शुक्रवार, 26 जून 2020

लोधी गार्डेन

 

लोधी गार्डेन

लोधी गार्डेन आधुनिक दिल्लीक एकटा महत्वपूर्ण स्थान अछि । एहिठाम सभसँ पहिने १४१४ ई०मे सैय्यद राजवंशक दोसर शासक मोहम्मद शाहक  मकबरा अलाउद्दीन आलम द्वारा बनाओल गेल छल ।    तकर बाद वर्ष 1517 में सिकंदर लोधीक  मकबरा हुनकर पुत्र इब्राहिम लोधी (लोधीवंशक अंतिम शासक )द्वारा बनाओल गेल छल । मुगलवंशक तेसर शासक अकबर एहि स्थानक उपयोग वेधशालाक रूपमे केलथि। अंग्रेज सेहो एहि स्थानकक जीर्णोद्धार करबैत रहलाह । ९ अप्रैल १९३६क एहि पार्कक नाम लेडी वेलींगटन पार्क राखल गेल जे स्वतंत्रताक बाद बदलि कए लोधी गार्डेन राखि देल गेल । ९० एकड़मे पसरल लोधी गार्डेनमे २१० प्रकारक करीब ५४०० वृक्ष लागल अछि । एहिठाम लागल वृक्षसभमे प्रमुख अछि- अर्जुन,चंपा,अमलतास,नीम,जामुन,मौलश्री,पीपड़,कचनार,किसुम,अशोक,पाकड़ि .. करीब दू एकड़ जमीनमे बनल रोज गार्डेनमे ५००० गुलाबक फूल लागल अछि । एकहिठाम एतेक प्रकारक गाछ-बृक्ष हेबाक कारण वनस्पतिशास्त्रक विद्यार्थीकेँ ओहिठाम बहुत जानकारी भेटि सकैत अछि । लोधी गार्डेनमे कैकटा दुर्लभ पक्षीसभ देखबामे आएत  जेना सुग्गा,देशी मैना,कोइली,उल्लू,सातभाइ,बुलबुल,कौआ, कठफोरा आदि,आदि ।

लोधी गार्डेनमे लोधीरोडसँ सटले आमक गाछी अछि । ऐहिमे टिकुलासँ लए कए आमक पकबाक समय धरि लोकसभ आम बिछैत रहैत अछि । कैकगोटे तँ झोड़ाक -झोड़ा काँच आम अँचार बनेबाक हेतु लए जाइत छथि । मुदा नीक आमसभ नहि अछि । तथापि जे-से ओकरापर झटहा फेकैत रहैत  अछि आ पकबाक दिन धरि मोसकिलसँ कतहु-कतहु आम बाँचल रहि पबैत अछि । लोधीगार्डेनक बीचमे सेहो आमक गाछसभ अछि । आमक अतिरिक्त रोडसँ सटले कोनपर बाँसक तरह-तरहक प्रकारसभ रोपल अछि । संभवतः ओ बाँस सभक म्युजिअम थिक । आइ-काल्हि एहि स्थानक देख-भाल एनडीएमसी द्वारा कएल जाइत अछि । दिन-राति सताधिक कर्मचारी एहिमे लागल रहैत छथि । तकर परिणाम थिक जे एतेकटा परिसर कोनो आंङनसँ बेसी स्वच्छ आ सुंदर लगैत रहैत अछि । चारूकात हरल- भरल गाछ,फूलसभ मिलिकए तेहन मनोरम दृश्य बनओने रहैत अछि जे होएत जे  घुमिते रहि जाइ । जँ कनीको काल एतए बैसि जाएब वा टहलि लेब तँ मोन अतिशय  प्रसन्न आ प्रफुल्लित भए जाइत अछि । सभ दुख-चिंता हरा जाइत अछि। लगैत अछि जेना सरिपहु स्वर्गमे आबि गेलहुँ ।

रातिक दस बाजि रहल हो वा भोरक चारि, ओ स्थान कखनो खाली नहि भेटत । केओ-ने-केओ ओतए चलैत-फिरैत भेटिए जाएत।  जँ केओ नहिए भेटल तइओ कोनो बात नहि । असगरो अहाँ सुरक्षित रहि सकैत छी । कोनो डरक बाते नहि । एक चक्कर जँ लगा लेलहुँ तँ सवा दू किलोमीटर पुरि गेल । एहि तरहे कैक गोटे सात-आठ चक्कर लगा लैत छलाह । केओ एक्के चक्करमे थाकि कए बैसि जाइत छलाह। सामान्यतः लोक दू वा तीन चक्कर लगबैत भेटि जेताह । ताहूमे सभक गति भिन्न होइत अछि । केओ बहुत तेज चलैत  छथि तँ केओ नहु-नहु।  साउथ एक्सटेंसनसँ एकटा सेवानिवृत्त फौजी लोधी गार्डेनमे नित्य टहलए अबैत छलाह । ओ अपन घरेसँ पैरे बिदा होइतथि आ लोधी गार्डेनमे सात चक्कर लगबैत छलाह । टहलैत काल ओ जोर-सोरसँ अपन मुरी हिलबैत रहैत छलाह । हुनकर टहलबाक गति सेहो बहुत अधिक रहैत छल । लोधी गार्डेनमे टहललाक बाद ओ फेर पैरे अपन घर  वापस होइत छलाह । कैक साल धरि हुनकर टहलबाक ई क्रम चलैत रहल । मुदा बादमे पता नहि हुनका की भए गेलनि जे टहलनाइ तँ कम भइए गेलनि अपितु मुरीक  जोर-सोरसँ हिलेनाइ सेहो चलि जाइत रहलनि । कहुना कए एकटा ठेंगा पकड़ि कए थोड़ बहुत टहलि लैत छलाह-ओहो बहुत दिनक बाद । संभवतः हुनका कोनो स्वास्थ्य संबंधी समस्या भए गेलनि ।

जौं-जौं समय बितैत अछि लोधी गार्डेनमे लोकक संख्या बढ़ैत जाइत अछि । सात बजे भोर होइत-होइत तँ ओहिठाम टहलनिहारक मेला लागि जाइत  अछि । कैकगोटे टहललाक बाद अपन मित्रसभक संगे चाह पीबैत भेटि जेताह । किछुगोटे कहिओ काल ओतए जलखैक ओरिआन सेहो केने रहैत छथि । कहिओ-कहिओ तँ लोकसभकेँ ताकि-ताकि कए जलखै कराओल जाइत अछि ।  गुरुपर्व क दिन किछु गोटे लंगर करबैत छथि । एहिसभ तरहक दृश्य लोधी गार्डेनमे कोनो-ने-कोनो रूपमे सालभरि चलैत रहैत अछि ।

