गुरुवार, 25 जनवरी 2018

पढ़ू पूत चण्डी.......




 


पढ़ू पूत चण्डी


समय एक गतिसँ आगा बढ़ल जा रहल अछि। मुदा हम-अहाँ ओकर प्रवाहमे कहि नहि कतय पहुँचि जाइत छी। जेना कोनो तेज धारमे छोट-मोट कतेको वस्तु स्वत: दहाइत कहाँ-सँ-कहाँ पहुँचि जाइत अछि, वएह हाल एहि जिनगीक अछि। ओहि दिन हम बहुत समयक अन्तरालपर एक बेर फेर स्कूलक काते-काते जाइत रही। बहुत रास बच्चा सभ ओहिना विद्यालयक प्रांगणमे खेलाइत छल। मास्टर साहेब हाथमे एकटा डन्टा लऽ कऽ ठाढ़ छलाह कि एतबामे घण्टी घनघनायल आ विद्यार्थी सभहक हूँज स्कूलसँ बहराय लागल।

बीस-बाइस वर्ष पूर्व हमहूँ एहिना घण्टी बजैत देरी स्कूलसँ भगैत छलहुँ। एकटा मुक्तिबोध होइत छोट-छोट बच्चाकेँ देखि बहुत रास गप्प मोनमे आबि रहल छल। प्राय: एकरो सभहक भाय-बाप ओहिना आशा लगा कऽ स्कूल पठवैत हेतैक। भऽ सकैत अछि एहिमेसँ कए गोटा पढ़बो करैक। भऽ सकैत अछि कए गोटा आगा जाकऽ कोनो हाकिम भइयो जाइक। मुदा ताहिसँ ककरा की हैत? की ओकरो सभसँ फेर ओहिना लोककेँ निराश नहि होबय पड़तैक? की ओहो सभ ओहिना अपेक्षा ओ वास्तविकताक    क शमकशमे बिलाइत नहि रहत? तखन ई सभ किएक एतेक चक्कर काटि रहल अछि? वर्षो वर्ष धरि एहेन प्रयास वो संघर्ष किएक?  

मनुष्यक जिनगी होइते कतेकटा अछि? ओहूमे बीस-बाइस वर्ष बड़ीटा भाग भऽ जाइत अछि। वोहि बीचमे एकटा नव पीढ़ी समर्थ भऽ कऽ पूछय लगैत अछि-

अहाँ की केलहुँ? घूरतर बैसल प्राय: नित्य साँझमे गामक   कैटा बूढ़सभ आपसमे चर्चा करैत छलाह।

क्यो किछु, क्यो किछु कहैत। गप्प-सप्प बिबादक रुप धरैत आ अन्ततोगत्वा कहियो काल झंझटोक संभावना भए जाइत। सभसँ ढीठ ओ दबंग ठीठरकका पहलमान वो अपढ़ छलाह आ ओहि घूरक महफिलमे डंकाक चोटपर कहितथि-

पढ़ू पूत चण्डी जासे चले हण्डी।

सद्य: लाभमे पूर्ण आस्था छलन्हि। भोरमे बच्चा महिष चरौलक आ साँझमे एक डाबा गरम-गरम दूध। एहिसँ नीक शास्त्र की भऽ सकैत छल? सभ पढ़ाइ-लिखाइ व्यर्थ। कहिया पढ़त आ कहिया कमाएत...? मुदा, ओहीठाम हीरा कक्काक स्वर एकदम दोसर रंग छल। धिया-पुता पढ़त तँ विचारवान हैत आ सुखी रहत।

गाममे ओहि घूरक चर्चा चर्चित छल। दुनू गोटासँ साँझमे जँ बैसितथि तँ अपन-अपन दर्शनक अनुसार जरूर बजितथि आ परिणाममे विवाद होइत।

ठीठरकका दबंग ओ लठैत छलाह। जबरदस्त खेती-पथारी रहनि। धिया-पुता सभ बेस मोट-सोंट आ लंठ। सभ डटिकऽ खेतीमे लागल रहैत छल। परिवार सुखी छल। हुनका तुलनामे हीरा कक्काक हालत पातर छल। धिया-पुता सभ स्कूल-कॉलेजमे पढ़ि रहल छल। खेती-पथारी कोनो खास नहि। तेँ कखनोकाल ठीठर कक्काक कथन ठीक बुझाइत छलनि। मुदा दुनू गोटे अपन-अपन विचारपर दृढ़ छलाह।

