मंगलवार, 7 जनवरी 2020

नागरिकता संशोधन कानून 2019


नागरिकता संशोधन कानून 2019



भारत के संसद के दोनो सदनो ने संविधान द्वारा तय प्रकृया का पलान करते हुए अपार बहुमत से संसद के हाल ही में संपन्न हुए  शीतकालीन सत्र में नागरिकता संशोधन कानून २०१९ पास किया  है । इसके बाद बारत के माननीय राष्ट्रपतिजी ने इस कानून को अपनी मंजुरी भी दे दी है । भारत के राजपत्र में यह कानून प्रकाशित भी हो गया है । इस तरह यह कानून पूरे भारतवर्ष में लागू हो गया है । इस कानून के लागू होते ही कुछ लोगों ने इसके खिलाफ भारत के उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दिया है । इसके बाद माननीय उच्चतम न्यायलय ने केन्द्र सरकार सहित सभी संवद्ध पक्षों को नोटीस जारी कर दिया है । २२ जनवरी २०२० को इस मामले में आगे की सुनवाई होना तय है । फिर ऐसा क्या हुआ कि इस कानून को लेकर पूरे देश में आग लगा हुआ है? विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इसे असंवैधानिक,सांप्रदायिक,मुस्लिमविरोधी और न जाने क्या-क्या कहती जा रही है । क्या इस कानून के विरोधियों को भारत के उच्चतम न्यायलय पर से भी विश्वास उठ गया है? क्या उन्हें यह पता नहीं है कि संसद में तमाम विपक्षी दलों ने अपने तर्क-कुत्रक द्वारा इस कानून का विरोध किया था । बाबजूद इसके अपार बहुमत से यह कानून संसद के दोनो सदनो में पारित हो गया । इस सब के बाबजूद कुछ विपक्षी दल असमाजिक तत्वों का सहयोग  लेकर सड़क पर उतड़ चुके हैं और हर संभव प्रयास कर समाज के एकवर्ग को भड़काने में लगे हुए हैं । क्या सचमुच वे लोग लोकतंत्र से अपना विश्वास खो चुके हैं ? अन्यथा संसद में बहुमत से पास इस कानून को इस तरह सड़कों पर विरोध नहीं करते वह भी तब जबकि इसके विरुद्ध माननीय उच्चतम न्यायलय सुनवाई कर रही है?

इस कानून के विरुद्ध में सबसे पहले उत्तर-पूर्व के राज्यों से उठना शुरु हुआ । वहाँ के राज्यों खासकर आसाम में विदेशी घुसपैठियों की समस्या बहुत पुरानी है । न्यायालय के आदेश पर आसाम मे राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC)वहाँ पर हाल ही में बनकर तैयार हुआ जिसमें करीब उन्नैस लाख विदेशी चिन्हित किये गए हैं जो गलत तरीके से सालों से वहाँ जमे हुए है । पहले तो अनुमान था कि यह संख्या चालीस लाख से कम नहीं है । लेकिन जब  तय प्रकृया द्वारा उन्नीस लाख  लोग राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC)से बाहर रह गए तो तभी से कुछ लोगों ने इसके पक्ष और विपक्ष में आबाज उठाना शुरु कर दिया था । सही बात तो यह है कि सायद ही कोई पक्ष इस तरह तैयार राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC) से संतुष्ट हो । इसी परिस्थिति से गुजर रहे वहाँ के समाज को कुछ दन बाद ही नागरिकता संशोधन कानून का सामना करना पड़ा । जाहिर है कि वहाँ के लोगों में पहले से ही विद्यमान अनिश्चितता का माहौल और गहरा गया । चारो तरफ अराजकता का माहौल बन गया। हिंसा होने लगी । सरकारी संपत्तियों को जलाया जाने लगा । केन्द्र सरकार ने यथासंभव कार्रवाई कर वहाँ के लोगों का गुस्सा शांत करने में  लग गई ,पर देखते ही देखते यहा आंदोलन पूरे देश में फैल गया ।

