शनिवार, 28 जनवरी 2017

चाह पीवि लिअ   



भोरमे उठिते पहिल चीज जे धियानमे अबैत अछि, से थिक चाह। कएक बेर मन होइत अछि जे भोरुका सभ काज–जेना टहलब, नहाएब–छोड़ि दी आ चाह पीवि ली। फेर देखल जेतइ। चाहक आगमन देख मनमे हुलास भऽ जाइत अछि। चाहक एक-एक घोंट जेना शरीरक भीतर जाइते उत्‍साहित करए लगैत अछि। नव-नव गप फुरए लगैत अछि। चाहकेँ भफाइत देख उत्‍साहसँ मन भरि जाइत अछि। ई क्रम सालोसँ चलि रहल अछि।

आब तँ भोरक आकर्षणे भऽ गेल चाह, अर्थात मॉरनिंग टी। चाहक भाफ जेना आगॉं बढ़ि कऽ कहैत हुअए-

गूड मॉरनिंग।

चाहक स्‍वादक वर्णन करब कठिन अछि। ओकर अन्‍दाज तँ चाह पीलेसँ भऽ सकैत अछि। चाह पीबू आ टनटना जाउ। कनीकालक लेल चिन्‍ता-फिकिरसँ मुक्ति भऽ जाइत अछि, कारण मन चाहक संगे गपमे ओझरा जाइत अछि।

चाह आइ-काल्‍हिक सभ्‍यताक अभिन्न अंग बनि गेल अछि। केकरो ओतए जाउ, चाहक आग्रह अबस्‍स हएत आ जँ से नहि भेल तँ कहक विषय भऽ जाएत जे चाहो नइ पुछलकै। कोनो बैसार हौउ, ओइमे चाह अबस्‍से परसल जाएत।

पहिने गाममे चाहक एतेक प्रचार नहि छल। माने ग्रामीण क्षेत्र ऐसँ बाँचल छल। हमरा गाममे चौकपर दोकान सभपर चाह भेटै आ लोक सभ ओत्तै चाह पीबैत छला। गामक अधिकांश घरमे चाह नहि बनैत छल। मुदा आब समय बदलल। चाह घरक अभिन्न अंग बनि गेल अछि।

बहुत दिन धरि हम चाह नहि पीबैत छेलौं। बादमे नौकरी पकड़ला पछाइत भोर-साँझ चाह पीबए लगलौं। क्रमश: एकर संख्‍या बढ़ैत गेल। नार्थ ब्‍लौक, दिल्‍लीमे पोस्टींगक क्रममे कॉफीक चलन बढ़ल। सस्‍ता ओ सुलभ रहबाक कारण दिनमे कएक बेर कॉफी भऽ जाइत छल। संगे टी बोर्डक  चाह सेहो उपलब्‍ध छल। दूध, चीनी, चाह फराक-फराक देल जाइक। अपन रूचिक अनुसार चाह बना लिअ। चीनी कम दिअ, पत्ती कम पड़ि गेल, आदि-आदि झंझटसँ मुक्ति।

हमर एकटा अधिकारी (आए.ए.एस.) चाहक बड़ शौकीन छला। हुनकर कार्यालयमे चाह बनेबाक पूरा सरंजाम रहैत छल। आध-आध घन्‍टापर ओ चाह पीबैथ। हुनका लगमे तरह-तरह केर चाहक पत्ती रहै छेलैन। कोन समयमे केहेन चाह बनत सभ तँइ छल। जे कियो ओइ समयमे पहुँच गेल, तिनका सेहो ओइ चाहमे स्‍वत: भागी बनौल जाइत छल।

कालक्रमे दुपहरियाक बाद चाह पीअब हम छोड़ि देलौं। तेकर कारण रातिक निन्नक दिक्कत छल। कएक ठाम पढ़लौं जे चाहमे कैकीन होइत अछि, जेकरा पचबामे बारह घन्‍टा लागि जाइत अछि आ ओ निन्नमे बाधक भऽ सकैत अछि। ई बात केतेक सही अछि से नहि कहि, मुदा हम दुपहरियाक बाद चाह पीअब छोड़ि देलौं। मुदा भोरक जबरदस कपसँ चाह पीबए लगलौं। एक्के कपमे सामान्‍य कपक चारि- पाँच कप आबि जइतैक। एकबेर हमर ग्रामीण ओइ कपसँ चाह पीबैत देख अबाक् रहि गेला। मुदा कालक्रमे चाहक मात्रा कम भऽ गेल।  

चाह कम कऽ देला पछाइत बैसार सभमे किंवा कोनो आगन्‍तुक संगेचाह नहि पिलापर निर्विवाद रूपसँ चर्चाक विषय भऽ जाइत अछि। ई जे चाह किएक नहि पीबैत छी। कनिक्के पीवि लीअ। चाह तँ नीक चीज छै। आदि-आदि। केकरा-केकरा बुझैबै जे हम चाह मात्र भोरुके पहरटा मे पीबै छी। दुपहरियाक बाद नइ पीबै छी। कारण, निन्नमे दिक्कत भऽ जाइत अछि।

..तँ हम समाधान तकलौं जे जे कियो चाहक आग्रह करैथ से मानि ली। हुनका संगे चाह पीब शुरू करी, आ थोड़ेकालक बाद राखि दी। हँ, ऐमे चाहक बेरबादी तँ होइ छल मुदा एकटा सद्य: लाभ होइत छल जे बिबादसँ बँचि जाइ छेलौं। क्रमश: लोक सभ ई बात बुझि गेल आ हमरा संग चाहक आग्रह कम भऽ गेल। चाहसँ निन्नक कमी होइत अछि की नहि मुदा हम चाह पीअब कम कऽ देलौं। मुदा केते गोरेकेँ सुतबासँ पूर्व चाहक आदत होइ छैन आ तेकरबाद ठाठसँ सुतैत देखै छिऐन। जे होइ मुदा चाह चाहे थिक।

चूँकि चाहक संख्‍या कम भऽ गेल छल तँए हमर प्रयास रहैत छल जे चाह उम्‍दासँ उम्‍दा होइक। तइले हम चारूकात चाहक पत्ती तकैत रहलौं। किछु दिन तँ हमर एकटा मित्र सिलीगुड़ीसँ चाह अनैत छला, मकाइवाड़ीक चाह, जेकर सुगन्‍ध अद्भुत ओ आनन्‍ददायी छल। बादमे हुनकर स्‍थानान्‍तरण भऽ गेल एवं ओ चाह ताकबाक हेतु हम केतेको प्रयास केलौं। कर्नाट पलेस दिल्‍लीक केतेको दोकानपर केतेको प्रकारक चाह अनलौं। ओही क्रममे केपचु रेडलेवल चाह तकलौं। ओइ चाहक स्‍वाद एवं सुगन्‍ध हमरा सभकेँ पसिन भेल आ बहुत दिन धरि ओ चाह चलल। बादमे ओइ चाहक अभाव रहय लागल। दोकान सभपर कएक बेर भेटिते ने छल। तइ क्रममे लोदी कालोनीक मेन मार्केट स्‍थित चाहक थौक विक्रेताक पता लागल। ओ चाह विक्रेता योग्‍य बेकती छला एवं मधुबनी सहित इलाकाक आन-आन स्‍थानक जानकारी सेहो रखैत छला। हुनकर दोकानपर चाह किनबाक क्रममे गप-सप्‍प होइत छल जइसँ बुझाएल जे ओ बहुत योग्‍य बेकती छला एवं दुनियाँक अनेको देश घुमल छला। किछु दिनक बाद जखन हम फेर चाह लेबए ओतए गेलौं तँ पता लागल जे ओ गुजैर गेला। अचानक हृदयाघात भेलैन आ ओ नहि बँचि सकला। ऐ घटनासँ बहुत दुख भेल। तेकर बादो हम ओइ दोकानपर जाइत रहलौं मुदा बादमे लोदी कालोनीक डेरा छुटलापर आवागमन कम भऽ गेल आ तेकर बाद केपचु छुटि गेल।

पानिक बाद चाह दुनियाँमे सभसँ बेसी प्रचलित पेय अछि। आम धारणा अछि जे चाह कएक प्रकारक बिमारीसँ निजात आनि सकैत अछि। कहल जाइत अछि जे चाह रक्त चाप कम करैत अछि। हृदयक हेतु ई नीक अछि। चाह एन्‍टीऑक्‍सीडेन्‍ट सेहो होइत अछि। मुदा चाहपर भेल अनुसन्‍धानमे पाओल गेल जे ऐमे कीटनाशक औषधिक मात्रा सामान्‍यत: अधिक रहैत अछि। बहुत रास चाहक पत्तीकेँ नीकसँ धोल नहि जाइत अछि आ डिब्‍बामे बन्‍द कऽ देल जाइत अछि, जइसँ कैंसर हेबाक डर रहैत अछि। कएक बेर चाहमे सुगन्‍ध करक हेतु हानिकारक रसायन मिला देल जाइत अछि। कएक बेर चाहक पुड़ियामे राखल रहैत अछि। ओइ पुड़ियाकेँ गरम पानिमे डुबा कऽ चाह बनौल जाइत अछि। ओइ क्रममे चाहमे प्‍लास्‍टिकक पुड़ियासँ हानिकारक तत्व मिलि जाइत अछि। किछु अवगुणक चर्चाक अछैतो चाहक प्रेमीक संख्‍या अपार अछि। चाहक समाजिक-सांस्‍कृतिक योगदान केकरा नहि बुझल अछि। कोनो बैसार बिना चाहक नहि होइत अछि। चाह परक चर्चा तँ प्रसिद्ध भऽ गेल अछि। चाहक केतेको प्रकार अछि। हरियर, कारी किंवा औषधीय (हर्वल) चाह। अपन-अपन पसिनक अनुसार लोक एकर चुनाव करैत अछि। कारी चाह पिलासँ दाँतमे खोधैरसँ बँचाव होइत अछि। हरियर वा कारी चाह पिलासँ हृदयाघातक संभावना २१ प्रतिशत कम भऽ जाइत अछि। एक वा दू कप कारीचाह विपैबला बेकतीकेँ टाइप टू मधुमेह हेबाक संभावना ६० प्रतिशतकम भऽ जाइत अछि। कारी चाह तनाव बढ़बैबला हारमोन कम करैत अछि। ऐमे विद्यमान अल्‍कलामाइन एन्‍टीजेन रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़बैत अछि।

कहल जाइत अछि हरियर चाह कारी चाहसँ बेसी गुणकारी होइत अछि। तेकर कारण एकर बनबक क्रियामे फरमेन्‍टेसन नहि हएब थिक। हरियर चाहमे एन्‍टीऑक्‍सीडेन्‍ट एवं पोलीफेनोल अधिक रहैत अछि। कहल जाइत अछि जे चीनक द्वितीय राजा सेन तुँग सन्‍ २७३७ इसा पूर्व चाहक अविष्‍कार केलैन। उबलैत पानिमे संयोगसँ किछु पत्ती उड़िया कऽ पड़ि गेलइ। ओ पीवि कऽ हुनका बहुत नीक स्‍वाद लगलैन।

दुनियाँ भरिमे चाहक करीब-करीब १५०० प्रकार उपलब्‍ध अछि जे मूलत: छह प्रकारक पत्तीसँ बनौल जाइत अछि। अमेरिकामे कारी चाहकेँ लाल चाह कहल जाइत अछि।

१७०० ईस्‍वीक आसपास ब्रिटेनमे चाह लोकप्रिय पेय भऽ गेल।

अफगानिस्‍तान एवं इरानक राष्‍ट्रीय पेय चाह थिक।

दुनियाँमे सभसँ बेसी चाह आयरलैंडमे पीअल जाइत अछि।

प्रतिवर्ष औसतन तीन कड़ोर टन चाहक उपज होइत अछि। ब्रिटिस इस्‍ट इण्‍डिया कम्‍पनीक प्रभाव बढ़िते भारतमे चाहक व्‍यापारिक उत्‍पादन बढ़ल। ओइ समयमे बहुत रास उपजाउ जमीनकेँ चाहक उत्‍पादनमे लगा देल गेल। टी वोर्ड द्वारा सन् १९२० ईस्‍वीक आसपास चाहक विज्ञापन जोर-सोरसँ कएल गेल। आइ-काल्‍हि भारत दुनियाँक सभसँ अधिक चाहक उपज करैबला देशमे सँ एक अछि। देशमे उपजल ६० प्रतिशत चाह एत्तै खपत भऽ जाइत अछि। विश्व प्रसिद्ध आसाम एवं दार्जिलीग चाह सेहो अहीठाम उपजैत अछि। मनीराम देवान (१८०६-१८५८) प्रथम भारतीय चाह उत्‍पादक छला एवं आसामी चाहक व्‍यापारिक उत्‍पादनक श्रेय हुनके जाइत अछि।

दार्जिलीगमे चाहक उत्‍पादन१८४१ ईस्‍वीमे आर्थर कैम्‍पवेल द्वारा प्रारंभ भेल। ओ सिविल सार्जन छला। काठमाण्‍डूसँ १८३९ ईस्‍वीमे हुनका स्‍थानान्‍तरण दार्जिलीग भऽ गेल। १८४१ ईस्‍वीमे ओ चीनक चाहक बीज दार्जिलीगमे लगेला आ क्रमश: ओकर व्‍यापारिक उत्‍पादन प्रारंभ भेल।

चाहक स्‍तुतिमे तरह-तरहक बात कहल गेल अछि। विलियम एवार्ट ग्‍लैडस्‍टोनक निम्‍नलिखित पाँति उद्धरणीय अछि-

“If you are cold, tea woll warm you

If you are too heated, it will cool you,

If you are depressed, it will cheer you,

If you are excited, it will calm you.”

