सोमवार, 2 मार्च 2020

सरिसवबाली काकी


सरिसवबाली काकी



हम जहिआसँ मोन पाड़ैत छी,सरसवबाली काकीकेँ ओहिना देखलिअनि । उज्जर चक-चक नुआ पहिरने माथ झपने,बहुत नहू-नही बजैत अपन बात कहितथि । अन्हरोखेमे अपन दियादिनी बेरमाबाली काकीक संगे नवका पोखरिपर स्नान-पूजा करबाक हेतु जइतथि । रस्तामे एकाधटा आओर हुनके सन बुढ़ि संग भए जइतथिन । सभगोटे घाटपर स्नान करैत घर-बाहरक गप्प-सप्प करितथि । महादेवकेँ जल ढारितथि आ वापस घर जखन आबि रहल होइतथि तखन गामक लोकसभ ओछाओन छोड़बाक उपक्रममे रहैत । जाढ़क मास रहैत तँ अधिकांश लोक घूरक सेवन करैत रहैत । भोरे-भोर चाह पीबाक चलनि ओहि समय गामसभमे नहि रहैक । मुदा केओ-केओ चाह पीबैत छलाह,से सभ अड़ेरचौकपर पहुँचि जइतथि । किसानसभ जन अढ़बए चलि जइतथि । जँ अगहनक मास अछि तँ दरबजे-दरबजे दाउन होबए लगैत। क्रमशः मौसम बदलैत,लोकक दिनचर्या तदनुकूल बदलि जाइत । मुदा सरसवबाली काकीकेँ नित्य ओहिना देखिअनि । माघोमासमे हुनका ओढ़ना ओढ़ने नहि देखिअनि । स्नान-पूजा कए लौटैत काल जाढ़क मासमे थर-थर कपैत किछु-किछु मंत्र पढ़ैत ओ वापस अपन घर आबि जइतथि ।

हमसभ नेना रही। जबान भेलहुँ । मुदा सरिसवबाली काकी ओहिनाक ओहिना रहथि । हुनका कहिओ भरिमोन हँसैत नहि देखलिअनि । जखन कखनो हुनकर आङन जाइ तँ ओ कोनो -ने -कोनो काजमे बाझल रहतथि। हुनकर हाथक बनाओल भोजनक प्रशंसा जतेक करी ततेक कम । कैकबेर हमरा हुनका ओहिठामसँ नोत होइत छल। आब सोचैत छी तँ सोचिते रहि जाइत छी । कतेक मनोयोगपूर्वक ओ भोजन बनबैत छलीह । आङनमे जाइते लगैत जेना कोनो बहुत पवित्र स्थानपर आबि गेल छी । सौंसे आङनमे एकटा खढ़ नहि देखाइत । सदिखन चमचम करैत रहैत छलनि हुनकर आङन ।

ओहि आङनमे गेलाक बाद एकटा अद्भुत शांतिपूर्ण वातावरण रहैत छल । कुलमिला कए चारिगोटे ओहिघरमे रहथि । भाइजी(स्वर्गीय अनुग्रह नारायण झा),सरिसवबाली काकी,बरमाबाली काकी, आ कामदेव भाइ। यद्यपि संबंधमे ओ काका लगितथि तथापि हमसभ नेनेसँ हुनका भाइजी कहैत छलिअनि । ओ काशीसँ संस्कृत पढ़ने छलाह । ज्योतिष रहथि । हमर गामक मुखिआ सेहो निर्विरोध चुनल गेल रहथि । भूदान आंदोलनमे विनोबा भावे संगे बहुत सक्रिय छलाह  । एकबेर तँ ओ अपनसभटा जमीन भूदान आंदोलनमे दान कए देने रहथि। बादमे बरमा बाली काकीक प्रयाससँ ओ जमीनसभ वापस भेल छल । हुनका लोकनिक ओएह जमीनसँ जीविका चलैत छलनि । तेँ लगैत अछि जे भवावेशमे ओ ई काज कए देने रहथि ।

