सोमवार, 27 अप्रैल 2020

स्वामी आनंद वैराग्य ( फेकनजी)





स्वामी आनंद वैराग्य ( फेकनजी)



गोर-नार,नमगर,गुलाबक फूलसन सदिखन प्रफुल्लित  हम अपन ओहि मित्रसँ जखन कखनो भेंट करए जाइ तँ माहौले बदलि जाइत छल । सभटा काज ओ छोड़ि दितथि । लग-पासमे जे केओ रहितथि तिनका छुट्टी कए दितथि । आ एकटा तेहन अपूर्व मुस्कीक संगे स्वागत करितथि जकर वर्णन करब बहुत मोसकिल । जखन कखनो हम मधुबनी जइतहुँ तँ हुनकासँ अवश्य भेंट करितहुँ । कैकबेर तँ ओ मधुबनीक रस्तेपर देखा जइतथि । मधुबनी छैहे कतेक टापनरह मिनटमे एहिपारसँ ओहि पार। ओना आब आवासीय क्षेत्र यत्र-तत्र पसरि गेल अछि आ तकर हिसाब केलासँ मधुबनी  बहुत नमरि गेल अछि । मुदा ओहि समयमे तँ खादी भंडार सँ किशोरीलाल चौक,ओतएसँ आगू बढ़ब तँ शंकर टाकीज आ कनीक आओर आगू बढ़ जाएब तँ रेलवे टीसन । ओमहरेसँ आगू बढ़ैत जाएब तँ थाना मोड़ । बस खेल खतम ।

शंकर टाकीजक चर्च भेल तँ मोन पड़ि गेल गाइड सीनेमा । शंकर टाकीजमे गाइड सीनेमा हमर जीवनक पहिल सीनेमा छल जे हम मैट्रिकक परीक्षा समाप्त भए जेबाक उत्साहमे देखने रही । मैट्रिकक परीक्षाक हेतु एकतारा उच्च विद्यालयक विद्यार्थीसभक परीक्षा केन्द्र वाटसन इसकूल मधुबनीमे छल । विद्यार्थीसभ अलग-अलग गुटमे यत्र-तत्र डेरा लेने रहथि । मुदा परीक्षा केन्द्रपर सभक भेंट भए जाइत छल । मैट्रिकक परीक्षा पास केलाक बादो ओ हमरसभक संगे आर.के.कालेज मधुबनीमे नाम लिखओने रहथि । अस्तु,कुल मिला कए पाँचसाल हमसभ इसकूलसँ कालेज धरि संगे पढ़ने रही । तकरबाद ओ लंगट सिंह कालेज मुजफ्फरपुर चलि गेलाह आ हम सी.एम.कालेज दरभंगामे नाम लिखओलहुँ । मुदा हमरा लोकनिक संपर्क बरोबरि बनल रहल । सभ तरहें सुबिधा संपन्न होइतहुँ ओ पढ़ाइमे बहुत आगा नहि गेलाह । असलमे हुनकर साहित्यिक आ कलाक पक्ष नेनेसँ बहुत मजगूत छल । जौं ओ ओही लाइनमे गेल रहितथि तँ निश्चय बहुत किछु केने रहितथि । मुदा ई अफसोचक बात नहि रहि गेल कारण ओ किछु अद्भुत तँ कइए गेलाह ।

हुनकर घर मधुबनीमे नीलम टाकीजसँ आगू उतरबारि कात बनल बाल्मिकी कालोनीमे छलनि । ओ ओहि कालोनीक स्थापकमे सँ छलाह । तकर बाद तँ हमर कैकटा मित्र ,परिचित आ संबंधी ओहि कालोनीमे घर बनओलथि। हमर ससुर(स्वर्गीय गणेश झा-पण्डौल डीह) सेहो ओतहि जमीन कीनि कए घर बनओलथि । तेँ ओहिठाम हमर अबरजात बहुत दिनधरि बनल रहल आ ताहि क्रममे अपन पुरानसंगीसभसँ भेंट-घाँट सेहो होइत रहल । श्रीनारायणजी सेहो ओतहि घर बनओलथि। श्रीनारायणजी (ग्राम -नगवास) ओही दिन आठमामे एकतारा उच्च विद्यालयमे नाम लिखओने रहथि जहिआ हम लिखओने रही । हमर बाबूजी आ हुनकर पित्ती हमरा लोकनिक संगे रहथि । ओ दृष्य अखनो हमरा मोन अछि । केना इसकूलक ओसारापर हमसभ बेंच लग ठाढ़ रही आ बूचनबाबू कागजी कार्रवाइ करैत छलाह । ई बात सन् १९६३ई.क थिक । तहिआसँ आइधरि ४७ वर्ष बित गेल मुदा हमरा लोकनिक संपर्क ओहिना टटका बनल अछि जेना इसकूलक समयमे छल । नेनाक दोस्ती बहुत गहींर होइत अछि जकर प्रभाव मोनपर अमिट भए जाइत अछि । ओ इसकूलिआ संगी आ हुनका लोकनिक संगे बिताओल गेल आनंदमय समय नहि बिसरल जा सकैत अछि ।

मधुबनी डेरापर हम एकबेर हुनकासँ भेंट करए गेल रही । हमर ससुरक घर सेहो ओही कालोनीमे रहनि । ओतहिसँ प्रातःकाल दस बजेक करीब हम हुनका ओतए पहुँचल रही । ओहि समय ओ ओतए नेनासभक हेतु आवासीय विद्यालय चला रहल छलाह । ओकर अलाबा मधुबनीमे दू-तीनटा आओर इसकूलसभ ओ चलबैत छलाह। बादमे ओ अपन पैतृक ग्रममे सेहो इसकूल स्थापित केलाह । डेरापर पहुँचलापर ओ हमर जोरदार स्वागत केलाह । नाना-प्रकारक मेवा,फल,मधुर राखल छल,खाइत रहू जे खाएब,जतेक खाएब । मुदा ओ अपने किछु नहि खाथि । हम पुछबो केलिअनि तँ कहए लगलाह जे ओ यात्राक क्रममे ततेक मिठ्ठ खा लेने रहथि जे हुनकर सुगर तीनसए सँ बेसी भए गेल छनि । तेँ डाक्टरक परामर्शपर सभकिछु बंद भए गेल छनि ।

