मंगलवार, 27 नवंबर 2018

प्रतिष्ठाक भूख


प्रतिष्ठाक भूख



हमरा लोक बुझए,जे नहि छी सेहो बुझए,समाजमे हमर मान्यता होअए,लोकक दृष्टिमे हम पैघलोकमे जानल-मानल जाइ ,ई सभ एहन भावना थिक जे मनुक्खमात्रकेँ परेसान केने रहैत हछि । जकरा आओर किछु नहिओ चाही,जेहो संत-महात्मा भए गेल छथि,विद्वान छथि किंवा उच्चपदासीन छथि ,सभ प्रतिष्ठा अर्जित करबाक हेतु आजन्म प्रयत्नशील रहैत छथि । ओना जँ देखिऐक तँ प्रतिष्ठा प्राप्त करबाक भावनामे किछु अधलाह नहि थिक । कतेको बेर लोक एही हेतु नीक काज करैत छथि । मुदा गड़बड़ तखन होइत अछि जखन  हमसभ प्रतिष्ठाक पाछा पड़ि जाइत छी । परिणामस्वरूप बहुतरास  अलट-विलट काज करैत छी । एहि कारणसँ निरंतर अशांत रहैत छी।

सकारात्मक प्रयास द्वारा लोक जीवनमे आगू बढ़थि आ प्रतिष्ठा अर्जित करथि,एहिसँ नीक बात की भए सकैत अछि । मुदा कतेकोबेर एहन होइत अछि जे व्यक्तिगत स्वार्थमे अंधभए लोक दोसरकेँ टांग घिचैत छथि जाहिसँ समाजमे अकारण तनाव बढ़ैत अछि आ कतेको बेर निर्दोष लोककेँ परेसानीक सामना करए पड़ैत अछि । बिना परिश्रमकेँ दोसरक हक छीनि कए समाजपर अपन प्रभुता स्थापित करबाक एकटा हवा बहि गेल अछि । एहि कारण नीक- बेजाएक भेद खतम भेल जा रहल अछि आ अवसरवादी ओ स्वार्थी लोकसभ तत्काल जीतैत लगैत अछि । एहि तरहेँ समाजक कोनो तरहे हितसाधन नहि होइत अछि । अपितु नीकलोक पाछा भए जाइत छथि जकर कुपरिणाम सभ देखि रहल छी ।

गाम-घरमे प्रतिष्ठाक लेल कतेको लोक की नहि कए लैत छथि । साधनसँ बेसी लंफ-लंफामे रहैत छथ जाहिसँ लोक  बूझए जे ओ पैघ ळोक छथि । मुदा देखाबटी पैघत्व कै दिन चलत? ओ किछुए दिन मे देखार भए जाइत छथि । बिआह,श्राद्ध,उपनायनमे लोक अगह-बिगह खर्च कए लैत छथि । गामक-गाम भोज करैत छथि जाहिसँ हुनकर यश पसरए ,लोक हुनका पैघ बुझनि । ताहि हेतु खेत-पथार सेहो बेचि लैत छथि । पूर्वमे कतेको परिवार एहिसभक चलते दरिद्र भए गेलाह ।

ई बात तँ तय अछि जे हमसभ जे किछु नीक-बेजाए करैत छी,जे किछु धन-संपत्ति बटोरैत छी  से सभ एहीठाम रहि जाइत अछि । तैँ बहुतोलोक  धन-संपत्ति  दान कए दैत छथि। जन कल्याणक काज करैत छथि मुदा ताहूक पाछा हुनकर यशलिप्सा रहैत अछि । बड़का संत-महात्मासभ सेहो यशलिप्सासँ मुक्त नहि भए पबैत छथि । ताहि हेतु तरह-तरहक यज्ञ-जाप करैत छथि,करबैत छथि,ठाम-ठाम मंदिर,धर्मशालाक निर्माण करबैत छथि । जाहि हेतु गाम-घर त्यागिकए सन्यास लए लेलाह तैयो मोन ओतहि भटकैत रहि जाइत छनि । अपन लोकवेद,अपन जन्मस्थानमे किछु एहन करबाक जिज्ञासा रहिए जाइत छनि जाहिसँ हुनका अपनालोकमे प्रतिष्ठा भेटए । सही मानेमे प्रतिष्ठाक भूखसँ जान छोड़ाएब बहुत मोसकिल काज अछि । 

प्रतिष्ठा मात्र छाँह थिक जकर अपन कोनो आस्तित्व नहि अछि । लोक छाँहक पाछा भागत तँ की ओ भेटतैक ? कदापि नहि? ओ तँ आओर फटकी होइत जेतैक। सएह हाल प्रतिष्ठाक अछि। जँ अपने प्रतिष्ठाकेँ केन्द्रविन्दुमे राखि कए जीब तँ सही मानेमे अहाँ मृगमारिचिकामे रहब । कहिओ जीवनक सत्यकेँ नहि बुझि सकबैक जे शक्ति प्रतिष्ठाक पाछा भगलामे नहि अछि । असल शक्ति तँ मनुक्खक अपने हाथमे अछि । ओ की अछि? ओ अछि अहाँक द्वारा कएल गेल कर्म । जँ अहाँ सही कर्म करैत गेलहुँ तँ प्रतिष्ठा के कहए की-की ने अहाँक पाछा- पाछा घुमैत रहत । अस्तु, जीवनमे कर्मक प्रधानता दए निरंतर  आगा चलैत रहू,देखिऔ ने चमत्कार भए जेतैक आ भइए कए रहतैक ।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

