सोमवार, 29 जनवरी 2018

यमलोकक दलबदलू




 


यमलोकक दलबदलू


ओहि दिन यमलोकमे जबरदस्त गहमा गहमी छल।भेल ई जे मृत्यु लोक सँ हालमे आएल बहुत रास लोक ओतए पहुँचलाक बाद जनतंत्र बहालीक मांग पर अडि गेल रहए। नित्य प्रतिक हंगामा सँ तंग भए यमराज यमलोकक नव संबिधानक  हेतु अध्यादेश जारी केलाह । तकर बाद मृत्यु लोकक तर्जपर चुनावक कार्यवाही प्रारंभ भेल।


जनप्रतिनिधि बनब कतेक कठिन बात थीक से भुक्तभोगिये कहि सकैत छथि। यद्यपि सत्तारूढ़ दलसँ लऽ कऽ विपक्षी धरिक सभ व्यक्ति अपन-अपन राष्ट्रप्रेम ओ सेवाक प्रति समर्पणक भावनाक चर्च करैत-करैत अपसियाँत रहैत छथि मुदा असलमे जे वो करैत छथि से जगजाहिर अछि। यैह सभ गप्प हम ओहि दिन सोचैत रही कि अखबारमे प्रतिनिधि सभा चुनावक समाचार निकललैक।

अखबारक समाचार देखिते एकबेर हमरा जेना करेन्ट जकाँ लागि गेल। कोना ने लागए। भुनेसरा देखिते-देखिते भुनेश्वर बाबू भए गेल..! बेटा डोनेशन दऽ कऽ मेडिकलक पढ़ाइ प्रारम्भ केने छल। स्कूलमे यश छलैक। माय मरि गेल रहैक तँ सौंसे गामक लोककेँ पुरी-जिलेबीक भोज खुओने छल। क्यो कनिको संकोच नहि केलखिन। सभठाम पुरी-जिलेबीक शोर, लहरि जकाँ लहरल। आखिर ई सभ कोना भेलैक?

असलमे जहियासँ चुनावक सिलसिला अयलैक तहियासँ कतेक घर बसि गेल। कतेको बेरोजगार सभ रातिये-राति पाइबला भए गेल ।इएह कारण थिक जे आब लोक जहाँ चुनावक हल्ला सुनैत अछि आकि टिकट लेबक हेतु एड़ी-चोटीक पसेना एक कऽ दैत अछि।

प्रतिनिधि सभाक चुनाव भेला एक मास भेल छलैक। कोनो पार्टीक स्पष्ट बहुमत नहि आयल छलैक। प्रधान बनय लेल बेस घमरथन भए रहल छलैक। यद्यपि पार्टी सभहक संख्या तँ ९ टा छल मुदा मूलत: तीनटा दलक सदस्य बेसी छलाह- कृषकदल, राष्ट्रवादी दल ओ जनवादी दल।

नव निर्वाचित सदस्यमे सँ कमसँ कम पचासटा सदस्य एहन छलाहजे कमसँ कम पाँच-सात बेर पार्टी बदलि चूकल छलाह। प्रतिनिधि सभामे कोनो दलकेँ स्पष्ट बहुमत नहि भेटलासँ हिनका सभहक लेल स्वर्णिम अवसर छलनि। नवका जनप्रतिनिधि सभ अपन-अपन भविष्य सुधारबाक हेतु बेस उत्सुक छलाह।

प्रमुख महोदयकेँ से बेस परेशानी छलनि। हुनका तीनू दलक नेता बेरा-बेरीसँ अपन-अपन समर्थनमे आधासँ अधिक सदस्यक सूची प्रस्तुत केने छलाह। तीनू सूचीमे पचासटा सिद्धहस्त दल बदलू आ पचीसटा नवका जनप्रतिनिधि केर नाम सामिल छल। प्रमुख महोदय भूतपूर्व इमानदार छलाह। मुदा जनताक हिसाब देखि कए रंग बदलि लेने छलाह। ओहो मामला नीकसँ बुझि रहल छलखिन। आखिर इमानदारीसँ होइते की छैक? नून रोटी चलि सकैत अछि। घरवाली कहथिन जे कहि नहि कोन करम केलहुँ जे अहाँक संग भेल।

जहियासँ प्रमुख महोदय अपन चालि-ढालि बदललाह तहियासँ दुनियाँ दोसर भए गेलनि। जेम्हरे देखू तेम्हरे लक्ष्मीक दर्शन। ई मौका हुनका हेतु स्वर्णिम अवसर छल। जनसेवाक व्रतधारी लोकनिक प्रथम अवतार भए रहल छल। प्रमुखजी तीनू नेतासँ गप्प-सप्प करबाक हेतु तिथि निर्धारित कए सूचित कए देलखिन आ अपने भूमिगत भए गेलाह।

जनवादी दलक नेता रातिक बारह बजे प्रमुखजीक पत्नीसँ भेँट करए गेलाह। दोसर-तेसर ओहिठाम क्यो नहि छल। सूटकेशसँ नोटक सभ गड्डी निकालि धराधर टेबुलपर राखि देलखिन।

ई थिक पुतोहुक मुँह देखाइ ।

फेर गप्प-सप आगा बढ़ल कहए लगलखिन-

जे राजनीतिक हाल-चाल तँ अहाँकेँ बूझले अछि। कृषकदल ओ राष्ट्रवादी दलक नेता सभ हमर पक्षक जनप्रतिनिधि सभकेँ फोरि रहल छथि। अहाँ प्रमुखजीकेँ हमर सिफारिश कए हमरा न्याय दिआउ।

प्रमुखजीक धर्म पत्नीजीकेँ तीनू लोक सुझि रहल छलनि, मुदा तैयो बजलीह-

अवश्य कहबनि। अहाँसँ बेसी योग्य, कर्मठ ओ इमानदार के भए सकैत अछि। प्रधानक पद तँ अहींकेँ भेटबाक चाही।

जनवादी नेता सहर्ष ओहिठामसँ विदा भेलाह। मुदा ओ समस्याक अन्त नहि छल। आखिर मास दिनक बादे सही, प्रतिनिधि सभाक सामना तँ करैक छलनि। तेँ कमसँ कम पचासटा आर जनप्रतिनिधि के अपनामे मिलायब जरूरी छलनि।

राता-राती ओ अपन विश्वासपात्र जनवादी नेताक सचिवक ओहिठाम पहुँचलाह। ओमहर कृषक दल ओ राष्ट्रवादी दलक लोक सभ सेहो बैसल नहि छलाह।  

राति भरि हुड़दंग होइत रहल। असलमे बीस-पच्चीसटा जनप्रतिनिधि कै गोटेसँ टाका लए लेने छलाह। तीनू नेता सोचथि जे ओ सभ हमरा संगे छथि मुदा असलमे वो सभ ककरो संगे रहथि नहि। ओ सभ चुनावमे खर्च भेल अपन पूँजी ऊपर करबाक हेतु अपसियाँत छलाह। मुदा प्रमुखजी सेहो आब घवरायल छलाह आ जनप्रतिनिधि लोकनिकेँ साफ कहलखिन-

