सोमवार, 27 अप्रैल 2020

स्वामी आनंद वैराग्य ( फेकनजी)





स्वामी आनंद वैराग्य ( फेकनजी)



गोर-नार,नमगर,गुलाबक फूलसन सदिखन प्रफुल्लित  हम अपन ओहि मित्रसँ जखन कखनो भेंट करए जाइ तँ माहौले बदलि जाइत छल । सभटा काज ओ छोड़ि दितथि । लग-पासमे जे केओ रहितथि तिनका छुट्टी कए दितथि । आ एकटा तेहन अपूर्व मुस्कीक संगे स्वागत करितथि जकर वर्णन करब बहुत मोसकिल । जखन कखनो हम मधुबनी जइतहुँ तँ हुनकासँ अवश्य भेंट करितहुँ । कैकबेर तँ ओ मधुबनीक रस्तेपर देखा जइतथि । मधुबनी छैहे कतेक टापनरह मिनटमे एहिपारसँ ओहि पार। ओना आब आवासीय क्षेत्र यत्र-तत्र पसरि गेल अछि आ तकर हिसाब केलासँ मधुबनी  बहुत नमरि गेल अछि । मुदा ओहि समयमे तँ खादी भंडार सँ किशोरीलाल चौक,ओतएसँ आगू बढ़ब तँ शंकर टाकीज आ कनीक आओर आगू बढ़ जाएब तँ रेलवे टीसन । ओमहरेसँ आगू बढ़ैत जाएब तँ थाना मोड़ । बस खेल खतम ।

शंकर टाकीजक चर्च भेल तँ मोन पड़ि गेल गाइड सीनेमा । शंकर टाकीजमे गाइड सीनेमा हमर जीवनक पहिल सीनेमा छल जे हम मैट्रिकक परीक्षा समाप्त भए जेबाक उत्साहमे देखने रही । मैट्रिकक परीक्षाक हेतु एकतारा उच्च विद्यालयक विद्यार्थीसभक परीक्षा केन्द्र वाटसन इसकूल मधुबनीमे छल । विद्यार्थीसभ अलग-अलग गुटमे यत्र-तत्र डेरा लेने रहथि । मुदा परीक्षा केन्द्रपर सभक भेंट भए जाइत छल । मैट्रिकक परीक्षा पास केलाक बादो ओ हमरसभक संगे आर.के.कालेज मधुबनीमे नाम लिखओने रहथि । अस्तु,कुल मिला कए पाँचसाल हमसभ इसकूलसँ कालेज धरि संगे पढ़ने रही । तकरबाद ओ लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर चलि गेलाह आ हम सी.एम.कालेज दरभंगामे नाम लिखओलहुँ । मुदा हमरा लोकनिक संपर्क बरोबरि बनल रहल । सभ तरहें सुबिधा संपन्न होइतहुँ ओ पढ़ाइमे बहुत आगा नहि गेलाह । असलमे हुनकर साहित्यिक आ कलाक पक्ष नेनेसँ बहुत मजगूत छल । जौं ओ ओही लाइनमे गेल रहितथि तँ निश्चय बहुत किछु केने रहितथि । मुदा ई अफसोचक बात नहि रहि गेल कारण ओ किछु अद्भुत तँ कइए गेलाह ।