कहक माने जे चाह सर्वगुणी अछि। चाह कोनो दुख दूर कऽ सकैत अछि। सुखक वर्षा कऽ सकैत अछि। The book of Tea केर लेखक जापानी विद्वान एवं कलाकार Okakura Kakuzo  कहै छैथ-

“Tea is a raligion of the art of life”

कहक माने जे चाहक चुस्‍कीक संग जीवनक रंग बदैल सकैत अछि। जीवनक समस्‍याक समाधान भऽ सकैत अछि।

रूसक विद्वान उपन्‍यासकार Fyodor Melehalouich Postyevaky कहने छैथ-

“I say let the world go to hell, but

I should always have my tea.”

जे हेतै से हेतै, मुदा पहिने चाह पीवि ली।

उपरोक्‍त कथानक सभ चाहक उपयोगिताकेँ प्रमाणित करैत अछि। गरीब, धनीक, गाम, शहर सभठाम भोर होइते चाहक सुमार होइत अछि। दड़िभंगा टावर हो वा तिरुपतिक धर्मशाला, सभठाम भोरे-भोर चाह उपलब्‍ध भऽ जाइत अछि।

एतेक प्रसिद्ध एवं सर्व व्‍यापी चाहक बिक्री केनिहार अधिकांश बेकती गरीब परिवेशसँ अबै छैथ। गाम-घरसँ भागि अपन भविसक निर्माण हेतु पैघ शहर जेना- दिल्‍ली, मुम्‍बई, अबै छैथ। सालो फुटपाथपर चाह बेचैत रहि चाइ छैथ मुदा हुनकर आर्थिक स्‍थितिमे सुधार नहि भऽ पबैत अछि। ई अलग बात अछि जे भारतक वर्तमान प्रधानमंत्री बचपनमे चाह बेचै छला मुदा एहेन भाग्‍यवान कम होइ छैथ।

दिल्‍लीक आइ.टी.ओ.क आसपास रोडक कातमे सालोसँ चाह बेचनिहार श्री लक्ष्‍मण राव केर कथा फराक अछि। चाहक दोकान करैत ओ लगातार लेखनक काज सेहो करैत रहै छैथ। अखन धरि २४ टा पोथी लिखि चूकल छैथ।

चाह बेचनाइक संग अपन लिखल पोथी सेहो बेचैत रहै छैथ। ओ मैट्रिक पास करि कऽ चाह बेचनाइ प्रारंभ केला। फेर बी.ए. केला। निरन्‍तर लिखैत रहला मुदा चाहसँ हुनक लगाव बनल रहल। मुदा अधिकांश चाह विक्रेता अहिना भाग्‍यवान नहि होइ छैथ। जीवन पर्यन्‍त चाह बेचैत-बेचैत ओ जहिना-तहिना रहि जाइ छैथ।

जीवन अद्भुत अछि। कहि नहि जीव केतए-सँ आएल आ केतए जाएत? कहि नहि पुनर्जन्‍म हएत कि नहि? स्‍वर्ग जाएब वा नर्क सेहो ठेकान नहि। आ जौं स्‍वर्ग चलिये गेलौं तँ कहि नहि ओतए चाह हेतैक कि नहि? तँए जाबत जीवन अछि एकरा नीकसँ जीवि लिअ। आनन्‍द बना लिय। जँ भऽ सकए तँ ओरियान कऽ लिअ जे स्‍वर्गोमे चाह भेटैक। तँए हम अपन माइक श्राद्धमे चाह-चिन्नीक संग चाह बनेबाक सभ सामग्री जेना गैसबला चूल्‍हि आदि-आदि, दान कएल। आ दानक वस्‍तु हुनका देल जे चाहक प्रेमी छला। माय हुनका केतेको बेर चाह पीवि लिअ कहितथि। चाहक ऐ आग्रहमे बहुत जान होइत छल। हुनका लग लोकसब अबैत जाइत रहैत छल। ओ सदिखन प्रसन्न रहैत छेली। मारफत चाह। अस्‍तु हमहूँ-अहाँ चाहक पक्का ओरियान राखी आ प्रयत्न करी जे स्‍वर्गोमे चाह भेटैत रहए।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

बुधवार, 25 जनवरी 2017

डॉ. जयकान्‍त मिश्र







डॉ. जयकान्‍त मिश्र(संस्मरण)

सन् १९७८ इस्‍वीक जनवरी मासमे दिल्‍लीसँ स्थानांतरण भए हम इलाहाबाद गेल रही। ओहि समय प्रथम बेर डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी सँ हुनकर तीरभूक्‍ति,  सर पीसी वनर्जी  रोड स्‍थित घरमे भेँट भेल। बिना कोनो पूर्व परिचय रहितहुँ ओ सभकाज छोड़ि हमरासँ भेँट केलाह। एकटा मैथिलकेँ हमर डेरा तकबाक हेतु कहलखिन। ओतहिसँ हमर हुनका संग परिचय ओ सम्‍पर्कक क्रम प्रारंभ भेल जे अन्‍त धरि चलैत रहल। जखन-कखनो हम हुनकर डेरापर जाइ तँ ओ सभकाज छोड़ि हमरासँ अत्‍यन्‍त अपनत्‍व भावसँ गप्प करथि। अपनेटा नहि,  अपितु हुनक पत्नी,  ओ संगे रहनिहार परिवारक अन्‍य लोकनि सभ सेहो ओहिना गप्प-सप्‍पमे संग देथि। जलखै,  चाह,  पान तँ हेबे करइ। ओही क्रममे कतेको गणमान्‍य मैथिल लोकनिसँ हुनकर डेरापर भेँट भेल। हुनकर अध्‍ययन,  अध्‍यापन,  लेखन सबहक अवलोकन करबाक अद्भुत अवसर भेटल। कए दिन हुनका संगे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजी विभाग गेलहुँ,  जाहिठाम ओ अंग्रेजी विभागक अध्‍यक्षक पदपर कार्यरत छलाह। 

इलाहाबादमे रहनिहार मैथिल समाज डॉ. जयकान्‍त मिश्रसँ पूर्ण परिचित छलाह। अधिकांश मैथिल सभसँ हुनकर व्यक्तिगत सम्‍पर्क छलनि। प्रत्‍येक साल विद्यापति समारोह मनाओल जाइत छल। डॉक्‍टर जयकान्‍त मिश्र ओहिमे अवश्‍यमेव रहैत छलाह। हुनकर डेरापर निरन्‍तर मैथिलीक विकास केना हो,  तकर चर्चा होइत रहैत छल। ओ सदिखन बाजथि- 

मैथिलीमे लिखल करू। मैथिलीक हेतु काज करू।” 

संगे मैथिलीक हेतु कएल गेल अपन अनवरत संघर्षक चर्चा सेहो होइत,  जाहिसँ मैथिली विकास यात्राक साक्षात अनुभव होइत छल। 

मैथिली भाषाकेँ बिहार लोक सेवा आयोगमे हटा देल गेल रहइ। तकरा पुनश्‍च आपस अनबामे, मैथिलीकेँ बच्‍चा सबहक शिक्षाक अनिवार्य माध्‍यम बनेबाक हेतु ओ कहि नहि,  कतेको बर्ष संघर्ष करैत रहलाह आ अन्‍ततोगत्‍वा अपन प्रयासमे सफल रहलाह। मैथिलीक विकास हेतु ओ गाम-गाम घुमैत रहलाह। ततबे नहि,  जतए कतहु मैथिलीक चर्चा होइत आकि कोनो कार्यक्रम होइत तँ ओहिमे डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी अबस्‍से भाग लेथि। 

आयु बढ़लासँ नाना प्रकारक स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी समस्‍या रहैत छलनि। हुनका कतेको साल पूर्व पेसमेकर लागल छल तथापि जँ कतहु मैथिलीक कार्यक्रममे हुनका बजाओल जाइत,  तँ ओ अवश्य जाथि। परिवारक लोक चिन्‍तित भए जाइत छलखिन।

एकबेर हम इलाहाबादसँ पटना जाइत रही। स्‍लीपरमे हमर आरक्षण छल। डॉक्‍टर जयकान्‍त मिश्रजी केँ देखलहुँ। ओहिना ठाढ़,  बिना सीटेक यात्रा कए रहल छलाह। बहुत आग्रह केलापर ओ हमर सीट लेबाक हेतु तैयार भेलाह। कहथि जे ओ अहिना चलि जेताह। ई छल हुनकर उत्‍साह- मैथिली कार्यक्रमे भाग लेबाक। ओहि दिन पटनामे कोनो मैथिली कार्यक्रममे भाग लेबाक हेतु जाइत छलाह। 

डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीक भाषा ओ  व्यवहारमे अद्भुत मधुरता छल। कखनो नहि लगैत जे एतेक पैघ विद्वानसँ गप्प कए रहल छी। जे जेहने स्‍तरक लोक रहैत,  तेकरा संग तेहने भए गप्प करितथि, पूरा घ्‍यान देथि, घरक सदस्‍य जकाँ ओकर पूर्ण स्‍वागत करथि। 

घरक प्रथम तलपर हुनकर पुस्‍तकालय छल। ओहिमे बैस कए ओ अध्‍ययन,  लेखन करैत रहैत छलाह। इलाहाबादसँ एकटा लघुकाय मैथिली पत्रिकाक सम्‍पादन सेहो करै छलाह । हुनकर नाति,  भातिज सभ ओहि पत्रिकाक मैथिल लोकनिमे वितरणक व्यवस्था करथि। कहिओ काल हमरो ओहि काजमे ओ लगा लैत छलाह। 

माघ मासमे प्रयागमे संगमतर पर ओ सपरिवार मास करैत छलाह। मिथिलाक प्रसिद्ध माछबला झण्‍डा मैथिल पण्‍डा सबहक पहिचान अछि। ओहि झण्‍डाकेँ देखि कए जयकान्‍त बाबू डेराक ठेकान लागि जाइत छल। 

दिल्ली चलि अएलाक बहुत दिनबाद नवम्बर २००७ इस्‍वीमे हम इलाहाबाद गेल रही। हुनकर डेरापर गेलहुँ। परन्‍तु, ओ काशी मास करए चल गेल रहथि। हुनकासँ भेँट नहि भए सकल। हुनकर डेरापर हुनकर नाति,  एवं परिवारक अन्‍य सदस्‍य सभ छलाह। डेरा उदास-उदास लगैत छल। परिवारमे कएटा दुर्घटना भए गेल छल। किछु साल पूर्व हुनक ज्‍येष्‍ठ पुत्र डा. रूद्रकान्‍त मिश्रक आकस्‍मिक असामयिक निधन भए गेल छल। आओर कएटा गप्प-सप्‍प...। एहि सबहक आभास घरमे भए रहल छल। किछुकाल बैसला बाद हम सभ ओतए-सँ अपन स्‍मृतिकेँ पुनश्च जगा कए ओहिठामसँ विदा भए गेलहुँ। डॉक्‍टर साहेबसँ भेँट नहि भए सकल ताहिबातक मोनमे बहुत कचोट होइत रहल   

