गुरुवार, 19 मार्च 2020

यशस्वी भव ! दीर्घायु भव !


 
यशस्वी भव ! दीर्घायु भव !
“रे मिआँ जान! महीष चुकरि रहल छौ ।”
“कतए छैं रे!”” 
“सुनि नहि रहल छैँ?”
“जल्दीसँ पड़रुकेँ खोल । हम आबि रहल छी ।”
बाबा नित्य भोर आ साँझ चिकरि कए मिआँजानकेँ आबाज दैत छलाह । मिआँजान तुरंत महीष लग पहुँचितए । बाबा तुरंत दनानपरसँ ओलारपर पहुँचितथि । आ थोड़ेकालक बाद भरिडोल फेनाएल दुध लेने वापस अबितथि । ई घटनाक्रम चारि-पाँच मास धरि चलैत । तकरबाद महीषक दुध कम होबए लागैत । जौँ-जौँ दुध कम होइत तौँ-तौँ ओकर स्वाद बढ़िआ होइत जाइत । कहल जाइत छल जे महिष बकेन भए गेल अछि । तकरबाद जखन महीषकेँ गर्भाधानक समय अबैत तँ मिआँजान ओकरा लेने बाधे-बाध घुमैत चिकरैत छल-अर्र! चहत -चहत -चहत... अर्र! चहत- चहत -चहत...आ कतहुसँ पारा कुदैत-फनैत अबैत। गोटैक दिन बाबा प्रसन्नतापूर्वक घोषणा करितथि-महिष बाहि गेल । तकरबाद महीष दुध देनाइ क्रमशः बंद कए दैत ।
हमरसभक दनान आ ओलारक बीचमे पोखरि छल । पोखरिक उतरबारि भीरक बाटे एकपेरिआ रस्ता छलैक । ओही देने ओलारपर पहुँचल जा सकैत छल । क्रमशः ओ एकपेरिआ रस्ता लग-पासक जमीनक मालिकसभ धकिअबैत गेलाह । किछु समयक बाद ओ रस्ता नहि रहि गेल । ओलारपर जाएब-आएब मोसकिल भए गेल । तथापि बहुतदिन धरि वैकल्पिक रस्तासभक ओरिआओन होइत रहल ।  ओहो रस्तासभ गाहे-बगाहे बंद होइत गेल। बादमे हमरसभक  घरे लग उतरबरिआ कातमे माल-जालक घर बनल । दनानसँ सटले पूब बड़दक थरि बनल । बादमे मिआजान नौकरी करए सहर चलि गेल । ओकरा बदलामे कैकबेर कैकटा चरबाह आएल गेल। मुदा केओ स्थिर नहि रहि सकल । हारि कए बाबा महीषकेँ पोषिआ लगा देलाह । दूध-दही उठओना आबए लागल । मुदा ओहि दूधक स्वाद घरक महीष दूध सन नहि भए सकल । नव बिआएल महीषक दूध किछुदिन धरि अशुद्ध रहैत छल । ओकर खिरसा बनैत छल । बादमे ओसभ दुर्लभ भए गेल। बाबा अपन महीषक बहुत गाढ़ दूध पीबाक अभ्यस्त छलाह । जखन महीष पोसिआ लागि गेल आ परिवारमे लोक बढ़ि गेल तँ उठओना लेल गेल दूधसँ बाबाकेँ खोआसन गाढ़ दूध  भेटब मोसकिल भए गेलनि । एहिबातक अफसोच करैत हुनका कतेको बेर देखिअनि ।
एते बाततँ भए गेल मुदा अहाँ कहि सकैत छी जे अखन धरि बाबाक नाम नहि कहलहुँ । तँ से सुनिए लिअ। हुनकर नाम रहनि स्वर्गीय श्रीशरण मिश्र (पिताक नाम स्वर्गीय गुमानी मिश्र गाम अड़ेर डीह परगना जरैल) । हुनकर पिता स्वर्गीय गुमानी मिश्र  ओहि समयमे इलाकामे संपन्न व्यक्ति मानल जाइत छलाह । 
बाबा नित्त अन्हरोखे उठैत छलाह । जौं जन अढ़ाबक होनि तँ अहल भोरे सिनुआरा टोल जइतथि आ तकरबाद नित्यकर्म करबाक हेतु नवका पोखरिपर चलि जइतथि । नवका पोखरिपर  हुनकोसँ पहिने कैकगोटे पहुँचल रहैत छलाह जाहिमे प्रमुख छलाह बंगटकाका,बरमाबालीकाकी आ सरिसवबाली काकी । नवका पोखरिसँ सटले बसल लोकसभमेसँ कैकटा महिलासभ सेहो स्नान करबाक हेतु ओतए भोरे पहुँचि जाइत छलि । जँ खेतमे जन काज करैत होइत तँ बाबा ओकरसभक पनपिआइ लए कए जैतथि आ खेतक काज समाप्त भेलाक बादे ओ स्नान-पूजा करैत छलाह । तकरबाद वापस घर अबितथि । 
बहुत दिन धरि बाबा शालीग्राम भगवानक पूजा करैत छलाह । पूजामे  जँ कोनो व्यवधान भेल तँ हुनका कैकबेर बहुत तमसाइत देखिअनि । कैकबेर तँ ओ तमसा कए भगवानकेँ शर्माजीक ओहिठाम पठा दैत छलाह । फेर कहिओ मोन होइतनि तँ हुनका ओहिठामसँ भगवानकेँ वापस मंगा लितथि । ईसभ कैकबेर हमसभ देखिऐक । बाबा स्वभावसँ बहुत कर्मठ,मेहनती,स्वाबलंबी मुदा तमसाह छलाह । चौहत्तरिम वर्षक बएस धरि ओ खेती स्वयं करैत छलाह । हुनका खेतीसँ हटितहि घरक आर्थिक स्थिति गड़बड़ाइत गेल । तकरबाद खेतसभ बटाइ लागए लागल । परिवार पैघ भए गेल छल । हमसभ नौ भाए-बहिन रही । बाबू,माए आ बाबा लगाकए बारहगोटे भेलहुँ। बादमे हमर नानी सेहो आबि गेल रहथि । ओ मसोमात छलीह आ हमर माए हुनकर एकमात्र संतान रहथिन । एकाधटा पाहुन रहितहि छलाह । अस्तु, कुलमिलाकए सोलहगोटेक नियमित आश्रम छल। एतेकगोटेक जलखैसँ लए कए भोजनधरिक ओरिआन करबामे माए दिन-राति व्यस्त रहैत छलि ।  ओहिमे हमसभ इसकूल जाइ। बाबू सेहो अपन काजपर जाथि । बाबाक पूजा-पाठ होनि । सभ काजक जिम्मेबारी एकसरि हमर माए सालक-साल निर्वाह करैत रहलि । 
