गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

दिल्‍ली आगमन   






दिल्‍ली आगमन   

दिल्‍ली एकटा ऐतिहासिक महानगर अछि। सौंसे देशसँ लोक जीवन-यापन हेतु एतए अबैत अछि। वर्तमान समयमे ई देशक राजनीतिक केन्‍द्र बिन्‍दु अछि। ऐठाम प्राचीन एवं आधुनिक सभ्‍यताक समागम अछि। पुरना दिल्‍लीमे अखनो मुगल समयक छाप भेट जाइत अछि। कुतुव मिनार, लाल किला हुमायुक मकबरा दिल्‍लीक अतीतक स्‍मरण करबैत अछि। ओत्तै मेट्रो रेल, नेहरू स्‍टेडियम, लोटस टेम्‍पल, बड़का बड़का मौल, फ्लाइ ओभर इत्‍यादि दिल्‍लीक आधुनिक कालक विकास यात्राक प्रमाण अछि।

पाण्‍डवक समयमे दिल्‍लीकेँ इन्‍द्रप्रस्‍थ कहल जाइत छल। ११९२ ई.मे दिल्‍लीपर मोहम्‍मद गोरीक कब्‍जा भऽ गेलइ। १२०६ ई.मे दिल्‍ली साल्‍तनक स्‍थापना भेल। १३९८ ई.मे तैमुरद्वारा दिल्‍लीपर आक्रमणक संग सल्‍तनक अन्‍त भऽ गेल। अन्‍तिम सल्‍तनक लोदी वावरसँ हारि गेला। १५२६ ई.मे पानीपतक लड़ाइक बाद मुगल साम्राज्‍यक स्‍थापना भेल। १८०३ ई.मे दिल्‍ली अंग्रेजक अधीन भऽ गेल। १९११ ई.मे भारतक राजधानी कलकत्तासँ दिल्‍ली आबि गेल।  

एहेन ऐतिहासिक रूपे समृद्ध शहर जेबाक, ओइठाम रहबाक एवं विकास करबाक इच्‍छा मनमे रहबे करए, अत: तीव्र अभिलाषाक संग हम दिल्‍ली विदा भेल रही। दिल्‍लीक विषयमे लोक सबहक तरह-तरह केर धारणा रहइ। बहुत दूर तँ छइहे। खर्चो-बर्च बढ़ि जेबाक अन्‍दाज सही छल। परिवारमे बहुत दिन धरि हम दिल्‍ली जाइ वा नहि जाइ, ऐ विषयपर चर्च होइत रहल। हमर पिताजीकेँ दिल्‍लीमे जा कऽ नौकरी करब एकदम पसिन नइ रहैन। दड़िभंगामे टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टर बनल रही से हुनका बेहतर बुझाइत रहैन। गामक लग रहब, भेँट-घाँट होइत रहत। पाइयो बाँचत इत्‍यादि...।

ओना, किछु हद तक हुनक सोच ठीके रहैन मुदा हम दिल्‍ली जाए चाही, कारण ओइठाम बेहतर भविसक सम्‍भावना बुझाइत रहए। प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा सबहक तैयारीक बेहतर अवसर भेट सकै छल। किछु दुरदर्शी लोकक मन्‍तव्‍य छेलैन जे दिल्‍ली अबस्‍स जेबाक चाही। ओइठाम वेहतर भविस हएत। धिया-पुताकेँ वेहतर शिक्षाक अवसर भेटत। अपनो आगू बढ़ि सकब। मुदा कहब छै जे दिल्‍लीक लड्डू जे खेलक सेहो पछताएल आ जे नइ खेलक सेहो पछताएत। किछु हद धरि से सही।  

दड़िभंगासँ बरौनी होइत हम दिल्‍ली आएल रही। ऐसँ सन् १९७२ ई.मे पहिल बेर स्पेशल क्लास रेलवे अपरेन्टीसक संघ लोक सेवा आयोगक साक्षात्‍कारक क्रममे हम दिल्‍ली आएल रही। ओइ समयमे जे.एन.यू. दिल्‍ली स्‍कूल ऑफ इन्‍टरनेशनल स्‍टडीज रहइ। सप्रु हाउसमे हमर गौंआँक मित्र विद्यार्थी छला। हुनके संगे चारि दिन ओइ छात्रावासमे रहि कऽ शाहजहाँ रोड स्‍थितसंघ लोक सेवा आयोग जाइ छेलौं। सप्रु हाउसमे बहुत रास विदेशी विद्यार्थी सभ सेहो छला। हमरा ओइ वातावरणमे असोकर्ज होइत छल, अन्‍यथा ओइठाम बहुत सुविधा रहइ आ हमरा बहुत नीकसँ रखने रहैथ। दोबारा हुनकासँ भेँट नहि भेल। बादमे पता लागल जे ओ ऐ्एन्यू्मे प्रोफेसर भऽ गेल रहैथ।

२ अगस्‍त १९७७ ई.मे हम दिल्‍ली पहुँचल रही। हमर गामक कोरियानी टोलक एक गोरे दिल्‍लीमे रहै छला। रातिमे हुनके ओइठाम रहल रही। सम्‍भवत: ओ मंगोलपुरीमे रहै छला। एक्के पाँतिमे छोट-छोट केतेको घर सभ छल। बहुत रास लोक सभ। चारि बजे भोरे कियो चिकैर-चिकैर कऽ सभकेँ उठा रहल छेलइ। प्राय: ड्यूटीपर जेबाक हेतु। ३ अगस्‍त १९७७ ई.के हम पहिल बेर दिल्‍ली स्‍थित नार्थ ब्‍लॉकमे नौकरी ग्रहण केलौं। ओइ दिन बर्खा होइत रहै आ नार्थ ब्‍लॉक अबैत-अबैत हम अधभिज्‍जू भऽ गेल रही।