हुनकर घर मधुबनीमे नीलम टाकीजसँ आगू उतरबारि कात बनल बाल्मिकी कालोनीमे छलनि । ओ ओहि कालोनीक स्थापकमे सँ छलाह । तकर बाद तँ हमर कैकटा मित्र ,परिचित आ संबंधी ओहि कालोनीमे घर बनओलथि। हमर ससुर(स्वर्गीय गणेश झा-पण्डौल डीह) सेहो ओतहि जमीन कीनि कए घर बनओलथि । तेँ ओहिठाम हमर अबरजात बहुत दिनधरि बनल रहल आ ताहि क्रममे अपन पुरानसंगीसभसँ भेंट-घाँट सेहो होइत रहल । श्रीनारायणजी सेहो ओतहि घर बनओलथि। श्रीनारायणजी (ग्राम -नगवास) ओही दिन आठमामे एकतारा उच्च विद्यालयमे नाम लिखओने रहथि जहिआ हम लिखओने रही । हमर बाबूजी आ हुनकर पित्ती हमरा लोकनिक संगे रहथि । ओ दृष्य अखनो हमरा मोन अछि । केना इसकूलक ओसारापर हमसभ बेंच लग ठाढ़ रही आ बूचनबाबू कागजी कार्रवाइ करैत छलाह । ई बात सन् १९६३ई.क थिक । तहिआसँ आइधरि ४७ वर्ष बित गेल मुदा हमरा लोकनिक संपर्क ओहिना टटका बनल अछि जेना इसकूलक समयमे छल । नेनाक दोस्ती बहुत गहींर होइत अछि जकर प्रभाव मोनपर अमिट भए जाइत अछि । ओ इसकूलिआ संगी आ हुनका लोकनिक संगे बिताओल गेल आनंदमय समय नहि बिसरल जा सकैत अछि ।

मधुबनी डेरापर हम एकबेर हुनकासँ भेंट करए गेल रही । हमर ससुरक घर सेहो ओही कालोनीमे रहनि । ओतहिसँ प्रातःकाल दस बजेक करीब हम हुनका ओतए पहुँचल रही । ओहि समय ओ ओतए नेनासभक हेतु आवासीय विद्यालय चला रहल छलाह । ओकर अलाबा मधुबनीमे दू-तीनटा आओर इसकूलसभ ओ चलबैत छलाह। बादमे ओ अपन पैतृक ग्रममे सेहो इसकूल स्थापित केलाह । डेरापर पहुँचलापर ओ हमर जोरदार स्वागत केलाह । नाना-प्रकारक मेवा,फल,मधुर राखल छल,खाइत रहू जे खाएब,जतेक खाएब । मुदा ओ अपने किछु नहि खाथि । हम पुछबो केलिअनि तँ कहए लगलाह जे ओ यात्राक क्रममे ततेक मिठ्ठ खा लेने रहथि जे हुनकर सुगर तीनसए सँ बेसी भए गेल छनि । तेँ डाक्टरक परामर्शपर सभकिछु बंद भए गेल छनि ।

हुनकर ज्येष्ठ पुत्र किछुसाल पूर्व घर छोड़ि भागि गेलखिन आ कतेको प्रयासक बादो हुनकर किछु अता-पता नहि लागि सकल । हुनकर श्रीमतीजी एहि घटनासँ बहुत आहत भेलीह । ओ निरंतर एहिबातसँ दुखी रहैत छलीह । मुदा ओ स्वयं एहिबातकेँ पचा गेल रहथि आ व्यवहारमे  कखनो प्रकट नहि होबए देथि । कारण जे रहल होअए मुदा हुनकर पारिवारिक जीवन सहज नहि छलनि । मुदा हुनका एहिबातसभक चिंता नहि देखिअनि । असलमे नेनेसँ हुनका जीवनमे अंतर्विरोधक साक्षात्कार होइत रहलनि । हुनकर माएक देहावसान बहुत कमे बएसमे भए गेलनि । पिता दोसर बिआह कए लेलखिन । तकरबाद की भैलक की नहिओ बहुत दिन धरि अपन पितासँ फराक नाना(स्वर्गीय यदु नंदन मौआर)क संगे एकतारामे रहलथि । जखन हुनका नाना एकतारा लए अनलखिन तँ हुनकर पिता संगे नानाकेँ कोट-कचहरीक चक्कर पड़ि गेलनि। अंततोगत्वा,नानाकेँ पक्षमे कोर्टक फैसला भेल । नाना हुनकर पालन-पोषण केलखिन । हुनकर नाना बहुत संपन्न लोक छलाह । हमरा कैकबेर हुनका ओहिठाम जेबाक अवसर भेटल छल । हुनकर दनानपर गगनचुंबी पुआरक टालसभ देखितहुँ तँ देखितहि रहि जइतहुँ। सुनबामे आएल जे ओ फेकनजीकेँ किछु जमीन-जायदाद सेहो देने रहथिन जे बादमे नानाक मृत्युक बाद मामासभ हथिआ लेलखिन जखन कि ओसभगोटे बहुत संपन्न छलाह । नानाक मृत्युक बाद हुनकर पिता (स्वर्गीय राम नंदन रायआग्रहपूर्वक हुनका अपना संगे राखि लेलखिन आ एकबेर फेर ओ अपन पैतृक गाम मधेपुरा (पण्डौल टीसन लगपहुँचि गेलाह। बादमे हुनकर पितासँ हमरो भेंट भेल आ दुनू पिता-पुत्रक अनुराग देखि हम बहुत प्रभावित भेल रही ।