बाबाकेँ छओटा भाए आ दूटा बहिन रहथिन । एकटा बहिन तँ नैहरेमे बसाओल गेल रहथिन आ दोसरक बिआह वभनगामा(जनकपर,नेपाल)क एकटा संपन्न परिवारमे भेल रहनि। हमरा जतेक मोन पड़ि रहल अछि बाबाक दुनू बहिन देखबामे गोर-नार आ अतीब सुन्दरि छलि । दुर्गा दाइ गामे मे बसल रहथि । तेँ हुनकामे बहुत ठसक छलनि। भाएसभक घरे-घर घुमि कए भौजीसभपर हुकुम चलबथि। बभनगामाबाली पीसी स्वभावक बहुत मृदुल रहथि ।  दुर्भाग्यवश ओ  जल्दिए विधवा भए गेलीह। हुनका दूटा पुत्र रहथिन। हुनकर  वभनगामामे  नीक संपत्ति रहनि। मुदा दियादसभ गड़बड़ करैत छलनि । बाबा कैकबेर एहि प्रसंगसभमे वभनगामा जाइत  छलाह आ पिसीक काज सोझरा अबैत छलाह । बाबा जखन कोनो बातपर रुसि जाइत छलाह तँ वभनगामा  चलि जाइत छलाह । ओहिठाम दस-बीस दिन रहितथि। वापसीमे  गृहस्थ हेतु उपयोगी किछु-किछु जेना हर,बैलगाड़ी उपहार जरूर भेटैत छलनि । वभनगामासँ लौटलाक बाद बाबाक रोहानी बदलल रहैत छलनि। ओ स्फूर्तिसँ भरल रहैत छलाह आ वापस आबि अपन गृहस्थीक काजमे जोर-सोरसँ लागि जाइत छलाह।
बाबा अपना लेल पनही मधुबनीसँ अनैत छलाह । ओहिमे पहिने कैकदिनधरि अंडीक तेल दए कए ओकरा नरम कएल जाइत छल । गाममे पनहि पहिरि कए ओ साँझमे टहलैत नवका पोखरि स्थित महादेव मंदिर धरि जाइत छलाह । ओहिठाम नित्य हुनकर दू-तिन घंटा समय बितैत छलनि । एकदिन एहिना टहलैत काल सड़कपर एकटा साइकलसँ टकरा गेलाह । तकरबादतँ तमासा लागि गेल । ओहि साइकलबलाकेँ तँ जे भेलैक,से भेलैक,मुदा ओकर साइकिल सेहो छिनने चलि अएलाह । बादमे ओ बहुत गोहरेलक आ घटी मानलक तखन ओकर साइकिल वापस भेल ।
बाबा अपन युवावस्थामे  सशक्त पहलवान रहथि । कहाँदनि एकदिस कैकगोटे आ दोसर दिस एसगरे चार चढ़ा दैत छलाह । हमसभ तँ हुनका जखन देखलिअनि आ जखनसँ हुनकर आकृति मोन अछि ओ बूढ़े देखाइत छलाह । मुदा ओ छलाह एकदम चुस्त । सभटा खेतीबारी ओ एसगरे करैत छलाह । ककरो मजाल नहि छल जे हुनकर खेतमे बिदति कए दैत । कैकबेर घरारीक सीमाक हेतु,कलमक बाँस हेतु वा खेतमे पानि पटेबाक हेतु हुनका झंझट करए पड़ैत छलनि । एकबेर एहीसभ विषयमे दियादेमे  बाताबाती भए गेल । बात किछु आगा भए गेल । बाबाक कहलापर हम बंगट काकाकेँ पंचैतीक हेतु बजाबए गेल रही । बंगटकाका ओहि समयमे गामक मानल पंच होइत छलाह । पहलवान तँ छलाहे संगहि ठाँइ-पठाँइ अपन बात कहबाक हेतु प्रसिद्ध छलाह । पंचैती भेल आ संबंधित व्यक्ति बाबासँ घटी मानलनि । बात ओतहि खतम भए गेल । कहि नहि की-की होइत? मुदा हुनकासभमे एतेक छल-प्रपंच नहि रहनि । आएल पानि गेल पानि बाटे बिलाएल पानि- से बला हाल रहैक ।
बाबाक बिआह सोतीपुर सलमपुर(समस्तीपुर लग) शीलानाथ झा पाँजिमे भेल रहनि । ओहि समयमे पाँच सए चानीक सिक्का हमरसभक परबाबा दए ई बिआह ठीक केने रहथि कारण जाति-पाँजि बला कन्या आनब ओहि समय बहुत प्रतिष्ठाक गप्प बूझल जाइत छल । बादमे बाबाक सारसभ जनाढ़मे जा कए बसि गेल रहथि । जनाढ़सँ बहुत दिन धरि हुनकर सारसभ बाबासँ भेंट करए आबथि आ मासक मास बाबा लग रहि जाथि । ओहिमे बाबाक एकटा सार स्वर्गीय सतंजीव मिश्र तँ हमरा गाममे रहि कए बहुत दिन पढ़लो रहथि । बादमे  सभाक समय ओ अवश्य आबथि आ कैक मास धरि पहुनाइ केलाक बाद जनाढ़ वापस जाथि । बाबाक हेतु कैकटा उपहार जेना चक्कु,सरौता आनथि ।
