सोमवार, 25 जनवरी 2021

इएह नियति छल !

इएह नियति छल !

 

हम जखन नौकरीमे गेलहुँ तँ शुरु-शुरुमे बहुत परेसानी होअए। ई नहि बूझल रहए जे एहि पेशामे सभकेँ डाँट-फाँट होइते रहैत अछि । केओ कतबो पैघ अधिकारी होथि,हिनका हुनकर वरिष्ठ कहिओ-ने-कहिओ कोनो-ने-कोनो त्रुटि पकड़ि किछु-ने-किछु कहबे करतिन । ई एहि पेशाक संस्कार थिक । तेँ एकरा बेसी ध्यान नहि देबाक छलैक। मुदा हम तँ अपन माता-पिताक बहुत दुलारु संतान रही । परिस्थितिवश एक्कैसम वर्षेसँ नौकरी करए लागल रही । जँ कोनो बातपर अधिकारी डाँटि देथि तँ बहुत कष्टमे पड़ि जाइ । गाम-घरसँ फटकी रहए पड़ए सेहो बहुत कष्टक कारण रहए ।

  हमरा शुरुमे नौकरी करबाक लूरि नहि रहए । अधिकारी,सहकर्मी आ अधीनस्थ कर्मचारी सभक संग अलग-अलग व्यवहार करब नहि बुझिऐक । क्रमशः एहि माहौलसँ समन्वय करब आबि गेल । तकरबाद नौकरी करब ओतेक मोसकिल नहि रहल । मुदा ताहि प्रयासमे व्यक्तित्वक मौलिकता सेहो क्षीण होइत गेल । सरकारी सेवामे तँ आदमीकेँ एकटा मसीन जकाँ बना देल जाइत अछि । एकर सभसँ नीक शिक्षा हमरा एकटा कार्यालयमे कार्यरत मालीसँ भेटल । ओकरा किछु कहिऐक तकर जबाब यस सरमे दैत छल । हम एकबेर पुछलिऐक जे ओ एना किएक करैत अछि । जबाबमे ओ कहलक जे ओकरा एकटा अधिकारी सिखा देने रहथिन जे सरकारी कार्यालयमे केओ किछु कहए तँ तकर उत्तरमे यस सर कहि देल करी । ओ सएह करए ।

जँ सेवानिवृत्तिक बाद भेल स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेटक नौकरीक अवधि जोड़ि देल जाए तँ हम  बिआलिस वर्ष नओ महिना सोलह दिन नौकरी केलहुँ , ओहो दूरभाष निरीक्षकक हेतु प्रशिक्षणक नओ महिना छोड़ि कए । एतेक समयमे कतेको तरहक नीक लोक -बेजाए लोक भेटैत रहलाह । कतेको लोक अएलाह-गेलाह । मुदा किछुगोटे जीवनमे तेना ने जुड़ि गेलाह जकर कल्पनो हम नहि केने रही । ओहिमे नगवासक श्री नारायण झाजी , पिंडारुछ गामक प्रोफेसर(डाक्टर) विनय कुमार चौधरीजी , ओहि समयमे गृह मंत्रालयमे कार्यरत दरभंगा लग पतोर गामक बासी मिसरजी(श्री रबीन्द्र नारायण मिश्र) ,इलाहाबादक श्री संजीव सिन्हा जी , आ न्याय विभागमे कार्यरत मुजफ्फरपुर लगक श्री मदन मोहन सिन्हाजी बिसरने नहि बिसरा सकैत छथि । बिना कोनो स्वार्थकेँ ई लोकनि जीवन भरि हमरा सभ तरहें सहयोग करैत रहलाह ।  एकरे कहल जा सकैत अछि पूर्वजन्मक संवंध । भए सकैत अछि जे ई लोकनि पहिलके जन्मसभसँ हमर अपन रहल होथि । ई घटना कोनो हमरे संगे भेल होएत से बात नहि छैक । सभ व्यक्तिक संग जीवनमे किछु-ने-किछु चमत्कार होइत अछि जकर व्याख्या करब मोसकिल थिक । हिनका लोकनिक अतिरिक्तो बहुत रास एहन लोकसभ संपर्कमे अएलाह जिनकासँ बहुत तरहक उपकार होइत रहल। ककर-ककर नाम लेल जाए । एहि पोथीमे प्रसंगवश एहने किछुगोटेक स्मरण भेल अछि । मुदा बहुतगोटेक बारेमे हम नहि लिखि सकलहुँ । तकर मूल कारण प्रकाशकीय समस्या कहि सकैत छी । मुदा तकर माने नहि जे ओ सभ कोनो मानेमे कम महत्वपुर्ण छलाह । अवसर अएलापर भविष्यमे हुनको लोकनिपर लिखवाक प्रयास कएल जाएत।