हुनकर ज्येष्ठ पुत्र किछुसाल पूर्व घर छोड़ि भागि गेलखिन आ कतेको प्रयासक बादो हुनकर किछु अता-पता नहि लागि सकल । हुनकर श्रीमतीजी एहि घटनासँ बहुत आहत भेलीह । ओ निरंतर एहिबातसँ दुखी रहैत छलीह । मुदा ओ स्वयं एहिबातकेँ पचा गेल रहथि आ व्यवहारमे  कखनो प्रकट नहि होबए देथि । कारण जे रहल होअए मुदा हुनकर पारिवारिक जीवन सहज नहि छलनि । मुदा हुनका एहिबातसभक चिंता नहि देखिअनि । असलमे नेनेसँ हुनका जीवनमे अंतर्विरोधक साक्षात्कार होइत रहलनि । हुनकर माएक देहावसान बहुत कमे बएसमे भए गेलनि । पिता दोसर बिआह कए लेलखिन । तकरबाद की भैलक की नहिओ बहुत दिन धरि अपन पितासँ फराक नाना(स्वर्गीय यदु नंदन मौआर)क संगे एकतारामे रहलथि । जखन हुनका नाना एकतारा लए अनलखिन तँ हुनकर पिता संगे नानाकेँ कोट-कचहरीक चक्कर पड़ि गेलनि। अंततोगत्वा,नानाकेँ पक्षमे कोर्टक फैसला भेल । नाना हुनकर पालन-पोषण केलखिन । हुनकर नाना बहुत संपन्न लोक छलाह । हमरा कैकबेर हुनका ओहिठाम जेबाक अवसर भेटल छल । हुनकर दनानपर गगनचुंबी पुआरक टालसभ देखितहुँ तँ देखितहि रहि जइतहुँ। सुनबामे आएल जे ओ फेकनजीकेँ किछु जमीन-जायदाद सेहो देने रहथिन जे बादमे नानाक मृत्युक बाद मामासभ हथिआ लेलखिन जखन कि ओसभगोटे बहुत संपन्न छलाह । नानाक मृत्युक बाद हुनकर पिता (स्वर्गीय राम नंदन रायआग्रहपूर्वक हुनका अपना संगे राखि लेलखिन आ एकबेर फेर ओ अपन पैतृक गाम मधेपुरा (पण्डौल टीसन लगपहुँचि गेलाह। बादमे हुनकर पितासँ हमरो भेंट भेल आ दुनू पिता-पुत्रक अनुराग देखि हम बहुत प्रभावित भेल रही ।

 हमरा हुनकासँ भेंट एकतारा उच्च विद्यालयमे भेल जतए ओहो हमरे किलासमे पढ़ैत छलाह । हुनका इसकूलमे हमसभ हुनका फेकनजी कहिअनि । हुनकर असली नाम छलनि चन्द्र भूषण राय ।  हुनकर फेकन नाम कोना पड़लनि सेहो रहस्ये थिक । आठमासँ एगारहमा धरि हमसभ एकहि किलासमे पढ़लहुँ । हमरासभक गणितक शिक्षक डुमरा गामक जटाधर बाबू छलाह। ओ हुनके ओहिठाम रहैत छलाह । ई सुनि कए आश्चर्य लागि सकैथ अछि जे हुनकर व्यक्तिगत ट्युटर होइतहुँ ओ नंबर देबा काल हुनका कोनो पक्षपात नहि करथि । कैकबेर तँ हुनकर विषयमे ओ बहुत खराब करैत छलाह । तथापि केओ शिक्षकपर आङुर नहि उठओलक । आइ-काल्हिक समय रहैत तँ संभवतः सभसँ एहिने ओ शिक्षक हटा देल जइतथि । एकतारा उच्च विद्यालयक सचिव हुनके मामा छलाह । तथापि शिक्षक अपन निष्पक्षता बनओने रहथि से काबिले तारीफ  छल ।

ई बात सन् १९६९ ई०क थिक । हम सी.एम.कालेज दरभंगामे पढ़ैत रही । ओहि समयमे कैकटा बाबासभ ऊपर भेल रहथि । ताहि समयमे ओशोक सेहो हवा बहि गेल छल । किछु बात हुनकामे जरूर छल जे तत्कालीन युवावर्ग बहुत जोर-सोरसँ हुनकासँ प्रभावित भेल । बहुत रास लोकसभ हुनकर चेला सेहो बनलथि । गेरुआ वस्त्र पहिरने,गर्दनिमे एकटा लाकेट लटकओने आ घर-गृहस्थीक सभकाज करितहुँ सन्यास लेने । बाह रे विधानरुचिगर विषयसभकेँ तेनाक घोंटि देल रहैक जे जकरा जे नीक लागए से तहिना करथु,कोनो धर्म -अधर्मक बात नहि होएत। जे-से । ओहि समयमे फेकनजी सेहो ५ अगस्त १९७३ क दिन ओशोक शिष्य भए गेलाह । अपने तँ भेबे केलाह,संगहि अपन समस्त परिवार,इष्ट-मित्रकेँ सेहो हुनकर शिष्य बनबाक हेतु प्रेरित केलाह ।हम नहि कहि सकैत छी किएक,मुदा हमरा एहन कहिओ नहि बुझाएल जे हम ओशोक चेला भए जाइ यद्यपि हमर कैकटा मित्र एहिमार्गक अनुयायी छलाह। असलमे हमर स्वभावमे चेला बनब नहि अछि । अखनो धरि हम माता छोड़ि ककरो चेला नहि भए सकल छी । कौलिक मंत्र हम स्वर्गीया मातासँ लेने रही । बस ततबे । मुदा तकर माने ई नहि जे ओशोक विद्वतासँ हम प्रभावित नहि रही । ओहि समयमे हुनकर कैकटा किताब कीनि कए पढ़ने रही । रेडिओ,टेलेवीजनपर हुनकर भाषणसभ सुनैत रही ।