मनक शक्ति


मनक शक्ति



वैज्ञानिकसभ कहैत छथि जे मनुक्ख अपन दिमागक बहुत  लघुअंशक उपयोग कए पबैत अछि । ओकर अधिकांश मानसिक शक्ति व्यर्थ चलि जाइत छैक । हमर पूर्वज योग आ ध्यानद्वारा अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त केने छलाह । महाभारतक समयमे संजयकेँ दिव्यदृष्टि प्राप्त रहैक जाहिसँ ओ धृतराष्ट्र लग बैसले-बैसल कुरुक्षेत्रक दृष्यक वर्णन करैत रहल । भए सकैत अछि जे ओ किछु आइ-काल्हिक टेलीवीजनेक प्रारूप रहल हो किंवा ओकर आँखिएमे किछु एहन विशेष शक्ति भए गेल जे ओकरा लेल अदृष्य वस्तु सेहो दृष्य भए गेल । मंत्र द्वारा मोनक शक्तिकेँ कतेको गुना बढ़ा- घटा देबाक सामर्थ्यक चर्च हमसभ अपनसभक शास्त्र-पुराणमे सुनैत रहलहुँ अछि । आखिर मंत्र छैक की? सुनियोजित शव्दक शृंखला मात्र जकर अर्थ ओ ध्वनिसँ मनुक्खक मष्तिष्क प्रभावित भए जाइत अछि । ओना सामान्य जीवनमे हमसभ ई बात देखैत छी जे जँ अनट बात बजलहुँ वा बजा गेल तँ तुरंते सामनेक व्यक्ति तमसा जाएत आ भए सकैछ जे जानोपर बनि जाए । कहक माने जे शव्देक प्रभावसँ एहन प्रतिकृया भए गेल । मंत्र सएह काज करैत अछि,एहिमे कोनो सक नहि हेबाक छाही । अस्तु,मनक एकटा अपन अनंत संसार छैक जे हमरा अहाँकेँ कतए सँ कतए लए जेबाक सामर्थ्य रखैत अछि ।
देहक मजगूत होएब तखने कारगर भए सकैत अछि जखन ओकरा संगे मोनो मजगूत होइक ,नहि तँ एकसँ एक पहलमान सिपाही पातर -छितर अधिकारीक आदेशपर नचैत रहैत अछि । ओतेकटा हाथीकेँ नान्हिटा महावत नचौने रहैत अछि । ई बात अलावा छैक जे जँ हाथीकेँ माथा फेल भए जाइत अछि,तखन तँ ओ महावतकेँ चीड़ि-फारिकए राखि दैत अछि । ओहूमे ओकर मोनेक स्थिति असरदार भए जाइत अछि । सच पुछैत छी तँ आदमी-आदमीमे फर्के ओकर मोनक ऊपर निर्भर करैत अछि । एक आदमी डाक्टर भए जाइत अछि,किओ कलक्टर बनि जाइत छथि तँ ककरो भाग्यमे भरि जिनगी चपरासिएक काज करब रहैत अछि । मुदा एहिसभक पाछु मोनेक शक्तिक चमत्कार थिक ।
ई संसार हमर अपने सोचक प्रतिविम्ब अछि । हम जेहने सोचैत छी,सएह होबए लगैत अछि । जँ हम ककरोसँ नीकसँ गप्प करब तँ ओहो नीकसँ बाजत । जँ हम अलट-विलट काज करब,अंट-संट बाजब तँ जाहिर अछि जे दोसरोक मोनमे तेहने भाव जागत,ओहो तमसाएत । परिणाम केहन होएत से सोचल जा सकैत अछि। आइ-काल्हि की भए रहल अछि? सभ अपन-अपन तानमे मस्तान अछि । ककरो कोनो मतलब नहि छैक जे ओकरा आस-पासक लोक के अछि,केहन अछि । गामो-घरक जीवनक शहरीकरण भए गेल अछि । लोक चुपचाप अपन दरबाजापर बैसल रहैत अछि । फगुआ हो वा दिआबाती,ककरोसँ किओ भरिमुँह गप्पो नहि करैत अछि । तेहन परिस्थितिमे जँ कोनो विवाद होइत अछि तँ ओ भयानक रुखि लए लैत अछि । कारण संवादहीनताक कारण आपसी समझ नदारद रहैत अछि आ बात एकहि बेर काबूसँ बाहर भए जाइत अछि ।
एहन उदाहरण कतेको भेटत जतए लोकसभ कहए लगताह-"की कहैत छी? हमरा तँ साधने नहि अछि ने तँ हम केहन,केहनक कान काटि देतिऐक । आदि,आदि । मुदा ई सभ बहाना मात्र छैक । एक सँ एक कठिन परिस्थितिमे लोक आगू बढ़बे नहि केलाह अपित समाजक सामने एकटा दृष्टान्त प्रस्तुत केलाह।कहबी छैक जे रोम एकदिने नहि बनल । माउंट एवरेस्टपर चढ़बाक हेतु कतेको बेर लोक खसल,कतेको अपन जानोसँ हाथ धोलथि । अंततोगत्वा विजय भेटल । विजय पताकासभ देखैत अछि मुदा ओकर पाछाक संघर्ष साइते किओ बुझैत अछि । मुदा ई बात तँ मानिए कए चलू जे पैघ उपलव्धिक हेतु ओहने कठोर  परिश्रमक प्रयोजन होइत अछि । सफलताक हेतु कोनो लघुपथ नहि होइत अछि । कहक मानेजे  कोनो पैघ काज करबाक हेतु तेहने सघन प्रयासक प्रयोजन होइत अछि । खुरपी छलहुँ आ बोनि भए गेल ,ताहि तरहक प्रवृतिसँ जीवनमे उत्कर्षपर नहि पहुँचल जा सकैत अछि । ताहि हेतु चाही दृढ़निश्चयी ,पहाड़सन निस्सन ओ अटल मोन जे रस्ताक संघर्ष ओ कष्ट देखि कए अगुताथि नहि,कर्तव्यपथपर अड़ल रहथि । की मजाल अछि जे एहन अडिग व्यक्तिकेँ सफलता नहि भेटत,भेटबे करत ।  एहने लोकसभ समाजमे दृष्टान्त बनि जाइत छथि ।
मनक शक्ति अथाह अछि । कतेक तरहक बात कहिआ-कहिआसँ एहिमे संचित रहैत अछि जकर उपयोग हमसभ सुविधानुसार करैत रहैत छी । क्रोध,प्रेम,घृणा,दया आद तरह-तरहक भावना मनुक्खक मोनमे सुसुप्त रहैत अछि आओर मौका पाबि कए सक्रिय भए जाइत अछि । किओ व्यक्ति जन्मजात क्रोधी,प्रतिशोधी,मतलबी होइछ । तँ किओ स्वभावसँ उपकारी,दानी आ उदार एकरा की कहबै? मनुक्खक मोनमे कतेको जन्मसँ संचित कर्म ओकर संस्कारक रुपमे समय-समयपर स्वतः प्रकटभए ओकर स्वभावक रुप दैत अछि । कहक माने जे, जे किछु हम अहाँ कए रहल छी तकर फलाफल एहि जन्ममे तँ भेटिते अछि,बादोमे, आनो जन्ममे हमरसभक पछोड़ करैत अछि । सही मानेमे मोन अनंत अछि ।
मनुक्खक मोनमे परमात्माक बास अछि। ओ जे सोचत से भए कए रहत,बसर्ते ओ आधा,अधूरा प्रयास कए रस्तासँ घुरि नहि जाथि। लक्षकेँ प्राप्त हेबा कालधरि अपन प्रयासमे लागल रहथि । मार्गक कष्टसँ व्यथित भए प्रयासकेँ शिथिल नहि करथि । कोनो सबाल नहि अछि जे ओ  अपन निर्धारित लक्षयकेँ नहि प्राप्त कए सकथि। मुदा ताहि हेतु चाही धैर्य,ताहि हेतु चाही अनथक प्रयास । जे किओ से केलाह अछि सएह सही मानेमे सफल भेलाह अछि ।