 हमरा हुनकासँ भेंट एकतारा उच्च विद्यालयमे भेल जतए ओहो हमरे किलासमे पढ़ैत छलाह । हुनका इसकूलमे हमसभ हुनका फेकनजी कहिअनि । हुनकर असली नाम छलनि चन्द्र भूषण राय ।  हुनकर फेकन नाम कोना पड़लनि सेहो रहस्ये थिक । आठमासँ एगारहमा धरि हमसभ एकहि किलासमे पढ़लहुँ । हमरासभक गणितक शिक्षक डुमरा गामक जटाधर बाबू छलाह। ओ हुनके ओहिठाम रहैत छलाह । ई सुनि कए आश्चर्य लागि सकैथ अछि जे हुनकर व्यक्तिगत ट्युटर होइतहुँ ओ नंबर देबा काल हुनका कोनो पक्षपात नहि करथि । कैकबेर तँ हुनकर विषयमे ओ बहुत खराब करैत छलाह । तथापि केओ शिक्षकपर आङुर नहि उठओलक । आइ-काल्हिक समय रहैत तँ संभवतः सभसँ एहिने ओ शिक्षक हटा देल जइतथि । एकतारा उच्च विद्यालयक सचिव हुनके मामा छलाह । तथापि शिक्षक अपन निष्पक्षता बनओने रहथि से काबिले तारीफ  छल ।

ई बात सन् १९६९ ई०क थिक । हम सी.एम.कालेज दरभंगामे पढ़ैत रही । ओहि समयमे कैकटा बाबासभ ऊपर भेल रहथि । ताहि समयमे ओशोक सेहो हवा बहि गेल छल । किछु बात हुनकामे जरूर छल जे तत्कालीन युवावर्ग बहुत जोर-सोरसँ हुनकासँ प्रभावित भेल । बहुत रास लोकसभ हुनकर चेला सेहो बनलथि । गेरुआ वस्त्र पहिरने,गर्दनिमे एकटा लाकेट लटकओने आ घर-गृहस्थीक सभकाज करितहुँ सन्यास लेने । बाह रे विधानरुचिगर विषयसभकेँ तेनाक घोंटि देल रहैक जे जकरा जे नीक लागए से तहिना करथु,कोनो धर्म -अधर्मक बात नहि होएत। जे-से । ओहि समयमे फेकनजी सेहो ५ अगस्त १९७३ क दिन ओशोक शिष्य भए गेलाह । अपने तँ भेबे केलाह,संगहि अपन समस्त परिवार,इष्ट-मित्रकेँ सेहो हुनकर शिष्य बनबाक हेतु प्रेरित केलाह ।हम नहि कहि सकैत छी किएक,मुदा हमरा एहन कहिओ नहि बुझाएल जे हम ओशोक चेला भए जाइ यद्यपि हमर कैकटा मित्र एहिमार्गक अनुयायी छलाह। असलमे हमर स्वभावमे चेला बनब नहि अछि । अखनो धरि हम माता छोड़ि ककरो चेला नहि भए सकल छी । कौलिक मंत्र हम स्वर्गीया मातासँ लेने रही । बस ततबे । मुदा तकर माने ई नहि जे ओशोक विद्वतासँ हम प्रभावित नहि रही । ओहि समयमे हुनकर कैकटा किताब कीनि कए पढ़ने रही । रेडिओ,टेलेवीजनपर हुनकर भाषणसभ सुनैत रही ।

