सोमवार, 12 जून 2017

कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते   




 


कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते   


लगभग चालीस साल धरि केन्‍द्र सरकारक विभिन्न पदपर कार्य केलाक बाद सेवा निवृत्तसँ एकटा शून्‍यता सोभाविक छल। नौकरीक दौरान छुट्टी दिन छोरिकऽ लगभग १२ घन्‍टाक नियमित व्‍यस्‍तता रहैत छल।

केतेको गोटे ऐ परिवर्तनकेँ बर्दास्‍त नहि कऽ पबै छैथ वा कहू तँ नवीन परिस्‍थितिसँ सामंजस्‍य नहि बैसा पबै छैथ। परिणाम कए बेर बहुत घातक होइत अछि। एकटा सचिव स्‍तरक अधिकारी सेवा निवृत्त होइते हृदयाघातसँ मरि गेला। कुर्सी जेबाक संगे संग बहुत रास सुविधा सेहो चल जाइत अछि किने...। तेतबे नहि, अधीनस्‍थ कर्मचारीक जी-हुजुरी सेहो समाप्‍त भऽ जाइत अछि। मुदा ई सभ तँ भेनाइ अछिए। माने एक-ने-एक दिन सभ सेवा निवृत्त होइते अछि।

नौकरीक दौरानक अस्‍तव्‍यस्‍तता आब खतम अछि। बीतल समयक जखन सिंहावलोकन करै छी तँ लगैत अछि जे नौकरीक दौरान कएल गेल अधिकांश चिन्‍ता व्‍यर्थ छल। छोट-मोट बातपर अनुरंजित भऽ जाएब, अधिकारीक अप्रसन्नतासँ तनावमे आबि जाएब, व्‍यर्थ छल।

सभसँ चिन्‍ता तँ वार्षिक मूल्‍यांकन (ACR वा APAR) लऽ कऽ होइत छल। पता नहि अधिकारी की लिखि देताह..! भविष्‍य खराप भऽ जाएत..! अधिकारीक हाथमे सरकार एकटा एहेन अस्‍त्र दऽ देने अछि, जइसँ अधिनस्‍थ अधिकारी वा कर्मचारी बकड़ी भेल मेमियाइत रहै छैथ। जँ अहाँ हँ-मे-हँ मिलबैत रहलौं तखन तँ बड़ बढ़ियाँ रिपोर्ट पक्का अछि, नहि तँ भगवाने मालिक..! केतबो काज करब आ जँ अधिकारीक अहं केर परवाह नहि करब तँ गेले घर छी।

बहुत कम्‍मे अधिकारी होइ छैथ जे काजक प्रधानता दैत अधीनस्‍थक सेवाक मूल्‍यांकन करइ छैथ। ऐ सबहक हेतु नौकरीमे लोक परेशान रहैत अछि। हमहूँ कए बेर बहुत चिन्‍तित भऽ जाइत रही।

सरकारी सेवासँ निवृत्तिक पछाइत पूरा-के-पूरा ACR क बण्‍डल हमर आग्रहपर हमरा सरकार आपस कऽ देलक। एक दिन कने-मने उनटाक पढ़लौं। कएटा आश्चर्यजनक अनुभव भेल। तेकर बाद ओ ओहिना धएल अछि। कूड़ाक भाव बिका जाएत। ऐ लेल एतेक परेशान रहैत रही। सरकारी बेवस्‍थामे अधीनस्‍थक सेवाक मूल्‍यांकनक वर्तमान बेवस्‍था यद्यपि पहिनेसँ बेहतर ऐ मानेमे भेल अछि जे आब मूल्‍यांकनक प्रतिलिपि सम्‍बन्‍धित बेकतीकेँ दऽ देल जाइत छैइ। आ ओ चाहे तँ ओइमे सुधारक हेतु उच्‍च अधिकारीकेँ प्रतिवेदन दऽ सकैत छैथ। मुदा अखनो ई प्रकृया पूर्णतः पारदर्शी नहि अछि। जे अधिकारी प्रतिकूल टिप्पणि केलक, फेर तेकरेसँ राय लेब कोनो बहुत सार्थक नहि होइत अछि। ओ तँ सामान्‍यत: अपन कहल बातपर अड़ि जाइत छैथ। सरकारी सेवकक सेवा मूल्‍यांकनक समस्‍त बेवस्‍था मोटा-मोटी जी-हुजुरीपर आश्रित अछि आ ऐमे आमुलचुल सुधार जरूरीए नहि अनिवार्य थिक जइसँ इमानदार, कर्मठ बेकती निर्भिक भऽ अपन बात राखि सकैथ एवम्‍ राष्ट्रहितकेँ सर्वोपरि राखि काज करैथ। एहनो प्रसंग देखबामे आएल जे सेवा मूल्‍यांकन केनिहार अधिकारीपर गंभीर आरोप अछि, तथापि अधीनस्‍थ इमान्‍दार अधिकारीक चरित्र पंजिकाकेँ ओ बोरि देलैथ आ ओ(अधीनस्‍थ इमान्‍दार अधिकारी) तड़पैत रहि गेलाह। हेबाक की चाही, सुधार केना कएल जाए, तैपर अनेको बेर चर्चा होइत अछि मुदा ठोस निर्णय अद्यावधि नहि भऽ सकल तेकर मूल कारण वरिष्‍ठ अधिकारी अपन अधिकारमे कटौती नहि होमए देबए चाहै छैथ।