शुक्रवार, 16 नवंबर 2018

दुखिआसभ संसार!


दुखिआसभ संसार!





एहि दुनिआमे अधिकांश लोक अनकर सुख देखिकए दुखी छथि । एहन लोकक की समाधान अछि? ओ सही मानेमे अभागल छथि । सौंसे संसारमे लोक दिन-राति एही प्रयासमे रहैत छथि जे सुखी रही,नीक घर बनाबी,धीआ-पूताकेँ नीक-सँ-नीक शिक्षा दी,हुनकर नीक नौकरी लागि जानि आ जीवनमे सभ तरहेँ सुव्यवस्थित होथि । हमरातँ से सभटा होअए मुदा अनका से सभ नहि होइ आ जँ हेतैक तँ हम दुखी भए जाएब । एहिसँ हटि कए जौँ हम सकारात्मक रुखि रखैत अनकर उपलव्धिकेँ अपने बुझी तँ सुखी हेबाक अवसर अबिते रहत । हम अपने कैटा मकान बना सकब? एकटा-दूटा ,हे तीनटा मुदा लाखोक संख्यामे मकान,फ्लैट आओर लोकसभ बना रहल छथि किंवा बनल बनाओल कीनि रहल छथि । जौँ हम अपना आपकेँ कनी उदार करी आ अनकर सुखसँ सुखी होएब सीखि ली तँ निश्चय बुझु जे हमसभ हजार गुना बेसी सुखी रहि सकैत छी ।  नित्यप्रति अपने घरक गृहप्रवेश हेबाक आनंदक अनुभूति कए सकैत छी ।

लोक सोचैत रहहैत अछि जे दोसर आदमीसभ कतेक भाग्यवान अछि । सभकेँ अनकर चीज-वस्तु सोहनगर लगैत रहैत छैक। जखन कि कै बेर से बात होइत नहि छैक । असलमे ई संसार विचित्रतासँ भरल अछि । किओ किछु तँ किओ किछु लए मुदा असंतुष्टसभ अछि । जकरा एकटा मकान छैक से दोसरक चक्करमे अछि । जकरा दोसरो मकान भए गेलैक से आओर किछुक पाछु पड़ल अछि । किओ बिरलैके एहन भेटताह जे सभ मानेमे पूर्ण छथि आ जँ से भए जेतैक तँ ओ मनुक्ख नहि रहि जेताह,भगवान भए जेताह । सत पूछल जाए तँ अपुर्णता स्वभाविक थिक । जँ सभ किछु भइए जेतैक तू हम-अहाँ जीविए कए की करब? बैसल-बैसल  लोथ नहि भए जाएब?

जखन मनुक्खकेँ अभाव हेतैक तँ ओ ओकर प्राप्तिक हेतु प्रयास करत ,प्रयास करत तँ किछु हेतैक,किछु नहि हेतैक । आब एहीठाम आदमी-आदमीमे फर्क भए जाइत अछि । किओ मनोनुकूल परिणाम नहि भेलोपर  प्रयास नहि छोड़ैत छथि, अपितु वारंबार प्रयास कए इक्षित फल प्राप्त कए लैत छथि । ओतहि किछुगोटे एहन होइत छथि जे  कनीमनी प्रयास करताह आ हाथ बारि देताह । तकरबाद तरह-तरहक कबाइत पढ़ए लगताह ।" हमर तँ भाग्ये खराप अछि। हम कइए की सकैत छी । फलना आदमी तँ देखिते-देखिते की सँ की कए लेलथि " आदि,आदि। एहि तरहक सोचबला व्यक्ति बेसीकाल दुखिए रहैत छथि ।

लोक कतबो पैघ किएक ने भए जाओ,ओकरा समस्या लागले रहैत छैक । मानि लिअ जे किओ प्रधानमंत्री भए गेल तँ की ओ बहुत सुखी अछि, से नहि कहल जा सकैत अछि । एहिबातक किओ गारंटी नहि दए सकैथ अछि । कम सँ कम ओकरा दिन-राति एहिबातक चिंता तँ लागले रहैत छैक जे ओकर प्रतिष्ठा बनल रहए,ओ लोकप्रिय रहए,आ जनतामे ओकर नीक छवि  रहैक । ताहि लेल ओ दिन-राति अपसिआँत रहैत छथि । कहक माने जे सुखी होएब कोनो पद वा धनसँ नहि जोड़ल जा सकैत अछि । सही पुछैत छी तँ ई बात लोकक दृष्टिकोणसँ बेसी प्रभावित होइत अछि जे अमुक व्यक्ति सुखी रहताह की दुखी । एकहि बातसँ किओ जान देबए हेतु उतारु भए जाइत छथि तँ ककरो लेल ओएह बात होएब कोनो माने नहि रखैत अछि ।

