गुरुवार, 28 जून 2018

कलनाबला बाबा




कलनाबला बाबा

मिथिलांचलमे रहनिहार साइते किओ एहन हेताह जे कलनाबला बाबाक नाम नहि सुनने होथि । अत्यंत साधारण लिवास मे निरंतर प्रसन्न ओ कलना मे कतेको साल सँ रहैत छलाह। ओहि समयमे हम कालेजक विद्यार्थी रही। परीक्षा भए गेल रहए । गामपर खाली रही । नौकरी ताकबाक प्रयासमे बहत चिंतित रही । मोन बेचैन रहैत छल । हमर मित्र स्वर्गीय विश्नुकांत मिश्र(लाल बच्चा) बहुत  आस्थावान लोक छलाह । हुनकासंग कए पैरे दुनू गोटे कलना विदा भेलहुँ । 
सुनने रहिऐक जे बाबा बहत नियम निष्ठासँ रहैत छथि । जौं हुनका लेल किछु प्रसाद लए जा रहल छी तँ बहुत पवित्रता पूर्वक लए जेबाक रहैत छल । रस्तामे यत्र-कुत्र नहि हेबाक चाही,अन्यथा कहाँदनि अनिष्ट भए जाइत छल । हम सभ तँ खाली हाथे जाइत  रही तँ चिन्ताक बात नहि रहए ।
कलना बाबा केँ दर्शन हेतु पहिलबेर हम अपन मित्र लालबच्चाक संगे गेल रही। रस्ताभरि पैरे-पैरे गप्प-सप्प करैत हम दुनू गोटे दूपहरिआमे ओहिठाम पहुँचलहुँ । बाबा  नान्हिटा फूसक घरमे रहथि। ओहिमे बाँसक फट्टक लागल छल । एक-दू गोटे आओर ओहिठाम बैसल रहथि। बाबा अत्यंत सहज रूपमे सभसँ गप्प-सप्प करैत छलाह । गप्पक क्रममे ओ कहलाह
एकटा सेठ एकबेर हुनका लग आएल आ कहलक जे भगवान झुठ छथि। हम ओकरा कहलिऐक जे तोँही झुठ छैँ ।" 
ओ कहथि जे हुनका लग लोक कबुला कए लैत अछि आ ओकर अनुपालन नहि करैत अछि जाहि कारणसँ ओकरा अनिष्ट होइत अछि । कैटा भक्त हुनका लेल प्रसाद अनैत छलाह। ताहि काजमे बहुत संयम ओ स्वच्छताक प्रयोजन रहैत छल । बाबाक कहब रहनि जे जौँ क्यो हुनका हेतु अशुद्ध बस्तु अनैत अछि तँ ओकरा अपने अनिष्ट भए जाइत अछि । ताहि प्रसंगे ओ कैटा उदाहरणसभ देलथि ।
कलनाबला बाबा सँ हमरा तीन बेर भेँट भेल । दू बेर तँ हुनके कलना आश्रम पर आ एक बेर ओ हमरा ओहिठाम आएल रहथि तखन । दुनू बेर कलना हम अपन मित्र लालबच्चाक संगे पैरे गामसँ कलना गेल रही ।
एकबेर हम जखन बाबाक दर्शनक हेतु गेलहुँ तँ रस्तामे मोनमे भेल जे बाबाक एतेक नाम सुनैत छिअनि ,किछु सद्यः देखतिऐक । बाबाक ओतए हम दुनूगोटे पहुँचलहुँ तँ बाबा कहलाह जे आइ रहि जाह । हमसभ हुनकर आज्ञानुसार रुकि गेलहुँ । रातिमे सामनेक पोखरिक घाटपर हम सभ सुति गेलहुँ।अर्धरात्रिमे देखैत छी जे एकटा बाँस हीलि रहल अछि आ ओकर फुनगीपर धोती सुखा रहल अछि । डर भए गेल जे की बात छैक? उठिकए ठाढ़ भेले रही की देखैत छी जे लगेमे बाबा हँसि रहल छथि आ हुनकर हाथमे धोती छनि । बाबा किछु-किछु कहबो केलाह ।
एकबेर हमर अनुज(सुरेन्द्र नारायण मिश्र) बाबाकेँ अपना ओतए चलबाक हेतु आग्रह केलखिन । बाबा मानि गेलाह । कारसँ बाबाक संगे हमहुँ रही । बाबाक सिपहसलारसब सेहो रहथि । बाबा पहिने गिरजा स्थान गेलाह । ओहिठाम माताक दर्शन केलाह । फेर कार गाम विदा भेल । गाम पहुँचलाक बाद ओ हमरा ओहिठाम चौकीपर बैसलाह । कोनो ओछाओन नहि ओछबए देलखिन। अखरा चौकी पड़ बाबा पड़ल-बैसल रहलाह । ताबे तँ सौंसे गामक लोकक करमान लागि गेल । ततके भीड़ जमा भए गेल जे माइकसँ ओकरा शांत कएल गेल । माइकेपर बाबा किछु उपदेश देलाह । सभकेँ आशीर्वाद देलखिन । हमर अनुज(सुरेन्द्र नारायण मिश्र) केँ आशीर्वाद देलखिन जे तोरा बेटा होइ ,से सत्य भेल । हुनका दूटा पुत्र तकर बाद जन्म लेलखिन । कतबो कहल गेलनि ओ किछु नहि खेलथि आ थोड़ेकालक बाद कारसँ आपस चलि गेलाह ।
 बाबाक देहपर मात्र एकटा धोती रहैत छल जकरा ओ ठेहुनधरि पहिरने रहैत छलाह । लोककेँ देखि कए ओ अद्भुत निर्मल हँसी हँसैत छलाह । खेबाक कोनो चिंता नहि रहैत छलनि। नान्हिटा खोपड़ीमे माटिपर बाबा पड़ल वा बैसल रहैत छलाह । ओतहुँ लोक अपन स्वार्थसँ आन्हर भेल हुनका तंग केने रहैत छल ।