आब अहाँ कहब जे एतेक बात तँ कहि गेलहुँ मुदा ई नहि कहलहुँ जे आखिर हुनका सभसँ हमरसभक की संबंध छल । तँ से कहिए दैत छी । हमर प्रपितामह स्वर्गीय गुमनी मिश्र बहुत संपन्न लोक रहथि । हुनका छओटा पुत्र आ दूटा पुत्री रहथिन । एकटापुत्र बिआहक बाद कमे बएसमे मरि गेलखिन ।  एकटाकेँ कोनो संतान नहि भेलनि। चारिटाकेँ संतानसभ भेलनि । एकटा कन्याक बिआह वभनगामा(जनकपुर लग ,नेपालमे} रहनि । दोसर कन्याकेँ बिआहक बाद गामे बसाओल गेल । ओहि समयमे बेटीकेँ बसेनाइ,गाममे भगिनमानकेँ राखब, गौरवक बात बूझल जाइत छल । हुनका जमीन,कलम,पोखरि सभचीजमे हिस्सा देल गेल रहनि । हुनका तीनटा  पुत्र भेलनि। ओहिमेसँ एकटा रहथि भाइजी । दोसर रहथि-स्वर्गीय जगदीश झा । ओ वाटसन इसकूल मधुबनीमे पढ़ैत रहथि । गेनखेलीमे नाम केने रहथि । मुदा कमे बएसमे टीबी बिमारीसँ हुनकर मृत्यु भए गेलनि। हुनके पत्नीकेँ हमसभ बरमा बाली काकी कहिअनि । (बरमा बेतिआ लग कोनो गाम छैक ।) हमसभ नेनामे हुनकर एकटा  ग्रूपफोटो देखने रही  जे हुनकर परिवार लगमे हुनकर एकटा निसान छल । गेनखेलीमे ओ बहुत रास मेडलसभ जितने रहथि । सेहो हमसभ नेनामे देखने रही । बरमाबाली काकी बहुत जोगा कए ई दुनू वस्तु रखने रहथि । हुनका एकटा पुत्र छथि कामदेव भाइ । बाबाक बहिनक नाम रहनि दुर्गा दाइ । दुर्गा दाइक तेसर पुत्रक बिआह सरिसवबाली काकीसँ रहनि। हम कहिओ हुनका नहि देखलिअनि । लोकसभ कहैत जे ओ बिआहक किछुए दिनक बाद टीबी बिमारीसँ मरि गेलथि । तकरबाद सरसवबाली काकी विधवा भए गेलीह । हुनकर सौंसे जीवन ओहिना उजरा सारी पहिरने बितए लगलनि ।

हम जखन कखनो ओहि आङन जाइ,सरसवबाली काकीकेँ काजे करैत देखिअनि । घरक काजसँ जखन फुर्सति होनि तँ चरखा काटथि । ओहि समयमे चरखा चलेबाक एकटा हवा बहल रहैक । हमरसभक गामेमे  खादी भंडार रहैक । ओहि माध्यमसँ कतेको गरीब महिलासभक गुजर होइत छलैक । महिला कतिनसभ महीन सँ महीन ताग काटथि । जतेक महीन ताग तकर ततेक बेसी दाम भेटितैक । ताग कतेक महीन भेल तकर निर्णय खादी भंडारक कार्यकर्ता करैत छलाह । चरखासभ सेहो कैक प्रकारक होइत छलैक । सभसँ पैघ चरखाकेँ अंबर चरखा कहल जाइक । ओहि चरखामे एकहि संगे कैकटा सूत निकलैत छल । ओकरा चलबएमे बेसी परिश्रम जरूर होइत छल मुदा सूतक उत्पादन सेहो कैक गुना बेसी होइत छल । कतिनसभ अपन-अपन सूत खादी भंडारमे  जमा कए देथि आ तकरा बदलामे बेसीकाल खादी कपड़ा देल जाइत छल । टाका कमे काल दैत छल । एहि तरहसँ कठोर परिश्रम कए ओ सभ अपन देह झपैत छलीह आ पेटो भरैत छलीह । सरिसवबाली काकी आ बरमा बाली काकी दुनूगोटे अंबरक चरखा चलबैत छलि ।

सरिसवबाली काकीक स्वरमे अद्भुत मधुरता रहनि । भगवतीक गीत,बिआहक समयक गीत ,बरक परिछन आ बेटीक जेबा काल समदाउन ओ ततेक  मधुर गबैत छलीह जकर वर्णन करब मोसकिल अछि ।