ककरा कोन बातसँ दुख हेतैक तकर कोनो निजगुत व्याख्या नहि कएल जा सकैत अछि। मुदा एतबा तँ तय अचि जे बहुत रास दुख मनुक्खक स्वयं बेसाहल होइत अछि । कहब से कोना? आब कहैत छी । मानि लिअ जे  ककरो बच्चामे गणितक सबाल बुझबाक क्षमता नहि छेक,तैयो ओ चाहैत छथि जे हुनकर बेटा अभियंता भए जाए,किंवा ककरो बच्चा कहुना कए बीए पास केलक आ ओ अभिलाषा रखैत छति जे ओ बच्चा आइएएस भए जाथि ,तखन हुनका की हेतनि,निराशा छोड़ि कए किछु आओर हाथ लगतनि? कदापि नहि। इएह बात बुझबाक रहैत छैक । कहबाक माने जे पहिने उत्तर निकालि कए सबाल बनबए चलब तँ की होएत? जीवन यात्राक आनंद सँ एहन व्यक्ति वंचित रहि जाइत छथि जे तखने सुखि हेताह जहिआ सभकिछु हुनकर मोन जोगर भए जेतनि । से ने हेतनि ने ओ कहिओ भरिमोन हँसि सकताह । ने राधाकेँ नौ मोन तेल हेतनि ने ओ नचतीह। सएह हाल बेसी गोटे अपन बना लैत छथि आ तखन दोख देताह भाग्यक ।"हमर तँ भाग्ये खराप अछि?"

"औ बाबू! खराप किओ आन थोड़े केने अछि? कनिको सोचि-विचारि कए चलितहुँ तँ साइत बहुत बेसी सुखी रहि सकितहुँ ।

कै बेर जखन भोरे अखबार पढ़ैत छी तँ  मोन चिंतित भए जाइत अछि । एक सँ एक योग्य,पढल-लीखल, उच्चपदपर आसीन व्यक्ति आत्महत्या कए रहल छथि । मामुली बात लए पड़ोसीसँ झगड़ा होत अछि आ गोली चलि जाइत अछि । सड़कपर बात-बातमे कार सबार मोटर साइकल पर बैसल लोकसंगे  गारि-मारिपर उतारु देखल जाइत छथि । आखिर,एना किएक भए रहल अछि?  कतहु-ने-कतहि ई लोकसभ अंदरसँ परेसान छथि । मोनमे चैन नहि छनि । पाकल घाव जकँ मौका पबितहि अंदरक विकार बलबला कए बाहर भए जाइत अछि । निश्चित रुपसँ ई चिंताक विषय थिक ।

एहि संसारमे साइत किओ भेटत जकरा कोनो-ने-कोनो रुपमे दुख नहि भेल हो । कबीर दास ठीके कहैत छथि-

राजा दुखी परजा दुखी जोगीकेँ दुख दूना ।

कहे कबीर सुनो बाइ साधो एकहु घर नहि सूना ।।

भगवान रामसन चक्रवर्ती आ प्रतापी राजाकेँ कतेको तरहक कष्टक सामना करए पड़लनि। भगवान कृष्णकेँ दुष्टसभक संहार करए हेतु की-की नहि करए पड़लनि । आधुनिक समयमे सेहो एक सँ एक उदाहरण भेटत जतए लोक अपन सिद्धान्त हेतु सर्वस्व दावपर लगा देलनि । नेल्सन मंडेला कतेको साल जेलमे सड़ैत रहि गेलाह मुदा अपन बात पर अडिग रहलाह आ अंततोगत्वा विजयी भेलाह । कहक माने जे दुख सहबाक शक्ति अपना आपमे वरदान अछि। दुख हेबे नहि करए से हमरा -अहाँक बशमे अछि? नहि अछि? तखन तँ ओकर निदान करब आ ताहि हेतु उचित आ आवश्यक धैर्य राखब एकमात्र समाधान भए सकैत अछि । अस्तु, बहुत किछु हमरा लोकनिक मनोवृतिपर निर्भर करैत अछि ।

जावे मनुक्खक जीवन छैक,दुख-सुख लागले रहत ।  ई प्रकृतिक नियम थिक । सभदिन एकरंग ने ककरो रहलैक अछि आ ने रहतैक । परिवर्तन अवश्यंभावी थिक । तखन की कएल जाए जाहिसँ सुखी आ शांत जीवन जीवि ली? ताहे हेतु गीताक निमन्लिखित श्लोकक ध्यान कएल जाए

-दुखेषु अनुदविग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतराग भय क्रोधः अथितधिः मुनिः उच्यते ।।

कहक मतलब जे जेना जीवन यात्रामे अबैत जाए तकरा तहिना स्वीकार कए चलैत चलू। बढ़ैत चलू । सभ ठीके रहतैक ,ई भावना जँ  मोनमे रहत तखने सही मानेमे हमसभ सुखी रहि सकैत छी।

