रविवार, 19 अप्रैल 2026

अयोध्या लखनउक यात्रा

 

अयोध्या लखनउक यात्रा

 

हम ओहि दिन ग्रेटर नोएडा स्थित घरे मे रही। चारूकात लगैक जेना कर्फ्यु लागल छैक। पुलिसक जीप रहि-रहि कए आवासीय कालोनीसभमे घुमि रहल छल। बीच-बीचमे ओकर सायरन सेहो बाजि रहल छलैक।किछु बुझेबे नहि करए जे बात की छैक? हमरा नहि रहल गेल। टीवी खोललहुँ तँ देखैत छी जे उच्चतम न्यायालय अयोध्या राम मंदिर केसमे अपन निर्णय सुना रहल छल। निर्णय की भेल छल से तँ आब सौंसे दुनिआ जनैत अछि। निर्णयक कारण देशक माहौल खराप नहि होअए आ आपसी सद्भावना बनल रहि जाए,कोनो अप्रत्याशित घटना नहि घटए ताहि लेल उचित ओरिआन सरकार केने छल।मुदा,किछु गड़बड़ नहि भेल। शांति व्यवस्था बनल रहल।कालक्रममे अयोध्यामे भव्य राम मंदिर बनल आ तकर उद्घाटनो  भेल।शुरूमे तँ ओहिठाम दर्शनक लेल भयाओन भीड़ रहैत छल। एतेक तीर्थयात्रीकेँ ओतए उचित व्यवस्था करब बहुत कठिन काज छल। कहिओ काल गड़बड़ीक समाचारसभ सेहो अबैत रहल। हमरोसभकेँ ओहिठाम जएबाक इच्छा छल। मुदा,एतेक भीड़मे से संभव नहि बुझाएल।तेँ सोचलहुँ जे जखन ओहिठाम भीड़ कम होएत तखने जाएब जाहिसँ नीकसँ दर्शन भए सकत।हमसभ ओहि शुभ दिनक प्रतीक्षा करए लगलहुँ।एहि बीचमे बहुत समय बीति गेल। अयोध्यामे राम मंदिरक काज पूरा भए गेल। ओकर ऊपरमे धाजा फहरा गेल। “आबो तँ हमसभ ओतए जाइ”-ई बात हमर श्रीमतीजी कहलनि।

“कहि तँ सही रहल छी?”

“तखन तकैत की छी?टिकट कटाउ ।”

हमरासभ आपसी विमर्शक बाद टिकटक ओरिआनमे लागि गेलहुँ। भेल जे जखन अयोध्या जएबे करब तखन वापसीमे लखनउओ घुमि लेब।ओहिठाम केन्द्र सरकारक होलीडेहोम छैक। ओहिमे रहबाक जोगार करए लगलहुँ।संयोगसँ बारह फरबरीसँ सोलह फरबरी धरि,पाँच राति ओहिठाम रहबाक आनलाइन आरक्षण  भए गेल। कहबाक काज नहि जे सरकारक होलीडे होममे रहबाक बहुत नीक ओरिआन रहैत छैक,सेहो बहुत कम दामपर।एसी दू बेडक कोठरीक लेल मात्र तीन सए रूपया देबाक होइत छैक।कतहु-कतहु तँ आर कम छैक।जेना कि पटनामे एहने कोठरीक लेल मात्र ‍१८० रूपया प्रतिदिन देबाक होइत छैक। भीआइपी कोठरीक लेल नओ सए रूपया लगैत छैक। ओहिमे दूटा बड़ी-बड़ीटा कोठरी होइत छैक।तकर हमरासभकेँ काज नहि रहए।मात्र दू गोटेक लेल तीन सए बला कोठरी एकदम पर्याप्त छल।हम सभसँ पहिने लखनउमे रहबाक आरक्षण आनलाइन करबा लेलहुँ। तकर सूचना हुनका दए देलिअनि। आब प्रश्न छल जे पहिने लखनउमे रहब कि सोझे अयोध्या चलि जाएब आ वापसीमे लखनउ घुमैत-फिरैत ग्रेटर नोएडा वापिस भए जाएब?

“अयोध्या राम मंदिरमे दर्शन करब हमरसभक मुख्य उद्येश्य अछि।तेँ पहिने सोझे ओतहि चलब। ओहिठाम दर्शन आ भ्रमण केलाक बाद लखनउमे ठहरब आ वापिस ग्रेटर नोएडा चलि आएब।”-ओ कहलथि।

“ठीक छैक।”

हम ओही हिसाबसँ आनन्दविहारसँ अयोध्या जएबाक लेल वंदे भारत ट्रेनमे टिकट लए लेलहुँ। ओना आनन्दविहारसँ ओ ट्रेन छओ बाजि कए दस मिनटपर खुजैत छैक। तकरा पकड़बाक लेल घरसँ पाँच बजेक आसपास निकलब जरूरी छल। पाँच बजे  प्रस्थान करबाक माने भोरे चारि बजे उठबाक छल। जाड़क मासमे भोरे चारि बजे उठि कए नित्यकर्म करब आ यात्राक लेल तैयार होएब मोसकिल बुझाइत छल। मुदा हनुमानजीकेँ ऊपर सभकिछु छोड़ि निश्चिन्त भए गेलहुँ।

आब अयोध्या जएबाक समय लगचिआ रहल छल। हमसभ अपन यात्राक लेल जरूरी सामानसभ सरिआ रहल छलहुँ ।ओहीक्रममे किछु जरूरी काजसँ एडब्लुएचओ सोसाइटी स्थित दोकानसँ काज कए लौटति रही कि ओहिठामक मंदिर समितिक अध्यक्ष भेटि गेलाह। ओ हमरा जनैत छथि। ओ कहलनि –

“हमर सोसाइटीमे मंदिरमे भगवानसभक प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम आठ फरबरीसँ सोलह फरबरी २०२६क बीचमे आयोजित अछि। अपने ओहिमे एकदिन यजमान बनबाक लेल अपन सहमति दिअ। ”

“मुदा,हमरा तँ अयोध्याजी जएबाक कार्यक्रम अछि।”

“कहिआ?”

“दस तारीखक भोरे।”

“कोनो बात नहि। अहाँ नओ तारीखक लेल यजमान बनि जाउ।खंडुरीजीकेँ अपन नाम लिखा दिअनु।”

हम श्रीमतीजीकेँ एकर सूचना देलिअनि। ओ सहर्ष एहि लेल अपन सहमति देलनि आ कहलथि-

“लगैत अछि भगवानक अपना सभपर विशेष कृपा छनि। ओ चाहैत छथि जे अयोध्याजी जएबासँ पहिने  हमसभ पूर्णतः सात्विक भए जाइ।”

“बातो सही। कारण हमरा दुनू बेकतीकेँ एक दिन पहिने व्रत,फलहार कए प्रायश्चित समारोहमे सामिल होमए पड़ल।दोसरो दिन फलाहरेपर दिनभरि रहए पड़ल।साँझमे सिद्ध अन्न,मुदा पूर्णतः सात्विक,बिना प्याजु,लहसुनकेँ भोजन करबाक छल।”

हमसभ यथासाध्य एहि नियमसभक पालन करैत आठ आ  नओ फरबरीक आयोजित प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रममे सामिल भेलहुँ।ओहिठाम तीनटा मूल्यवान किताबसभ सेहो मोफतमे भेटल।किताबसभ स्थानीय लोकसभ द्वारा निःशुल्क वितरण करबाक लेल देल गेल छल। मुदा,बादमे व्यवस्थामे किछु परिवर्तन भेल आ मोट-मोट किताबसभ ओहिठामसँ हटा देल गेल।हमसभ तँ अपन पसिंदक किताबसभ लए ओकरा अपन झोरामे राखि लेने रही।

प्रायश्चित

प्राणप्रतिष्ठासँ पूर्व एक दिन पहिने प्रायश्चित कार्यक्रमक उद्येश्य यज्ञमे सामिल भए रहल जजमानलोकनिकेँ सभ तरहेँ शुद्ध करब छल।एहि कार्यक्रममे सामिल होएबाक लेल हमसभ भोरे नओ बजे कार्यक्रमस्थलपर पहुँचि गेल रही। मुदा,ताबे बहुत कम लोक आयल रहथि। अस्तु,किछु विलंबसँ ई कार्यक्रम प्रारंभ भेल। लगभग साढ़ै बारह बजे ई कार्यक्रम समाप्त भेल।तकर बाद हमसभ वापसि अपन घर आबि गेलहुँ।आइ आब किछु नहि करबाक छल। दोसर दिन फेर नओ बजे हमसभ ओहिठाम पहुँचलहुँ।आइ पाँचटा परिवार  जजमान लेल नामित रहथि।मुदा,कार्यक्रम शुरू होएबा धरि मात्र तीनटा परिवार आबि सकल रहथि।हमरा बगलमे एकटा ओकील साहेब सपरिवार जजमान रहथि। पंडितजी हमरा सामने रहथि आ हमरा पूजाक विधि-विधान बुझबथि आ हम तदनुकूल काज करी। मुदा ओ ओकील साहेबपर उचित ध्यान नहि दए पाबथि।तकर मूल कारण रहैक जे ओ कनी फटकी बैसल रहथि।ओ अपन उपेक्षासँ बहुत परेसान भए गेलथि आ चिकरि उठलथि-

“ई की भए रहल अछि?हमसभ एहिठाम व्यर्थ बैसल छी। हमरा नीकसँ पूजा नहि कराओल जा रहल अछि।ई तँ अन्याय अछि।”

“अहाँकेँ सेहो ललका डोरीसँ बान्हि देल गेल अछि। अहाँकेँ पूजाक बरोबरि फल भेटबे करत।”

“यदि से बात छैक तखन सभगोटेकेँ एहिना ललका डोरीसँ बान्हि दिअनु आ पंडितजी आगूसँ अपने सभक लेल पूजा करथु।मुदा,से तँ ओ करैत नहि छथि। एहि स्पष्ट भेदभावक लेल हुनका प्रायश्चित करबाक चाहिअनि।”

“हमरासभसँ गलती भेल।”-मुख्यपंडितजी स्थितिक गंभीरता बूजि तुरंत एकटा पंडितजीकेँ हुनको सामने बैसा देलनि। तकर बाद हुनको कोनो सिकाइति नहि रहलनि।पूजाक कार्यक्रम लगभग तीन घंटा चलल।तकर बाद हमसभ अपन घर वापस आबि फलाहार केलहुँ।रातिमे सात्विक भोजन केलहुँ आ भोरे अयोध्या जएबाक लेल झोरासभकेँ ठीक करबामे लागि गेलहुँ।

यद्यपि वंदे भारत ट्रेन दिल्लीसँ अयोध्या जएबाक लेल बहुत सुगम आ बढ़िआँ ट्रेन अछि,मुदा एकर आनन्दविहार टीसनसँ खुजबाक समय(भोरे छओ बाजि कए दस मिनट)  सही नहि अछि।जाड़क मासमे ओहि ट्रेनकेँ हमर घरसँ पकड़बाक लेल भोरे पाँच बजे प्रस्थान करब जरू अछि। मुदा हमसभ एहि लेल अवधारि लेने रही। भेल जे शुरूएमे कनी दिक्कति होएत बादमे फएदे फएदा रहत।कारण हमसभ दूपहर अढ़ाइ बजे अयोध्याजी पहुँचल रहब।तकर बाद मंगले दिन कए हनुमानगढ़ीमे दर्शन करब।यदि बहुत थाकि गेल रहब तँ आओर स्थानसभ जाएब।भगवान रामक जन्मस्थानपर नवनिर्मित मंदिरपर दोसरे दिन जाएब,से तँ पहिनेसँ निर्धारित छल।तकर बादे कोनो आनठाम जाएब।

ओहि दिन भोरे हम साढ़तीन बजे उठि गेलहुँ। हमर श्रीमतीजी तँ पहिने उठि कए बैसल रहथि। हम पुछलिअनि तँ ओ कहलथि—

“हम तँ राति भरि बैसले रहि गेलहुँ। निठ्ठाहे निन्न नहि भेल।”

हमसभ जल्दी-जल्दी तैयार भए गेलहुँ।चारि बजे भोरे तँ चाह पीबि रहल छलहुँ।स्नान,ध्यान तँ भइए गेल रहए।तकर बाद हमसभ कनी काल हीटरपर हाथ सेकलहुँ कि घंटी बाजल-टन-टन-टन।माने वाहनचालक आबि गेल। आब कोन चिंता? ठीक साढ़ेचारि बजे भोरे हमसभ आनन्दविहार टीसनक लेल अपन कारसँ प्रस्थान केलहुँ।

रस्ता एकदम खाली छल। रातुक वातावरण अकनो छलहे। कतहु-कतहु कार,टैक्सी,मोटर साइकिलसँ अबैत -जाइत यात्रीलोकनि देखा जाथि।कतहु कोनो अवरोध नहि रहबाक कारण हमसभ पैंतालिसे मिनटमे नन्दविहारटीसनक मुख्यद्वारिपर पहुँचि गेलहुँ।हमसभ बहुत आसानीसँ सामानसभ सहित अपन ट्रेन पकड़बाक लेल चिन्हित प्लेटफार्मपर पहुँचि गेलहुँ।तकर बीस मिनटक बाद वंदे भारत ट्रेन हुंकार भरैत टीसनपर लागि गेल।हमरसभक डिब्बा नंबर बीस सभसँ अंतमे छल। ओही हिसाबसँ हमसभ प्लेटफार्मपर बैसले रही।तेँ बिना कोनो असुविधाकेँ हमसभ ट्रेनमे अपन सीटपर पहुँचि गेलहुँ।

वंदे भारत ट्रेन

ओना अयोध्या जाए बला वंदे भारत ट्रेनमे चढ़बाक लेल हबाइ यात्रासँ बेसीए तत्परताक प्रयोजन भेल छल। कारण ट्रेन भोरे छओ बाजि कए दस मिनटपर आनन्दविहारसँ खुजबाक रहैक। ताहि लेल हमसभ पहिनेसँ बहुत तैयारी केने रही।तेँ समयसँ पहिने करीब सबा पाँच बजे हमसभ टीसन पहुँचि गेलहुँ। ट्रेनकेँ छओ नंबर प्लेटफार्मपर लगबाक रहैक। पहिने तँ चिंता होअए जे ओहिठाम कोना पहुँचब।संगमे बहुत भारी बैग छल।छोट-छोट कैकटा सामान से छल। ऊपरसँ श्रीमतीजीकेँ घुटनामे समस्या से रहैत छनि। आइ-काल्हि कनीक अनुकूल भेल छनि।विदति केलासँ कहीं बढ़ि ने जानि। मुदा हमसभ सुरक्षित आ बहुत आरामसँ जल्दीए प्लेटफार्म नंबर छओपर एस्कलेटरक सहायतासँ पहुँचि गेलहुँ।एकटा कूली कइए लेने रही। ओ हमरासभकेँ लेने देने सही जगहपर ठाढ़ कए देलक।कनीके कालमे अत्यंत नूतन सजल-धजल डिब्बाबला ट्रेन आबि कए प्लेटफार्मपर लागि गेल। हमरासभक डिब्बा नंबर बीस सभसँ पाछू रहए।हमसभ जल्दीए अपन-अपन सीटपर जा कए बैसि गेलहुँ। सामान नीचाँ राखि देल गेलैक। आब की? लागि रहल छल जेना एकटा महत्वपूर्ण किला फतह भए गेल अछि।

वंदे भारत ट्रेनक डिब्बा नंबर बीसक सीट सख्या ३८,३९पर हमसभ बैसि गेल रही। ऊपरमे बैग राखि देल गेलैक। यात्रीसभ अपन-अपन सीटपर बैसि गेलथि। ठीक छओ बाजि कए दस मिनटपर ट्रेन खुजि गेल। हमसभ भोरुका चाह नहि पीने रही। जलखै तँ करबाक नहि छल,कारण आइ हमरालोकनिकेँ मंगलक उपास छल। थोड़बे कालक बाद जखन आर यात्री लोकनिक लेल जलखै परसा रहल छलहुँ,हमहूँ चाहक आग्रह केलिऐक।से ओ सहर्ष पूरा केलक।हमसभ यथेष्ट मात्रामे चाह पीबि संतुष्ट भेलहुँ। डिब्बा नंबर बीस अंतिम डिब्बा छल आ ओहिमे मात्र एक्केटा अंग्रेजी स्टाइलक पैकाना रहैक। पैखानाक बाहर सभ कोठरीमे एकटा सफाइकर्मी तैनात कएल गेल छल।करीब सएटा यात्रीक बीचमे एक्केटा पैखाना रहैक। आन डिब्बासभमे दूटाक पैखाना रहैक। मुदा प्रायः ट्रेनक अंतिम डिब्बा होएबाक कारण एहि डिब्बामे एक्केटा  अंग्रेजी पैखाना रहैक। हम कैक बेर ओहिठाम धरि जाइ आ वापस भए जाइ।कारण सदिखन केओ ने केओ ओहिमे बैसले रहैत छलाह। पैखानाक बाहर सदिखन किछुगोटे पाँतिमे ठाढ़ रहैत छलाह। तेहन हालतिमे की करितहुँ?वापिस अपन सीटपर चलि आबी।आखिर साढ़ि एगारह बजे बरदाससँ बाहर बुझाएल। भोरे साढ़े चारि बजे डेरा छोड़ने रही।तखनसँ पाँच घंटा समय बीति गेल छल। तेँ आब अनिवार्य भए गेल छल। संयोगसँ एहि बेर  पैखाना खाली छल।हम तुरंत भीतर चलि गेलहुँ। अंग्रेजी स्टाइलक पैखाना ततनीटा छल जे ओहिमे बैसएमे बहुत असौकर्य भए रहल छल। संक्रमणक डर सेहो भए रहल छल। मुदा कएल की जा सकैत छल?वापिस सीटपर आबि बहुत आश्वस्त लागि रहल छल।ट्रेन सरपट भागि रहल छल। दुनू दिसक प्राकृतिक दृश्य देखैत जाउ,आगू बढ़ैत जाउ।शुरूमे तँ यात्रा बहुत नीक लागि रहल छल।मुदा,जेना-जेना समय बीतल,आब बैसनाइ मोसकिल लागि रहल छल।हमर श्रीमतीजी तँ बहुत परेसान बुझेलीह। ओ कहलीह-