लोधी गार्डेनमे प्रातः वा सायंकाल भ्रमण केनिहार लोकक आपसी दोस्ती हुनकर टहलबाक समय आ गतिपर निर्भर करैत अछि। एकदिनक बात होइक तहन तँ लोक ठहरि जाएत,दूटप्पी कए लेत । मुदा नित्यप्रति टहलएबलासभक हेतु  से संभव नहि थिक । किछुगोटे तँ झुंड बनाकए चलैत छथि । ओसभ टहलैत कम गप्प बेसी करैत छथि । ओहिठाम भोर-साँझ टहलनिहार लोकसभमे एक सँ एक गणमान्य लोक रहैत छथि । असलमे लोधी गार्डेनक लग-पासमे उच्च सरकारी अधिकारी लोकनिक आवास अछि । तेँ हुनका लोकनिक हेतु लोधी गार्डेनमे टहलनाइ बहुत सुगम होइत छनि ।  अपन फ्लैटसँ निकलु आ पाँच-सात मिनटमे  लोधी गार्डेनमे चलि आउ ।  ओहिमे पैर रखिते हवाक स्वाद बदलि जाइत छैक । जौं अहाँ लोधी हार्डेन लगीचसँ गुजरैत छी तखनहि अहाँकेँ हवाक  बदलल रुखिक अंदाज लागि जाएत । लोधी गार्डेनमे  विद्यमान वृक्षसभक एहिमे बहुत योगदान अछि । गार्डेनक भीतर टहलबाक हेतु छोट-पैघ कैकटा ट्रैक अछि। लोक अपन सुविधानुसार रस्ताक चुनाव करैत छथि । कैकगोटे भीतरे-भीतर चलबाक इच्छुक रहैत छथि । तिनका चलैत काल कमेगोटेसँ भेंट हेबाक संभावना रहैत छनि । अस्तु,असगर टहलबाक आनंद एहि रस्ते भेटि सकैत अछि । जँ अपने मुख्यट्रैकपर चलब आ फरीछ भए गेल अछि तखन तँ लोकक हुजुम देखबामे आबि सकैत अछि । कैकठाम गाछतरमे लोकसभ सुस्ताइत देखेताह । किछुगोटे चाह-पानोक ओरिआन रखने रहैत छथि । कहक माने जे ओहिठाम टहलबाक संगे पिकनिकक आनंद लैत छथि । भोरे-भोर टहलैत काल शरीरकेँ नवीन उर्जा भेटैत छैक । अंग-अंगमे उत्साह भरल रहैत अछि । लोक सभकिछु बिसरि एक-दोसरकेँ प्रातः अभिवादन करैत छथि। लगैत रहैत अछि जेना सभ केओ उर्जासँ भरल छथि ।

लोधी गार्डेनमे भोर-साँझ टहलनिहारसभक हेतु ओ जीवनक एकटा महत्वपूर्ण अंग थिक । कैकगोटेक तँ आपसी संवध ततेक प्रगाढ़ छनि जे ओ अपन दुख-सुख बिना कोनो संकोचकेँ बाँटैत छथि । कैकगोटेकेँ तँ ओ जीवनदायी सिद्ध भेल अछि । जीवनमे घटित दुर्भाग्यपूर्ण स्थितिमे  लोधी गार्डेनक हुनकर मित्रलोकनि बहुत मदति केलखिन आ ओ सबटा दुख बिसरि फेरसँ ठाढ़ भए गेलाह । जँ हुनका लोधी गार्डेनक समाजक सहयोग नहि भेटल रहैत तँ कहि नहि आइ हुनकर की हाल भेल रहैत ?

लोधी गार्डेनमे सालोंसँ घुमैत-घुमैत कएगोटेकेँ आपसमे बहुत भावुक सिनेह भए गेल छनि । हमर एकटा संगी तँ बाजल करथि जे जँ हम मरी तँ अंतिम संस्कारसँ पूर्व हमरा लोधी गार्डेनमे  एकबेर अवश्य घुमा देल जाए । आब ओ सेवानिवृत्तिक बाद लोधी कालोनीसँ चलि गेल छथि आ लोधी गार्डेनसँ सेहो फटकी भए गेल छथि । मुदा लोधी गार्डेनसँ हुनका ओहिना सिनेह बनल छनि । अखनो ओ कहिओ काल ओतए अबैत छथि आ अपन पुरानसंगीसभसँ भेंट कए बहुत तृप्तिक अनुभव करैत छथि ।

लोधी गार्डेनक पुरान सिनेहीमेसँ छथि सरदार अजीत सिंह । ओ टैक्सी स्टैंडक इंचार्ज छथि । पचासोटा टैक्सी रखने छथि आ ताहिसँ बहुत नीक आमदनी केने छथि । लोधी गार्डेनक लगीचेमे घर छनि । भोर-साँझ-दुपहरिआ जखन देखू ओ लोधी गार्डेनमे घुमैत भेटि जेताह । ओहिठामक गाछ-बृक्ष,फूल-पातसभसँ हुनका बहुत सिनेह छनि । एकबेर केओ भोरे टहलैत काल बेलीक फूल तोरैत रहथि। सरदारजी हुनका फूल तोड़ैत देखि लेलखिन । औ बाबू! तकर बाद जे हंगामा भेल से की कहू । बात बढ़ैत-बढ़ैत दुनूगोटेमे  मारि-पीट होबए लागल । सरदारजीक हाथमे चोट लागि गेलनि । ओ अस्पताल जाए पलस्तर करओलनि आ पुलिसमे केस सेहो कए देलनि । आब तँ ओ सरदारजीक निहोरा करए जे कहुना पुलिस केस हटा लेथि । बहुत दिन धरि ई झंझटि चलैत रहल । आखिर ओ घटी मानलाह आ जेना-तेना मामिला शांत भेल ।

लोधी कालोनीमे सरकारी आवास आवंटित भेलाक बाद हमहु नित्य लोधी गार्डेनमे घुमए लागल रही । एकदिन पूजाक हेतु किछु फूल तोड़ैत रही कि सरदारजीक नजरि हमरापर पड़लनि । ओ फटकिएसँ चिकरब शुरु केलाह । हम इएह-ले ओएह-ले भागलहुँ । बादमे अपन मित्र सरदार वलदेव सिंहसँ एहि घटनाक चर्चा केलहुँ । हुनकेसँ सरदार अजीत सिंहक बारेमे पता लागल । असलमे ओ लोधी गार्डेनक स्वयंभु रक्षक बनि गेल छथि आ जे केओ कोनो अनट काज करैत देखाइत छनि तकरासँ लड़बामे  कोनो संकोच नहि करैत छथि। बादमे सुनलिऐक जे एनडीएमसी हुनका लोधी गार्डेनक संरक्षक बना देने छनि । कालक्रमे सरदार अजीत सिंह हमर नीक मित्र बनि गेलाह आ जखन कखनो मोन होइतनि तँ ओहि घटनाक चर्च कए आनंद उठबितथि ।

दिल्लीक प्रसिद्ध इन्डिआ इन्टरनेसनल सेंटर लोधी गार्डेनसँ सटले अछि । अपितु,ओ लोदिए गार्डेनक एक भाग लगैत अछि । ओहिठाम बेसीकाल गीत-नाद होइत रहैत अछि । एक सँ एक कलाकार ओहिमे सामिल होइत छथि । लोधी गार्डेनमे टहलैत काल साँझमे ओ मधुर- मधुर गीत जँ कानमे पड़ितए तँ मोन होइत जे कनी काल ठाढ़ भए जाइ ,गीत सुनि ली ।  असलमे ओहिठाम लगीचेमे कैकटा महत्वपूर्ण संस्थानसभ छलैक जतए एहन-एहन कार्यक्रमसभ होइते रहैत छल । चिन्मयानंद मिसन,इस्लामिक सेंटर,इन्डिआ हैबिटाट सेंटर मे निरंतर किछु-ने-किछु एहि तरहक कार्यक्रम होइते रहैत छल । यद्यपि हम लोधी कालोनीमे आठसाल रहलहुँ मुदा एहिसभ कार्यक्रममे बेसी नहि जाइत छलहुँ । अंतिम सालमे किछुदिन एकर आनंद उठा सकलहुँ । तखन तँ बहुत अफसोच होइत छल जे पहिने किएक नहि एहिमे सामिल भेलहुँ  