दिल्ली में और देश के अन्य प्रान्तों में यह आंदोलन अत्यंत तीव्र गति से फैलता गया । दुख की बात यह है कि आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय संपत्तियों का भारी नुकसान किया । जहाँ-तहाँ आगजनी,लूटपाट का माहौल बना दिया गया । जाहिर है इस परिस्थिति में पुलिस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती थी । आंदोलनकारियों के हिंसक व्यवहार का प्रतिरोध कानून के राज्य को बनाए रखने के लिए अनिवार्य था । सो पुलिस को जहाँ-तहाँ शक्ति प्रयोग करना पड़ा । इसके बाद पुलिस को गाली देने का दौड़ प्रारंभ हो गया । संभव है कि लगातार चल रहे उग्र और हिंसक आंदोलन को सम्हालने के क्रम में पुलिस से भी गल्ती हुई हो परंतु इसके लिए आंदोलनकारी ज्यादा जिम्मेदार हैं । आखिर इस कानून में ऐसा क्या है कि उनको इस तरह त्वरित और उग्र कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा जबकि इसी मामले पर उच्चतम न्यायलय में मामल लंवित है और सुनवाई की तारिख भी तय हो चुकी है । क्या यह उचित नहीं थT कि विपक्षी दल और आंदोलनकारी लोग उच्चतम न्यायलय के फैसले का इंतजार करते? इस से तो यस साफ स्पष्ट होता है कि ये लोग हर हाल में हंगामा खड़ा करना चाहते थे । पता था कि  उनके विरोध प्रदर्शन में कोई कानूनी दम नहीं है। फिर भी वे मोदी सरकार के विरुद्ध इस अवसर को पूरी तरह इस्तमाल कर लेना चाहते थे । चूंकि लोकतांत्रिक तरीके से वे इस सरकार का सामना नहीं कर पा रहे हैं ,अस्तु, उनको लगा कि सरकार को बदनाम करने का ,इसे अस्थिर करने का यह स्वर्णिम अवसर लगता है । इस तरह सुचिंतित कार्रवाई कर इनलोगों ने देश का माहौल बिगाड़ने का काम किया है ।

जिस तेजी से यह आंदोलन  पूरे देश में फैलता चला गया वह अपने-आप में रहस्यात्मक है । कारण यह कानून बेशक लागू हो गया है परंतु  व्यवहारिक तौर पर किसी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो ऐसा संभव नहीं  लगता है । तमाम विपक्षी नेता इस प्रकार एक स्वर से इस कानून के खिलाफ खड़े हो गए हैं जैसे कि कोई बहुत बड़ा अनर्थ हो गया हो । वास्तविक में इन सबको बोटबैंक बनाने का एक सुंदर अवसर लग रहा है । समाज के एकवर्ग को भयभीत कर ,कानून की गलत-सलत  एवम् मनमानी व्याख्या कर भ्रम की स्थिति पैदा करने में वे तात्कालिक रूप से सफल होते नजर आ रहे हैं । परंतु,राष्ट्रीय एकता को अकारण हो रहे क्षति को कोई सोच नहीं पा रहे हैं । देश-विदेश में भारत की प्रतिष्ठा को अकारण खराब किया जा रहा है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो संयुक्त राष्ट्र तक को दखल देने का आग्रह कर दी है । साथ ही उन्होंने और कई और मुख्यमंत्रियों ने इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं करने का एलान कर दिया है । लेकिन सबसे आगे तो केरल के मुख्यमंत्री ने राज्य के विधानसभामें इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव भी पास करबा दिया है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिन-रात संविधान की दुहाई देनेवाले राजनेता स्वयं संवैधानिक प्रावधानों का कुछ भी ख्याल नहीं कर पा रहे हैं । यह सर्वविदित तथ्य है कि राज्य की विधानसभा इस मसले  पर प्रस्ताव पास नहीं कर सकती है क्यों कि नागरिकता  के विषय में संसद ही कानून बना सकती है । फिर कैसे कोई राज्य संसद द्वारा विधिवत पास कानून को लागू नहीं करने का सरेआम एलान कर सकता है और साथ ही स्वयं को संविधान का रक्षक घोषित कर सकता है?