डॉक्‍टर जयकान्‍त मिश्रजीक पिता महामहोपाध्‍याय डॉ. उमेश मिश्रक बर्षी बहुत यत्न पूर्वक मनाओल जाइत छल। ओहिमे डॉक्‍टर साहेब ओतए हम (जाधरि इलाहाबादमे रहलहुँ) नियमित आमंत्रित होइत छलहुँ। हुनकर सम्‍पूर्ण परिवार अत्‍यन्‍त मनोयोग पूर्वक ब्राह्मण भोजनक व्यवस्था करैत रहलाह। नाना प्रकारक भोजनक व्‍यंजन सबहक स्‍मरणे मात्रसँ मोन आनन्‍दित भए जाइत अछि । भोजनक संग-संग कतेको गप्प-सप्‍प मैथिल लोकनिसँ ओहि अवसरपर भेँट भए जाइत छल। 

इलाहाबादमे गप्प-सप्‍पक क्रममे ओ मैथिलीकेँ साहित्‍य अकादेमीमे मान्‍यताक सम्‍बन्‍धमे हुनक कएल गेल प्रयासक वर्णन करथि। ओहि हेतु ओ दिल्‍लीमे तत्‍कालिन प्रधान मंत्री द्वारा मैथिली पोथीक प्रदर्शनीमे भाग लेब,  दिल्‍लीक उपराज्‍यपाल स्‍व. आदित्‍यनाथ झाजीक प्राप्‍त समर्थन एवं सहयोगक चर्चा सेहो करैत छलाह। 

एकबेर हम डॉ. शुभद्र झाजीक संग इलाहाबादमे डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीक ओहिठाम जाइत रही। रस्‍तामे डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीक मैथिलीक प्रति अनुराग ओ मैथिलीक विकास हेतु संघर्षक प्रशंसा करैत डॉ. शुभद्र झा कहलाह-

मिथिलामे डॉ. जयकान्‍त मिश्रक एवं हुनक पूर्वज लोकनिक अद्भुत योगदान अछि।” 

संगे ईहो कहलाह- 

एहन बहुत कम परिवार भेटत जाहिमे लगातार छह पुश्‍त सरस्‍वतीक एहन आर्शीवाद प्राप्‍त रहल हो।” 

ओ दिल्‍ली  आबथि तँ  हमरा सूचित करथि। कतेको बेर तँ ओ हमरे ओतए ठहरैत छलाह। कए बेर हवाइ यात्रासँ उतरि लबनचूस बच्‍चा सबहक लेल नेने अबैत छलाह। जाधरि ओ डेरापर रहथि,  निरन्‍तर मैथिली सम्‍बन्‍धी चर्चा होइत रहैत।

मैथिली आन्‍दोलनक संघर्ष यात्रा आओर अनेकानेक लोकनिक योगदानक चर्चा सेहो होइत। 

एकबेर ओ (डॉ. जयकान्‍त मिश्र) दिल्‍लीमे यूजीसीक मैथिलीक प्रश्‍न पत्र बनबए खातिर आएल रहथि। संगमे स्‍व. सुमनजी एवं डॉ. नवीन बाबू सेहो रहथिन। ओ तीनू गोटे हमर आग्रहपर पुष्‍पबिहार,  दिल्‍ली स्‍थित हमर आवासपर अएलाह आ एकसंग हुनका सभकेँ भोजन करेबाक सौभाग्‍य प्राप्‍त भेल। ओहि अवसरकेँ स्‍मरण करैत अखनो रोमांचित भए जाइत छी। तीनू गोटेक एकट्ठे हमरा ओतए आएब आओर हुनकर वार्तालाप सुनि मोन आनन्दित भए गेल। आनन्‍दितो केना ने होइतडॉ. सुमनजी एवं डॉ. नवीन बाबू सी.एम. कौलेज- दरभंगामे हमरा मैथिली पढ़ओने रहथि। 

डॉ. मिश्रजी अत्‍यन्‍त समाजिक व्यक्ति छलाह। इलाहाबाद किंवा बाहरोक मैथिल लोकनिकेँ व्यक्तिगत स्‍तरपर ओ मदति करैत छलाह। नयाकटरा,  इलाहाबाद स्‍थित हमर डेरापर कएक बेर पएरे चलि आबथि। कतेको मैथिल विद्यार्थी सभकेँ ओ अपना ओहिठाम राखि कए हुनकर शिक्षामे  सहायता करैत छलाह। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालयक अंग्रेजी विभागक अध्‍यक्ष पद हेतु हुनका बहुत विरोधक सामना करए पड़ल छलनि। ताहि खातिर ओ इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालयमे केस सेहो केने रहथिन। अन्‍तोगत्‍वा हुनकर विजय भेल,  आ ओ अंग्रेजी विभागाध्‍यक्ष भेलाह। हुनकर विरोधी सबहक कहब रहैक जे ओ मैथिलीमे लिखैत छथि। हुनकर पी.एच-डी.क विषय मैथिली भाषाक इतिहास छल तखन ओ अंग्रेजी विभागक अध्‍यक्ष केना भए सकैत छथि?

जयकान्‍त बाबू दिल्‍ली आएल रहथि। तहिया हुनकर पोती रोहिनीमे रहैत छलखिन।। हुनकासँ भेँट करबाक रहनि। हमरा संगे चलए कहलनि। बसपर ठाढ़े हम दुनू गोटे रोहिनी विदा भएलहुँ। इलाहाबादसँ एकटा पोटरी अनने रहथि। तेकरा उपहार स्‍वरूप अपन पोतीकेँ देलखिन। किछु कालक बाद हम सभ ओहिठामसँ आपस भए गेलहुँ। ओहि पोतीक बिआह दिल्‍लीएमे भेलनि एवं बिआहक हकार हमरा देबाक हेतु डॉ. रूद्रकान्‍त मिश्र (कन्‍याँक पिता) स्‍वयं आएल रहथि। हम बिआहक अवसरपर गेलो रही। बिआहमे डाक्टर साहेबक सभ भाए आएल रहथिन। कोनो प्रकारक दहेज नहि लेल गेल छल। डॉक्‍टर साहेब दहेज रूपी लेन-देनक खिलाफ छलाह एवं एकरा मिथिलाक संस्‍कृतिक प्रतिकूल कहथि। 

डॉक्‍टर जयकान्‍त मिश्रजीक पिता महामहोपाध्‍याय- डॉ. उमेश मिश्रक बनाओल मकानमे डॉक्‍टर साहेब एवं हुनकर भैयारी लोकनि सेहो रहैत छलखिन।। सभसँ शुरूबला हिस्‍सामे डॉक्‍टर साहेब रहथि आ तकर बाद बलामे आर भाए सभ। 

डॉक्‍टर साहेबक व्यक्तिगत जीवनमे,  परिवारोमे भोजन आ रहन-सहनमे मिथिलाक संस्‍कृतिक अमिट छाप छल। मकानक ओसारपर माछक मूर्ति लटकल,  सदैव झूलैत रहैत छल। घरमे भोजन बनबएकाल देहपर वस्‍त्र नहि रहक चाही। ब्राह्मण भोजनकाल परसनिहार आ भोजन केनिहार गंजी,  कमीज नहि पहिरथि। भोजनमे पियाजु-लहसुन नहि पड़ए। जखन कखनो ओ बाहर यात्रापर जाथि तँ अपन नियम सबहक पालन कठोरतासँ करथि। बाहरमे बेसीकाल चुरा-दहीसँ काज चलबथि। 

इलाहाबादमे रहितहुँ ओ गामसँ सम्‍पर्क बनओने रहथि आ सभ साल मास-दू मास गाम जा कए रहथि। गामसँ लौटैत काल सभ ग्रामीणक ओहिठाम जा कए भेँट करथि एवं पुनश्च गाम अएबाक इच्‍छा रखैत सभसँ विदा लेथि। एहि क्रममे किछु साल पूर्व ओ गाम गेल रहथि,  ओतहि बहुत जोरसँ बिमार पड़ि गेलाह। हृदयाघातभए गेल रहनि। ओहिठामसँ लोक सभ उठा-पुठा कए दरभंगा अनलकनि। दरभंगामे थोड़ेक सुधार भेला पछाइत इलाहाबाद आपस अएलाह। इलाहाबादमे हुनकर मासो इलाज चलल। बहुत मुश्‍किलसँ हुनकर जान बॉंचल। बिमारीसँ उठलाक बाद एक दिन फोनपर गप्प भेल रहए। बहुत दुखी बुझाइत रहथि। अबल भए गेल रहथि,  तथापि मैथिलीक विकासमे अभिरूचि बनल छलनि आ ओहि विषयमे गप्प करैत रहलाह। 

मैथिलीक विकासक हेतु डॉ. मिश्रजीक अद्भुत योगदान अछि। संविधानक अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीकेँ शामिल करबाक हेतु ओ कतेको साल प्रयास करैत रहलाह। अन्‍ततोगत्‍वा हुनकर ईहो स्वपन्न साकार भेल एवं मैथिलीकेँ संविधानक अष्‍टम् सूचीमे शामिल कएल गेल। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालयसँ सेवा निवृत्त भए ओ मध्‍यप्रदेशमे चित्रकुट स्‍थित ग्रामीण विश्वविद्यालयमे विभागाध्‍यक्ष भेलाह। ओहिठाम ओ कएक साल धरि रहि संस्‍थानक शिक्षण व्यवस्थाकेँ उत्‍कृष्‍ट बनेबामे संलग्‍न रहलाह। नानाजी देसमुख विश्वविद्यालयक उपकुलपति रहथि। देसमुखजी डॉ. मिश्रक कार्यसँ अतिशय प्रभावित रहथि। हुनकर इच्‍छा रहनि जे डॉ. मिश्र ओतए बनल रहथि परन्‍तु मैथिलीक काजमे विशेष रूचि ओ व्‍यस्‍तताक कारणेँ ओ विश्वविद्यालयक काजसँ त्‍याग-पत्र दऽ देलनि। 

डॉक्‍टर मिश्र अत्‍यन्त अध्‍ययनशील व्यक्ति छलाह। रातिमे जखन-तखन ओ उठि जाथि आ पढ़ए लागथि। हुनकर स्‍वास्‍थ्‍यक चिन्‍तासँ फिरसान भए परिवारक लोक कएक बेर आपत्ति करथि जे एतेक परिश्रम नहि करथि,  मुदा ओ अपन कार्यक्रममे अनवरत लागल रहैत छलाह। मैथिलीक नाम सुनिते जेना हुनका स्‍फुर्ति आबि जाइत छल। पेसमेकर लगलाक बादो ओ मैथिलीक आन्‍दोलनक हेतु समर्पित रहलाह आ जतए कतहु हुनका  एहि काजे बजाओल जानि तँ ओ सहर्ष जाथि। 

२००८ इस्‍वीमे,  नव वर्षक आगमनक अवसरपर हम हुनका नव वर्षक मंगल कामना पत्र पठौने रहिएनि। तकर जवाबमे ओ पोस्‍टकार्ड लिखने रहथि जाहिमे थर-थर कँपैत हाथसँ लिखल गेल अक्षर ओ हस्‍ताक्षर देखि हुनक एहू अवस्थामे सकृयताक प्रमाण भेटल। तकर बाद लगभग साल भरि कोनो सम्‍पर्क नहि रहल। जनवरी (२००९) मे एक दिन डॉ. धनाकर ठाकुरजी पत्र इन्‍टरनेट पर पढ़ल,  जाहिमे डॉक्‍टर मिश्रक प्रयागमे मासक दौड़ान निधनक समाचार छल। कतेको बेर ओहि समाचारकेँ पढ़लहुँ। मैथिलीक एकटा अनन्य सेवकक चिर संघर्षक बाद देहावसान भए गेल छल। मिथिलाक गाम-गाममे शोक सभा मनाओल गेल। श्रर्द्धांजलि देनिहार लोक सबहक हुनक प्रति सिनेह अवर्णनीय छल। 