लोधी गार्डेनक चारूकात एक सँ एक महत्वपूर्ण स्थानसभ अछि । लगीचेमे विश्वप्रसिद्ध खान मार्केट अछि । ओहिठाम देश-विदेशक संभ्रांत लोकसभ बजारमे बौआइति भेटि जेताह । खानमार्केटसँ सटले मेट्रोक टीसन बनि गेलासँ ओहिठाम आबा-जाही सुगम भए गेल अछि । ओही इलाकामे साइ मंदिर सेहो अछि । वृहस्पति दिन कए ओतए भक्तलोकनिक जबरदस्त भीड़ होइत अछि । अहलभोरेसँ भक्तलोकनि पाँति बना कए दर्शनक उत्सुक रहैत छलाह । लोधीगार्डेनसँ सटले वरिष्ठ सरकारी अधिकारी लोकनिक सरकारी आवास अछि। हुनकासभक हेतु लोधी गार्डेन तँ जेना दनान अछि । सफदरजंग मदरसा सेहो लोधी गार्डेनसँ सटले अछि । ओ दिल्लीक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थानमेसँ अछि । जँ अहाँ प्रायोजित दिल्ली दर्शनक हेतु बिदा होएब तँ ओतए जेबे करब । अहाँक बस ओतए ठाढ़ हेबे करत । असलमे ई सभ स्थान दिल्लीक इतिहाससँ जुड़ल अछि । एकसमयमे ओहिठाम की चुहचुही रहल होएत से सोचल जा सकैत अछि।

लोधी गार्डेनमे लगभग आठसाल हम भोर-साँझ टहलि सकलहुँ । ब्लाक २१,लोधी कालोनीक सरकारी आवास जून २०१४मे छुटि गेल आ तकर बाद लोधी गार्डेन सेहो छुटि गेल ।  मुदा ओकरासँ जुड़ल बहुत रास घटनासभ अखनो स्मृतिमे ओहिना बनल अछि । भोरे जखन लोधी गार्डेनमे टहलबाक हेतु जाइत छलहुँ तँ ओहिमे जाइते देरी अकटा अलग दुनिामे पहुँचि जाइत छलहुँ । ओतए कतेको लोकसभसँ परिचय भेल । ओहिमे महत्वपूर्ण व्यक्तिमे सँ छलाह सेवानिवृत्त आइएएस श्री भुरेलालजी । ओ उत्तरप्रदेश काडरक अधिकारी छलाह । स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह जखन भारतक प्रधानमंत्री रहथि तँ भुरेलालजी हुनकर प्रमुख सचिव रहथि । एकसमयमे देशक सभसँ शक्तिमान सरकारी अधिकारी रहल श्री भुरेलालजी समय संगे केहन तालमेल केने छथि से लोधी गार्डेनमे हुनका देखि कए पता लगैत अछि । अहंकार जेना हुनका अछिए नहि । सभसँ बेस अपनत्वसँ गप्प-सप्प करताह,आगु बढ़ि कए भोरे हरिओम कहि कए स्वागत करताह आ संगे-संह घुमैत रहताह । लगबे नहि करत जे एहन पैघपदपर रहल लोकक संगे छी । ततबे नहि,ओ ठाकुरद्वारा ट्रस्ट बनओने छथि जे  बहुत तरहक सामाजिक काजसभ करैत अछि । ओसभ लोधी गार्डेनमे एकटा बैसारक स्थान बनओने छथि आ नित्यभोरे पचास-साठिगोटे ओतए बैसैत छथि,योग-व्यायाम करैत छथि,चाह-पान करैत छथि,कहिओ-कहिओ तँ जलसा सेहो होइत अछि । एहिसभसँ हुनका एकटा बहुत जीवंत समाज भेटि गेल छनि जकरा संगे सेवानिवृत्तिक बाद बहुत नीक समय बिता रहल छथि । लोधी गार्डेनमे एहन-एहन कैकटा गुट अछि । समय-समयपर ओसभ उत्सव मनबैत छथि,भोजन करैत छथि आ वापस अपन-अपन घर चलि जाइत छथि ।

लोधी गार्डेनमे प्रातःकाल दसबजेसँ रातिमे आठ-नओ बजेधरि प्रेमी जोड़ासभक बाढ़ि रहैत अछि । ओसभ दोगमे कतहु करोट धेने रहैत छथि । मुदा किछु दर्शकसभ हुनकासभक पछोड़ केने रहैत छथि । केओ आबओ,केओ जाओ हुनकासभक भाव-भंगिमापर कोनो प्रभाव नहि पड़ैत अछि कारण ओसभ तँ अपनेमे मस्त रहैत छथि,बेहोश रहैत छथि । लोधी गार्डेनमे दिन-देखार ईसभ होइत रहैत अछि मुदा पुलिस आ प्रशासन के जेना कोनो मतलबे नहि । जे होइत छैक से होऊ । कखनो काल जखन कुकांडभए जाइत अछि तखन जरूर पुलिस डंडा हिला दैत अछि । अन्यथा ककरो कोनो मतलब नहि । लोक आबि रहल अछि,जा रहल अछि मुदा प्रेमी जोड़ासभ अपन दुनिआमे  मस्त रहैत छथि । मुदा ओहिठाम सुच्चा टहलनिहार लोकसभकेँ एहि फसादसभसँ कोनो मतलब नहि रहैत छनि । ओ तँ प्रकृतिक आनंद लैत अपन स्वास्थ बनबएमे लागल रहैत छथि ।

एकबेर दियाबातीक प्रात अन्हरोखे हम दुनू बेकती ओतए टहलए चलि गेल रही । फटक्का प्रदूषणक कारण एकडेग नहि देखाइत छल । अन्हार गुज्ज,भयावह वातावरणमे ओतए एकडेग ससरब मोसकिल छल । लगैत छल जे सौंसे लोधी गार्डेनमे हमही दुनूगोटे आएल  छी । तथापि साहस कए हमसभ आगु बढ़ैत रहलहुँ । किछु फटकी मनुक्खक आबाज सुनाएल तखन जान मे जान आएल । कहुना कए एक चक्कर लगओलहुँ । दोसर चक्कर लगेबाक साहस नहि भेल आ डेरा वापस आबि गेलहुँ ।

एकदिनहम छुट्टीक दिनमे दस बजे लोधी गार्डेन टहलए गेल रही ।  गेटसँ थोड़बे अंदर गेलाक बाद एकटा अधबएसू बहुत भावबिभोर भए गबैत छलाह- ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले..हम रह गए अकेले....ओकर गीत सुनिकए हम ठामहि ठाढ़ भए गेलहुँ । गीतक स्वरमे ततेक दर्द भरल छल जे लागल जेना लकबा मारि देलक ।  ओ किछुकाल धरि अहिना गबैत रहल आ कहि नहि कतए बिला गेल । बादमे फेर ओ कहिओ नहि देखाएल । बहुत दिन धरि ओ गीत फेरसँ सुनबाक मोन होइत रहल । संभवतः ओ व्यक्ति सेहो छुट्टीक मूडमे अपन मनोव्यथा संगीतक रूपमे अभिव्यक्त कए रहल छलाह। एहने एकटा दृश्य एकदिन लोधी गार्डेनक बीचमे  देखलहुँ। एकटा ओकील साहेब पाथरपर बैसि कए तरह-तरहक शास्त्रीय संगीत गाबि रहल छलाह । हुनकर गेबाक भाव-भंगिमासँ लगैत छल जेना ओ अंदरसँ हिलि गेल छथि । गबैत-गबैत ओ नाचए लागथि । चारूकात तमासा देखनिहारक भीड़ लागि गेल छल । ओना ओ गीतो नीक गबैत छलाह मुदा ओहूसँ बेसी हुनकर आकृतिसँ निकलैत संकेत छल जे कोनो गंभीर  आंतरिक दुखक दिस इसारा करैत छल । एहि तरहें कतेको तरहक दृश्य लोधी गार्डेनमे देखबाक अवसर भेटैत छल । छुट्टी दिन कए तँ ओतए मेला लागल रहैत छल । लोकसभ सपरिवार  आबि ओतए आनंद मनबैत छलाह । जेम्हरे जाउ नेना,युवक आ बूढ़सभ नाना प्रकारक मनोरंजन करैत  देखेताह । साँझ होइत-होइत लोकसभक भीड़ ससरि जाइत छल ,रहि जाइत छल नियमित टहलएबलासभ जे सामान्यत: लगीचक सरकारी आवाससभसँ अबैत छलाह । ई क्रम बारहो मास आ तीसो दिन ओतए चलैत रहैत छल ।

