सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

Be fair and just


Be fair and just

The justice delivery system of the country is very complicated, tiresome and costly and is far from the reach of the poor and the unprivileged section of the society. Therefore, informal arrangements existing in the society may prove very helpful and often save life and honour of many. In earlier days, there were village or caste heads who would call the important persons of the locality and deliver instant justice in front of the both sides, But such practices were often unfair and used to side with the stronger parties. In fact, such practices are still prevalent in some of the localities where they inflict heavy punishment upon persons seen violating the local systems. On many occasions, such panchayats even take away lives of children in love and wanted to marry inter caste or inter religion. The Government and the Judiciary have been trying their best to prevent such practices but it is not proving deterrent enough to ban such illegal practices altogether.

We were born to this world as a small kid. We were dependent upon our parents and other family members for our survival. It is because of compassion, love and affection shown by them that we could grow and develop into a complete man. By the time we grow and become adult, our parents and relatives become quite old. Now, it is our turn to repay their debt. We can do so by so many ways. Unfortunately, this is not happening and the old parents and other close relatives are left to defend themselves at the fag end of life even when they deserve sympathy and help from their wards. This has led to great social problem. The sense of justice which should have governed our actions is missing. This is happening   not only while dealing with our family but even with the outside world. This has created a vicious circle. We are willingly or unwillingly creating a world around us which is full of hatred, violence and revenge. We must put a halt to this situation, if we have to live in happiness and want our children to inherit a beautiful world full with love and affection.

Everybody small or big has to take decision with regard to his sphere of work. He is an important man for his family because decisions taken by him often decide the future of his family members. Similarly, decisions taken by an officer affects the life of his juniors. It may even bring happiness to his family life or create unwanted problems. A driver takes decisions every moment while driving and a single  wrong decision may create danger for the fellow travelers. Thus, everybody small or big is tasked with the responsibility of taking decisions which should be fare   and just so that persons   living in his proximity lead a happy and prosperous life.

Everybody is imbibed with the sense of justice. Nobody wants to be seen as unfair person. Nevertheless, there is so much violence, hatred and revenge dominating the mankind all over the world. Even democratic countries like US , U.K are not spared. Violence is all pervasive. This is happening mainly because we have become too much self centered. Whereas, we want best of everything, we do not ourselves practice the same in our own lives. If teacher will not teach in the school, the doctor will not treat his patient properly, Officers will not attend to the genuine grievances of the public with fairness, how will  the society progress? Ultimately, everybody suffers in such situations because he cannot live in isolation and have to share the same social situation alongwith others. It is, therefore, essential that we create a situation where   everybody understands and performs his duty honestly and always keeps   public good in mind while dealing with others problems in day to day life.

Everybody   is capable of delivering justice. However, this can happen only when the persons at the grassroot have proper education and have developed sense of compassion  towards one and all . Sense of justice is a God gift. It brings about compassion and kindness in our dealings with others. We become sensitive towards difficulties of others. Only such persons can bring happiness in the lives of others. It brings peace and harmony around us and we feel satisfied with good work done.



रविवार, 7 फ़रवरी 2021

किसान आंदोलन का सच



किसान आंदोलन का सच


आजकल देश एक विचित्र स्थिति से गुजर रहा है । देश के तथाकथित किसान अपने हितों की रक्षा के लिए सड़क पर उतर आए हैं । जहाँ-तहाँ धरान-प्रदर्शन कर रहे हैं । सड़कों को जाम कर दिया है । पंजाब,हरियाना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों में घूम-घूमकर आंदोलनकारी ग्रामीणों को जगा रहे हैं कि वे चेत जाएं और अगर अबकि चूके तो गए । २६ जनवरी को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था,जब इन्डिआ गेटपर आयोजित विशेष समारोह में देश के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, एवम् अन्य गणमान्य लोग गणतंत्र दिवस का परेड देख रहे थे ,जव राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीकों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा रहा था तभी कुछ सिरफिरे दिल्ली के कानून व्यवस्था को तहस-नहस कर लालकिला पर राष्ट्रीय ध्वज के बगल में अन्य ध्वजों को फहरा रहे थे। ऐसा करने के लिए उनलोगों ने जो सुनियोजित षड़यंत्र किया,जिस तरह संपूर्ण दिल्ली में हजारों ट्रैक्टर के साथ विप्लवकारी दृश्य उपस्थित किया वह समस्त देशवासियों ने स्वयं देखा । उपद्रकारियों में अधिकांश लोग लाठी,डंडा,तलवार और अन्य हथियारों से लैस थे । उनके गैर कानूनी हरकतों पर जब भी पुलिस के लोगों ने विराम लगाने की चेष्टा की तो उन्हें तलवार,और अन्य घातक हथियारों का सामना करना पड़ा । उस दिन सैकड़ों पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए बुरी तरह जख्मी हो गए । कुछ को तो आइसीयू में भर्ती करना पड़ा । २६ जनवरी जैसे शुभ दिन में देखते ही देखते सारे दिल्ली में भयावह दृश्य उपस्थित कर दिया गया । किसान आंदोलनकारियों के नेता जिन्होंने पुलिस के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का लिखित आश्वासन दिया था एकाएक कहीं गायब हो गए । आखिर, यह सब क्यों और किसके इशारे पर किया गया?