सरकारी सेवामे अधिकारीक निर्णय लेबाक प्रक्रिया बहुत जटिल अछि। अधिकारक बँटवारा आदम जमानासँ चलैत नियमक आधारपर होइत अछि। परिणामत: अधिकारीगण निर्णय लेबएमे ऐ बातक बेसी साकंक्ष रहै छैथ जे हुनकापर जिम्‍मेदारी नहि खसए, काज हौउ चाहे नहि हौउ। कारण सहियो काज कऽ कऽ फँसि गेलौं तँ जान बँचाएब पराभव भऽ जाइत अछि। तरह-तरह केर नियम ओ बेवस्‍थासँ बान्‍हल ऐ बेवस्‍थामे सुधार हेतु केतेको बेर प्रयास होइत रहल अछि, मुदा अखनो बहुत किछु संभव अछि।

छोटसँ पैघ सभ अधिकारीकेँ एक सीमामे अधिकार देल जाए जइसँ त्‍वरित निर्णय लेल जा सकए। मंत्रालय सबहक तँ ई हाल रहैत अछि जे छोट-सँ छोट मामलाकेँ सचिव स्‍तर तक पठा देल जाइत अछि। सामान्‍यत: संयुक्‍त सचिव तक तँ फाइल जेबे करैत अछि।

वर्तमानमे सरकारी नौकरीक जे स्‍थिति अछि, ओइमे कियो बेकती इमानदारीसँ जीबिटा सकैत अछि चाहे ओ केतबो बड़का अधिकारी हो। बहुत हेतइ आ भाग साथ देतइ तँ धिया-पुताकेँ पढ़ा लेत। एकटा घरो बना लेत, मुदा ई कहब जे ओ स्‍थितिमे आमूल चूल परिवर्तन आनि लेत से संभव नहि अछि। सरकारी नौकरीमे सेवाक एकटा अवसर अछि, व्‍यापार नहि अछि, से बुझि संतोषसँ जीवन-यापन कएल जा सकैत अछि।

हमर एकटा मित्र योजना आयोगमे सेवा निवृत्तिक बाद सलाहकारक काज करैत छला। जरूरी काज निपटा कऽ ओ अबस्‍स हमरा लग आबि जइतैथ। गप-सप्‍प करितैथ। केतेको तरहक सलाह हुनकासँ भेटैत। प्रशासनिक काजमे ओ माहीर छला। क्‍लिष्‍टसँ क्‍लिष्‍ट समस्‍याक सटीक समाधान तुरन्‍त उपस्‍थित कए दितैथ। बीचमे हुनका सुगर बढ़ि गेलैन। योग ओ प्राणायाम द्वारा एक माससँ अपन सुगरक स्‍तर सामान्‍य कए लेलाह। डाक्‍टरक परामर्शपर जाँच करबए गेल रहैथ। जाँचक रिपोर्ट साँझमे आनए गेलाह। घरक आसे-पास जाँचक लेब्रोट्री छेलइ।