“आब दोबारा एहि ट्रेनसँ यात्रा नहि करब।आठ घंटा लगातार बैसल रहि यात्रा करब सुखद अनुभव नहि अछि।”

ठीक दू बाजि कए पचीस मिनटपर ट्रेन अयोध्या कैंट टीसनपर पहुँचि गेल।हमसभ सामान सहित बाहर निकललहुँ। बड़ी काल चललाक बाद हमसभ प्लेटफार्मसँ बाहर भेलहुँ। ओहिठाम कैकटा टैक्सी,आटो बलासभ घेरि लेलक।हम सभसँ पहिने होटल श्रीरामइनक व्यवस्थापकसँ संपर्क केलहुँ,ओहि स्थानक सही जनतब प्राप्त केलहुँ ।तकर बाद एकटा आटोसँ होटलक लेल प्रस्थान केलहुँ। अफसोचक बात जे स्थानीय होइतहुँ आटो बलाकेँ होटलक जनतब नहि रहैक। ओकरा कैक बेर व्यबस्थापकसँ गप्प करओलिऐक। तइओ ओ भुतलाइते रहल।आखिर हमसभ किछु विलंबसँ होटल पहुँचि सकलहुँ।

होटल श्रीरामइनक जानकारी हमरा श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्टक वेबसाइटसँ भेटल छल।ओतए उपलब्ध फोन नंबरपर हम फोन केने रहिऐक।फोनपर होटलक संचालक दूबेजी गप्प केने रहथि।ओ सुपरडीलक्स कोठरीक दू हजार प्रतिदिन किराया कहने रहथि,जखन कि आनलाइन बुकिंग लेल बहुत अधिक किरायासभ देखबामे आएल छल। हम तुरंत अपन कार्यक्रमक अनुसार एकटा कोठरी आरक्षित करबाक आग्रह केलिअनि जे ओ मानि गेलथि।जखन अयोध्या जएबाक समय लगचिआ रहल छल तखन हम फेर हुनकासँ एहि बातक पुष्टि केलहुँ। तकर बादे हमसभ अयोध्याक लेल प्रस्थान केने रही। अयोध्या कैंट ट्रेनसँ उतरबाक बाद टेम्पुसँ भूतलाइत-तुतलाइत  हमसभ आखिर होटल पहुँचिए गेलहुँ। मुख्य सड़कसँ कनी हटि कए ओ होटल छल।दुबेजीक स्थानपर एकटा दोसर सज्जन हमरासभकेँ भेटलाह।दूबेजी कोनो बिआह कार्यक्रममे सामिल होएबाक लेल गेल रहथि।हुनका  एबजमे  एकटा दोसर व्यक्त हमरा लोकनिक स्वागत केलनि आ कोठरीक कुंजी देलनि।बादमे ओएह अयोध्या यात्रामे हमर मार्गदर्शकक काज केलनि।हम एहि बातसँ चकित रही जे होटलमे कोठरीक कुंजी देबासँ पहिने ओकर खातामे हमर पता आदि किछु नहि लिखल गेल,ने हमरासँ कोनो परिचय पत्र मांगल गेल।हम एहि विषयमे पुछबो केलिऐक तँ ओ कहलनि –“कोनो बात नहि।अहाँ अपन पता आदि विवरण ह्वाट्सअपसँ पठा देब। ”एहि बातपर बेसी माथापच्ची करब ठीक नहि बुझाएल।भेल जे भए सकैत अछि जे बादेमे ओ कएल जाइत होइक।मुदा जएबा काल धरि से सभ किछु नहि देखाएल।जाइत काल हम उचित भुगतान केलहुँ आ अपन सामान लए कए होटलसँ बिदा भए गेलहुँ।

हमसभ जल्दीए अपन आवंटित कोठरी संख्या ‍११२मे पहुँचि गेल रही।ओहि कोठरीमे हमरसभक सामानसभ पहुँचा देल गेल।ओ कोठरी बेस अइल-फइल छल। कोठरीसँ संबद्ध शौचालयमे सभ सुविधा छल। पलंग,गद्दा सभ एक नंबर। मुदा,फ्रीज,एसी,टीवी नदारद छल। “इएह छी सुपरडिलक्स कोठरी?”हम मोने-मोन सोचलहुँ। फेर भेल जे हमरासभकेँ दुइए दिन तँ रहबाक अछि।भगवान रामक दर्शन भए जाए।हनुमानगढ़ी सहित आर-आर प्रसिद्ध स्थानसभ देखि ली।हमरसभक उद्येश्य पूर्ण भए जाएत।तेँ हमसभ कोठरीसँ बेसी मार्गदर्शकक जोगारमे लागि गेलहुँ।

हमसभ ओतए किछु काल विश्राम केलहुँ ।तकर बाद हनुमानगढ़ी जएबाक व्योंतमे लागि गेलहुँ। मार्गदर्शकजीसँ पहिने गप्प भइए गेल छल। ओ कहलनि जे मंगल होएबाक कारण आइ हनुमान गढ़ीमे बहुत भीड़ होएतैक,मुदा दू सए टाका खर्च केलापर हम अहाँकेँ आसानीसँ दर्शन करा देब।दू सए टाका आटोबलाकेँ सेहो देबाक होएत। हमसभ तुरंत तैयार भए गेलहुँ।कारण ओहिठामक भीड़क बारेमे पहिनेसँ बूझल छल। हमरासभ मंगलक उपास से केने रही।समयसँ दर्शन भए जाएत तँ आगू परना करबामे सेहो नीक रहत।

हमसभ साढ़े चारि बजे होटलसँ मार्गदर्शकजीक संगे हनुमानगढ़ी दर्शन लेल आटोसँ बिदा भेलहुँ आ घंटा भरिसँ पहिने मानस भवनमे भोजन लेल पहुँचि गेलहुँ।कहब जे एतेक जल्दी से सभ भेल केना? तँ सुनि लिअ। हमरासभकेँ मार्गदर्शकजी हनुमानगढ़ी मंदिरक पाछू बाटे अनलनि आ  इसारासँ आगी बढ़ि जएबाक लेल कहलनि। किछुए सीढ़ी चढलाक बाद हमसभ हनुमानजीक सामने पहुँचि गेलहुँ। मुदा हमसभ भीड़क उल्टा दिससँ आएल रही।एकाध गोटे टोकबो केलनि। मुदा जेना-तेना आगू बढ़ि गेलहुँ।कनीके चललाक बाद हमसभ मुख्य भीड़मे सामिल छलहुँ।सभ हनुमानजीक जयकारा लगा रहल छलाह।हमहूँ हनुमानजीक ठीक सामने पहुँचि श्रद्धापूर्वक हुनकर प्रार्थना केलहुँ।हमर श्रीमतीजी तँ संगे रहबे करथि। दस मिनटक भीतरे हमरसभक काज भए गेल छल। हमसभ आब थाकिओ गेल रही।तेँ आर ठाम नहि जाए,सोझे अपन होटल वापस पहुँचि गेलहुँ।एहि तरहेँ हनुमान गढ़ीमे मंगल दिन कए हनुमानजीक दर्शन करबाक स्वप्न साकार हुनके कृपासँ संपन्न भेलासँ हमसभ अतिशय प्रसन्न  संतुष्ट रही।

प्रात भेने हमसभ सात बजे श्रीराम जन्मभूमि मंदिरपर जएबाक कार्यक्रम बनओने रही।मुदा,भोरे उठलाक बाद होटलमे पानिक आपूर्ति वाधित बुझाएल। होटलक व्यवस्थापककेँ फोन केलिअनि । ओ प्रयासो केलनि।मुदा,पानिक आपूर्ति शुरू होएबामे  एकघंटा समय लागि गेल। हमसभ सात बजेक बाद आठ बजे धरि राममंदिर लेल बिदा भए सकलहुँ। कोठरीसँ होटल परिसरमे बाहर गेलाक बाद एकटा आटो लागल देखाएल।

“हमसभ तँ टैक्सीक बात केने रही।”

“टेक्सीसँ बढ़िआँ इएह रहत।कारण बहुत ठाम गली बाटे जएबाक होइत छैक। ताहि लेल आटो  बेसी उपयुक्त सबारी होइत अछि।”

“मुदा एहि लेल दू हजार रूपया भरि दिनक तँ बेसी होएत।हमरा दुपहरिए धरि घुमा देथि , हम ताहि लेल आठ सए देबनि।बादमे देखल जेतैक।”

“जे अहाँक विचार।”

हमसभ मार्गदर्शकजीक संगे आटोसँ बिदा भए गेलहुँ। मुदा,बादमे ओहि आटो बला आ मार्गदर्शक,दुनूक व्यवहार बहुत नीक बुझाएल।संगे ओसभ हमरालोकनिकेँ मंदिरे-मंदिरे बहुत नीकसँ दर्शन करबैत रहल। तेँ श्रीमतीजीक परामर्शपर ओही आटोकेँ दिनभरि लेल राखि लेलहुँ।संगमे मार्गदर्शकजी तँ रहबे करथि।एहिमे किछु पैसा जरूर खर्च भेल,मुदा ओ सभ बहुत नीकसँ हमरासभकेँ अयोध्या आ लगपासक प्रमुख स्थानसभक दर्शन करा देलक,जे अन्यथा संभवतः संभव नहि होइत।

रामजन्मभूमि मंदिर

एहनो दिन हेतैक जे हमसभ सद्यः रामजन्मभूमिपर बनल श्रीरामक मंदिरमे स्थापित हुनकर दर्शन करब,से के सोचि सकैत छल? जुग-जुगसँ एहि मंदिरक लेल अनेक प्रयास कएल गेल।कतेको बेर युद्ध लड़ल गेल। कतेको लोक अपन प्राण गमा देलनि। सालक-साल देशक विभिन्न न्यायालयमे एहि विषयक मोकदमा चलैत रहल। ततबे नहि,सालक-साल सौंसे देशमे एहि मंदिरक निर्णक लेल आंदोलन कएल गेल।मुदा,समाधान उच्चतम न्यायालयक निर्णयक बादे संभव भेल।तकर बाद तँ ओहिठाम मंदिर निर्माणक प्रक्रिया जे शुरू भेल से सालों चलैत रहल। जनबरी २०२४मे एहि मंदिरक भूतलमे भगवान रामक वालरूपकेँ समारोहपूर्वक स्थापित कएल गेलनि। तकर बाद तँ ओहिठाम दर्शन करबाक लेल लोक जे हुजुम लागल से वर्णन करब मोसकिल थिक। हमसभ एहन भीड़मे दर्शन नहि करबाक निर्णय केलहुँ। जखन भीड़ कम भए गेल आ ऊपरो तलसभमे मंदिर बनि गेल,मंदिरक मंडपपर ध्वज विधिवत फहरा गेल,तखन हमसभ ओहिठाम जएबाक लेल कार्यक्रम बनाबए लगलहुँ।  ताही सोचक परिणाम छल जे आइ हमसभ अयोध्यामे रामजन्मभूमिपर बनल श्री राम मंदिर परिसरमे पहुँचि गेल छी। मार्गदर्शकक इच्छानुसार हम श्रीमतीजीक लेल एकटा ह्वील चेयर बुक करओलहुँ। नियमानुसर हम हुनका संगे जा सकैत छलहुँ। ओना हमरा बुझल छल जे सत्तरि सालसँ बेसीक लोककेँ एकटा सहायकक संगे त्वरित दर्शनक व्यवस्था छैक। हम ई बात मार्गदर्शकजीकेँ कहलिअनि तँ बजलाह-

“जखन अहाँकेँ त्वरित दर्शन भइए रहल अछि तखन चिंताक कोन बात छै?”

हम निश्चिंत  भए ह्वीलचेयरक संगे-संगे बिदा भेलहुँ। सचमुचकेँ कतहु कोनो भीड़ नहि छल। ओहुना ओहि दिन सामान्यो पाँतिमे बहुत कम लोक देखेलथि। भूतलमे बनल श्री रामक ममूर्तिक दर्शनतँ बहुत नीक जकाँ भए गेल।

तकर बाद हमसभ मंदिरक प्रथम तलपर पहुँचलहुँ। सामनेमे रामपरिवारक अद्भुत दृश्य देखि अचंभित रही। लागि रहल छल जेना भगवान श्रीराम सपरिवार सामनेमे सिंहासनपर विराजमान छथि, हमरालोनिकेँ आशीर्वाद दए रहल छथि। हमसभ बहुत मोनसँ प्रार्थना केलहुँ  अत्यंत संतुष्टिक संग ओहिठामसँ वापसि भेलहुँ।वापसी काल ओहि पुलिसकेँ बेर-बेर धन्यवाद देलिऐक।

ओहिठामसँ नीचाँ उतरलाक बाद देबालपर रामराज्याभिषेकक  भव्य  जीवंत चित्र उकेरल गेल छल।ई दृश्य देखि हमरा अश्रुपात होमए लागल।मोनमे भेल जे भगवान रामक संगे कतेक अन्याय भेलनि,कतेक कष्ट ओ सहलनि?केहन अनुपम ओ क्षण रहल होएत जखन की ओ लंका विजयक बाद जानकीजीक संग अयोध्यामे राजा बनि रहल छलाह।असलमे संपूर्ण राम मंदिर परिसर,ओहिठाम बनल मंदिरसभ आ तकर भीतरमे स्थापित मूर्तिसभ अवर्णनीय अछि,अद्भुत अछि ।फटकीएसँ ऐहि मंदिरक गगनचुंबी धाजा देखाइत अछि। ओकरा देखिते मोन गर्वसँ भरि जाइत अछि।लगैत अछि जे अयोध्या आबि हमरालोकनिक जीवन सफल भए गेल।एकटा चीर अभिलाषा बहुत नीकसँ आइ पूर्ण भए गेल।

सरयू नदीमे नौकायान

रामजन्मभूमि मंदिरमे दर्शनक बाद हमसभ सोझे सरयू नदीक घाटपर पहुँचलहुँ।सरयू नदीक साफ,स्वच्छ जल देखि मोन प्रसन्न भए गेल। ओहिठाम पर्यटन विभागक जहाज लागल छलैक।किछु मोटर नाओसभ सेहो लागल रहैक। पर्यटन विभागक जहाजक किरया साढ़े तीनसए रहैक,फेर ओ देरीसँ खुजितैक।मोटर नाओ सएटाकामे घुमा दैत आ तुरंते खुजबो करितैक।तेँ हमसभ मोटरनाओपर बैसि गेलहुँ।ओहिमे किछु यात्री पहिनेसँ बैसल रहथि।हमसभ बैसलहुँ आ नाओ खुजि गेल। तकर बाद तँ आनन्दे-आनन्द छल। चारू दिस अद्भुत दृश्य छल।सरयू नदीक दोसर दिसक दृश्यसभ देखा रहल छल।आगू-पाछु चलैत नाओ सभ ।हमसभ बहुत फटकी धरि ओहि नाओमे घुमैत रहलहुँ ।लगभग आधाघंटाक बाद वापस ओतहि आबि गेलहुँ जाहिठामसँ बिदा भेल रही। तकर बाद आटोबला आ मार्गदर्शकजीक संगे आगूक भ्रमणपर बिदा भेलहुँ।एगारह बाजि रहल छल। भेल यदि जलखै करए लागब तखन मंदिरसभ बंद भए जाएत।तेँ पहिने से काज कए ली तकर बाद एक्के बेर भोजने कए लेब। सरयओनदी घाटसँ बाहर होइते हमसभ सीताक रसोइ गेलहुँ। ओहिठाम निरंतर  भंडारा चलैत रहैत अछि। एकटा बाबाजी हमरासभसँ सटि गेलाह। पहिने तँ भंडाराक बारेमे बतबैत रहलाह ।तकर बाद ओहिमे किछु योगदान करबाक लेल प्रेरित करैत रहलाह। सामनेमे एकटा बृद्ध बाबा जप करैत बैसल रहथि। ओ हमरासभकेँ ओहि बाबा लग बैसा देलाह,फेर अपन खाता खोलि कए कहए लगलाह-

“एहिमे भंडाराक लेल योगदान केनिहारसभक विवरण लिखल जाइत अछि। अपने जे इच्छा होअए से कए कए सकैत छी।कोनो बन्हौट नहि अछि।”

आब कहू।सामने बृद्ध बाबाजी जप कए रहल छथि।हमसभ मंदिरमे बैसल छी। ओ खाता खोलने तैयार छथि। माने स्पष्ट छल।मुदा,हमरासभकेँ से सभ किछु करबाक तँ नहि छल।तेँ चुचाप उठि गेलहुँ।हुनकर मोन कोनादनि भए गेलनि।माहौल देखि श्रीमतीजी कहलनि-

“किछुओ दए दिऔक।”

हम अपन जेबीसँ सएटाका निकालि ओहिठाम राखि देलिऐक आ बिदा भए गेलहुँ। ओहिसँ पूर्व सीताकुंड देखलहुँ।कहल जाइत छैक जे सीताजी एहीमेसँ जल निकालि भानस करैत छलीह। हुनकर रसोइक सामानसभ सेहो किछु राखल देखाएल।सामने एकटा भवनक निर्माण भए रहल छल। पता लागल जे राम मंदिर आंदोलनमे मारल गेल कारसेवक लोकनिक स्मारक ओहिमे बनाओल जा रहल अछि।ओहिठामसँ बाहर निकलि हमरा लोकनि कनक भवन,वाल्मीकि रामायण भवन,दसरथ भवन गेलहुँ। वाल्मीकि रामायण भवनक विशेषता ई अछि जे ओकर देबालसभपर संपूर्ण वाल्मीकि रामायण लिखल अछि। आगू दिस कोनमे मोटाक-मोटा रामनाम लिखल रजिष्टरसभ राखल छल। असलमे ओ रामनाम बैंकक नामसँ जानल जाइत अछि।देश भरिसँ रामनाम लिखि-लिखि भक्तलोकनि स्थानीय संपर्कक माध्यमसँ रामनाम बही ओहिठाम पठबैत छथि।ई अपना-आपमे अद्भुत बुझा रहल छल। लोकक श्रद्धा आ भक्तिक अनुपम दृष्टान्त ओतए हमरालोकनिक सामनेमे उपस्थित छल।