नार्थ ब्‍लॉकक वर्णन की कएल जाए। ब्रिटिश साम्राज्‍य द्वारा भारतपर शासन करबाक शक्ति केन्‍द्र छल नार्थ ओ साउथ ब्‍लॉक। हायसीना पर्वतपर बनल- एक तरफ विशालकाय राष्‍ट्रपति भवन आ दुनू समानान्‍तर ठाढ़ नार्थ ओ साउथ ब्‍लॉक।

सन्‍ १९११ ई.मे भारतक राजधानी दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरणक पछाइत दिल्‍लीक नवनिर्माणक जिम्‍मा लाइटनकेँ देल गेलैन। ओ राष्‍ट्रपति भवन (ओइ समयक भाइसराय हाउस) क निर्माण केलाह। हर्वर्टवेकर दच्‍छिन अफ्रिकासँ आबि कऽ हुनकर सहयोगीक रूपमे काज करए लगला।

नार्थ एवं साउथ ब्‍लॉकक निर्माणक जिम्मा वेकरकेँ देल गेल। कालान्‍तरमे दुनू गोटेमे मतभेद भऽ गेल। फाइटन चाहै छला जे नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉक वाइसराय हाउसक हिसाबसँ कम ऊँच बनै जइसँ राजपथसँ ओकरा अनचोके देखल जा सकइ। मुदा वेकरकेँ ई बात पसिन नहि छेल आ अन्‍ततोगत्‍वा वेकरेक चलल। नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉकक ऊँचाई भाइसराय हाउसक बरबैर राखल गेल।

भारतक राजधानी दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरणक बाद उत्तरी दिल्‍लीमे बनल अस्‍थायी सचिवालयसँ भारतक शासन चलल। ब्रिटिश भारतक विभिन्न भागमे कार्यरत कर्मचारी सभकेँ दिल्‍ली आनल गेल ओ गोल मार्केटमे हुनका लोकनिक आवासक निर्माण भेल।

पुरना सचिवालयमे बादमे दिल्‍ली सरकारक कार्यालय रहल। १९३१ ई.मे भारतक शासन नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉकसँ होमए लगल। ओही आसपास सन्‍ १९२१ ई.मे संसद भवनक निर्माण प्रारंभ भेल।

नार्थ ब्‍लॉक ओ साउथ ब्‍लॉकक निर्माण एक्के रंग अछि। भूतलक अलावा दू सतह आरो अछि। प्रथम तलपर सामान्‍यत: वरिष्‍ठ अधिकारी एवं मंत्रीगणक कार्यालय अछि। जखन सुरक्षा बेवस्‍थामे एतेक सख्‍ती नहि छल, तखन सामन्‍य आदमी नार्थ ब्‍लॉकक मुख्‍य द्वारासँ होइत आरपार निकैल जाइत छल। मुख्‍य द्वारसँ घुसिते अन्‍दर गोलाकार खाली स्‍थान अछि जइमे तापक्रम अपेक्षाकृत कम रहैत अछि आ गरमीमे लोक सभ ओइमे बैस कऽ सुस्‍ताइत अछि। आबक सुरक्षा परिवेशमे नार्थ ब्‍लॉक वा साउथ ब्‍लॉकमे प्रवेश बहुत कठिन काज थिक। 

यदि अहाँकेँ नार्थ ब्‍लॉकक भूगोलक सही जानकारी नहि अछि, तँ अपनेकेँ वौआ जाएब आसान बात अछि। विभिन्न स्‍थानसँ सरकारी काजसँ नार्थ ब्‍लॉक एनिहार अधिकारी लोकनिसँ केतेको बेर सम्‍बन्‍धित स्‍थान वा कक्षक जानकारी लैत देखिऐन। नार्थ ब्‍लॉक ठीक सामने बामा कातमे इण्‍डिया गेट अछि। नार्थ ब्‍लॉकसँ उतैर कऽ कनिक्के आगू बढ़ू तँ विजय चौक अछि, जेतए गणतंत्र दिवस समारोहक बाद वीटींग रीट्रीटक आयोजन कएल जाइत अछि।

नार्थ ब्‍लॉकमे पहिल बेर गेलाक बाद श्री विनय सेखडीजीसँ भेँट भेल जे हमरा आवश्‍यक कागत सभपर दस्‍तखत करा कऽ नव नौकरीमे पदभार ग्रहण करौलैथ। नार्थ ब्‍लॉकक पैघ-पैघ कक्षक अन्‍तहीन श्रृंखला देख हम गुम रही। केतौ कियो चिन्‍हारे नहि छल। किछु बुझल नहि छल। सत् पुछल जाए तँ हमरा ठक-विदरो (चक-विदोर) लागि गेल रहए। कार्यभार ग्रहण कऽ हमर बैसक  इण्‍डिया गेटक एकदम सामने पड़ै छल। कोठरीमे बैसले-बैसल इण्‍डिया गेट देखल जा सकै छल।

कखनो काल अवर सचिव महोदय ओइ कोठरीमे आबैथ आ कहैथ जे अहाँ केतेक भाग्‍यवान छी जे बैसले-बैसल इण्‍डिया गेटक दर्शन करैत रहै छी। ओइ समयमे अवर सचिवक बड़ धाक रहइ। हम तँ एतेक डराएल ओ अपसियाँत रहै छेलौं जे किछु काज करब कठिन छल। भारत सरकार लिखल देख कऽ होइत छल जे आब की हएत। भारत सरकारक मंत्रालयमे भारत सरकार नहि लिखल जेतै तँ आर की लिखल जेतइ? क्रमश: ई स्‍थिति सामान्‍य भेल।