बाबाकेँ एकमात्र जीवित संतान हमर बाबू रहथिन । हुनकर  हार्दिक इच्छा रहनि जे ओ नीकसँ पढ़थि । ताहि हेतु हुनका वाटसन इसकूल मधुबनीमे छात्रावासमे राखि पढ़ाइ करबाक ब्योंत केने रहथि । मुदा बाबूजीक ध्यान गेनखेलीपर बेसी आ पढ़ाइपर कम रहैत छलनि । गेनखेलीमे  बाबूजीकेँ कतेको मेडलसभ भेटल रहनि । किुछदिनक हेतु जखन ओ कोलकाता गेल रहथि तँ हुनकर  चयन मोहनबगानक फुटबालटीममे भए गेल रहनि । मुदा ओ कोलकातामे बेसीदिन नहि टिकलाह आ गाम वापस आबि गेलाह। ओ आगा नहि पढ़ि सकलाह जखन कि हुनकर कैकटा संगी  बहुत आगू गेलाह । बादमे एहि बात हेतु हुनका बहुत अफसोच करैत देखिअनि । बाबाक कहाँदनि दूटा आओर संतान भेल रहथिन जे अकाल कालक गालमे समा गेलाह। तेँ बाबू एसगरे रहि गेलथि। बाबा एहि हेतु हुनका किछु रोक-टोक नहि करथि ।
बाबा अपन एकमात्र संतान स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्रक बिआह टेकटारि टीसन लग सिंघिआ ड्योढ़ीमे बहुत संपन्न परिवारमे स्वर्गीय रामप्रसाद झाक एकमात्र संतान( स्वर्गीया दयाकाशीदेबी)सँ करबओने रहथि । ओहि समय हमर माएक बएस नओ साल आ बाबूजीक बएस बाइस साल छलनि । हमर नानाक देहांत बहुत पहिने(हमर माएक जन्मसँ किछु मास पूर्बहि) भए गेल रहनि । एतेक कम बएसमे सासुर अएलाक बाद हमर माए पचासी साल सासुरमे रहलीह आ निरंतर संपूर्ण परिवारक सेवा करैत रहलीह । हमर दाइक असामयिक मृत्युकबाद माए तीस वर्षधरि बाबाक सेवा केलथि । एहन पुतहु आब कतए पाबी?
हमर दाइ बहुत कमे बएसमे मरि गेलीह । बाबाक बएस ओहि समयमे पचास साल रहल होएतनि। दाइकेँ पेचिस भए गेल रहनि । ओहि समयमे कोनो इलाज रहैक नहि । बैदक पुड़िआ बहुत दिन धरि खाइत रहलीह। मुदा हुनकर स्वास्थ्य गड़बड़ाइते गेल । आखिर ओ कमे बएसमे चलि गेलीह । हुनकर पोताक मुँह देखबाक मनोरथ लागले रहि गेलनि । हमर चारिटा बहिनक जन्म भए गेल रहनि । ताबेधरि हमर जन्म नहि भेल छल । एहिबातसँ ओ बहुत दुखी रहैत छलीह ।  हुनका मृत्युक बाद एकटा आओर बहिनक जन्म भेलनि । कहक माने जे पाँच बहिनक जन्मक बाद छटम संतान  हम भेलिअनि । हमर जन्मसँ बाबा बहुत प्रशन्न भेल रहथि। 
हमर परिवारमे जखन कोनो संतानक जन्मक समय होइत तँ बाबा सिनुबारा टोलसँ चमाइनकेँ बजबितथि। दिन होइ वा दूपहर राति ओएह ओ काज करैत छलाह । पहिनेसँ बकरीकेँ ठेकना कए राखल जाइत जाहिसँ जनमौटी नेनाकेँ बकरीक दुध जनमितहि देल जा सकए ।
कहाँदनि जखन हमर जन्म भेल तँ बाबाकेँ ई समाचार दैत हुनकर बहिन कहलखिन जे नेनाक नाक पीचल छैक । बाबा कहलखिन-
“जएह दही गे भुलिआ । हिनकर नाककेँ देखैत अछि ।”- से कहि ओ महादेवकेँ बहुत धन्यवाद देबए लागल रहथि। हमर जन्मसँ पूर्व बाबा महादेवकेँ पोताक हेतु बहुत प्रार्थना करथि ।   हुनका एकदिन लगेक इनार लग एकटा डमरु भेटलनि । ओहि डमरुकेँ बजा-बजा कए ओ महादेवक नचारी गबैत छलाह आ महादेवसँ पोताक जन्मक हेतु मनता करैत छलाह । बाबा कहथि-
  “डमरु बजओलासँ प्रसन्न भए महादेव चारिटा पोता देलथि ।” 
ओहि डमरुकेँ बजबैत हमहु बादमे बाबाकेँ देखने छलिअनि । बहुत बादमे जा कए बाबा ओहि डमरुकेँ नवका पोखरिपर महादेव मंदिरमे राखि देलखिन ।
परिवारमे ज्येष्ठ हेबाक कारण बाबा बहुत गोटेक गुरु छलाह । ताहिमेसँ प्रमुख छलाह भैया(हमर पितिऔत -श्री शशिभूषण मिश्र) । हुनका आ भौजी -दुनूगोटेकेँ बाबाक प्रति बहुत श्रद्धा रहनि । ओ सभ हुनकेसँ मंत्र लेने छलाह ।  बाबा हुनकर बरोबरि चर्चा करथि । कहल करथि जे अपने प्रयाससँ पढ़िकए ओ छोटे नौकरी कए पूरा परिवारक नक्सा बदलि देलनि । बातो सही। हुनकर चारूपुत्र उत्तमसँ उत्तम शिक्षा प्राप्त केलथि आ बहुत उच्च पदसभधरि पहुँचि सकलथि । गाम-घरमे बहुत संपत्ति अर्जित केलाह । हमसभ नेनेसँ हुनका भैया कहिअनि । हुनकामे आश्चर्यजनक फुर्ती सभदिन देखबामे आएल । सरकारी नौकरीसँ सेवानिवृत्तिक बादो ओ निरंतर सकृय रहलाह । 