जँ अहाँ लोकनि स्पष्ट स्थिति नहि उत्पन्न करब तँ हम यमलोक प्रतिनिधि सभाकेँ भंग करबा देब।

ई बात सुनि नवका जनप्रतिनिधि सभहक मनमे हड़बड़ी मचि गेल। ओ सभ गोटे जनवादी दलकेँ अपन समर्थन देबाक निर्णय प्रमुख महोदयकेँ अवगत करा देलखिन।

प्रात:काल जनवादी दलक नेता मंगनू बाबूकेँ प्रधान पदक हेतु सपथ कराओल गेल।

प्रात:काल सपथ ग्रहण समारोह प्रारम्भ भेल। मनोनीत प्रधानजी अपन जेबीमे सँ एकटा चिट निकालि कए अपन पी.ए.केँ देलखिन्ह। पी.ए. साहेब ओहि कागजकेँ प्रमुखक आप्त सचिवकेँ दय देलखिन।

ओम्हर जनप्रतिनिधि लोकनि मंत्री पद प्राप्तिक संभावनासँ अपसियाँत छलाह। किछुए कालमे घोषणा प्रारम्भ भेल। नवीन मंत्रीमण्डलमे तीस गोट कैबीनेट, बीसटा राज्यमंत्री ओ बीसटा उपमंत्रीक नामक घोषणा कएल गेल। एवम्-प्रकारेण प्रतिनिधि  सभाक एक तिहाइ सदस्य मंत्री बनि रहल छलाह। शेष सदस्यमे सँ सत्तापक्षक समर्थक जनप्रतिनिधिकेँ कोनो-ने-कोने पद अवश्य देबाक स्पष्ट आभास भेटि गेल छलनि। प्रमुख निकेतन खचाखच भरल छल। सपथ ग्रहण समाप्त होमय पर छल कि सत्तापक्षक एकटा जनप्रतिनिधि गरजि उठला- 

मंत्री पदक हेतु चयनमे पक्षपात कएल गेल अछि! आदि-आदि...। प्रधानजी मुड़ी उठेलाह आ इशारासँ किछु कहलखिन।

प्रधान विक्षुब्ध जनप्रतिनिधि सभक गुप्त बैठक कए रहल छलाह। रात्रिमे बारह बजे मीटिंग शुरू भेल से प्रात: छह बजेमे सम्पन्न भेल। बैठकमे पचासटा जनप्रतिनिधि छलाह जे कहैत गेलाह जे जौं अहाँ अपन बात नहि राखब तँ हमहूँ सभ अपन बात बदलबाक हेतु मजबूर भए जायब। 

हारि कऽ प्रधानजी ओहिमे सँ पन्द्रह गोटेकेँ विभिन्न कैबिनेट मंत्रीक दर्जा संगे अपन-अपन जिलाक प्रशासनिक मुखिया सेहो बनाओल गेल। सभा विसर्जित भेल। 

ओमहर कृषक दल आ राष्ट्रवादी दलक नेता जनवादी दलक नेताकेँ प्रधान पदक सपथ केर विरोधमे राज्यव्यापी हड़ताल कए देलन्हि। कानून/ व्यवस्थाक गम्भीर समस्या उत्पन्न भए गेल। असलमे दुनू नेताकेँ प्रधान पद छुटि जयबाक आक्रोश तँ छलनिहे। सभसँ बेसी कष्टक गप्प छल जे हुनका लोकनिकेँ गम्भीर आर्थिक क्षतिसँ सामना करए पड़ल छलनि। पचासो जनप्रतिनिधि तीनू नेतासँ यथेष्ट पाई टानि लेने छलाह। प्रधानकेँ अपन कुर्सी बचायब पराभव भए रहल छलनि। प्रमुखक खिलाफ दुनू विरोधी दल यमलोक भरिमे गम्भीर हड़ताल कए देने छलैक। स्थिति सम्हरने नहि सम्हरि रहल छलैक। अन्ततोगत्वा प्रधानजी विरोधी दलक नेता सभसँ गोपनीय बैसार करबाक निर्णय केलनि।

दोसर दिन विरोधी नेतासभ एक-एक कऽ प्रधानजीसँ फराक-फराक भेँट करए लगलाह। पाँचटा छोट-मोट नेताकेँ शान्त केलनि। मुदा कृषक दल ओ राष्ट्रीय दलक नेता किछु सुनबाक हेतु तैयार नहि छलाह।

अन्ततोगत्वा प्रधानजी कृषक दलक नेताकेँ विपक्षक नेता बनयबाक घोषणा केलनि। हुनको कैबिनेट मंत्रीक दर्जा देल गेल। संगहि राष्ट्रवादी दलक नेताकेँ प्रतिनिधि  सभाक उप-सभापति बनयबाक निर्णय कएल गेल। दुनू नेताकेँ पॉंच-पाँच कड़ोर रूपया अपन-अपन जिलाक बिकासक नामपर खर्च करबाक अधिकार देल गेल।

एवम्-प्रकारेण मंत्रीमण्डलक कृयाकलाप प्रारम्भ भेल। प्रमुख महोदय सहित जनप्रतिनिधि लोकनिके हरियरी आबि गेल । प्रतिनिधि  सभाक अधिवेशन प्रारम्भ भेल। कतेको नव गोटे एहि बेरक अधिवेशनमे देखबामे आबि रहल छल। सदस्य सभकेँ सपथ दिआवोल गेल आ तकर बाद प्रमुख महोदयक भाषण भेल। यमलोकक अगिला वर्षक बजट केर प्रस्ताव प्रस्तुत कएल गेल। एतवा कार्यक्रम भेल छल कि विपक्षी नेता सभ वर्तमानमंत्री मण्डलमे अपन अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत केलनि। प्रतिनिधिसभामे जबरदस्त हंगामा होमय लागल। हंगामा नियंत्रणसँ बाहर भए गेल आ अध्यक्षकेँ प्रतिनिधिसभाक कार्यवाही स्थगित कए देबय पड़ल।

ओमहर विपक्षक नेता अपन चेला-चाटीक संगे सभाअध्यक्षक निर्णायक विरूद्ध प्रतिनिधिसभासँ वहिगर्मन कए देल।

यमलोकक राजनीतिक स्थिति कहुना ठहरिये ने रहल छल। प्रधानजी परेशान छलाह। प्रतिपक्षक नेता सभ यमलोकमे हड़तालक आह्वान कए देने छलाह। मुदा प्रधानजी कोनो कीमतपर कुर्सी छोड़बाक हेतु तैयार नहि छलाह। दोसर दिन प्रतिनिधि  सभाक सत्र फेर प्रारम्भ भेल आ सत्ता पक्ष ओ प्रतिपक्षक नेता एवम् सदस्य लोकनि हंगामा करएपर अडल छलाह। प्रधानजी जतबोकेँ मंत्री बना सकलाह ततबो लोक गड़बड़ी नहि करताह तकर कोनो ठेकान नहि छल। शेष लोकनिक कहब मुश्किल।