 जीवन चलिते अछि सहयोगसँ । एकटा मनुक्खक निर्माणमे कतेको लोकक योगदान रहैत अछि । माता-पिता तँ जन्म दैत छथि ,पालन-पोषण करैत छथि । मुदा संस्कार आ शिक्षा तँ समस्त समाजसँ भेटैत अछि । सभ वंदनीय छथि,प्रशंसाक पात्र छथि जिनका बिना एतेकटा समय नीकसँ बीतबाक कल्पनो नहि कएल जा सकैत छल। दुर्गामाताकेँ शत्रुसँ लड़बाक हेतु समस्त देवतालोकनि अपन-अपन अस्त्र -शस्त्र प्रदान केलनि । तकरबादे ओ युद्धमे उतरलीह आ विजयी भेलीह । तहिना एहि जीवन युद्दमे सफलताक पाछु छोट-पैघ अनेको लोकक योगदान रहैत अछि । जन्मसँ मृत्यु पर्यंत समाजक सहयोगक बिना केओ एकडेग नहि बढ़ि सकैत अछि । 

हमरा लोकनिक उच्च विद्यालय एकतारामे गणितक शिक्षक श्री जटाशंकर झाजीक ॠण कोना सधा सकैत छी जे हमरा गणितमे तेहन पक्का कए देलाह जे आगु कतेको वर्ष धरि हमरा फएदा करैत रहल । हमरा गामक कतेको लोकसभ(जे आब एहि लोकमे नहि छथि) हमरा निरंतर उत्साहित करैत रहलाह,कैकबेर मदति केलाह,तिनकर उपकारकेँ कोना बिसरल जा सकैत अछि । हमर पितिऔति काका स्वर्गीय पंडित चंद्रधर मिश्रजीक प्रेरणादायी विचारसँ हम कतेक उपकृत भेल छी तकर की वर्णन करू । बाबूक कैकटा संगीसभ जेना स्वर्गीय श्यामलाल यादव (अड़ेर,ब्रह्मोत्तरा),स्वर्गीय कृष्णदेव नारायण सिंह(एकतारा),स्वर्गीय मार्कंडेय भंडारी सभक अनेको उपकार हमरापर अछि । एही तरहें नौकरीक क्रममे कतेको प्रिय-अप्रिय घटनासँ बहुत शिक्षा भेटैत रहल । तकरासभकेँ कोना बिसरब? जहिना कतेको लोकसभ बिना कोनो लोभ-लालचकेँ हमरा मदति केलनि आ हमर जीवन यात्राकेँ सुगम बनबएमे सहयोगी भेलथि तहिना हमहु जतए मौका भेटए अनका मदति करी सएह सुंदर समाधान भए सकैत अछि। हम से प्रयास केबो केलहुँ । ओना हम ताहिमे कतेक सफल आ सही रहलहुँ से तँ ओएहसभ कहि सकैत छथि । मुदा अपना मोनमे संतोष तँ रहिते अछि  जे हमर परिस्थिति छल  ताहिमे जे जे जखन कएल जा सकैत छल से हम केलहुँ ।