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सोमवार, 12 नवंबर 2018

प्रतिशोध


प्रतिशोध



सोचिऔ जे सभकिछु जँ अपने मोनक अनुसार होइतैक तँ ई दुनियाँ कतेक रमनगर रहितैक? मुदा से होइत छैक? कदापि नहि ? एकसँ एक पैघ लोक एहि प्रयासमे लागल रहलाह जे ओ जे चाहथि सएह होइक,हुनकेटा  चलनि आ जे से नहि करैत अछि तकरा तेहन दंड देल जाए जे आओर किओ फेर तेहन गलती करबाक साहस नहि कए सकए? मुदा रावणोकेँ से कएल नहि भेलैक । कहबी छैक जे सभकिछु ओकर अधीन भए गेल रहैक ,तइओ जखन समय अएलैक ओ कालक अधीन भए एहि दुनियाँ सँ चलि जाइत रहल । सौंसे जिनगी ओ प्रतिशोध लैत रहल ।लक्षमण सूर्पनखाक नाक काटि देलखिन । ताहिबातसँ अपमानित भए सूर्पनखा रावण लग पहुँचल आ ओकरा तरह-तरहसँ एहि अपमानक बदला लेबाक हेतु उत्तेजित केलक । प्रतिशोधक आगिमे धधकैत अहंकारी रावणक वुद्धि भ्रष्ट भए गेल आ ओ एकपर एक गलती करैत चलि गेल । सीता हरण सेहो तैँ भेल छल । परिणाम की भेल? ओकर घरहंज भए गेल । कहबी छैक जे रहा न कुल कोइ रोवन हारा । रावणक सभकिछु चल जाइत रहलैक । तैँ प्रतिशोध बहुत हानिकारक भावना थिक जे मनुक्खकेँ कैबेर राक्षस बना दैत अछि आ ओ एहन काज सभ कए बैसैति अछि जे ओकरा बादमे स्वयं पश्चाताप होइत छैक । जरुरी अछि जे समय रहिते मनुक्ख चेति जाए आ बेसी फसाद नहि करए ।

अपन शास्त्र-पुराणमे एहन खिस्सासभ भरल अछि जाहिमे  प्रतिशोध लेबाक कारण देबता-राक्षसमे कतेको युद्ध भेल । महाभारत तँ ऐहि तरहक घटनासँ भरल अछि । द्रोपदी दुर्योधनपर हँसि देलथि,किछु अनट बात कहि देलथि ,ताहि बातसँ अपमानित  दुर्योधन की-की ने केलक से ककरा नहि बूझल अछि । बात एहि हदधरि चलि गेल जे भरलसभामे छल द्वारा द्युतमे पाणडवसभकेँ हरा कए हुनकर राज-पाटसभटा तँ चलिए गेल,अपितु द्रोपदीकेँ नाङटकए आनल जेबाक प्रयास भेल । ओहिसभामे कर्ण सेहो अपन अपमानक बदला लेबएमे नहि चुकलाह आ द्रोपदीकेँ की-की ने कहि देलखिन ,किएक? एही लेल जे ओ हुनका संग द्रोपदी बिआह करए हेतु तैयार नहि भेल रहथि,कारण जे रहल हो । एहन शुर-वीर लोकसभ एहन नीचतापर उतरि गेलाह कारण हुनकासभपर प्रतिशोधक भूत सबार छल । परिणामक चर्च करब आवश्यक नहि अछि । सभ जनैत छी जे तेहन भयानक युद्ध भेल जे घरहंज भए गेल । अहीं कहू,एहिमे के जीतल?

मनुक्खक जखन तामस हदसँ बेसी भए जाइत छैक आ ओकरा लगैत छैक जे ओएहटा सही अछि,आनलोकसभ ओकरासंगे अन्याय कए रहल छैक तँ ओ बदला लेबाक भावनासँ दोसर व्यक्तिक क्षति करैत अछि । मुदा तामसेटा मे एहन काज होइत छैक से बात नहि अछि । जेना कै बेर लोक सोचि-विचारि कए सेहो एहन काज करैत अछि जाहिसँ ओकर प्रतिद्वंदी किंवा शत्रुकेँ सबक सिखाओल जा सकए । जे व्यक्ति ओकर क्षति केलक तकरा सूदि,मूर समेत घाटा कएल जा सकए । मूलतः बदला लेबाक हेतु किंवा ओलि चुकाबक हेतु लोक एहन काज करैत छथि । जाहिर बात छैक जे एहन निषेधात्मक विचारसँ कोनो शुभ नहि भए सकैत छैक ।

जीवन अछिए कतेकटा? देखिते-देखिते लोक बच्चासँ बूढ़ भए जाइत अछि । जौं एहि बएह्मांडक आयुसँ तुलना करी तँ हमरा लोकनि जीवन ओकर एकटा बहुत छोट क्षणक समान अछि । एतेक छोट जीवनमे कतेक उठापटक हमसभ कए लैत छी । कै बेर तँ छोट-छोट बात हेतु अपने लोकक हत्यापर उतारू भए जाइत छी । पुछब जे की करी,अन्याय सहि कए जिब कोन नीक बात भेल? एहि तरहक बहुत तर्क देल जा सकैत अछि आ सएह सभ कहि लोक आवेशमे , प्रतिशोधपूर्ण काज करैत छति जाहिसँ अपनेटा नहि अनको दुखी करैत रहैत छथि । जीवनमे संतुलन बनाकए रहलासँ एवम् सहनशील रहलासँ बहुत रास समस्याकेँ आसानीसँ सलटल जा सकैत अछि । अपन उर्जाक सकरात्मक उपयोग जँ हमसभ करब तँ अपन उन्नति तँ हेबे करत बहुत रास आनोलोकसभक उपकार कए सकब । मुदा ताहि लेल तँ क्षमाशील होएब बड़ जरुरी अछि । नहि तँ छोट-छोट बात हेतु हमसभ दिनराति व्यग्र रहब । कमसँ कन चैनसँ तँ नहिए रहि सकब।

एहन बात नहि अछि जे बदमास वा कम पढ़ल-लिखल लोक  प्रतिशोधी होइत छथि । अपितु एकसँ एक पढ़ल-लिखल,विद्वान  आ उच्चपद आशीन व्यक्तिसभ कैबेर ततेक प्रतिशोधी होइत छथि वा भए जाइत छथि जे जानवरोकेँ पाछा छोढ़ि दैत छथि । जौँ अपने हुनकर अहंपर कतहु चोट कए देलिअनि तखन देखैत रहू तमाशा । जाहिर थिक जे मनुक्खक जतेक अहंकारी,क्रोधी होएत ओकरामे प्रतिशोधक मात्रा ततेक बेसी होएत। आइ-काल्हि तँ ई हाल अछि जे मामूली बातपर गोली चलि जाइत अछि जेना मनुक्खक जीवनक कोनो मूल्ये नहि होइक । रस्ता चलैत जँ अहाँक मोटर साइकल कारसँ टकरा गेल तँ भए सकैत अछि जे दोसरे क्षण गोलीक आबाजसँ कान बहीर भए जाए । अखबार रोज एहन घटनासँ पाटल रहैत अछि । पड़ोसीसँ गाड़ीक पार्कींगपर झंझट भेल आ दोसरे क्षण कैटा लहास देखए पड़ि सकैत अछि । कतेक दुखक गप्प थिक जे मनुक्ख जीवनक जेना कोनो मोले नहि रहि गेल होइक । अस्तु,प्रतिशोध निश्चय राक्षसी प्रवृति थिक एवम् एकर त्याग करबेमे सभक कल्याण अछि ।