हौ बाबा ! किछु करहक ने...।

जखन बड़ तंग कए दैन तँ कहथि-"का कहली? की भैल?"। मुदा जकरा ओ बाक दए दैत छलाह से जरुर उद्धार भए जाइत छल । बाबाक कहब रहैत छलनि जे जँ क्यो किछु कबुला करैत छथि तँ काज सिद्धि भेलापर ओकरा तुरंत पालन करक चाही अन्यथा अनिष्ट होइत अछि।
बाबाक आश्रममे कतेको गोटे रहैत छलाह वा अबैत-जाइत रहैत छलाह। ओहिठाम रहनिहार लोकसभ एकहि साँझ अपनेसँ रान्हि भोजन पबैत छलाह । जखन ओसभ बहुत गोहराबथि तँ बाबा हँसैत कहितथिन –“ ठीक ,बनाब भोजन । भोजन जहन बनि कए तैयार भए जाए तखन बाबाक आज्ञा चाहै छल जाहिसँ ओ सभ भोजन शुरु करथि । बाबा किछु बजबे नहि करथि । लैह ,आब तँ बड़का विपत्ति । भोजन पड़सल धैल अछि आ बाबाक आदेशक प्रतीक्षा भए रहल अछि । बाबाके ओ सभ गोहरा रहल छथि । बाबा बड़ छगुन्तासँ हुनकासभकेँ देखथि । जखन ओसभ बाबाकेँ आग्रह करैत-करैत थाकि जाथि तखन ओ कहि दितथि -"शुरु करह" । एहि तरहेँ बाबा हुनका लोकनिक धैर्यक परीक्षा लैत छलाह । तकरबाद बाबा ओहिठाम बैसल ओकरासभकेँ खाइत देखि बहुत प्रशन्न होइत छलाह ।
बाबाक आश्रममे किछु गोटे  निरन्तर रहैत छलाह । किछु गोटे अबैत जाइत रहैत छलाह। खिछुगोटेतँ मात्र पेट पोसबाक हेतु ओतए पड़ल रहैत छलाह । कैटा  भक्त बाबा लेल कंबल वा आन-आन चीज-वस्तु अनितथि । बाबा ओकरा छुबितो नहि छलाह । आस-पास रहनिहारसभ  ओहि वस्तुसभकेँ लुझि लैत छलाह । बाबा आश्चर्यचकित भए देखैत रहैत छलाह ।
बाबाक दरबारमे पैघ सँ पैघ लोकसभ अबैत रहैत छलाह । जौँ बाबाकेँ इच्छा नहि होनि तँ हुनकर पट खुजिते नहि छल । जाबे बाबा जीबैत रहलाह,ओहि परिपट्टाक लोकक अपन आशीर्वादसँ कल्याण करैत रहलाह । बिना कोनो लोभ लालच केँ संपूर्ण जीवन ईश्वरक आराधनामे  लगा देलाह । हुनक निधनसँ एकटा महान संत एहि संसारसँ  मुक्त भए गेलाह संगहि बहुतरास लोकक मोनमे अथाह श्रद्धा छोड़ि गेलाह। हुनका शत-शत प्रणाम!






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