डॉ. जयकान्‍त मिश्र अपने-आपमे मिथिलाक इतिहास छलाह। मिथिलाक कोनो एहन  गाम नहि होएत जतए ओ मैथिली कार्यक्रमक हेतु नहि गेल होथि। विद्यापति समारोह हो,  किंवा मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम सूचीमे शामिल करबाक हेतु आयोजित आन्‍दोलन हो,  वा मैथिलीकेँ शिक्षाक अनिवार्य माध्‍यम बनेबाक प्रयास हो,  सभठाम हुनकर नाम अबिते छल एवम् ओ व्यक्तिगत रूपसँ सभ कार्यक्रमे भाग लइते छलाह। 

जखन-कखनो ओ भेटितथि,  मैथिलीमे लिखबाक हेतु प्रेरित करबे करथि,  मैथिलीक सम्‍मानक हेतु कएल जा रहल प्रयासक चर्चा करितथि, सभ काजपर मैथिलीसँ जुड़ल आन्‍दोलनकेँ प्राथमिकता देबे करथि। 

मैथिलीक एहि अनन्‍य सेवकक कतेक उपकार अछि तकर वर्णन असंभव।हुनक साहृदयता, वाणीक मधुरता एवं अपनत्व सदिखन मोन पड़ैत रहत आ मोन रहत हुनका संग बिताओल गेल अद्भुत क्षण। ओ आब नहि छथि,  मुदा कोटि-कोटि मैथिलक हृदयमे ओ सदिखन विद्यमान छथि आ  रहताह।





 















रविवार, 22 जनवरी 2017

वरिष्‍ठ नागरिक  


वरिष्ठ नागरिक

सन् २००७ मे भारतवर्षमे माता-पिता एवम् वरिष्ठ नागरिकक भरण-पोषण एवम् कल्याण कानून लागू भेल। एहि कानूनमे मूलत: निम्नलिखित चारिटा बिन्दुपर ध्यान राखल गेल अछि-  

१. माता-पिता एवम् वरिष्ठ नागरिकक आवश्यकताक अनुसार गुजाराक जोगार हेतु उपयुक्त व्यवस्था।  