आटो बला आ मार्गदर्शकजी बीच-बीचमे देखाइत मंदिरसभक बारेमे बतबैत रहैत छलाह।बारह बजै बला छलैक।सभठाम जल्दी-जल्दी जाइ,कारण थोड़बे कालमे  मंदिरसभक कपाट बंद भए जाएत।बीच-बीचमे एकाधटा आर महत्वपूर्ण मंदिरसभ देखैत-सुनैत हमसभ वापसीमे मानस भवन पहुँचलहुँ। मानस भवन बेस विस्तृत अछि। ओहिमे रहबाक सुविधा सेहो छैक। एसी डबल बेड कोठरीक एक दिनक किराया २१०० छैक। मुदा,हमसभ तँ पहिनेसँ  दोसर ठाम रहि रहल छलहुँ। ओहिठाम सात्विक भोजनक उत्तम प्रबंध रहैत अछि। तेँ हमसभ अयोध्यामे बेसी काल ओतहि भोजन करी।ओतए जनकपुरसँ आएल एकटा मैथिल परिवार सेहो भोजन करैत छलाह। ओ सभ ओहीठाम ठहरल रहथि।अयोध्याजीमे जनकपुरसँ आएल मैथिल परिवारकेँ देखि बहुत नीक लागल।हुनकासभसँ कनीकाल बतिएबो केलहुँ।भोजनोपरांत अपनसभ अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ।आटोबलाकेँ तीन बजे आबए कहि देलिऐक जाहिसँ आर-आर स्थानसभ देखि सकब।

हमसब तीन बजे आटोसँ अयोध्या भ्रमणक दोसर खेपपर निकलबाक योजना बनओने रही। ताही हिसाबसँ हमसभ तैयार भए कोठरीसँ बाहरो भेलहुँ।मुदा आटोबला अखन रस्तेमे छल। ओ बीस मिनट देरीसँ पहुँचल।अबिते कहलक-

“ततेक थाकि गेल रही जे भोजन करिते सुता गेल।”

“कोनो बात नहि।कनी-मनी आगू-पाछू होइते रहैत छेक।”

तकर बाद हमसभ मार्गदर्शकजीक संगे सभसँ पहिने गुप्तार घाट पहुँचलहुँ। ओहिठामक परिचय देबाक काज नहि अछि। तथापि,एतबा कहि दैत छी जे राम भरत,शत्रुघ्न आ समस्त अयोध्यावासीलोकनिक संगे एतहि जलसमाधि लेने रहथि।एहिसँ पूर्व लक्ष्मण प्राणायाम कए अपन प्राण परित्याग कए देने रहथि।कतेक दुखद रहल होएत ओ दिन।मुदा जे भावी छल से भेल। किछु साल पूर्व धरि ओ स्थान बहुत सुनसान रहैत छल। मुदा,आब से बात नहि बुझाएल। ओहिठाम बहुत रास नाओसभ लागल छल।ऊपर बहुत रास छोट-मोट दोकानसभ देखाएल। यात्रीसभसँ स्थान भरल छल। सामने ऊपरमे एकटा प्राचीन मंदिर अछि। हमसभ ओहिठाम थोड़े काल रहलहुँ,फोटो घिचओलहुँ आ वापसि बिदा भए गेलहुँ। कनीके आगू गेलाक बाद एकटा छोटसन मंदिर देखाएल। स्थानीय लोकसभ कहलनि जे ओतए भगवान रामक खराम राखल छल।तकर बादे ओ सरयूमे जलसमाधि लेल प्रस्थान केलथि।हमसभ ओहिठाम गेलहुँ। भीतरमे एकटा पादुकाक निसान जरूर देखाएल। ओहिठाम बहुत कम लोक भेटलथि।हमसभ थोड़े कालक बाद अत्यंत उदास मोनसँ ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ।

आब हमसभ नन्दीग्राम बिदा भेलहुँ। सूर्यास्त लगीच छल। जाड़ बढ़ि रहल छल।हम टोपी नहि अनने रही। तेँ आटोपर चलबामे कनी बेसी परेसानी लागि रहल छल। मुदा,कएल की जाइत? जेना-तेना बरदास करैत आगू बढ़ैत गेलहुँ। नन्दीग्रामेमे लंका विजयक बाद अयोध्या लौटलापर भरतसँ रामक पहिल बेर भेंट भेल रहनि।ओहिठाम भरत मंदिर अछि। ओहिमे हमसभ दर्शन केलहुँ। कनीके फटकी एकटा छोटसन मंदिर अछि।कहल जाइत अछि जे ओहीठाम बनल सुरंगसँ भरत अयोध्या जाइत छलाह। एतेक ऐतिहासिक स्थानपर कोनो बेसी आकर्षक किछु नहि देखाएल।आब राति शुरू भए गेल छल।होइत छल जे जल्दी डेरा वापिस भए जाइ। मुदा रस्ता तँ कम होइत नहि। सूर्यघाटपर साढ़े छओ बजेसँ लेजर शो होइतए। ठीक ओही समय हमसभ तए पहुँचिओ गेल रही। आखिर टिकट लेलहुँ आ दुनूगोटे  उचित स्थानपर जा कए बैसि गेलहुँ।हमसभ ततेक थाकि गेल रही जे ओहिठाम बनल सूर्यमंदिरमे भीतर नहि जा सकलहुँ।बाहरेसँ प्रणाम कए लेलहुँ। थोड़बे कालमे लेजर शो प्रारंभ भेल जे आधा घंटा धरि चलैत रहल। कार्यक्रम बहुत आकर्षक आ ज्ञानवर्धक छल।

लेजर शो समाप्तिक बाद हमसभ सोझे डेरा दिस बिदा भेलहुँ। फेर मानसभवन लग आटो रूकल।हमसभ तहि भोजन केलहुँ आ डेरा आवि रात्रि विश्रामक तैयारीमे लागि गेलहुँ।

भोरे उठि-सुठि हमसभ अपन सामानसभ सरिएलहुँ। नित्यक्रमसँ निवृत भए ओलापर कार बूक करओलहुँ ।ठीक साढ़े सात बजे हमसभ लखनउक लेल कारसँ प्रस्थान केलहि।हमसभ चाह रस्तेमे पीअब,से वाहन चालककेँ कहि देने रहिऐक। आधाघण्टाक बाद वाहन चालक सड़कक कातमे बनल चाहक प्रसिद्ध ढाबा लग कार रोकि देलक।हमसभ बहुत नीक चाह पीलहुँ आ लखनउ दिस आगू बढ़ि गेलहुँ।रस्तामे अयोध्याजीक यात्रासँ जुड़ल प्रसंग स्मरण करैत बेर-बेर आनन्दित होइत रहलहुँ। धन्य रहथि राम जे हजारों हजारों वर्षक बादो अखनहु धरि लोकक मोनमे सद्यः विराजमान छथि,आराध्य छथि। धन्य छथि ओ सभ जे एहन महापुरुषक जन्मस्थानपर लाखक लाख लोकक स्वप्नकेँ साकार करओलथि।

 

 

८।३।२०२६

 

लखनउ प्रवास

 

हमरालोकनि एगारह बजे लखनउक होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।टेक्सीबलाकेँ आनलाइन भूगतान केलहुँ।  स्वागतीकेँ अपन कागज देखलिऐक। ओ तुरंत हमरसभक सामान कमरा नंबर ‍१०८मे पहुँचबा देलाह।बेस सुसज्जित   सभ तरहेँ सुबिधापूर्ण कोठरी देखि हमरा लोकनिक मोन प्रफुल्लित भए गेल।हमसभ कनी काल विश्राम केलहुँ आ श्री कौशल किशोर मिश्रजी(हमर पितिऔत भातिज) केँ फोन लगओलहुँ। ओ  लखनउमे बहुत दिनसँ रहैत छथि  । मोतीलाल नेहरु इंजिनीयरिंग कालेज,इलाहाबादसँ सिभिल इंजिनीयर छथि।  उत्तरप्रदेस सरकारमे अधीक्षण अभियंताक पदसँ सेवानिवृत्त केलाक बादो कार्यरत छथिहे।हुनकासँ फोनपर गप्प भेल। हुनकर पड़ोसी) जे मधुबनी लग सीमा गामक छथि,बहुत दुखित छलखिन।हुनकर हृदयक शल्यक्रिया ओही दिन होएबाक छलनि।अस्तु,ओ आइ तँ नहि आबि सकताह।काल्हि जरूर अओताह,से कहलनि।

हमसभ भोजनक बाद कनी काल विश्राम केलहुँ ।तकर बाद हमसभ आटोसँ डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल देखबाक लेल बिदा भेलहुँ।ओहीठाम गोमती नदीक कातमे रिभरफ्रांट बनल अछि जतए साँझमे घुमबाक लेल बहुत लोकसभ अबैत छथि।सटले फूडपार्क सेहो अछि। आटो बला पुछलक जे अहाँसभ पहिने केमहर जाएब?हमसभ पहिने रिभरफ्रांट देखबाक लेल आटोसँ उतरि गेलहुँ। गोमती नदीक काते-काते बनल पार्कमे लोकसभ घुमैत छथि,विश्राम करैत छथि। हमहूँसभ कनी काल ओहिठाम घुमलहुँ।तकर बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल चलि गेलहुँ। ओहिठाम प्रवेशक लेल टिकट लेबए पड़ैत छैक। टिकट लेलाक बाद हमसभ भीतरमे पैरे-पैरे यथासाध्य घुमैत रहलहुँ। ओहीमे एकदिस बड़ीटा सामियाना लागल छल। पता लागल जे काल्हि ओहिमे बड़का साहित्यिक कार्यक्रम होमए बला छैक।ई पार्क मात्र  एक स्थापत्य चमत्कार नहि अछि।अपितु, ई समता, न्याय आओर मानवाधिकारक भावनाक प्रतीक सेहो अछि।अम्बेडकर पार्कक निर्माण उत्तर प्रदेशक पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती मायावतीक कार्यकालमे भेल छल। एहि पार्ककेँ बनाबक मुख्य उद्येश्य  भारतक ओहि  महान नेता लोकनिक सम्मान करब थिक जे  सामाजिक न्याय, समानता आ दलित अधिकारक लिए संघर्ष केलनि।एहिमे प्रमुख छथि- डॉ. भीमराव अंबेडकर, कांशीराम, नारायण गुरु, ज्योतिबा फुले, आदि।

डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल अद्भुत अछि। हमसभ  यथासाध्य एहिमे घुमलहुँ।थोड़े काल सुस्तेबो केलहुँ आ तकर बाद आटोसँ फूडपार्क दिस बिदा भेलहुँ। काते-काते दूबगली अनेक प्रकारक भोजन,जलखैसभक दोकान देखबामे आएल। ओहीमे बीचमे एकटा बिहारी व्यंजनक दोकान सेहो देखबामे एल।मुदा,ओहिठाम,आमिष भोजन सामग्री भेटैत छल। तेँ हमसभ वापस भए गेलहुँ। बेसी आमिष सामग्री बला दोकानेसभ देखाएल। शुरूएमे एकटा निरामिष  चाटक दोकान छल। मुदा,हमसभ किछु खेलहुँ नहि।  ओहिठामसँ सोझे अपन डेरा वापिस भए गेलहुँ।

आइ तेरह फरबरी २०२६ अछि।हमसभ स्नान-ध्यान,जलखैक बाद कौशलजीक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ। ओ कहने रहथि जे आइ अओताह,मुदा अएबाक समय नहि कहने रहथि। करीब एकघंटा धरि हुनकर प्रतीक्षा केलाक बाद श्रीमतीजी कहलनि –

“एना तँ हमसभ बैसले रहि जाएब।”

“तखन?”

“तखन की,हमसभ कतहु घुमबाक लेल निकलि जाइ।हुनकर बाट कतेक काल तकैत रहबनि।”

“बात तँ सही कहि रहल छी।मुदा ओ कहने छथि।अएबे करताह।यदि हमसभ निकलि जाएब आ ओ बीचेमे आबि गेलाह तखन?”

“तखन हमसभ वापस चलि आएब।हमसभ कोनो ततेक फटकी तँ जा नहि रहल छी।”

“बेस।बातो सही छैक।हुनका निश्चित समय कहबाक चाहै छलनि।तखन ओहि हिसाबे हमसभ अगिला कार्यक्रम बनबितहुँ। चलू,निकलि जाइत छी।बादमे देखल जेतैक।”

आखिर हमसभ बाहर भए गेलहुँ। कनीके फटकी एकटा टेम्पो बला(शाहजाद)  ठाढ़ छल।हम ओकरा पुछलिऐक-

“हमसभ लखनउक मुख्य-मुख्य स्थानसभ घुमए चाहैत छी।तूँ चलबह?”

“किएक ने जाएब?हमर तँ काजे इएह अछि।”

“केमहर जेबहक आ कतेक किराया लेबहक?”

ओ एकसुरे पुरान लखनउक दर्शनीय स्थानसभक नाम गना गेल। रुमी दरबाजा,शाही तालाब,सतखपे,नौबतखाना,हनुमान मंदिर,इमामबाड़ा,भूल-भुलैया,,,।

“से तँ बुझलहुँ,मुदा किरया कतेक लगतैक?”

“चलू ने।जे वाजिब बुझाए से दए देबैक।”

“फरिछएल बात नीक होइत छैक।”

“अखन बिदा होइत छी तँ दू-तीन बजे धरि वापस आबि सकब। सात सए रूपया दए देबैक।”

“ठीक छैक।”

हमसभ आटोपर बैसि गेलहुँ।रूमी दरबाजा,शाही तलाब,सतखपे,नौबतखाना देखलाक बाद हमसभ हनुमान मंदिर पहुँचलहुँ। प्रयागराज जकाँ ओतहु खधिआमे सुतल हनुमानजी छथि।हुनका प्रणाम कए हमसभ ओतए बैसले छलहुँ कि कौशलजीक फोन आएल-

“कहाँ छीऐ?हमसभ अहींक डेरापर आएल छी।”

“हमसभ तँ अहाँक एकघंटा बाट तकलहुँ।तकर बाद भेल जे कनी घुमि ली।”

“हम तँ कहने रही जे काल्हि आएब,,,।”

आब हुनका की कहितिअनि।

“अहाँ ओतहि रहू।हमसभ आबि जाइत छी।”

“हमही आबि जाइत छी।”

“कतेक समय लागत?”

“हमरा आधा घंटा लागत।ताबत ओतहि रहब।”

हमरासभकेँ भेल जे आधा घंटा ओहीठाम बैसल की करब?सटले बुद्धपार्क रहैक ।ओहिठाम जा कए बैसि गेलहुँ। एक-पाँच-सात  मिनट भेल होएत की हुनकर फोन आबि गेल।

“कतए छी?हमसभ तँ हनुमान मंदिर आबि गेल छी।”

“ओहिठामसँ सटले बुद्धपार्कमे बैसल छी।”

ओ एहिपर किछु-किछु फुसफुसेलनि।फेर कहैत छथि-

“आब ओतहि रहब।हमसभ आबि रहल छी।”

हम हुनकर परेसानी बुझि रहल छलिअनि।चिंता आटोबलाक सेहो छल।यदि कौशलजी अपना संगे चलबाक आग्रह केलनि तखन कोना की होएत?