लोधी गार्डेनक लगीचमे रहि हमसभ ओकर बहुत फएदा उटओलहुँ । आठ वर्षसँ बेसी समय धरि मगनीमे स्वस्थ मनोरंजन होइत रहल । लोकसभ महग होटल वा कल्वमे जा कए जे उसासक अनुभव करैत  हेताह से हमसभ मगनीमे लोधी गार्डेनमे उठओलहुँ । सभसँ फएदा तँ ई भेल जे नीक लोकसभक संगति भेटल । एक सँ एक विद्वान लोक ओहिठाम टहलैत भेटलाह । ओहिमेसँ कैकगोटे दोस्तो बनि गेलाह । स्वास्थकेँ तँ जेना असीर दबाइ छल ओ स्थान । हमर श्रीमतीजीकेँ पैरमे दर्द होइत रहैत छलनि । कतेको डाक्टरसँ देखेलहुँ । कहि ने कोन-कोन एक्सरे करओलहुँ । मुदा ठीक भेल लोधीगार्डेनमे चललासँ । शुरुमे तँ हुनका चलबामे परेसानी बुझाइनि मुदा क्रमशः ओ फुर्तीसँ चलए लगलीह आ कालक्रमे तँ ओ हमर कोन कथा कैकटा तेज टहलएबलासभकेँ पछुआ दैत छलीह । लोकसभ एहिबातसँ बहुत प्रसन्न होइत छलाह । मुदा अंतिम दूसाल ओ लोधी गार्डेनमे भोरक टहलनाइ छोड़ि देलीह । बहुतदिन धरि लोकसभ हुनकर हाल-चाल पुछैत रहलाह ।

जून २०१४मे लोधी कालोनीक सरकारी आवास छोड़ि देलाक बाद हमहु लोधी गार्डेन घुमबाक सुखसँ बंचित भए गेलहुँ । आब तँ तकर कतेको साल बिति गेल । तथापि,लोधी गार्डेनक स्मरण अबिते रहैत अछि । ओहिठाम भोरसाँझ टहलैत लोकसभ मोन पड़िते रहैत छथि । मुदा ई जीवन थिक । सभ नीक-बेजाए वस्तुक अंत होइते अछि । लगैत अछि जेना लोधी गार्डेनक स्मृति कोनो बहुत नीक सिनेमाक एकटा सुखद अंश छल । आशा करैत छी जे कहिओ फेर एहन समय अएतैक जे हमसभ लोधी गार्डेन पहिने जकाँ भोर-साँझ टहलि सकब आ जीवनमे ओएह स्फ्रुति ,ओएह आनंद फेरसँ भेटि सकत ।

 

26.6.2020

 

 

 



बुधवार, 24 जून 2020

नियति

 

 

नियति

 

 

नियतिवश हम कर लेते हैं

गलत विकल्पों का चुनाव

और भटकते रह जाते हैं,

बंचित रह जाते  हैं

सार्थक समाधान से

रह जाते हैं दुखी और अशांत

नियति का कुछ भी नहीं है विकल्प

अगर ऐसा होता तो

दुर्योधन मान लेता

 कृष्ण का समझौता प्रस्ताव

दे दिया होता बस पाँच गाँव

और टल जाता महाभारत

बंच जाते लाखों लोक कटने-मरने से

परंतु ऐसा हो न सका

क्यों कि अहंकारी दुर्योधन

पढ़ नहीं सका अपना भविष्य

होनी को कोई टाल नहीं सका

व्यास को सब पता था

परंतु कोई सुना नहीं

वह भी दिव्यचक्षु देकर चलते बने

 

युद्ध का परिणाम कितना दुखद था

सुखी कोई नहीं रहा

जीतने वाले भी हार गए

कोई अपना रहा नहीं

जिसके साथ विजय का सुख बाँट सकते

रक्तरंजित राज भोग नहीं सके

आखिर,सबकुछ त्यागकर चले गए

जब अहंकारवश

सही और गलत में नहीं कर पाते हैं फर्क

और

दूसरों का ऐश्वर्य, मान-सम्मान पर

करते रहते हैं प्रहार

तो होता है विनाश

समझने की जरूरत है कि

यह दुनिया लेने के लिए नहीं

देने का लिए है

लोभ के संवरण से

त्याग से ही

हम हो सकते है मुक्त

नियति के पाश से


24.6.2020

शनिवार, 20 जून 2020

दिल्लीक दुरंगी दुनिआ

 

दिल्लीक दुरंगी दुनिआ

 

भोर होइते चारूकात लोकसभ गर्द पड़ए लगैत अछि । चारिबजे भोरेसँ लोकसभ कथु-ने-कथुक पाँतिमे ठाढ़ भए जाइत अछि । ककरो दूध लेबाक छैक,ककरो रेलक टिकट । ककरो कार्यालय जेबाक जल्दी छैक तँ ककरो कालेज जेबाक छैक । बस,रेल,कारसभक समय बान्हल छैक । तरह-तरहक इंतजामो छैक मुदा लोकक जनसंख्या ततेक छैक जे व्यवस्था धएले रहि जाइत छैक । बसमे चढ़बाक काल धकमधुक्का,अस्पतालमे डाक्टरसँ देखेबाक अछि तँ धकमधुक्का । अस्पतालमे देखेबाक अछि तँ चारि बजे भोरेसँ पाँतिमे लागि जाउ । माने कोनो एहन स्थान नहि भेटत जतए लोकक हुजुम नहि रहैत अछि,जतए अनगिनित लोक पाँति लगाए प्रतीक्षा नहि कए रहल अछि । ई तँ हाल अछि देशक राजधानी-दिल्लीक ।

दिल्लीमे जखन पैसि कए देखबैक तँ ओकर कैकटा विकृति देखाएत । अहाँक दुनिआ अपन फ्लैट धरि समटल रहत । अहाँक अगल-बगल के छथि,चोर छथि,कि उचक्का छथि कि कोनो विद्वान वा कलाकार छथि तकर कोनो जानकारी नहि भेटत । लोक सौंसे दुनिआकेँ नोति लेत मुदा पड़ोसीकेँ कोनो सूचना नहि रहत । जँ सीढ़ीपर कोनो पड़ोसी देखा जाएत तँ लगतैक जे आब की कएल जाए? ओ प्रयासपूर्वक नुका जाएत जाहिसँ भेंट ने भए जाए। बीच सड़कमे केओ ककरो छूरा मारि रहल अछि,कोनो महिलाकेँ कोनो लफंगा तंग कए रहल अछि, कि कोनो घर मे कोनो बूढ़केँ ओकरे परिवारक लोक फज्जति कए रहल अछि,केओ किछु नहि कहत , कात बाटे तेना ने ससरि जाएत जेना ओ किछु नहि देखलक,जेना किछु भेवे नहि कएल । सैकड़ों लोक कोनो घटनाकेँ देखत मुदा मौकापर एकटा गवाह नहि भेटत । तेहन बेदर्द थिक दिल्ली ।