मधुबनीक छोट-छीन,दुर्वलकाय सड़कसभ पर पैरे वा रिक्सासँ गेरुआ वस्त्र पहिरने हुनकर एकटा तेहन पहिचान भए गेल छल जे ककरो कहिऔक सोझे हुनका लग पहुँचा देत । ओहि समयमे जे ओ ओशो भक्त भेलाह से बनले रहि गेलाह । ओहि काजमे रमि गेलाह । सौंसे देशमे सालभरि हुनकर कार्यक्रम होइत रहैत छल । सालभरि पहिनहि हुनकर यात्रासभक कार्यक्रम बनैत छल । तकरा तमाम ओशो भक्त लोकनिक संस्थासभमे प्रचारित कएल जाइत छल । ततबे नहि,एक समयमे तँ पूना स्थित ओशो आश्रममे ओ प्रतिस्पर्धाक कारण भए गेल छलाह । 

सन् १९७७ई.मे नौकरीक क्रममे हम दिल्ली चलि अएलहुँ । गाम-घरसँ बहुत फटकी चलि गेल रही । तथापि हुनकासँ संपर्क बनल रहल । ओ गाहे-बगाहे दिल्ली अबैत रहैत छलाह । कैकबेर ओ हमर डेरापर चलि अबैत छलाह आ देशभरिमे  अपन आध्यात्मिक भ्रमणक चर्चा करैत छलाह। एतेक व्यस्तताक बाबजूद ओ साहित्यिक काजमे सेहो लागल रहैत छलाह । अपन लिखल कैकटा कविता,नाटक  आ लेखसभ ओ हमरा देखबैत रहैत छलाह ।हुनका संगे कैकटा हुनकर सहयोगी आ मित्र लोकनि रहैत छलाह । कैकबेर तँ ओ हुनकालोकनिकेँ पाछुए छोड़ि हमरा लग आबि जाइत छलाह । हुनका एहि तरहें असगर अएबाक तात्पर्य निश्चिंत भए हमरासँ भरिपोख गप्प-सप्प करब रहैत छलनि ,ओहिना जेना नेनामे रहल होएतनि। किछु कालक हेतु हमसभ वाल्यावस्थामे पहुँचि जाइत छलहुँ । बेसक हम नौकरी करए दिल्ली  आबि गेलहुँ आ ओ मधुबनीमे रहि गेलाह मुदा हमरा लोकनिक भेंट-घाँट निरंतर होइत रहल । एकबेर दिल्लीक श्रीराम सेंटरमे हुनकर लिखल नाटक- ‘’वुद्धम् शरणं गच्छामि’’क मंचन भए रहल छल । ओकर कलाकारसभ मूलतः हुनकर शिष्य वा सहकर्मी लोकनि छलाह । हमरा ओ रामकृष्णपुरम स्थित सरकारी डेरापर स्वयं आबि कए ओहि नाटककेँ देखाबक हेतु आग्रह कए गेल रहथि । हम ओ नाटक देखए गेबो केलहुँ । सभागार खचाखच भरल छल । ओ सभागार मे प्रथम पाँतिमे बैसल छलाह । मुदा हमर चिंता हुनका रहनि । हमरा देखितहि ओ तुरंत उठि कए अत्यंत भावुकताक संग भेंट केलाह । उठि कए ठाढ़ भए गेलाह आ हमरा नीकसँ बैसेबाक जोगारमे लागि गेलाह । से देखि लग-पासमे बैसल लोकसभ छगुन्तामे रहथि जे आखिर ई के छथि जिनकासँ स्वामीजी एतेक आदर आ भावुकतासँ भेंट कए रहल छथि । फेर हुनकर अनुज सत्यार्थजी हमरा अपनासंगे बैसबाक प्रवंध केलाह । हुनका संगे बैजू महराज दीप प्रज्ज्वलित कए नाटकक उद्घाटन केलाह । वुद्धक जीवनीपर आधारित ओ नाटक निश्चय बहुत मार्मिक छल । नाटक समाप्त भेलाक बाद ओ हमर हाल-चाल लैत रहलाह जाहिसँ हमरा घर वापस जेबामे कोनो परेसानी नहि होअए।

हम सन् १९८८ ई०मे मधुबनीमे मकान बनबैत रही । मकानक काज शुरु करबासँ पूर्व फेकनजी हमरा संगे ओहि स्थानपर गेलाह आ मकानक नक्सासँ हटि कए ओ किछु परामर्श देलथि जकर समावेश करैत मकानक निर्माण कएल गेल । मकानक निर्माणक क्रममे ओ कैकबेर निर्माणस्थलपर जा कए मार्गदर्शन करैत रहलाह । ओहिक्रममे श्रीनारायणजी सेहो कैकबेर ओतए जाइत-अबैत रहलाह । मकानक काजमे शुरुसँ अंतधरि श्रीनारायणजीक ततेक योगदान रहल जकर वर्णन करब बहुत मोसकिल । कतेको साल धरि ओ कोनो-ने-कोनो रूपमे मकानक काजसँ जुड़ल रहलाह। हुनका लोकनिक एहि अमूल्य योगदानकेँ नहि बिसरल जा सकैत अछि ।

अपन मंडलीमे ओ स्वामी आनंद वैराग्यजीक नामसँ जानल जाइत छलाह । ओशोक शिक्षाक प्रचार-प्रसारमे ओ सालों लागल रहलाह । कालक्रममे ओ हरिद्वारमे एकटा पैघ संस्थान बनबएमे लागल रहथि जकर उद्देश्य आध्यात्मिक एवम् सांस्कृतिक क्षेत्रमे समाजक विकास करब छल । मुदा ओ काज पूर्णता दिस बढ़ैत ताहिसँ पहिनहि ओ अस्वस्थ भए गेलाह । एकाएक पता लागल जे हुनका आंतमे कैंसर भए गेल छनि । इलाजक क्रममे ओ लेडी हार्डींग मेडिकल कालेज सेहो आएल रहथि । हुनका संगे हुनकर अनुज स्वामीसिद्धार्थजी रहथिन ।ओहि समयमे हम ओतए उप-निदेशक(प्रशासन)क काज देखैत रही। डाक्टरसभ हुनका देखबो केलकनि मुदा केओ उत्साहवर्धक समाधान नहि बता सकल रहथि । बादमे ओ काशी चलि गेलाह आ ओहीठाम करीब छओ मास धरि देसी इलाजसभ केलथि । आकस्मिक एहन अस्वस्थ भए गेलासँ ओ बहुत दुखी रहथि। कहथि -