इस घटना के बाद अब कुछ यह कहते सुने जा रह हैं कि अगर आंदोलनकारियों ने कानून अपने हाथ में ले लिया  तो पुलिस क्या करती रही ?क्यों नहीं उनलोगों ने आंदोलनकारियों के खिलाफ समुचित वलप्रयोग कर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया?

इस बात में कोई  सक नहीं है कि दिल्ली में २६ जनवरी २०२१ के दिन आंदोलनकारियों ने ऐसा माहौल बना दिया था कि पुलिस कठोर कदम उठा सकती थी । पर उन्होंने बड़े धैर्य और संयम से काम लिया । जहाँ बहुत जरूरी हुा वहीं आँसू गैस और डंडे से काम चलाया गया जबकि सैकड़ों पुलिस कर्मी को आंदोलनकारियों ने घायल कर दिया । संभवतः वे लोग चाहते थे कि सरकारी गोली चलबा दे ताकि उन्हें सरकार के खिलाफ कुछ और कहने-करने का मौका मिल जाए । यह कम आश्चर्य की बात नहीं हे कि दिल्ली पुलिस ने अभूतपूर्व संयम का परिचय देते हुए और अपनी जान का बाजी लगाकर ऐसा कुछ नहीं होने दिया । लेकिन आंदोलनकारियों ने इसका भरपूर नाजायाज फैदा उठाया और भारी तादाद में हिंसा पर उतारू भीड़ लाल किले को अपने कब्जे में ले लिया । इतना ही नहीं,कुछ लोग तो वहाँ तलबार भांजते रहे । तरह-तरह के उत्तेजक भाषणबाजी करते रहे। इसी बीच राष्ट्रीय झंडे के पास में एक और झंडा लगा दिया गया । ऐसा करने के बाद कई लोगों ने विजयी मुद्रा बनाते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान को चुनौती देते हुए सभी राष्ट्रप्रेमी लोगों की भावना का जो अनादर किया सायद इसका उनको तनिक भी परबाह नहीं था । लेकिन जो नुकसान होना था सो तो हो चुका । जिस लालकिले पर तिरंगे झंडा को फहराते देखने का स्वप्न पाले हुए पता नहीं कितने लोग शहीद हो गए,उसी स्थान पर ऐसा राष्ट्रविरोधी दृश्य उपस्थित करने का आखिर मकसद क्या था?

यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि जब किसान कानून के मामले में उच्चतम न्यायालय सुनाबई कर ही रही है और इस कानून पर फिलहाल रोक भी लगा दिया गया है,इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय ने एक समिति गठित कर इस मामले पर प्रतिवेदन देने को कहा है तो भी आंदोलन क्यों नहीं रोका जा रहा है? प्रधान मंत्री कई बार कह चुके हैं कि इस कानून से किसानों के हितों पर कोई क्षति नहीं होगा,किसी किसान की जमीन नहीं जाएगी,तब भी क्यों हंगामा किया जा रहा है? उतना ही नहीं,अब तो सरकार खुद डेढ़साल तक इस कानून पर रोक लगा देने के लिए तैयार है,तब भी किसानों के साथ सरकार की बातचीत क्यों असफल हो गई ? आखिर किसान नेता चाहते क्या हैं? क्या संसद के द्वारा बहुमत से पास किसी कानून को कुछ लोग वलप्रयोग करते हुए रोकने पर सरकार को मजबूर कर देंगे तो देश में जनतंत्र कितने दिन चल पाएगा? कोई कानून संवैधानिक है या नहीं इसके लिए भारत में स्वतंत्र न्यायपालिका का प्रवधान भारत के संविधान ने कर रखा है। ऐसा क्या हुआ है कि आंदोलनकारियों को संसद,सरकार,प्रधानमंत्री ,उच्चतम न्यायालय सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं में से किसी पर भी विश्वास नहीं हो रहा है । इन सब बातों पर विचार करने से यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि किसान आंदोलनकारियों की भेष में कहीं ये लोग कुछ क्षद्म एजेंडा तो नहीं चला रहे हैं?

यह समझ से परे है कि आंदोलन शुरु होते ही विदेशों से इसके समर्थनमें आवाज उठने लगी। सरकार लगातार  किसान आंदोलनकारियों से समझौता करने का प्रयास करती रही । इस प्रयास में वे जितने ही आगे बढ़े किसान नेता उतने ही कठोर रुख बनाते रहे। जरा सोचिए कि संसद द्वारा विधिपूर्वक पास कानून को कुछ मुठ्ठी भर लोग चुनौती दें और कानून निरस्त हो जाए तो देश में कौन सा लोकतंत्र चलेगा? सरकार से यह अपेक्षा करना कि कानून पूर्णतः रद्द कर दिया जाए तभी वे लोग आंदोलन बंद करेंगे,कहीं से भी न्यायसंगत नहीं लगता है ।

 दिल्ली में छब्बीस जनवरी को ट्रैक्टर रैली के नाम पर जो हिंसा किए गए,जिस तरह भयावह दृष्य उतपन्न कर दिया गया,लाल किला को अपमानित कर राष्ट्रीय स्वाभिमान पर चोट किया गया,उस से सारा देश क्षुव्ध है । एकदिन तो ऐसा लग रहा था कि अब यह आंदोलन यहीं समाप्त हो जाएगा । कुछ लोग अपना-अपना सामान हटाकर वापस जाने भी लगे थे । लेकिन फिर अचानक क्या हुआ कि वे लोग अपने पुराने स्थान पर वापस लौट आए । अब फिर वही हालात बना दिए गए।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली के आस-पास ही यह आंदोलन सिमटा हुआ है । पंजाब पश्चिम उत्तरप्रदेश और हरियाना के कुछ हिस्सोंके कुछ लोग ही इस से जुड़े हुए लगते हैं । हला कि इस बात की लगातार कोशिश की जा रही हे कि पंजाब की तरह अन्य राज्यों के लोग भी इस से जुड़े पर वैसा अबतक हुआ नहीं है । पंजाब में जरूर इसका व्यापक प्रभाव दिख रहा है । इसका एक प्रमुख कारण वहाँ  होने बाले विधान सभा का आगामी चुनाव और उस से जुड़ा हुआ राजनीतिक स्वार्थ है । अकाकी दल,कांग्रेस, और आम आदमी पार्टी सभी इस मौके का लाभ उठाना चाहते है । जनता इस कानून के बारे में कतनी जानती है ,यह कौन जानना चाहता है? लगता है कि अधिकांश किसान को भ्रमित किया जा रहा है । उनके सीधेपन का राजनीतिक दुरुपयोग हो रहा है। अगर कानून में कमी है तो उसके सुधार का संवैधानिक उपचार होना चाहिए था । इसके लिए कुछ लोग उच्चतम न्यायालय का रुख कर भी चुके हैं ।  उच्चतम न्यायालय इस मामले में उचित कारबाई कर भी रही है । लेकिन आंदोलनकारी तो उच्चतम न्यायालय में भी विश्वास करने के लिए तैयार नहीं दीख रहे हैं । लेकिन क्यों?