गृह मंत्रालय, नार्थ ब्‍लॉकमे पदभार ग्रहण करबाक दौरान जे भेट भेल से क्रमश: दोस्‍तीमे बदैल गेल।  गोरनार, मेहनती एवं इमानदार अधिकारी छला श्री सेखडीजी। जलंधर शहरक निवासी छला आ योजना रहनि जे सेवा निवृत्तिक बाद ओहीठाम शेष समय बिताएब। हुनकर धिया-पुता सभ अति शिक्षित छेलखिन। मुदा संयोग देखू, निदेशक पदसँ सेवा निवृत्ति भेलाक चारि-पाँच मासक अन्‍दरे हुनकर स्‍वर्गवास भऽ गेल। एक दिन भोरे टहैल कऽ आएल रहैथ आ घर पहुँचते छातीमे दर्द भेलैन आ जाबे किछु लोक बुझितै ओ मरि गेला। सभ योजना धाएले रहि गेल। एहेन क्षणभंगुर जीवनक हेतु लोक कतेक योजना बनबैत रहैत अछि..! युधिष्‍ठिरक यक्ष प्रश्‍नक उत्तर जे निरन्‍तर मरैत देखितो लोक अपनाकेँ ओइ नियमसँ फराक बुझैत अछि! केतेक सटीक  अछि!

शेखरीजीक स्‍मरण सदैत होइत रहैत अछि ।हुनक असामयिक निधनसँ हमर एकटा मित्रे नहि अपितु एकटा नीक सलाहकार सदा सर्वदाक लेल अनन्‍तमे बिला गेल छल।

३ अगस्‍त १९७७ ई.के नार्थ ब्‍लॉकमे कार्यभार ग्रहण कऽ हम साँझमे अपन गौंआँक ओइठाम गेलौं। ओ मोतीनगरमे रहै छला। परिवारो संगे रहैन। एक्केटा कोठरी किरायापर लेने छला। अपना भरि पूरा सत्‍कार केलाह। रातिमे भोजनक बाद हम बाहर खाटपर सुति रहलौं। एकाध दिन अहिना बीतल। तेकर बाद वएह अपन मकान मालिकक एकटा फ्लैट मोती नगरमे किरायापर दिया देलैन।

दिल्‍लीमे आवासक बेवस्‍था भऽ गेला बाद आश्वस्‍त भेलौं। मोती नगरसँ नार्थ ब्‍लॉक ८० नम्‍बरक बस चलैत छल। ओइ समयमे बस नार्थ ब्‍लॉकमे एकदम नजदीक तक अबैत छल। उतरू आ दस डेग चलिते नार्थ ब्‍लॉकक अन्‍दर आबि जाउ।

ओइ समय दिल्‍लीक सुरक्षात्‍मक वातावरण आइ-काल्‍हि जकाँ नइ छल। मोती नगरमे राति-राति भरि लोक सभ अपन फ्लैटक आगाँ खाट लगा कऽ सुति रहै छल। मुदा हम कार्यालय, बाहर ओ घर सभठाम नव वातावरण, नव लोक एवम्‍ अलग जीवन शैलीक कारण अपसियाँत रही। कखनो-कखनो अफसोच होइत छल जे दड़िभंगाक नौकरी छोड़ि कऽ दिल्‍ली किएक एलौं?

मोतीनगरमे डेराक अगल-बगलक लोकसँ कोनो परिचय नहि छल। रातिके छतपर सुति रही। खाटपर सतरंजीक तरमे लोहाक डंडा नुका कऽ रखने रही जे जँ कोनो संकट औत तँ देखल जेतइ। एक राति एकटा पड़ोसीसरदारजीभेँट करए आएल। खाटपर बैसल की ओ लोहाक रौड निच्‍चाँ खसि पड़लै। ओकरा संशय बढ़ि गेलइ, जे की बात छिऐ? दोसर दिन भेनेओ हमर मकान मालिक ओतए पहुँचल। मकान मालिक ओकरा आश्वस्‍त केलकै तखन ओ चैन भेल।

कार्यालयमे अपन लेाक ताकबाक प्रयास करए लगलौं तँ वित्त मंत्रालयमे एकटा झाजी भेटला। बुढ़ लोक। मैथिलीमे बजबाक प्रयास कएल, मुदा ओ मैथिली नइ बुझथिन। कहला जे २-३ पुस्‍त पहिनहि हुनका लोकनिक पुर्वज गाम-घर छोड़ि जयपुरेमे बसि गेल रहैथ। हुनका मैथिली बुझए तँ अबैत छेलैन मुदा बाजि नहि सकैथ। हुनकर डेरा आर.के.पुरममे छल। ओत्तौ गेलौं। हुनकर परिवारमे सभ कियो मैथिली सीखए चाहैत छला, मुदा तेकर उचित सुविधा नहि भऽ रहल छेलैन।  किछु दिन बाद कोइलखक श्री आर.आर. झाजी नार्थ ब्‍लॉक, वित्त मंत्रालयमे भेटला। हुनकासँ गप करिते मोन बहुत आश्वस्‍त भेल। दड़िभंगा लगक हमरे नामधारी मिसरजी भेटला। हुनका सभसँ जे सम्‍पर्क भेल से अद्यावधि बनल अछि।