हमरा तँ अखन पचपने वर्ष भेल अछि । अखन बहुत काज करबाक छल । ”

मुदा कालक आगा ककर चलैत अछि । सन् २००५ई०मे एकदिन हुनकर अनुज शिद्धार्थजीक फोन आएल-स्वामीजी नहि रहलाह ।बहुत दुख भेल। एकटा बहुत प्रिय बचपनक दोस्त आ शुभचिंतक असमयमे हमरासभकेँ छोड़ि कए सदा-सर्वदाक लेल एहि दुनियासँ चलि गेलाह । बेसक आब ओ नहि छथि ,मुदा कतेको बेर जखन हम अपन वाल्याबस्था दिस घुमैत छी तँ अखनहुँ हुनकर तेजस्वी छवि सद्दः प्रस्तुत भए जाइत अछि,जेना ओ पुछि रहल होथि –

रबीन्द्रजीकोना छी?”

रबीन्द्र नारायण मिश्र

२७.४.२०२०

mishrarn@gmail.com



गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

भारतवर्ष महान है !


भारतवर्ष महान है !





गाँव-गाँव और शहर-शहर में,

गुंजित होता गान है ।

आओ हमसब मिलकर  गाएं,

भारतवर्ष महान है ।



आसेतु-हिमाचल तक विस्तृत

तेजस्वी वीरों से रक्षित,

राम कृष्ण की पावन धरती,

उत्कर्ष ज्ञान-विज्ञान है ।



भारत माता तेरी जय हो,

जय हो तेरे संतान की,

विश्व विजेता बने सभी

रक्षक तेरे सम्मान की ।



जीते जी और मरकर भी,

जयगान तुम्हारा गाएंगे ।

सर्वस्व समर्पित कर तुझको

नूतन इतिहास बनाएंगे।



त्याग,तपस्या करुणा का

संदेश हमेशा देते है ।

वंधुत्व,प्रेम के संवाहक

हम विश्वमित्र कहलाते हैं ।



औरों के सुख के खातिर,

सर्वस्व त्याग कर देते है ।

अपना सब कुछ दे कर भी,

कल्याण जगत का करते हैं ।



क्रोटि-क्रोटि जन के प्रतिपालक

त्याग तपस्या के अनुपालक

अखिल शृष्टि मंगलमय हो

मन में यह अरमान है ।



विविध धर्म भाषा अनेक

तद्यपि हम सबके हृदय एक

द्वेष रहित उन्नत विचार

मन में सब का सम्मान है ।

भारतवर्ष महान है ।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email: mishrarn@gmail.com




















सोमवार, 20 अप्रैल 2020

लेखक परिचयः




लेखक परिचयः

नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र
पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र
माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी
बएस : ६६ बर्ख
पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह
मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी
वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/
स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवा निवृत्त)
शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक
प्रकाशित कृति :
मैथिलीमे:-

प्रकाशन वर्ष २०१७
१. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा) २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध) ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग),

प्रकाशन वर्ष २०१८

४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)

प्रकाशन वर्ष २०१९

९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास) 

प्रकाशन वर्ष २०२०

१३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)

१५.ढहैत देबाल(उपन्यास) 

प्रकाशन वर्ष २०२१


१६.पाथेय(संस्मरण)

१७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) 

In English:-

Year of Publication:2018
1.The Lost House (Collection of short stories)
2.Life is an art


हिन्दी में

प्रकाशन वर्ष २०१९

१.न्याय की गुहार(उपन्यास)


(
उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipcart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि)
इमेल : mishrarn@gmail.com
ब्लोग : mishrarn.blogspot.com
Mobile -9968502767
एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra

 

 






























मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत !


हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत !




विश्व कर रहा त्राहिमाम्!

दिन-प्रतिदिन सैकड़ों निर्दोष,

 हो रहे अकाल काल- कलवित,

व्यर्थ हो चुके हैं वैज्ञानिक अविष्कार

आशा भरी दृष्टि से ,

सभी देख रहे भारत को ।

ऐसे में भारत ही करेगा चमत्कार,

संयम और निष्ठा की पुँजी से

बचा लेगा स्वयं को और विश्व को भी ।

हम फिर बनेंगे ध्वजवाहक,

इस भूधरा पर,

सुख, समृद्धि एवम् शांति के।

विश्व पर मड़राते संकट के बादल,

छट के रहेंगे,

चाहे जितना हो विनाशकारी,

कोरोना का प्रकोप,

हटकर रहेंगे ।

छटेगा अंधेरा और शीघ्र

फैलेगा जीवन में प्रकाश

हो चाहे जितना भी वलिष्ट

हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत!

रबीन्द्र नारायण मिश्र


१४.४.२०२०

लहसन उपन्याससँ उठैत जीवन संघर्षक स्वर




लहसन उपन्याससँ उठैत जीवन संघर्षक स्वर

:: रबीन्द्र नारायण मिश्र

समाजक निर्माण सभगोटे मिलि कए करैत छी। सभक सुख-सुबिधाक हेतु प्रकृति अपन समस्त संपदाक निर्माण केने अछि। जे वस्तु जतेक महत्वपूर्ण अछि से ततेक प्रचुर मात्रामे आ सर्वसुलभ करबाक व्यवस्था प्रकृति द्वारा भेल अछि। जेना कि वायु, जल, सूर्यक प्रकाश निरंतर उपलब्ध अछि। तहिना पृथ्वी सेहो सुलभ रहल होएत। मुदा मनुक्खक स्वार्थी प्रवृति कही, वा जे कही, लोक समस्त शक्तिसँ सर्वसुलभ वस्तुसभकेँ दुर्लभ करबाक कोनहु प्रयास नहि छोड़लक।

