शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

लोकतंत्र का महाभारत


लोकतंत्र का  महाभारत



भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है । संबैधानिक व्यवस्थाओं के अनुसार  हमारे देश में केन्द्र सरकार और राज्यों में अलग-अलग सरकारों का प्रावधान है। केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकार और कार्यक्षेत्र बंटे हुए हैं । केन्द्रीय सरकार/ राज्य सरकारों के  गठन के लिए लोकसभा और विधानसभाओं  का चुनाव प्रत्येक पाँच साल पर कराना होता है । अगर जरुरी हुआ तो मध्यावधि चुनाव भी कराये जा सकते हैं। संबैधानिक व्यवस्थाओं के अनुकूल ही देश में अगले लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव मई २०१९ में कराया जाना है। यद्यपि चुनाव की विधिवत अधिसूचना अभी नहीं हुई है ,फिर भी पूरे देश चुनावी माहौल में रंगा नजर आने लगा है । सत्ता पक्ष और विपक्ष तरह-तरह की घोषणाएं कर रही हैं सभी जनता को आकर्षित करने के लिए लोक-लुभावन वादे भी करते जा रहे हैं ।  चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है । देश में लोकतंत्र को बनाए रखने का यही साधन है । इसलिए जो कुछ हो रहा है वह सामयिक ही है । परंतु चिंता की बात यह है कि देशभर में अभी से कटुतापूर्ण वातावरण बनता जा रहा है । 
देश के सब से पुराने और साठ साल तक देश  राज करने बाले कांग्रेस पार्टी पर चार पुस्तों से एक ही परिवार राज कर रहा हे । यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि इतना पुराने राष्ट्रीय दल अपने लिए एक परिवार से हटकर कई नेता नहीं ढूंढ़ सका। पारिवारिक सदस्यों की पकड़ और मजबूत करने के लिए उसी परिवार के एक अन्य सदस्य को महासचिव बनाकर चुनावी मैदान में उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य की कमान सौंप दी गई ,वह भी ऐसे समय जब यह कहने के पर्याप्त कारण हैं कि ऐसा करते समय उनके दिमाग में जरूर यह बात रही होगी कि एकबार राजनीति में आ गये तो पारिवारिक सदस्यों पर आर्थिक अपराधों से जुड़े तरह-तरह के आरोपों से बचने का बहुत ही आसान बहाना मिल जाएगा। वे आसानी  से कह सकते हैं कि हमलोगों से  राजनीतिक बदला लिया जा रहा है । सब से चिंता की बात यह है कि देश में भ्रष्टाचार को अब सहजता से लिया जाने लगा है । एसे लोग जेल जाते समय ऐसी भाव भंगिमा बनाते हैं जैसे कि वे स्वतंत्रता सेनानी हों । 
पिछले कुछ महिनों से कांग्रस अध्यक्ष लगातार राफेल सौदे के बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे हैं । देश के चुने हुए प्रधानमंत्री के बारे में इस तरह की बातें  बिना पुख्ता सबूत के करते रहना देश हित में नहीं है , वह भी तब जब कि इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि इसमें किसी भी प्रकार से कोई गड़बड़ी नहीं हुई है । जब  आब इस के बाद जेपीसी की बात उठाना और कुछ,कुछ कहते रहने का साफ माने यह निकलता है कि कांग्रेस पार्टी के नेता खासकर कांग्रस अध्यक्ष  इस मुद्दे को लोकसभा के आनेबाले चुनाव तक चलाते रहना चाहते हैं ताकि कुछ लोगों में भ्रम पैदा करने में वे सफल हो सकें । पता नहीं वे इस मकसद में कितना कामयाब हो पाते हैं लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह के दुषप्रचार से देश की प्रतिष्ठा को व्यापक क्षति पहुँची है । अगर कांग्रस अध्यक्ष के पास इस मामले में सबूत थे तो उन्होंने इसे उच्चतम न्यायालय के सामने क्यों नहीं रखा? इस बात में विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि उनमे पास कोई सबूत है ही नहीं,बस वे जैसे,तैसे एक ही झूठ बार-बार दोहराए जा रहे हैं । ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि विपक्ष के पास मोदी हटाओ के सिवा कोई और मुद्दा है ही नहीं।