दिल्लीक कोनो टीसनपर चलि जाउ नित्य लाखोंक तादातमे गाम-घरसँ पलायन कए मजदूर दिल्ली अबैत अछि । कैकगोटे तँ अपन गौंवाक संगे अबैत अछि । तकरासभकेँ अएलाक बाद रहबाक ठौर भेंटि जाइत अछि। मुदा दिल्ली अएनिहार बहुत रास एहन लोकसभ होइत अछि जकरा कोनो ठेकान नहि रहैत अछि,जे टीसनसँ कतए जाएत सेहो नहि बूझल रहैत छैक । प्रचंड इच्छाशक्तिक एकमात्र पूँजी लेने ओ सभ जीवन संग्राममे कुदि जाइत  अछि आ अंततोगत्वा, जीवि जाइत अछि । कैकगोटे तँ दिल्लीमे जेना-तेना अपन घरो बना लैत अछि ,अपन रोजगार बना लैत अछि मुदा सभ एहने भाग्यवान नहि होइत छथि । सोचिऔक ओकरासभक हेतु दिल्ली केहन क्रूर रहैत हेतैक जे माघक जाढ़मे रोडपर सुतबाक हेतु विवश रहैत अछि । बात ओतबे पर रहि जइतैक तँ बरदास्त कए लैत मुदा कैकबेर सुतलेमे ओकरापर ट्रक,बस वा कार गुजरि जाइत अछि आ ओ अभागल व्यक्ति फेरसँ सूर्योदय नहि देखि पबैत अछि ।

जँ कहिओ छुट्टी भेटए(ओना दिल्लीमे ककरो कहिओ आफियत रहैत नहि छैक) तँ चलि जाउ कोनो वृद्धाश्रम। ओहिठामक दृश्य देखिते रहि जाएब । ओतए काहि कटैत बूढ़सभ कोनो गरीब घरक नहि होइत छथि । ओसभ अपन जवानीमे कैकटा महल बना चुकल छथि,अपन पुत्रक सुख सुविधाक हेतु बैंकमे कड़ोरो टाका जमा केने छथि,कतेकोगोटेकेँ तँ अखनहुँ बड़का-बड़का कारोबार चलि रहल छनि । मुदा तेँ की? धीया-पुता बुझैत छनि जे ओसभ तँ ओकर अछिए आ ओकरे हेतैक ,ताहि लेल एहि बूढ़केँ कतेक दिन माथपर रखने रहब । कैकटा बूढ़ बेटाक मुँह देखबाक प्रत्याशामे मरि जाइत छथि । कैकटाकेँ अंतिम संस्कारोमे परिवारक केओ नहि आबि पबैत छनि । ओसभ विदेशमे बसि गेल छथिन,ओतएसँ आएब-जाएब बहुत मोसकिल । अपन मजबूरी बता कए संतोख कए लैत छथि । बाह रे! आधुनिक दिल्लीक आधुनिक लोक़ ।

दिल्लीक हाल पुछि रहल छी तँ कहि रहल छी । एकदिस एकसँ एक महल,सुविधा संपन्न कोठीसँ सजल मोहल्लासभ आ तकर सटले भेटत उजरल-उपटल लोकसभक खोपड़ीक शृंखला जकरा दिल्लीक भाखामे कहल जाइत अछि झुग्गी-झोपड़ी कालोनी । जतेक चोर,उचक्का,अपराधीसभ होइत छथि से सभ एहने ठाम नुकाएल रहैत छथि । अपराध करब हुनका लोकनिक मुख्य रोजगार छनि । ओकरेसभक संगे जेना-तेना  देहकेँ झपने ,पेट भरने  दिन-राति गारि मारि सुनैत जिनगी बितबैत रहलाह लाखों बिहारी मजदूरसभ अछि । कालक्रममे ओहीमेसँ किछुगोटे सुभ्यस्त भए गेलाह तँ फेर घुरिओ कए ओहिठाम नहि गेलाह । केओ नेता बनि गेलाह,ककरो दोकान खुजि गेलनि तँ केओ कोनो सरकारी कार्यालयमे छोट-मोट काज पकड़ि लेलनि । जिनका जोगार भए गेलनि,कोनो पैघ अधिकारीसँ संपर्क भए गेलनि तँ स्थायी सरकारी नौकरी सेहो भए गेलनि । से जँ नहिओ भेलनि आ नैमित्तिक आधारपर काज करैत छथि तैओ गाम जा कए हवा दैत छथिन जे ओ सरकारी काज करैत छथि । कैकगोटेकेँ तकर फाएदा भेलनि,नीक परिवारमे बिआह भए गेलनि । जखन ओ सहरमे कनिआ अनलनि आ ओ हुनकर हालति देखलखिन तँ छाती पीटैत रहि गेलीह ।

जे-से मुदा दिल्ली अएबाक क्रम लगातार बनले रहल । गामक-गाम उपटि कए दिल्ली आबि गेल । आब तँ ई हाल अछि जे गामसँ बेसी गौंवा दिल्लिएमे भेटि जेताह । मुदा दिल्ली अछि बेदर्द से तँ कहनहि छी । कोरोनाक कारण जखन सभकिछु बंद भए गेल तँ प्रवासी मजदूरसभक हाथ-पैर फुलि गेलैक । काज छुटि गेलैक । सरकारी सहायताक कतहु कोनो पता नहि । मालिकसभ काजसँ हटा देलकैक । एहन हालतिमे पहुँचलाक बाद सभकेँ अपन गाम मोन पड़लैक । भेलैक जे जेना-तेना गाम वापस चलि जाइ । सभ दिल्ली छोड़ि देलक । किछुगोटे गाम घुरबाक प्रयासमे रस्तेमे  मरि गेल । मुदा गाम-गामे होइत छैक । जे पहुँचि गेल से सभ बहुत उसासमे छल । बेसक एहिबेर ओकरासभक देहपर नवका जींस नहि रहैक, गमकौआ तेल माथमे नहि लागल रहैक मुदा गामक माटिमे  पैर पड़िते ओकरासभकेँ स्वर्गक सुख भेटलैक ।

दिल्लीक चारूकात बड़का-बड़का  अट्टालिका,मीलों नमगर ओभरब्रिज,सैकड़ों दोकानसँ सजल-धजल माल दिस देओ आकर्षित भए जाएत । ओकरा के बनओलक? ओएह बिहारी मजदूर जे आब कोरोनाक संकटमे जान बँचेबाक हेतु गाम वापस चलि गेल अछि । मुदा जखन ओ दिल्लीमे छल तखनहु ओहि मालमे ओ फेर नहि गेल,नहि किनि सकल कोनो दामी चीज-वस्तु , नहि लए सकल अपन शिशु हेतु कोनो आकर्षक खेलौना जकरा गाम गेलाक बाद ओ ओकर हाथमे दैत गर्वक अनुभव करैत ।  ई छैक दिल्लीक दुरंगी दुनिआक कटुसत्य ।

ओना दिल्लीमे भारतक इतिहासक गहींर दर्शन होइत अछि । कहि नहि कतेको राजा एतए अएलाह आ गेलाह मुदा दिल्ली ठामहि अछि । ऐतिहासिक महत्वक एकसँ एक वस्तु एहिठाम भेटत । मुदा से के देखैत अछि? गाम-घरसँ आएल जन-बनिहारसभ दिल्ली अबितहि पेटक जोगारमे जे लगैत अछि से लगले रहि जाइत अछि । आइ-काल्हि करैत ओकर जिनगी गुजरि जाइत छैक । दिल्लीमे रहितहुँ ओ किछु नहि देखि पबैत अछि । सही मानमे कहल गेल अछि - जे दिल्लीक लडू खेलक सेहो पछतओलक आ जे नहि खेलक सेहो ।