 ई बात सभ जनैत अछि जे एहि पृथ्वीक एक इंच केओ अपना संगे नहि लए जा सकत, खाली हाथ आएल आ खाली हाथ चलि जाएत तथापि जेना-तेना अधिक-सँ-अधिक भूभागपर अपन कब्जा करएमे दिन-राति लागल रहैत अछि। परिणाम की भेल? पृथ्वी खंड-खंड भए गेलथि। हुनकर आँङन लहु-लहान भेल अछि। केओ सए बिघा जमीन कब्जा कए लेने अछि तँ केओ हजार। कतेको एहनो लोक छथि जिनका घरारिओ नहि छनि, ककरो अनकर जमीनपर बास केने छथि। जखन ओ चाहए भगा दिअए। मनुक्ख एहि प्रवृत्तिक कारण पृथ्वीपर भूमिहीन मजदूरक हुजुम बनि गेल। एहन लोकक केओ माए-बाप नहि। दिनमे खाउ आ साँझ हेतु प्रयासमे लागि जाउ। बात ततबे तक रहैत तखन तँ चलू...। मुदा मनुक्खक राक्षसी प्रवृति आओर आगाँ बढ़ल। भरिदिन काज केलाक अछैतो मजदूर बोनि माङलापर मारल-पीटल गेल। तेँ ने ओ घसल अठन्नी बाजि उठल- हम कतए जाउ ,अवलंब पाउ...।[1]

हालत तँ आब ई अछि जे पानि,हवा, रौद किछु सर्वसुलभ नहि रहल। जकरा टाका अछि तकरा लेल सभकिछु सुलभ, नहि तँ बाट तकैत रहू। एकहि समयमे एकहि ठाम रौदी आ दाही दुनू एहि समाजमे विद्यमान देखल जा सकैत अछि।

जाहिर बात अछि जे अभावग्रस्त लोक रोजी-रोटीक फिराकमे जतए-ततए बौआइति रहैत अछि। तेहने एकटा व्यक्ति अछि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लिखित उपन्यास लहसनक नायक- मेवालाल। मेवालाल अपन घरबालीक गहना बेचि कलकत्ता काज करए बिदा होइत अछि। रस्तामे ओकरा किछु आओर सहयात्रीसभ भेटि जाइत छथि। रविनाथक संग भए गेलासँ हुनकर यात्रा आसान भए जाइत छनि। जेना-तेना कलकत्ता पहुँचि जाइत छथि। ओहिठाम पहिनेसँ रहैत कैकटा मजदूरसभ हुनका मदति करैत छथि। कलकत्तामे अपना सन-सन कतेको मजदूरसभसँ मेवालालक परिचय होइत छनि। ओएहसभ हुनका हथरिक्सा चलेबाक काज पकड़बामे सहयोग करैत छथि। कठोर परिश्रमसँ ओ अपन जीवन-यात्राकेँ आगू बढ़बैत छथि। अपनो जीबैत छथि आ गाममे रहि रहल अपन परिवारोकेँ जिआबैत छथि। किछुसाल एहिना बीति जाइत अछि। एकदिन संयोगसँ हुनका एकटा मीलमे नौकरी भेटि जाइत छनि। रहबाक हेतु घर सेहो ओही कंपनी द्वारा देल जाइत छनि। दरमाहा सेहो नीक भए जाइत छनि। तखन गामसँ अपन पत्नी राधाकेँ लए अनैत छथि। पत्नीक आबि गेलासँ समय नीकसँ बीतए लगैत छनि। एहीक्रममे ओही मीलमे काज केनिहारक हिनकर पड़ोसी सुनीलपालसँ हुनका दोस्ती भए जाइत छनि। दुनू परिवारमे अबरजात बढ़ैत अछि। मेवालालक पत्नी राधा आ सुनीलपालक पत्नी अंतिकापालक बीच सेहो निकटता बढ़िते रहैत अछि। संयोग एहन होइत अछि जे सुनीलपालक पत्नी अंतिकापालक दुर्घटनामे मृत्यु भए जाइत अछि। सुनीलपाल घरमे असगर भए जाइत छथि। एहन समयमे हुनकर ध्यान मेवालालक पत्नी राधापर पड़ैत छनि। उपन्यासकारक शब्दमे-

तेकर बाद राधापर बंशी पथलैन, जे सुतैर गेलैन। सुतैर ई गेलैन जे राधाकेँ अपन पत्नी बना अपना घरमे रखि लेलैन। ओना, बुढ़ाड़ीमे सिनुरदान करब नीक नइ बुझि नइ केलैन। तँए राधा सिनुर नइ करै छैथ सेहो नहियेँ अछि। दुनूक सम्बन्ध सभकेँ बुझल, मुदा तैयो सुनीलपाल राधाकेँ छह मास चोरा कऽ रखलैन।[2]

पत्नीकेँ तकबाक क्रममे मेवालाल सुनीलपालक ओहिठाम सेहो गेलाह। यद्यपि राधा सुनीलपालक घरमे दोसर कोठरीमे बंद रहथि मुदा ओ सामने नहि अएलीह। सुनीलपाल चाह-पान पिआ कए मेवालाकेँ बिदा करबामे सफल रहलाह। तथापि मेवालालक मोनमे कतहु-ने-कतहु संशय रहबे करनि। हुनकर संशय ओहिदिन सत्यमे बदलि गेल जखन मेवालाल कलकत्ताक बजारमे राधाकेँ सुनीलपालक संगे घुमैत स्वयं देखि लेलनि। परिणाम सोचल जा सकैत अछि। मेवालाल एकर प्रतिकारक हेतु न्यायालयक शरण लैत छथि। न्यायालयमे हुनकर विजय होइत छनि। राधा वापस मेवाला लग अबैत छथि। तकरबाद मेवालाल सहर छोड़ि देबाक निर्णय करैत छथि। राधासंगे गाम आबि कए भोजभात करैत छथि। एकबेर फेर ओ गौंवा भए जाइत छथि।

मनुक्खकेँ जखन पेट जरैत छैक तँ होइत छैक जे कोनो उपायसँ पेट भरए। जखन तकर जोगार भए जाइत छैक तकरबाद आओर-आओर आवश्यकतासभ फुराइत छैक। कहल जाइत अछि जे मन हर्षित तँ गाबी गीत। मेवालाक संगे सेहो सएह भेलनि।