एकदिन बाबा नवका पोखरिपर साँझक पूजाक समयमे मंदिरेपर बेहोश भए गेलाह । तुरंते ई बात सौंसे गाममे पसरि गेल । देखिते-देखिते लोकक करमान लागि गेल । केओ हुनका पंखा करथि तँ केओ पानि पिआबथि,केओ भगवानक नाम लेथि । लोकसभके भेलैक जे आब ओ गेलाह । मुदा थोड़बे’कालक बाद हुनकर हालतमे सुधार होबए लागल आ घंटाभरिक बाद स्वयं चलि कए ओ घर पहुँचि गेलाह ।
बाबा ठट्ठ गृहस्थ छलाह । घर-बहारक सभटा काज हुनका बूझल रहनि । खाट घोरब, जौर बनाएब,धान रोपनीसँ कटनी धरि ओ मुस्तैद रहैत छलाह । जखन दनानपर धानक कटनीक बाद दाउन जोइत तँ बाबा भोरे ऊठिकए बरदक ओरिआन करैत छलाह। स्वर्गीय बच्चाकाका(उदयकान्त मिश्र)क बरद सभदिन मेहिआमे बहैत छल । कहक माने जे जँ सातटा बरद दाउनमे लागल अछि तँ सभसँ शुरुमेमे जे बरद होइत तकरे मेहिआ कहल जाइत छल । सामान्यतः सभसँ अहदी आ अब्बल बरदकेँ मिहआमे राखल जाइत छल ।  जखन दाउन भए गेल तँ धानकेँ  तौलल जाइत छल । गामक किछुगोटेकेँ एहिकाजमे महारत छलनि । हुनका धान तौलबाक हेतु बजाओल जाइत छल । ओ धानकेँ तौलितथि-
रामहि राम एक-एक,रामहि राम दू-दु, एहि तरहें गनैत धानक तौलनाइ होइत ।  तकरबाद एकसूप धान कात कए राखि देल जाइत जे कोनो गरीब ब्राहमणकेँ दानमे देल जानि । एहि तरहेँ अगहनसँ शरु भए मास-दूमास ई प्रकृया चलैत रहैत । अधिकांश धानकेँ दरबाजाक कोनपर बनल बखारीमे राखि देल जाइत छल । तकरबाद बँचल धानकेँ घरमे राखल ढक,कोठी आदिमे राखल जाइत छल । बादमे ई परिस्थिति नहि रहल । 
बाबाक जीवन बहुत मानेमे एकाकी रहनि । कमे बएसमे हमर बाबीक देहांत भए जेबाक कारण ओ व्यक्तिगत रूपसँ नितांत एसगर रहथि । ई बात कैकबेर हुनकर व्यवहारमे परिलक्षित होइतो छल । ओना तँ एकहि पुत्रसँ हुनका भरल-पूरल परिवार रहनि । नओटा पोता-पोती,बेटा-पुतहुसभ रहनि । ओ ओहीमे लागलो रहैत छलाह। मुदा जौँ-जौँ हुनकर बएस बढ़ैत गेल हुनकर मोनक उदासी साफे देखल जा सकैत छल । तकर मूल कारण परिवारक आर्थिक स्थितिक ह्रास छल । बहुत रास एहन घटनासभ भेल जे ओ सपनोमे सोचने नहि रहल हेताह । मुदा भावी प्रवल होइत अछि । जे हेबाक रहैत अछि से होइते अछि । जे सुख-दुख हुनका लिखल छलनि ,से भेलनि। 
एहिसभक अछैत ओ ८६ साल जीलाह । जीवनक अंतिम समयमे बहुत कमजोर भए गेल रहथि । दरबाजापर दिन-राति समय कटैत छलनि । जँ केओ मजगूत युवक देखितथि तँ ओकरासँ जतबितथि । कैकबेर ब्रम्हुजीकेँ अपन सुखाएल हड्डीपर चढ़ा लैत छलाह । ओहो भरिमोन हुनकर सेवा करितथि । पहलवानीक समयक भग्नावशेष हुनकर देहमे तखनो बहुत जान छल । व्यायाम छुटि गेलाक कारण हड्डी दुखाइत रहैत छलनि । तखन होनि जे केओ हुनका जतैत रहए । मुदा एतेक समय ककरा लग रहैक?
सन् १९७५मे हम दरभंगामे दूरभाष निरीक्षक रही। बेलामे हमर डेरा रहए । नौकरीक संगहि प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारी करैत रही ।  एकदिन भोरे पता लागल जे बाबा मरि गेलाह । किछुदिनसँ ओ अस्वस्थ छलाह । अफसोचक बात जे अंतिम समयमे हमरा हुनकासँ भेंट नहि भए सकल ।
बाबा बहुत अध्यात्मिक व्यक्ति रहथि । दुपहरिआमे ओ नियमित रामायण पाठ करथि।  एकादशी-चतुदशी सहित अनेको व्रत-उपवास ओ नियमित करैत छलाह । महादेवक भक्त छलाह। सभसँ बेसी ओ बहुत कर्मठ आ सशक्त गृहस्थ छलाह । जाधरि हुनका शरीर संग देलक ताधरि परिवारकेँ प्रतिष्ठापूर्वक पालन-पोषण करैत रहलाह। सही मानेमे ओ हमर परिवारक लक्ष्मी छलाह। जखन कखनो  एकांतमे रहैत छी,बाबा ध्यानमे आबि जाइत छथि। नमगर-पोरगर, फुर्तीसँ भरल, हाथमे छड़ी लेने जेना अखनो ओ हमरा लग ठाढ़ भए आशीर्वाद दए रहल होथि । जेना कहि रहल होथि-“यशस्वी भव ! दीर्घायु भव !”