“जे हेतैक,देखल जेतैक।”

हमसभ पार्कसँ बाहर भेले छलहुँ कि कौशलजी बड़काटा कारपर बैसल देखेलाह।मोन आनन्द भए गेल।हमरासभकेँ देखिते ओ कारसँ नीचाँ उतरि गेलाह,प्रणाम केलनि आ भेंट होएबाक सुयोगपर बहुत प्रसन्नता व्यक्त केलनि। हमरा तकबामे,डेरासँ ओहिठाम धरि पहुँचबामे,फेर हमरा लोकनि द्वारा स्थान  बदलि लेबाक कारण जे हुनका परेसानी भेल रहनि से हुनकर आकृतिपर झलकि रहल छलनि।मुदा हम आब कइए की सकैत छलहुँ?हँ,एतबा ध्यानमे आएल जे आगूसँ हमहीं हुनकासँ समय पक्का कए लेब जाहिसँ हुनका एहन परेसानी फेर नहि होनि।ओ आग्रह केलनि जे हमसभ हुनका संगे कारपर बैसि जाइ।हमसभ बात आटो बलाकेँ कहलिऐक।ओ सहर्ष तैयार भए गेल।कहलक-

“कोनो बात नहि।बाँकीक जगहसभ काल्हि घुमि लेब।अखन अहाँ किछु टाका दए दिअ।”

हम ओकरा तीन सए रूपया दए देलिऐक ।ओ प्रसन्नतापूर्वक से राखि लेलक ।हमसभ कौशलजीक संगे हुनकर कारपर बैसि अपन डेरा वापस बिदा भेलहुँ।रस्तामे लखनउक प्रसिद्ध हनुमान मंदिर छल।हमसभ ओतए उतरि हुनकर दर्शन केलहुँ,प्रसाद चढ़ेलहुँ आ वापस अपन डेरा दिस बिदा भए गेलहुँ।कौशलजी हमरासभकेँ डेरा पहुँचा कए वापस चलि गेलाह।हम बहुत आग्रह केलिअनि जे संगे चलथि,कमसँ कम चाह पीबि लेथि।मुदा हुनका अपन पोताकेँ इसकुलसँ अनबाक रहनि।

“फेर आएब।”- से कहैत ओ कारपर सबार भए गेलाह। हमसभ अपन डेरा पहुँचि गेलहुँ।जाइत-जाइत हुनकर वाहन चालक हमरासभक कोठरीमे बड़ीटा मधुरक डिब्बा राखि गेल।हम बड़ी काल धरि कौशलजी,हुनकर शिक्षा आ उपलब्धिक विषयमे सोचैत रहि गेलहुँ। ओ जखन प्रयागराजमे मोतीलाल नेहरु इंजिनीयरिंग कालेजमे पढ़ैत रहथि तखन हमसभ ओतहि कर्मचारी चयन आयोगमे कार्यरत रही आ ‍१७ नयाममफोड़गंजमे रहैत रही। ओ बरोबरि हमरासभक ओहिठाम अबैत रहथि।हमहूँ कहिओ काल हुनकर छात्रावास जाइत रही। तहिआसँ आब कतेक समय बीति गेल।बीच-बीचमे कहिओ काल भेंट होइत रहल।एतेक दिनक बाद फेर भेंट भेलाक बादो ओहिना आपकता,ओहने सिनेह हुनकामे देखबामे आएल।आइ ओ किछु जल्दीमे रहथि।नीकसँ गप्पसप्प नहि भए सकल। काल्हि फेर अओताह,से कहि गेल छथि। से सोचि आनन्दमे रही।अपन कोठरीमे पहुँचि गेल रही।

“आब आइ किछु आर नहि,बस विश्राम।”

“ठीक छैक।”

आइ लखनउमे हमरसभक तेसर दिन छल। कौशलजीकेँ फोन केलिअनि। ओ चारि बजेक आसपास अओताह।

“तखन हमसभ घुमि लैत छी।”

“ठीके कहलहुँ।”

आटोबलाकेँ फोन लगओलहुँ। ओ नओ बजे धरि आबि जाएत। हमसभ ताबत जलखै कए लेलहुँ। बाहर निकलले छलहुँ कि स्वागत कक्षसँ सटले ओएह आटोबला ठाढ़ देखाएल।हमसभ प्रसन्नतापूर्वक काल्हि बाँकी रहि गेल स्थानसभ देखबाक लेल बिदा भए गेलहुँ।हमसभ इमामबाड़ा आ भूलभुलैया काल्हि बाहरेसँ देखने रही।ओहिठाम फोटो घिचओने रही। आइ शुक्र दिन छलैक। ओहिठाम नमाजीसभक बहुत भीड़ हेतैक।रस्तासभ जल्दीए बंद भए जेतैक। फेर ओहिसभमे बहुत रास सीढ़ी चढ़बाक छैक जे हमर श्रीमतीजीकेँ कष्टकारी हेतनि,साइत पारो नहि लगतनि।तखन?बाहरेसँ हमसभ घुरि गेलहुँ। थोड़बे फटकी म्युजियम छल।हमसभ ओहिठाम गेलहुँ। ओहिठामम मिर्जा वाजिद अली शाहक खिस्सा सुनलहुँ। मिर्जा वाजिद अली शाह ( ३० जुलाई १८२२ – १ सितम्बर १८८७) अवधक एगारहम आ अंतिम राजा छलाह। ओ ९ वर्ष धरि(१३ फरवरी १८४७ सँ ११ फरवरी १८५६)  एहि पद पर रहलाह ।कहल जाइत अछि जे हुनका अंग्रेज घेरि लेने छलनि,मुदा एहि लेल भागि नहि सकलाह जे पनही पहिरेबाक लेल आदमी नहि आबि सकल।के अबैत?सभ तँ अपन जान बचबएमे लागल छल। आखिर ओ पकड़ि लेल गेलाह ।ई भेलैक नबाबी। म्युजियममे मार्गदर्शक गजब व्यक्तित्वक लोक छलाह। एहन विनम्र आ गरिमापूर्ण व्यवहार,बजबाक अद्भुत शैली लखनउएमे देखल जा सकैत अछि।ओहिमे राखल चित्रकलासभक ओ विस्तारसँ वर्णन केलनि। हमसभ तकर खूब आनन्द लेलहुँ।ओहि चित्रसभमे ई विशेषता छल जे जेमहरे घुमबै तेमहरे ओकर मुँह घुमि जाइत छलैक। से एकटा,दूटा चित्रमे नहि।सभमे इएह हाल छल। अंतमे,हम मार्गदर्शकजीकेँ हुनकर शुल्क देलिअनि जे ओ बिना कोनो ना-निकुरकेँ राखि लेलनि आ बहुत आदरपूर्वक हमरासभकेँ ओहिठामसँ बिदा केलनि।ओ एहि बातसँ बहुत प्रसन्न भेल रहथि जे बच्चामे हमसभ दाहा देखए अपन गामक हाटपर जाइत छलहुँ,जे हमरा ओहिठामक लोकसभ दाहापर कबुलामे बद्धी चढ़बैत छलाह,जे हमरा टोलक लोकसभ दाहाक लेल चंदा सेहो दैत छलाह। ओ उत्सुकतामे पुछलाह-

“कतए घर भेलैक अपनेक?”

“बिहारक मधुबनी जिला।”

“मधुबनीक लोक होइते छथि एहने नीक।”

हुनकर प्रशंसासँ हम दंग छलहुँ। बाहरे लखनउ!

”ओहिठामसँ वापसीमे हमसभ एकटा प्रसिद्ध दोकानपर किछु कपड़ासभ कीनलहुँ आ वापस अपन डेरा चल अबैत रहलहुँ। आटोबलाकेँ चारि सए रूपया देलिऐक।ओ बहुत प्रसन्न।एहि तरहेँ हमरा लोकनिक ओकरासँ सातसए रूपयामे पुरना लखनउ घुमबाक  करार पूरा भए गेल।ओहो खुस,  हमहूँसभ प्रसन्न।

साँझमे निर्धारित समयपर कौशलजी पहुँचलाह।

चारि बाजि रहल छल।हमसभ कौशलजीक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ। आइ हुनका कोनो परेसानी नहि होनि,हमसभ अपन डेरापर समयपर उपलब्ध रही ताहि लेल पहिने सँ साकंछ छलहुँ। हम हुनका फोनो कए देलिअनि जाहिसँ कोनो प्रकारक दुबिधा नहि रहए। ओ समयसँ आबि रहल छथि,से जानकारी भेटि गेल छल। होलीडे होममे हुनका लेल कथीसँ स्वागत कएल जाइत।तथापि, चाहक लेल कहि देने रहिऐक। समयसँ ओ आबि गेलाह। हमसभ हुनका अपन डेरापर देखि बहुत प्रसन्न रही। आब की?शुरू भेल तरह-तरहक गप्प-सप्प। हुनकर धिआ-पुताक बारेमे विस्तारसँ जानकारी भेटल।ओना किछु-किछु तँ बुझले रहए।हुनकर आर्थिक संपन्नता आ बच्चासभक कुशल-समाचार जानि बहुत आनन्द भेल। लगभग दू घंटा धरि हुनकर सानिध्यक फएदा हमसभ उठबैत रहलहुँ। ओ आब वापस अपन घर जेताह। जाइत-जाइत अपना ओहिठाम आएबाक लेल हकार दैत गेलाह। मुदा हमरासभ लग आब एक्केटा दिन बाँचल छल। हमसभ प्रात भेने चंद्रिका भगवतीक दर्शन करबाक लेल बिदा भेलहुँ।आइ शिवराति छलैक।तेँ मंदिरमे बहुत भीड़ रहैक। तथापि,हमसभ नीकसँ दर्शन केलहुँ  आ साँझ पड़ैत-पड़ैत अपन डेरा वापस आबि गेलहुँ।काल्हि  लखनउसँ दिल्ली वापस होएबाक छल। तेँ ओहि दिन कोनो आर कार्यक्रम नहि छल।दुपहरामे लगीचेक एकटा प्रसिद्ध भोजनालयमे हमसभ लखनवी बिरियानी खेलहुँ।हमरासभकेँ ओहिठाम आटोबला(शाहजादा)  लए गेल रहए। जाबे हमसभ भोजन केलहुँ,ताबे ओ हमरासभक प्रतीक्षा करैत रहल।तकर बाद वापस डेरा पहुँचा देलक।किराया पुछलिऐक तँ मात्र एकसए टाका मंगलक। हमरा लागए जे ओ बेसी कहत,कारण ओतेक काल धरि प्रतीक्षा केने छल।मुदा,ओ उचितो किरायासँ कनी कमे लेलक।हमसभ ओकर सज्जनता, विनम्रतासँ बहुत प्रभावित भेल रही।जाइत जाइत  एकटा आर घटना मोन पड़ि रहल अछि। भोरे टहलबाक क्रममे एकटा कोनटापर पराग दूधक पैकेट बेचैत एकटा सज्जन भेटलाह।हम हुनका लगपासक एटीएमक जानकारी पुछलिअनि।ओ बता देलाह।मुदा कोनो एटीएम काज नहि कए रहल छल।वापसीमे हुनका से कहलिअनि। ओ तरह-तरहक बात सभ बुझबए लगलाह जे एटीएमसँ जानि कए खराप राखल जा रहल छैक,आदि,आदि।दोसर दिन फेर ओ देखेलाह।हम हुनका कोनो नीक बिरियानी बला होटलक जानकारी पुछलिअनि। ओ कहलाह-

“हम पछिला पचीस सालमे कहिओ होटलमे नहि खेने छी।तेँ एहि बारेमे हम किछु नहि कहि सकैत छी।”हमरा हुनका बारेमे उत्सुकता बढ़ल।हम पुछलिअनि-

“अपने कोन काज करैत छलहुँ?”

“छोट-छिन सरकारी कारकून छलहुँ। हम कहिओ अधिकारीक दबाबमे नहि रहलहुँ।ठाँइ-पठाँइ जबाब दए दिऐक।परिणाम भेल जे जाही पदसँ नौकरी शुरू केलहुँ ताहीसँ सेवानिवृत्त भए गेलहुँ। किछु साल पूर्व एक्सीडेन्ट भए गेल।तकर बाद समयपूर्व स्वेच्छा सेवानिवृत्ति लए लेलहुँ। आब इएहसभ करैत छी।गुजर भइए जाइत अछि।”

हमरा हुनकर स्वभाव बुझबामे आब कोनो भांगठ नहि छल। हम मुस्काइत आगू बढ़ि गेलहुँ।

 दिन भरि विश्रामक बाद हमसभ रातिमे काशी विश्वनाथ एक्सप्रेससँ दिल्ली वापसी  होएब। ट्रेन बहुत विलंबसँ चलि रहल छल।ताहि हिसाबे दस बजे रातिक आसपास ओकरा लखनउ टीसनपर अएबाक चाही। मुदा,‍१३९ नंबरपर फोन कएलापर पता लागल जे ट्रेन लखनउ सही समयपर पहुँचत। हम से जानि चकित रही।मुदा भेलैक सएह।सही समयपर ट्रेन आबि गेल छल। ट्रेनक प्लेटफार्म अंतिम समयमे बदलि गेल रहैक,जाहिसँ कनी परेसानी भेल।ओही क्रममे एकटा ग्रैजुअट कूलीसँ भेंट भेल।ओ गजब व्यक्ति छलाह।एतेक शिक्षित रहितहुँ वर्षोंसँ कूलीक काज कए रहल छलाह।हम हुनकर फोटो खिचलहुँ आ परिचय सेहो पुछलिअनि।मुदा ओ आर किछु कहबासँ मना कए देलाह।“बस एतेक प्रयाप्त छैक।की करब बेसी बूझि कए?”

आब हमर सभक लखनउ प्रबासक अंत भए रहल छल। लखनउ सहर,एहिठामक खानदानी लोकसभ,स्वादिष्ट भोजन आ कौशलजीक अपनत्व नहि बिसरल जा सकैत अछि।  हमसभ ट्रेनमे बैसि गेल छलहुँ। ट्रेन लखनउ प्लेटफार्मसँ सही समयपर घुसकए लागल। मोने-मोन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामकेँ स्मरण करैत हमरा लोकनि वापस दिल्ली बिदा भए गेलहुँ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

‍१८।४।२०२६




 रामकृष्ण मिशन आश्रम, लखनउ

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रविवार, 4 जनवरी 2026

छाप सरायकेला साहित्योत्सवमे हमर उपन्यास हम आबि रहल छी,पर विशेष चर्चा

छाप सरायकेला सहित्योत्सव २०२४( Please click to view) 


छाप सरायकेला साहित्यिक महोत्सव 2024

एक दिन दुपहरिआमे भोजनक बाद विश्राम करैत रही कि अचानक मोबाइलक घंटी टनटना उठल।फोनमे अविचलजीक नाम उचरि रहल छल।भेल जे ओ जरूर कोनो शुभ समाचार देताह।बातो सएह रहैक। गप्प शुरू होइतहि ओ कहलथि-

“जमशेदपुरमे साहित्य कला परिषदक पहिल साहित्यिक आयोजन”छापक नामसँ अक्टूबरमे हेतैक।ओहिमे अपनेक  कोनो उपन्यासपर चर्चा करबाक योजना अछि। से कोन किताबपर कएल जा सकैत अछि?”

“हम आबि रहल छी।”-हम कहलिअनि।

“मुदा अपनेकेँ आबए पड़त।”

“आबि जेबैक।”

“ठीक छै।अहाँकेँ मिश्राजी फोन कए कार्यक्रमक विवरण देताह।अहाँ हुनका किताबक पाँच प्रति पठा देबनि,संगे अपन कार्यक्रमक बारेमे सेहो कहि देबनि।”

अविचलजीक प्रस्ताव सुनि मोनमे स्वाभाविक बहुत रास उत्सुकता जागल।मिश्रजी के छथि?साहित्य कला फाउन्डेशन,जमशेदपुर केहन संस्था अछि?एकर स्थापना के केलनि?आर-आर कतेको तरहक जानकारीक इच्छा भेल।हम इन्टरनेटपर उपलब्ध जानकारी देखिए रहल छलहुँ कि साहित्य कला फाउन्डेशनक ट्रस्टी आदरणीय डाक्टर ब्रजेश मिश्रजीक फोन आएल।ओ जमशेदपुरमे साहित्य कला फाउन्डेशन,जमशेदपुर आ जिला प्रशासनक संयुक्त तत्वावधानमे छाप शिर्षकसँ अक्टूबरमे आयोजित होमएबला साहित्यिक कार्यक्रमक जानकारी विस्तारसँ देलनि।ईहो कहलनि जे अपनेकेँ एहि आयोजनमे सामिल होएबाक अछि।ताहि लेल अपनेक  मैथिली उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर एकटा परिचर्चा सत्र आयोजित कएल जाएत।अपने अपन कार्यक्रम सूचित करी जाहिसँ आवश्यक व्यवस्था कएल जा सकए।

“हम जल्दीए आवश्यक सूचना पठाएब।किताब कोन पतापर पठाओल जाएत?”

“हमरे पतापर पठा देबैक।”

“ठीक छैक।”

फोन कटि गेल।हम ई समाचारसभ सुनि बहुत प्रसन्न रही। मैथिलीमे हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर एतेक पैघ आयोजनमे एकटा विशेष सत्रमे परिचर्चा होएत से जानि हमर प्रसन्नताक अंते नहि छल। हम तुरंत ई समाचार श्रीमतीजीकेँ देलिअनि।तुरंत लैपटापपर बैसि जमशेदपुर जएबाक कार्यक्रम बनओलहुँ आ अपन कार्यक्रमक जनतब ब्रजेशजीकेँ पठा देलिअनि।संगे हुनका  किताब पठेबाक लेल उचित व्यवस्थामे लागि गेलहुँ।

ब्रजेशजी आ त्रिपाठीजी जमशेदपुरक एहि छाप नामसँ भए रहल साहित्यिक आयोजनक प्रमुख कर्ता-धर्ता रहथि।बादमे ब्रजेशजीसँ एहि कार्यक्रमक संदर्भमे कैक बेर गप्प भेल।ओ मीतभाषी आ बहुत प्रभावशाली लोक बुझेलाह।हमर कार्यक्रम प्राप्त भए गेलाक बाद हमर पत्नी सहित दिल्लीसँ जमशेदपुर आवागमन आ ओहिठाम रहबाक व्यवस्था सभटा ओएह केलनि।त्रिपाठीजी हमर परिचय सहित चर्चाक लेल चयनित हमर मैथिली उपन्यास,हम आबि रहल छीक बारेमे हिन्दी आ अंग्रेजीमे संक्षिप्त विवरण पठेबाक आग्रह केलनि।हम हुनका आवश्यक जानकारी जल्दीए पठा देलिअनि।जखन एक सप्ताह समय बीति गेल आ टिकटक किछु जनतब नहि भेटल तँ बीचमे अविचलजीसँ सेहो गप्प भेल।तकर बाद तुरंत ब्रजेशजीक फोन आएल। ओ हमर  सपत्नीक जमशेदपुर जएबाक आ वापसी हबाइ यात्राक टिकट पठा देलनि।रहबाक व्यबस्था सेहो सरकारी अतिथिगृहमे करबा देलनि।आब कथीक चिंता?