यद्यपि दिल्‍लीक धक्कम-धुक्काबला जिनगीसँ अपसियाँत रही, मुदा तत्‍काल कोनो विकल्‍पो नहि छल। जेतइ देखू, लोक पाँति बना कऽ ठाढ़ अछि। दूधक पाँति तँ चारि बजे भोरेसँ लागब शुरू भऽ जाइक। डी.एम.एस. दूध कनीक सस्‍त होइत छल। मुदा तइ हेतु टोकन लेमए पड़ैत छल जे आसान नहि छल। जेतइ जाउ तेतइ पाँति लागल लोक सभ भेटत। कार्यालयमे भरि दिन काज करू आ तेकर बाद शुरू भऽ जाउ पाँतिमे। बसमे चढ़बासँ पहिने पाँति लगाउ। जँ छुट्टी हेबासँ पाँच मिनट पहिने आबि गेलौं तँ आसानीसँ बसमे सीट भेट जाएत, नहि तँ ठाढ़े धक्का-मुक्की करैत घर पहुँचब। हमर अधिकारी एकटा मद्रासी छला। अपने बजैथ आ अपने बुझैथ।

दिल्लीक धक्कामुक्कीसँ हम तंग भय गेल रही।ओइ समयमे कर्मचारी चयन आयोगमे इलाहाबाद हेतु किछु लोकक पदस्‍थापना हेबाक रहइ। हम दर्खास्‍त देलिऐ आ हमर स्‍थानान्‍तरण ओइठाम भऽ गेल। सन्‍ १९७८ ई.क ९ जनवरीकेँ हम इलाहाबाद कर्मचारी चयन आयोग पहुँचलौं।

पाँच महिना धरि दिल्‍लीमे रहलाक बाद हम इलाहाबाद चलि गेल रही। ऐ अल्‍प अवधिमे दिल्‍लीक जानकारी प्राप्‍त करब आसान नहि। ओइठाम दिल्‍लीमे प्रदूषण चरमसीमापर छल। अकास धुआँसँ भरल रहै छल। रातियोमे तारा नहि देखल जा सकै छल। दिन भरि काज भेलाक बाद डेरा लौटैत-लौटैत कपड़ा सभ बेहद मैल भऽ जाइत छल। यद्यपि आब दिल्‍लीक जनसंख्‍या तहियाक तुलनामे बहुत बढ़ि गेल अछि, अपेक्षाकृत वायुमण्‍डल कम प्रदूषित अछि। अकास साफ देखाइत अछि एवं यातायातक बेवस्‍था (खास कऽ मेट्रोक कारण) बहुत बेहतर भऽ चूकल अछि। ओइ समयमे दिल्‍लीमे सरकारी आवासक बहुत पैघ प्रतीक्षा सूची छल।

२०-२५ साल नौकरी केलाक बाद जा कऽ सरकारी आवास भेटैत छल। बहुत रास बात सभ रहल हएत जे हम स्‍वेच्‍छासँ दिल्‍लीसँ स्‍थानान्‍तिरित भऽ इलाहाबाद चलि गेलौं। मुदा दिल्‍ली तँ दिल्‍ली थिक। सन १९८७ मे आपस स्‍थानान्‍तरण दिल्‍ली भऽ गेल आ फेरसँ अपनाकेँ एतए बेवस्‍थित करए पड़ल। प्राय: इलाहाबाद गेनाइ कोनो बहुत लाभकारी नहि रहल।

सन्‍ १९७७ क चुनाव हारि गेलाक बाद स्‍व. श्रीमती इन्‍दिरा गॉंधी अपन आवासपर सुलभ भऽ गेल रहथि आ बहुत रास लोक हुनकासँ भेँट करए हुनकर आवासपर जाइत छल। हमहूँ सभ अपन परिवारक संग इन्‍दिराजीक आवासपर गेल रही। ओतए कियो आम जनता बेरोक-टोक चल जाइत छल। हमहूँ सभ पहुँच गेल रही। मुदा संजोगवश ओ डेरापर नइ रहैथ। बाहरेसँ हुनकर आवास देख आपस भऽ गेलौं। तीन मूर्ति भवन, तेकर बगलमे बनल अन्‍तरिक्ष शाला, राजघाट, सफदरजंगक मकबरा, लोदी गार्डेन, नेहरू पार्क, कुतुबमीनार, लोटस टेम्‍पल, योगमाया मन्‍दिर इत्‍यादि सभ जगह घुमलौं। ओइ समयमे केतौ आएब-जाएब सुरक्षा दृष्‍ट्रिमे आसान छल। अस्‍तु, यथासाध्‍य हम मुख्‍य-मुख्‍य स्‍थान सभ देखलौं।

जनवरी १९७८ ई.क बात छी, ट्रेनसँ दिल्‍लीसँ इलाहाबाद विदा होइत बहुत आनन्‍दित भेल रही। संगे पत्नी ओ बच्‍चा सेहो। एवम्‍ प्रकारेण हम दड़िभंगासँ दिल्‍ली एलौं, मुदा किछुए मासमे इलाहाबाद चल गेलौं। इलाहाबादमे ९ बर्ख धरि रहला बाद मार्च १९८७ ई.मे दिल्‍ली आपस एलौं। मुदा ऐपर चर्चा फेर कखनो करब।


दड़िभंगा प्रवास   




 