१९.०३.२०२०

शनिवार, 14 मार्च 2020

हमर पोथीसभक मुद्रित संस्करण निम्नलिखित वेवलिंकपर क्लिक कए आनलाइन कीनल जा सकैत अछि:

हमर पोथीसभक मुद्रित संस्करण निम्नलिखित वेवलिंकपर 

क्लिक कए आनलाइन किनल जा सकैत अछि:

भोरसँ साँझ धरि(आत्मकथा)
https://pothi.com/pothi/node/195476.
प्रसंगवश(निवंध संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195527.
स्वर्ग एतहि अछि(यात्रा प्रसंग)
https://pothi.com/pothi/node/195487.
फसाद(कथा संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195510.
नमस्तस्यै(मैथिली उपन्यास)
https://pothi.com/pothi/node/195444.

विविध प्रसंग(निवंध संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195633.

महराज  (मैथिली उपन्यास)

https://pothi.com/pothi/node/195795
लजकोटर (मैथिली उपन्यास)  

 https://pothi.com/pothi/node/196264.

सीमाक ओहि पार(मैथिली उपन्यास)  

https://pothi.com/pothi/node/197004.

 

समाधान (निवंध संग्रह)

https://pothi.com/pothi/node/197754.

मातृभूमि(उपन्यास)

https://pothi.com/pothi/node/198699.

स्वप्नलोक(उपन्यास)
https://pothi.com/pothi/node/199847.

शंखनाद(उपन्यास)

https://pothi.com/pothi/node/200903.

इएह थिक जीवन(संस्मरण)

https://pothi.com/pothi/node/202488.

ढहैत देबाल(उपन्यास)

https://pothi.com/pothi/node/203720.

पाथेय 

 https://pothi.com/pothi/node/205009.

हम आबि रहल छी(उपन्यास)

 https://pothi.com/pothi/node/206093.

 

The Lost House (Collection of short stories)

https://pothi.com/pothi/node/195843.
Life is an Art (Motivational essays)

https://pothi.com/pothi/node/196385

न्याय की गुहार (हिन्दी उपन्यास)

https://pothi.com/pothi/node/198163.

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शुक्रवार, 13 मार्च 2020

स्वर्ग और नर्क


स्वर्ग और नर्क

प्राचीन काल में समाज में अनुशासन पैदा कराने के लिए और लोगों को गलत काम से परहेज करने के लिए ही सायद स्वर्ग और नर्क की कल्पना की गई होगी । मृत्यु के बाद यातनापूर्ण जीवन से बचने के लिए बहुत तरह के गलत काम करने से लोग बचते रह होंगे । साथ ही स्वर्ग की कामना से वे दान-पूण्य और परोपकार करते होंगे ।  यह भी एक तथ्य हो सकता है कि जीवन में जो सुख नहीं प्राप्त हो सका उसे मृत्यु के बाद पाने की चाहत में ही सायद स्वर्ग की कल्पना करने के लिए मनुष्य को प्रेरित किया होगा ।

लेकिन  लोगों ने इसका भी दुरुपयोग किया । तरह-तरह के नियम बना कर लोगों को गुमराह किया गया कि अमुक कार्य करने से ही उनको मुक्ति मिलेगी । धर्म के नाम पर तरह-तरह का अत्याचार होने लगा । पशुवध इसका एक उदाहरण है । मांसाहार करने का बहाना था पशुवलि । इसी तरह कई लोग मदिरा या अन्य नशा पीने के लिए उसे देवी-देवता पर चढ़ाने लगे ।  इस तरह अपनी वासनाओं को तृप्त करने के लिए कुछ लोगों ने सीधे-सादे लोगों की धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग किया ।