 

यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि नागरिकता संशोधन कानून का हिंसक विरोध उनही राज्यों में हुआ जहाँ बीजेपी या उसके सहयोगी/ समर्थक दलों की सरकारे हैं । इस तरह से खास-खास जगहों पर हिंसक घटनाएं घटित होना प्रायोजित ही लगती हैं । उसमें शामिल वे लोग ही हो सकते हैं जिनका इस देश की संपत्तियों को वर्वाद करने में तनिक भी दुख नहीं होता है,जिन्हें इस तरह के आचरण से चतुर्दिक भय का वातावरण कायम करना ही मूल उद्देश्य है,जो भारत की तरक्की नहीं देखना चाहते हैं,जो दुनिया में भारत को बदनाम करना चाहते है,इसकी एक गलत छवि बना देना चाहते हैं । ताज्जुब की बात है कि यह सब इतने तेजी से हुआ । ऐसा लग रहा है कि वे लोग घात लगाए मौका का पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे थे । अब जब कई राज्यों में हिंसा  फैलाने वाले लोग पकड़े जा रहे हैं तो उनमें विदेशी  ताकतों की संलिप्तता स्फष्ट हो रही है । जनतंत्र में विरोध करने का,सरकार से अलग राय रखने और व्यक्त करने का अधिकार देश के नागरिक को है । इस में कोई दो राय नहीं हो सकता है । परंतु विरोध शांतिपूर्ण ढ़ग से व्यक्त किया जाना चाहिए । किसी को हिंसक आंदोलन को चलाने का या समर्थन देने का अधिकार नहीं है । अगर इस तरह हिंसक गतिविधि चलता रहा तो देश में लोकतंत्र कबतक सुरक्षित रह पाएगा?



इन तमाम विवादों में उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक अच्छा मिसाल कायम किया है । जो लोग सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट करने में शामिल पाए जा रहे हैं उन्ही लोगों से उसका हर्जाना अदा करने का आदेश दिया जा रहा है और सुनते हैं कि कुछ लोगों ने दिया भी है । इस तरह की कार्रवाईके बाद उत्तर प्रदेश में हिंसक विरोध कमा है । उपद्रवी भयभीत हैं । उन्हें लगने लगा है कि गलत करने वालेलोग कानून की गिरफ्त से बँच नहीं पाएंगे । अन्य राज्यों में भी ऐसा ही हो तो ऐसे अराजक तत्वों को हिंसक गतिविधि करने का साहस नहीं होगा और वे भाग खड़े होंगे ।

 सबाल ये भी है कि इस कानून का विरोधकरनेवाले लोग क्या वास्तविक रूप से परेशानी में पड़ गए हैं । क्या इस कानून ने उनसे कुछ भी छीन लिया है जो अबतक उनको सुलभ था ?इस कानून का सबसे पहले आसाम में विरोध होने का मूल कारण आसामी लगों के मन में उपजा यह भय है कि  इस से वंगलादेश से आए विदेशी लोगों का वहाँ बसना आसान हो जाएगा जिसे उन लोगों का सांस्कृतिक एवम् भाषायी विरासत खतरे में पर सकता हे । सभी जानते हैं कि इनही कारणों से आसाम में लंबे अवधि तक आंदोलन हुआ था जिसका अंत आसाम समझौता द्वारा संभव हो सका । आसाम समझौते के तहत  २४ मार्च १९७१ तक वहाँ  बसे हुए लोगों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने के उपयुक्त माना जा सकता है , लोगों का नागरिकता पंजी में नाम अंकित हो सकता है जबकि नये कानून के अनुसार  ३१ दिसम्बर २०१४ तक भारत में आ चुके शरणार्थियों को पात्रता मिल जाती है ।

नागरिकता संशोधन कानून २०१९ में यह प्रावधान है कि ३१ दिसम्बर २०१४ तक पाकिस्तान,बंगला देश और अफगानिस्तान से आकर भारत में शरण लेने वाले  वहाँ के उत्पिड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दी जा सकती है । इस कानून का विरोध करने वालो  का  कहना  है कि यह कानून  भारतीय संविधान की मूल आत्मा- धर्म निरपेक्षता के खिलाफ है । यह संविधान के अनुच्छेद १४ में दिए गए समानता के सिद्धान्त के भी खिलाफ है । उनके कहने का सारांश यह है कि अन्य धर्मावलंवियों के तरह पाकिस्तान,वंगलादेश और अफगानिस्तान से आए हुए मुसलमानों को भी इस कानून के तहत नागरिकता प्राप्त करने दिया जाए । नागरिकता कानून में इस संशोधन करने का मूल तात्पर्य ही इन देशों में प्रताड़ित  हो रहे अल्पसंख्यकों को  राहत  देना है । नागरिकता कानून के संशोधित प्रवधानों के तहत  पाकिस्तान,वंगलादेश और अफगानिस्तान से आए प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को छ: वर्षों की छूट मिल जाती है। जबकि सामान्यतः इस तरह नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारत में एगारह वर्ष रहना जरूरी होता है,इस कानून के तहत यह अवधि पाँच वर्ष कर दी गई है । सोचने की बात है  विशेष रूप से सताए गए लोगों के हित में बस इतने से अंतर के लिए, इस तरह का बबाल खड़ा कर देना क्या उचित है? इस कानूनी संशोधन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो भारत के किसी भी नागरिक के खिलाफ हो । एक अनुमान के  मुताबिक संशोधित अधिनियम के तात्कालिक लाभार्थी 31,313 लोग होंगे- 25,447 हिंदू, 5,807 सिख, 55 ईसाई, 2 बौद्ध और 2 पारसी। निश्चय ही इतने बड़े भारत देश के लिए यह संख्या बहुत नगण्य है ।