पहिने तँ छापक आयोजन साहित्य कला ट्रस्ट जमशेदपुर  द्वारा जिला प्रशासनक सहयोगसँ आयोजित करबाक योजना छल। मुदा,बादमे स्थानीय जिला प्रशासन एहि आयोजनकेँ पूर्णतः अपना हाथमे लए लेलक।कार्यक्रमक रूपरेखा आ ओहिमे सामिल होमएबला अतिथिलोकनि ओएह रहि गेल। जिला प्रशासन एहि आयोजनकेँ भव्य बनाबएमे कोनो कसरि नहि रखलक। हमरा सपत्नीक दुनू दिसका हबाइ यात्राक लेल टिकट पठा देलक।हमरासभकेँ स्थानीय राजकीय अतिथिगृहमे रहबाक व्यवस्था कए देलक।ततबे नहि,जहिआ हमरासभकेँ राँची जएबाक छल,ओहि दिन भोरेसँ कैकटा वरिष्ठ पदाधिकारीलोकनिक फोन आबि गेल। हम कखन राँची पहुँचब,आगू जमशेदपुरक लेल कखन जाए चाहब,आदि,आदि।हमरा राँची पहुँचि  ओहि दिन ओतहि ठहरबाक छल। दोसर दिन भेने राँचीसँ जमशेदपुरक लेल जएबाक जनतब हुनकासभकेँ देलिअनि। हमरा द्वारा देल गेल जानकारीक अनुसार दोसर दिन भोरे एकटा युवक राँची आबि गेलाह।हुनका संगे हमसभ जमशेदपुरक लेल बिदा भेलहुँ।रस्तामे प्रमुख स्थानसभक जानकारी ओ हमरा दैत रहलाह। असलमे ओ स्थानीय इंजिनियरिंग कालेजक विद्यार्थी छलाह आ एहि साहित्यिक कार्यक्रममे स्वेच्छासँ अपन सेवा दए रहल छलाह।एहन-एहन बहुत रास विद्यार्थीसभ अतिथिलोकनिक स्वागत  सहायताक लेल लागल छलाह। राँचीसँ जमशेदपुरक लेल बिदा होएबाक कालसँ वापसी समय धरि ओ हमरा संगे रहलाह आ जरूरी मदति करैत रहलाह।एहि काजक कारण हुनका कैक बेर व्यक्तिगत परेसानी सेहो भेलनि।मुदा,ओ से सभ प्रसन्नतापूर्वक सहैत रहलाह। ओ बहुत प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहथि आ  साहित्यमे स्वाभाविक रुचि छलनि जाहि कारण ओ एहि कार्यक्रममे सामिल भेल रहथि।

हमसभ जमशेदपुरक रस्तेमे रही कि आदरणीय अविचलजीक फोन आएल। ओ हमरसभक स्वागतक लेल उत्सुक छलाह।

“कतए धरि पहुँचलहुँ?कोनो दिक्कति ने ने?अपनेसभकेँ रहबाक लेल अतिथिगृहमे व्यवस्था अछि। सोझे ओहीठाम चलि जाएब।”

हम हुनकर भावुक शब्द सुनि आह्लादित छलहुँ। लगैत छल जेना हम कतेक महत्वपूर्ण भए गेल होइ।ई थिक हुनकर महानता।हमरासभकेँ अतिथिगृहक द्वारिपर पहुँचिते जबरदस्त स्वागत कएल गेल। दूटा महिला आरती लेने ठाढ़ छलीह। ओतए  उपस्थित अधिकारीलोकनि माला पहरओलनि ।ओएहसभ हमरा लेल आरक्षित कोठरीमे हमर सामानसभ पहुँचा देलनि।हमसभ पाछूए लागल ओतए पहुँचलहुँ। सभ तरहक आधुनिक सुविधासँ परिपूर्ण ओ कोठरी बेस आरामदायक लागि रहल छल। आब की?हमसभ किछु काल विश्राम केलहुँ। आब साँझ पड़ि रहल छल कि आदरणीय अविचलजीक फोन आएल।

“डेरेपर छी ने?”

“हँ,हँ।”

“हमसभ अपनेसँ भेंट करए आबि रहल छी।”

“आउ,आउ।हम तँ बाटे ताकि रहल छी। भोजन संगे हेतैक।”

हमसभ कनीके कालक बाद आमने-सामने छलहुँ। अविचलजी सपरिवार आबि गेल छलाह। हुनकर सपरिवार एहि तरहेँ आएब आ एतेक समय देब बहुत नीक लागल। हमसभ बड़ीकाल धरि गप्प करैत रहलहुँ। हम आबि रहल छी,उपन्यासपर चर्चा भेल।काल्हि एहि पुस्तकपर मंचपर चर्चा होएत। तेँ हमरालोकनिकेँ स्वाभाविक उत्सुकता छल। किछु आर किताबसभ सेहो हुनका देलिअनि।हमसभ संगे भोजन केलहुँ। तकर बाद ओ सभ अपन डेरापर वापस चलि गेलाह।हमसभ वापस अपन कोठरीमे कनीकाल दूरदर्शन देखलहुँ आ कल्हुका कार्यक्रमक ध्यान करैत सुति रहलहुँ।

आइ अठारह अक्टूबर २०२४ कए छाप साहित्यिक कार्यक्रमक प्रथम दिन छल। हम सभ कार्यक्रममे जएबाक लेल तैयार छलहुँ।हमरा कार्यक्रमस्थल धरि लए जएबाक लेल कार संगे हमरसभक  मार्गदर्शक आबि चुकल छथि। हमसभ तुरंत कारमे बैसि कार्यक्रम स्थल दिस बिदा भए गेलहुँ।हमरालोकनिक अतिथिगृहसँ सटले छल ओ स्थान।दस मिनटक भीतरे ओहिठाम पहुँचि गेलहुँ। अतिथिगृहसँ कार्यक्रमस्थलक बीचमे रस्ताक बिजली खंभासभपर कार्यक्रममे सामिल होमए जा रहल लेखक,रचनाकारलोकनि आ  हुनकर चयनित पुस्तकसभक पैघ-पैघ पोस्टर लगाओल गेल छल। हमरा ई देखि बहुत प्रसन्नता भेल जे ओहि पोस्टरसभमे हमहूँ सामिल छलहुँ।हमर पुस्तक,हम आबि रहल छी,क चित्र कार्यक्रम स्थलपर शुरूएमे लगाओल गेल छल। कार्यक्रम स्थलक बाहर जिला प्रशासनक प्रमुख अधिकारी हमरालोकनिक स्वागत लेल उपस्थित छलाह।कार्यक्रम एकटा विशाल हालमे आयोजित भए रहल छल। कनीके फटकी प्रतीक्षा रूममे हम प्रतीक्षारत आन लेखकलोकनिक संग बैसलहुँ।हमर श्रीमतीजी सेहो हमरा संगे रहथि। स्थानीय जिलाधीश माननीय श्री रविशंकर शुक्लजी व्यक्तिगत रूपसँ सभसँ भेंट केलनि।परिचय-पातक बाद सभगोटे कार्यक्रम भवन दिस बढ़ि गेलहुँ।किछु गोटे मंचपर बैसबाक लेल आगू बाटे निकलि गेलाह।मंच सजि गेल छल।हाल लोकसभसँ भरल छल। जिला प्रशासनक सक्रियताक कारण श्रोताक कमी महि छल।जिला भरिक विद्यालय ,महाविद्यालयसँ विद्यार्थी एहिमे सामिल भए रहल छलाह। उद्घाटन सत्रमे साहित्य आ सृजनक महत्वपर बहुत सफल चर्चा भेल। तकर बाद दिन भरि पूर्वनियोजित कार्यक्रमक अनुसार अनेकलोकनि अपन पुस्तकक विषयमे आयोजित परिचर्चामे सामिल होइत रहलाह।

आजुक अंतिम सत्रमे हमर  उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर चर्चा प्रारंभ भेल। आदरणीय प्रोफेसर अविचलजी कार्यक्रमक संचालन कए रहल छलाह। हाल दर्शकसँ भरल छल। अविचलजीक प्रश्न पुछबाक क्रम  आ हमर उत्तरसँ लगभग एकघंटा धरि ओसभ मनोयोगपूर्वक सामिल रहलाह।अंतमे,एहि उपन्यास आ परिचर्चासँ संवंधित श्रोता दिससँ प्रश्न सेहो कएल गेल जाहिमे श्रीमती नूतन झाक प्रश्न बहुत सटीक आ मार्मिक छल। आब कार्यक्रम समाप्त होएबाक समय आबि गेल छल। लोकसभ थाकि चुकल रहथि।मंचसँ कार्यक्रम समापनक घोषणा होइतहि लोकसभ हालसँ बाहर होमए लगलाह।हमहूँसभ बाहर निकललहुँ।ओहिठाम जमशेदपुरक बहुत रास मैथिलसभ उपस्थित छलाह।ओसभ हमरा हमरासँ भेंट करबाक लेल बहुत उत्सुक छलाह।हम किछुगोटेकेँ अपन किताबसभ सेहो देलिअनि। आब बाहर निकलिए रहल छलहुँ कि अविचलजी भेटि गेलाह-

“काल्हि समय होअए तँ  एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरमे समाजमे बृद्धलोकनिक स्थितिपर कार्यक्रम आयोजित कएल जाइत ।”

“किएक ने।कखन अएबाक हेतैक?”

“साढ़े दस बजे आबि जाएब।इएह कार अहाँकेँ पहुँचा देत।संगमे मार्गदर्शक तँ रहबे करताह।”

‍१९ अक्टूबर २०२५

आइ जमशेदपुर प्रवासक तेसर दिन अछि। हमसभ अविचलजीक कालेजमे आयोजित  कार्यक्रममे जएबाक लेल तैयार छी। हमरसभक मार्गदर्शक कार सहित आबि चुकल छथि। हमसभ कारसँ गंतव्य दिस बिदा छी। मुदा,रस्तामे जाम छैक। तेँ देरी भए रहल अछि। ओमहर अविचलजी कालेजमे अपन मित्रलोकनिक संगे हमरसभक प्रतीक्षा कए रहल छथि।हमरा हुनकर फोन आबि जाइत अछि।

“कतए पहुँचलिऐक?”

“जाममे फँसि गेलहुँ।आब दसमिनटमे पहुँचि जएबाक चाही।”

“आउ,आउ।हमसभ अपनेसभक बाट ताकि रहल छी।”

हमसभ एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक द्वारिपर पहुँचैत छी।अविचलजी  रबीन्द्र चौधरीजीक संगे हमर सभक स्वागत  करैत छथि। हमसभ कनीके आगू बढ़ैत छी कि एनसीसीक कैडेटसभ सलामी दैत छथि। आदरणीय रबीन्द्रजी हुनकरसभक सलामीकेँ उचित जबाब दैत छथिन। हम अविचलजीक व्यवस्थासँ चकित छी। भाषणमंडप विद्यार्थीसभसँ भरल छल। हमरा स्वागत करबाक लेल एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक प्राचर्य सहित कालेजक अनेक गण-मान्य प्राध्यापकलोकनि उपस्थित छलाह।फूल माला,पाग,आ शाल दए हमरा दुनूगोटेक स्वागत कएल गेल।तकर बाद परिचर्चा प्रारंभ भेल। परिचर्चाक विषय छल-“समाजमे बूढ़क स्थिति आ तकर समाधान।”हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी आ ठेहापरक मौलायल गाछ एहि विषयसँ संवंधित अछि। एहि विषयपर हम कैकटा आलेखो लिखने छी। संभवतः तेँ अविचलजी एहि विषयपर हमर विचार सुनए चाहैत छलाह।

कार्यक्रमक संचालन अविचलजी स्वयं कए रहल छलाह।अविचलजी एहि कालेजक बहुत दिन धरि प्रभारी प्राचार्य रहि चुकल छथि।संप्रति मैथिली विभागाध्यक्ष छथि।ईहो सुनबामे आएल जे किछु मासक बाद ओ फेर एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक प्राचार्य बनि जएताह। मंचपर तत्कालीन प्राचार्यक अतिरिक्त आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर रबीन्द्र कुमार चौधरीजी उपस्थित छलाह आ ओएह एहि कार्यक्रममे शुरूमे बजबो केलथि।अविचलजी आ प्राचार्यजी सेहो अपन विचार व्यक्त केलनि। हमरा तँ ओहि विषयेपर  बजबाक लेल बजाओल गेल छल। मुदा,काल्हि भेल छापमे हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर भेल चर्चाक छाप एतहु पड़बे कएल।आजुक परिचर्चाक विषयसँ हटि कल्हुके परिचर्चापर चर्चा होमए लागल।हम परिचर्चाक विषयसँ बेसी अपन उपरोक्त उपन्यासक बारेम बजैत रहि गेलहुँ। मुदा,अविचलजी तँ सधल वक्ता संग-संग उत्कृष्ट मंच संचालक छथि। ओ अपन व्यक्तित्वक गरिमा आ विद्वतासँ सभकेँ बहुत प्रभावित केलनि।हमरो उत्साहित करैत रहलाह। बादमे श्रोताक पाँतिमे बैसलि एकटा महिला प्राध्यापक द्रोणाचार्यक एकलव्यक प्रतिए कएल गेल अन्यायक चर्चा केलनि जे कनी बेसीए काल चलैत रहल। लगभग दू घंटा चलल ई कार्यक्रम बहुत सार्थक छल।कार्यक्रमक समाप्तिक बाद हमसभ अपन डेरा आपस आबि गेलहुँ।भोजनपरांत हमसभ फेर छाप कार्यक्रममे सामिल होएबाक लेल कार्यक्रम स्थालपर पहुँचि गेलहुँ।मुदा,हाल भरल छल। कतहु बैसबाक जगह नहि छल। हमसभ किछुकाल प्रतीक्षा केलहुँ।तकर बादे भीतर जा सकलहुँ।

समापन कार्यक्रम

कार्यक्रमक समाप्ति आयोजकलोकनि द्वारा ओहि आयोजनमे सामिल भेल समस्त लेखक,रचनाकार,कलाकारलोकनि सहित अनय सहभागीलोकनिकेँ उपहार दए कएल गेल। जिलाक वरिष्ठअधिकारीलोकनि एहिमे उपस्थित छलाह।उपहारमे खरसवाँ जिलाक प्रतीकचिन्ह छउ(मुखौटा)  सामिल छल। कार्यक्रम समाप्तिक बाद साँझमे सामने लागल सामियानामे विवेकानन्दक जीवनीपर आधारितनाट्य रुपांतरण  प्रसिद्ध कलाकार   द्वारा कएल गेल। हमहूँसभ ओहि कार्क्रमकेँ थोड़ेकाल देखलहुँ। विवेकानन्दक जीवनीकेँ बहुत नीक जकाँ प्रदर्शित वर्णित कएल जा रहल छल। एक्केटा कलाकार अनेक प्रकारक भाव भंगिमाक सृजन कए कार्यक्रमकेँ जीवंत आ रोचक बना देने छलाह। कार्यक्रम बहुत नीक लागि रहल छल। बीचमेसँ उठबाक मोन नहि भए रहल छल।तथापि,समयसँ डेरा पहुँचि जएबाक लेल हमसभ ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ। अविचलजी,  रबीन्द्र कुमार चौधरीजी पहिले पाँतिमे दहिना दिस बैसल रहथि। हुनकासभसँ अनुमति लैत हमसभ सामिआनासँ बाहर भेलहुँ आ  कारसँ अपन डेरा दिस बिदा  भए गेलहुँ।

आइ हमरासभकेँ जमशेदपुरसँ बिदा होएबाक छल।भोरे दस बजे हमरासभकेँ राँची धरि पहुँचएबाक लेल कार आबि गेल छल। हमरसभक मार्गदर्शक फोन केलथि-

“सर! अपनेक आज्ञा होइक आ अहाँसभकेँ कोनो असुविधा नहि होअए तँ हम एतहिसँ अपनेसँ बिदा ली।”

“अहाँ निश्चिन्त रहू।हमसभ चलि जाएब।”

हम हुनका ईहो पुछलिअनि जे अतिथिगृहकेँ हिसाब-किताब केना की हेतैक?ओ संबंधित अधिकारीसँ गप्प केलाक बाद कहलनि-

“अपनेसभ तँ राजकीय अतिथि छलिऐक ने।अहाँकेँ किछु नहि देबाक अछि।”

ई ने भेलैक बात।एहन स्वागत बहुत दुर्लभ।हमसभ बहुत आनन्दमे रही। एतेक पैघ साहित्यिक कार्यक्रममे हमर मैथिली उपन्यासपर चर्चा भेल से बहुत गर्वक बात तँ छलहे संगे एतेक नीक स्वागत,एतेक नीक व्यवस्था।ऊपरसँ अविचलजीक निरंतर व्यक्तिगत ध्यान राखब कोनो मामुली बात नहि छल।आर तँ आर,ओ अपना कालेजमे हमर विशेष कार्यक्रम सेहो करओलनि,सेहो ओतेक कम समयमे।रस्ताभरि अविचलजी आ हुनकर श्रीमतीजीक स्नेहपूर्ण व्यवहार मोन पड़ैत रहल  आ मोन पड़ैत रहलाह ओहिठामक कार्यक्रमक आयोजकलोकनि जे कार्यक्रमक सफलताक लेल कोनो कसरि नहि छोड़लनि।












शनिवार, 20 दिसंबर 2025

बाबाक दरबारमे

 

बाबाक दरबारमे

 

बहुत दिनसँ वाराणसी जएबाक मोन छल। असलमे  ओहिठाम बाबा विश्वनाथक मंदिरक आ आसपासक जगहक पुनुरोद्धारक समाचार देखि-सुनि मोनमे बहुत प्रसन्नता भेल छल।हम जखन इलाहाबाद(प्रयागराज) मे रहैत रही तखन एक बेर ओतए गेल रही।इलाहाबादसँ वाराणसी ट्रेनक यात्रामे हमर एकटा संगी सेहो रस्ते मे भेटि गेल रहथि।ओ वाराणसी लग अपन पैतृक गाम जाइत रहथि।हमरा संगे हमर श्रीमतीजी आ हमर पुत्र भास्कर रहथि।ओ ट्रेन इलाहाबादक रामबाग टीसनसँ खुजल रहैक आ वाराणसी धरि गेलैक।रस्तामे सभ टीसनपर रुकैत गेलैक।हमसभ आपसमे गप करैत रहलहुँ।ट्रेन वाराणसी पहुँचलाक बाद हमर संगी  अपन गाम चलि गेलाह।हमसभ टीसने लग एकटा आटो रिक्सा केलहुँ। ओ आटोरिक्सा हमरासभक संगे भरि दिन रहल,यथासंभव सौंसे घुमओलक आ ओही दिन साँझमे हमसभ वापस इलाहाबाद आबि गेलहुँ।वाराणसीमे काशी विश्वनाथ मंदिरमे बाबाक दर्शन बहुत नीकसँ भेल रहए,कारण ओहि समयमे स्वर्गीय आर०के० मिश्र(आइएएस) (स्वर्गीय जयकान्त मिश्रजीक भाइ) ,ओ हमरासभक दर्शनक लेल ओरिआन कए देने रहथि। जयकान्त बाबू हमरा लेल हुनका फोन कए देने रहथिन। मंदिरे मे ओ पलथा मारि कए बैसल रहथि। हमरा देखितहि ओ बहुत प्रसन्न भेलथि  एकटा पंडाकेँ हमरासभक संग लगा देलथि।तकर बाद हमसभ बहुत नीकसँ महादेवक दर्शन केलहुँ।दर्शन काल पंडासभकेँ बड़का-बड़का परातमे भोजन सामग्री बाबाकेँ प्रसाद चढ़बैत देखेने रहियनि।हमरा भूख लागि गेल रहए। स्वादिष्ट भोजन सामग्रीसभ देखि मुँहमे पानि आबि गेल रहए।बाबाक दर्शनक बाद सोझे होटल गेल रही,भरि पेट भोजन केने रही। तकर बादे हमसभ घुमबाक लेल आगू बढ़ल रही।मोन पड़ैत अछि जे मंदिरक आसपास केहन गलींज छल, पैदलो चलब मोसकिल।बाबा मंदिरसँ गंगा घाटक बीच आएब-जाएब बहुत मोसकिल छल। आब जखन सुनलिऐक जे बाबा मंदिर परिसरक आ आसपासक क्षेत्रक नक्सा बदलि गेल अछि,गंगा स्नानक बाद सोझे मंदिरमे बाबाकेँ जल चढ़ाउ,कतहु कोनो अवरोध नहि,तँ हमरोसभकेँ  ओतए एक बेर फेर जएबाक इच्छा होएब स्वाभाविक छल।मुदा एकर कार्यान्वयनमे किछु विलंब भेल।कारण नवका कारीडोर बनलाक बाद वाराणसी गेनिहार लोकसभक मेला लागल रहैत छल। ओहिठाम रहबाक,घुमबाक व्यवस्था करब कठिन बुझा रहल छल।

अचानक एक दिन वाराणसी स्थित केन्द्र सरकारक होलीडे होममे पाँच दिन रहबाक लेल जगह भेटि गेल। आब की छल।हम तुरंत हुनका हाक देलिअनि-

“हेयै! कहाँ छी?”  