दिल्ली भने देसक राजधानी होअए,एकर कोनो अपन व्यक्तित्व नहि छैक । सौंसे विश्वक लोकसभ एतए आबि कए अपना हिसाबे जीबि रहल अछि । सभ अपन-अपन फ्लैटमे मुनल अछि । बगलमे की भए रहल अछि तकर कोनो जानकारी नहि,कोनो मतलबो नहि । जँ केओ मरिओ गेल तँ परेसानी तखने होइत छैक जखन लाससँ निकलैत दुर्गंधक कारण रहनाइ मोसकिल भए जाइत छैक । अन्यथासभ होटल जकाँ फराक-फराक जिनगी जीबैत रहैत अछि । पैघलोकक सभसँ प्रिय मित्र ओकर विदेशी जातिक कुकूर भए गेल अछि । ओकरे संगे जीबैत अछि,ओकरे संगे सुख-दुख बाँटबाक प्रयास मे लागल रहैत अछि । एहन संभ्रांत परिवेशमे रहनिहारक मोनमे  ओकर लगीचेमे झुग्गी बनाकए रहनिहार काजबालीक कोनो चिंता नहि ,कोनो मतलब नहि रहैत छैक । ओसभ तँ संपन्न वर्गक हेतु मात्र इस्तमाल करबाक वस्तु थिक , एक नहि तँ दोसर भेटि जेतैक ।

 सालक -साल दिल्लीमे रहलाक बादो अपन कनो पहिचान बनबएमे असफल रहबाक बाद प्रवासी मजदूर लोकनि कैकबेर वापस अपन गाम जेबाक विचार करैत छथि । मुदा कतेको बेर हुनकर ई इच्छा मोनमे धएले रहि जाइत छनि आ एकदिन परदेशेमे एहि संसारकेँ छोड़िकए चलि जाइत छथि । सौंसे जिनगीक संघर्ष यात्राक एकटा दुखद अंत भए  जाइत अछि । ककरा फुर्सति छैक जे ओकरा हेतु शोक मनाओत वा श्रद्धांजलि देत । एहन थिक ई बेदर्द दिल्ली ।

दोष दिल्लीक नहि थिक । ओ तँ सभदिनसँ राजदरवार रहल अछि । तरह-तरहक राजासभ एहि सहरपर अपन कब्जा जमओलक आ भारतपर शासन केलक । कहल जाइत अछि जे पाण्डवलोकनि सेहो एतहिसँ राज केलथि । पाण्डवकालीन कैकटा मंदिरसभ दिल्लीमे अखनो अछि । दिल्लीमे जेम्हरे जाएब ढहल-ढनमनाइत राज-प्रसादसभ अपन-अपन खिस्सा कहबाक हेतु आतुर भेटत । मुदा ककरा समय छैक जे ओकरसभक दारुण व्यथा-कथा सुनए आ अपनो मोनकेँ दुखी कए लिअए ।  राजा रहैक,राजबारा रहैक ,ओकरे नौकर-चाकर रहैक । मुदा आब समय बदलल छैक । सभ अपनाकेँ राजे मानैत अछि । कहैत अछि जे देशमे प्रजातंत्र आबि गेल छैक । संविधान बनि गेल छैक , सभ बरोबरि अछि । मुदा ई सभ  कागज-किताबमे सीमित छैक । वास्तविकता इएह छैक जे आम आदमीकेँ जे दिल्ली हाथ लगैत छैक से ततेक ने कठोर आ विद्रुप अछि जे ओकरा पाथरपर माथा फोड़ैत रहबाक हेतु विवश कए दैत छैक जखन कि ओतहि केओ श्रीमान दिन-राति गगनचुंबी महलमे  बैसल देशक प्रगतिक ढोल बजबैत रहैत छैक ।

उमीदेपर ई दुनिआ ठाढ़ छैक । तेँ हमसभ आशा करी (आ किएक नहि करी) जे एकदिन एहनो अएतैक जखन दिल्ली  सही मानेमे सुंदर भए जएतैक । दिल्लीक नीक अस्पतालसभ गरीबोक हेतु सुलभ होएतैक। गरीबोक नेनासभ पव्लिक इसकूलमे  पढ़तैक आ सभगोटेएकस्वरमे कहतैक-वाह रे दिल्ली!


20.6.2020


बुधवार, 17 जून 2020

मृत्यु से संवाद

मृत्यु से संवाद

 

जब लोगों ने बहुत ही डराया

कि मृत्यु से बचकर रहिए

यह कर देगा सर्वनाश

कुछ नहीं बचेगा उसके बाद

 तो मैंने सोचा कि क्यों नहीं

सीधे उनसे ही संवाद कर

पूछ लिया जाए-

मृत्युजी ! आपके बारे में जो चर्चाएं सुन रहा हूँ

क्या वह सही है?

क्या आप सचमुच बहुत क्रूर हैं?

क्या आप सचसच सबकुछ बताएंगे?

और कुछ नहीं तो कोई रास्ता ही बताएंगे

जिससे  मैं आपसे बच सकूं ।

मेरी बात सुनकर वे ठहाका लगाने लगे

कहने लगे-

यार! तुम कमाल के आदमी हो

आजतक किसी ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई

जो मुझसे आँख में आँख डालकर

इस तरह पूछ सके

वह भी मेरा ही प्रोफाइल

फिर मैंने कहा-

सीधे नहीं कह सकते तो

अपना फेसबुक प्रोफाइल का लिंक ही बता दीजिए

 हम खुद सारी जानकारी निकाल लेंगे

मृत्युजी फिर हँसे-

ये सारे प्रोफाइल अधूरे हैं

जिसदिन मैं इनका एकाउंट चेक करूंगा

देखना सबकुछ डिलीट मिलेगा

सिर्फ मैं ही रहूंगा अकेले

एक-एककर सबको विदा कर

फिर उन्होने इशारा किया

 फेसबुक पृष्ठ पर दायीं तरफ

जहाँ कुछ लोगों ने लिख रखा था-

लोक अकारण ही डरते हैं मृत्यु से

सभी लगे हैं जिसके निवारण में

परंतु,कोई न कोई उपाय वह कर ही लेता है

चल देता है कोई न कोई चाल ,

एक-से-एक प्रतापी, शूर-वीर

राजा,रंक फकीर

कुछ भी नहीं कर पाते हैं

मृत्यु का अनंत साम्राज्य

कर देता है सब को परास्त

मृत्यु उतना बुरा भी नहीं है,

है वह भी सौंदर्यमयी, ममतामयी

तमाम दुखों से हमें करता है मुक्त

सारे वंधनों से दिलाता है छुटकारा

शोक,लोभ,लाज सभी पीछे छूट जाते हैं ।

जीवन में तो दुख ही दुख है

 नान प्रकार के योग- वियोग का घटित होते रहना

अपने लोगों का विछुड़ना

प्रियपात्रों का दूर हो जाना

तरह-तरह के रोग-व्याधियों से ग्रसित हो जाना

लेकिन मृत्यु एक ही बार में

इन सबसे हमें देता है विश्राम ,

नहीं रह जाती है अपेक्षा

धन-संपत्ति,यश-प्रतिष्ठा

हो जाता है अर्थहीन

फिर भी हम चिंतित हो जाते हैं

मृत्यु के आहट से

निश्चय ही मृत्यु बहुत दुखदायी है

जब अपना कोई चला जाता है

वरना तो रोज ही कितने मरते रहते हैं

और किसी को कुछ भी असर नहीं होता है

असल में दुख का कारण ही मोह है

किसी को अपना समझने से उपजा हुआ मोह ही

हमें धकेलता है

नर्क में वारंबार

जो स्वतः छूट रहा है उसे जाने दीजिए

क्यों उससे चिपकने का कर रहे हैं प्रयास

जो जितना त्याग करता है

वही बनता है महान

 सभी रंगो को त्यागकर ही बनता है

सात्विकता का प्रतीक- श्वेत रंग

जो दे सकता है चिरंतन शांति

मृत्यु का भय हो सकता है समाप्त

जब हम समझने लगते हैं

 आत्मा का अमरत्व

और यह भी कि

शरीर का आना-जाना तो

बस एक क्षणिक पटाक्षेप है।

 

17.6.2020

 


शुक्रवार, 12 जून 2020

मजदूर

मजदूर

भूख और अपमान से त्रस्त

वे छोड़ गए थे सबकुछ

अपना घर,गाँव और परिवार

इसलिए कि

अपने ही लोगों से प्राप्त

अपमान और यातनाएं

हो गई थी असह्य

सामने में परिवार था असहाय

अन्न-जल के बिना

बच्चे पत्नी और माता-पिता

भरण-पोषण के बिना बन चुके कंकाल

हारकर एकदिन

वह रातों-रात निकल पड़ा था

कुछ भी नहीं था पाथेय

न था रेल-बस का कोई इंतजाम

पैदल स्टेसन पर

पहुँच गया था जैसे-तैसे

एक नंबर प्लेटफार्म पर  खड़ी थी

आठ डिब्बों वाली एक ट्रेन

जिसमें पहले से ही खचा-खच भरे थे लोग

साधारण डिब्बा में

बिना टिकट वह घुस गया था

पता नहीं कि

वह ट्रेन जाएगी कहाँ?