ओना, गाममे चारि कोठरीक पक्का मकान सेहो मेवालाल बना नेने छला, मुदा पत्नीकेँ संग रखने मकानमे ताला लगबए पड़लैन। सालमे एकबेर दुनू परानी गाम अबै छला आ मास दिन तक रहै छला। तही बीच बेटियो-नातिकेँ अपना ऐठाम लऽ अबै छला आ कलकत्ता जाइसँ दू-तीन दिन पहिने, सासुर पठा दइ छेलखिन। माने बेटी सासुर चलि जाइ छेलैन। ओना, अखनो धरि दुनू परानीक मनमे गामक प्रति सिनेह छैन्हे जइसँ ने कलकत्तामे आन नोकरिहारा जकाँ घरे बनौलैन आ ने रहैक विचारे केलैन। नीक दरमाहा रहने मेवालाल गाममे दू बीघा खेतो अरजलैन।[3]

महानगरसँ गामधरि परिवर्तन भेल अछि। देशमे लोकतंत्रक स्थापनाक बाद संविधानमे देशक सभ नागरिककेँ समानताक अधिकारक संगहि आओर कैकटा मौलिक अधिकार प्राप्त अछि। मुदा एखनो ढाकीक-ढाकी लोकसभ गाम-घर छोड़ि जहाँ-तहाँ वौआ रहल अछि। अखनो महानगरसभक गगनचुंबी महलसभकेँ लज्जित करैत हजारो लोक सड़कक कातमे सुतल रहैत अछि आ कैकबेर निसाँमे मातल वाहन चालकक द्वारा पीच देल जाइत अछि। अखनो महानगरसभमे एहन लोकसभक हुजुम अछि जे भोर खाइत अछि आ साँझक हेतु व्योंतमे लागल रहैत अछि। महलसभमे रहनिहार विशिष्ट वर्गक लोककेँ एहन लोकक स्थिति-परिस्थितिक सुधि लेबाक कोन काज? मुदा उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल फाँढ़ बान्हि कए आगू अबैत छथि आ लहसने टामे नहि अपन कतेको रचनासभमे समाजक एहन उपेक्षित वर्गकेँ महत्व दैत छथिन। ई मामूली बात नहि अछि। कारण बलगरहासभक संगे तँ अनेरे लोकसभ ठाढ़ अछि आ तरह-तरहक फएदा उठा रहल अछि। जकर केओ नहि अछि,जे एक हिसाबे बौक अछि, तकर कण्ठमे स्वर देबाक काज करी तखन ने। से काज मण्डलजी केलाह अछि। ताहि दृष्टिसँ जँ अपने लहसन उपन्यास पर दृष्टिपात करब तँ लागत जे ई कतेक भारी काज केलाह अछि।

उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल साहित्यिक क्षेत्रमे परिचयक मोहताज नहि छथि। मैथिली साहित्यक विभिन्न विधामे ओ अपन रचनासभक पथार लगा देने छथि। करीब एक सए किताब मण्डलजीक हाससँ लिखल प्रकाशित भए चुकल अछि। आ अखन ओ हाथ थोड़े बारि देलनि अछि, लिखिए रहल छथि।

लहसनक नायक मेवालाल अपन कलकत्ता-प्रवासमे बचनू, भूषण, दुखी आ मखनलाल उर्फ बौनभाइ सन-सन जन-बनिहारसभक सम्पर्कमे अबैत छथि आ देखैत छथि जे ओ सभ केना सालक-साल कलकत्ता सन महानगरमे संघर्ष कए अपन हालतमे सुधार केलनि। गाममे जमीन-जथा बनओलनि। पक्का घर बनओलनि। हुनकालोकनिक कलकत्तामे एकटा अपन पहिचान छनि। अपन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश छनि। एहने परिवेशक वर्णन करैत उपन्यासकार लिखैत छथि-

रौतुका खेनाइसँ पहिने आने दिन जकाँ धरमशल्लामे ढोलको-झालि बजए लगल आ ताशक संग गाम-घरसँ लऽ कऽ देश-दुनियाँक गप-सप्प सेहो चलए लगल। एक घर  आ एकरंगाह जिनगी  रहितो अनेको समाजमे विभाजित अछिए। कियो ताशक जुआमे अपन कमेलहो गमा रहल अछि तँ कियो मेहनतक कमाइक संग जुओसँ कमा रहल अछि। तही बीच किछु गोरे एहनो तँ छथिये जे साज-बाजक संग भगवत-भजन सेहो कइये रहला अछि। दुनियाँमे दिन-दिनक घटना सेहो घटिये रहल अछि। तहूमे छोट घटनासँ लऽ कऽ पैघ धरि घटिते अछि। रंग-रंग देखनिहारो-सुननिहार अछिए। लोक अपना मुँहमे ताला थोड़े लगा लेत आकि काने केना मुइन लेत। सेहो तँ चलिते रहत। यएह ने भेल दुनियाँक तमाशा जइमे सभ केनिहारो छी आ देखनिहारो।[4]