जहिना किछुगोटे स्वतः मदति करैत रहलाह,तहिना किछुगोटे अकारण हमरा परेसान करैत रहलाह । अखनो कखनहु जखन बितलका बातसभ मोन पड़ैत अछि तँ रोमांच भए जाइत अछि । आखिर ओ सभ एनाकिएक केलाह? मुदा छोड़ू ओ बात सभ जीवन अछिए कतेकटा? जँ सएहसभ सोचैत रहि जाएब तँ सोचिते रहि जाएब । किछु नीक नहि कए सकब । नीक बनबाक लेल,नीक करबाक हेतु बहुत किछु छोड़ए पड़ैत अछि । ओहिना जेना श्वेत रंग सातो रंगकेँ छोड़ि कए सात्विकताक ग्रहण करैत अछि। मानलहुँ जे ई ओतेक आसान नहि छैक,तथापि एकटा उच्च आदर्श तँ मोनमे रखबेक चाही । तखने जीवनमे आनंद उठा सकैत छी ।

भोरे नओ बजेसँ साँझ छओ बजे धरि वा ओहूसँ बेसी समय लोकक कार्यालयमे बितैत अछि । ताहिसँ एक घंटा पहिने आ एकघंटा बादक समय कार्यालय आबए-जाएमे बितैत अछि । कार्यालय बिदा होबएसँ पहिने भोरे उठलाक बाद लोक नित्यकर्मसँ निवृत भए अपना आपकेँ कार्यालय जेबाक हेतु तैयार करैत अछि। कार्यालयसँ घर अएलाक बादो घंटा-दूघंटा धरि कार्यालयक थकान भगबएमे लागि जाइत अछि। कहक माने जे सोमसँ शुक्र दिन धरि कमसँ कम बारह घंटा समय कार्यालयमे वा ओकर तैयारीमे बिति जाइत अछि । एतेक थाकल-ठेहिआएल जखन लोक घर अबैत अछि तँ बेसी किछु करबाक स्थितिमे नहि रहि जाइत अछि । कनी-मनी परिवारक लोकसभ सँ गप्प-सप्प केलाक बाद लोक भोजन केलक आ सुतबाक हेतु चलि गेल । एहि तरहें पाँचदिन बितलाक बाद अबैत अछि शनिक दिन । ओहो तखन जखन कि पाँचदिनक कार्य दिवस होइक । जँ से नहि अछि तखन तँ बस सप्ताहमे एकहिटा दिन बचि जाइत अछि । मुदा आब अधिकांश कार्यालयमे पाँचदिन कार्यदिवस होइत छैक । तेँ लोक सप्ताहमे पाँचदिन काज केलाक बाद सप्ताहांत होबएबला छुट्टीक बहुत उत्सुकतासँ प्रतीक्षा करैत छथि । शनि-रविक दिन अपना हिसाबसँ सुतैत आ उठैत छथि । जतए मोन होइत छनि ,ओतए घुमैत छथि । माल-सीनेमा वा कोनो पर्यटन स्थल जाइत छथि । देखिते-देखिते फेर सोमक दिन आबि जाइत अछि । तकर बाद ओएह दैनिक कार्यक्रम शुरु भए जाइत अछि । ओहिना भोरे उठब,ओहिना समयपर कार्यालय पहुँचब । दिनभरि ओतए कुटौनी करब आ साँझमे थाक-झमारल वापस अपन घर आएब । एहि तरहे आइ-काल्हि करैत-करैत  कतेको वर्ष बिति गेल। कोन-कोन विभागसभ ने घुमैत रहलहुँ। अंततोगत्वा, सेवानिवृत्त भए गेलहुँ । सेवानवृत्तिक बादो फेरसँ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिष्ट्रेटक पदपर दिल्ली उच्च न्यायालयसँ चयन भेल आ तीन साल चारि महिना धरि दिल्लीक विभिन्न न्यायालयमे हम ई काज केलहुँ। पैंसठि वर्षक आयु भेलापर इहो काज सठि गेल। एहि तरहे देखिते-देखिते एतेकटा जीवन बिति गेल ।