 ओहि दिन सेहो प्रतिनिधि  सभाक बैठक स्थगित भए गेल। एवम्-प्रकारेण प्रधानजी पाँच-साट दिन काटि लेलाह। ताधरि अनेको उद्योगसँ मंत्रीमण्डलक गठनमेजे आर्थिक दबाब पड़लनिसे आपस भए गेल छलनि। विपक्षक सदस्य सभ प्रमुखजीकेँ विज्ञापन-पर-विज्ञापन दैत छलाह जे प्रतिनिधि  सभाक अधिवेशन शीघ्र बजाओल जाय। अन्ततोगत्वा प्रमुखजी प्रधानजीकेँ बजा कऽ साफ कहलखिन जे अहाँ सात दिनक भीतर प्रतिनिधिसभामे अपन बहुमत सिद्ध करू अन्यथा अहाँक कुर्सी चलि जायत।

प्रधानजी अपसियाँत छलाह। नवका जनप्रतिनिधि-क गुटक कोनो भरोस नहि छलनि। मुदा झख मारि कऽ प्रतिनिधिसभामे विश्वास प्रस्ताव रखलाह। निर्णय भेल जे काल्हि एहिपर मतदान होएत। विपक्षक सदस्य सभ हर्षसँ थपड़ी पीटए लगलाह। 

राति भरि क्यो जनप्रतिनिधि सुतल नहि। प्रात:काल दस बजे प्रतिनिधि  सभाक बैठक प्रारम्भ भेल। सभाअध्यक्ष महोदय आशनपर विराजमान भेलाह। मत विभाजनक घन्टी बाजल। गुप्त मतदानक व्यवस्था छल। आधासँ अधिक सदस्य प्रधानक विरोधमे मतदान कए देलाह। सभाअध्यक्ष एहि निर्णयक घोषणा कए देल। प्रधान दल बदलक गम्भीर शिकार भए गेल छलाह। मुदा ई सभ कोना भेल से नहि कहल जा सकैत अछि।

प्रधानजी अपन त्याग पत्र प्रमुखजीकेँ दय देलखिन। मास दिनक भीतर एकबेर फेर नवीन मंत्रीमण्डलक गठनक तैयारी जोर-सोरसँ प्रारम्भ भेल। मुदा आब जनप्रतिनिधि सभ सेहो चितिंत छलाह। प्रतिनिधि सभाभंग होयबाक समाचार जोर-सोरसँ चारूकात पसरि गेल छल। प्रमुखजी सेहो सख्त रूखि अपनौने छलाह। तेँ हेतु सभक मत भए गेल छलैक जे एकटा ठोस मंत्रीमण्डल बनाओल जाय।

राष्ट्रवादी ओ कृषक दलक नेता आपसमे बन्द कोठरीमे बैसार केलाह। तय ई भेल जे कृषक दलक नेता प्रधान बनताह। मंत्रीमण्डलमे दूटा उपप्रधान हेताह। एकटा उपप्रधान राष्ट्रवादी दलक हेताह आ दोसरनव जनप्रतिनिधि गुटक नेता...। येन-केन प्रकारेण नव मंत्रीमण्डलक गठन भेल। जनप्रतिनिधि लोकनि आश्वस्त भेलाह जे जनसेवाक आब नीक अवसर हुनका सभहक हाथसँ नहि सरकतनि। प्रतिनिधि  सभामे एहि मंत्रीमण्डलकेँ विश्वास सेहो प्राप्त भए गेलैक। किछु दिन दोबारा यमलोकमे अमन चैन स्थापित भए गेल।

आखिर यमलोकमे जनतंत्र बहाल भए गेल।

रविवार, 28 जनवरी 2018

The gold coins


The gold coins

I was lone child of my parents. They had little education. They had no regular job and were dependent entirely upon agricultural income The land was fertile but there was no proper arrangement for irrigation and people were dependent on nature. Moreover, the income from cultivation was uncertain and needed initial investment which was a problem. The condition of the farmers was not good in general. The problem compounded when there was no rain or there was, too, much of it followed by flood and other natural calamities.

My parents sent me to the village school for primary classes. I was a brilliant student from the outset.  I always stood first in my classes. I attracted attention of my teachers. The Principal of the school, too, started taking interest in me. I got many rewards in recognition of outstanding performance in the school as well as extracurricular activities. I passed fifth class examinations in the first division and also topped in the school as I had obtained the highest marks in the entire school. Despite the fact that I was a brilliant student my family was extremely worried mainly because they did not have adequate means to support me. There was no school for higher classes in the village. The nearest school was about six kilometres away from the village. Even that school was only up to the class eight. The High School was located in the district headquarter about 10 kilometres away from the village.

One day while my father was sleeping, he heard Devi Saraswati stating:

“Ramanand! You need not worry about your son. He is very lucky. He would bring good name to your entire family. Pl open the box which is lying near your outer gate. You would find there everything that you need. Then Devi

Saraswati started further telling me: “Your son was a great saint in his previous birth. He was a great scholar but he died prematurely due to an accident. He would recover his memory soon. “I just got up to find none. I told everything to my wife. She  was immensely surprised.

Soon after getting from the sleep I rushed towards the gate of my house. There was nothing as such. Then I tried to look left and right but nothing could be noticed. I was disappointed. I heard similarly the next night while I was sleeping. This time I even saw the hidden treasure which was lying in a small bag.

Next day my father got up as usual. There was nothing new which could have invited anybody`s attention. But he saw something below the tree in front of our house. He ran towards that. In the meantime, a dog appeared on the scene and took away the small bag in his mouth.

My father ran after the dog. On seeing me running many villagers, too, started running. Gradually the whole village was running. The dog was ultimately surrounded by the villagers. The dog left the small bag it was carrying in its mouth on the nearby land.

The police had got alerted on seeing the whole villagers running and picked up the small bag left by the dog. In the meantime, the dog vanished from the scene. The police tried to open the bag but it had nothing. They, therefore, threw it on the road. The villagers ,too, scattered here and there.

 In the meantime, my father heard the voice again directing him to pick up the bag which was lying unattended on the road. He did accordingly. He was surprised to listen beautiful music coming from inside the bag. He also noticed some gold coins lying in it. He picked up the coins and threw the bag on the road.

My father reached the house with the gold coins. My mother was very happy. She was very keen to know the details. My father told her the entire story. She was, however, disappointed to know about loss of the bag. According to her the bag was mystical and would have brought us prosperity and happiness. But what could have been done now.