रिर्पोट लऽ कऽ आपस अबैत रहैथ कि तेजसँ अबैत कोनो कार तेतेक जोरसँ टक्कर मारलक जे सात फूट ऊपर उठि गेलाह। खसलाह तँ कारक पहियासँ पीचा गेलाह। सड़कपर आधा घन्‍टा पड़ल रहैथ, खून बहैत रहल, कियो हाथ नहि लगाबए। के झंझैटमे पड़त। हलांकि मा. उच्‍चतम न्‍यायालयक आदेशानुसार मदैत केनिहारकेँ कोनो दाव-पेंचमे नहि देल जाएत, मुदा तैयोलोक पचड़ामे नहि पड़ए चाहैत अछि। संयोगसँ कौलेजक दूटा बालिका हुनका सड़कपर पड़ल, खूनसँ लथपथ देखलक। ओ सभ हुनक सड़कपर खसल मोबाइलकेँ उठौलक। ओइमे उपलब्‍ध कएक फोन नम्‍बरपर फोन केलक। संयोगसँ ओकर घर फोन लागि गेलइ। ओ फोनसँ पुलिसकेँ सेहो बजौलक आ पुलिसक सहयोगसँ ओकरा स्‍थानीय अस्‍पताल लऽ गेल। अस्‍पताल जाइत-जाइत बहुत देरी भऽ गेल छल। तथापि ओ सभ प्रयास करैत रहल। दू घन्‍टाक बाद हुनकर अस्‍पतालेमे देहान्‍त भऽ गेल। सुखी सम्‍पन्न लोक छला। मुदा किछु काज नहि आएल।

हमरा तँ तखन पता लागल जखन सप्‍ताह भरि ओ नहि एला तँ मोन औनाएल। हुनकर अधिकारीजी सँ सभटा बात पता लागल।

ई थिक समय। कखन की हएत, के जनैत अछि। ओ एकदम स्‍वस्‍थ छला। कहैथ जे हम कहियो दबाइ नहि खेलौं। मुदा अप्रत्‍याशित रूपेँ दुर्घटनाग्रस्‍त भऽ परलोक चलि गेला। कएक दिन हमरा रूममे योगाशन करैत कहैथ जे ऐसँ सूगरपर एकदम नियंत्रण भऽ जाइत अछि। हुनकर जीवन यात्रा अहिना समाप्‍त हेबाक छल। केतेको दिन धरि ऐ घटनाक दृश्‍य माथमे घुमैत रहल। आवेश आ लोभमे लोक छोट-छोट बातकेँ बतंगर कऽ लइ छैथ। जान लेबए, देबएपर बनि जाइत अछि, मुदा हाथ की अबैत अछि? अशान्‍ति, घृणा ओ प्रतिशोध कहियो समाधान नहि अनलक आ ने आनत।

हमरा ओ कएक बेर कहला जे थ्री इडिएट्स सीनेमा जँ नहि देखने होइ तँ अबस्‍स देख ली। कमसँ कम एको भाग अबस्‍स देख ली। हम सीनेमा बहुत कम देखै छी। ओ सीनेमा सेहो नहि देखने रही। अही उहापोहमे रही जे ओ ऐ सीनेमाकेँ देखबाक हेतु किए कहि रहल छैथ। ताबते हुनकर अकस्‍मात मृत्‍यु भऽ गेल। हम ओ सीनेमा देखबाक निश्‍चय कएल। घरेमे सीड़ी आनल गेल। सीनेमा निश्‍चय शिक्षाप्रद छल। एकर सारांश जे केकरो ऊपर अपनाकेँ थोपक नहि चाही। सबहक सोभाव, रूचि ओ प्रतिमा अलग-अलग होइत अछि। तद्दनुसार ओकरा स्‍वच्‍छं ओ स्‍वतंत्र विकासक अवसर हेबाक चाही। मुदा से कहाँ भऽ पबैत अछि। डिब्‍बा बन्‍द जिनगीक विडम्‍बना थिक। वर्तमान विकृति।