जखन जिनगीक पन्ना वापस उनटबैत छी तँ सोचिते रहि जाइत छी । सोचलिऐक किछु,भेलैक किछु । ई बात कोनो हमरे संगे भेल से बात नहि छैक । जीवन छैहे तेहने। एकर कोनो निजगुत रस्ता नहि अछि,ई कोनो पहिनेसँ खींचल डरीरपर चलए बला नहि अछि,एक हिसाबे ई आबारा थिक,जे मोन हेतैक सएह करत । प्रकृतिमे सभठाम मोटा-मोटी इएह हाल छैक । जखन मोन हेतैक मेघ बरसि जाएत,जखन मोन हेतैक भयानक गर्मी पड़ए लागत आ कखनो तेहन जाढ़ धरत जे होएत जे एकचारिओमे आगि लगा कए हाथ सेकि ली । बाह रे जिनगी! हम सोचैत रहैत छी जे जँ हम दिल्ली नहिए जइतहुँ तँ कोनो घाटामे नहि रहितहुँ । हमर कैकटा मित्र मधुबनी,दरभंगामे जिनगी भरि रहलाह आ की नहि कए गेलाह? मुदा फेर ओएह बात? सभक अपन-अपन भाग्य,सभक अपन-अपन कर्म । जीवनकेँ कोनो तय सीमामे व्याख्या नहि कएल जा सकैत अछि । मानि लिअ जे केओ आइएएस कइए गेल तँ की ओ सुखी रहबे करत तकर कोन ठेकान? कोनो ठेकान नहि? कैकटा आइएएस आत्महत्या कए लैत छथि? कैकटा आइआइटी इंजिनीयर अकाल मृत्युक शिकार भए जाइत छथि । तेँ जीवन जे भेटल अछि तकरा मात्र अफसोच करैत बिता लेब,कोनो नीक बात नहि कहल जा सकैत अछि । असल बात तँ ई थिक जे सभक जीवनक दशा ओ दिसा पूर्वसँ तय अछि आ सभ किछु ओही तरहें होइत अछि जेना ओकरा हेबाक रहैत अछि । प्रकृतिक व्यवस्थामे कोनो दुविधा नहि रहैत अछि । ओ तँ हमसभ स्वयं मोहवश उतपन्न कए लैत छी ।

कहबी छैक जे जखन धोती पहिरए जोकर होइत अछि तँ ओ फाटए लगैत अछि । खिआइति -खिआइति ओकर ताग महिन भए जाइत छैक,धोती चिक्कन भए जाइत छैक । मुदा ओ घात-प्रतिघात सहबा जोगर नहि रहि जाइत अछि आ कनिको जोर पड़ितहि फाटि जाइत छैक । सएह बात जीवनोपर लागू होइत छैक। से कोना? तँ कहिए दैत छी । युवावस्थामे लोककेँ बहुत उर्जा रहैत छैक । लोक खतरा उठा सकैत अछि । मुदा जीवनक अनुभव कम रहबाक कारण उल्टा-पुल्टा निर्णय भए जाइत छैक । अनुभव होबएमे समय लगैत छैक,सौंसे जीवन बीति जाइत छैक । मुदा ताबे समये नहि रहि जाइत छैक जे लोक सुधार करए । तेँ चाही जे अनुभवी लोकनिक विचार ली,हुनकर ज्ञान सँ फएदा उठाबी । नेना जकँ आङुर जराए कए आगिसँ बँचबाक शिक्षा नहि ली । आब जखन पाछु घुमि कए सोचैत छी तँ लगैत अछि जे कैकटा एहन गलतीसभ भेल जाहिसँ बँचल जा सकैत छल । मुदा आब ओहिपर सोचलासँ की फएदा? जे हेबाक छल से भेल । समय समाप्त अछि। जीवनक अंतिम अध्याय चलि रहल अछि ।