My father nevertheless tried to get back the bag. He went to the same place where he had thrown the bag but could not see anything. Soon, he heard a roaring sound warning him to leave the place at once as he had done a great sin by not obeying the message of God. My father got afraid and left the place.

Anyway, my father got few gold coins which helped us to arrange for immediate requirements. I got myself admitted in the High School located in the district town. The expenditure was arranged by selling the gold coins.

I passed the Intermediate examination in Science getting the highest marks in the entire board. I was awarded certificate of merit and also a monthly scholarship. I cleared the entrance examination in the very first attempt. I got admission in B Tech course in the subject and college of my choice. But arranging money for admission was a big problem.

One day while I was moving alone in the IIT Campus I met with the admission in -charge Dr Devan. He at once recognised me as he had seen my picture in the newspaper. He asked me about my future planning. I told him about my problems. He immediately offered to bear the entire cost of admission. Besides he also promised to help me in future.

While at the college I worked very hard. I cleared all the tests of my engineering course in the first attempt with excellent marks. It increased my self-confidence. I became a known face among the students.

I got B. TECH degree from IIT with full support of my teacher who kept his words and gave enough money every month so that I could manage my requirements peacefully and could concentrate on my studies.

I got many campus placements. Ultimately, I decided to join the London based company which offered me the highest salary package. Within a year  I purchased a house in a posh locality of London. With the growing income my life style changed completely.

While studying at the IIT, I had developed intimacy with my fellow student Nilima. She had been helping me whenever I needed it. She was doing well in her examinations and got good placement along with me. Luckily, she, too, got posted in London. We remained in touch during our stay there. Our intimacy grew with time. We, therefore, decided to marry. Our parents were happy to bless us and  had readily agreed to our proposal. Our marriage was a simple affair. We decided to make it a purely private affair. Besides our parents only a few personal friends were present.

Both of us started living happily in our own house. It was very conveniently located. Our offices were at walking distance. So, we used to have our lunch there. The house approved very auspicious to us. We had to kids while living in the house. We were both holding very high position in our companies. We were now economically sound and wanted to do something for our motherland.

 As planned, we returned to Mumbai. There we met with Dr Dewan, our teacher in the IIT.I told him about my planning to do something to repay my indebt to him and also to the motherland. He was very glad to know this. He said that the best way to repay him would be to help the poor and needy students who are unable to take up higher education due to financial constraints. The advice of Dr Dewan worked well. Both of us decided to return to India. We resigned from our jobs, sold our house in London and returned Mumbai with determination to follow his instructions.

On return to Mumbai we set up an institution for free coaching of the meritorious but poor students of the locality. They were provided all the facilities including books, notes and even fee for the entrance examination. Our efforts have blessed many poor and needy students. So far more than five hundred poor students trained by our coaching institute have got degree from IIT.

Years have passed since we returned to Mumbai after resigning our lucrative jobs at London. We feel lot of satisfaction and internal happiness which we never got from the gold coins which we earned during our days in London.


शनिवार, 27 जनवरी 2018

पुनर्मुषिकोभव




 


पुनर्मुषिकोभव


की करी किछु फुरा नहि रहल अछि...! प्रेसबला सभ पाछू पड़ि गेल अछि। जतए जाउ ओतहि ई सभ पहुँचि जाएत। आखिर हमरो निजी जिनगी अछि।मुख्यमंत्रीजी बाजि उठलाह। पुन: अपन प्रेस सचिवकेँ बजौलखिन-

मिस्टर सिंह। अहाँ एकटा विज्ञप्ति अखबारमे प्रकाशित करबा दियौक जे प्रेसक आदमी मुख्यमंत्रीसँ सम्बन्धित ओही समाचारकेँ प्रकाशित कराबथि जे हुनकर सरकारी कारोबारसँ सम्बद्ध होइक आ जकरा छापब जनताक हेतु नितान्त आवश्यक होइक। संगहि ईहो समाचार प्रकाशित करबाओल जाएजे हमर व्यक्तिगत कृया कलाप छापए बला समाचार पत्र ओ सभ व्यक्तिक विरूद्ध कार्रवाई कएल जाएत।

उत्तरमे प्रेस सचिव बाजि उठलाह-

ठीक सर। ठीक। प्रेस बला सभकेँ कहि नहि की भए गेल छैक। एकरा सभकेँ सबक सीखेनाइ बेस जरूरी थिक। हम आइए ई विज्ञप्ति प्रकाशित करबा दैत छियैक।

हद भए गेल! कहि नहि, प्रेसबला सभकेँ की भए गेलैक अछि।

अहीं कहू अपना सभमे बलिदान देबाक तँ पुरान प्रथा छैक आ ताहि बातकेँ लऽ कए प्रेसबला सभ छापि देलकै अछि आ सौंसे देशमे हरविर्ड़ो मचि गेल। जे मुख्यमंत्री डॉ. तिवारीजी अपन कुर्सी बचयबाक हेतु छागरक सोनितसँ स्नान कएलन्हि अछि। लगैत अछि जे प्रेसबला सभकेँ सबक सीखबहि पड़त। मुदा कोना? अच्छा काल्हि एहि विषयपर बिस्तारसँ विचार- विमर्श कएल जयतैक।

मैडम। प्रेस विल तँ अहींक आज्ञासँ लगाओल गेल।

मुदा जाहि तरहक विरोध एकर भए रहल अछि से तँ अप्रत्याशित अछि। लगैत अछि हमरा नव मुख्यमंत्रीक नियुक्ति करहि पड़त।

नहि, नहि। एना नहि करी। हम तँ अहाँक शरणमे सदिखन रहलहुँ अछि। कही तँ एहि विलकेँ आपस लएली?”

हँ, से भए सकैत अछि, मुदा एकर बादो हम ई आश्वासन नहि दए सकैत छी। अच्छा, फेर गप्प कएल जेतैक।

-क्यो महिला स्वर एतबा कहि कए टेलीफोन काटि देने छल। एकर बादे माननीय भूतपूर्व मुख्यमंत्रीजीक निन्न उपटि गेलनि। सभटा बीतल गप्प सीनेमाक रील जकाँ सपनामे देखार भए रहल छलनि। असलमे हुनकर कुर्सीसँ हटब एकटा तेहन मार्मिक प्रसंग छल जे हुनका निरंतर ओझरौने रहैत छल।

ओना जहिआसँ ओ मुख्यमंत्री भेलाह तहिएसँ हुनका भयावह स्वप्न सभ आबए लागल छलनि। विपक्षी दलक नाकेबन्दी मजबूत भए गेल छलनि आ सत्तादलमे सेहो कै गूट भए गेल छल मुदा साहसक बले ओ आगा बढ़ैत जाइत छलाह।अचानक गाड़ीक पहिया घसैत देखलनि तँ वो ओकरा उखारबाक कोनो कम प्रयास केलनि से बात नहि मुदा भावी प्रवल।