आइ-काल्हि छोट-छीन घटनासभ भयानक रुप ग्रहण कए लैत अछि । मामुली बातमे लोक हिंसापर उतारु भए जाइत अछि आ जान लेब तँ जेना सामान्य बात भए गेल अछि । अहाँ जँ भोरुका अखबार  उल्टाउ तँ एहन समाचारसँ पन्ना भरल रहैत अछि । आखिर मानवमूल्यक एहन क्षरण किएक भेल? ई सभ एकदिने नहि भेल अछि । जाहि देशमे चुट्टी-पिपड़ी धरिकेँ इश्वरक अंश मानि पूजा कएल जाइत रहल अछि ताहीठाम इश्वरक सुंदरतम कृति मनुक्खक  किछु मोल नहि रहि गेल अछि । कैठाम तँ एहन देखल गेल जे पचीस-तीस टकाक झगड़ामे आदमीक जान चलि गेल । ई महज दुर्घटना नहि कहल जा सकैत अछि । असल बात ई अछि जे मनुक्खक देहमे लोक राक्षसक रुप धए लैत अछि ,कखन? जखन ओकरामे निषेधात्मक प्रवृतिक बहुलता भए जाइत अछि ,जखन लोक स्वार्थमे आन्हर भए किछु करएपर उतारु भए जाइत अछि । एहने समयकेँ लोक कलियुग कहैत अछि । अहाँ कहि सकैत छी जे समस्या तँ बुझलहुँ मुदा सबाल अछि जे एहि परिस्थितिसँ उबरी कोना?

निश्चित रुपसँ प्रतिशोध एकटा गंभीर समस्या अछि जकर निवारणक कोनो सर्वमान्य समाधान नहि भए सकैत अछि कारण ई व्यक्तिक स्वभावसँ जुड़ल समस्या अछि । । व्यक्ति-व्यक्तिक स्वभाव फराक-फराक होइत अछि । किओ कनी जल्दिए अगुता जाइत छथि तँ किओ बहुत सहनशील होइत छथि । मुदा जाधरि हमसभ तामसक त्याग नहि करब आ व्यर्थक अहंकारसँ उपर नहि उठब ताबे प्रतिशोधक आगिमे जरिते रहब । क्षमाशील व्यक्तिमे प्रतिशोधक भावना कम भए जाइत अछि । तेँ हेतु हमसभ जँ क्रोध,अहंकार सन-सन निषेधात्मक भावनासँ जतेक फराक रहब,जतेक बँचल रहब, प्रतिशोधक आवेगसँ ततबे बँचब आसान भए जाएत ।

प्रतिशोधक परिणाम कैबेर बहुत घातक होइत अछि जाहिमे घुन संगे सातुओ पिसा जाइत छथि । जापानपर बम खसलैक तँ भने अमेरिका, ब्रिटेनसभ युद्ध जीति गेल मुदा मानवताक जबरदस्त  हारि भेलैक । हजारो निर्दोष नागरिक जे युद्धमे भाग नहि लए रहल छल मारल गेल वा अपाहिज भए गेल । आइ-काल्हि कतेको देश आओर भयानक आणविक हथिआरसभ जमा केने छथि । जाहिर छैक जे ओहि हथिआरसँ कोनो पूजा-पाठ तँ हेतैक नहि? जखन कखनो आ जे किओ ओकर उपयोग जाहि कोनो कारण सँ करत तँ ओ नरसंहारे करत । सबाल ई अछि जे हमसभ एतेक उन्नत सभ्यताक अंग होइतहुँ एहि दुनियाँकेँ एहि तरहक मानवनिर्मित प्रलयसँ बचा सकैत छी कि नहि? ओ तँ तखने संभव होएत जखन  एक-एक व्यक्तिमे मानवीय गुणक अधिकता हेतैक जाहिसँ ओकर तामसी प्रवृति हल्लुक पड़ि जाइ । तखने मनुक्ख मात्रक कल्याण संभव अछि ।

शनिवार, 10 नवंबर 2018

Mind your business


Mind your business



Dronacharya wanted to test his students. He ordered them to pierce the right eye of a bird sitting on the branch of a tree. The disciples of Dronacharya took turns to test their ability. When Bhim came to the front stage, Dronacharya asked him about things he was seeing. Bhim answered, “I am seeing the entire tree, then the branches and the bird moving around, and finally the right eye of the bird. I also see you and many respectable persons sitting around.” Dronacharya laughed aloud. Bhim could not understand mystery behind his laughter. He fired the arrow which could never reach the target. Similarly, other disciples also could not pass the test as their as they lacked concentration. In the end Arjun came. Dronacharya asked the same question from him. He answered, “I am seeing only the right eye of the bird which I have to pierce with my arrow.” Dronacharya was very much satisfied by his answer and was quite happy to find that Arjun pierced the right eye of the rotating bird with his arrow in a single attempt and had thus successfully achieved the target. The lesson to be learnt from this episode of the Mahabharat is that one should concentrate on his work hundred percent, then only he can achieve something marvellous.

Persons who do not concentrate on their work, keep disturbing others. If we remain involved in our work, we do not have time to find fault with others or to create problem for others[p1] . So, the best thing is that we keep engaged constructively and should not unnecessarily disturb others with our views on any issue unless they are willing to listen. Unsolicited advice does not lead to any meaningful solution.