२. वरिष्ठ नागरिक हेतु वेहतर चिकित्साक व्यवस्था।  

३. वृद्ध लोकनिक जीवन एवम् सम्पत्ति केर रक्षा हेतु संस्थागत व्यवस्था।  

४. प्रत्येक जिलामे वृद्धाश्रमक स्थापना।  

उपरोक्त कानूनक अनुसार सन्तानक माने वालिग पुत्र, पुत्री, पौत्र, पौत्री अछि। साठि साल वा ओहिसँ अधिकक कोनो व्यक्ति केँ विरिष्ठ नागरिक कहल जाएत। नि:सन्तान वरिष्ठ नागरिकक सम्पत्तिक वारिस वा ओकर सम्पत्तिपर कब्जा रखनिहार वालिग व्यक्ति ओकर सम्बन्धी मानल जेता। गुजारामे भोजन, वस्‍त्र, आवास एवम् चिकित्साक उचित व्यवस्था शामिल अछि।  
प्रश्न अछि जे उपरोक्त कानूनक आवश्यकता किए भेल? अपन माटि-पानिक संस्कारमे वृद्धकेँ सदैव आदरसँ देखल जाइत छल। परिवारकेँ हुनकर ज्ञान एवम् अनुभवक लाभ तऽ भेटिते छल, संगहि सेवा सामान्य रूपसँ होइत रहैत छल। कालक्रमे संयुक्त परिवार टुटैत गेल। लोक गाम-घर छोड़ि कए नौकरी-चाकरीक जोगारमे महानागर चल गेल। गाममे वृद्ध असगर भए गेलाह। शहरी वृद्धक हालत तऽ आरो खराप होइत जा रहल अछि, कारण ओहिठाम लोक अलग-थलग रहैत अछि। अड़ोस-पड़ोससँ कोनो मतलब नहि रहैत छइ।  
उपरोक्त परिस्थितिमे बुढ़ सभहक हालत खराप होइत गेल। जीवनक अन्‍तिम वर्ष संघर्षमय एवम् दुखद भेल जा रहल अछि। परिबारिक भावात्मक लगाव कम भेल जा रहल अछि। कतेको वृद्ध लोकनिकेँ आमदनीक श्रोत नहि छै आ परिवार उचित व्यवस्था नहि करैत अछि। जिनका अधिक धिया-पुता अछि ओ सभ एक-दोसरपर फेका-फेकी करैत रहै छथि। उपरोक्त परिस्थिति निपटक हेतु एवम् वृद्धजनक कल्याणक हेतु ई कानून बनल। एहिसँ पूर्व सी.आर.पी.सी.क अधीन राहत हेतु मोकदमा चलि सकैत छल, मुदा ओ बहुत जटिल प्रक्रिया अछि। निपटानमे बहुत समय लागि जाइत अछि। 
२०१७ इस्वीसँ लागू उपरोक्त कानून बहुत असरदार अछि। एहिमे तीनसँ चारि मासमे न्याय भए जाइत अछि। कोनो पक्ष ओकील नहि राखि सकैत अछि। हरेक जिलामे एहि हेतु न्यायाधिकरण अछि। न्यायाधिकरण मामलाक सार-संक्षेपमे सुनवाइ कए कए १० हजार रूपैआ मासिक धरिक राहत दिया सकैत अछि। एहि कानूनमे सभसँ विशेष बात ई अछि जे जँ माता-पिता किंवा वरिष्ठ नागरिकक सम्पत्ति हुनक सन्तान किंवा सम्बन्धी लइ छथि आ हुनकर पालन-पोषणमे कोताही करै छथिन तऽ सम्बन्धित माता-पिता वा वरिष्ठ नागरिक न्यायाधिकरणमे दर्खास्त दए सकै छथि आ न्यायाधिकरण के ओहन सम्पत्ति हस्‍तांतरणकेँ निरस्त कए ओहि पर माता-पिता वा वरिष्ठ नागरिकक मालिकाना हक आपस दिया सकै छथि। एहि न्यायाधिकरणक निर्णयक विरूद्ध कोनो सिविल कोर्टमे सुनवाइ नहि भए सकैत अछि। जरूरत पड़लापर जिलाधिकारीक समकक्ष अधिकारीक अध्यक्षतामे गठित अपीलीय न्यायाधिकरण ओहिठाम अपील कएल जा सकैत अछि। 
एहि कानूनकेँ लागू भेला पाँच बर्ख भए गेल तथापि गामसँ शहर धरि वृद्ध-वृद्धा लोकनिक समस्याक समाधान नहि भए सकल। तकर एकटा प्रमुख कारण ई थिक जे माता-पिता अपने सन्तानक विरूद्ध नहि बजै छथि। लोक लाजक कारणेँ परिबारिक विषयपर चर्चो नहि करए चाहै छथि। अपवादिक मामलामे आसपासक लोककेँ पता लगैत छइ। थाना, पुलिस, कोर्ट, कचहरी के करत? जीवनक संध्यामे एहि तरहक फसाद करब सम्भव नहि बुझाइत अछि। 
समस्या मात्र आर्थिक नहि अछि। वयोवृद्ध लोकनिकेँ शारिरिक अक्षमता एवम् निर्भरता बढ़ैत जाइत छै। जँ पैसा बैंकमे अछि तऽ आनत के? जँ क्यो आनियोँ देलक तऽ रोज-रोज वस्तु-जात केना आएत? आबियो जाएत तऽ ओकर मनोनुकूल उपयोग कए सकता ताहि बातकेँ के सुनिश्‍चित करत
जे बात हृदय एवम् श्रद्धासँ भए सकैत अछि ओकरा कानून द्वारा लागू केना कएल जाएत? जाहि वृद्ध सभकेँ सन्तान नहि अछि, हुनक समस्या आर जटिल रहैत अछि कारण निकट सम्बन्धी हुनकर सम्पत्तिपर धपाएल रहै छथि आ सम्पत्ति कब्जा कए निपत्ता..
भारतीय संविधानक चारिम भागक ४१म अनुच्छेदमे वृद्ध लोकनिक हित रक्षा करबाक परामर्श अछि। मुदा ई दिशा निर्देश हेबाक कारणेँ कानूनी अधिकार नहि दैत अछि। हिन्दू दत्तकक ग्रहणसँ भरण-पोषण अधिनियम, १९५६क अधीन पहिल बेर कानूनी तौरपर बेटा एवम् बेटीकेँ माता-पिताक पालन-पोषण करबाक जिम्मेदारी देल गेल। अपराधिक प्रक्रिया संहिताक धारा १२५ मे पहिल बेर सन् १९७३ मे व्यवस्था कएल गेल जे आर्थिक रूपसँ सक्षम सन्तानकेँ माता-पिताक भरण-पोषण करबाक कानूनी दायित्व अछि। मुदा एहि कानूनकेँ व्यवस्थाक अनुसार ज्यादासँ ज्यादा ५०० रूपैआ प्रतिमास माता-पिताकेँ भेटि सकैत छै। उपरोक्त रकम वर्तमान समयमे देखैत हास्यास्पद लगैत अछि। ई कानून सभ धर्मक लोकपर लागू होइत अछि।  
वृद्ध लोकनिक भरण-पोषण हेतु सभसँ धारदार कानून माता-पिता एवम् वरिष्ठ नागरिकक भरण-पोषण एवम् कल्याण अधिनियम २००७ अछि। वरिष्ठ नागरिकक जीवन संध्यामे आर्थिक कष्टक निवारण हेतु रिभर्स मोर्गेज स्कीम २००८ आनल गेल अछि। ओ अपन अर्जित मकानकेँ बैंकक पास बन्धक राखि कए ओहि एवजमे आजन्म मासिक आय प्राप्त कए सकै छथि, संगहि ओहि मकानमे रहिओ सकै छथि। हुनकर मृत्युक पश्चात हुनकर उत्तराधिकारी बैंकक ऋृण सूद सहित अदा कए मकान आपस अपना नामे करा सकै छथि अन्यथा बैंक ओहि मकानकेँ बेचि कर्जक रकम चुकता कए सकैत अछि।  
एहनो वृद्ध छथि जिनका सन्तान सम्पत्ति किछु नहि अछि। ओ की करता? कानूनसँ हुनका कोनो मदति सम्भव नहि? बहुत रास वृद्धक सन्तान परदेशमे नौकरी आकि व्यवसाय करै छथिन। एहन बुढ़ सभ मजबूरीमे शहर अपन सन्तान लग चलि जाइ छथि मुदा ओहिठाम हुनका मन नहि लगै छै। गाम-घर छुटबाक दरेग हरदम मनमे कचोटैत रहै छै। सारांश जे वृद्धजनक जीवन-यापन एवम् समुचित व्यवस्था एकटा गम्‍भीर समस्या भए गेल अछि चाहे ओ गाम हो, शहर हो, धनीक हो वा गरीब। सभ एहि समस्याक शिकार छथि। सभकेँ एक दिन एहि परिस्थितिसँ गुजरबाक अछि। जे आइ युवक अछि, काल्हि ओहो वृद्ध होएत। समाजिक परिस्थिति क्रमश: बिगड़िते जा रहल अछि। धिया-पुता जे देखत सैह ने आगू करत। ई बात सभ सोचैत अछि मुदा किछु मजबूरीमे आ किछु लापरवाहीमे घरक बुढ़केँ काहि काटक हेतु विवश छोड़ि दइ छथि। वृद्ध लोकनिसँ जुड़ल एक-सँ-एक घटना नित्यप्रति समाचार पत्र, रेडियो, दुरदर्शनपर अबैत रहैत अछि। एकटा एहने घटना किछु दिन पूर्व दिल्लीमे घटल। एक वृद्ध महिलाक पतिक मृत्यु भए गेल छलनि। दिल्लीमे हुनका आलीशान भवन छलनि। पुत्र अमेरिकामे काज करैत रहथिन। बहुत दिनपर पुत्र दिल्ली अएला आ माएकेँ अपना संगे चलबाक प्रस्ताव केलखिन। 
बेटाक बातसँ माए बहुत प्रसन्न भेली। दिल्लीक एकाकी जीवनसँ ओ तंग भए गेल छेली। बेटा कहलखिन जे जखन सभ गोटे अमेरिकामे रहब तऽ दिल्लीक घरक की होएत? से नहि तऽ एकरा बेचि लेनाइए ठीक रहत। माए सहर्ष ई प्रस्ताव मानि लेलथि। दिल्लीक मकान बेचि देल गेल। सभटा टाका बेटाक खातामे जमा भेल। तकर बाद सभ क्यो दिल्ली हवाई अड्डा पहुँचला। अमेरिकाक यात्राक क्रममे। माएकेँ बाहर बैसा देलखिन्, ई कहि कए जे टिकट कटा कए आबि रहल छथि। माए बाहर प्रतीक्षा करैत रहली आ ओ किएक आपस अएता। जखन बहुत समय गुजरि गेल तऽ पुलिस ओहि वृद्धा लग आएल आ ओकर बात बुझलक। तखन हठात्‍ पुलिस कहलकै जे अमेरिकाक जहाज उड़ला तऽ घण्‍टो भए गेलइ। बटा माएकेँ छोड़ि कए अमेरिका चल गेल। बुढ़िया असगर कनैत रहल...।  
ई बात ओकर मकान कीननिहारकेँ सेहो पता लगलैक। बुढ़ियाकेँ अपन घरमे एकटा छोटसन जगह देलकै। बेटा घुरि कए कहियो हाल-चाल लेबए नहि आएल। लोककेँ कतेक धोखा भए सकैए तकर ई उदाहरण अछि। 
दिल्ली विश्वविद्यालयक विधि विभागक प्रोफेसर ८७ वर्षीय लोतिका सरकारक खिस्सा जगजाहिर अछि। दिल्लीक K-१/१० हौजखास इनक्‍लेभमे हुनकर घर छल जकरा हुनकर परिबारिक मित्र हथिया लेने छलाह। घटनाक्रम तेहन भेल जे हुनका अपने घरसँ बाहर होमए पड़ल। तखन हुनकर इष्ट-मित्र सभकेँ एहि बातक जानकारी भेल। प्रो. लोतिका सरकारक तरफसँ समाजिक संगठन वरिष्ठ नागरिक न्यायाधिकरणमे केस केलक।  
तमाम पूछ-ताछक पश्चात उपरोक्त न्यायाधिकरण लोतिका सरकार द्वारा कथित उपहारमे देल गेल हुनकर घर हुनका आपस दिओलक। लोतिका सरकारक सम्पत्ति हरपनिहार एक उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी छलाह जे हुनकासँ दोस्‍तीक स्‍वांग करैत-करैत हुनकर कीमती घरकेँ कब्‍जिया लेला। जँ दिल्लीक संभ्रान्त समाजक मदति नहि करैत तऽ प्रो. लोतिका सरकारक तऽ लूटा गेल छल। सेहो एहन व्यक्ति द्वारा जे स्वयं अति शिक्षित उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी छलाह। रक्षको यत्र भक्षकः सिद्ध भए रहल छल। 
होमपेज इण्‍डिया द्वारा कएल गेल एकटा सर्वेक्षणक मुताबिक प्रत्येक तीनमे सँ एक वृद्धकेँ परिबारिक लोक द्वारा प्रतारणाक सामना करए पड़ैत छै। ५६ प्रतिशत एहन मामलाक हेतु पुत्र एवम् २५ प्रतिशत मामलामे पुत्रवधु जिम्मेदार होइ छथि। एहिमे सँ आधासँ अधिक वृद्ध एहन घटनाक बारेमे मूलत: परिबारिक प्रतिष्ठाकेँ ध्यानमे रखैत ककरो नहि कहैत छथि। एहन घटना मध्य प्रदेशमे सभसँ अधिक (४७.९२ प्रतिशत) आ राजस्थानमे सभसँ कम (१.६७ प्रतिशत) भेल। अधिकांश वृद्धक धारणा अछि जे वृद्ध लोकनिक दुर्दशा रोकबाक हेतु धिया-पुताकेँ सचेष्ट करब जरूरी अछि। वृद्ध एवम् बच्चाकेँ आपसी सिनेह एवम् सामंजस्य बढ़ाएब जरूरी अछि। अर्जित आत्म निर्भरता सेहो जरूरी अछि। वृद्धजनकेँ संयुक्त परिवारमे रहबाक व्यवस्थाकेँ उत्साहित करबाक हेतु राष्ट्रीय नीति बनक चाही एवम् ओहन लोक सभकेँ टैक्‍स एवम् सरकारी नौकरीमे विशेष सुविधा देबाक चाही। एक अन्य प्रतिवेदनक अनुसार सन् २००० सँ २०५० क बीचमे भारतक जनसंख्या ६० प्रतिशत बढ़ि जाएत। 
एहि अवधिक बीच वरिष्ठ नागरिकक संख्या ३६ प्रतिशत बढ़ि जाएत जे तत्काल आवादीक २० प्रतिशत होएत। ईहो कहल गेल अछि जे विश्वमे २०५० इस्वी धरि महिला वरिष्ठ नागरिकक संख्या पुरुखसँ अधिक भए जाएत। समाजमे महिलाक स्थिति ओहिना संघर्षपूर्ण रहैत अछि। ८० बर्खसँ ऊपर पुरुखक तुलनामे महिला अधिक दिन जीबै छथि। जाहिमे अधिकांश बिधवा भए गेल रहै छथि। सर्वेक अनुसार ८० बर्खसँ बेसी आयुवर्गमे ७० प्रतिशत बिधवा एवम् २९ प्रतिशत विधुर छथि।  
समाजक उपेक्षा एवम् लिंग आधारित भेदभावक कारण बिधवा वृद्धाक जीवन अपेक्षाकृत बेसी कष्टकर भए जाइत अछि। शिक्षा एवम् जगरुकताक अभावमे ओ सरकारी सहायताक लाभ नीकसँ नहि उठा पबै छथि। कएक बेर हुनकर सम्पत्तिकेँ हरपि लेल जाइत अछि एवम् नाना प्रकारक प्रतारणाक शिकार सेहो होमए पड़ैत अछि। 
निरंतर बढ़ैत वृद्धक जनसंख्या आ लड़खड़ाइत परिबारिक संरचना वरिष्ठ नागरिक सभहक समस्याकेँ जटिल केने जा रहल अछि। पूर्वमे किछु कानूनी व्यवस्थाक चर्चा भेल मुदा समस्या अछि जे अपने सन्तानक विरूद्ध न्यायक मांग कए आगू बढ़ैबला हजारमे क्यो एक व्यक्ति होइ छथि, शेष लोक यंत्रनापूर्ण जीवन बीतबैत स्वर्ग सीधारि जाइ छथि।  
आइसँ करीब २९ बर्ख पूर्व दिल्लीमे स्कूटरक पाछाँ एकटा बुढ़केँ उघारे देहे आ एकटा हाथ ऊपर उठेने जाइत देखने रहिऐक। पुछलियनि जे ई एना किए छथि? तऽ आसपासक लोक सभ कहलक जे किछु साल पर्व हुनका अपन बेटाक संगे किछु विवाद भए गेल रहनि आ ओ हुनकर अँगा फाड़ि देलखिन तहियासँ ओ अँगा पहिरब छोड़ि देलखिन आ विरोध-स्वरूप एकटा हाथ हमेशा आकाश दिशि केने रहै छथि। ..सोचल जा सकैए जे ओहि पिताकेँ कतेक आन्तरिक कष्ट भेलनि जे एहन रूप धऽ लेलथि ।  
समस्या तऽ ई अछि जे घर-परिवारसँ अनादृत, उपेक्षित होइतो वृद्ध लोकनि जाथि तऽ कतए जाथि? कोनो दोसर विकल्‍प नहि बुझाइत अछि? नौकर-चाकरपर निर्भरता कतेको बेर जानलेबा साबित होइत अछि। घरमे असगर रहनिहार बुढ़क समस्या तऽ आर जटिल भए गेल अछि।  
सरकारी एवम् गैर-सरकारी संस्था द्वारा वरिष्ठ नागरिकक हेतु आवास सहित आन व्यवस्था सभ सेहो कएल गेल अछि मुदा ओ अपर्याप्त अछि। दिल्ली, फरीदावाद, नोएडामे एहन कतेको आवास (ओल्‍ड एज होम) अछि। 
परन्तु एहि सभ ठाम रहनिहार वृद्ध लोकनिक हालत कोनो नीक नहि कहल जा सकैत अछि। कलकत्तामे डीगनीटी फाउण्‍डेसन, प्रोग्राम आदि नामसँ कतेको एहन संस्था सभ एहि क्षेत्रमे काज कए रहल अछि। मुदा वृद्ध लोकनिक संख्या देखैत एहन सुविधा नगण्य अछि। फेर अधिकांश बुढ़ तऽ ग्रामीण क्षेत्रमे रहि रहल छथि। जाहिठाम परिवारक अतिरिक्त कोनो प्रकारक सहायताक सम्भावना नहि अछि।  
सरकार वरिष्ठ नागरिक लोकनि लेल कएटा सुविधा सभ दैत अछि, जेना- रेल टिकटमे छूट, अस्पतालमे अलग काउन्टर, पोस्‍ट ऑफिस, बैंक आदि सन सार्वजनिक जगहपर अतिरिक्त सुविधा मुदा व्यवहारमे ई सुविधा सभ पर्याप्त नहि होइत अछि। अक्‍सर वृद्ध लोकनिकेँ झगड़ा करएपर मजबूर होमए पड़ै छनि। एहि मामलामे दिल्लीक मेट्रोमे निश्चय बेहतर व्यवस्था अछि। वरिष्ठ नागरिककेँ आसानीसँ आरक्षित जगहपर बैसए देल जाइत अछि।  
दिल्ली लोदी गार्डेनमे भोरू-पहरमे टहलैबला सभहक हुजुम रहैत अछि। ओहिमे कएटा संगठित समूह बनि गेल अछि जाहिमे अधिकांश वरिष्ठ नागरिक लोकनि छथि। ओ सभ भोरकेँ टहलै तऽ छथिहे संगे आपसमे भेँट-घाँट आ गप्प-सप्प सेहो करैत रहै छथि। श्री भुरेलाल (सेवा निवृत्त आइ.ए.एस.) क ठाकुरद्वारा ट्रस्‍ट सेहो ओहिठाम बहुत सक्रिय अछि। वृहस्पति दिनकेँ नि:शुल्‍क चाहक व्यवस्था ओतए रहैत अछि। टहलला पश्चात सभ ओतए एकट्ठा होइ छैत, चाह पीबै छथि आ आपसमे अपन-अपन नीक-अधलाहक चर्च-बर्च करैत, हाँ-हाँहीं-ही करैत सभ क्यो घर घुमै छथि।  
एहि सम्पर्कक प्रभावसँ कएटा वृद्धकेँ घोर विपत्तिसँ उबड़ैत पुनश्च नव उत्साहक संग जीबैत देखिलहुँ। ठाकुरद्वारा ट्रस्‍ट एकटा गैर-सरकारी संगठन अछि जे कतेको तरहक सेवा कार्य करैत अछि। कोसीक जखन बाढ़ि आएल छल तऽ अहू ट्रस्‍ट द्वारा ट्रक भरि सहायता-सामग्री लए कए लोक सभ ओतए जरूरतमन्द लोकनिकेँ बीच बितरित केलनि। लोदी गार्डेनमे सेहो समय-समयपर अनेको कार्यक्रम ई सभ आयोजित करैत रहै छथि।  
हौज खास, दिल्ली स्थित डियर पार्कमे सिनियर सिटिजन कॉसिल, दिल्लीक नामक एकटा संस्था अछि जे वरिष्ठ नागरिकक सुख-सुविधा आ मनोरंजनक लेल व्यवस्थामे लागल रहैत अछि। समय-समयपर ओ सभ विदेश भ्रमणपर सेहो जाइत रहै छथि। भोरमे ७ बजेसँ ८:३० बजे धरि नित्य योग व्‍यायाम सहित अन्यान्य सांस्‍कृतिक कार्यक्रमक आयोजन कएल जाइत अछि। पाँच सएसँ अधिक नागरिक एहि संस्थाक सक्रिय सदस्य छथि। किछु दिन पूर्व केन्‍द्र सरकार गरीबी रेखासँ निच्चाँबला वरिष्ठ नागरिकक हेतु मुफ्तमे छड़ी, चश्‍मा आ कानमे लगबैबला उपकरण देबाक घोषणा केलक अछि। जिलाक कलक्टरक अधीन गठित एकटा समिति एहन लाभार्थीक पहचान करत। उपरोक्त समिति कानमे लगबैबला मशीन, चश्‍मा आ नकली दाँत इत्‍यादि वरिष्ठ नागरिकक हेतु बनेबाक लेल मूलभूत मेडिकल परीक्षण सेहो कराएत । जनवरी २०१७ इस्वीसँ मार्च २०१७ इस्वीक बीच सभ जिलामे १००० वरिष्ठ नागरिककेँ ई सुविधा देल जाएत।  
एवम् प्रकारेण सरकार ओ समाज सेवी लोकनि वरिष्ठ नागरिकक कल्याण हेतु बहुविध प्रयास कए रहल छथि। मुदा ई समस्त प्रयास मिलियो कए परिवारक स्थान नहि लए सकैत अछि। अस्तु जरूरी अछि जे आधुनिकता एवम् वैश्‍वीकरणक प्रवाहमे हमरा लोकनि अपन संस्कारकेँ नहि बिसरी। माता-पिता, एवम् अन्य वरिष्ठ नागरिकक प्रति अपन दायित्व निर्वाह आनन्दपूर्वक करी जाहिसँ ओ गर्वसँ जीबथि आ शान्‍तिसँ अपन जीवनक यात्रा पूर्ण करथि।  
समाजमे एहन लोककेँ उत्साहित करक चाही जाहिसँ अधिकांश लोक अपन माता-पिताक सेवा कानूनक भयसँ नहि अपितु कर्तव्यक भावनासँ करथि। एहि उद्देश्यसँ पटना स्थित आचार्य किशोर कुणालजी द्वारा स्थापित महावीर मन्‍दिर ट्रस्‍ट द्वारा श्रवण कुमार पुरस्कार पुत्र द्वारा माता-पिता आ पुतोहु द्वारा ससुरक सेवा केनिहारकेँ देल जाइत अछि। समाजमे विरिष्ठ नागरिकक जीवन सुगम करबामे एहि तरहक प्रयास निश्चय प्रेरणादायी भए सकैत अछि।  
अस्तु समाजमे वृद्ध लोकनिक आदर, सम्‍मान ओ सेवा बढ़य से संस्कार बच्‍चेसँ धिया-पुताकेँ देल जाए, एहिमे सभहक कल्याण अछि।  