ई बात तँ निर्विवाद अछि जे एहि संसारमे केओ असालतन नहि रहल । जे आएल से गेल । तखन जे अवसर भेटल अछि तकरा नीक सँ नीक उपयोग कए लेबे बुधिआरी थिक । बहुत लोक से प्रयास करितो छथि । बहुत लोक प्रयास कइओ कए प्रारव्धवश बेसी नहि कए पबैत छथि । लोक सोचबाक हेतु विवश भए जाइत छथि जे एहुनका संगे एना किएक होइत छनि?  ई जीवन बहुत रहस्यात्मक अछि । केओ जनमिते अछि संपन्न घरमे जतए ओकरा सभ किछु स्वतः सुलभ रहैत अछि । तँ केओ जनमिते सड़कपर मजदूरी करैत अपन माएक संगे रहए पड़ैत छैक । भाग्यं फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरुषः । अहाँ कतबो किछु कए लेब मुदा जँ भाग्य दहिन नहि रहल तँ अहाँ ठामहि रहि जाएब । एक सँ एक धनीक,विद्वान,उच्चपदपर आसीन लोक सभ किछु अछैत दुखी रहि जाइत छथि आ मामुली खेतिहर जन-बनिहार निचैन फोंफ कटैत अछि । ओतहि श्रीमान लोकनि सभ किछु सुविधाक अछैत भरि राति करौट बदलैत रहि जाइत छथि । तेँ मात्र भौतिक उपलव्धिएसँ जीवन सुखी नहि भए सकैत अछि । मनुक्खकेँ चाही मोनमे सकून ,निश्चिंतता आ सभसँ बेसी शांति ।

सभ कथाक अंत होइत अछि । नीक-बेजाए सभ समय बिति जाइत छैक । मुदा ओकर स्मरण बाँचल रहि जाइत छैक । चाहे कतबो पैघ लोक होथि ,हुनको जीवनमे उठापटक होइते छनि,उत्थान-पतन होइते छनि । सुख-दुखक क्षण अबिते छनि । चाहे कतबो संपन्न लोक होथि,कतहु-ने-कतहु हुनको अभाव रहिए जाइत छनि । एहिसभसँ बहुत शिक्षा भेटैत अछि – हे मनुक्ख! अहाँ अपन सीमान सँ परिचित रहू । अहंकारवश गलती पर गलती नहि करैत जाउ । उलटि कए पाछु ताकू । साइत किछु सुधार अपनामे कए सकी । जे किछु अपराधवोध मोनमे गड़ि गेल अछि,ताहिसँ मुक्तिक मार्ग ताकू । तखने सही मानेमे अहाँ सुखी भए सकब ।

हमर उनहत्तरिम वर्ष चलि रहल अछि । एहि अवधिमे जे केओ जाहि रूपमे भेटलाह सभ स्मरण होइते रहल अछि,होइते रहत। सही मानेमे ओ सभ धन्यवादक पात्र छथि जे हमरा कहिओ कोनो रूपमे मदति केलाह । संगहि ओहो कम धन्यवादक पात्र नहि छथि जे बेबजह यदा-कदा परेसान करैत रहलाह । साइत ओ हमर आंतरिक शक्तिकेँ जगबैत रहलाह जाहिसँ हम आओर दृढ़तासँ जीवन संग्राममे जुटल रहि सकलहुँ । अन्यथा तँ कहि नहि हम कतए रहितहुँ ?एहि दीर्घकालीन जीवन यात्रामे भेटल बहुत रास स्मृति शेष हमर पाथेय थिक जकर बलें हमरा विश्वास अछि जे आगामी शेष समय सेहो नीकसँ कटि जाएत।

जाइत-जाइत  Francis Duggan क बहुत उपयुक्त आ प्रेरणादायी कविता Thank you life!पढ़ैत चली

Thank you life!

I have had a good innings and I have a nice wife
And if I die tomorrow I will have had a good life
I am not financially wealthy or I am not in poverty

I thank you life you have been quite good to me
In my life's seventh decade this is quite a long time
Some forty years beyond my physical prime
Lucky as far as health goes without ache or pain
I do not have any cause for to complain
So many poor people doing it tougher than me
Homeless and hungry and in dire poverty
Born as the children of the lesser gods
Every day they have to battle the odds

Compared to many I am lucky indeed
Of any of life's necessities I am not in need.

 

Francis Duggan

 

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