मधुबनीक छोट-छीन,दुर्वलकाय सड़कसभ पर पैरे वा रिक्सासँ गेरुआ वस्त्र पहिरने हुनकर एकटा तेहन पहिचान भए गेल छल जे ककरो कहिऔक सोझे हुनका लग पहुँचा देत । ओहि समयमे जे ओ ओशो भक्त भेलाह से बनले रहि गेलाह । ओहि काजमे रमि गेलाह । सौंसे देशमे सालभरि हुनकर कार्यक्रम होइत रहैत छल । सालभरि पहिनहि हुनकर यात्रासभक कार्यक्रम बनैत छल । तकरा तमाम ओशो भक्त लोकनिक संस्थासभमे प्रचारित कएल जाइत छल । ततबे नहि,एक समयमे तँ पूना स्थित ओशो आश्रममे ओ प्रतिस्पर्धाक कारण भए गेल छलाह । 

सन् १९७७ई.मे नौकरीक क्रममे हम दिल्ली चलि अएलहुँ । गाम-घरसँ बहुत फटकी चलि गेल रही । तथापि हुनकासँ संपर्क बनल रहल । ओ गाहे-बगाहे दिल्ली अबैत रहैत छलाह । कैकबेर ओ हमर डेरापर चलि अबैत छलाह आ देशभरिमे  अपन आध्यात्मिक भ्रमणक चर्चा करैत छलाह। एतेक व्यस्तताक बाबजूद ओ साहित्यिक काजमे सेहो लागल रहैत छलाह । अपन लिखल कैकटा कविता,नाटक  आ लेखसभ ओ हमरा देखबैत रहैत छलाह ।हुनका संगे कैकटा हुनकर सहयोगी आ मित्र लोकनि रहैत छलाह । कैकबेर तँ ओ हुनकालोकनिकेँ पाछुए छोड़ि हमरा लग आबि जाइत छलाह । हुनका एहि तरहें असगर अएबाक तात्पर्य निश्चिंत भए हमरासँ भरिपोख गप्प-सप्प करब रहैत छलनि ,ओहिना जेना नेनामे रहल होएतनि। किछु कालक हेतु हमसभ वाल्यावस्थामे पहुँचि जाइत छलहुँ । बेसक हम नौकरी करए दिल्ली  आबि गेलहुँ आ ओ मधुबनीमे रहि गेलाह मुदा हमरा लोकनिक भेंट-घाँट निरंतर होइत रहल । एकबेर दिल्लीक श्रीराम सेंटरमे हुनकर लिखल नाटक- ‘’वुद्धम् शरणं गच्छामि’’क मंचन भए रहल छल । ओकर कलाकारसभ मूलतः हुनकर शिष्य वा सहकर्मी लोकनि छलाह । हमरा ओ रामकृष्णपुरम स्थित सरकारी डेरापर स्वयं आबि कए ओहि नाटककेँ देखाबक हेतु आग्रह कए गेल रहथि । हम ओ नाटक देखए गेबो केलहुँ । सभागार खचाखच भरल छल । ओ सभागार मे प्रथम पाँतिमे बैसल छलाह । मुदा हमर चिंता हुनका रहनि । हमरा देखितहि ओ तुरंत उठि कए अत्यंत भावुकताक संग भेंट केलाह । उठि कए ठाढ़ भए गेलाह आ हमरा नीकसँ बैसेबाक जोगारमे लागि गेलाह । से देखि लग-पासमे बैसल लोकसभ छगुन्तामे रहथि जे आखिर ई के छथि जिनकासँ स्वामीजी एतेक आदर आ भावुकतासँ भेंट कए रहल छथि । फेर हुनकर अनुज सत्यार्थजी हमरा अपनासंगे बैसबाक प्रवंध केलाह । हुनका संगे बैजू महराज दीप प्रज्ज्वलित कए नाटकक उद्घाटन केलाह । वुद्धक जीवनीपर आधारित ओ नाटक निश्चय बहुत मार्मिक छल । नाटक समाप्त भेलाक बाद ओ हमर हाल-चाल लैत रहलाह जाहिसँ हमरा घर वापस जेबामे कोनो परेसानी नहि होअए।

