मंगलवार, 15 मई 2018

पैसा


पैसा

जीवनसँ मृत्यु धरि,

ओकरे पसार हछि ।

एकरे लेल पढ़लोसभ ,

बनि गेल गमार अछि ।



बुझि नहि रहल क्यो जे,

ओ एक इंशान अछि,

पैसोसँ बढ़ि-चढ़ि,

 मनुक्खक इमान अछि ।



मनुक संतान देखू,

भेल रक्तबीज छथि,

पैसेकेँ बुझि रहल,

ओ सभ चीज छथि ।



चारू दिसि केहन ई,

चहल-पहल व्याप्त अछि,

पैसाक आगूमे,

क्यो नहि आप्त अछि ।



१८.११.८१

अनाहूत


अनाहूत

जेठक दुपहरिआमे,

पीपरक गाछ तर,

असोथकित बैसल छलहुँ,

एतबहिमे क्यो अनाहूत,

हमरे इशारा कए,

किछु कहि रहल छल ।

"जे हम दुखक झंझाबातसँ, दग्धभए, सुखक अन्वेषणमे,

तोरे देह सँ बहराएल छलहुँ,

मुदा एहि अर्थ युगमे,अभावक चक्रव्युहमे ओझराऐल,

पुनः तोरे देहमे प्रवेशक हेतु,

चेष्टा कए रहल छी ।

हमर अतिरुग्ण तन, अपने प्राणसँ डरि रहल छल,

जे एकर पुनरागमनसँ,

दुखक नूतन शृँखला प्रारंभ होएत,

कहि उठल-

"ठामहि रहह,हम विदा छी । "



(सन्१९८१)

अहीँक मर्जी !


अहीँक मर्जी !



हमर जीवन,

हमर सभ कामना,

हमर इक्षा ,हमर सभ भावना,

हे शृष्टिकर्त्ता अहीँक मर्जीपर ,

बनल अछि,चलि रहल अछि ।

हम हारि भागक चोटसँ,छटपटाएल,

भाविक पसरल जालसँ लटपटाएल,

किंकर्तव्य भए,अज्ञात दुर्गम मार्गपर,

चलतहि रहल छी,

सभकिछु अहीँक माया,

अहीँक विस्तार अछि,

से सोचि ,हे प्रभु!

कष्ट हँसि- हँसि सहि रहल छी ।

(सन्१९८१)

अर्थतंत्र


अर्थतंत्र

दूपहर रातिसँ,

ककरो आवाहन कए,

उद्विग्न भावे हम,स्वागतमे ठाढ़ छलहुँ ।

की हमर आवाहन मंत्रक कोनो पाँति,

गड़बढ भए गेल छल ?

जे आहूत आगन्तुक,

हमर देखितहिँ,

पाछुए हटैत गेल ।

आर वो कहैत गेल,

जे एहि आवाहनकेँ,

आविष्ट करबाक हेतु,

अर्थक प्रयोजन अछि,

कारण सभ मंत्र -तंत्र,

एहीसँ जोड़ल अछि ।

(सन्१९८१)

परिवर्तन


परिवर्तन
हरिअरीसँ भरल गाछक डारिसँ,
कुहकि कोयली गबै छल,
ई महमही,ई हरियरी,बस दू दिनक अछि ।

नहि क्यो सूनल,चलिते रहल,
दिन रााति अबिरल भावसँ ,बढ़िते रहल,
गन्तव्य की? ततबो पता ककरो ने छल ।

जे बटुक चल,से तरुण भए,
नित भोग कए,पुनि बृद्ध भए,
ठेहिआएल ओही गाछ तर सोचैत छल ।

की भेल? जे ई गाछ,जे हरियर रहए,
सुन्दर  सुगन्धित पुष्पसँ महमह करए,
से ठुट्ठ अछि,झड़ि गेल सभटा पात अछि "

निकटवर्ती पाथरक चट्टानसँ,
प्रतिध्वनित,वो गीत एखनहुँ भए रहल अछि,
"ई हरियरी, ई महमही, बस दू दिनक अछि ।
(नवम्बर १९८१)


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