दड़िभंगा प्रवास   





दड़िभंगा आबि जाएब बच्‍चामे बड़ीटा बात होइत छल। रहिका बाटे चुनिन्‍दा बस छल। ओइ बसक समय बान्‍हल छेलइ। जँ ओ छुटि गेल तँ बाट तकैत रहू। टेकरक चलती आइ-काल्‍हि जकाँ तहिया नइ छल। मधुबनी बाटे दड़िभंगा जेबाक रेबाज नहि छल। दड़िभंगा जाइत काल हवाई अड्डा अबैत छेलइ। फटकीए-सँ बड़ीटा कारी, उज्‍जर रेघाबला झण्‍डा फहराइत देखाइत रहै छल। एकाध बेर ओइठाम छोट-छीन हवाई जहाज देखने रहिऐक। हवाई जहाज ओइ समय एतेक मात्रामे नहि चलैत छल। कहियो काल अकासमे हवाई जहाज देखाइत छल। बच्‍चा सबहक धियान अकस्‍माते ओइपर पड़ि जाइत छल।

पहिल बेर ट्रेनपर चढ़ि कऽ दड़िभंगासँ मुहम्मदपुर गेल रही। बाबू संगमे रहैथ। ट्रेनमे पहिल यात्राक स्‍मरण अखनो एकटा होइत रहैत अछि। ट्रेन चलै तँ डोलै रहै, आ हमहूँ सभ डोली। डरो होइत छल। नीको लगैत छल। साधरण किलासमे उड़ीसक भरमार रहैत छल।

दरभंगा द्वारवंगसँ बनल अछि। द्वार आ वंग माने वंगालक प्रवेश द्वारा (गेट वे ऑफ बंगाल) किछु गोरक कहब जे दरभंगा नाम द्वार ओ भंगासँ मिलि कऽ बनल अछि। १३२६ ईस्‍वीमे तुगलक आक्रमणक दौरान किलाघाटक आसपास किलाकेँ तोड़ि देल गेल रहए। १८६५ ईस्‍वी तक दरभंगा सरकार तिरहुतक भाग छल। तेकर बाद ई अलग जिला बनल। १८४५ ईस्‍वीमे दरभंगा सदर, १८४६ ई.मे मधुबनी, आ १८६७ ई.मे समस्‍तीपुर सवडिभीजनक निर्माण भेल। १९०८ ई. धरि दरभंगा पटना डिवीजनक हिस्‍सा छल। तेकर बाद ई तिरहुत डिविजनक हिस्‍सा भऽ गेल। १९७२ ई.मे मधुबनी, दरभंगा आ समस्‍तीपुर सवडिविजनकेँ अलग जिला बनि गेलाक बाद दरभंगा डिविजनक मुख्‍यालय बनि गेल।

दरभंगा महराज द्वारा बनौल गेल नरगौना पैलेश, आनन्‍दवाग भवन, बेला पैलेशक अतिरिक्‍त अनेको मन्‍दिर, तालाव एवं बाग-बगीचा दड़िभंगा शहरकेँ ऐतिहासिक महत प्रदान करैत अछि। श्‍यामा मन्‍दिर आस्‍थाक केन्‍द्र बिन्‍दु भऽ गेल अछि। मिथिला विश्वविद्यालय, अखिल भारतीय संस्‍कृत विद्यालय सहित अनेकानेक शिक्षण संस्‍थान दरभंगाक महत प्रदान करैत अछि।

दड़िभंगाक संगे बहुत रास स्‍मरण जुड़ल अछि। विद्यार्थी जीवनमे १९६८ सँ १९७२ तक दड़िभंगामे रही। प्राइवेट लॉज सभमे डेरा रहए। एक साल तक उमा सिनेमाक पाछाँ मिसर टोलामे उेरा रहए। ओना तँ मकान मालिक बहुत नीक लोक रहैथ आ गाहे-वगाहे मदैत सेहो करैथ, मुदा कोठरीमे बिजली जरैत देख ओ चिन्‍तित भऽ जाइ छला। बहुत राति धरि पढ़बाक कार्यक्रम होइत छल। हुनका चिन्‍ता होनि जे बिजली जरा कऽ सुति गेला। बगलक कोठरीसँ अवाज दैथ हम जोरसँ हूँ कहि कऽ ई बुझा दिऐन जे जगले छी। कएक बेर ऐ तरहक जखन भऽ जाइ तँ कहि दैथ-

सुति जाह, आब बहुत राति भऽ गेल।

असलमे हुनका हमर चिन्‍ता नइ रहैन, बिजली बेसी जरि रहल अछि, तइ चिन्‍तासँ परेशान भऽ जाथि। कारण बिजलीक शुल्‍क, कोठरीक किरायामे शामिल छेलइ।

किछु दिन पूनम सिनेमा हॉल लग एकटा प्राइवेट छात्रावासमे रही। ओइ समयमे पूनम सिनेमा हॉल बनियेँ रहल छल। ओइठामसँ दड़िभंगा टावर नजदीक छल। दयाल भंडारक चुरा, दही आ पेरा स्‍मरण करैत अखनो आनन्‍दित भऽ जाइ छी।


सी.एम. कौलेजक चर्चा होइ आ प्रो. शाहीजीक नाओं नहि आबए, से नहि भऽ सकैत अछि। शाहीजी रसायन शास्‍त्र विभागक अध्‍यक्ष छला। अनुशासनक मामलामे बहुत सख्त रहैथ। स्‍कूल जकाँ सबक देल जाइक। ऐगला किलासमे एक-एकटा विद्यार्थीक काज देखल जाइक, पूछताछ होइक। परिणामत: आर्गेनिक केमेस्‍ट्रीमे हम सभ पारंगत भऽ गेल रही आ परीक्षामे खूब नम्‍बर आएल। ओहि समयमे डॉ. एल. के. मिश्रजी प्रचार्य रहैथ। ओ अनुशासनक हेतु प्रसिद्ध छला।