सभी धर्मों में किसी न किसी रूपमे स्वर्ग-नर्क  की चर्चा है । लोग अपने-अपने तरीका से  इसकी व्याख्या कर सकते  हैं । परंतु सत्य यही है कि भौतिक धरातल पर  इनका कोई आस्तित्व नहीं है । असल में स्वर्ग और नर्क इसी जीवन में है। हम अपने आचरण से इसका निर्माण कर लेते हैं । अगर हम शांत रहते हैं,दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं तो सामने खड़ा व्यक्ति भी हमसे अच्छा व्यवहार करता है । इस तरह हमारे इर्द-गिर्द शुभचिंतको का परिवेश तैयार हो जाता है । हम एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने लगते हैं । इस तरह सभी अपने लगने लगते हैं । हम निश्चिंत जी सकते हैं । हमारे शुभचिंतको की कमी नहीं रहती है । ठीक इसके विपरित अगर हम किसी का बुरा सोचते हैं या किसी के साथ कटु वचन बोलते हैं तो वह भी हमारे साथ वैसा ही पेश होता है । कालांतर में हम अपने आप को कठिन परिस्थिति में डाल देते हैं । हमें कोई भी अच्छा नजर नहीं आता है । जबकि यह सब हमारी अपनी गलतियों के वजह से ही होता है । अगर हम किसी का बुरा सोचेंगे या किसी के व्यक्तिगत हित पर कुठाराघात करेंगे तो जाहिर है कि वह व्यक्ति कुछ-न-कुछ प्रतिकार तो करेगा ही । एकतरफा अन्याय कबतक और क्यों सहेगा? इस तरह कुटिल और दुष्ट स्वभाव के लोगों का कोई हितचिंतक नहीं रह जाता और वह दिन-रात दुखी रहकर इस दुनिया से चला जाता है । इस से बड़ा नर्क क्या होगा?

मृत्यु के बाद स्वर्ग की कल्पना भी की गई है जो जीवन में  अच्छे कर्म करने वालों को मिलते हैं । अगर अच्छा कर्म करके आदमी मरेगा तो अगले जन्म उसको उसका लाभ मिलेगा । चूंकि आज तक मृत्यु के बाद कोई भी लौटकर आया नहीं ,सो ये सारी बातें भौतिक धरातल पर सावित नहीं की जा सकती हैं । इसलिए स्वर्ग या नर्क है भी या नहीं या यह एक मात्र कपोल कल्पना है? इस बारे में कुछ भी प्रमाणिकता से नहीं कही जा सकती है । लेकिन स्वर्ग या नर्क के चक्कर में कई लोग अंध विश्वास के शिकार हो जाते हैं। तरह-तरह के गुरुओं के चक्कर में पड़कर अपना बचा-खुचा सुख शांति ,धन-संपत्ति भी कई बार गमा देते हैं । सवाल है कि जिस बात पर हमारा कोई नियंत्रण ही नहीं है,जिसकै होने न होने पर भी प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है ,फिर उसके लिए सोचकर समय क्यों नष्ट किया जाए?

स्वर्ग और नर्क आदमी के मन में ही होता है । हमें किसी व्यक्ति या घटना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए । ऐसा करने से कठिन से कठिन काम आसान हो जाता है । आपस में सहयोग और विश्वास का वातावरण बनता है । लेकिन नकारात्मकता से प्रभावित लोग हर बात में उल्टा ही सोचते हैं । उनके विचार से सभी लोग खराब ही हैं । वे ईर्ष्या,द्वेष जैसे नकरात्मक भावनाओं से भरे होते हैं । एसे व्यक्ति अकारण दूसरों की निंदा करते रहते हैं । इन्हें सभी शत्रु ही नजर आते हैं । कोई अपना लगता ही नहीं है । इस से बड़ा नर्क क्या हो सकता है?

गीता में भगवान कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि आत्मा अमर है । इसका न तो मृत्यु होता है न जन्म । मात्र हमारा शरीर बदल जाता है ,वैसे ही जैसे हम पुराने वस्त्र को छोड़कर नए वस्त्र को ग्रहण करते हैं । शरीर के प्रति मोह ही हमारे दुखों का कारण है । हम जाने-अनजाने अपने लिए दुख उतपन्न कर लेते हैं । न चाहते हुए भी कभी भी समाप्त नहीं होने वाले कामनाओं के जाल में फँसते जाते हैं । इसी से हमारे चारों ओर नर्क का शृजन होता रहता है । ठीक इसके विपरीत अगर हम जीवन में त्याग की भावना को समाहित कर लेते हैं,दुसरों को सुखी देखकर खुश रहने की कला विकसित कर लेते हैं तो हमारे जीवन में नित्य नूतन वसंत का आगमन होता रहता है । हम सही माने में सशरीर स्वर्ग पहुँच जाते हैं ।



लेखकःरबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

सोमवार, 2 मार्च 2020

सरिसवबाली काकी


सरिसवबाली काकी



हम जहिआसँ मोन पाड़ैत छी,सरसवबाली काकीकेँ ओहिना देखलिअनि । उज्जर चक-चक नुआ पहिरने माथ झपने,बहुत नहू-नही बजैत अपन बात कहितथि । अन्हरोखेमे अपन दियादिनी बेरमाबाली काकीक संगे नवका पोखरिपर स्नान-पूजा करबाक हेतु जइतथि । रस्तामे एकाधटा आओर हुनके सन बुढ़ि संग भए जइतथिन । सभगोटे घाटपर स्नान करैत घर-बाहरक गप्प-सप्प करितथि । महादेवकेँ जल ढारितथि आ वापस घर जखन आबि रहल होइतथि तखन गामक लोकसभ ओछाओन छोड़बाक उपक्रममे रहैत । जाढ़क मास रहैत तँ अधिकांश लोक घूरक सेवन करैत रहैत । भोरे-भोर चाह पीबाक चलनि ओहि समय गामसभमे नहि रहैक । मुदा केओ-केओ चाह पीबैत छलाह,से सभ अड़ेरचौकपर पहुँचि जइतथि । किसानसभ जन अढ़बए चलि जइतथि । जँ अगहनक मास अछि तँ दरबजे-दरबजे दाउन होबए लगैत। क्रमशः मौसम बदलैत,लोकक दिनचर्या तदनुकूल बदलि जाइत । मुदा सरसवबाली काकीकेँ नित्य ओहिना देखिअनि । माघोमासमे हुनका ओढ़ना ओढ़ने नहि देखिअनि । स्नान-पूजा कए लौटैत काल जाढ़क मासमे थर-थर कपैत किछु-किछु मंत्र पढ़ैत ओ वापस अपन घर आबि जइतथि ।