अब यह सभी जानते हैं कि किसान के नाम पर चलाए जा रहे आंदोलनक मूल उद्दयेश्य मोदीजी को राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। वे इसके लिए अनंत काल तक आंदोलन चलाने के लिए तैयार दीखते हैं । फिर यह कैसे मान लिया जाए कि तीनों कृषि संवंधित कानून अगर समाप्त भी कर दिया जाए तो आंदोलनकारी चुप बैठ जाएंगे । वे तो द्विगुणित शक्ति से फिर कुछ मौका ढ़ूंढ़कर नया बखेरा तबतक करते रहेंगे जबतक सन् २०२४ में देश का अगला आम चुनाव नहीं हो जाता है। इस बीच होने बाले राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव भी इस आंदोलन को चलाए रखने का एक मकसद है । बंगाल,पंजाब,उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के विधानसभाओं का चुनाव में वे बीजेपी को पराजित होते देखना चाहते हैं । यह सब किसलिए और कौन कर रहा है यह कहने की आवश्यकता नहीं है । ऐसे लोगों को न तो देश हित की चिंता है न ही विदेश में हो रहे भारत की छवि को नुकसान का । जाहिर है कि इसका फैदा भारत विरोधी शक्तियाँ जैसे चीन,पाकिस्तान उठाएंगी और क्यों न उठाएं? जब अपने लोग ही दुश्मनहो जाएं तो देश कबतक बचेगा? जरुरी है कि देशवासी इन तमाम षड़यंत्रों से सावधान हो जाएं और एसे तमाम देश विरोधी ताकतों को माकूल जबाब दें जिस से वे दुबारा ऐसा कुछ करने से पहले सौ बार सोचें ।


रबीन्द्र नारायण मिश्र



बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

उपभोक्ता संरक्षण कानून २०१९



उपभोक्ता संरक्षण कानून २०१९


नव अधिनियम बनाएब किएक जरुरी भेल?

एकटा समय छल जे कोनो वस्तु किनबाक हेतु लोक कैक दिनसँ तैयारी करैत छल । मधुबनी,दरभंगा वा लगपासक कोनो हाट-बजार जाइत छल । तखन दोकाने-दोकाने घुमैत छल । अपन आवश्यकता आ सामर्थ्यक अनुसार वस्तुक चयन करैत छल । दामक मोलौअलि करैत छल । जँ सौदा पटि गेलैक तँ ओकर दाम देलक  आ ओहि वस्तुकेँ लेने चलि अबैत छल । आब समय बहुत बदलि गेल । इंटरनेटक युगमे लोकसभ घरे बैसल अपन स्मार्टफोनपर एमजान,बिग बास्केट वा अन्य कोनो कंपनीक एप खोलि कए चीज-वस्तु पसिंद करैत छथि,ओकर आनलाइन भूगतान करैत छथि आ घरे बैसल एक-दू दिनक बाद ओहि वस्तुकेँ प्राप्त कए लैत छथि । जाहिर छैक जे एहि व्यवस्थामे ग्राहककेँ दोकानदारसँ भेंट नहि होइत छैक,ने ओ क्रय कएल गेल वस्तुकेँ सद्यः देखि सकैत अछि ,ओकर जाँच-पड़तालक अवसर तँ नहिए रहैत छैक । तेँ अधिकांश कंपनी एहन वस्तुकेँ एकटा तय समयक भीतर वापस करबाक नियम बनओने रहैत छथि । जँ कोनो दिक्कति भेल,तँ भूगतान कएल गेल टाका वापस कए दैत छथि। एहिसभ व्यवस्थाक अछैत कहिओ काल उपभोक्ताकेँ एहिसभमे परेसानी होएब स्वबाविक थिक । संगहि आनलाइन क्रय बिकरी केनिहार कंपनीसभकेँ कानूनी नियंत्रणमे रखनाइ एहू लेल जरूरी अछि जे ओ सभ मनमानी नहि करए,उपभोक्ताकेँ वाजिब दामपर सही वस्तु भेटैक आ बजारमे उचित प्रतिस्पर्धा बनल रहए, बजारपरकोनो कंपनीक एकाधिकार नहि भए जाइक ।