कर्णोक रथ तँ एहिना धसि गेल रहनि। बेस संक्रमण कालमे ओ जहाँ ने लड़ाइमे आगू बढ़लाह कि रथक पहिआ धसए लागल। ठीक एकदम वैह हाल माननीय भूतपूर्व मुख्यमंत्रीजीकेँ भेलनि।

भए सकैय जे हमर गप्प अहाँकेँ तीत लगैता हो आ जँ मैथिलवृन्द छी तँ हमर गप्प अनुचितो लागत जे एकटा मैथिल मुख्यमंत्रीक प्रति सेहो जखन ओ सत्ताच्युत भए गेलाह एहि तरहक आरोप, प्रत्यारोप मिथिलाक संस्कृतिक अनुकूल नहि थिक। मुदा मैथिलवृन्द, अपने लोकनि भावुक नहि होइ। माननीय भू.पू. मुख्यमंत्रीजी कुर्सी बचयबाक हेतु कोन कुकर्म छोड़लाह। अपन नामक नियोजन कराए एकटा आधुनिक परिवार सन छोट कए देल जा ऊर्दू भाषाकेँ कपारपर चढ़ा गामे-गामे ऊर्दू भाषाक पढ़ौनीक हेतु किछु कसरि नहि उठा कए राखल आ ताहूसँ नहि मोन मानलकनि तँ आकाशवाणी दरभंगासँ मैथिली-कार्यक्रममे हिन्दीकेँ सन्न्हिआ देल। एहिसँ बेसी मैथिल प्रेमी सचमुच के भए सकैत अछि?

कहबी छैक जे ने दौड़ चली ने ठेसि खसी। मुदा मुख्यमंत्रीजीकेँ ई गप्प के बुझेतनि। ओहि दिन अखबार पढ़ैत छलियैक तँ एकटा बेस नमगर अपील पढ़लहुँ। धूर्तताक चरमसीमा छल । मैथिलीमे समाचार पत्र निकालताह।

यौ महामहोपाध्यायजी। अपनेकेँ ई बुद्धि किछु दिन पूर्व किएक नहि भेल? की अहाँ मैथिल जनताकेँ ओतेक मुर्ख बुझि रहल छियैक जे अहाँ ओकरा भुतिएने फिरिऐक। एकदम नहि। आब जमाना बदललै। मुदा अहाँक निराशाक प्रति सहानुभूति तँ अछिए। खैर, देर अयलहुँ दुरुस्त अयलहुँ। मुदा ई तँ कहू जे ओहि समाचार पत्रमे की की खबरि छपतैक? मुख्यमंत्री पदक पुन: प्राप्तिक हेतु जँ अहाँ कोनो यज्ञ करबैक तँ ओकरा प्रमुखतासँ छपबैक वा नहि? उमेद अछि जे एहिबेर ओ समाचार मैथिलीमे प्रकाशित समाचार पत्रक मुख्य पृष्ठपर अपने छापब।

ओहि दिन गाममे बैसार रहैक। नवतुरिआ सभ मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेस आन्दोलन केने छलाह। माननीय भू.पू. मुख्यमंत्रीजी प्रमुख वक्ता छलाह। वो बाजक लेल ठाढ़े छलाह कि क्यो दौड़ल आएल। कहलक-

दिल्लीसँ फोन आएल अछि।

ओ मंचपरसँ धड़फड़ाइत उतरए लगलाह ओ एही क्रममे लूढ़कियो गेलाह। फेर वैह नारी स्वर। फेर वैह हतप्रभ भू.पू. मुख्यमंत्री...।

एमहर बैसारीमे हल्ला छलैकजे भू.पू. मुख्यमंत्रीजी मिथिला राज्यक घोषणा करताह। मुदा कहि नहि किएक, सम्भवत: ओहि अप्रत्याशित फोनक कारणसँ मिटिंगक कर्यवाहीपर गम्भीर प्रभाव पड़ल आ मिटिंग साधारण भाषणक बाद स्थगित भए गेल।

ओहि दिनुका मिटिंगक बाद भू.पू. मुख्यमंत्रीजी बहुत दिन धरि चुप रहलाह। पछिला महिना साँझक एक दिन समाचार पत्र पढ़ैत छलहुँ। मुख्य पृष्ठपर समाचार छपल छल। ओकर किछु महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत अछि-



दिनांक २ मई सन् १९७६  

आई मुकुल गाँधी पटना अयलाह। परम सन्तोष अछि जे हम हुनका प्रशन्न कए सकलहुँ। वो प्रधानमंत्रीक दहिना हाथ छथि। ओना हमर प्रतिद्वन्दी लोकनि हमरापर लागल छथि मुदा जाधरि मुकुल गॉंधी हमरापर नहि विगरताह ताधरि क्यो किछु नहि कए सकैत छथि। तेँ हुनका प्रशन्न करबाक हेतु जान लगा दो।



दिनांक १२ सिदम्बर १९८१

किछु मैथिल आएल छलाह। मैथिलीक अधिकार हेतु छलाह। आखिर मैथिलीक की महत्व अछि? हमरा ई सभ तँ एकदम नीक नहि लगैत अछि, मुदा कएल की जाय। व्यक्तिगत हमरा मैथिल, मैथिलीसँ कोनो लगाव नहि अछि। हँ, जँ क्यो अपन सम्बन्धी होथि वा दोस्त-महिम होथि तँ तिनका नीक-सँ-नीक पद दियावी आ मदतिओ करी। मैथिली, मैथिली चिचिएलासँ की होयत?





१४ अक्टुबर १९८२

बिहार बेस विवादास्पद राज्य अछि। मोन तँ होइए जे एहि पदकेँ छोड़ि जा कए आराम करी, वा पुन: अपन पहिलुका पेशामे लागि जाइ। मुदा एतेक आमदनी छैक एहि काजमे जे शिक्षकक काजमे सातो जन्ममे नहि भए सकैत अछि। प्रेसबला सभ पाछू पड़ि गेल अछि। की करी बुझा नहि रहल अछि?



१ जनवरी १९८४

देखा चाही नवीन वर्ष की की रंग लबैत अछि। मुख्यमंत्री पदसँ हटलाक बाद तीव्र वैराग्य भए रहल अछि। खने मोन करैत अछि जे राजनीतिसँ सन्यास लऽ ली। खने मन करैत अछि जे युद्वाय कृत निश्चयक पुनरावृत्ति कए दी। मिथलाराज्यक विचार मोनमे घुरिआ रहल अछि। मुदा मैथिलो सभ तँ हमरासँ उचटले छथि। एकटा उपाय सुझि रहल अछि। मैथिलीक प्रचारमे पदयात्रा किछु सज्जन चला रहल छथि। हुनके संग धरी। गामे-गाम मैथिलीक नामे हमरो प्रचार भइए जाएत। सुनबामे आएल अछि जे महिषीमे एकटा बड़ सिद्ध तांत्रिक छथि। हुनकोसँ किछु परामर्श करब। आगा जगदम्बाक ईच्छा। देखा चाही छुटल राज पलटैत अछि कि नहि...।  



कै दिनसँ थाकल-झमारल भू.पू. मुख्यमंत्रीजी ओहि दिन दुपहरियामे कनेके आँखि मुनने छलाह कि सपनाए लगलाह। साक्षात् महिषासुर मर्दिनी कत्ता लए घुमि रहल छलीह। शत्रुक संहार करैत छलीह। नवका मुख्यमंत्रीक नाशक हेतु षडयंत्र जोर-सोरसँ चलि रहल छल। मिथिलाराज्य दलक जनतामे भारी प्रचार भए गेल छल। जतहि देखू ततहि भू.पू. मुख्यमंत्रीजीक स्वागतमे स्वागतद्वार सभ बनल छल जाहिपर बड़का-बड़का बैनरमे लिखल छल-

मिथिला नरेशक स्वागत हो!”