हाल ही में सीबीआइ के अधिकारियों के साथ कोलकाता में कोलकाता पुलिस द्वारा की गई कार्यबाई कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है । वहाँ के पुलिस आयुक्त से पूछताछ करने गये सीबीआइ के अधिकारियों के साथ धक्कामुक्की की गई,उन्हें थाना ले जाया गया और घंटो वहाँ उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया । उतना ही नहीं,पुलिस ने वहाँ के सीबीआइ के संयुक्त निदेशक के सरकारी आवास को भी घेरे रखा जिस वजह से उनके पारिवारिक लोगों को घंटो दहशत में रहना पड़ा । यह मामला उच्चतम न्यायालय तक गया और कोलकाता के पुलिस आयुक्त को सीबीआइ के सामने शिलांग में पेश होने का आदेश दिया गया। इस से स्पष्ट है कि सीबीआइ को कोलकाता के पुलिस आयुक्त के पास पूछताछ के लिए जाना सही था । अब उनको शिलांग  में सीबीआइ के पास पेश होना होगा । इस से यह भी स्पष्ट है कि माननीय न्यायालय को भी कोलकाता में इसके लिए उचित  माहौल का अभाव लगा । इसी विषय पर वहाँ के मुख्यमंत्री का सरेआम धरना पर बैठना तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन तो है ही, देश के संघीय ढांचा का भी खुल्लमखुल्ला चुनौती है । सबाल है कि जब देश ही नहीं बचेगा तो लोकतंत्र कहाँ से बंच पायेगा? लेकिन दुख  की बात यह है कि इन नेताओं को तो चुनाव जीतने के अलावा और कुछ दीखता ही नहीं है । पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेताओं को राजनैतिक रैलियाँ निकालने,बैठक करने में तरह-तरह से दिक्कतें पैदा की जा रही है । कई राष्ट्रीय नेताओं के हेलीकाप्टर को उतरने नहीं दिया जा रहा है । यहाँ तक कि प्रधान मंत्री के रैलियों में भी पर्याप्त सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की जाती है। आश्चर्य बात है कि ऐसे कार्य करने बाले लोग भी मोदीजी को अलोकतांत्रिक बताने में सब से आगे हैं । इस सब से स्पष्ट है कि इन के करनी और कथनी में कहीं से साम्य नहीं है । 
आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री चार साल तक एनडीए के साथ थे । सभी को पता है कि बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत लोकसभा में प्राप्त था और सरकार चलाने के लिए किसी अन्य दल की आवश्यकता नहीं थी । फिर भी एनडीए के घटक दलों को केन्द्रीय सरकार में शामिल किया गया और वे हुए भी। उन्होंने सायद सोचा कि भागते भूत की लंगोटी ही सही । परिस्थिति ही ऐसी बन गई की एनडीए के घटक दलों के पास सौदेबाजी की शक्ति नहीं रह गई । जिसको जो विभाग मिले ,सबों ने लेने में ही भलाई समझी । जब पूरे चार साल तक राजसुख भोग लिया तो उनको  एकाएक अपने राज्य को विशेष दर्जा दिलाने की सुधि आई । उन्हें लगने लगा कि उनके राज्य के साथ बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार  केन्द्र सरकार कर रही है । फिर तो उन्होंने ऐसा समा बांधा कि एनडीए से नाता ही नहीं तोड़ा,क्या-क्या कहने लगे यह सभी जानते हैं । अब तो ऐसा लगता है कि मोदीजी हट गये तो उनके राज्य में स्वर्ग आ जाएगा । अगर ऐसा ही था तो वे चरसाल तक चुप क्यों रहे? साल-दोसाल काफी था । असल में चुनावी गणित को प्रमुखता देते हुए ही सारे लोक अपना भविष्य का निर्णय ले रहे हैं । इस में कुछ गलत भी नहीं है ,परंतु लोकतांत्रिक समाज में यह सबों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यवहार में शालीनताऔर ईमान्दारी का परिचय दें । मतभेद व्यक्त करते हुए मर्यादाओं का ध्यान भी रखा जा सकता था खासकर जब चारसाल तक आप कंधा से कंधा मिलाकर चल रहे थे,केन्द्र सरकार में शामिल थे। जाहिर है कि राजनीतिक स्वार्थ या अहं के टकराव को राज्य हित  का बहाना बनाकार लोगों को भ्रमित करना एक आम बात हो गई है और यह बात केवल वहीं तक सीमित नहीं रह गई है।