सी.एम. कौलेजमे पढ़ाइक स्‍तर ओइ समयमे बढ़ियाँ छल। यद्यपि आन कालैज सभमे हड़ताल होइत रहैत छल, परीक्षामे नकल करबाक खबरि सेहो बरबैर अबैत रहै छल, मुदा सी.एम. कौलेज एकर अपवाद छल। तेकर श्रेय काफी हदतक प्राचार्य डॉ. एल. के. मिश्रजीक छेलैन। अनुशासनक मामलामे ओ टससँ मस नहि होइत छला। ओइ समयमे विज्ञान एवं कला संकाय सभ एक्के छल। विद्यार्थी सभ खूब मिहनतसँ पढ़ैत छला आ आगाँ नीक-नीक ठाम उच्‍चतर शिक्षण संस्‍थान सभमे नामांकन भऽ जाइत छेलैन। इलाकाक समान्‍य परिवारसँ अबैबला विद्यार्थी सबहक हेतु ई वरदान छल। हमहूँ जोर-सोरसँ परिश्रम कए इंजीनियरिंगमे प्रवेशक हेतु तैयारी केने रही। हमरा नीक नम्‍बर एबो कएल। ओइ समय नम्‍बरक आधारपर इंजीनियरिंगमे नामांकन भऽ जाइत छल मुदा हम कतिपय कारणसँ बहुत नीक नम्‍बर अनलाक बादो इंजीनियरिंगमे नामांकन नहि लऽ सकलौं। ई बात सन् १९६९ ई.क थिक। तेकर बाद सी.एम. कौलेजक भौतिक शास्‍त्र (प्रतिष्‍ठा) मे आगाँक पढ़ाइ करबाक निर्णय भेल आ ऐगला दू साल धरि ओहीमे लागल रहलौं।

डॉ. सी.के.आर. वर्मा भौतिकी विभागक अध्‍यक्ष रहैथ। विद्यार्थी सभमे हुनका वैज्ञानिकक मान्‍यता प्राप्‍त रहैन। कहल जाइत जे हुनकर रिसर्च विदेशी पत्रिकामे छपैत रहैन। कुल मिला कऽ शिक्षक सभ मेहनती छला। सामान्‍यत: क्‍लास खाली नहि जाइत। मुदा विषय-वस्‍तु ऐ तरहेँ नहि पढ़ाएल जाइ, जइसँ विद्यार्थीकेँ विषयक समझ होइक आ ओ ओइ विषयमे किछु मौलिक समझ उत्‍पन्न कऽ सकितए अपितु परीक्षामे अधिकाधिक नम्‍बर अननाइ मूल लक्ष्‍य छल। एकटा अध्‍यापक तँ पूरा नोट पढ़ैथ आ विद्यार्थी ओकरा लिखि लिअए। केतेको प्राध्‍यापक सभ ट्यूशन करैत छला। बहुत रास विद्यार्थी ट्यूशन पढ़ैथ, ऐ लोभ सँ जे प्रैक्‍टिकलमे खूब नम्‍बर दिया देता। मुदा किछु प्राध्‍यापक एकर अपवादो रहैथ। ईमानदारी ओ मिहनतसँ पढ़ाइ कराबैथ। चेष्‍टा करैथजे विद्यार्थी सभकेँ विषय-वस्‍तुमे पैठ होइक। मुदा ओहन शिक्षक कम रहैथ। डॉ. एल.के. मिश्रजी केँ प्राचार्य पदसँ हटि गेलाक बाद कौलेजमे अराजकताक महौल आबि गेल। पढ़ाइ-लिखाइ चौपट। परीक्षा बेवस्‍था तँ तेना चरमराएल जेकर चर्चो करब लज्ज्‍यास्‍पद। कएक सालक पछाइत नागर्माण आइ.ए.एस. अधिकारीकेँ बिहार विश्वविद्यालयक उप कुलपति बनौल गेल, तेकर बाद हालत सुधरल।

बी.एस-सी. आनर्सक लिखित परीक्षा समाप्‍त भेला बाद गाम आबि गेल रही। गाममे हमरा बड़ नीक छल। अधिकांश पढ़ाइ, लिखाइ हम गामेमे करै छेलौं, आ तइमे कोनो असुविधा नहि होइत छल। बेसी एकान्‍तक प्रयोजन हो तँ नवका पोखैरपर भालसरी गाछ तरक छाहैर लग चल जाइत रही।

प्रैक्‍टिकल परीक्षाक तिथि घोषित नइ भेल छल। गाममे रहि कऽ कहीं परीक्षा छुटि ने जाए से चिन्‍ता हुअ लगल छल। मुदा से नहि भेल। सही समयपर अपन ग्रामीण (जे ओही कौलेजमे विद्यार्थी रहैथ)क माध्‍यमसँ प्रैक्‍टिकल परीक्षाक कार्यक्रमक सूचना भेटल आ सही समयपर हम ओइमे भाग लऽ सकलौं। परीक्षो नीक भेल। समय-साल ओतेक खराप रहितो, बिना कोनो अतिरिक्‍त प्रयाससँ हमरा ठीक-ठाक नम्‍बर आएल।

बी.एस.सी. लिखित परीक्षाक दौरान हमर डेरा दोनार पोखैरक कातमे छल। ओइमे आरो कएकटा विद्यार्थी सभ छला। ओइ समयमे भारत-पाकिस्‍तानक युद्ध चलि रहल छल। १६ दिसम्‍बरकेँ भारतीय फौज बंगला देश जीत चूकल छल आ ओही दिन हमर लिखित परीक्षा समाप्‍त भेल रहए। ई एकटा अद्भुत संजोग छल।

