रविवार, 21 मार्च 2021

भारत में लोकतंत्र

 

 

भारत में लोकतंत्र

 

एक लंबी लड़ाई के बाद १५ अगस्त १९४७ के दिन हमारा देश आजाद हुआ । हमें इस आजादी की भारी कीमत देश के विभाजन के रूप में चुकानी पड़ी। देश का लगभग आधा हिस्सा पुर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप मे अलग हो कर एक स्वतंत्र राष्ट्र पाकिस्तान’’ के नाम से बना दिया गया । पाकिस्तान बनाने के पीछे तर्क यह था कि मुसलमान हिन्दू बहुल देश में नहीं रह सकते । इस तरह धर्म के आधार पर दो देश बना दिया गया । लाखों लोगों को इस बटबारे के बाद अपने जान गबाने पड़े । लोक अपने-अपने ठिकाने तलाशते रहे और इस क्रम में हिंशा के शिकार हो गए । जो जैसे-तैसे जान बचाकर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ भी गए ,उनके पास कुछ भी नहीं था । बड़े-बड़े घरों के स्मृद्ध लोक दाने-दाने के मोहताज हो गए । कई परिवार के सदस्य एक-दुसरों से ऐसे बिछुड़े कि कभी मिल ही नहीं पाए । भगवान जाने उन में से कितने बचे और कितने हिंसा के शिकार हो गए । ऐसे लाखों की संख्या में लोग अपने ही देश में शरणार्थी हो गए । उनके पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था ,खाने के लिए भोजन नहीं था । ऐसे लाखों लोगों को सरकार और स्थानीय लोगों ने भरसक सहायता प्रदान की । कई संभ्रांत लोगों ने ऐसे परिवारों को गोद ले लिया और उनको उचित मानवीय सहायता दे कर अपने पावों पर खड़े होने में मदत किए । सोचिए,ऐसे लोगों की मनोदशा क्या रही होगी जो देखते ही देखते इसलिए कंगाल हो गए थे कि देश आजाद हो गया था ।

१५ अगस्त १९४७ को देश आजाद होने के बाद २६ जनबरी १९५० को संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को लागू किया गया । इसके अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना । एक ऐसा देश जिसमें जनता ही सबकुछ होगा । जिसमें समाज के सभी लोग बिना किसी भेदभाव के रह सकेंगे । जहाँ सभी लोग अपने-अपने धर्मों का पालन कर सकेंगे । जिसमें किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा । लेकिन आजादी के इतने सालों के बाद क्या यह सब संभव हो सका? देश के आजादी के इतने सालों के बाद भी हम गरीबी हटाने में लगे हुए हैं । देश की अधिकांश जनसंख्या अभी भी मुलभूत सुविधाओं से वंचित है । अभी भी महानगरों में मजदूर पटरी पर सोते हुए वाहनों द्वारा कुचल दिए जाते हैं । गरीबों के बच्चे स्कूल जाने के बजाए मजदूरी करते हैं । ऐसा नहीं है कि इस सब को रोकने के लिए कानून नहीं बना है ।  लेकिन कानून बनाने से ही क्या होगा? कानून तो दहेज के खिलाफ भी बना हुआ है पर सभी जानते हैं कि अभी भी यह समाज में किसी न किसी रूप में व्याप्त है ही । कानून तो यह भी है कि पैतृक संपत्ति में महिलाओं का हक होगा । पर व्यवहार में एसा नहीं हो पा रहा है । जहाँ कहीं ऐसा प्रयास होता है वहाँ बबाल होता रहता है । कहने का तात्पर्य यह है कि मात्र कानून बना देने से देश के गरीब,पिछड़े तबके के लोगों का भला नहीं होने बाला है ।

कहने के लिए स्कूल,कालेज,विश्वविद्यालय सब कुछ बन गए । अस्पतालों की भरमार हो गयी । तरह-तरह के अधिकारी लोगों के कल्याण के लिए काम करते रहे। फिर भी आजादी के ७४ साल बीत जाने के बाबजूद हमें करोड़ो लोगों को मुफ्त या मामूली मूल्य पर भोजन क्यों देना पड़ता है? क्यों अभी भी छोटे-छोटे बच्चे काम करते देखे जाते हैं? क्यों अनगिनित संख्या में लोग रात को पटरियों पर सोने के लिए विवश हैं? जिस देश का अधिकांश नागरिक मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हो वहाँ मताधिकार का क्या मायने है? कोई सवल व्यक्ति या समूह उन्हें प्रभावित कर सकता है । यह तो रहा वंचितों का हाल । लेकिन जो सामर्थ्यवान है,सब तरह से संपन्न हैं ,जिनके पास राजनीतिक और आर्थिक प्रभुता है,वे भी अपना मतदान सायद ही निष्पक्ष होकर योग्यता के आधार पर करते हों । क्यों कि अभी भी देश में धर्म और जाति का बोलबाला है । बोट बैंक  की राजनीति इस कदर हावी है कि सायद ही कोई मुद्दा हो जिसको राजनीति से नहीं जोड़ दिया जाता हो। नेता चाहे जिस किसी भी दल का हो,लेकिन उसका सारा ध्यान इस बात में लगता रहता है कि आगामी चुनाव में उसको अधिक से अधिक मत कैसे मिले । ऐसा इसलिए हो रहा है क्यों कि राजनीति सेवा का मार्ग नहीं रह गया है । यह एक व्यापार हो गया है।