अभिवादनशीलस्य नित्‍यं वृद्धोपसेविन:

चत्वारि तस्य वर्धन्‍ते आयुर्विधा यशोवलम्।



गामक इसकुल



गामक इसकुल

बालोहं जगदानन्द, नमे बाला सरस्वती

अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्रयम्।

बाबूजी नित्य एहि श्‍लोककेँ रटबैत कहथि जे एहिसँ संस्कार प्रवल होएतकिओ पढ़ल-लिखल लोक जँ नजरिपर पड़नि तँ हुनकासँ भेँट जरूर करबैत छलाह। पढ़ाइ-लिखाइमे कोताही हुनका एकदम पसिन नहि छलनि। गाममे रामलीला होइत तँ कएक बेर धिआ-पुताक संग हमहु चलि जाइ, मुदा ओ पूरा सख्तीसँ एकर विरोध करथि।

माए घोर परिश्रमी छलीह। भोर-सँ-साँझ धरि परिवारक पालन-पोषणक ब्यवस्थामे लागल रहैत छलीह। कएक दिन माए लग बैस कए खिस्सा सुनी। कहितथि जे केना बच्चामे हुनकर पढ़ाइ छुटिगेलनि, नहि तँ ओ बहुत पढ़ितथि। हम सभ भाए नीकसँ पढ़ी ताहि हेतु कोनो प्रकारक व्यवधान नहि होइक से ओ सदिखन प्रयत्नशील रहैत छलीह

परिवार जीवनक प्रथम पाठशाला थिक। परिवारमे जे संस्कार बच्चाकेँ पड़ि जाइत अछि ओ जीवन भरि ओकर संग रहैत अछि। हम सभ खूब पढ़ी-लिखी आओर जीवनमे प्रतिष्ठित रही ताहि हेतु हमर माए, बाबूजी निरन्र तत्‍पर रहैत छलाह।

गाममे नीक दिन तका कए भट्ठा धराएल जाइत छल। नामासीधं (‘ओम् नमः सिद्धं') पढ़ि कए विद्यारम्भ होइत छल। हमहु वृहस्पति दिन दरबज्जापर भट्ठा पकड़ने रही। से कनी-कनी अखनो स्मरण अछि। स्व० बच्‍चूबाबू (पं. अदिष्ट नारायण झा )हमरा भट्ठा धरओने छलाह। गामक ब्रह्मस्थानमे गाम भरिक लोक दूध ढारैत छल। बेर-कुबेरमे लखराम-महादेवक पूजा होइत छल। सालमे एकाध बेर नवाह सेहो होइत छल। मन्दिरक सटले बिनु घाटक एकटा पोखरि सेहो छल। ओहीठाम फूसक मड़बामे इसकुल चलैत रहए। इसकुलकेँ ग्रामीण स्व० पं. अदिष्ट नारायण झाजी (बच्‍चूबाबू )चलबैत रहथि। गाम भरिक छोट-छोट बच्चा सभ ओहि इसकुलमे पढ़ैत रहए। ओही इसकुलमे एकटा शिक्षक आ तीस-चालीसटा विद्यार्थी रहथि

इसकुलमे पठन-पाठनक प्रारंभ प्रार्थनासँ आ अन् १ सँ २० तकक खाँत पढ़लासँ होइत छल। नित्यप्रति खाँतक उच्चारण करैत-करैत पूर्णत: कण्‍ठाग्र भए गेल। एहिसँ गामक विद्यार्थीकेँ गणितक सबाल हल करबामे बहुत सुविधा होइत छल। ओही इसकुलमे शनि दिनक शनिचरीक परंपरा सेहो छल। शनिचरीमे सभ बच्चा अपन-अपन घरसँ गुड़-चाउर अनैत छलाह। पूजा होइत, प्रसाद बाँटल जाइत आ बच्चा सभ हँसैत-बजैत घर चलि जाथि। सालमे दू किलास लोक पढ़ि लैत छल। कहक माने जे चौथा पास करएमे दू साल लगैत रहए। ओहि समयमे के.जी. आकि अपर-के.जी. आदिक प्रथा नहि छल। बच्चा सभ नीक दिन कए घरेपर भट्ठा धरैत छल, ककहरा सिखैत छल आ लग-पासक ब्रह्मस्थानक इसकुलमे नाम लिखा लैत छल। ब्रह्मस्थानक इसकुलमे कखनो-काल विद्यार्थीकेँ डाँट-दबार सेहो होइत रहए। जँ कहिओ कोनो बच्चा इसकुल नहि आएल तँ ओकरा आनए लेल चारिटा विद्यार्थी घरपर पहुँच जाइत छल आ उठा-पुठा कए लए अबैत छल। कुल मिला कए ओहि इसकुलमे पढ़ाइ नीक होइत रहए। इसकुलक आगाँमे एकटा खोपड़ी छल जाहिमे कहिओ-काल विद्यार्थी नुका रहैत छल।

ब्रह्मस्थानक इसकुलसँ चौथा पास कए हम अड़ेर मिडिल इसकुल पहुँचलहुँ। ओ अपेक्षाकृत पैघ इसकुल छल। दूटा कोठरी पक्काक आ तीन वा चारिटा फूसक। पक्काबला एकटा कोठरीमे सातमा क्‍लासक विद्यार्थी पढ़ैत छलाह आ दोसर कोठरीमे चारि वा पाँचटा शिक्षक लोकनि रहैत छलाह। इसकुलक प्रधानाचार्यसँ सभ विद्यार्थी बहुत डराइत रहैत छल। ओ बहुत सख्त छलाह। विद्यार्थीकेँ हुनका हाथे कएक बेर पिटाइत देखि शेष विद्यार्थी भयभीत भए जाइत छल। इसकुलक दहिना दिस करबीर फूलक एकटा झमटगर गाछ छलैक। ओकर छौकीसँ कएक बेर पिटाइक कार्यक्रम होइत छल। इसकुलक जहिना अनुशासन उत्तम तहिना पढ़ाइ-लिखाइ छल। दहिना कातमे थोड़ेक खाली जमीन छलैक, जाहिमे विद्यार्थी सभकेँ फूलक कियारी लगबैक हेतु उत्‍साहित कएल जाइत छल।

बच्चा सबहक आग्रहपर मास्टर साहेब खिस्सा सेहो सुनबैत छलाह। मास्टर साहेब हमरे गामक छलाह। टाँग टेबुलपर, छड़ी बगलमे आ फोंफ कटैत हुनकर मुद्रा अखनो स्मरण भए जाइत अछि। विद्यार्थी सबहक हेतु ई स्वर्णिम-काल होइत छल। बच्चा सभकेँ किछु सबक दए देल जाइ, जाहिसँ ओ सभ व्यस्त भए जाए आ मास्टर साहेब चैनसँ फोंफ काटए लागथि। जँ बच्चा सभ हल्ला करए लागए जाहिसँ कि मास्टर साहेबक निन्न टुटि जानि, तखन देखएबला दृश्य सोझाँ आबि जाइत। छड़ीक लपलपाहटसँ क्‍लास सन्न भए जाइत रहए आ मास्टर साहेब पुनश्च शयन मुद्रामे चलि जाथि।

कहिओ-काल इसकुलक छुट्टीक घन्‍टी विद्यार्थी स्वयं टुनटुना देथि। घन्‍टी सुनिते विद्यार्थी सभ धराधर बाहर झोड़ा लेने इसकुलसँ निकलि जाए। जाबे मास्टर साहेब सभकेँ पता लागनि-लागनि ताबे सभ चटिया बाहर..! छुट्टीक एहि आकस्मिक घोषणासँ आनन्ददायी की भए सकैत छल?

फूसक इसकुलमे छठा तकक क्‍लास होइत छलबरखाक समयमे इसकुलक टाट खसए लगैत छल। टाटक स्थित एहन जे थोड़बो प्रयाससँ ओ कखनो खसि सकैत छल। कएक दिन विद्यार्थी बरखा होइत-काल टाटक जौरकेँ काटि दैक। जाहिसँ इसकुलक टाट खसए लगैत छल आ सभ विद्यार्थी रेनी डे मनबए इसकुलसँ बाहर भए जाइत छल। इसकुलक हेड मास्टर बहुत सख्त आ तमसाह छलाह। कोन बातपर कतेक तमसा जेताह तकर कोनो ठेकान नहि। मुदा डरक संग-संग इसकुलमे अनुशासनक वातावरण स्थापित करबामे ओ सफल छलाह। मास्टर साहेब सबहक डाँटक डरे कएक दिन विद्यार्थी लगपास खसकि जाइत छल। एकटा मास्टर तँ पेटमे  बिट्ठु    काटबाक हेतु प्रसिद्ध छलाह। एहि प्रकारक दण्ड सभसँ बचए लेल कएटा विद्यार्थी धारक काते-काते किंवा पूलक तरमे समय कटैत छल आ छुट्टी भेलापर ओतहिसँ घर आपस भए जाइत छल। हिन्‍दी माध्यमक इसकुलमे पाँचमासँ अंगरेजी पढ़ेबाक चेष्टा होइत छल। जँ किओ अपन नाम अंगरेजीमे लिख लेलक तँ बड़का बात बुझल जाइत छल। आइ-काल्हि अंगरेजी माध्यमक इसकुलमे पढ़एबला बच्चा सबहक अंगरेजीक ज्ञान देखि गामक इसकुलक स्थिति हास्यास्‍पद् लगैत। यद्यपि इसकुल मिथिलांचलक गढ़मे अवस्थित छल, बच्चा सभ सोल्‍हन्नी मैथिली भाषी छलाह, तथापि इसकुलक पढ़ाइ हिन्‍दीमे होइत छल। मास्टर सभ आदेश हिन्‍दीमे दैत छलाह। भाषाक ई विसंगति कमोवेश अखनो ओहिना अछि...! (ओना, आब तँ अपन-अपन बच्चाकेँ गामसँ हटा रहिका लग फटकीमे किंवा मधुबनीक कोनो अंगरेजी माध्यमक इसकुलमे पढ़बैत अछि।)