बादमे हम टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टरक नोकरी करबाक क्रममे टेलीफोन एक्‍सचेंज लहेरियासरायमे ट्रेनिंगपर रही आ बलभद्रपुरमे डेरा रहए। अपेक्षाकृत शान्‍त ओ स्‍वच्‍छ मोहल्‍ला छल। सामनेमे पोखैर। कनिक्के दूर हटि कऽ एक्‍सचेंज रहइ। टेलीफोन एक्‍सचेंजमे अधिकाश काज हाथेसँ (मैनुअली) होइत छेलइ। ट्रेनिंगक पछाइत किछु दिन जमशेदपुर, फेर सुपौलमे काज केलाक बाद ३जून १९७५ केँ डीहरी ऑफिस दड़िभंगा आबि गेलौं।

डीइटी ऑफिस कादिराबादमे छल। बस स्‍टैण्‍डसँ डीहरी ऑफिस पएरे आएब-जाएबक क्रममे दड़िभंगा राजक महलमे बनल ललित नारायण विश्वविद्यालसँ जेबाक रस्‍ता रहइ। एतेक सम्‍पन्न महाराजक एहेन दुर्गति भेल से सदिखन सोचाइत रहै छल। ओ चाहितैथ तँ दड़िभंगाक एवं ओइठामक लोकक आइ दोसर भविस रहैत। तथापि महाराज रामेश्‍वर सिंहक चितापर बनल श्‍यामा मन्‍दिर सबहक श्रद्धाक केन्‍द्र बनल अछि आ भक्त लोकनिक निरन्‍तर प्रवाह ओतए देखल जा सकैत अछि।

सन्‍ १९७७ मे जखन केन्‍द्रिय सचिवालय सेवामे संघ लोक सेवा आयोगक माध्‍यमसँ हमरा चयनक बाद गृह मंत्रालयसँ नियुक्ति पत्र भेटल तँ हम दड़िभंगामे टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टरक काज करैत रही। बेलामे हमर डेरा छल। हमर मकान मालिक दड़िभंगा राजमे खजांची छला। सोचल जा सकैत अछि जे अपन समयमे हुनकर केतेक चलती रहल होएत। तखन तँ ओ वृद्ध भऽ गेल रहैथ। आर्थिक हालत झूस भऽ गेल रहैन। मकानक एक भागमे अपने सपरिवार रहैथ आ तीनटा कोठरीमे तीनटा किरायेदार छल जइमे एकटा हमहूँ रही। घरक पाछाँमे बड़ीटा पोखैर छल। ओइमे कहियो-कहियो स्‍नान करए जाइत छेलौं अन्‍यथा अधिकांशसमय बेल पैलेशक अन्‍दरस्‍थित पानिक टोंटी रहइ, ओइमे भोरे-भोर स्‍नान करी। डी.ई.टी. दरभंगा कार्यालयमे लेखाधिकारी श्री एस.पी.चटर्जी महोदयक सरकारी आवास ओहीठाम छल। ओ भोरे-भोर स्‍नान-ध्‍यानक पछाइत नित्‍य पाठ करैत रहै छला।

दड़िभंगाक बेला स्‍थित हमर डेराक कनियेँ हटि कऽ उत्तर दिस डॉ. लखन झाजी रहैत छला। कहियो-कहियो हुनका ओइठाम सेहो जाइत रही। घरमे पुस्‍तक भरल छेलैन। असगरे ओ ओइ घरमे रहैत छला। अपने भोजन बनबैथ, अपने सभ काज करैथ। डॉ. लखन झा बी.ए. पास केला बाद अक्‍सफोर्ड विश्वविद्यालयमे एम.ए.क हेतु आवेदन देलखिन। हुनकर साक्षात्‍कारसँ प्रभावित भऽ एम.ए. पासक डिग्री दऽ देल गेलैन आ सोझे पी.एच-डी.मे प्रवेश भेटि गेलैन।

डॉ. लखनजी कर्पूरी ठाकुरजीक संगी रहथिन। ओ जय प्रकाश नारायणजीक संग समाजवादी आन्‍दोलनसँ जुड़ल छला। कर्पुरी ठाकुरजी जखन बिहारक मुख्‍यमंत्री भेला तँ हुनका (लखनजीकेँ) ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयमे उप कुलपति बनौल गेल। ओ मात्र एक टका दरमाहा लैत छला आ खराउँ (खराम) धोती पहीरि कऽ विश्वविद्यालय जाइत छला। हुनकर कार्यकालमे दड़िभंगा महाराजक बनौल ऊँच-ऊँच देबालकेँ आधासँ अधिक ढाहि देल गेल। पता नहि, ऐसँ समाजक की उपकार भेलइ..! बादमे ओ वेलाक घर खाली करि कऽ अपन गाम रसियारी चलि गेला।