सामाजिक काजमे मदति करबाक जबरदस्त प्रबृति हुनकामे छलनि । ककरो घरमे बिआह,उपनायन होइत तँ ओ दिन-राति  एक कए दितथि । उपनयनक मरबामे लिखिआ-पढ़िआ करबामे हुनका महारत छल । सौंसे मरबामे तरह-तरहक चित्रसभ हाथसँ बनबैत छलीह । आजुक समय रहैत तँ हुनकर एहि प्रतिभासभकेँ समाजमे प्रचार होइत ,हुनका किछु आर्थिक लाभो होइतनि । मुदा ओहि समयमे से सभ तँ नहि रहैक । मधुबनी चित्रकलाक प्रचार-प्रसार भेलैक जरूर मुदा बहुत देरीसँ । ताबे हुनका सन-सन कतेको मौलिक कलाकारसभ साधना करैत-करैत एहि संसारकेँ छोड़ि गेलि ।

गाममे ककरो बेटीक बिआह होइतैक तँ मधुश्रावणीमे कनिआकेँ  खिस्सा कहबाक हेतु ओ जाइत छलीह । हुनका सभकिछु कंठाग्र रहनि । लग-पासक महिलासभ बैसितथि ,कनिआ बैसितथि , जँ बर आएल छथि तँ ओहो बैसितथि आ सभगोटे नियमपूर्वक हुनकर खिस्सा सुनितथि ।

मधुश्रावणीक समाप्तिपर जे विध-व्यवहार होइक से सभ ओ करबैत छलीह । बदलामे हुनका की भेटैत छलनि? जँ कनिआक सासुरसँ हुनको  लेल नुआ आबि गेल तँ से हुनका भेटि जाइत छलनि नहि तँ फोकला । मुदा हुनका एहिसभसँ निर्लिप्त देखिअनि । जेना ओ एहि पृथ्वीपर चुपचाप सभकिछु सहि जेबाक हेतु आएल होथि । कहिओ ककरो कोनो तरहक प्रतिवाद नहि,आग्रह नहि,इच्छा-अभिलाषा नहि ।

कैकबेर पाबनिसभमे हुनका अपना ओहिठाम किछु-किछु बनबैत देखिअनि । जेना तिलासंक्रांतिमे चुरलाइ बनबएमे ओ हमरा माएकेँ मदति करितथि । एहि काजमे तँ बरमाबाली काकी सेहो लागल देखिअनि । सभगोटे गप्प-सप्प करितथि आ चुरलाइओ बनबैत रहतथि । एहि तरहे छिट्टाक-छिट्टा चुरलाइ बनैत छल आ हमसभ तकरा कतेको दिनधरि खाइत रहैत छलहुँ ।

सरसवबाली काकीकेँ अपन कोनो संतान नहि रहनि । भाइजीकेँ सेहो अपन कोनो संतान नहि रहनि । हुनकर पत्नी कहि नहि कहिआ शुरुएमे मरि गेलखिन । कहाँदनि हुनकासभकेँ एकटा पुत्र भेल रहनि जे दस वर्षक भए कए मरि गेलथि । बरमा बाली काकी सेहो शुरुएमे विधबा भए गेलथि । मुदा संयोगसँ हुनका एकटा पुत्र भेल रहथिन-कामदेव भाइ । तीनू फरिकेनमे  ओएहटा संतान रहथि । ओ अखन अस्सी वर्षक छथि । हुनका भरल-पुरल परिवार छनि । सरसवबाली सभदिन हुनके अपन संतान बूझि जीबि गेलीह । कहिओ ककरोसँ किछु अपेक्षा नहि। भगवान छोड़ि केओ मदति केनहार नहि । कहिओ काल हुनका माएक लग नोर पोछैत देखिअनि । साइत मोनमे गड़ल कष्टकेँ असह्य भेए जाइत होनि । कतहुँ तँ ओकरा अभिव्यक्ति चाहैत छलैक । नौकरीक क्रममे हम बाहर चलि गेलहुँ । एकदिन सुनलिऐक जे सरसवबाली काकी नहि रहलीह ।  सदा-सर्वदाक लेल एकटा दुखी आत्मा एहि संसारकेँ छोड़ि गेलीह । बिना किछु कहने,बिना किछु मंगने ।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

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