मैथिलीक प्रचार खूब भेलैक। भू.पू. मुख्यमंत्रीजीक नामक नागारा चारूकात बाजि रहल अछि। चुनाव घोषणा भए गेलैक। बड़का-बड़का उद्योगपति सभ अपन भविष्यक उमेदपर पर्याप्त चन्दा दए रहल छथि। एहि सबहक परिणामो बहरेलैक आ हम पुनश्च मुख्यमंत्री भए गेलहुँ। सपथ प्रहण समारोहमे किछु मैथिल सभ उपद्रव करय चाहैत छलाह कि पुलिस लाठीचार्ज कए देलक...।

एतवहिमे भू्.पू. मुख्यमंत्रीजी सपनेमे गरजए लगलाह कि हुनक नीन्न खुजि गेल। उठलाह तँ वैह रामा वैह खटोला। पुनर्मुषिकोभव।

O

१६ अगस्त १९८४


गुरुवार, 25 जनवरी 2018

पढ़ू पूत चण्डी.......




 


पढ़ू पूत चण्डी


समय एक गतिसँ आगा बढ़ल जा रहल अछि। मुदा हम-अहाँ ओकर प्रवाहमे कहि नहि कतय पहुँचि जाइत छी। जेना कोनो तेज धारमे छोट-मोट कतेको वस्तु स्वत: दहाइत कहाँ-सँ-कहाँ पहुँचि जाइत अछि, वएह हाल एहि जिनगीक अछि। ओहि दिन हम बहुत समयक अन्तरालपर एक बेर फेर स्कूलक काते-काते जाइत रही। बहुत रास बच्चा सभ ओहिना विद्यालयक प्रांगणमे खेलाइत छल। मास्टर साहेब हाथमे एकटा डन्टा लऽ कऽ ठाढ़ छलाह कि एतबामे घण्टी घनघनायल आ विद्यार्थी सभहक हूँज स्कूलसँ बहराय लागल।

बीस-बाइस वर्ष पूर्व हमहूँ एहिना घण्टी बजैत देरी स्कूलसँ भगैत छलहुँ। एकटा मुक्तिबोध होइत छोट-छोट बच्चाकेँ देखि बहुत रास गप्प मोनमे आबि रहल छल। प्राय: एकरो सभहक भाय-बाप ओहिना आशा लगा कऽ स्कूल पठवैत हेतैक। भऽ सकैत अछि एहिमेसँ कए गोटा पढ़बो करैक। भऽ सकैत अछि कए गोटा आगा जाकऽ कोनो हाकिम भइयो जाइक। मुदा ताहिसँ ककरा की हैत? की ओकरो सभसँ फेर ओहिना लोककेँ निराश नहि होबय पड़तैक? की ओहो सभ ओहिना अपेक्षा ओ वास्तविकताक    क शमकशमे बिलाइत नहि रहत? तखन ई सभ किएक एतेक चक्कर काटि रहल अछि? वर्षो वर्ष धरि एहेन प्रयास वो संघर्ष किएक?  

मनुष्यक जिनगी होइते कतेकटा अछि? ओहूमे बीस-बाइस वर्ष बड़ीटा भाग भऽ जाइत अछि। वोहि बीचमे एकटा नव पीढ़ी समर्थ भऽ कऽ पूछय लगैत अछि-

अहाँ की केलहुँ? घूरतर बैसल प्राय: नित्य साँझमे गामक   कैटा बूढ़सभ आपसमे चर्चा करैत छलाह।

क्यो किछु, क्यो किछु कहैत। गप्प-सप्प बिबादक रुप धरैत आ अन्ततोगत्वा कहियो काल झंझटोक संभावना भए जाइत। सभसँ ढीठ ओ दबंग ठीठरकका पहलमान वो अपढ़ छलाह आ ओहि घूरक महफिलमे डंकाक चोटपर कहितथि-

पढ़ू पूत चण्डी जासे चले हण्डी।

सद्य: लाभमे पूर्ण आस्था छलन्हि। भोरमे बच्चा महिष चरौलक आ साँझमे एक डाबा गरम-गरम दूध। एहिसँ नीक शास्त्र की भऽ सकैत छल? सभ पढ़ाइ-लिखाइ व्यर्थ। कहिया पढ़त आ कहिया कमाएत...? मुदा, ओहीठाम हीरा कक्काक स्वर एकदम दोसर रंग छल। धिया-पुता पढ़त तँ विचारवान हैत आ सुखी रहत।

गाममे ओहि घूरक चर्चा चर्चित छल। दुनू गोटासँ साँझमे जँ बैसितथि तँ अपन-अपन दर्शनक अनुसार जरूर बजितथि आ परिणाममे विवाद होइत।

ठीठरकका दबंग ओ लठैत छलाह। जबरदस्त खेती-पथारी रहनि। धिया-पुता सभ बेस मोट-सोंट आ लंठ। सभ डटिकऽ खेतीमे लागल रहैत छल। परिवार सुखी छल। हुनका तुलनामे हीरा कक्काक हालत पातर छल। धिया-पुता सभ स्कूल-कॉलेजमे पढ़ि रहल छल। खेती-पथारी कोनो खास नहि। तेँ कखनोकाल ठीठर कक्काक कथन ठीक बुझाइत छलनि। मुदा दुनू गोटे अपन-अपन विचारपर दृढ़ छलाह।

हीराककाकेँ अपन धिया-पुताक बड़ आशा छलन्हि। आ तेँ अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ धिया-पुताकेँ शिक्षा व्यवस्थामे लागल रहैत छलाह।

समय बितैत गेल आ हुनकर सभ नेना सभ पढ़ि-लिखि यथायोग्य नीक-नीक स्थानपर पहुँचलाह। ओम्हर ठीठरक गृहस्ती दिन-प्रति-दिन गड़बड़ाइत गेल। वृद्धावस्थाक जोर पकड़ितहि पुत्र सभ आपसमे भिरैत रहैत छलाह। बात बिगड़ैत देखि वो सभकेँ फराक-फराक कऽ देलखिन। जमीन-जथा बँटि गेल। परिणामत: घरक प्रतिष्ठा सेहो छल।