ओ आबि गेलथि।हम हुनका वाराणसीमे रहबाक जोगार होएबाक जनतब देलिअनि।ओहो बहुत प्रसन्न भेलथि।हम सभ तुरंत रेल टिकटक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।भेल जे जखन वाराणसी जाए रहल छी तँ इलाहाबादो घुमिते आएब।हमर अभिन्न मित्र श्री संजीव सिन्हाजीसँ भेँट-घाँट भए जाएत।ओ बहुत दिनसँ इलाहाबाद अएबाक लेल आग्रह कए रहल छलाह।संगे हमरो इलाहाबाद घुमबाक इच्छा छलहे।कारण हम जनबरी ‍१९७८सँ मार्च ‍१९८७ धरि नओ साल ओहिठाम रहल छी। ओतए पहुँचिते हमरा अपन जगहपर पहुँचि जएबाक आनन्द होइत अछि।अस्तु,ओतहु रहबाक लेल सरकारी अतिथि गृहमे रहबाक जोगारमे लागि गेलहुँ जे संयोगसँ संभव भए गेल। ओना सिन्हा साहेबक बहुत जोर छलनि जे हम हुनके ओहिठाम रही।मुदा सिभिल लाइन्स स्थित अतिथिगृह आ जार्ज टाउन स्थित हुनकर घरमे बेसी दुरी नहि अछि,से सभ कहला-सुनलापर ओ मानि गेलाह।हमसभ वापसी रेल टिकट इलाहाबादसँ बना लेलहुँ।आब की छल?बस ओहि दिनक प्रतीक्षामे लागि गेलहुँ।

२५ अगस्त २०२५क हमरासभकेँ वाराणसी यात्राक लेल प्रस्थान करबाक छल।हमसभ तैयारी कए रहल छलहुँ। हमर पौत्र हमर श्रीमतीजीकेँ तैयारी करैत  देखि दुखी भए गेल। ओकरा बुझा गेलैक जे हमसभ  कतहु जा रहल छी।ओ हुनका कहैत छनि-

“अहाँ एना नीक नहि लागि रहल छी।अहाँ जहिना रहैत छी,तहिना रहू।” ओ बहुत उदास छल। हमसभ जखन घरसँ बाहर होइत रही तखन सभ केओ बिदा करबाक लेल आएल छल,मुदा ओ नहि आएल। ओ असलमे बहुत दुखी छल। ओकरा दाइसँ फराक होएब नीक नहि लागि रहल छलैक।असलमे दाइसँ ओकरा बहुत लगाओ छैक।इसकुलसँ वापस भेलाक बाद ओ बेसी काल दाइए लग रहैत अछि। हमरोसभकेँ नीक तँ नहिए लागि रहल छल। मुदा जएबाक तँ छलहे।अस्तु,अछताइत-पछताइत हमसभ टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। हमर पोती जरूर हमरासभकेँ नीकसँ बिदा केलक। बड़ी काल धरि बाइ-बाइ करैत रहल।

हमरासभकेँ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेसमे एसीटूमे एक आ तीन नंबरक नीचाँक शायिका आरक्षित छल।ई दुनू शायिका बाहरी द्वारिसँ सटले छल।ओ निरंतर खुजैत रहैत छल।लोक अबैत-जाइत रहैत छल।हमरासभ लग दूटा बाकसमे भरल सामानसभ छल।तकर चिंता होइत रहैत छल।अस्तु,हम तँ राति भरि जगले रहि गेलहुँ।भोरे सात बजे करीब हमसभ वाराणसी टीसनपर पहुँचि गेल रही। हमरासभक स्वागत लेल माधवजी(परिवर्तित नाम)  आएल रहथि। ट्रेनसँ उतरितहि प्लेटफार्मेपर ओ भेटि गेलथि।प्रथमदृष्टिए माधवजी बहुत आकर्षक आ रमणीय व्यक्तित्वक लोक बुझेलाह।ओहो केन्द्रीय सचिवालय सेवामे रहथि।हमर कैकटा संगी हुनकर परिचित,मित्र छथिन।ओ मूलतः वाराणसीएक वासी छथि,जीवन भरि एही सहरमे रहल छथि।वाराणसीक माटि-पानिसँ बहुत प्रेम छनि,से एहि हद धरि छनि जे ओ अपन दिल्लीक नौकरी एही लेल छोड़ि देलनि। से सुनबामे कनी विचित्र तँ लगैत छैक कारण आजुक अर्थयुगमे लोक एना करत से नहि सोचल जा सकैत अछि,मुदा ओ से केने छथि आ एहि मानेमे एकटा अपना तरहक उदाहरण छथि।अत्यन्त साधारण भेषमे अपन सरल सहज व्यवहारसँ ओ अपना दिस लोककेँ आकर्षित करैत छथि।हम बड़ी काल धरि हुनका बारेमे सोचैत रहि गेलहुँ। हुनकासँ बहुत किछु जानकारी भेटैत रहल।हुनको बारेमे आ सहरोक बारेमे।मुदा ओ नौकरी किएक छोड़ि देलनि,से हम नीकसँ नहि बुझि सकलहुँ ,सेहो तखन जखन कि ओ ओकर बाद फेर कोनो नौकरी नहि कए सकलथि(हमरा जनतबे)।प्रत्येक मनुष्य स्वयंमे अद्भुत होइत अछि,रहस्य अछि।हम कनी काल सएहसभ सोचैत रहलहुँ।टैक्सी आगू बढ़ैत रहल। सहर अपने सभठाम जकाँ।कतहु नव,कतहु पुरान तरीकाक घरसभ देखाइत छल। भोरक समय छलैक।दूबगली दोकानसभ खुजि रहल छलैक। रस्ताक कातमे चाहक दोकानसभसँ धुआँ उठि रहल छल।ठाम-ठाम लोकसभ चाह बनबाक प्रतीक्षा कए रहल छल।हाथमे अखबार आ तरकारीक झोरा सेहो किछु गोटे रखने रहथि।

 माधवजीक संगे  रहलासँ हमरासभक चिंता आब खतम छल।केना जाएब,कतए घुमब,की-की देखब सभ किछु हुनका ऊपर।हुनका संगे टैक्सीसँ हमसभ घंटा भरिक बाद केन्द्र सरकारक होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।होलीडे होमेमे हमरसभक कोठरी दस बजेक बाद उपलब्ध होएत,से बात स्वागती कहलनि।हमसभ ताबत स्वागत कक्षेमे बैसि चाह-पान केलहुँ।तखनहि श्रीमतीजीसँ विमर्शक बाद आजुक घुमबाक कार्यक्रम सेहो तय केलहुँ।आइ मंगल दिन छल।हमसभ उपास केने छलहुँ।तेँ दिनमे भोजनक चिंता नहि छल। आइ हमसभ हनुमानजीक दर्शन करब।तकर बाद लगपासक चीज-वस्तु देखबाक प्रयास करब।मंगल दिन प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिरमे हनुमानजीक दर्शन करब महत्वपूर्ण छल,कारण आइ मंगल दिन रहबाक कारण सहर आ बाहरोसँ बहुत भक्तसभ ओतए अबैत छथि।हमसभ  अतिथिगृहमे  आश्वस्त भए गेलाक बाद करीब तीन बजे टैक्सीसँ संकटमोचन मंदिर लेल बिदा भेलहुँ। करीब आधा घंटामे हमसभ ओहिठाम पहुँचलहुँ।

संकटमोचन मंदिर वाराणसी

संकटमोचन मंदिर वाराणसीक अति प्राचीन मंदिर अछि।एकर स्थापना तुलसीदासजी स्वयं केने रहथि। एहि मन्दिरक पुनर्निर्माण 1900 ईस्वीमे स्वर्गीय मदन मोहन मालवीयजी द्वारा कराओल गेल। ओएह एहि मंदिरकेँ  “संकट मोचन हनुमान मन्दिर वाराणसी” क नामसँ प्रतिष्ठित केलथि।

कहबी छैक जे जखन तुलसीदासजी ओहिठाम रामकथा कहैत रहथि तँ एक दिन एकटा प्रेत देखेलनि। ओहो हुनकर रामकथा सुनैत छल। तुलसीदासजी हुनका आग्रह केलखिन जे ओ हनुमानजीक पता बताबथि जाहिसँ हुनकर दर्शन भए सकनि।ओ प्रेत कहलखिन-

“हनुमानजी तँ नित्य अहाँक कथामे उपस्थित रहैत  छथि। ओ एकटा कोढ़ीक भेषमे सभसँ पहिने अबैत छथि,पाछू बैसल रहैत छथि आ कथा समाप्त भेलाक बाद सभसँ पाछू जाइत छथि।”

प्रेतक देल हुलिआक अनुसार तुलसीदासजी हनुमानजीकेँ कोढ़ीक भेषमे चिन्हि लेलखिन आ हुनकर पैरपर खसि पड़लखिन।हनुमानजीकेँ ओ भगवान रामसँ दर्शनक रस्ता बतेबाक प्रार्थना केलखिन।हनुमानजी हुनका कहलखिन-

“अहाँ चित्रकुट चलि जाउ।ओतहि अहाँकेँ भगवान राम भेटताह।”

तकर बाद तुलसीदासजीकेँ चित्रकुटमे भगवान रामक दर्शन भेल रहनि। कहबाक तात्पर्य जे ओ स्थान बहुत सिद्ध आ प्रसिद्ध  अछि। तुलसीदासजी ओतए माटिक हनुमानजी मूर्तिक स्थापना केने रहथि। ओएह मूर्ति अखनहु ओहि मंदिरमे स्थापित अछि।हनुमानजीक हृदयक ठीक सामनेमे भगवान रामक पैर देखाइत अछि।शनि आ मंगल दिन कए ओहिठाम भक्त लोकनिक बहुत भीड़ रहैत अछि।मंदिरे परिसरमे प्रसादक कैकटा दोकान अछि जाहिठामसँ घीमे बनल लड्डू आ आन मिठाइसभ प्रसादक लेल उपलब्ध रहैत अछि।मंदिर परिसरमे  प्राचीन इनार अछि।कहल जाइत अछि जे तुलसीदासजीक समयसँ ई इनार ओहिठाम अछि।भक्त लोकनि ओहि इनारक पानि पिबैत छथि।

यद्यपि आइ मंगल दिन छल,मुदा मंदिर परिसरमे अपेक्षाकृत बेसी लोक नहि देखेलथि।हमसभ बहुत सुविधासँ हनुमानजीक दर्शन कए सकलहुँ।हनुमानजीक दर्शनक बाद माधवजी  हमरासभकेँ वाराणसीक प्रसिद्ध पहलमान लस्सी पियाबए लए गेलाह।

पहलमान लस्सी

वाराणसी सहरक लंका चौकक पास सन् ‍१९५०मे पन्ना सरदारजी द्वारा पहलवान लस्सीक स्थापना कएल गेल छल। एहि लस्सीक विशेषता ई अछि जे ई हाथेसँ बनाएल जाइत अछि आ शुरूए सँ माटिक कुल्हरमे परसल जाइत अछि।पहलवान लस्सी पीबाक लेल भोरे सँ लोकक पाँति लागि जाइत छल। सालक-साल एकर प्रसिद्धि बनल रहल। किछु महिना पहिने ओहिठामक आसपास सभटा दोकानसभकेँ सड़क बनेबाक लेल ढाहि देल गेल। तकर बाद पहलवानक लस्सी कनीके फटकी दोसर ठाम चलि गेल। हमसभ तकैत-तकैत ओहिठाम पहुँचलहु।कनीक प्रयासक बाद  दोकान भेटि गेलाक बाद हमसभ बहुत प्रसन्न रही। चारिटा लस्सी बनेबाक लेल कहलिऐक।थोड़बे कालमे लस्सी तैयार छल। हम तीनूगोटे ओहीठाम बेंचपर बैसि लस्सी पिलहुँ। लस्सीक उपरसँ बेस मोट छाल्ही छल। पहलवान लस्सी जेहने देखबामे रमनगर छल तेहने एकर स्वाद छल।हमसभ लस्सी पिबि सचमुचमे बहुत आनन्दित भेलहुँ। एकटा लस्सी वाहन चालकक लेल सेहो लेने गेलहुँ। एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न बुझेलाह। लस्सी पिलाक बाद हमरासभमे नवस्फूर्ति आबि गेल छल।आब हमसभ वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर दिस बिदा भए गेलहुँ।

वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर

बीसवीं शताब्दीक आरम्भक समय भारतक आत्मा स्वतंत्रता आ सांस्कृतिक पुनर्जागरणक लेल आतुर  छल। पश्चिमी शिक्षा प्रणाली भारतक नवयुवककेँ ज्ञान तँ दैत छल, मुदा ओ भारतीय मूल्य आ परंपराक आत्मासँ बहुत फटकी कए दैत छल। एहि परिस्थिति मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपन अदम्य संकल्पसँ एकटा एहन विश्वविद्यालयक स्वप्न देखलाह जे भारतीय संस्कृति, धर्म, आ परंपराक गौरवकेँ आधुनिक विज्ञान आ शिक्षा संग जोड़ि सकए। एहि स्वप्नक साकार करबाक लेल मालवीयजीकेँ डॉ. एनी बेसेंट, महाराजा रामेश्वर सिंह, (दरभंगा), महाराजा प्रभु नारायण सिंह (काशी) आ अन्य गणमान्य लोकनिक सहयोग भेटलनि। सन् ‍१९१५ ई०मे  ब्रिटिश संसदमे पारित बीएचयू कानूनक आधार पर ४ फरवरी ‍१९१६ केँ वाराणसीक पवित्र भूमिपर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापना भेल।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)  एशियाक सबसँ पैघ आवासीय विश्वविद्यालय मानल जाएत अछि आ वाराणसीमे ‍१३०० एकड़ मे मुख्य परिसर स्थित अछि, जखन कि मिर्जापुर जिलामे दक्षिण परिसर २७०० एकड़मे पसरल अछि। विश्वविद्यालय मे१४ संस्थान, 14 संकाय आ ‍१४० सँ बेसी विभाग अछि, जतए करीब तीस हजार छात्र अध्ययन  करैत छथि। ई विश्वविद्यालय भारत सरकारक “प्रतिष्ठित संस्थान(Institute of Eminence) " मे चयनित अछि आ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेहो प्रसिद्ध अछि। सर सुंदरलाल अस्पताल, भारत कला भवन संग्रहालय, विशाल खेल मैदान आ सांस्कृतिक केंद्र विश्वविद्यालयक विशेष पहिचान अछि। एहिठाम एक्के परिसरमे 3५० सँ बेसी स्नातक, स्नातकोत्तर आ शोध पाठ्यक्रम उपलब्ध अछि । संक्षेपमे, बीएहयू शिक्षा, संस्कृति, शोध आ सामाजिक एकताक अद्वितीय प्रतीक अछि।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक परिसरमे अवस्थित नव काशी विश्वनाथ मंदिर आधुनिक स्थापत्यक अद्भुत चमत्कार आ धार्मिक आस्थाक उज्ज्वल प्रतीक अछि। पंडित मदन मोहन मालवीयक संकल्पसँ ई मंदिर बिरला परिवारक सहयोग सँ ‍१९३१ मे शिलान्यास पाबि ‍१९६६ मे पूर्ण रूप सँ तैयार भेल। करीब २५० फीट ऊँच शिखर आ देबालसभ पर अंकित गीता आ शास्त्रक श्लोक एहि मंदिरक वैभवकेँ बहुत आकर्षक बनओने अछि। शिवक प्रधान स्वरूपक संग नओ अन्य देवालयक उपस्थिति एहि स्थानकेँ बहुआयामी आध्यात्मिक केन्द्र बनबैत अछि। विश्वविद्यालयक छात्र आ आगंतुक लेल ई मंदिर केवल पूजास्थल नहि, अपितु ध्यान, शांति आ सांस्कृतिक चेतनाक आलोकक स्रोत अछि, जतए धर्म, कर्म, अर्थ आ मोक्षक मूल्य संगे-संग प्रतिध्वनित होइत अछि। संक्षेपमे, ई मंदिर विश्वविद्यालयक आत्माकेँ धार्मिक आ सांस्कृतिक रूपमे आलोकित करैत भारतक सनातन परंपराक गौरवक जीवंत प्रतीक बनि गेल अछि।