हमरा एलीगंज सी.जी.एच.एस.क डीसपेंसरीक प्रधान डाक्‍टर मेरठक किसान परिवारक छला। ओ कहैथ जे हुनका डाक्‍टर बनबाक कनिको इच्‍छा नहि रहैन। मुदा अभिभावक अड़ि गेला जे जँ पढ़बाक होइक तँ डाक्‍टर बनैथ नहि तँ पुस्‍तैनी पेशा खेती-बारीमे लागि जाथि। कहलाह जे हारि कऽ हम डाक्‍टरी पढ़लौं। बेकती ओ नीक छला, मुदा गपोड़ी रहैथ। मरीज सभ पाँतिमे ठाढ़ अछि आ ओ अन्‍दरमेजे मरीज अछि तेकरा संगे निश्चिन्‍तसँ गप मारि रहल छैथ। ओना, मरीजकेँ देखैथ बहुत धियानसँ, मुदा समय बहुत बर्बाद कऽ देथि। तेकर प्राय: मूल कारण ओइ पेशासँ उरूचि छल।

जीवन-यापन हेतु जएह-सएह काज लोक कऽ कऽ पेट भरैत अछि। अपन देशमे नौकरीक तेतेक सुविधा नहि अछि जे लोक इच्‍छानुसार अपन रूचिक धियान रखैत जीविकाक चुनाव करैथ। जेकरा जे काज भेटल से करैत जीवि जीविकोपार्जन करै छैथ।

माता तु पार्वती देवी, पिता देवो महेश्‍वर:। माता-पिता ओ समस्‍त श्रेष्‍ठजनक असीम अनुकंपा ओ कृपासँ जीवन यज्ञ आब अन्‍तिम चरणमे पहुँच गेल अछि। असलमे ऐ जीवन रूपी नावक पतवार परमात्‍माक हाथमे छैन। वएह छैथ खेबनिहार। हुनके कृपासँ लांगरो पहाड़ नांघि सकै छैथ, पंगुम्‍ लंघयते गिरिम्। सही मानेमे किछु पता नहि छल जे ई यात्रा केतसँ शुरू हएत आ केना अन्‍त हएत? जीवनमे तरह-तरह केर जे घटना देखल-सूनल ओहिसँ आँखि खुजि जाएब, भारी बात नहि। एकसँ एक पैघ योग्‍य एवम्‍ पदाशीन बेकती अकाल मृत्‍युक शिकार भऽ गेला। समस्‍त बेवस्‍था ठामहि धएले रहि गेल। गरीब-गुरबा सभ बिना कोनो सुविधोक, बिना दबाइए-दारूक वयोवृद्ध भऽ जाइ छैथ। कहबी छै जे आन्‍हर गाएकेँ राम रखबार। जँ सामर्थ्‍यवान भेनहि लोक जीवितो, तँ कियो गरीब ऐ दुनियाँमे रहबे ने करैत। मुदा प्रकृतिक बेवस्‍था विचित्र एवम्‍ क्रूड़ अछि। कोनो स्‍पष्‍ट नियम सभपर लागू नहि कएल जा सकैत अछि। जीवन भाग्‍य ओ पुरषार्थक बीच झुलैत रहैत अछि।



बच्‍चामे गाममे रही, ओहीठाम पढ़लौं-लिखलौं आ जबान होइते रोजी-रोटीक फिराकमे गाम-घरसँ अतिदूर दिल्‍ली चलि एलौं। एतेक दूर आबि गेलाक बाद अपनो दुख होइत छल। रहि रहि कऽ गाम, गामक लोक, माए, बाबू सभ मोन पड़ैत रहैत छला। जखन गाम जाइ आ आपसी यात्रामे माए-बाबूक वियोगसँ उपजल असीम कष्‍ट अविस्‍मरणीय भऽ जाइत छल। समय बीतैत गेल। ने आब ओ रामा ने ओ कोठाला। माए, बाबू स्‍वर्गीय भऽ गेलाह। कएटा ग्रामीण मित्र सेहो चल गेला। आब गाम जा कऽ के भेटत?

यहॉं कौन है तेरा, ऐ मुसाफिर जाएगा कहाँ?”

रोडक कातमे गरीब तिहारी कऽ कऽ राति बितबैत अछि। निद्रालीन रहैत अछि कि कियो अन्‍धधुन्‍ध गाड़ी चलौनिहार ओकरा कुचैल दइ छइ। ओकर प्राण चलि जाइ छै, ऐमे ओकर की दोख?