 God has given us everything that we need but the problem is that we are unable to make proper use of our own resources and keep envying when others achieve something better.We have limited time which we can either use in positive way or fritter away in gossips. Every day we get a blank cheque in the form of a new day. We have option to write anything by doing things of our choice. We may spoil our time in quarrelling, sleeping or gossiping. Alternatively, we can spend our time in good things like reading books, or doing some other constructive things. Ultimately the day will pass. Time that has passed away will never return. If we make constructive use of our time and energy, we can accomplish a lot. We can make big achievements. On the other hand, if we just keep finding fault with others or try to bring others down, we can never improve. Our time will be wasted over useless things. At the end, we will feel disappointed to find that many persons who were much below us have grown and achieved much more.

We see striking difference between achievements of some persons. They live in the same world but the way they think and act makes the difference. If we concentrate on our positive actions and let our energy utilized for the designated purpose we can achieve much more than we ever dreamt of. We become our own enemy by spoiling our time and energy in negativities. Time and energy which is lost in finding fault with others can be better utilized. That is how successful persons have behaved and won in this world which is otherwise full of conflicts.

Everybody acts as per his nature. The fact of the matter is that we keep advising others without understanding the implications. We should, therefore, not disturb anybody in perusing his self-designated path. If we do so, we cannot help them in any manner. Not only he would be deflected from his own way but will probably not be able to follow the path being shown by us. We should, therefore concentrate upon our own business in life so that we are able to achieve the best.

Everybody has different situation to face in life. Accordingly, there cannot be a solution common to all the problems that the people confront in day to life. But living in peace and harmony is definitely a common desire but for which the very existence of mankind can be endangered. We must, therefore, think twice before taking a decision affecting others. We must not do something which we would not like to be done to us.

Nature exists because of unique balance it is maintaining automatically. The Sun, the Moon, the Earth and for that matter millions of stars and planets are rotating in their fixed circles without disturbing any other planet and that is how they are surviving for millions of years. Nobody knows for certainty as to how this is happening but it happens and that is helping all of us to live in this wonderful world happily and peacefully. Let us all take lesson from this and try to be accommodative and adjust with others. Then alone we can prosper and live a happy life.







गुरुवार, 8 नवंबर 2018

Printed versions of my books can be bought online




हमर पोथीसभक मुद्रित संस्करण निमन्लिखित वेवलिंकपर क्लिक कए आनलाइन कीनल जा सकैत अछि(Printed versions of my books can be bought online from pothi.com at the following links):



The Lost House (Collection of short stories)



Life is an Art(Motivational essays)



विवि
ध प्रसंग(निवंध संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195633.
प्रसंगवश(निवंध संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195527.
फसाद(कथा संग्रह)
https://pothi.com/pothi/node/195510.
स्वर्ग एतहि अछि(यात्रा प्रसंग)
https://pothi.com/pothi/node/195487.
भोरसँ साँझ धरि(आत्मकथा)
https://pothi.com/pothi/node/195476.
नमस्तस्यै
(मैथिली उपन्यास)
https://pothi.com/pothi/node/195444.

महराज  (मैथिली उपन्यास)



लजकोटर (मैथिली उपन्यास)  


सीमाक ओहि पार (मैथिली उपन्यास)  
https://pothi.com/pothi/node/197004.

समाधान(निवंध संग्रह)

https://pothi.com/pothi/node/197754.