बीस वर्षक बाद आइ ने हीरा बाबू छथि आ ने ठीठरकका। मुदा सुनबामे बहुत किछु आयल। ठीठरकका बड़ कष्टमे मरि गेलाह। बेटा सभ खेत-पथार बेचि लेलक आ पेट पोसबाक हेतु गामसँ पड़ा गेल। हीरा बाबू सेहो सुखी नहि भऽ सकलाह। धिया-पुता सभ बढ़लक-लिखलक जरूर मुदा सभ अपनामे व्यस्त। ककरो बूढ़ाक व्यथापर सोचबाक समय, इच्छा ओ सामर्थ्य नहि भेलैक। क्यो कलकत्ता तँ क्यो बम्बइ। पाँचो बेटा पाँचटा शहर धेने छलाह। सुनबामे ईहो आयल जे मझिला बेटा लखनउमे मकान बना लेलक अछि। हीरा बाबू ओहिना एसगर टकटक तकैत विदा भऽ गेलाह।

ओहि स्कूलमे मौलाना-जोलहाक बेटा सेहो हमरा सभहक संगे पढ़ैत छल। पढ़यमे सामान्य छल मुदा अत्यन्त सज्जन वो संवेदनशील। कै दिन गामसँ स्कूल जाइत काल वो भेटि जाइत। मुदा वो स्कूल नियमित नहि जाइत छल। कै दिन बाधमे ओकरा हम सभ हर जोतैत देखियैक। हँसियो लागय आ दुखो भऽ जाय। कहियो काल ओकर बाप सेहो भेटि जाइत, एकटा आग्रहक संग-

बौआ, माहटर साहेब बाबूसँ कहि देबै जे हमर बचबा आज नै जायत।

पुछिऐक-

किए?”

मुदा तकर जवाब ओ किछु नहि दितय। पनपिआइ गमछामे बन्हने हर जेातइत अपन बेटा दिसि इशारा करैत।

कै दिन हमरा संगे वो स्कूल जाइत। रास्तामे भेँट भऽ जाइत छल। गमछामे पाँच-छहटा किताब ओ किछु कॉपी बन्हने हमरा देखैत घरेसँ आबाज दैत-

हमहँ चलब। ठाढ़े रहब।

आबाज सुनि कए हम-सभ पाकरी गाछक तरमे सुस्ताय लगैत छलहुँ। स्कूल पहुँचि सभसँ पछिलका सीटपर वो बैसि जाइत छल। आ कै दिन तँ औसतन सभ घण्टीमे मारि खाइत रहैत छल। बिना कोनो आक्रोश आ प्रतिकृयाक कै दिन कहितिऐक-

एना मारि किएक खाइत रहैत छह! नीकसँ पढ़ाइ करह।

मुदा वो हमर-सभहक बात सुनि किछु-किछु अकाट्य तकैत दऽ दैत छल।

बहुत दिनक बाद ओकरा एक दिन चौकपर रिक्सा लगौने   देखलियैक। हमरा देखि ओकरा उत्साह भेलैक। प्राय: ओकरा भेलैक जे ई पसिंजरपर ओकरा बिशेष अधिकार छैक। एकबेर हमरा मोन भेल जे ओही रिक्सासँ चली मुदा आत्मा सिहरि गेल। हमर वो सहपाठी रिक्सा चलाओत आ हम ओहिपर बैसल रहब। आ हम कात भऽ गेल रही। किछुए कालक बाद ओकर बूढ़ बाप एक गठ्ठर कपड़ा लेने आयल। प्राय: हमरा नहि चिन्हि सकल। ओहि रिक्सापर गठ्ठर राखि बाप-बेटा मिलि कए बीड़ी पीबय लागल। समयक एतेक अन्तरालक बादो बाप-बेटाक स्नेह बनल छल। हमरे सभहक संगे किछु वरिष्ठ विद्यार्थी सभ सेहो स्कूल जाइत छलाह। जाहिमे सँ कै गोटा मैट्रिकमे चारि-पाँच बेर फेल कऽ कऽ क्रान्तिकारी भऽ गेल छलाह। गाममे छोटका लोक सभकेँ संगठित कएक ओ सभ महा उपद्रव ठाढ़ कऽ देने छल। कैटा पैघ गृहस्थक हर-जन बन्द भऽ गेल छल। पनिभरनी सभ आँगनमे काज नहि करत आ भरिआ भार लऽ कऽ नहि जायत। जकर घर जाहि जमीनपर छैक से तकर हेतैक। ई हेतै वो हेतै आ भऽ कऽ रहतै। दिन राति गाममे घोल-फचक्का होइत रहैत...।

सभसँ बड़का आफद बड़का मालिककेँ भेल रहनि। वो एकदम अपसेट भऽ गेल रहथि। दिन-राति हुनका ओहिठाम भण्डारा चलैत रहैत छल। इलाकाक पहलमान ओ लंठक जमघट रहैत छल।

समय बीतलाक संग-संग वो क्रान्तिकारी सभ शान्त भऽ गेलाह। अधिकांश कतहुँ-कतहुँ चाकरी कऽ रहल छलाह आ एकाधटा अकाल मृत्युक सेहो शिकार भए गेलाह।

बड़ीकाल बैसल यैह सभ सोचैत रही कि दिनेश भाई भेट भए गेलाह।ओ हीरा बाबूक जेठ भातिज छलाह आ अंतकालमे वैह बेचारेक सेवा केने रहथि। हीरा बाबूक छोट पुत्र टुना हमर सहपाठी छलाह। हुनके प्रति गप्प होमय लागल। कहलाह जे वो तँ बहुत दिनसँ लंदनमे रहैत अछि। बड़का हाकिम भऽ गेल अछि आ बहुत रास पैसा कमाइत अछि। मुदा कै वर्षसँ गाम नहि आयल अछि।

पुछलियनि-

हीराबाबूक काजमे आयल रहथि की नहि?”

नहि आयल रहथि।

छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। पुछलऐक-

किएक?”

कहि नहि! मुदा मृत्युसँ दू-तीन वर्ष पूर्व आयल छलाह। गाम डोलि गेल रहय। जाइतकाल बहुत रास टाका बापकेँ दैत रहथिन्ह मुदावो नहि लेलखिन्ह।

बिच्चेमे चौंकैत पुछल-

कारण?”

कहाँ दनि कहलखिन जे ई पैसा अहीं राखू। काज आओत। जाहि पैसाक कारण अहाँ एतेक दूर चल गेलहुँ, गाम-घर, माय-बाप ओ सभ किछु त्याग कऽ देलहुँ ताहि पैसाकेँ व्यर्थ हमरापर किएक नष्ट कऽ रहल छी। टुना तहिआसँ घुरि कऽ गाम नहि अयलाह।

मुदा ठीठर ककाकेँ की भेल?”