हमसभ नेना रही। जबान भेलहुँ । मुदा सरिसवबाली काकी ओहिनाक ओहिना रहथि । हुनका कहिओ भरिमोन हँसैत नहि देखलिअनि । जखन कखनो हुनकर आङन जाइ तँ ओ कोनो -ने -कोनो काजमे बाझल रहतथि। हुनकर हाथक बनाओल भोजनक प्रशंसा जतेक करी ततेक कम । कैकबेर हमरा हुनका ओहिठामसँ नोत होइत छल। आब सोचैत छी तँ सोचिते रहि जाइत छी । कतेक मनोयोगपूर्वक ओ भोजन बनबैत छलीह । आङनमे जाइते लगैत जेना कोनो बहुत पवित्र स्थानपर आबि गेल छी । सौंसे आङनमे एकटा खढ़ नहि देखाइत । सदिखन चमचम करैत रहैत छलनि हुनकर आङन ।

ओहि आङनमे गेलाक बाद एकटा अद्भुत शांतिपूर्ण वातावरण रहैत छल । कुलमिला कए चारिगोटे ओहिघरमे रहथि । भाइजी(स्वर्गीय अनुग्रह नारायण झा),सरिसवबाली काकी,बरमाबाली काकी, आ कामदेव भाइ। यद्यपि संबंधमे ओ काका लगितथि तथापि हमसभ नेनेसँ हुनका भाइजी कहैत छलिअनि । ओ काशीसँ संस्कृत पढ़ने छलाह । ज्योतिष रहथि । हमर गामक मुखिआ सेहो निर्विरोध चुनल गेल रहथि । भूदान आंदोलनमे विनोबा भावे संगे बहुत सक्रिय छलाह  । एकबेर तँ ओ अपनसभटा जमीन भूदान आंदोलनमे दान कए देने रहथि। बादमे बरमा बाली काकीक प्रयाससँ ओ जमीनसभ वापस भेल छल । हुनका लोकनिक ओएह जमीनसँ जीविका चलैत छलनि । तेँ लगैत अछि जे भवावेशमे ओ ई काज कए देने रहथि ।

आब अहाँ कहब जे एतेक बात तँ कहि गेलहुँ मुदा ई नहि कहलहुँ जे आखिर हुनका सभसँ हमरसभक की संबंध छल । तँ से कहिए दैत छी । हमर प्रपितामह स्वर्गीय गुमनी मिश्र बहुत संपन्न लोक रहथि । हुनका छओटा पुत्र आ दूटा पुत्री रहथिन । एकटापुत्र बिआहक बाद कमे बएसमे मरि गेलखिन ।  एकटाकेँ कोनो संतान नहि भेलनि। चारिटाकेँ संतानसभ भेलनि । एकटा कन्याक बिआह वभनगामा(जनकपुर लग ,नेपालमे} रहनि । दोसर कन्याकेँ बिआहक बाद गामे बसाओल गेल । ओहि समयमे बेटीकेँ बसेनाइ,गाममे भगिनमानकेँ राखब, गौरवक बात बूझल जाइत छल । हुनका जमीन,कलम,पोखरि सभचीजमे हिस्सा देल गेल रहनि । हुनका तीनटा  पुत्र भेलनि। ओहिमेसँ एकटा रहथि भाइजी । दोसर रहथि-स्वर्गीय जगदीश झा । ओ वाटसन इसकूल मधुबनीमे पढ़ैत रहथि । गेनखेलीमे नाम केने रहथि । मुदा कमे बएसमे टीबी बिमारीसँ हुनकर मृत्यु भए गेलनि। हुनके पत्नीकेँ हमसभ बरमा बाली काकी कहिअनि । (बरमा बेतिआ लग कोनो गाम छैक ।) हमसभ नेनामे हुनकर एकटा  ग्रूपफोटो देखने रही  जे हुनकर परिवार लगमे हुनकर एकटा निसान छल । गेनखेलीमे ओ बहुत रास मेडलसभ जितने रहथि । सेहो हमसभ नेनामे देखने रही । बरमाबाली काकी बहुत जोगा कए ई दुनू वस्तु रखने रहथि । हुनका एकटा पुत्र छथि कामदेव भाइ । बाबाक बहिनक नाम रहनि दुर्गा दाइ । दुर्गा दाइक तेसर पुत्रक बिआह सरिसवबाली काकीसँ रहनि। हम कहिओ हुनका नहि देखलिअनि । लोकसभ कहैत जे ओ बिआहक किछुए दिनक बाद टीबी बिमारीसँ मरि गेलथि । तकरबाद सरसवबाली काकी विधवा भए गेलीह । हुनकर सौंसे जीवन ओहिना उजरा सारी पहिरने बितए लगलनि ।