हीराककाकेँ अपन धिया-पुताक बड़ आशा छलन्हि। आ तेँ अपन सम्पूर्ण शक्तिसँ धिया-पुताकेँ शिक्षा व्यवस्थामे लागल रहैत छलाह।

समय बितैत गेल आ हुनकर सभ नेना सभ पढ़ि-लिखि यथायोग्य नीक-नीक स्थानपर पहुँचलाह। ओम्हर ठीठरक गृहस्ती दिन-प्रति-दिन गड़बड़ाइत गेल। वृद्धावस्थाक जोर पकड़ितहि पुत्र सभ आपसमे भिरैत रहैत छलाह। बात बिगड़ैत देखि वो सभकेँ फराक-फराक कऽ देलखिन। जमीन-जथा बँटि गेल। परिणामत: घरक प्रतिष्ठा सेहो छल।

बीस वर्षक बाद आइ ने हीरा बाबू छथि आ ने ठीठरकका। मुदा सुनबामे बहुत किछु आयल। ठीठरकका बड़ कष्टमे मरि गेलाह। बेटा सभ खेत-पथार बेचि लेलक आ पेट पोसबाक हेतु गामसँ पड़ा गेल। हीरा बाबू सेहो सुखी नहि भऽ सकलाह। धिया-पुता सभ बढ़लक-लिखलक जरूर मुदा सभ अपनामे व्यस्त। ककरो बूढ़ाक व्यथापर सोचबाक समय, इच्छा ओ सामर्थ्य नहि भेलैक। क्यो कलकत्ता तँ क्यो बम्बइ। पाँचो बेटा पाँचटा शहर धेने छलाह। सुनबामे ईहो आयल जे मझिला बेटा लखनउमे मकान बना लेलक अछि। हीरा बाबू ओहिना एसगर टकटक तकैत विदा भऽ गेलाह।

ओहि स्कूलमे मौलाना-जोलहाक बेटा सेहो हमरा सभहक संगे पढ़ैत छल। पढ़यमे सामान्य छल मुदा अत्यन्त सज्जन वो संवेदनशील। कै दिन गामसँ स्कूल जाइत काल वो भेटि जाइत। मुदा वो स्कूल नियमित नहि जाइत छल। कै दिन बाधमे ओकरा हम सभ हर जोतैत देखियैक। हँसियो लागय आ दुखो भऽ जाय। कहियो काल ओकर बाप सेहो भेटि जाइत, एकटा आग्रहक संग-

बौआ, माहटर साहेब बाबूसँ कहि देबै जे हमर बचबा आज नै जायत।

पुछिऐक-

किए?”

मुदा तकर जवाब ओ किछु नहि दितय। पनपिआइ गमछामे बन्हने हर जेातइत अपन बेटा दिसि इशारा करैत।

कै दिन हमरा संगे वो स्कूल जाइत। रास्तामे भेँट भऽ जाइत छल। गमछामे पाँच-छहटा किताब ओ किछु कॉपी बन्हने हमरा देखैत घरेसँ आबाज दैत-

हमहँ चलब। ठाढ़े रहब।

आबाज सुनि कए हम-सभ पाकरी गाछक तरमे सुस्ताय लगैत छलहुँ। स्कूल पहुँचि सभसँ पछिलका सीटपर वो बैसि जाइत छल। आ कै दिन तँ औसतन सभ घण्टीमे मारि खाइत रहैत छल। बिना कोनो आक्रोश आ प्रतिकृयाक कै दिन कहितिऐक-