 सांस्कृतिक कार्यक्रमक नामपर कहिओ-काल स्कूलेक ओसारापर विद्यार्थी सबहक जमावरा सेहो होइत छल। किओ-किओ विद्यार्थी ओहिमे गीत गबैत छलाह। सन् १९६२ ईस्‍वीमे चीन संगे भारतक युद्ध चलैत छल। ओहि समयमे बच्चा सभ राष्ट्र-प्रेमक गीत बरोबरि गबैत रहैत छलाह। ओना, इसकुलक प्रार्थनामे जय शंकर प्रसाद जीक गीत-

हिमाद्रि तुँग श्रृँग से प्रवुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्वला स्वतंत्रता पुकारती... होइत छल।

जखन-कखनो संगीतक कार्यक्रम होइत तँ एकटा विद्यार्थी एकमात्र गीत गाबथि-

चीन के विगरलबा चलनियॉं कैसे सुधरी...।

इसकुलक समय सालक-साल बीतैत गेल। एक क्‍लाससँ दोसर क्‍लास विद्यार्थी टपैत गेलाह। सातमाक परीक्षाक परिणाम निकलल आ विद्यार्थी सभ हाई इसकुल दिस प्रस्थान केलक।

पाँचमामे सोंहसाक लक्ष्‍मी नाराण महतो प्रथम स्थान अनने छलाह। लक्ष्‍मीजी देखबामे कारी रहथि, कण्‍ठी पहिरथि। पश्चात पता लागल जे हुनका साँप काटि लेलकनि आ असमये काल कलवित भए गेलाह! ओहि समय हम सभ हाई इसकुलमे पढ़ैत रही। छठामे हम प्रथम केने रही आ सातमामे दोसर स्थान भेटल छल। सातमामे दोसर स्थान बहुत खराप लागल छल। कारण प्रथम स्थान जिनका भेलनि ओ ओहि योग्य नहि बुझाइत छलीह। बाबा इसकुल जा कए मास्टर सभकेँ उपरागो दए आएल रहथिन। मास्टर सभ कॉंपी देखेलखिन जे अहाँक बच्चाकेँ सहीए अंक देल गेल अछि। बाबूजी कहथिन जे कोनो बात नहि, बोर्डक परीक्षामे थोड़े बेइमानी होएत

गामक मिडिल इसकुलक पढ़ाइ-लिखाइ ठीक छल। सामान्यत: कोनो घन्‍टी खाली नहि रहैत छल। मुदा पढ़एमे कमजोर विद्यार्थीकेँ बेर-बेर कहल जाइत छल-

पढ़बे करोगे कि मरबे करोगे।

कएक बेर तमसा कए मास्टर साहेब विद्यार्थीक ऊपर छड़ीक प्रहार करैत चिकरि-चिकरि कहथि-

ब्रेंचपर ठाढ़ कए देब! कान पकड़ि कए उट्ठी-बैसी कराएब!”

छड़ीसँ पिटनाइ तँ आम बात छल। परिणामत: कमजोर विद्यार्थीक मनोबल आओर कमजोर भए जाइत छल आ ओ सभ कन्नी काटए लगैत छल। विद्यार्थी सबहक अन्य क्रियाकलापक रूचिक विकासक कोनो प्रयास इसकुलमे नहि होइत छल। एहि तरहें सामान्य ओ कमजोर विद्यार्थी सभ भगवाने भरोसे रहैत छलाह। चूँकि सातमामे वोर्डक परीक्षा नहि होइत छल तेँ सामान्यत: विद्यार्थी सभ पास कए कए आठमामे आन ठाम हाई इसकुलमे नाम लिखा लैत छल।

मिडिल इसकुलक एकटा घटना स्मरण भए रहल अछि जे सोचि कए अखनो हँसी लागि जाइत अछि। इसकुलमे कोनो कोनो बात लए कए हमरे गामक एकटा विद्यार्थी इसकुलसँ भागल आ आओर विद्यार्थी सभ मास्टरक आदेशपर ओकर पछोर केलक। इसकुलसँ निकलि कए दहिना कातमे एकटा इनार छलैक। ओ विद्यार्थी इनार फानि गेल आ भागल। जाहिठाम एतेक आतंक विद्यार्थीक हेतैक, ताहिठाम विद्यार्थीक भविष्य सोचल जा सकैत अछि। ओ विद्यार्थी बादमे जा कए भगता भए गेल। बहुत दिन धरि ओकरा देहपर भगवती अबैत रहलखिन।

एकदिन मिडिल इसकुलमे क्‍लास चलि रहल छल। ओहिमे कएक गोटे बाजि उठलाह -

डा. सुभद्र झा जा रहल छथि।

डा. सुभद्र झाक गाम नागदहक रस्ता इसकुलक सामनेसँ जाइत छल। इसकुलक सामने नहरिपर एकटा काठक पूल छल। ओहिपर सँ डा. सुभद्र झा सपरिवार जा रहल छलाह। प्राय: पहिल बेर हम हुनका तखने देखने छलहुँ। तकर बाद तँ कएक बेर भेँट भेलाह। राँचीमे हुनकर डेरापर एक मास रहबो केलहुँ। आ ई क्रम बहुत दिन चलैत रहल। इलाकामे विद्वानक रूपमे हुनक धाख छलनि। जाबे ओ जिबैत रहलाह, नित्य किछु-ने-किछु हुनकर प्रसंगपर चर्चा चलैत रहैत छल।

मिडिल इसकुलमे सरस्वती पूजाक समयमे विद्यार्थी सभमे बेस उत्‍साह रहैत छल। प्रसादमे बुनियाँ आ केसौर बँटाइत छल। सरस्वती पूजाक प्रसाद नहि भेटबाक उपराग सुनू-

पश्‍चिम इसकुल पूरव धार

जनता हेलि-हेलि भेला पार

मिडिल इसकुलसँ आएल हकार

पूरय गेलहुँ सेहो वेकार...।

उपरोक्त कविता हमरे गामक स्व. सीताकान्त झा(नाथ) क कहल छल। ओ बहुत रास एहन कविता सभ रचैत छलाह जे गाममे लोक सभ वारंबार आपसमे दोहरबैत रहैत छल। इसकुलपूब दिस धार छल। बरखाक समयमे ओ धार पानिसँ भरि जाइत छल। इसकुलसँ बच्चा सभ बाहर निकलि कए धारक कातक दृश्य देखि आनन्दित होइत छल। कागतक नाओ बना कए बच्चा सभ ओहिमे छोड़ि दैत रहैक आ पानिक प्रवाहक संग ओ कागतक नाओ ऊपर-नीचाँ होइत बहैत रहैत छल। जकरा देखि बच्चा सभ आनन्दित होथि। जाधरि ओ नाओ डुबि नहि जाइत ताधरि सभ किओ देखि-देखि आनन्दित होथि।

जनवरी १९६३ ईस्‍वीमे हम उच्च विद्यालय एकतारामे आठमामे नाम लिखओलहुँ। एकतारा हमर गाम अड़ेर डीहसँ पाँच किलो मीटर उत्तर अछि।

ओहि समयमे एकतारा जेबाक हेतु कोनो सवारी नहि छलैक। धारक काते-काते किंवा बाधे-बाधे एकपेरिया रस्ता पएरे चलए पड़ैत छल। ककरो-ककरो साइकिल रहैत छल। बेलौजाक शिक्षक एकतारा हाई इसकुलमे गामसँ इसकुल नियमित साइकिलसँ जाइत छलाह। हुनकर साइकिलक टी-टोंक अवाज दूरेसँ सुनाइ पड़ैत। साइकिलमे हवा भरएबलाम्प सेहो खोंसल रहिते छलनि। धारक काते-काते ओ साइकिलसँ नियमित यात्रा करथि। गामसँ कएकटा विद्यार्थी एकतारा जाइत छलाह। सिनुआरा, विष्‍णुपुर, बेलौजासँ सेहो विद्यार्थी नियमित जाइत छलाह। रस्तामे ज्‍योँ-ज्‍योँ आगाँ बढ़ैत जाउ, जमुआरी, कुसमौल, विचखानसँ विद्यार्थी सभ रस्तामे भेटैत जाइत छल,यात्राक आनन्द बढ़ैत जाइत छल। कएक दिन बरखामे रस्तामे थाल-थाल भए जाइत छल। ओहि थाल-कादोक आनन्द लैत हमरो लोकनि एकतारा पहुँची। इसकुलसँ पहिने पाण्डेजीक घर छल ।   इसकुलमे चपरासी छलाह। इसकुलक छात्रावास सटले छल। छात्रावासमे चारिटा कोठली छल। एक कोठरीमे सरकारी चिकित्सालय चलैत छल। एकटामे प्रधानाध्यपक जी रहैत छलाह। छात्रावासक मेसमे गर्मीक समयमे हम कहिओ-काल खाइत रही। आठअना लगैत छल। बेसी-काल रामझिमनीक लसलस करैत साना आ अल्‍लुक महिन-महिन काटल भुजिया। अधिक गर्मी भेलापर कहिओ-काल मेसमे भोजन केलाक बाद स्कूलेपर रूकि जाइत रही। पढ़ी-लिखी आ रौद खसलापर गाम विदा होइ। मुदा ई कार्यक्रम कम-काल होइक।

गर्मीक समयमे इसकुल प्रात:काले प्रारंभ होइक। हम सभ जमुआरी पहुँची, तखन सूर्योदय होइत रहैत छल। कहिओ-काल थाकि गेलापर जमुआरी महंथक पानिक चापाकलपर पानि पीवि आ लग-पास गाछक छाहरिमे विश्राम करी। संगी सभ कहितथि चलू की बैसल छी, कोनो एक दिनुका बात थोड़े छैक। चलैत रहू। जतेक सुस्ताएब ततेक आलस होएत

प्रकृतिक ऑंगनमे रचल-बसल गाम-सभसँ जाइत बच्चा सबहक आनन्दक वर्णन करब अक्षरक बसक बात नहि। पीयर-पीयर सरिसोक फूल नवकनिआँ सन सजल-धजल बाध सबहक शोभा बढ़बैत रहैत छल। दूर-दूर धरि बाधे-बाध। जमुआरीसँ आगू निकलिते विचखानासँ पूर्व जे हरियर कंचन बाधक दृश्य छल ओ अखनो धरि आँखिमे झलकैत रहैत अछि। गाहे-वगाहे किसान सभ खेत पटबए हेतु पानिक नहरि सभ बनओने छल। ओकरा सभकेँ तरपैत हाथ-पएर धोइत जखन विचखानासँ पूर्व धारपर चढ़ी तँ यात्राक अन् होबाक अहसाससँ भीतरिया आनन्द होइत छल। कुसमौलसँ जे विद्यार्थी सभ आबथि हुनका सभसँ ओहीठाम भेँट होइत छल। रस्ता भरि गप्प-सप्पमे समय केना बीति जाइत छल तकर पतो नहि चलए। चारि बरख धरि लगातार ई क्रम चलल। चारू साल हम पएरे इसकुल गेलहुँ। बाबूजी कहथि जे एहिसँ पएर मजगूत होएत, पएरे चलू। चलबाक ई आदति हमरा आइयो बनले अछि।

कएक दिन झमाझम बरखा होइतो रहैत तैओ हम सभ इसकुलसँ गाम धरि रस्ता पैरे तय करैत रही। एक बेर विष्‍णुपुरक हमर संगीकेँ थाल-कादोसँ भरि देने रहियनि। ओ कतेक तमसाएल छलाह। हमहु भीजि गेल रही। कहुना कए किताव सभकेँ वस्तामे बँचओने रही। प्रकृतिक आँगनमे धुरझार बरखासँ बच्चा सभकेँ बहुत आनन्द भेटैत छल। सहयोगक भावना बढ़ैत छल। संगे चलू,स्ताक आनन्द बढ़ि जाएत। रस्ता असान भए जाएत। बीच-बीचमे किओ सहपाठी साइकिलसँ आगाँ निकलि जाथि, तँ लागए जेना ई कतेक भाग्यवान छथि।