की कहूँ! सभ बेटा घर छोड़ि पड़ा गेल। करबो की करितैक। गामपर किछु नहि बाँचल रहैक। असगर ठीठर कका काहि कटैत रहैत छलाह। जेठकी पुतोहु थोड़-बहुत सेवा कऽ दैत छलखिन।

एकबेर फेर ठीठर कका भीमकाय ओ हुनक आप्त वाक्य मोन पड़ि गेल-

पढ़ू पूत चण्डी, जासै चलय हण्डी।

शरीरमे बड़ थाकान बुझि पड़ैत छल, कहि नहि कखन नीन्न आबि गेल।

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बुधवार, 24 जनवरी 2018

Tragedy in a hut










Tragedy in a hut

I am Rillo Devi. I am the sixth child of a labourer called Deva. My mother used to work at the house of the village headman. She would work there till late in the night and would return home with left over foods given by the landlords. She had to wait till late in night to get even that.

Deva used to work in the agricultural fields of the landlords of the village but they were reluctant to pay the wages. He had to struggle a lot to get his daily wages. Most of the time his children would sleep without food. Deva worked for the whole day but would return home empty hand. The landlords were cruel and would not listen to his humble requests to give him his wages which he earned so laboriously.

Whenever Deva raised the issue of payment of wages with his landlords, he was abused and forced to accept whatever they would give. Most of the wages earned by him used to be adjusted against the interest on loan which his grandfather had taken from the ancestors of the present landlord. Although the generations of Deva had worked free to    repay the loan but they could not be debt free as the   repayments were always adjusted only against the interests.

Deva was not in a position to negotiate with the landlord and had to accede to every demand of the landlord. Once his wife was seriously ill. He wanted money for her medical treatment but the landlord would not budge. He wanted him to put thumb impressions on the blank stamp paper which he ultimately did and received only Rs 20 out of Rs150 loan which was recorded in the document. Rest of the amount was adjusted against the previous loan and interest thereupon. Deva left the place with Rs 20 in his hand with burden to pay loan of Rs 150 and interest ever multiplying

His in-laws, too, were earning livelihood only by working in the agriculture field of the landlord of the village. His brothers and sisters numbering six, all used to leave home early and work similarly. That is how they were alive.

Thus, the entire village used to work as bonded labour. They were working year after year just to repay the loan taken by their forefathers. They were not free to select master by choice. They could not also say ‘No’ to work even when they were ill. They were just like tools in the hands of the rich.      

My parents married their children here and there so that they get rid of them. All of them started living separately with their husbands. Hardly anybody had any asset. Everybody was busy in earning livelihood by working with the village landlords. The only option was to die of starvation.     

When I came to live with my husband Ramu , there was hardly anything to eat .My husband looked at me with hope that he would be able to get both time meal from tomorrow onwards because the newly married were given full support. My husband knew the price for that.                 

Thus, life became easy for my husband after I arrived in his house. But the story was not to last long. One day while both of us were returning home, my husband was bite by a cobra. Before anybody could know anything, he became unconscious. Many persons gathered around. He collapsed before anybody could have understood anything.

At the time my husband died, I had one-year son. There was hardly any support. My landlords offered me both time meal for which I had to stay and work in his house hold for the whole day and late in the night.

I was very much upset with the attitude of the landlord. He was a great exploiter. He was often harsh with me. I did not like these things but had no choice.

Gradually I started living there itself. I was allotted room on the top floor where nobody else had the access except the landlord. It went all well till I was young. I grew older with time. The landlord lost interest in me and would not bother even for my food and essential requirements.

Thereafter we shifted to our old hut. But there was no work there. I had to live without food on many occasions. In that situation my only son, Ramu, came to my rescue. He started earning from his ancestral profession of barber.




Ramu was unmarried. I fixed his marriage in a local family. The bride was hardworking and beautiful. However, the marriage had to be postponed as he suffered from a paralytic attack about two years ago. He was unable to move out of his hut. No body helped him to get proper medical treatment. He was just 40 years and could have recovered if timely treatment was made available but nobody bothered. So many poor persons fall ill and die without proper medical treatment. Thus, the case if Ramu was nothing new.

I was BPL (below poverty line) card holder and was, therefore, entitled for 76 kilograms of grains every month. This month, too, I got the grain but had to   sell it for purchasing medicines for his ailing son. This left me without food to eat. I had none to help. Hardly anybody from the village would enquire from them about their condition.

They were without food several days. Ramu had grown weak. He  was unable to walk or talk. He got medicines for a few days at the cost of food which had to be sold.

I went to the landlord several times and requested him for help but he did not help and abused me instead. I had grown very weak and was not in a position to work. So, I requested him repeatedly but he had no mercy.

One day a VIP had come to inaugurate a village road. I also heard about it from a neighbour. I stayed along the roadside for the whole day so that I could meet the VIP. After waiting for about three hours I saw many policemen forming barricade along both sides of the village road. That followed arrival of a large number of cars. The VIP was sitting in the middle. I tried to approach him but was thrown out by a constable. Thus, my effort to contact the VIP could not succeed.

The VIP made a long speech over poverty eradication. He distributed free gifts to the poor villagers and had also assured full financial help to the needy for taking medical treatment. I could not guess why my name was not included in the list of the needy. With my adult son bedridden for months together, I had absolutely no financial support but that could not draw attention of the agents of the VIP who made selective approach in selecting the poor and needy persons.

The VIP meeting was attended among others by several local leaders. The meeting was followed by sumptuous lunch. There were many items of the menu which the participants could not even touch. The left-over foods were wasted as the locals who wanted to have it were not allowed to enter the place in the name of the security. These food wastes were thrown on the road side after the meeting was over and the VIPs left the village. This was height of cruelty because the hungry and poor villagers were denied access to this food waste.

Next day all the newspapers and television channels reported about generosity of the VIP and his love for the poor. He was projected as the best leader of the state who could be the great saviour of the poor and downtrodden.

That day his ailing son had a sleepless night. He had not been able to eat anything for several days. I wanted to sell my blanket but nobody was ready to buy even for a nominal price.

The only source of income for me was some money I would get on the occasion of marriage of the villager who used to donate me some money on such occasions but marriage was not a routine thing to happen. Only once in a while I would get such chance. So, this income was hardly enough to sustain life.

I got up early morning as usual to find that Ramu was motionless. He was unable to respond. I touched his body just to find that he was dead. I started weeping. Many villagers gathered around. Everybody was talking about us. Even local leaders who were so much busy that day had time to come to my house and express sympathy. The matter was soon reported by the press.

There was a rush of media persons near my hut. Everybody was keen to know the details so that they could send message to their media houses/newspapers. Next day the newspaper was filled with the news item: Mother ,82, watches son dies of hunger “It was a very pathetic story”. Everybody was worried about the tragedy.








Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...