एहन अद्भुत स्थान देखबाक जिज्ञासा ककरा नहि होएत?अस्तु,हमसभ बहुत उत्सुकतासँ टैक्सीसँ आब बीएचयू परिसर दिस बढ़ि रहल छलहुँ। माधवजी हमरा लोकनिकेँ विश्वविद्यालयक विभिन्न संकायक बारेमे बतबैत रहलाह।थोड़बे कालमे हमसभ विश्वविद्यालय स्थित काशी विश्वनाथ मंदिरमे पहुँचि गेलहुँ।हमसभ बहुत चैनसँ मंदिरमे भगवान शिवक दर्शन केलहुँ,चारूकात घुमलहुँ। ओतहि किछु काल विश्रामो केलहुँ  तकर बाद बाहर भए गेलहुँ।माधवजीकेँ ओहिठामक समोसा खेबाक इच्छा रहनि। ओ जखन कखनहु एमहर अबैत छथि तखन ओहिठामक प्रसिद्ध समोसा जरुर खाइत छथि। हमरोसभकेँ आग्रह केलथि। मुदा हमसभ तँ मंगलक उपास केने रही। अस्तु, ओ असगरे समोसा खेबाक लेल गेलाह।ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल हुनकर प्रतीक्षा करैत रहलहुँ।

तुलसी मानस मंदिर

माधवजी जाबे समोसा खेलनि,ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल सुस्ताइत रहलहुँ। हमसभ उपास केने रही आ भोरेसँ किछु-ने-किछु व्यस्तता रहबे कएल।टीसनसँ होलीडे होम पहुँचलाक बादो  कोठरी भेटबामे बड़ी काल लागि गेल।फेर हमसभ कोठरीमे सामानसभ रखलहुँ। कनीकाल विश्राम केलहुँ आ बिना किछु खेने-पीने मंदिर लेल बिदा भए गेलहुँ। आब वापसीमे बहुत थाकि गेल रही। कतहु जएबाक मोन नहि छल।तथापि,जखन टैक्सी तुलसी मानस मंदिर लग पहुँचल तँ मोन भेल जे देखिए ली। तुलसी मानस मंदिर ओएह स्थान थिक जाहिठाम तुलसीदास अपन रामायणक रचना केने छलाह। बादमे सन् ‍१९६४मे बंगालक हावराक ठाकुरदास सुरेका परिवार द्वारा एहिठाम मंदिर बनाओल गेल। मंदिरक देबालपर संपूर्ण तुलसी रामायण चित्र सहित उकेरल गेल अछि। एतए एकटा संग्रहालय सेहो अछि जाहिमे अनेक वहुमूल्य पाण्डुलिपि आ कलाकृति राखल गेल अछि।हमसभ एहि मंदिरमे दर्शनक बाद चारूकात घुमलहुँ।  किछु काल विश्रामक बाद वापसी यात्राक लेल टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। कनीके आगू वाराणसीक प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर आएल,मुदा हमसभ ततेक थाकि गेल रही जे एहिठाम कोनो आन दिन दर्शन करबाक विचार कएल। लगभग आधा घंटाक बाद थाकल-झमारल हमसभ होलीडे होम स्थित अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ।माधवजी पहिने उतरि गेल रहथि। टैक्सीबलाकेँ काल्हि फेर भोरे नओ बजे अएबाक आग्रह कए हमसभ विश्राम लेल अपन कोठरीमे चलि गेलहुँ।

होलीडे होमक अपन कोठरीमे पहुँचि हम मोबाइल फोन चार्ज करए चाहलहुँ,मुदा चार्जर प्वाइंटमे जएबे नहि करैक। ओतहिसँ टीभीक सेहो चलेबाक छल। ओहो नहि चलैत छल। अगल-बगलक कैकटा प्वाइंटसभमे इएह समस्या छल।आखिर हम फोन कए ओहिठामक केयरटेकर पाण्डेयजीकेँ बजेलिअनि। ओ कहलाह जे ई समस्या सौंसे मकानमे छैक। ओ बिजलीक प्लगमे पेन घुसा देलखिन, तकर बाद ओहिमे मोबाइलक चार्जर लगा देलथि। एही तरीकासँ टीभी सेहो चलि गेल। हमसभ जखन बादमे भीआइपी कोठरीमे गेलहुँ तखनहु ई समस्या रहबे कएल । वाराणसीक होलीडे होम नबे बनल अछि। ताहिमे एहन दिक्कति नहि होएबाक चाहैत छल। मुदा ई समस्या ओतए अछि। अफसोचक बात ई अछि जे एहि समस्यापर ओतुका व्यवस्थापक लोकनिक ध्यान किएक नहि जाइत छनि।ओना ई होलीडेहोम बहुत नीक अछि आ एहिठाम बहुत मोसकिलसँ कोठरी भेटैत छैक। तेँ हमरा जखने कोठरीक आरक्षण भए गेल तँ हम तुरंत ओही हिसाबसँ रेलक टिकट बनबा लेने रही। हमसभ कुल पाँचदिन ओहिठाम रहलहुँ।भोजन,जलखै आ चाहक  कम दाममे नीक व्यवस्था छल।संयोगसँ एकटा बहुत नीक टैक्सीबला लोक भेटि गेल छल जाहिसँ हमरा लोकनिक वाराणसी भ्रमण करबामे बहुत आराम रहल।

होलीडे होम वाराणसी टीसनसँ लगभग नओ कीलोमीटरपर अवस्थित अछि। ओहिठामसँ प्रेमचंदक गाम,लमही सटले अछि।मुदा सहरक प्रमुख मंदिरसभ ओहिठामसँ फटकी पड़ैत अछि। होलीडेहोमक परिसर बेस पैघ अछि।ओकर एकदिस विभिन्न प्रकारक सरकारी कर्मचारी,अधिकारी लोकनिक लेल आवास बनल अछि।बीचमे एकटा छोटसन मंदिरो अछि जाहिमे स्थानीय लोकसभ पूजा-पाठ करैत छथि।होलीडेहोमक सामनेमे  बड़ीटा मैदान अछि जकर चारूकात  घुमनाइ मोसकिल छल।बहुत रास लोकसभ प्रातःभ्रमण करैत देखा जाइत छलाह।ओना होलीडेहोममे ठहरल यात्री लोकनि भीतरेमे चक्कर लगबैत देखेलाह।हमहूँ बेसी काल सएह करी,कारण बाहर बहुत रास कुकुरसभ घुमैत रहैत छल । होलीडेहोमक चारूकात खाली जगहमे अनेक प्रकारक बृक्षसभ रोपल गेल अछि।केकटा रुद्राक्षक गाछ सेहो रोपल देखाएल।गाछक जड़ि लग बृक्षारोपन केनिहार व्यक्तिक नाम लिखल छल।

वाराणसीमे आइ हमरा लोकनिक दोसर दिन छल। नियत समयपर ठीक नओ बजे हमसभ तैयार भए गेल रही।तखनहि टैक्सीबला आबि गेल।हमसभ आइ बाबा विश्वनाथक दर्शन करब।माधवजी बीचमे कतहु भेटि जेताह।ओ अपन ठेकान नीकसँ टैक्सीबलाकेँ बता देने रहथिन। करीब दस मिनट चललाक बाद ओ स्थान आबि गेल। हम फटकीए सँ माधवजीकेँ कातमे ठाढ़ भेल देखि लेलिअनि। टैक्सीबलाकेँ सेहो  कनीको परेसानी नहि भेलैक। ओ टैक्सी कात लगा कए ठाढ़ केलक आ माधवजी आगूमे बैसि गेलाह।रस्तामे कैकटा प्रमुख स्थानसभ अबैत छल। तकर जनतब माधवजी दैत रहलथि। दस मिनट आर चललाक बाद हमसभ अपन गंतव्यपर पहुँचि गेल छलहुँ। मंदिरसँ फटकीए टैक्सी रोकि देल गेल।तकर बाद हमसभ एकटा एक्का ठीक केलहुँ। एक्का दू गोटेक सहयोगसँ चलैत छल।एकगोटे उपर बैसल छल आ दोसर बेर-कुबेर ओकरा पाछूसँ ठेलैत छल। ऊपर दिस चढ़ान रहैक। बीचमे पुलिस सेहो ठाढ़ रहए। ओकरा माधवजी किछु कहलखिन तखनहि एक्का आगू बढ़ि सकल,अन्यथा ओ ओतहि हमरासभकेँ उतारि दैत।एक्का संगे दौड़ि रहल दोसर व्यक्ति बहुत कम बयसक छल। ओ रहि-रहि कए मधुर स्वरमे एकटा गीत गबैत रहैत छल जे हमरा बहुत नीक लागल।गीतक अर्थ छल-

“जखन टाकाक महत्व बेसी हेतैक तखन आर की हेतैक?भाए-भाएक खून करतैक।”

हम ओकर गीतक भाव बूझि चकित छलहुँ ।ओ बच्चा बेर-बेर ओहि गीतकेँ दोहरबैत रहल। अंतमे,हम ओकरा बीस  टाका इनाम देलिऐक।एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न भेल छल।

“शुक्रिया साहेब। फेर आएब।हमरा जरूर कहब।हमर मोबाइल नंबर लिखि लिअ।”

आब मंदिर सामने देखा रहल छल। हमसभ एक्कासँ उतरि गेलहुँ। कनीके फटकी मंदिरक सेवाकेन्द्र छल। ओहिठाम हमसभ भीआइपी दर्शन लेल टिकट कीनलहूँ आ दुनू गोटे पैरे-पैरे मंदिर दिस बिदा भेलहुँ।माधवजीकेँ संगे नहि जाए देलकनि,ने कोनो पंडितजी संगे गेलाह।असलमे हमसभ यदि कनी आर टाका खर्च कए जलाभिषेकक टिकट लेने रहितहुँ तखन पंडितोजी संगे चलितथि आ भीतरमे जा कए शिवलिंगपर जलाभिषको कए सकितहुँ। मुदा हमसभ एहि विकल्पक बारेमे बादमे बूझि सकलहुँ जखन कि सूचनापट्टपर सभबात नीकसँ लिखल रहैक। मुदा हम से नहि पढ़ि सकलहुँ आ माधवजी जे जे कहैत रहलाह तेना-तेना करैत रहलहुँ।बादमे अफसोच होअए जे अपनो माथ किएक ने लगओलहुँ।

हमसभ लोकसभसँ पुछि-पुछि मंदिरक भीतर सही जगहपर पहुँचि गेलहुँ।एहि परिसरमे मोबाइल रखबाक बहुत नीक ओरिआन अछि। ओतहि हम अपन मोबाइल जमा करओलहुँ।कनीके हटि कए पूजाक लेल प्रसाद लेलहुँ आ दर्शनक लेल भीआइपी लाइनमे लागि गेलहुँ। बहुत जल्दीए हमसभ शिवलिंगक ठीक सामने पहुँचि गेल रही। ओतए देबालक पाछू शिवलिंग स्पष्ट देखा रहल छलथि। केओ-केओ जलाभिषेक कए रहल छलाह।पंडितजी हुनकासभकेँ मंत्रोच्चार कए पूजाक विधान संपन्न करबा रहल छलाह।हमहूँसभ बहुत नीकसँ भगवान शिवक आराधना केलहुँ आ आगू बढ़ि गेलहुँ।

बाबा विश्वनाथक दर्शनक बाद हमसभ कनीके आगू गेल छलहुँ कि एकटा पंडितजी हमरासभकेँ घेरि लेलनि। तरह-तरहसँ बुझबैत रहलाह जे की की केलासँ हमरासभक पुण्य अर्जित भए सकैत अछि। कनीके फटकी एकटा पंडितजीसँ सेहो भेंट करेलथि।ओहो किछु दक्षिणा लेलथि। फेर हमसभ सामनेमे  नन्दीक दर्शन केलहुँ जकर ठीक सामनेमे ज्ञानवापी परिसर अछि आ ओतहि कहाँदनि असली शिवलिंग भेटल छथि जाहिपर कानूनी विवाद चलिए रहल अछि।हमसभ पाँतिमे ज्ञानवापीक देबालपर बनल मूर्तिकेँ दर्शन केलहुँ आ मोनमे अपार क्षोभक संग वापस भए गेलहुँ। बाहर पंडितजी ठाढ़ छलाह।हुनको किछु टाका देलिअनि,मोबाइल छोड़ओलहुँ आ तय मार्गसँ वापस बाहर निकलि गेलहुँ। ओतएसँ कनीकाल पैदल चलि हमसभ फेर सेवाकेन्द्रपर पहुँचि गेल रही। ओहिठाम माधवजी रहबे करथि।टैक्सीबला सेहो कनीके फटकी आबि गेलथि।आब हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ।

मंदिर परिसरक व्यवस्था

मंदिर परिसरक सुरक्षा व्यवस्था बहुत चाक-चौबंद अछि।जहिना लोक एहि दुनिआमे खाली हाथ अबैत अछि आ ओहिना चलि जाइत अछि सएह हाल ओहि मंदिरक अछि।मंदिरमे प्रवेशसुरक्षा व्यवस्थामे लागल कैकटा सिपाहीसभ त्रिपुंड केने देखेलाह।ठाम-ठाम महिला पुलिस सेहो लागल छलीह। मंदिर परिसरमे प्रवेश करबासँ पूर्व सभ किछु बाहरे रखबा लेल जाइत अछि। एकटा समय छल  जे मंदिरमे जाएब मोसकिल होइत छल कारण चारूकात अबैध निर्माण भेल छल। अतिशय कठिन गलीसँ जिलेबी जकाँ घुमि-घुमि बाबाक मंदिरमे लोक पहुँचैत छल। आब जा कए देखिऔक।मंदिरक भीतर आ बाहरक संपूर्ण परिदृश्ये बदलि गेल अछि।मंदिरक चारूकात पर्याप्त खाली स्थान अछि।मंदिर परसरमे लोककेँ अएबाक आ जएबाक लेल स्पष्ट व्यवस्था अछि।गंगाक घाटसँ सोझे मंदिर धरि बिना कोनो व्यवधानकेँ लोक आबि-जा सकैत छथि।गंगामे नहाउ,गंगाजल लिअ आ आबि कए बाबापर चढ़ाउ।

माधवजीक संगे गलीक रस्तासँ हमहूँसभ गंगक कात धरि पहुँचि गेल रही।मुदा गंगाक पानि बहुत घोरल-घारल छल।ओहिमे स्नान करबाक माने छल घर पहुँचि दोबारा स्नान करब जरूरी अन्यथा जेहो स्वच्छ रही से खराप भए जाएत।गंगाक पानि रहबे करैक तेहने।तथापि,हमसभ घाटपर बहुत नीचाँ धरि गेलहुँ।गंगामाताकेँ प्रणाम केलहुँ आ वापस भए गेलहुँ।गंगास्नान नहि कए सकलहुँ।फेर ओही गलीक बाटे माधवजी हमरासभकेँ वापस सड़कपर अनलनि।बीचेमे एकटा लस्सीक दोकानपर हमसभ लस्सी पीबि फरहर भेलहुँ।मंदिरक लगीचे भंडाराक ओरिआन छलैक।माधवजी ओकर आनन्द लेबए चाहैत छलाह।मुदासभ ताहि लेल उत्साहित नहि रही। पहिने घुमि ली तकर बाद देखल जेतैक-से सोचि हमसभ टैक्सीसँ सारनाथ दिस बढ़ि गेलहुँ।

सारनाथ

वाराणसीसँ नओ किलोमीटर उत्तरपूब कोनमे अवस्थित सारनाथमे भगवान बुद्ध पहिल बेर अपन शिष्यसभकेँ उपदेश देने रहथि।लुम्बिनी,बोधगया,कुशीनगरक आ सारनाथ बुद्धक अनुयायी लोकनिक लेल बहुत पवित्र तीर्थ मानल जाइत अछि। करीब आधाघंटाक बाद हमसभ सारनाथ पहुँचल रही। टेक्सी बाहरे द्वारिक पास रूकि गेल। तकर बाद हमसभ पैरे-पैरे सारनाथक प्रमुख स्थानसभ देखलहुँ।शुरूऐमे हमरा सभकेँ एकटा गाइड पछोर केलनि। ओ कमे बएसके रहथि आ हुनका ओहिठामक बारेमे कोनो विशेष ज्ञान नहि रहनि।तथापि,हमसभ हुनका उत्साहित करबाक उद्येश्यसँ राखि लेलहुँ। हमरासभकेँ ओ की बतबितथि,उल्टे हमहीसभ हुनका समय-समयपर किछु-किछु बतबैत रहलहुँ।हमसभ बेरा-बेरी संग्रहालय, थाई मंदिर, तिब्बती मंदिर, देखलहुँ। ओहि बच्चा गाइडक बहुत जोर रहैक जे हमसभ निकटवर्ती हथकरघाक दोकानपर चली।संभवतः ओकरा किछु कमीशन भेटितैक।आखिर हमसभ ओहि दोकानपर गेबो केलहुँ,मुदा हमरासभकेँ ओहिठाम कीनबाक योग्य किछु पसिंद नहि भेल। बाहर निकललाक बाद बच्चासभक लेल जरूर किछु खेलौना कीनलहुँ। तकर बाद हमसभ वापसी यात्रामे प्रेमचंदक गाम लमही दिस बिदा भए गेलहुँ।

 