गामसँ इसकुल वा आपसी यात्रामे नगवासक डाककर्मी अपन साइकिलसँ जाइत-अबैत जरूर टकराइ छलाह। ओ डाक लेबए नियमित हमर गामक पोस्ट आँफिस अबैत छलाह। हुनको साइकिल फटकीए-सँ कटही गाड़ीक ध्वनि करैत आगू बढ़ैत छल। कएक दिन पंचर भए जाइत तँ साइकिलकेँ पएरे गुड़कबैत जाइत छलाह।

एकतारा उच्च विद्यालयमे चारिटा कोठली पक्का छल आ तीनटा कोठरी कच्चा। दसमा आ एगारहमाक क्‍लास पक्का घरमे होइत छल। नान्हिटा जगहमे पुस्तकालय सेहो छल। बहुत प्रयास केलापर कहिओ-काल पुस्तकालयसँ पुस्तक प्राप्त करबाक सुयोग होइत छल। एकटा प्रयोगशाला कक्ष छल। प्रयोगशालामे सीमित साधन छल। तथापि ओहि घन्‍टीमे विज्ञान वर्गक विद्यार्थी सभ बेसी डराएल रहैत छल। कहिओ-काल प्रयोगशाला नामधारी कक्ष खुजैत छल। विद्यार्थी सभ कहुना कए विध पूरा करथि। ओहि समयमे मैट्रिकक वोर्डक परीक्षामे जँ व्यवहारिक परीक्षामे फेल तँ पूरा परीक्षामे फेल भए जाइत छल। तेँ विज्ञानक शिक्षकसँ विद्यार्थी सभ बहुत डराइत छलाह।

इसकुलक आगूमे बड़ीटा मैदान रहए जाहिमे कहिओ-काल स्काउटक परेड आ कहिओ-काल खेल-धूप सेहो होइत रहैत छल। स्काउटक ड्रेस बनाबक हेतु हम कतेक उत्‍साहित रही आ जखनसँ बनि कए आएल तँ गामसँ इसकुल स्काउटक ड्रेसमे जाइत-काल कतेक खुश रही, एकर वर्णन करब कठिन। वार्षिक परीक्षाक बाद परीक्षा फल निकलैक समयमे समस्त इसकुलक विद्यार्थी एकट्ठा होइत छल। प्रधानाचार्यजी परीक्षा फलक घोषणा करथि। प्रथम, द्वितीय, तृतीय पाबएबला छात्रक नाम पहिने बाचल जाइक। फेर आन सबहक एक्कट्ठे घोषणा होइत जे पास वा फेल। साइते किओ फेल करैत छल छल। प्रथम स्थान पाबएबला विद्यार्थीक अपन क्‍लास आओर इसकुलमे धाख बनल रहैत छल।

ओहि समयक विद्यार्थी सबहक लेल अंगरेजी बड़ कठिन होइत छल। बहुत रास विद्यार्थी वोर्डक परीक्षामे अंगरेजीमे फेल कए जाइत छलाह। इंग्‍लिस वैरे हम, होप नहीं है, पास करेंगे फिर मर्जी भगवान की।ई गाना गबैत रहैत छलाह। तकर कारण जे सभटा पढ़ाइ हिन्‍दी माध्यमसँ होइत रहए आ पश्चात अंगरेजीक स्तर बढ़ाएब कठिन भए जाइत छल। अधिकांश लोक रट्टा मारि-मारि कए परीक्षा पास कए लैत छलाह। कएटा विद्यार्थी तँ गणित आओर ज्‍यामितिक सबाल धरि घोंटि लैत छलाह। से छल आतंक वोर्ड परीक्षाक, खास कए अंगरेजी आओर गणित विषयक। छड़ीसँ विद्यार्थीक हाथपर पीटनाइ, ब्रेंचपर ठाढ़ केनाइ अठमा/नौमा क्‍लास धरि आम छल। ततबे नहि, फज्‍झैत करब, उल्‍टा-पुन्टा बात कहि देब तँ चलिते रहैत छल। एहि सबहक नाकारात्मक असर विद्यार्थीक मनोबल पर पड़ब स्वभाविक छल। प्रत्येक क्‍लासमे चारि-पाँचटा विद्यार्थी बढ़िआँ अंक अनैत छलाह, शेष विद्यार्थीक भगवाने मालिक...। ओना, इसकुलमे कोनो एहन ब्यवस्था नहि छल जे विद्यार्थीक अन्दर छिपल प्रतिभाकेँ उभारि सकए, परन्तु उन्टे ओ सभ हीन भावनाक शिकार भए जाइत छल। अखनो धरि ई मानसिकता रहिते छैक जे बच्चा डाक्ट, इंजीनियर बनि जाए, चाहे जे करए पड़ए। एहन कएटा विद्यार्थी छलाह जे विज्ञान, गणितमे लगातार फेल करथि, तथापि डाक्ट, इंजीनियर बनक अभिलाषामे लागल रहथि। आबक समयमे विद्यार्थीक कतेको विकल्‍प छैक। शहरी विद्यालय सभमे तरह-तरह क विषय पढ़बाक सुविधा अछि।

ओहि समयमे खास कए गाम-घरमे एहन सुविधा नहि छल। जे विद्यार्थी विज्ञान विषय नहि रखलक तँ ओकरा चौपट बुझल जाइक। परिणाम स्वरूप कएटा विद्यार्थीकेँ ज्यमिति आ गणितक सबाल सभ रटैत देखी। दिन-रातिक मेहनतक बावजूद ओहन विद्यार्थी सभ फेल भए जाइत छलाह। हम एकटा एहन विद्यार्थीकेँ जनैत छी जे सात-आठ साल धरि डाक्टरीक प्रवेश परीक्षा पास नहि कए सकलाह, मुदा डाक्ट छोड़ि किछु आओर बनबाक इच्छा नहि करथि। हारि कए ओ आर्ट्स रखला आ बहुत विलम्बसँ वकालत पास केलाह।

एक दिन हमरा लोकनिक क्‍लासमे हमर सहपाठी शिक्षककेँ कहलखिन जे ओ ज्‍यामितिक साध्य अंगरेजीमे सावित करताह। मास्टर साहेब अनुमति देलखिन। ओ अंगेजीमे रटि कए आएल छलाह। जखन वोर्डपर साध्य बनाबए लगलाह तँ अक्षर बिसरा गेलनि आ सभ उन्टा-पुन्टा होबए लगलनि। आधारक जगह लम्ब, लम्बक जगह आधारक अक्षर सभ लिख देलखिन।

सौंसे क्‍लासमे ठहाका पड़ए लागल। अन्तोगत्वा ओ नर्भस भए बैस गेलाह। विज्ञान पढ़बाक ललक आ डाक्ट, इंजीनियर बनबाक आकांक्षा अखनो अपना एहिठाम अभिभावक ओ विद्यार्थी मोनसँ गेल नहि अछि। हम पढ़ाइमे नीक करी, गणितमे  शत-प्रतिशत अंक आनी, क्‍लासमे प्रथम करी, एहि हेतु हमर बाबूजी निरन्र प्रेरित करैत रहैत छलाह। हुनकर प्रेरणाक परिणाम छल जे हाइ इसकुलमे हमर परीक्षा-परिणाम निरन्बढ़िआँ होइत रहल। ओहिमे इसकुलक कएटा शिक्षक सबहक परिश्रम आओर प्रयासक गंभीर योगदान छल। गणितक शिक्षक तँ बहुत नीक छलाह।

११ वाँक इसकुलसँ वोर्ड तकक सभ परीक्षामे हम क्‍लासमे प्रथम स्थान प्राप्त केलहुँ। मैट्रिकक वोर्ड-परीक्षाक परिणाम जहिआ आएल छल, तहिआ गामक चौकसँ घर कतेक तेजीसँ हम दौड़ल रही, कतेक प्रसन्न भेल रही तकर अनुमान लगाएब कठिन। प्राय: जीवनमे एतेक प्रसन्न हम कम बेर भेल होएब। इसकुलमे चारिटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल, आ हमरा चारूमे सभसँ बेसी अंक छल। सत्य पूछल जाए तँ मैट्रिकक परीक्षाकेँ एतेक महत्व नहि देबाक चाही, मुदा गाम-घरक हिसावसँ ओहि समयमे ई बड़का बात बुझल जाइत छल। कम्मे विद्यार्थी प्रथम श्रेणीमे उत्‍तीर्ण होइत छल मुदा आब तँ ई आम बात भए गेल अछि।

एकतारामे पढ़बाक क्रममे कएटा विद्यार्थी दोस्त बनि गेलाह जे अखन धरि सम्पर्केमे नहि छथि अपितु हमर जीवनक अभिन्न अंग भए गेल छथि। एहिमे नगवासक श्री नारायणजी सर्वप्रथम मोन पड़ैत छथि। जहिआ हम इसकुलमे नाम लिखओने रही, तहिए ओहो नाम लिखओने रहथि। इसकुलमे बरोबरि ओ बढ़िआँ स्थान प्राप्त केलाह प्रथम श्रेणीसँ मैट्रिक केलाह पश्चात आर.के. कौलेज- मधुबनी आ एल.एस. कौलेज मुजफ्फरपुरसँ आगूक शिक्षा प्राप्त केलाह मधुबनी हुनकर कर्म क्षेत्र रहल। पारिवारिक जीवनकेँ केना स्वर्गमय, आनन्दमय बनाओल जा सकैत अछि, तकर प्रेरणा हुनकासँ लेल जा सकैत अछि। ओ बहुत संस्कारी व्यक्ति छथि। हुनक पत्नी सेहो बहुत गुणी छथि। मधुबनीमे हुनकर घरक साफ-सफाइ आ सजाबट देखब तँ आश्चर्यमे पड़ि जाएब। घरमे सदिखन शान्तिक  वातावरण रहैत अछि। लग-पास हुनकर इष्ट-मित्र लोकनि सेहो रहैत छथिन। हुनकर दुनू पुत्र अति प्रतिभाशाली छथि। दुनू बालक उच्च योग्यता प्राप्त कए उच्च पदासीन छथि। एकटा पुत्र अमेरिकामे वैज्ञानिक छथिन, दोसर इसरोमे इंजीनियर। ५४ बरखसँ ओ लगातार हमर सम्पर्कमे छथि। एहन उदाहरण जीवनमे कम भेटैत अछि।

नित दिन वरसत नयन हमारे

सदा रहत पावस ऋृतु हम पे

जब से श्याम सिधारे...।

सूरदासक उपरोक्त भजन हमरा सभक एगारहमामे विदाइ समारोहमे हमरा सबहक वर्ग शिक्षक गेने  छलाह। ओहि कार्यक्रमक हेतु हम हारमोनियम साइकिलपर लादि कए गामसँ लए गेल रही। अद्यावधि ओहि गीतक स्वध्यानमे अबैत रहैत अछि।

चारि सालक पढ़ाइक बाद हमरा लोकनि मैट्रिक-वोर्डक परीक्षाक उम्‍मीदवार भए गेल छलहुँ। इसकुलक पढ़ाइ समाप्तिपर छल। वोर्डक फार्म भरला पश्चात इसकुल जाएब बंद भए गेल। घरेपर रहि कए दू-तीन मास धरि पढ़ाइ केने रही। वोर्डक परीक्षाक तैयारीमे दिन-राति लागल रहलहुँ। देखिते-देखिते एकबेर फेर सभ विद्यार्थी वोर्डक परीक्षा देबाक हेतु मधुबनी पहुँचलहुँ। वाटसन इसकुलमे परीक्षाक केन्द्र छल। बाबूजी वाटसन इसकुलक विद्यार्थी छलाह। ओहि इसकुलक किछु शिक्षक सभ बाबूजीक परिचित रहथिन। देखिते-देखिते परीक्षा भए गेल, परीक्षाफल आएल, आ हम सभ इसकुलसँ निकलि कौलेज पहुँच गेलहुँ।





Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...