हम सन् १९८८ ई०मे मधुबनीमे मकान बनबैत रही । मकानक काज शुरु करबासँ पूर्व फेकनजी हमरा संगे ओहि स्थानपर गेलाह आ मकानक नक्सासँ हटि कए ओ किछु परामर्श देलथि जकर समावेश करैत मकानक निर्माण कएल गेल । मकानक निर्माणक क्रममे ओ कैकबेर निर्माणस्थलपर जा कए मार्गदर्शन करैत रहलाह । ओहिक्रममे श्रीनारायणजी सेहो कैकबेर ओतए जाइत-अबैत रहलाह । मकानक काजमे शुरुसँ अंतधरि श्रीनारायणजीक ततेक योगदान रहल जकर वर्णन करब बहुत मोसकिल । कतेको साल धरि ओ कोनो-ने-कोनो रूपमे मकानक काजसँ जुड़ल रहलाह। हुनका लोकनिक एहि अमूल्य योगदानकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि ।

अपन मंडलीमे ओ स्वामी आनंद वैराग्यजीक नामसँ जानल जाइत छलाह । ओशोक शिक्षाक प्रचार-प्रसारमे ओ सालों लागल रहलाह । कालक्रममे ओ हरिद्वारमे एकटा पैघ संस्थान बनबएमे लागल रहथि जकर उद्देश्य आध्यात्मिक एवम् सांस्कृतिक क्षेत्रमे समाजक विकास करब छल । मुदा ओ काज पूर्णता दिस बढ़ैत ताहिसँ पहिनहि ओ अस्वस्थ भए गेलाह । एकाएक पता लागल जे हुनका आंतमे कैंसर भए गेल छनि । इलाजक क्रममे ओ लेडी हार्डींग मेडिकल कालेज सेहो आएल रहथि । हुनका संगे हुनकर अनुज स्वामीसिद्धार्थजी रहथिन ।ओहि समयमे हम ओतए उप-निदेशक(प्रशासन)क काज देखैत रही। डाक्टरसभ हुनका देखबो केलकनि मुदा केओ उत्साहवर्धक समाधान नहि बता सकल रहथि । बादमे ओ काशी चलि गेलाह आ ओहीठाम करीब छओ मास धरि देसी इलाजसभ केलथि । आकस्मिक एहन अस्वस्थ भए गेलासँ ओ बहुत दुखी रहथि। कहथि -

हमरा तँ अखन पचपने वर्ष भेल अछि । अखन बहुत काज करबाक छल । ”

मुदा कालक आगा ककर चलैत अछि । सन् २००५ई०मे एकदिन हुनकर अनुज शिद्धार्थजीक फोन आएल-स्वामीजी नहि रहलाह ।बहुत दुख भेल। एकटा बहुत प्रिय बचपनक दोस्त आ शुभचिंतक असमयमे हमरासभकेँ छोड़ि कए सदा-सर्वदाक लेल एहि दुनियासँ चलि गेलाह । बेसक आब ओ नहि छथि ,मुदा कतेको बेर जखन हम अपन वाल्याबस्था दिस घुमैत छी तँ अखनहुँ हुनकर तेजस्वी छवि सद्दः प्रस्तुत भए जाइत अछि,जेना ओ पुछि रहल होथि –

रबीन्द्रजीकोना छी?”

रबीन्द्र नारायण मिश्र

२७.४.२०२०

mishrarn@gmail.com



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