www.flipkart.com/www.amazon.com पर सेहो ई पोथीसभ आनलाइन कीनल जा सकैत अछि।

चीटी चढ़ए पहाड़


चीटी चढ़ए पहाड़



ई संसार अपना-आपमे आश्चर्यसँ भरल अछि । एहन कोनो वस्तु नहि भेटत जाहिमे प्रकृतिक विचित्रताक अनुभूति नहि होइत हो । से जँ नहि होइत तँ चिरै चुनमुन सँ लए कए समस्त जीव पर्यंत जनमिते अपन माएक संगे कोन सटि जाइत? बाघसँ लए कए गाए पर्यंत अपन संतानक रक्षाक हेतु एना व्यग्र नहि रहैत। केहन अजगुत छैक जे  छोट-छोट जीब-जन्तुसभ अपन संतानकेँ एमहर-ओमहर नुकओने फिरैत अछि जे ओकरा शत्रुसँ बचाओल जाए,मनुक्खतँ कथे कोन ?
एतेक तरहक विचित्रतासँ भरल एहि संसारमे किछु तँ छैक जे ई चलि रहल छैक । आखिर  ओ की अछि? ई प्रश्न कहि नहि कहिआसँ समस्त मानवक मोनकेँ खोचारि रहल अछि। हमरासभ तँ नित्यप्रतिक जीवनमे तेनाकए लागल रहैत छी जे बुझाइते नहि अछि जे कोना भोर भेलैक आ कखन साँझ भए गेल । मुदा से सभ प्रकृतिक व्यवस्थाक अनुकूल स्वतः स्वभाविक रूपेँ होइत रहैत अछि आ से तेहन नियमसँ होइत अछि जे कहिओ कखनो एकहु सेकेंड हेतु सूर्य भगवानकेँ विलंव होइत किओ नहि देखलक,नहि सुनलक । सोचिऔ जे जँ से होइतैक तँ एहि शृष्टिमे प्रलय नहि भए जाइत? तारा, ग्रह सभ एकटा व्यवस्थाक अनुकूल निरंतर चलैत रहैत अछि। जाहि कारणसँ कखनो टकरावक परिस्थिति नहि अबैत अछि । एकटा हमसभ छी जे अनेरे एक दोसरसँ टकराइत रहैत छी । किएक? घमंड कही,अज्ञानताकही ,जे कही । मुदा अछि ई दुखद। हमरा लोकनि निरंतर व्यर्थक चिंतामे पड़ल रहैत छी,कै बेर दुखित भए जाइत छी ,राति-राति भरि जागल रहैत छी जे पता नहि आब की होएत? जे हेबाक छैक से हेतैक आ से भए कए रहत चाहे हम ओकरा पसिंद करी वा नहि करी । नियतिकेँ स्वीकार कए एवम् इश्वरमे आस्था रखलासँ जीवनमे बहुत तरहक परेसानीसँ बचल जा सकैत अछि । जे वस्तु हमर पसिंदक भेल से नीक आ जे से नहि भेल तँ आओर नीक कारण ओकरा इश्वरक इच्छा बूझि स्वीकार कए लेलासँ बहुत रास मानसिक तनावसँ हमसभ बँचि सकैत छी । छैक कि नहि ई सत्य बात?
आइ काल्हि लोक तरह-तरहक मानसिक परेसानीसँ गुजरि रहल छथि । बात-बातमे भाइ- भाइमे गोली चलि जाइत अछि । कनीमनी संपत्तिक बटबारामे  कोट-कचहरी धरि बात पहुँचि जाइत अछि । गाम-गाम गोलैसी होबए लगैत अछि । एना किएक होइत अछि? एही लेल जे हमसभ  जथापातकेँ  सर्वस्व बूझि रहल छी। नीक विचार ककरो सोहाइत नहि छैक । सब चहैत अछि जे ओ गामक सबसँ पैघ धनीक भए जाए ,चाहे जेना होइ । ककरो ई सोचबाक पलखति नहि छैक जे आखिर अन्यायपूर्वक उपार्जित संपत्तिसँ हम सुखी रहिओ सकब कि नहि ?
जीवनमे अध्यात्मिकताक अभावसँ लोक कोनो तरहसँ धन बटोरएमे लागल रहैत छथि । एहि लोभक कारण नीक -बेजाए किछुक ज्ञान हुनकासभकेँ नहि रहि जाइत अछि । सबाल अछि जे एतेक धन जमा कइओ कए जखन शांति नहि भेटैत अछि तखन की करी? धनक महत्व छैक ,मुदा एतेक नहि जे कोनो कर्म कए ओकरा पाछा पड़ल रही । एहन लोक अनेको प्रकारक कुक्रम करैत छथि आ अन्ततोगत्वा स्वतः निर्मित ससरफानीमे फँसि नष्ट भए जाइत छथि ।
कोनो जीव -जन्तुमे सोचबाक विचारबाक क्षमता नहि अछि । मनुक्खमे ओ शक्ति अछि जे ओ  बीताल वा आगा होबएबला घटनाक बारेमे सोचि विचारि सकैत अछि ।  नीक-अधलाहक विभेद कए सकैत अछि । दूर्भाग्यक बात थिक जे जाहि विचार शक्तिक उपयोग मानव कल्याण हेतु भए सकैत छल सएह शक्ति विध्वंशकारी भए गेल अछि । एक सँ एक घातक हथिआर बना कए राखल गेल अछि   एटम बम बनि कए तैयार अछि । एकसँ एक मिसाइल बनि गेल अछि जाहिसँ देखिते-देखिते मानवाताक विध्वंस भए सकैत अछि। मुदा लोक आँखि मुनि कए चलल जा रहल अछि । सत्य कही तँ आइ मानवता हाकरोस कए रहल अछि आ समस्त मानव समाज बेबस भए गेल अछि,साइत इएह नियति होइक ।
किओ कतबो पैघ होअए वा कतबो छोट,प्रकृतिक नियमसभपर समान रूपसँ बिना कोनो अपवादकेँ लागू होइत अछि । जे जनमल अछि से मरत । ई अकाट्य नियम थिक । एक सँ एक धनिक लोक समय अएलापर एहि दुनियाँसँ सभ किछु एतहि छोड़ि कए चलि जाइत छथि । सबाल अछि जे ई बात बुझितहुँ हमसभ एतेक बेचैन किएक रहैत छी,दिसरक हक किएक मारि देबए चाहैत छी ? उत्तर सभकेँ बूझल छैक। ई कोनो नव समस्या नहि अछि मुदा मनुक्खक स्वार्थ ओकरा तेना कए आन्हर केने रहैत अछि जे ओ आगू-पाछू किछु सोचि नहि पबैत अछि । एहन नहि हेतैक जे जखन प्रलय हेतेक तँ ओ अनकेधरि सीमित रहत । कहक मतलब जे अनिष्टक संग्रह जँ हमसभ करैत रहब तँ ओकर झटका हमरो भोगहि पड़त । जखन एटम बम फुटतैक तँ ओ थोरे चिन्हा परिचय कए लोकक संघार करत । 
अस्तु,शुभ भावनाक संग जीवनमे आगा चलैत रहलासँ लक्ष्य प्राप्ति सुगम होइत अछि संगे जीवनमे स्मृद्धिक संग शांति सेहो भेटैत अछि । अपन उर्जाकेँ सकारात्मक रुखि दैत रहलासँ  मनुक्ख  एक सँ एक आश्चर्यजनक उपलव्धि प्राप्त करैत अछि आ संसारमे अमर भए जाइत अछि। जरूरी एहिबातक अछि जे हम अपन दृष्टिकोणकेँ व्यापक करी आ जहिना अपना हेतु नीक सोचैत छी तहिना अनको लेल सोचिऐक । एहीमे कल्याण अछि,अपनो आ अनको ।
मनुक्ख जखन इश्वरसँ जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरामे असीम शक्तिक शृजन होइत अछि । ओकर आत्मशक्तिमे चमत्कारिक विकास होइत अछि आ ओ कखनो अपनाकेँ असगर नहि पबैत अछि । ओना सच पूछी तँ मनुक्खक बेसी कष्ट ओकर स्वनिर्मित होइत अछि । कोनो काल,केहनो संकटमे जँ हमरा मोनमे  ई भाव रहए जे ओ हमरा संगे छथि तँ हमसभ साहसपूर्वक संकटकेँ पार कए विजयश्री हासिल कए सकैत छी ।राम नाम के कृपा से सिंधु तरय पाषाड़ " ई एकदम सत्य अछि । सच पूछी तँ जीवनक समस्त  दुखक एकमात्र  समाधान इश्वरमे विश्वास अछि ।


Life is an opportunity

Life is an opportunity   Millions of people have come and gone but nobody remembers them. Only a few persons like Vyas, Shankarachary,Vi...