लहसनक नायक मेवालाल ग्रामीण परिवेशमे रहनिहार एकटा सरल व्यक्ति छथि। ओ कलकत्तासन महानगरक छल-प्रपंचसँ भरल जिनगीसँ अनभिज्ञ रहथि। असलमे महानगरोमे दू तरहक जीवन एकहि संगे चलैत रहैत अछि। एकदिस सुसज्जित भवनसभमे रहनिहार संपन्न लोकसभ छथि तँ दोसर दिस मेवालाल सन मेहनतकश लोकसभ जे भोर खाइ छथि आ साँझक भोजन व्योंतमे भरि दिन यत्र-तत्र संघर्षरत रहैत छथि। साँझमे कतए जाथि, राति कतए बिताबथि तकरो कोनो ठेकान नहि। जाबे मेवालाल अपनेसन लोकसभक बीचमे रहैत छथि ताबे हुनका सामाजिक रूपसँ कोनो परेसानी नहि होइत छनि। मुदा जखने हुनका नीक नौकरी भेटि जाइत छनि, हुनकर सभकिछु बदलए लगैत अछि। ओ कंपनीक फ्लैटमे रहए लगैत छथि। ओहिठाम सुनीलपालसन सहरिआ लोकसँ हुनका दोस्ती होइत अछि। शुरुमे तँ हुनका ई दोस्ती बहुत नीक लगैत अछि। मुदा सुनीलपाल छल सातिर लोक। ओ मेवालालक पत्नी राधाकेँ पटा लैत अछि,ततबे नहि राधाकेँ अपनासंगे राखिओ लैत अछि आ मेवालाकेँ फुसला दैत अछि जेना ओ किछु जनिते नहि होथि। मेवालाक आँखि तखन खुजैत छनि जखन ओ राधाक संगे सुनीलपालकेँ कलकत्ताक बजारमे टहलैत देखि लैत छथि। तकरबाद ओ राधाकेँ फेरसँ प्राप्त करबाक हेतु न्यायालयक शरण लैत छथि। न्यायालय मेवालाक पक्षमे फैसला कए दैत छथि आ राधा फेरसँ मेवालाल लग आबि जाइत छथि। एहिठाम उपन्यासकार कानूनक व्यवस्थाकेँ मेवालालक पक्षमे करैत काल कानूनक प्रतिकूल जाइत देखाइत छथि। लगैत अछि जेना न्यायालय सेहो स्त्रीकेँ पुरुषक संपत्ति मानि लेलक, जे सही नहि भेल। जखन राधा स्वेच्छासँ सुनीलपालक संगे रहैत छलीह आ ओतए प्रसन्नो छलीह तखन मेवालाल राधाकेँ अपना संगे रहबाक हेतु बिवश नहि कए सकैत छलाह। मेवालाल राधासँ तलाक लए सकैत छलाह। मुदा एहि घनचक्करमे नहि पड़ि उपन्यासकार सोझ समाधान केलथि।

 ई उपन्यास हुनका लोकनिक हेतु एकटा मार्गदर्शकक काज कए सकैत अछि जे सहर गेलाक बाद आधुनिकताक प्रवाहमे अपनासन लोककेँ छोड़ि विशिष्ट बनबाक फिराकमे पैघ लोकसभसँ सटैत छथि आ ताहि क्रममे सभ किछु गमा लैत छथि। मिथिलाक अधिकांश लोक गुजर करबाक हेतु दिल्ली,पंजाब,कलकत्ता आ आन-आन सहरसभमे पसरि गेल छथि। कतेको गोटे तँ अरब चलि गेल छथि। किएक? तकर मूल कारण थिक अपना ओहिठाम रोजगारक अभाव।

जे किछु, मुदा एतबा तँ तय अछि जे एहि उपन्यासकेँ पढ़लासँ पाठक थोड़बे कालमे समाजक निम्नतम पौदानपर ठाढ़ लोकक जिनगीक बारेमे बहुत किछु बुझि सकैत छथि। किछु एहन करबाक प्रेरणा प्राप्त कए सकैत छथि जाहिसँ मेवालाल सन-सन गरीबलोकसभकेँ गाम छोड़ि कलकत्ता सन महानगर पलायन नहि करए पड़नि। एहिसँ प्रेरणा लए समाजक समृद्ध लोकनि किछु करथि जाहिसँ गाम-घरसँ पलायन बन्द होअए आ गाम एकबेर फेर पल्लवित-पुष्पित भए जाए।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com















[1] घसल अठन्नी, काशीकान्त मिश्र मधुपपृष्ठ संख्या- ....
[2] लहसन, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 95
[3] तत्रैव,                              पृष्ठ संख्या- 87-88
[4] तत्रैव,                              पृष्ठ संख्या- 78

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कोरोना का प्रकोप



कोरोना का प्रकोप



आज से छ महिने पूर्व सायद किसी ने कोरोना शब्द सुना भी नहीं होगा । एकाएक नबंबर-दिसंबर में चीन से कोरोनाका आगाज हुआ । तब भी अधिकांश लोग यही सोचते रहे कि मामला चीन का है और उधर ही सलट जाएगा । हम तो दूर-दूर तक उस से प्रभावित नहीं हो सकते  हैं । इसी सोच के कारण चीन में हो रहे व्यापक प्रसार के बाबजूद दुनिया के तमाम देश अपने-अपने देशों में इस विमारी से बचने के लिए किसी भी प्रकार से रक्षात्मक उपाय करते नहीं दिखे । सायद उन्हें कोरोना के विनाशकारी प्रभाव का ज्ञान नहीं हो सका था ।

इसमें कोई शक नहीं कि चीन तब तक भुक्तभोगी होने के कारण दुनिया का मार्गदर्शन कर सकता था और कोरोना के दुष्प्रभाव से अन्य देशों को बचा सकता  था । परंतु उसने ऐसा किया नहीं । ऐसा क्यों हुआ इसका उत्तर ढूंढ़ने मे सायद बहुत वक्त लगेगा । लेकिन इतना तो तय है कि चीन के इस नीति से दुनिया के तमाम देश आज विनाश के कगार पर खड़े दिख रहे हैं । दुनिया में आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न युरोप,अमेरिका सब के सब निरुपाय,हतप्रभ हो गए । तमाम प्रयासों के बाबजूद उनके हजारों नागरिक अकाल मृत्यु के  शिकार हो गए । पूरे विश्व में लाखों नागरिक कोरोना से अभी  भी संक्रमित हैं।

जब सारी दुनिया इस अज्ञात विमारी से इस तरह जूझ रहा हो तब हमारा देश इस से कबतक बच सकता था । यद्यपि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्रीजी ने समय रहते  अद्भुत दूरदर्शिता का परिचय देते हुए संपूर्ण देश में २१ दिनका लाकडाउन लगा दिया ,लेकिन इस व्रह्मास्त्र का लाभ जितना मिल सकता  था उतना होता नजर नहीं आ रहा है । दुनिया के तमाम देश और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माननीय मोदीजी द्वारा लिए गए कड़े कदम की सराहना की है । परंतु कुछ लोग हैं जो इस आपत्ति काल में भी बहरे-अंधे बने हुए हैं । इतना ही नहीं,कुछ लोग तो अपनी मूर्खतापूर्ण व्यवहार से इस घातक विमारी को बढ़ाने का काम कर रहे हैं । हद तो तब हो गई जब राजधानी में कुछ लोगों ने  जाने-अनजाने हजारों कोरोना मरीज उतपन्न कर उन्हें सारे देश में फैला दिया। परिणामतः देश के जो क्षेत्र संयोग से कोरोना से बचे हुए थे वे भी  इसके चपेट में आते हुए नजर आ रहे हैं ।