सभी जानते हैं कि बिहार के चर्चित चारा घोटाला में कुछ महत्वपूर्ण लोग क्यों जेल में बंद हैं । बिहार के गरीब जनता के पैसों को चरबाहा विद्यालय और जानबारों के चारा खरीदने के नाम पर सरेआम लूटा गया । यह लूट सालों चलती रही । भला हो कुछ ईमानदार अधिकारयों का, जिन्होंने इस लूट को पकड़ा और नौकरी को जोखिम में डालकर उचित कानूनी कार्रवाई की । बहुत सारे ऐसे मामलों में सालों चली कानूनी प्रकृया के बाद अदालतों ने उनको  एवम् अन्यों को इस  भयानक भ्रष्टाचार के मामलों में सजा देने में कामयाब रही । अभी भी कुछ मामलों में फैसला होना बाँकी है । अगर कोई भी उपाय होता तो भ्रष्टाचारी बँच निकलते पर वे ऐसा नहीं कर सके क्यों कि अभी भी ईमान्दार अधिकारी और न्यायाधीश देशहित को सर्वोपरि रखकर काम करते हैं। ऐसे ही  लोगों के बजह ये लोग सलाखों के पीछे जीने के लिए मजबूर हैं । मजबूरी में उनके लोगों को यह स्वीकार करना पड़ा है परंतु वे जेल से बँच निकलने की भरपूर कोशिश अभी भी करने से बाज नहीं आ रहे हैं । अब उन्हें लगने लगा है कि मोदीजी के रहते तो कानूनी फंदों से बँच निकलना नामुमकीन है तो लोकसभा का चुनाव आशन्न देखकर उमीद लगाए हुए हैं की कोई ऐसी सरकार केन्द्र में बन जाए जिससे वे जमानत पर ही सही जेलों से बाहर हो सकें । आश्चर्य की बात है कि इस तरह भ्रष्टाचार के मुकदमो में सजा पाए लोग भी मोदीजी को ईमानदारी से काम करने की सलाह देते है । वे अपने समर्थकों को यह बताने से भी नहीं चूकते हैं कि मोदीजी के बजह से ही उनको फँसाया गया है । इसे आप क्या कहेंगे? निश्चय ही ये लोग मान बैठे हैं कि वे जब और जैसा चाहेँ अपने अंध समर्थकों को मूर्ख बनाते रह सकते हैं । परंतु उन्हें इस बात का अंदाज होना चाहिए की देश की जनता अब बहुत सजग है । वह वारंबार अपना मत बड़ी स्पष्टता से प्रकट भी कर रही है । लेकिन तब सत्य को समझ कर भी वे जनता को मूर्ख समझने की कोशिश करते हुए पाए जाते हैं। लेकिन भ्रम की इस स्वनिर्मित  मायाजाल से वे कब तक सच्चाई को दबा सकते हैं? । यही कारण है कि वे आज इतने हताश दिख रहै हैं ।
उत्तरप्रदेश में लोकसभा के अस्सी सीटों का चुनाव होना है । जातीय आधार पर मतों का ध्रुवीकरण सुनिश्चित करने के लिए बासपा और सपा ने आपस में गठवंधन किआ है । इस से कांग्रेस को बाहर रखा गया है।उनका कहना है कि वहाँ कांग्रेस के पास जनाधार है ही नहीं फिर उनको साथ लाकर क्या होगा? कांग्रेस के लोग उनको आगे लाकर चुनावी परिदृष्य को कितना प्रभावित कर सकेंगे यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन यह तो तय है कि उत्तरप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में ही महागठवंधन फेल होता नजर आ रहा है और चुनाव में कई पक्षों के होने की संभावना बढ़ती नजर आ रही है। इस तरह स्पष्ट है कि इस चुनावी महाभारत में सभी पार्टियां मोदीजी को पदच्युत करने के लिए कटिवद्द लग रही हैं। पर सबाल है कि क्या देश की जनता भी उनके साथ जाने के लिए तैयार है । इस प्रश्न का जबाब तो लोकसभा के चुनाव के परिणाम के आने के बाद ही मिल सकता है । पर इतना तो साफ है कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से लोहा लेने के लिए सारे विपक्षी नेताओं को एकजुट होने के लिए विवश होना पर रहा है । फिर भी वे इस सबों पर अकेले ही भारी पड़ते लग रहे हैं। देश में मान लीजिए महागठबंधन बनाकर वे तमाम विपक्षी पार्टियाँ केन्द्र में मोदीजी को हराने में सफल हो भी जाती हैं तो क्या वे एक सफल सरकार दे पाने की स्थिति में होंगे? अगर आप इनलोगों से पुछेंगे तो जबाब यही देते हैं कि इन सारी बातों पर चुनाव के बाद मिनटों मे निर्णय ले लिया जाएगा,कोई दिक्कत नहीं आएगी,आदि,आदि। वे इसके अलावा कुछ और कह भी नहीं सकते हैं,क्योंकि वहाँ दर्जन से भी ज्यादा प्रधामंत्री के प्रत्याशी मौके की ताक में घूम रहे हैं ।