लमही

थोड़बे कालमे हमसभ प्रेमचंदक गाम लमहीक ग्रामद्वारिमे प्रवेश कए रहल छलहुँ। द्वारिक दुनू कातमे बरदक   चित्र बनल अछि। गाममे कोनो तेहन विशेषता नहि बुझाएल। आने गामसभ जकाँ कोठाक घरसभ। प्रेमचंदक पुस्तैनी घर लग पहुँचलाक बाद हमसभ टेक्सीसँ उतरि गेलहुँ। दहिना दिस प्रेमचंदक नामपर बनल(मुंशी प्रेमचंद शोध एवं अध्ययन केन्द्र-लमही छल। बामा दिस प्रेमचंदक इनार छल जे आब झाँपि देल गेल छल। प्रेमचंदक पुस्तैनी मकानक देबालक पलस्तरसभ झड़ि रहल छल। ओकरा आब संग्रहालय बना देल गेल अछि।ओहिमे प्रेमचंदसँ जुड़ल अनेक प्रकारक वस्तुसभ राखल गेल अछि। हुनकर किछु किताबक पाण्डुलिपि सेहो राखल बुझाएल।किछु पुरान पत्रिका सेहो राखल छल। ओहिठामसँ कनीके फटकी सरकार द्वारा नवनिर्मिति भवन अछि। सामनेमे  कार्यालय सेहो बनल अछि जे ओहि दिन बंद छल। आसपास घुमलाक बाद हमसभ प्रेमचंदक पुस्तैनी घरक सामने बनल बैसकीपर बैसलहुँ, थोड़काल रुकलहुँ,फोटो घिचओलहुँ।लगपासमे केओ एहन नहि देखेलाह जिनकासँ प्रेमचंदसँ जुड़ल कोनो बातपर किछु चर्चा कए सकितहुँ।माधवजी किछु-किछु कहैत रहलाह।स्थानीय होएबाक कारण हुनका ओहिठामक बहुत किछु बूझल रहनि।आब किछु करबाक नहि छल। आखिर हमसभ ओहिठामसँ  बिदा भए गेलहुँ।कनीके फटकी प्रेमचंदक पोखरि सेहो देखाएल।पोखरि आब काजक नहि रहि गेल अछि। एतेक पैघ साहित्यकारक स्मृतिसँ जुड़ल हुनकर पैतृक घर आ आसपासक वस्तुक स्थिति देखि मोनमे बहुत दुख भेल।हमसभ आब वापस अपन डेरा दिस बढ़ि गेलहुँ।कैंटीनमे फोन कए देलिऐक जे हमसभ भोजन ओतहि करब।माधवजी सेहो हमरासभक संगे रहथि।हमसभ भोजन केलहुँ आ विश्राम लेल अपन कोठरी चलि गेलहुँ।

दुर्गाकुंड मंदिर

आइ वाराणसीमे हमरसभक तेसर दिन छल।हमसभ सभसँ पहिने प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर गेलहुँ। असलमे पहिने दिन वापसी यात्रामे हमसभ एहि मंदिरक लगे सँ गेल रही।मुदा ओहिठाम पहुँचैत काल धरि बहुत थाकि गेल रही।साहस नहि भेल जे टेक्सीसँ उतरी।आइ सभसँ एहिने हमसभ एतहि पहुँचलहुँ।विलंबसँ अएबाक लेल मातासँ माफी मंगलहुँ। बहुत पवित्र स्थान अछि दुर्गाकुंड मंदिर।एकर स्थापना   अठारहम शताब्दीमे बंगालक महरानी भवानी करओने छलीह। कहल जाइत अछि जे एहिठाम माँ दुर्गा स्वयं प्रकट भेल रहथि। दुर्गा मन्दिरमे बाबा भैरवनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, हनुमानजी आ माता कालीक मन्दिरो सेहो अछि।मंदिरक सामने एकटा बहुत पैघ पोखरि अछि। पहिने ई कुंड गंगासँ जुड़ल छल। पोखरिक पानि बहुत निर्मल देखाएल।मंदिरमे भगवतीक दर्शन केलाक बाद आसपास घुमलहुँ,कनी काल मंदिर परिसरमे बैसलहुँ आ काशीनरेशक पैतृक महल देखबाक लेल बिदा भए गेलहुँ।

 

 

 

काशीनरेशक पैतृक महल(रामनगरक किला)

स्थानीय लोकमे एहन मान्यता अछि जे काशीक तीनटा राजा छथि। पहिल बाबा विश्वनाथ,दोसर काशी नरेश आ तेसर डोम राजा।काशी राज घरानाकेँ काशी एस्टेटक नामसँ जानल जाइत अछि। सन् ‍१७०० ई०मे स्वर्गीय मंसाराम एकर स्थापना केलनि।तखनसँ सन् ‍१९४७ धरि ई परंपरा चलैत रहल। सन् ‍१९४७मे स्वतंत्रताक बाद काशी नरेशकेँ महाराजा विभूति नारायण शिंह लिखवाक अनुमति देल गेल छल।सन् २००० ई० मे हुनकर मृत्युक बाद हुनकर पुत्र श्री अनन्त नारायण सिंह कुँवरक नामसँ जानल छथि। संप्रति ओएह ओहिठामक उत्तराधिकारी छथि। ओहिठामक राजपरिवारक स्थानीय जनतामे बहुत धाख छल।मुदा पारिवारिक कलहक कारण आब स्थिति बहुत बदलि गेल अछि।

हमसभ जखन रामनगर किलाक मुख्यद्वारिपर पहुँचलहुँ तखन ओकर मरम्मतिक काज चलि रहल छल। मुदा भीतर जएबाक अनुमति छल। अस्तु,हमसभ टिकट लए किलामे प्रवेश केलहुँ। महलक अधिकांश भागमे राज परिवारक पुरान वस्तुसभ प्रदर्शनीक लेल राखल अछि। तरह-तरहक पुरान मोटर,हथियार,वर्तन,राज-परिवारक सदस्य लोकनि द्वारा प्रयोग कएल गेल गृहस्थीक अन्य वस्तुसभ देखबामे आएल। ऊपरका महलमे सेहो थोड़ बहुत  राज-परिवारक स्मृतिशेष भेटल। मुदा कनीके आगू गेलाक बाद रस्ता बंद छल।हमसभ सीढ़ीसँ नीचाँ उतरि गेलहुँ। समयो आब समाप्त भए रहल छल। सुरक्षाप्रहरीसभ सीटी बजा-बजा कए लोकसभकेँ वापस जएबाक आग्रह कए रहल छल।हमहूँसभ जल्दी-जल्दी किछु फोटो घिचओलहुँ आ वापसी यात्राक लेल मुख्याद्वारिसँ बाहर निकलि गेलहुँ। बाहर समोसा,चाटक कैकटा दोकान छल। मुदा हमसभ वाराणसीक प्रसिद्ध चाटक दोकान दीना चाट भण्डारपर चाट खएबाक लेल आगू बढ़ि गेलहुँ। बहुत काल चललाक बाद ओहि चाटक दोकानपर पहुँचबो केलहुँ,मुदा ओ बंद छल। तकर बाद हमसभ काशी चाट भंडार ( जे बहुत प्रसिद्ध अछि) दिस बिदा भए गेलहुँ।साँझक समय  छल। रस्तामे भीड़ लागि रहल छल। टैक्सीबला चाहिओ कए बहुत तेजसँ टैक्सी नहि चला सकैत छल। आखिर जेना-तेना हमसभ ओहि चाटक दोकानपर पहुँचिए गेलहुँ। जल्दीसँ हमसभ चाटक दोकानपर  अपन पसिंदक चाटक आदेश देलिऐक। थोड़बे कालमे गरमा-गरम चाट आबि गेल। ओ सचमुचकेँ बहुत स्वादिष्ट छल।चाटक बाद गरमा-गरम गुलाब जामुन सेहो चललैक।हमसभ तकर बाद ओहिठामसँ निकलिए रहल छलहुँ कि बाहरमे कुल्फी देखाएल।सभगोटे कुल्फीक आनन्द सेहो लेलहुँ ।रस्तामे हमसभश्रीराम पान दोकानपर मीठका पान खेलहुँ।पान कि ओ तँ एक प्रकारक मधुरे छल।आब हमसभ बहुत आश्वस्त छलहुँ।रातिमे किछु खएबाक स्थितिमे नहि रही, तेँ फोनपर केंटीनमे भोजन नहि बनेबाक लेल कहि देलिऐक। आधा घंटाक बाद हमसभ होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।

वाराणसीमे  चारिम दिन

आइ वाराणसीमे हमर सभक चारिम दिन छल। मोटामोटी जे स्थानसभ देखि सकैत छलहुँ,से देखलहुँ।किछु स्थान गंगामे बाढ़िक कारण नहि देखल जा सकल। कतहु-कतहु बहुत पैदल चलबाक रहैत।ताहू ठाम नहि जा सकलहुँ। मुदा आइ की करब?टैक्सी आबि चुकल छल।माधवजी सेहो हमरासभक प्रतीक्षा कए रहल छलाह।आखिर बिदा भेलहुँ।सभसँ पहिने लगीचेमे स्थित हथगरघा म्युजियम पहुँचलहुँ। ओहिठाम हमर श्रीमतीजी पसिंदक सारीसभ कीनलनि। ओतए कैकटा दोकानमे हस्तनिर्मित सामानसभ विक्रय लेल उपलब्ध छल। से सभ देखैत सुनैत हम सभ घंटा भरिक बाद ओहिठामसँ निकलि कबीर पंथक मुख्यालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम जएबाक लेल बहुत काल पैरे चलए पड़ल।रस्तामे गाय-महीषसभक गोबर भरल छल।आखिर हमसभ कबीरस्थानमे प्रवेश केलहुँ। ओहिठाम कबीरदाससँ जुड़ल बहुत रास वस्तुसभ राखल देखाएल। अनेक स्तंभसभपर कबीरदासक उपदेशसभ लिखल देखाएल।सामनेमे एकटा महंथजी बैसल छलाह। ओहिठाम गेलाक बाद एकटा महिला हमरासभक स्वागत केलनि आ ओतए भीतरमे बैसबाक आग्रह केलनि।मुदा हमरा ओहिठाम किछु आकर्षक नहि बुझाएल।ओहिठाम सफाइक अभाव छल।संगे बाहरसँ गोबरक गंध आबि रहल छल।हमसभ जल्दीए उबि गेलहुँ।आखिर थोड़ेकाल एमहर-ओमहर घुमलाक बाद हमसभ बाहर निकलि गेलहुँ।

भारतमाता मंदिर

बाबू शिव प्रसाद गुप्ता द्वारा सन् ‍१९१८सँ ‍१९२४क बीच सात वर्षमे निर्मित  भारतमाता मंदिरक उद्घाटन महात्मा गांधी द्वारा पन्द्रह अकटूबर सन् ‍१९३६ कए  कएल गेल छल। ई वनारस रेलवे टीसनसँ डेढ़ किलोमीटर आ काशी विश्वनाथ मंदिरसँ छओ किलोमीटर दूरीपर अवस्थित अछि।भारत माता मंदिरमे कोनो देवी-देवताक नहि, अपितु अखंड भारतमाताक चित्र बनाओल गेल अछि। एहिसँ भारतक लोककेँ देश प्रेम आ राष्ट्रीय एकताक प्रेरणा भेटैत अछि। हमसभ एहि मंदिरमे पहुँचि बहुत आनन्दित भेलहुँ। कैक बेर चारू कात घुमलहुँ।

श्री शिवाय भोजनालय

साँझमे डेरा लौटबासँ पहिने हमसभ श्री शिवाय भोजनालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम भोजन करबाक योजना कए दिनसँ बनि रहल छल। हमसभ आइ तय केने रही जे वापसीमे ओतहि भोजन करबाक अछि।तेँ केंटीनमे  पहिनेसँ मना कए देने रहिऐक। हमसभ श्रीशिवा भोजनालयमे जखन गेलहुँ तँ ओ खालीए छल। असलमे हमसभ भोजनक समयसँ किछु पहिने पहुँचि गेल रही। तथापि,हमरासभकेँ नीकसँ स्वागत कएल गेल। देशक विभिन्न भागक प्रसिद्ध भोजनसभकेँ समायोजित करैत ओहिठामक थारी भोजन बहुत प्रसिद्ध अछि। अस्तु,हमसभ तीनूगोटे  ओहि भोजनक आनन्द लेलहुँ। बेरा-बेरी अलग-अलग प्रकारक भोजनसभ परसल जाइत छल।जे खाइ,जतेक खाइ। हमसभ कतेक खइतहुँ?यथासाध्य भोजन केलाक बाद हमसभ डेरा लेल बिदा भए गेलहुँ।

वापसी यात्रा

आइ हमर सभक वाराणसी यात्राक पाँचम दिन अछि।आइ किछु नहि करबाक अछि।हमरासभ आजुक दिन विश्रामक लेल रखने छी।हमरासभकेँ होलीडे होममे घरो बदलबाक अछि।एक दिनक लेल हमसभ भीआइपी कोठरीमे जा रहल छी ,कारण दोसर कोठरी उपलब्ध नहि छल। हमरासभ लग बहुत कम सामान अछि। कम सँ कम सामान लए यात्रापर जएबाक चाही।हमसभ सएह प्रयास केने रही। तथापि दूटा बाकस आर किछु सामानसभ रहबे करए।बेरा बेरी ओकरा हमसभ उठा-उठा कए नवका कोठरीमे लए गेलहुँ।हमसभ नवका कोठरीमे पहुँचि बेस खुस रही। बड़ीटा हाल,बेडरूम सेहो पैघ।संगमे आर तरहक सुविधासभ। आब की?थोड़े काल एसी खोलि कए आराम केलहुँ।अचानक ध्यान  आएल जे दाँत तँ छुटिए गेल। आहि रे बा!आब की करी?दाँत कतए रहि गेल?हमरा बेचेन देखि ओ कहलथि-

“किएक परेसान छी? अहाँ कोन दाँत लगबिते छी जे नहि रहलासँ बेचेन छी। यदि जरूरी बुझाएत तँ फेर बना लेब।”

हम की बजितहुँ?चुप रहि गेलहुँ। तकर बाद मोन भेल जे कनी पुरना कोठरीमे जा कए देखिऐक।पुरना कोठरी एक तल नीचाँ छल। ओहिठाम कनीके पहिने सफाइबलासभ काज केने छल। तथापि,सौंसे तकलहुँ।कतहु दाँत नहि देखाएल।ओ एकटा छोटसन डिब्बीमे राखल रहैत छल। एमहर-ओमहर सौंसे बौअएलहुँ। आखिर,वापस नवका कोठरीमे आबि गेलहुँ।टीभी देखबाक प्रयास केलहुँ।मुदा मोन नहि लागि रहल छल। फेर नीचाँ गेलहुँ। पुरना कोठरीक बगलमे कूड़ादान राखल छलैक।भेल जे देखिऐक।की पता एतहि दाँत राखि देल गेल होअए?कहबी छैक –

“मरता क्या नहीं करता।”

ओहि कूड़ादानमे हाथ देलहुँ।ऊपरसँ कनीके हटओलाक बाद ओ डिब्बी भेटि गेल। ओकर भीतरमे डिब्बीमे पानि आ पानिमे हमर दाँतसभ ओहिना देखा रहल छल। हम तुरंत ओहि डिब्बीकेँ बाहर केलहुँ। ओकरा नीकसँ अनेक बेर साबुनसँ साफ केलहुँ।फेर डिब्बी खोललहुँ।पानि हरा देलिऐक आ दाँतकेँ वारंबार साफ केलहुँ।आब दाँत ठीक बुझाएल। ओकरा लेने विजयी मुद्रामे कोठरी वापस पहुँचलहुँ।हमरा प्रसन्न देखि ओ बुझि गेलथि।

“भेटि गेल की?”

जबाबमे हम हँसि देलिअनि।

बेस कीमती दाँत भेटि गेलासँ हमसभ बहुत आश्वस्त रही।आइ किछु करबोक नहि रहए।कतहु जएबोक नहि रहए।ओतेकटा भीआइपी कोठरीमे दू गोटे ।दिन-भरिक विश्रामक बाद हमसभ कल्हुका यात्राक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।हमरासभकेँ वापसीमे विंध्याचल भगवतीकेँ दर्शन करैत प्रयागराज जएबाक छल। अस्तु,हमसभ ओही टैक्सीबलाकेँ ठीक केलहुँ।ओ हमरासभकेँ काल्हि  भोरे सात बजे प्रयागराज लए जेताह।हमसभ  ताही हिसाबसँ तैयारी केलहुँ।भोरे सात बजे टैक्सी आबि गेल छल।होलिडेहोमसँ काल्हिए फारकती भेटि गेल छल। हमसभ अपन सामानसभ टैक्सीमे रखलहुँ ,कोठरीक कुंजी स्वागतीकेँ दए देलिऐक आ टैक्सीमे आगूक यात्राक लेल बैसि गेलहुँ।

कनीकालक बाद एकटा नीक ढाबापर हमसभ चाह पीलहुँ।चाहक चुस्कीक संग हमसभ अपन वाराणसी यात्राक स्मरण करैत रहलहुँ।

“केहन रहल अपनसभक ई यात्रा?”

“अद्भुत। बहुत आनन्ददायी।”

“वाराणसीमे  की सभसँ नीक लागल?”

“ओना तँ बहुत रास नीक-नीक स्थानसभ देखलहुँ,मुदा बाबा विश्वनाथमंदिरक व्यवस्था बहुत प्रशंसनीय छल। बाबाक दर्शन बहुत बढ़िआँसँ भए सकल।”

आब चाह खतम छल।हमसभ फेर टैक्सीमे बैसि गेलहुँ , बिदा भए गेलहुँ ,,,।बहुत किछु देखलहुँ,बहुत किछु नहिओ देखि सकलहुँ।मुदा हमरसभक मोनपर कुलमिला कए एहि यात्राक बड़ नीक प्रभाव पड़ल।हमसभ बादोमे एहि यात्राक प्रसंगसभपर कैक दिन धरि आपसमे चर्चा करैत रहलहुँ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

‍१८।१२।२०२५