हे ओ तँ सड़कपर अनाथ, सुरक्षाहीन सुतल रहैत अछि, मुदा जे महलमे समस्‍त सुख-सुविधासँ लैस छैथ, ओहो भाग्‍यक उठा-पटकसँ मुक्‍त नहि छैथ।

जीवनमे अहाँकेँ की भेटल अहाँ की कऽ सकलौं आ अहाँक मित्र, गौंआँ आकि परीचित की कऽ सकल एकर तुलनात्‍मक विचार व्‍यर्थ अछि। दुखक कारण अछि। सभ अपन-अपन कर्म ओ प्रारब्‍धक चक्रसँ बान्‍हल अछि।

सारांश जे प्रारब्‍ध प्रवल होइछ। सुनहुँ भरत भावी प्रवल, विहुपि कहे मुनिनाथ हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधिहाथ। तेकर माने ई नहि जे हाथपर हाथ धऽ बैस जाइ आ सभटा भागेपर छोड़ि दी। हमरा-अहाँक हाथमे कर्तव्‍य कर्म करक अधिकार अछि, फल अपना हाथमे नहि अछि। अपनासँ जे बनि पड़ए...।

जीवनसँ की प्राप्‍त केलौं, की दऽ सकलिऐक, ई प्रश्‍न मोनमे आएब सोभाविक थिक। हमरा तँ लगैत अछि जेना जीवन अपन स्‍वत: निर्धारित गंतव्‍य दिस स्‍वयं चलैत रहैत अछि। लोक तँ मात्र निमित्त क्रियाशील अछि।

निमित्त मात्रं भव सब्यसाचिन।

निश्चित रूपसँ महत्‍वाकांक्षाक पथगामीकेँ कष्‍टेकष्‍ट अछि। लोक की कहत? ऐ बातक धमर्थनसँ अपन मौलिकतापर संकट ठाढ़ कऽ लेब केतेक उचित? सबहक अपन जीवन छै, अपना आपमे सभ महत्‍वपूर्ण अछि, जे प्राप्‍त अछि वएह कोनो तरहेँ कम किए अछि? किएक हम अनकापर भारी पड़बाक प्रयत्‍न कऽ अपना आपकेँ तनावग्रस्‍त केने रही? जीवनसँ हम की चाहै छी..?

असलमे ऐ प्रश्‍न सबहक उत्तर कियो आन नहि दऽ सकैत अछि। शान्‍तिक हेतु संतोष बहुत आवश्‍यक अछि। प्राप्‍तक आदर जरूरी अछि। सामान्‍यत: लोक धिया-पुताकेँ उच्‍च शिक्षाक हेतु चिन्‍तित रहिते छैथ। मुदा उच्‍च डिग्री प्राप्‍त केनाइए जीवनमे सफलताक मूलमंत्र होइत तँ सचीन तेन्‍दुलकर, विस्‍मिल्‍ला खान, पण्‍डित जसराज, ज्ञानी जैल सिंह सन-सन बेकती उपलब्‍धिक ओ मान-सम्‍मानक पराकाष्‍ठापर नहि पहुँचितैथ। तँए जीवनकेँ अपन सोभाव ओ रूचिकेँ अनुसारे संतुष्‍टि वोध संभव अछि।

प्रकृतिंम् यान्‍ति भूतानि

निग्रटं किम्‍ करिष्‍यति!

ग्रामीण वातावरणमे रहि कऽ बहुत उच्‍च महत्‍वाकांक्षा लऽ कऽ हमर पूज्‍य माता-पिता हमर पालन-पोषण केने रहैथ कहि नहि से केतेक धरि संभव भेल, मुदा जे भेल, जेना भेल सएह सोचि कऽ ईश्वरकेँ हृदयसँ धन्यबाद। जीवन स्‍वयंमे अद्भुत अछि। तुलनात्‍मकता केतौसँ उचित नहि।

हमरा अहाँक हाथमे अछिए की? अपन कर्तव्‍य यथासाध्‍य करक चाही, शेष ईश्वरपर छोड़ि दी, ऐसँ बढ़ियाँ जीवन-मंत्र किछु नहि।

कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते माफलेषु कदाचन्...।

१।६।२०१७

Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...