जिस देश में लोकतंत्र के नाम पर जैसे-तैसे सत्ता पाना ही एकमात्र उद्येश्य हो वहाँ सामान्य लोगों में सुख-शांति कहाँ से आएगी? ऐसी स्थितिमें सामान्य आदमी तो राजनेताओं के हाथ का बस एक खिलौना बनकर रह जाता है । दल चाहे कोई हो,नेता चाहे कोई हो, सामान्य आदमी के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ता है । वे वैसे के वैसे ही रह जाते हैं । लोकतंत्र में मतदान से प्राप्त शक्तियों को कुछ संपन्न,संभ्रांत लोग ही लाभ उठा पाते हैं ।  दल चाहे कोई भी जीते,वही लोग असल में समाज पर हावी रहते हैं । वही मंत्री बनते हैं ,सत्ता का समीकरण वही बनाते विगाड़ते हैं। यही कारण है कि बहुमत में होते हुए भी आज भी गरीब लोगों की सरकार नहीं बन पाती है । सत्ता सम्हालने बाले चंद लोग अच्छी तरह समझते हैं कि इनको धर्म,जाति,संप्रदाय के नाम पर आपस में बाँटकर एकमुस्त मत प्राप्त किया जा सकता है । यही कारण है कि चुनाव जीतने के बाद शासक दल गरीबों को नहीं अपितु सत्ता के बिचौलियों को खुश करने में लग जाते हैं । गरीबों लोग वहीं के वहीं रह जाते हैं।

लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब देश के नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही सचेष्ट हों । दुर्भाग्यवश, अपने देश में एसा नहीं हो रहा है । लोक अपने अधिकारों की लड़ाई तो लड़ रहे हैं ,परंतु उन्हें दूसरों के अधिकारों की कोई चिंता नहीं है । फिर समाज कैसे चलेगा? समाज में संतुलान कैसे बनेगा?  गरीब-धनी का विभेद कैसे कम होगा? हो ही नहीं सकता है । यही कारण है कि अपने देश में तमाम कानूनी प्रावधानों के बाबजूद लोक तरह-तरह के भेद-भाव के शिकार हैं । देश में हिंसा का माहौल बड़ता ही जा रहा है । संसद,न्यायालय और चुनी हुई सरकारों के प्रति सम्मान का अभाव दिख रहा है । सबाल यह नहीं है कि देश का शासन कौन चला रहा है ?लोकतंत्र में सरकार हम स्वयं चुनते हैं । परंतु,जब एक बार बहुमत से सरकार बन जाती है तो उसे काम तो करने देना होगा। बात-बात में मात्र विरोध के लिए विरोध तो विनाशकारी ही सावित होगा । दुर्भाग्य से आज वही हो रहा है । जो लोग चुनाव हार जाते हैं वे अगले चुनाव की प्रतीक्षा नहीं करना चाहते हैं । वे जैसे-तैसे चुनी हुई सरकारों पर गैर कानूनी तरीकों से हावी होना चाहते है ताकि सरकार असफल हो जाए और वे जल्दी से जल्दी सरकार पर काबिज हो जाएं । एसी हालत में देश में लोकतंत्र कबतक बचेगा?

जैसा कि सभी जानते हैं लोकतंत्र में शासन की बागडोर जनता के हाथ में होती है । जैसे नागरिक होंगे वैसी ही सरकार होगी । चूंकि देश की जनता जात-पाँत,धर्म के आधार पर बटी हुई है और उसी हिसाब से अपना मतदान करती हैं,इसलिए सरकारें भी वैसी ही बनती हैं । उनका मूल उद्येश्य बोट बैंक बनाए रखना होता है ताकि वे आगामी चुनाव आसानी से जीत सकें । यही कारण है कि देश में विकास नहीं हो पा रहा है,और भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं है । अपने जात वा धर्म का व्यक्ति चुनाव जीते चाहे वह जैसा भी हो,यही मतदाताओं का मूल लक्ष्य बन गया है । जाहिर है कि ऐसी परिस्थित में कोई भी दल जोखिम उठाना नहीं चाहता है और जनता को तत्कालिक लाभ पहुँचा कर चुनाव जीत लेना चाहते हैं । परंतु,इस सब का देश पर कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ रहा है । पर यह सब सोचने की फुर्सत किसे है?

सबाल है कि हम क्या करें जिस से हालात में सुधार हो और देश सचमुच के लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ आगे बढ़े? हम एक ऐसा समाज का निर्माण करें जिस में बिना किसी भेदभाव के सभी वर्ग के लोगों को विकास करने का उचित मौका मिल सके । लेकिन यह तो तभी होगा जब हम सब व्यक्तिगत स्वार्थों का त्याग कर राष्ट्र की एकता,संप्रभुता और अखंडता के लिए एक साथ खड़े हों । हम संकल्प करें कि किसी देशवासी के साथ कसी प्रकार का अन्याय नहीं करेंगे न होने देंगे । समाज के गरीब तबके के लोगों को आगे आने का मौका देंगे और हजारों वर्षों के गुलामी से प्राप्त कुसंस्कारों को फेंककर भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अपने देश के पुनर्निर्माण कार्य में जुट जाएंगे।

 

रबीन्द्र नारायण मिश्र

21.3.2021

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