एना मारि किएक खाइत रहैत छह! नीकसँ पढ़ाइ करह।

मुदा वो हमर-सभहक बात सुनि किछु-किछु अकाट्य तकैत दऽ दैत छल।

बहुत दिनक बाद ओकरा एक दिन चौकपर रिक्सा लगौने   देखलियैक। हमरा देखि ओकरा उत्साह भेलैक। प्राय: ओकरा भेलैक जे ई पसिंजरपर ओकरा बिशेष अधिकार छैक। एकबेर हमरा मोन भेल जे ओही रिक्सासँ चली मुदा आत्मा सिहरि गेल। हमर वो सहपाठी रिक्सा चलाओत आ हम ओहिपर बैसल रहब। आ हम कात भऽ गेल रही। किछुए कालक बाद ओकर बूढ़ बाप एक गठ्ठर कपड़ा लेने आयल। प्राय: हमरा नहि चिन्हि सकल। ओहि रिक्सापर गठ्ठर राखि बाप-बेटा मिलि कए बीड़ी पीबय लागल। समयक एतेक अन्तरालक बादो बाप-बेटाक स्नेह बनल छल। हमरे सभहक संगे किछु वरिष्ठ विद्यार्थी सभ सेहो स्कूल जाइत छलाह। जाहिमे सँ कै गोटा मैट्रिकमे चारि-पाँच बेर फेल कऽ कऽ क्रान्तिकारी भऽ गेल छलाह। गाममे छोटका लोक सभकेँ संगठित कएक ओ सभ महा उपद्रव ठाढ़ कऽ देने छल। कैटा पैघ गृहस्थक हर-जन बन्द भऽ गेल छल। पनिभरनी सभ आँगनमे काज नहि करत आ भरिआ भार लऽ कऽ नहि जायत। जकर घर जाहि जमीनपर छैक से तकर हेतैक। ई हेतै वो हेतै आ भऽ कऽ रहतै। दिन राति गाममे घोल-फचक्का होइत रहैत...।

सभसँ बड़का आफद बड़का मालिककेँ भेल रहनि। वो एकदम अपसेट भऽ गेल रहथि। दिन-राति हुनका ओहिठाम भण्डारा चलैत रहैत छल। इलाकाक पहलमान ओ लंठक जमघट रहैत छल।

समय बीतलाक संग-संग वो क्रान्तिकारी सभ शान्त भऽ गेलाह। अधिकांश कतहुँ-कतहुँ चाकरी कऽ रहल छलाह आ एकाधटा अकाल मृत्युक सेहो शिकार भए गेलाह।

बड़ीकाल बैसल यैह सभ सोचैत रही कि दिनेश भाई भेट भए गेलाह।ओ हीरा बाबूक जेठ भातिज छलाह आ अंतकालमे वैह बेचारेक सेवा केने रहथि। हीरा बाबूक छोट पुत्र टुना हमर सहपाठी छलाह। हुनके प्रति गप्प होमय लागल। कहलाह जे वो तँ बहुत दिनसँ लंदनमे रहैत अछि। बड़का हाकिम भऽ गेल अछि आ बहुत रास पैसा कमाइत अछि। मुदा कै वर्षसँ गाम नहि आयल अछि।

पुछलियनि-

हीराबाबूक काजमे आयल रहथि की नहि?”

नहि आयल रहथि।

छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ। पुछलऐक-

किएक?”

कहि नहि! मुदा मृत्युसँ दू-तीन वर्ष पूर्व आयल छलाह। गाम डोलि गेल रहय। जाइतकाल बहुत रास टाका बापकेँ दैत रहथिन्ह मुदावो नहि लेलखिन्ह।

बिच्चेमे चौंकैत पुछल-

कारण?”

कहाँ दनि कहलखिन जे ई पैसा अहीं राखू। काज आओत। जाहि पैसाक कारण अहाँ एतेक दूर चल गेलहुँ, गाम-घर, माय-बाप ओ सभ किछु त्याग कऽ देलहुँ ताहि पैसाकेँ व्यर्थ हमरापर किएक नष्ट कऽ रहल छी। टुना तहिआसँ घुरि कऽ गाम नहि अयलाह।

मुदा ठीठर ककाकेँ की भेल?”

की कहूँ! सभ बेटा घर छोड़ि पड़ा गेल। करबो की करितैक। गामपर किछु नहि बाँचल रहैक। असगर ठीठर कका काहि कटैत रहैत छलाह। जेठकी पुतोहु थोड़-बहुत सेवा कऽ दैत छलखिन।

एकबेर फेर ठीठर कका भीमकाय ओ हुनक आप्त वाक्य मोन पड़ि गेल-

पढ़ू पूत चण्डी, जासै चलय हण्डी।

शरीरमे बड़ थाकान बुझि पड़ैत छल, कहि नहि कखन नीन्न आबि गेल।

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