न उसे इस बात की परवाह थी

जहाँ जाना हो जाए

पर यहाँ से तो हटे ।

फिर तीसरे दिन

वह पहुँचा था मुम्बई

अर्द्धमृत

किसी सहयात्री ने दयाकर

साथ चलने को कहा था ।

समय कितना आगे बढ़ गया

आज बीस वर्ष हो चुके हैं

उसका परिवार मुम्बई का नागरिक है

वह किसी सेठ का नौकर है

अपने जैसे ही दस-बीस मजदूरों के साथ

किराये के छोटे से घर में रहता है

समय ठीक ही बीत रहा था

यदा-कदा आंदोलनकारी

कहते रहते थे-वापस जाओ

पर वह वापस कहाँ जाता?

गाँव में सब कुछ कब्जा हो चुका था

उसके अपने ही लोग

उसे प्रवासी मानकर

सब कुछ ले चुका था

पर कौन जानता था?

कि एकदिन पूरे दुनिया को

कोरोना ले लेगा अपने गिरफ्त में

मुम्बई  शहर उसे काटने दौड़ेगा

लाक डाउन में चली जाएगी उसकी नौकरी

और वह पैदल चल पड़ेगा

वापस अपने गाँव को

पर किस्मत भी क्या चीज है?

ट्रेन दरभंगा पहुँच तो  गया

परंतु वह उसमें नहीं था

उस में था

उसका प्राणहीन शरीर ,

उसका छोटा सा शिशु

वारंबार प्रयत्न करता रहा

हिला डुलाकर उसको जगाता रहा

लेकिन वह हिला नहीं

तबतक ट्रेन आगे जा चुकी थी

स्टेसन खाली हो चुका था

शिशु रोता रह गया

प्राणहीन पिता के वगल में

परंतु कोई उसे बचा नहीं सका

और थोड़ी देर में वह भी सो गया

सद-सर्वदा के लिए

चिर निद्रा में ।



 12.6.2020

गुरुवार, 11 जून 2020

माधवी नानी

माधवी नानी


हम नेना रही । कैकबेर दनानपर बैसल रहितहुँ कि हुनका किछु-किछु बड़बड़ाइत देखितिअनि । कैकबेर ओ किछु-किछु हमरो कहबाक प्रयास करितथि । मुदा हम नहि बूझि पबिऐक जे बात की छैक ?  कैकबेर भगवती लग पूजा करैत काल सेहो हुनका भनभनाइत देखिअनि । मुदा बात नहि फरिछाए । माएकेँ हुनकासँ बहुत लगाव रहनि । ओ हुनकासँ बहुत आदरपूर्वक गप्प करित थि । बादमे माए हुनकेसँ मंत्रो लेलथि । हुनका लेल माएकेँ जे पार लागनि से ओ करबो करितथि । मुदा हुनकर दुख तँ भितरिआ रहनि । तकर निवारण के करैत ?

कृषकाय,उज्जर धोतिमे लपटल हाथमे छोटसन लोटा लेने भोरे-भोर ओ कुट्टीपर स्नानकरबाक हेतु जाइत छलीह । नवका पोखरिबनि गेलाक बाद हमरासभक परिवारक अधिकांश लोक स्नान,पूजाक हेतु ओतहि जाथि । मुदा माधवीनानी सभदिन कुट्टिएपर जाइत रहलीह । माघक जाढ़ होइक वा भदवारिक पानि हुनका लोकनिक स्नान-पूजाक समयमे कोनो परिवर्तन नहि होइत छल । हुनका संगे हुनके बएसक दू-तीनटा आओर महिला स्नान करबाक हेतु कुट्टीपर जाइत छलि । स्नान-पूजा केलाक बाद ओ सभ तीन-चारि गोटे संगहि लौटथि तँ कैकबेर रस्तेमे भेंट भए जाइत छल । कारण हमहु नवका पोखरिपरसँ स्नान कए ओही समयमे वापस अबैत रहैत छलहुँ । कुट्टीपरसँ स्नान-पूजा केलाक बाद ओ हमर बिचला घरमे स्थापित भगवतीक पूजा करैत छलीह । तकरबादे ओ उतरबारिकात बनल अपन घर जाइत छलीह । आश्चर्य आ दुखक बाद थिक जे ओ घर हुनकर अपन घरारीपर नहि बनल छल । ओ जगह हमरा लोकनिक हिस्सामे छल आ बाबू हुनका तात्कालिक देने रहथिन ।

 नित्य अन्हरोखे कुट्टीपर भगवानक आरती होइत छल । घरी-घंटा बजैत छल । ताधरि सूर्योदय नहि भेल रहैत छल । सोचल जा सकैत अछि जे ओ सभ कतेक भोरे स्नानक हेतु कुट्टीपर पहुँचि जाइत छलि । कुट्टीपरहक बाबा ओहिठामक व्यवस्था चाक-चौबंद रखने छलाह ।  ओतए बहुत रास गाएसभक पालन होइत छल आ तकर दूधसँ पाएस बनैत छल । प्रसादमे ओहि पाएसकेँ कनी-कनी कए लोकसभकेँ देल जाइत । ततेक स्वादिष्ट रहैत छल जे होइत जे खाइते रही । मुँहमे जाइते बिला जाइत छल ।  ओ बाबा बहुत दिनधरि कुट्टीपर रहलाह आ एकदिन रातिएमे कुट्टीक बहुत रास समानसभ बैलगाड़ीपर लादि चुपचाप चलि जाइत रहलाह । लोकसभ कहलक जे नेपाल दिस हुनकर भाए बाबाजी रहथिन,ओतहि चलि गेलाह । कुट्टी खाली भए गेल । मुदा माधवीनानी आ हुनकर संगीसभक स्नान चलिते रहलनि ।

माधवीनानीक पति हमर बाबाक सहोदर रहथि । हमर बाबा(स्वर्गीय श्री शरण मिश्र) छओ भाइ रहथि । ओहिमेसँ एकटा माधवीनानीक पति सेहो रहथि । बिआहक बाद मात्र एकटा बेटीक जन्मक बाद ओ असमयेमे मरि गेल रहथि । ओहि समयमे अंग्रेजक बनाओल कानूनक अनुसार विधवाकेँ मात्र खोरिसक अधिकार छलैक । आओर किछु नहि। तेँ हुनकर ई हाल छल । एतेक संपन्न परिवारक पुतहु होइतहुँ ओ अत्यंत कष्टमे जीवन-यापन करैत छलीह । अपने लोकसभ कानूनक भर लैत हुनका किछु नहि देलखिन । नेनामे सुनिऐक जे एकबेर ओ मोकदमा सेहो केलथि मुदा हारि गेलीह । ओहिसमयमे कानूने तेहने रहैक ।