देश चुनावों के दौरान बूथ कब्जा करने के दौर से बड़े मुश्किल से बाहर आ पाया है । इस के लिए शत-प्रतिशत योगदान इभीएम मशीनों का है । चुनाव में इन मशीनों को लगाने का फैसला कांग्रेस सरकारों के दौरान ही हुए थे,उसी दौरान ये मशीन  खरीदे गये और इनका सफलतापूर्वक उपयोग भी हुआ । चुनाव पर चुनाव इन्हीं मशीनों के सहारे होते रहे । यहाँ तक कि सन् २०१४ के लोकसभा और उसके बाद हुए कई विधानसभाओं के चुनावों में भी इन मशीनों का सदा-सर्वादा की तरह उपयोग होते रहे । परंतु, सन् २०१७ के उत्तर प्रदेश के विधानसभा में विपक्षी दलों को कराड़ी हार के बाद उन्होंने हार का टिकड़ा इभीएम मशीनों पर फोड़ना शुरु कर दिया । ऐसा इसीलिए कया गया कि मतदाता खासकर अपने समर्थकों को भुलावा में रखने और अपनी गिड़ती हुई साख को बचाने के लिए इनके पास कुछ भी विकल्प नहीं दिख रहा था । तभी से योजनावद्ध ढंग से इभीएम मशीनो को हैक करने की झूठी खबरें चलाई जा रही है । कभी दिल्ली की विधानसभा में तो कभी लंदन तक में इस मशीन की तथाकथित निकंम्मेपन की जानकारी प्रचारित की जात है । निश्चय ही इसके लिए काफी खर्चा भी किया जाता होगा । कोई इस तरह का नाटक मुफ्त में क्यों करेगा? दुख की बात यह है कि जब इन अफवाहों का संज्ञान लेते हुए देश के चुनाव आयोग ने सभी दलों को इभीएम मशीन के तकनीकी विश्लेषण हेतु आमंत्रित किया तो विपक्षी दलों ने इस में पर्याप्त रूचि नहीं दिखाई । एसा होना ही था ,क्यों कि उनको इस मशीन को सही साबित करना ही नहीं है । उनका एकमात्र मकसद जनता और अन्य लोगों में यह भ्रम फेला देना है कि चुनाव ठीक से होते ही नहीं अन्यथा वे ही चुनाव जीतते ,आदि,आदि । आश्चर्य की बात यह है कि जब  और जहाँ विपक्षी चुनाव जीतते हैं वहाँ की इभीएम मशीन कैसे ठीक काम करने लगती है और वे गलत चुनाव को सही कैसे मान लेते हैं,चुपके अपनी सरकार क्यों बना लेते हैं ,क्यों नहीं यह कहकर इस्तिफा दे देते हैं कि इस मशीन से चुनाव कराया गया ,इसलिए यह सही नहीं है?
विपक्षी दल यह भी नहीं  सोचते हैं कि इस तरह के गलत प्रचार से विदेशों में भारत की खासकर  हमारे चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा। देश की प्रतिष्ठा रहे या जाय,उनको तो हर हाल में खुद को सही और सरकार को गलत साबित करना ही है । इस तरह की हठधर्मिता और पूर्वाग्रहित कार्य से देश का सर्वनाश तो  होगा ही उन दलों का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता है । उनको यह समझना चाहिए कि देश में लोकतंत्र जिंदा है तभी वे सरकार के खिलाफ इस तरह बोल पा रहे हैं और आने बाले चुनावों में अपनी जीत का सपना देख पाते है । परंतु सत्ता हथिआने का सरल मार्ग अपनाकर देश की जनता को इस कदर मूर्ख बनाने की कोशिश उल्टा ही पड़ेगा ।
जिस तरह ठीक चुनाव से पहले तथाकथित असहिष्णुता  की बातें जोड़ पकड़ लेती हे उस से यह कहीं-न-कहीं शक जरुर पैदा होता है कि यह सब प्रायोजित तो नहीं है? विहार के विधानसभा के चुनाव के समय देश के कई लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाने शुरु किए । जैसे ही विहार का चुनाव संपन्न हो गया वे सभी इस तरह चुप हो गये जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । अगर सचमुच के वे लोग इस मामले मैं चिंतित थे तो इस आंदोलन को आगे बढ़ाते और अपने लक्ष्य तक पहुँचने तक जारी रखते । परंतु ऐसा नहीं हुआ । अब फिर थोड़े दिन पहले ठीक उसी प्रकार से सीनेमा जगत के एक चर्चित कलाकार ने असहिष्णुता की बात उठाई है । कुछ लेखक,वुद्धिजीवी ने देश में फैल रहे इस समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए संकट को इतना गंभीर बताया है कि इस से उनके बच्चों के भविष्य को भी खतरा लगने लगा है । इस में कोई शक नहीं लगता है कि बिहार के चुनाव के तरह लोकसभा के चुनाव को प्रभावित करना ही उनका मूल लक्ष्य है और चुनाव संपन्न होते ही ये सभी दृष्यपटल से ऐसे ही गायब हो जाएंगे जैसे कि बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद  गायब हुए थे ।