सन्‍ १९७७ मे आपत्तिकालक बाद केन्‍द्रमे जनता दलक सरकार बनल रहइ। ओही समयक बाद हमरा दिल्‍ली जेबाक रहए। दिल्‍लीक नोकरीमे जाइ की नहि, से असमंजसमे रही। ओइ समयमे दिल्‍ली जाएब औझुका जकाँ आमबात नहि छल। कियो-कियो दिल्‍ली जाइत छल। दिल्‍ली चलि जाएब से सोचि बेलाक डेरा छोड़ि देने रही। तेकर बाद किछु दिन अपन गौंआँ एवं मित्र नारायणजीक संगे दड़िभंगा महराजक रामवाग स्‍थित काली मन्‍दिर लग बनल कोठरीमे रहलौं। काली मन्‍दिर ओइ समयमे सुन्न लगैत छल। पचाढ़ीक पुजारी छला मन्‍दिरमे। ओ भोरेसँ भाँग घोरए लगैत छला। मन्‍दिरक आगाँमे पोखैर छल। ओहीमे स्‍नान कऽ भगवतीक आराधनाक सौभाग्‍य भेटैत छल। किछुए दिन ओइ डेरामे रहलाक बाद असमंजस दूर कऽ दिल्‍ली जेबाक निर्णय कएल आ दड़िभंगाक नोकरीसँ इस्‍तिफा दऽ देल। तद्दुपरान्‍त ३१ जुलाइकेँ (१९७७) दिल्‍ली विदा भेलौं।दड़िभंगाक नोकरी छोड़ि कऽ दिल्‍लीमे नोकरी करबाक निर्णय आसान नहि छल। जकरेसँ पुछिऐ, सएह तरह-तरह केर तर्क लऽ कऽ अस्‍थितर भऽ जाइत छल। मुदा किछु गोरेक स्‍पष्‍ट मत रहैन जे भविसक दृष्टिये दिल्‍ली जाएब बेसी नीक रहत। तखन हम दिल्‍ली विदा भेल रही।

ओइ दिन दड़िभंगा टीशनपर ट्रेन पकड़ए गेल रही तँ मेघसँ सम्‍पूर्ण अकास अच्‍छादित छल। टिपिर-टिपिर पानि पड़ैत छल।दड़िभंगा टीशनपर स्‍व रामनन्‍दन मिश्र एवं स्‍व. नूनू बच्‍चा सहित कएक गोरे हमरा विदा केने रहैथ।  स्‍व. रामनन्‍दन मिश्रजी एवं स्‍व. नूनू बच्‍चासँ बड़ीकाल धरि गप होइत रहल। ओ दुनू गोरेक बीच जे आपसी छेलैन ओ गाममे सभ जनैत अछि। रामनन्‍दन मिश्रजी कुशाग्र बुधिक एवं संस्‍कार सम्‍पन्न बेकती छला। हमरासँ हुनका बहुत लगाव रहैन। जमशेदपुरमे हम टेलिफोन इन्‍सपेक्‍टर रही तँ ओ जँ ओइठाम अबैत छला तँ बिना भेँट केने आपस नहि होथि। दिल्‍ली एलाक बादो ई क्रम बनल रहल। हमर जीवन-संघर्षक यात्रामे ओ सकारात्‍मकताक सम्‍वर्धक छला। निरन्‍तर विकास करैत रहला आ अपन सन्‍तान सभकेँ सुन्‍दर संस्‍कार देलखिन। जइसँ हुनकर परिवार गामेमे नहि, इलाकामे प्रतिष्‍ठित अछि।

कनीकालक बाद गाड़ी आबि गेल आ हम बरौनी होइत दिल्‍ली हेतु प्रस्‍थान केलौं।

दड़िभंगा टावरपर परुकाँ गेल रही। ४५-४६ बर्खक बादो ओहिना बुझि पड़ल। दतमैन बिकाइत, चाह बिकाइत, आस-पासमे ओहिना रिक्शा...। गन्‍दगीक तँ ई हालत रहैत जे जँ भोरे-भोर टावारपर पहुँच जाएब तँ ठाढ़ नहि रहि सकब। आस-पासक सभटा कूड़ा-करकट ओत्तै जमा कएल जाइत अछि आ ओतए-सँ दस बजेक आस-पास नगरपालिकाक गाड़ीमे ओकरा उठौल जाइत अछि। ओइ भयावह दुर्गन्‍धसँ भगवान दड़िभंगा टावरकेँ मुक्ति दैथ से प्रार्थना।

घुमैत-घुमैत सी.एम. कौलेजक अन्‍दर सेहो गेल रही। थोर-बहुत परिवर्तन भऽ गेल अछि। अन्‍दरमे किछु नव भवन बनि गेल अछि। कामेश्‍वर भवन ओहिना। आस-पासक विभाग सभ जस-के-तस।

काली मन्‍दिरक पासमे आब होटल बनि गेल अछि। चाहरदिवारीक अन्‍दर बहुत रास तरह-तरहक दोकान सभ खुजि गेल अछि। लोक सभ जमीन कीनि अपन घर बना लेलक अछि। एक हिसाबे ओइठाम एकटा जन क्रान्‍ति भऽ चूकल अछि। किछु दिन पूर्व हम ओइ होटलमे ठहरल रही। प्रात: भेने मन भेल जे दोबारा जा कऽ मन्‍दिर परिसरकेँ देखी। सएह केलौं। ओइठाम जा कऽ भगवतीक दर्शन केला पछाइत बगलमे बनल कोठरी दिस बढ़लौं। ओकर स्‍वरूप बहुत बदैल चूकल छल। एकटा वृद्ध भीतरसँ निकलला। बहुत उत्‍सुकता पूर्वक हम कहलिऐन जे ३७ बर्ख पूर्व हम अहीठाम रहै छेलौं। मुदा हुनकर गप ओ गप्‍पक तौर-तरीका सुनि क्षुब्‍ध रहि गेलौं।

हुनका भेलैन जे कहीं हुनकर ओइठाम रहबाक अधिकार पर आक्रमण तँ ने भऽ रहल अछि? हम कहलिऐन जे ऐ मन्‍दिरपर पहिने पचाढ़ीक पण्‍डितजी रहैथ। तँ ओ बजला-

रहल हेता।

फेर हम कहलिऐन-

हमहूँ ऐ बगलबला कोठरीमे रहैत रही।

ई सुनिते जेना हुनक धैर्यक सीमान टुटए लगलैन। बहुत क्षुब्‍ध होइत बजला-  

तँ केहेन .............।



Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...