किनबाक कतेको विकल्प आ भूगतानक सुविधा बढ़बाक संगहि उपभोक्ताक अधिकारक संरक्षण सेहो कठिन भए गेल अछि । बिकरी हेतु वस्तु कतहु अछि,किननाहर कतहु छथि,भूगतान कोनो तेसर माध्यमसँ भए रहल अछि । ई सभ बात पहिने केओ सोचिओ नहि सकैत छल। एकहिठाम ग्राहक,विक्रेता आमने-सामने सभकिछु करैत छलाह । मुदा आब से नहि रहलैक । तेँ एहिसभ परिस्थितिकेँ ध्यानमे राखब सरकारक हेतु सेहो जरुरी भए गेल । पुरनका कानून झूस पड़ि गेल आ नव कानून बनाएब जरुरी भए गेल । एही बात सभकेँ  ध्यानमे रखैत उपभोक्ता संरक्षण कानून २०१९ संसद द्वारा स्वीकृत भेल जे माननीय राष्ट्रपति महोदयक स्वीकृतिक  बाद ९ अगस्त २०१९क सरकारी गजेटमे छपल । तकर बाद भारत सरकार द्वारा२० जुलाइ २०२०क एहि कानूनकेँ लागू कएल गेल।

उपभोक्ताक नव परिभाषा:

जे केओ अपन उपयोग हेतु कोनो वस्तु किनैत छथि वा कोनो प्रकारक सेवा प्राप्त करैत छथि से एहि कानूनक मोताबिक उपभोक्ता छथि । मुदा पुनर्विक्रय वा वाणिज्यिक उद्देश्यक हेतु कोनो व्यक्ति द्वारा कोनो वस्तु किनल जाइत अछि वा कोनो प्रकारक सेवा प्राप्त कएल जाइत अछि तँ ओ उपभोक्ता नहि मानल जएताह।

ई-कॉमर्स लेनदेन सेहो सामिल अछि:

केओ व्यक्ति जे कोनो  सामान किनैत अछि, चाहे ओ ऑफलाइन वा ऑनलाइन लेनदेन, इलेक्ट्रॉनिक साधन, टेलीशॉपिंग, डायरेक्ट सेलिंग वा मल्टी-लेवल मार्केटिंगक माध्यमसँ होइ सेहो उपभोक्ता मानल जएताह।

उपभोक्ताक अधिकार:

  अधिनियम उपभोक्ताकेँ निम्नलिखित प्रमुख अधिकार प्रदान करैत अछि;

हानिकारक वस्तु आओर सेवासँ  सुरक्षित राखब।

वस्तु वा सेवाक मात्रा, गुणवत्ता, शुद्धता, शक्ति, मूल्य आओर मानकक बारेमे जानकारी होएब।

प्रतिस्पर्धी मूल्यपर विभिन्न प्रकारक वस्तु वा सेवा उपलव्ध होएब ।

उपभोक्ताक हितक उचित विचार करबाक हेतु सुनबाइ करब आ आश्वस्त करब ।

अनुचित वा प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथासँ रक्षा करब ।

उपभोक्ता जागरूकताक अधिकार ।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) क स्थापना:

एहि अधिनियममे केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरणक स्थापनाक व्यवस्था अछि जे उपभोक्ताक अधिकारक रक्षा, संवर्धन आओर लागू करत । केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण  अनुचित व्यापार प्रथा, भ्रामक विज्ञापन आओर उपभोक्ता अधिकारक उल्लंघनसँ संबंधित मामिलाकेँ  सुनबाइ करत।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण  केँ उल्लंघन केनिहारपर जुर्माना लगाएब आओर वस्तु वा सेवाकेँ वापस लेब, अनुचित व्यापार प्रथाकेँ बंद करब आओर उपभोक्ता द्वारा भुगतान कएल गेल मूल्यक  प्रतिपूर्तिक आदेश पारित करबाक अधिकार होएत ।

गलत वा भ्रामक विज्ञापनक हेतु दंड:

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) केँ भ्रामक वा गलत विज्ञापन देलापर एंडोर्सर वा निर्मातापर दस लाख रुपयाक जुर्माना लगाबक अधिकार अछि । केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण  ओकरा एहि हेतु  दू साल धरि जहलक दंड सेहो दए सकैत अछि । दोबार  एहने अपराध केलापर जुर्माना पचास लाख रुपया आओर पाँच साल धरि जहल सेहो भए सकैत अछि ।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरणक पास एहन उल्लंघनक जांच आओर जांच करबाक हेतु जाँच-पड़ताल विभाग( investigation wing) होएत । केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण क अध्यक्षता महानिदेशक करताह।

उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (सीडीआरसी):

एहि अधिनियम मे राष्ट्रीय, राज्य आओर जिला स्तरपर उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (सीडीआरसी) क स्थापनाक व्यवस्था अछि। उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (सीडीआरसी) निम्नलिखित  तरहक सिकाइतक सुनबाइ करत;

अधिक वा भ्रामक शुल्क ओसूल करब ।

अनुचित वा प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथा ।

एहन वस्तु आओर सेवाक बिकरी जे जीवनक हेतु हानिकारक भए सकैत अछि।

दोषपूर्ण वस्तु वा सेवाक बिकरी

उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगक क्षेत्राधिकार:

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग दस करोड़ रुपयासँ बेसीक सिकाइतक सुनबाइ करत । वस्तु वा सेवाक मूल्य एक करोड़ रुपया सँ अधिक मुदा दस करोड़ रुपयासँ कम भेलापर राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग सिकाइतक सुनबाइ करत । जखन कि जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग वस्तु वा सेवाक मूल्य एक करोड़ रुपया तक भेलापर सिकाइतक सुनबाइ करत । पाँचलाख मूल्य धरिक वस्तु वा सेवासँ संवंधित सिकाइत केलापर कोनो फीस जमा नहि करए पड़त ।

ई-कॉमर्स लेनदेन सेहो सामिल अछि:

उपभोक्ता क अर्थ अछि केओ व्यक्ति जे कोनो  सामान किनैत अछि, चाहे ओ ऑफलाइन वा ऑनलाइन लेनदेन, इलेक्ट्रॉनिक साधन, टेलीशॉपिंग, डायरेक्ट सेलिंग वा मल्टी-लेवल मार्केटिंगक माध्यमसँ होइ ।

सिकाइतक ई-फाइलिंग:

नव कानूनक अनुसार उपभोक्ता इलेक्ट्रिनिक माध्यमसँ अपन सिकाइत संवंधित उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगक समक्ष अपन घर वा कार्यस्थानसँ कए सकैत छथि ।उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगक अधिकार क्षेत्रक निर्धारण उपभोक्ताक आवास वा कार्यालयक पताक आधारपर कएल जाएत । उपभोक्ता अपन आवेदनक सुनवाइमे भिडिओ कान्फ्रेमसींगक माध्यमसँ भाग लए सकैत छथि । ताहि हेतु हुनका ओकील राखब जरुरी नहि अछि ।

वैकल्पिक विवाद समाधान :

उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग सिकाइतकर्त्ताक सहमतिसँ मामिलाक त्वरित समाधान हेतु मध्यस्तता प्रकोष्ठकेँ पठा सकैत अछि । मध्यस्तता प्रकोष्ठ ओहि सिकाइतक समयवद्ध तरीकासँ समाधान करत । एहि प्रकोष्ठ द्वारा कएल गेल समाधानक खिलाफ अपील नहि भए सकैत अछि ।

उपभोक्ताक सिकाइत संवंधित बहुत रास मामिला देशक विभिन्न भागमे बहुत-बहुत दिन धरि लंवित चलि रहल छल । एहि कानूनमे समयवद्ध तरीकासँ एहन सिकाइत सभक समाधान करबाक प्रावधान भेलासँ उपभोक्ताकेँ समयसँ आ बिना विलंबकेँ न्याय भेटतनि । एहि कानून लागू भेलासँ जागू ग्राहक जागूक मंत्रवाक्यकेँ साकार करबाक रस्ता आओर सरल भए गेल अछि ।  वस्तुक निर्माता आ व्यापारी वर्गकेँ आब एहसास हेतैक जे सक्षम कानून बनि गेलाक बाद उपभोक्ताक अधिकारक क्षति पहुँचाएब मोसकिल अछि आ जँ से कएल गेल आ कोनो प्रकारसँ उपभोक्ताकेँ ठगल जेतनि वा अनुचित क्षति कएल जेतनि तँ  ओ सभ निचैन नहि रहि सकताह,कानून हुनकासभकेँ उचित दंड दिआबएमे सक्षम होएत । मुदा से तँ तखने होएत जखन संवंधित उपभोक्ता सही समयपर उचित फोरममे अपन सिकाइत करताह ।













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