वारंबार यह कहा जा रहा है कि देश की तमाम संबैधानिक संस्थाएं खतरे में है । यह कहने बाले क्या खुद इस के लिए जिम्मेदार नहीं है? भारत के उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव  लाने बाले कौन थे और उन्होंने ऐसा क्यों किया था ? सभी जानते हैं कि वे लोग मुख्य न्यायाधीश को सकते में रखना चाहते थे । जब फैसला उनके पक्ष में हो तो सही नहीं तो सब कुछ गलत । ऐसे लोगों से क्या उम्मीद लगा सकते हैं?देश में आपत्तिकाल क्यों लगाया गया? पूरा देश जेलखाने में तब्दील कर दी गई । लोक अपनी बात रख नहीं सकते थे । हालात ऐसी थी कि कोई अगर सच बोलता तो जेल जाएंगे । वही लोग आज कह रहे हैं कि संबैधानिक संस्थाएं खतरे में है । 
जरूरी इस बात की है कि लोग संस्थाओं के ऊपर स्वार्थबश दबाब लगाना बंद करें । चुनाव आयोग हो,उच्चतम  न्यायालय हो,सीबीआइ हो सभी को व्यर्थ के विवादों में घसीटने से बचना चाहिए । तभी देश में लोकतंत्र फल-फूल सकता है । ठीक है, चुनाव महत्वपूर्ण है ,चुनाव के दौरान मतभेद की अभिव्यक्ति भी जरुरी हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं लगना चाहिए की हम किसी शत्रु देश से भिड़े हुए हैं। सभी अपने ही देश के नागरिक है और सब से ऊपर राष्ट्रहित है,ऐसा भाव लेकर हमें चलान ही चाहिए । तभी हम सार्थक सावित हो सकते हैं । 
भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्थिति की यह विचित्रता है कि यहाँ पर चुनाव होता ही रहता है । जब-जब चुनाव होगा आचार संहिता भी लगेगा । उस दौरान उस क्षेत्र की सरकार कोई नीतिगत निर्णय लेने से असमर्थ हो जाएगी । फिर चुनाव होगा,उसके परिणाम आयगा । कोई जीतेगा,कोई हारेगा । लोकतांत्रिक पद्धति अपनाने बाले सभी देशों में ऐसा ही होता है। पर दुनियाँ में ऐसा सायद ही कोई देश होगा जहाँ हर साल किसी--किसी राज्य में चुनाव होता रहता हो । उतना ही नहीं लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव के अतिरिक्त राष्ट्रपति का चुनाव,उपराष्ट्रपति का चुनाव और पता नहीं क्या-क्या चुनाव होता ही रहेगा । फिर आप ही बताइए की कोई भी सरकार काम कब करेगी? विकास की बातें तो चुनावी घोषणापत्र में होंगे पर उनका कार्यान्वयन कब होगा और कौन करेगा ? सभी लोग तो चुनाव में उल्झे रहते हैं । फिर देश की समस्यायें जस की तस नहीं रह जायेंगी तो और क्या उम्मीद की जा सकती है ? इसलिए जरूरी है कि चुनावी  महाभारत में मर्यादा बनाए   रखा जाए और देशहित को प्रमुखता देते हुए संबैधानिक संस्थाओं को व्यर्थ के विवाद में न घसीटा जाए ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की आजादी के लिए हजारों लोगों ने अपने कुर्वानी दी थी । कितने युवकों को इसीलिए फाँसी पर चढ़ा दिया गया कि वे देशभक्त थे,वंदे मातरम गाना चाहते थे । आज जब हम आजाद हैं, हम एकबार फिर वैसी गलती नहीं दुहराएं जो पहले हो चुके हैं और जिस वजह से हम हजारों साल गुलाम रहे । आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र के इस पर्व का सही उपयोग करें ताकि इस से एसा समाधान हो जिस से देश  मजबूत हो   और भावी पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज बिरासत के रूप में छोड़ जाँए ताकि वे हम पर गर्व करें।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

mishrarn@gmail.com


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