 पुस्तैनी संपत्तिमे हिस्सा नहि भेटबाक कारण हुनका हाकरोस करैत देखिअनि । हमरा नीकसँ मोन अछि जे पारिवारिक संपत्तिमे हिस्सा नहि भेटबाक कारण ओ कतेक बेकल रहैत छलीह। रहि-रहि कए कानए लगितथि। कहितथि-भगवान हमरा संगे तँ अन्याय केबे केलाह,घरोक लोक  बहुत जुलुम केलक। हमर घरबलाक हिस्सा पचा गेल । हुनका बेर-बेर श्राप दैत सेहो सुनिअनि। ओ श्राप सभकेँ पड़िए गेलनि। ओहि आङनक तीनू घरबासीक जे गति भेल से देखलक नगरक लोक ।

माधवीक माएक पोखरौनी बिआह भेल रहनि । हुनका सेहो मात्र एकटा संतान माधवी भेलखिन। माधवी अपन नानीकसंगे रहथि । संभवतः हुनकर माएक देहांत कमे बएसमे भए गेल रहनि (हम हुनका कहिओ नहि देखने रहिअनि) ।माधवी नानी नामसँ ओ जानल जाइत रहलथि । हुनकर नैहर बेतिआ रहनि । बहुत उच्च कुल-शीलक छलनि हुनकर नैहर । तेँ एतेक संपन्न परिवारमे हुनकर बिआह भेल छल । मुदा भाग्य दहिन नहि रहलनि । पतिक अकाल मृत्युक संगहि जीवनक समस्त सुख चलि गेलनि ।

माधवीक पति फौजमे रहथि । फौजमे पोस्टींगक दौरान ओ एकटा रेडिओ अनने रहथि । ऐहि समयमे रेडिओ ककरो-ककरो होइत छलैक । हमरे आङनमे उतरबारिकातसँ लालबाबाक घरक एक हिस्सामे ओ रहथि । ओकरे ओसारापर रेडिओ राखल जाइत चल । ओहिमे तरह-तरहक गीत-नाद सुनि लोक बहुत प्रभावित होइत । अफसोचक बात छैक जे माधवीनानी केँ घरारिओ नहि देल गेल रहनि । बहुतदिनक बाद जखन हुनकर नतिन जमाए (ठाकुरजी) जखन फौजसँ सेवानिवृत्त भेलाह तँ गामक उतरबारि कात कलमसँ सटले ओ घरारीक जमीन किनलनि। ओतहि घर बनओलनि । तकरबाद माधवी नानी सेहो ओतहि रहए लगलीह । कहि नहि हुनकर बएस कतेक रहनि। हमरा जनैत अस्सी सालसँ कम तँ नहिए रहल हेतनि । आधा देह झुकि कए जमीनक समानांतर भए गेल रहए । तेहनो हालतिमे गुरकैत-गुरकैत ओ हमरासभक आङन आबि जाइत छलीह ,कुट्टीपर स्नान करबाक हेतु चलि जाइत छलीह ।

हमर माए माधवीनानीसँ मंत्र लेने छलखिन । गुरु हेबाक कारण माए हुनका बहुत आदर करैत छलि । जखन अगल घरारीपर ओसभ अपन घर बना लेलनि तखनो माएक आवागमन बनल रहलनि । एकदिन ओतहि माधवीनानीक देहावसान भए गेलनि । बाबू हुनका आगि देलखिन । तकरबाद श्राद्धक समस्या उतपन्न भेल । माएक इच्छा रहैक जे हुनकर श्राद्धक व्राह्मण भोजन आ अन्य विधि-विधान ओही घरारीपर होबए जतए ओ रहैत छलीह । मुदा एकटा फरिकेन ताहि हेतु राजी नहि भेलथि । ओ अलगसँ अपने दरबाजापर व्राह्मण भोजन करओलनि । शेषलोकनि हुनकर अपन घरारिएपर श्राद्धक व्यवस्था केलनि । एहि संबंधमे किछुदिन जबरदस्त घोल-फचक्का भेल रहए । आपसी बैसार सेहो भेल । मुदा सहमति नहि बनि सकल । अ सलमे मरलाक बादो हुनकर स्वतंत्र आस्तित्वकेँ मानबाक हेतु किछुगोटे मानसिक रूपसँ तैयार नहि रहथि जखन कि आब ओहिमे कोनो खतरा नहि छलैक । ओ मरि चुकल रहथि । तखन हिस्सा लेबए थोड़े अबितथिन । 

माधवीनानीक नाम केओ नहि जनैत अछि । भरि जिनगी ओ माधवीनानीक रूपमे जानल गेलीह । हुनका एकटा बेटी भेलनि । तकरो कोनो पहिचान नहि भेलैक ,मुदा माधवीकेँ दूटा बेटा भेलनि । हमरा गाममे ओ सभ कतेको डीहीसँ बढ़ियाँ स्थितिमे छथि आ अपन नानीक स्मृतिकेँ बचओने छथि ।

 माधवीनानीक मरला ३७ साल भए गेल । कानूनक आरिमे हुनका संगे बहुत अन्याय भेल । हुनके कोन,ओहि समयमे जतेक विधवासभ होइत छलीह तिनकर सएह गति होइत छलनि । मुदा आबे की हालति बदलि गेल अछि ? एहि बीचमे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियममे कतेको संशोधन भेल अछि । कानूनीरूपसँ पैत्रिक संपत्तिमे बेटा-बेटीकेँ बराबरक हक भए गेल अछि । मुदा व्यवहारमे अखनो हालति बहुत नहि बदलल अछि । यद्यपि किछु गोटे अपन हक हेतु कोट-कचहरी धरि जा रहल छथि मुदा सामान्यतः अखनो बेटीक डोली जँ उठि गेल तँ ओ वापस नैहर नहि आएत ,सासुरेमे स्वाहा भए जाएत-क सिद्धांतपर समाज ठाढ़ अछि। केओ-केओ अपवादोमे गनल जा सकैत छथि मुदा अपवाद तँ अपवादे थिक । अपवादिक मामिलाकेँ छोड़िकए बेटीसभक हाथ  अखनहुँ फोकले अबैत अछि । आशा करैत छी जे समाज आबो जागत जाहिसँ माधवीनानीसन लोकक आत्माकेँ शांति भेटतनि ।

 

 

 11.6.2020

 

 

 

सोमवार, 8 जून 2020

यह समय है

यह समय है

 

समय अपना प्रभाव

छोड़ता ही है,

क्या राजा,क्या रंक

सभी हैं मोहताज इसके

बिना किसी अपवाद के ।

कोई कितना भी था प्रतापी,

परंतु,वह बचा नहीं सका

 अपने आप को

उसके समस्त सामर्थ्य

हो गए निष्प्रबावी

और समय अपना

निशान छोड़ गया।

एक मामूली व्याधा ने

कृष्ण जैसे महाप्रतापी के

हर लिए प्राण

और वे निःसहाय देखते  रह गए ।

महावली अर्जुन को

मामूली लूटेरों ने कर दिया परास्त

बेकार हो गया गांडीव

विधवाओं,अवलाओं को लूटकर चले गए

और वे रह गए

असमर्थ,निरुपाय ।

परंतु,हमारा अहंकार

भ्रमित रखता है हमें

और हम निरंतर करते रहते हैं

घात-प्रतिघात उनपर

 जो हैं असमर्थ,असहाय ।

पर भूलिए मत

यह समय है

एक दिन आप स्वयं भी

होंगे इसके गिरफ्त में

कोई बचा नहीं पाएगा

हो चाहे कितना भी समर्थ

और अफसोस करते रह जाएंगे

हाय! मैंने यह क्या किया?

इसलिए होइए सचेत

बच सकते हैं तो बचाइए स्वयं को

व्यर्थ के आरोप-प्रत्यारोप से

जो अवसर मिला है

उसे मत गबाइए

कर लीजिए सदकार्य

जिस से हो सके कल्याण

उन सबों का

जो दुखी हैं,बंचित हैं

और आप भी संतुष्ट होकर

विदा लें

इस संसार से ।

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