हम जखन कखनो ओहि आङन जाइ,सरसवबाली काकीकेँ काजे करैत देखिअनि । घरक काजसँ जखन फुर्सति होनि तँ चरखा काटथि । ओहि समयमे चरखा चलेबाक एकटा हवा बहल रहैक । हमरसभक गामेमे  खादी भंडार रहैक । ओहि माध्यमसँ कतेको गरीब महिलासभक गुजर होइत छलैक । महिला कतिनसभ महीन सँ महीन ताग काटथि । जतेक महीन ताग तकर ततेक बेसी दाम भेटितैक । ताग कतेक महीन भेल तकर निर्णय खादी भंडारक कार्यकर्ता करैत छलाह । चरखासभ सेहो कैक प्रकारक होइत छलैक । सभसँ पैघ चरखाकेँ अंबर चरखा कहल जाइक । ओहि चरखामे एकहि संगे कैकटा सूत निकलैत छल । ओकरा चलबएमे बेसी परिश्रम जरूर होइत छल मुदा सूतक उत्पादन सेहो कैक गुना बेसी होइत छल । कतिनसभ अपन-अपन सूत खादी भंडारमे  जमा कए देथि आ तकरा बदलामे बेसीकाल खादी कपड़ा देल जाइत छल । टाका कमे काल दैत छल । एहि तरहसँ कठोर परिश्रम कए ओ सभ अपन देह झपैत छलीह आ पेटो भरैत छलीह । सरिसवबाली काकी आ बरमा बाली काकी दुनूगोटे अंबरक चरखा चलबैत छलि ।

सरिसवबाली काकीक स्वरमे अद्भुत मधुरता रहनि । भगवतीक गीत,बिआहक समयक गीत ,बरक परिछन आ बेटीक जेबा काल समदाउन ओ ततेक  मधुर गबैत छलीह जकर वर्णन करब मोसकिल अछि ।

सामाजिक काजमे मदति करबाक जबरदस्त प्रबृति हुनकामे छलनि । ककरो घरमे बिआह,उपनायन होइत तँ ओ दिन-राति  एक कए दितथि । उपनयनक मरबामे लिखिआ-पढ़िआ करबामे हुनका महारत छल । सौंसे मरबामे तरह-तरहक चित्रसभ हाथसँ बनबैत छलीह । आजुक समय रहैत तँ हुनकर एहि प्रतिभासभकेँ समाजमे प्रचार होइत ,हुनका किछु आर्थिक लाभो होइतनि । मुदा ओहि समयमे से सभ तँ नहि रहैक । मधुबनी चित्रकलाक प्रचार-प्रसार भेलैक जरूर मुदा बहुत देरीसँ । ताबे हुनका सन-सन कतेको मौलिक कलाकारसभ साधना करैत-करैत एहि संसारकेँ छोड़ि गेलि ।

गाममे ककरो बेटीक बिआह होइतैक तँ मधुश्रावणीमे कनिआकेँ  खिस्सा कहबाक हेतु ओ जाइत छलीह । हुनका सभकिछु कंठाग्र रहनि । लग-पासक महिलासभ बैसितथि ,कनिआ बैसितथि , जँ बर आएल छथि तँ ओहो बैसितथि आ सभगोटे नियमपूर्वक हुनकर खिस्सा सुनितथि ।

मधुश्रावणीक समाप्तिपर जे विध-व्यवहार होइक से सभ ओ करबैत छलीह । बदलामे हुनका की भेटैत छलनि? जँ कनिआक सासुरसँ हुनको  लेल नुआ आबि गेल तँ से हुनका भेटि जाइत छलनि नहि तँ फोकला । मुदा हुनका एहिसभसँ निर्लिप्त देखिअनि । जेना ओ एहि पृथ्वीपर चुपचाप सभकिछु सहि जेबाक हेतु आएल होथि । कहिओ ककरो कोनो तरहक प्रतिवाद नहि,आग्रह नहि,इच्छा-अभिलाषा नहि ।

कैकबेर पाबनिसभमे हुनका अपना ओहिठाम किछु-किछु बनबैत देखिअनि । जेना तिलासंक्रांतिमे चुरलाइ बनबएमे ओ हमरा माएकेँ मदति करितथि । एहि काजमे तँ बरमाबाली काकी सेहो लागल देखिअनि । सभगोटे गप्प-सप्प करितथि आ चुरलाइओ बनबैत रहतथि । एहि तरहे छिट्टाक-छिट्टा चुरलाइ बनैत छल आ हमसभ तकरा कतेको दिनधरि खाइत रहैत छलहुँ ।

सरसवबाली काकीकेँ अपन कोनो संतान नहि रहनि । भाइजीकेँ सेहो अपन कोनो संतान नहि रहनि । हुनकर पत्नी कहि नहि कहिआ शुरुएमे मरि गेलखिन । कहाँदनि हुनकासभकेँ एकटा पुत्र भेल रहनि जे दस वर्षक भए कए मरि गेलथि । बरमा बाली काकी सेहो शुरुएमे विधबा भए गेलथि । मुदा संयोगसँ हुनका एकटा पुत्र भेल रहथिन-कामदेव भाइ । तीनू फरिकेनमे  ओएहटा संतान रहथि । ओ अखन अस्सी वर्षक छथि । हुनका भरल-पुरल परिवार छनि । सरसवबाली सभदिन हुनके अपन संतान बूझि जीबि गेलीह । कहिओ ककरोसँ किछु अपेक्षा नहि। भगवान छोड़ि केओ मदति केनहार नहि । कहिओ काल हुनका माएक लग नोर पोछैत देखिअनि । साइत मोनमे गड़ल कष्टकेँ असह्य भेए जाइत होनि । कतहुँ तँ ओकरा अभिव्यक्ति चाहैत छलैक । नौकरीक क्रममे हम बाहर चलि गेलहुँ । एकदिन सुनलिऐक जे सरसवबाली काकी नहि रहलीह ।  सदा-सर्वदाक लेल एकटा दुखी आत्मा एहि संसारकेँ छोड़ि गेलीह । बिना किछु कहने,बिना किछु मंगने ।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

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