सोचने की जरुरत है कि आखिर प्रकृति ने कोरोना जैसे संकट का अविष्कार क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने लगातार  हो रहे वैज्ञानिक उपलव्धियों के घमंड में संपूर्ण प्रकृति को ही चुनौती दे डाला हो और यह संकट इसी का प्रतिफल हो? सायद प्रकृति कह रहा हो-देखा आपने तो बहुत उछल-कूद किया,चंद्रमा पर चले गए,मंगल ग्रह की परिक्रमा भी कर डाली,पृथ्वी पर तरह-तरह के औजार बनाकर तमाम प्राणियों के लिए संकट उतपन्न करते रहे,परंतु अब यह सब बेकार क्यों हो गया? एक मामुली सा वायरस संपूर्ण पृथ्वी पर हाहाकार मचा रखा है । क्या राजा,क्या रंक सब परेसान हैं । ब्रिटेन के प्रधान मंत्री से लेकर नोएडा के झुग्गी में रहने वाले मजदूर सभी प्राण बचाने में लगे हए हैं । अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशके राष्ट्रपति भारतके प्रधानमंत्री को गुहार लगा रहे हैं कि मलेरिया की दवाई दे दीजिए । बताइए यह सब क्यों हो रहा है? संभवतः प्रकृति यह शिक्षा दे रही है कि अब बहुत हो गया । कृपया अपनी जिंदगी बचाना चाहते हैं तो दूसरे जीव-जंतुओं को बक्स दीजिए । अपना घमंड छोड़िए । देखिए आप का जीवन कितना लघु है । पानी के एक बुलबुले की तरह आप भी आए-गए हो जाएंगे । कृपया प्रकृति माता द्वारा निर्मित अद्भुत संतुलन को मत बिगाड़िए। तभी आप सुखी और सुरक्षित रह पाएंगे ।

मनुष्य ने अपने वुद्धि के वल से नाना प्रकार के संसाधनों का अविष्कार किया है । तरह-तरह की विमारियों के इलाज हेतु अचूक दवाइओं का निर्माण भी किया है । यहाँ तक कि जरुरत पड़ने पर शरीर के अंग तक बदल दिए जाते हैं । पहले मामुली विमारियों से लोक मर जाते थे । क्रमशः कैंसर जैसे भयानक विमारियों का भी काफी हद तक इलाज संभव हो गया । इब सब कारणों से मनुष्य में घमंड आ गया कि वह जो चाहे कर सकता है । यहाँ तक कि प्रयोगशाला में इक्षित गुणों वाला मनुष्य उतपन्न कर लेने का प्रयोग भी होने लगा । इतना ही नहीं ,मनुष्य ने अपने सामर्थ्य के घमंड में तमाम जीव-जन्तुआओ का जीवन कठिन कर दिया । ऐसा लगने लगा जैसे इस पृथ्वी के समस्त वैभव पर उसका एकल अधिकार हो । कहते हैं कि चीन में तो किसी भी जानवर,पक्षी को नहीं छोड़ा जाता है । वहाँ के लोग चमगादर,साँप और पता नहीं क्या-क्या खा जाते हैं हैं । यहीं सबसे बड़ी भूल हो गई । वैज्ञानिकों का मत है कि चमगादरों के खाने से ही करोना वायरस का जन्म हुआ।

करोना वायरस कितना खतरनाक है ,यह अब सभी जानते हैं । दुनिया भर में हजारों लोक इस विमारी से अपनी जान गवाँ चुके हैं । लाखों लोग विमार हैं । शहर-के-शहर बंद कर दिए गए हैं । स्कूल,कालेज,कारखाना,न्यायालय सभी बंद कर दिए गए हैं । लोगों को अपने-अपने घरों में ही बंद रहने के लिए कहा गया है । निश्चय यह संपूर्ण मानवता के लिए एक इम्तहान का क्षण है । घरों में बंद लोगों का ऊब जाना स्वभाविक है । सबाल है कि लोग कबतक इस हालात में रह पाएंगे? लगातार चल रहे लाकडाउन से जरुरी सामानों का उत्पादन भी प्रभावित होगा । लोगों के क्रयशक्ति में ह्रास होगा । कहने का तात्पर्य यह है कि इस विमारी के चपेट में पड़े दुनियाके तमाम देश आज त्राहिमाम् कर रहे हैं । दुर्भाग्य की बात है कि तमाम कोशिशों के बाबजूद अपना देश भी इस महामारी का शिकार होता जा रहा है । इस विमारी से कुछ लोगों का जान बचा भी है,परंतु उससे कई गुना लोग अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज करबा रहे हैं ।

निश्चित रूप से सारी मानवता आज महान संकट से गुजर रही है । दुनिया भर में लाखों लोग विमार हैं । मनुष्य का सारा पुरुषार्थ कोरोना के आगे नतमस्तक है । अभी तक हजारों लोग अपनी जान गवाँ चुके हैं । यद्यपि दुनिया भर के वैज्ञानिक दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं कि इस विमारी से बचने का कुछ तरीका निकले परंतु अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है । आशा करते हैं कि जल्द ही इस विमारी का इलाज ढूंढ़ लिया जाएगा और पृथ्वी पर एक बार फिर से वही प्रसन्नता व्याप्त हो सकेगी जो कभी हुआ करती थी 

हर परजाय में जय की संभावना छिपी रहती है । सायद इसबार भी यही हो । लोक  इस परेशानी के दौर से निजात पा भी लें तो भी इन्हें सदा-सर्वदा के लिए एक सीख तो मिल ही जाएगी। वह यह कि प्रकृति से ज्यादा छेड़छाड़ उचित नहीं है । अगर प्रकृति का धैर्य टूटा तो पता नहीं क्या हो? संभवतः हम आगे चलकर प्रकृति को ज्यादा तरजीह दें और तमाम जीव -जन्तुओं के जीवन की रक्षा वैसे ही करना सीखें जैसा हम अपने लिए प्रयत्नशील हैं ।



लेखकःरबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...