सरकार और प्रवुद्ध नागरिकों द्वारा निरंतर हो रहे प्रयास के बाबजूद आंदोलनकारी जनता में इस कानून के प्रति भ्रम फैलाने में लगे हुए हैं । वे वारंबार कहते जा रहे हैं कि भारत में रह रहे मुस्लिमों के नागरिकता पर समस्या हो सकती है । एनपीआर राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी का हबाला देकर मुस्लिमों को डराया जा रहा है । यह सब तब भी हो रहा है जब प्रधाममंत्रीजी ने खुद कईबार स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय नागरिकता पंजी पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है और इसका नागरिकता संशोधन कानून से कोई लेना-देना नहीं है।

यहाँ यह जान लेना उपयुक्त होगा कि एनपीआर ‘देश के सामान्य निवासियों’ की एक सूची है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, ‘देश का सामान्य निवासी’ वह है जो कम-से-कम पिछले छह महीनों से स्थानीय क्षेत्र में रहता हो या अगले छह महीनों के लिये किसी विशेष स्थान पर रहने का इरादा रखता है। देश में लोगों की संख्या का रजिस्टर, जो गांव, कस्बे, तहसील, जिला, राज्य, राष्ट्रीय स्तर पर तैयार होता है। 2010 में यूपीए शासन ने इसे लागू किया था।

एनपीआर का विचार यूपीए शासनकाल के समय वर्ष 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा लाया गया था। लेकिन उस समय नागरिकों को सरकारी लाभों के हस्तांतरण के लिए सबसे उपयुक्त आधार प्रोजेक्ट का इससे टकराव हो रहा था। एनपीआर के लिए डाटा को पहली बार वर्ष 2010 में जनगणना-2011 के पहले चरण, जिसे हाउस लिस्टिंग चरण कहा जाता है के साथ एकत्र किया गया था। वर्ष 2015 में इस डाटा को एक हर घर का सर्वेक्षण आयोजित करके अपडेट किया गया था। इसे अपडेट करना कानूनी बाध्यता है।राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के लिए जानकारियां जुटाने के तरीके में केंद्र सरकार में कुछ बदलाव किए हैं। अब एनपीआर में बायोमैट्रिक जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी और न ही किसी प्रकार का कोई दस्तावेज लिया जाएगा। इसे पूरी तरह से स्वघोषित रखा जाएगा।

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 (क्रमांकित) 2004 का अधिनियम 6 के तहत केन्द्र सरकार भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय पंजी तैयार करबा सकती है ।1955 का नागरिकता अधिनियम भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य पंजीकरण और उसे राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने का प्रावधान करता है। 2003 के नागरिकता नियम, 1955 के नागरिकता अधिनियम के तहत बनाए गए, राष्ट्रीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की तैयारी का तरीका बताते हैं। एनआरसी में अवैध अप्रवासियों की पहचान करने की बात कही गई है, चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या धर्म के लोग हों । एनआरसी बहरहाल सिर्फ असम में लागू है जबकि सीएए देशभर में लागू होगा।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

सोमवार, 25 नवंबर 2019

व्रह्मांड और मैं


व्रह्मांड और  मैं



वैसे तो यह दुनिया रहस्यों से भरा हुआ है,लेकिन मनुष्य स्वयं रहस्यों में भी महान रहस्य है । यह प्रश्न हमारे लिए नया नहीं है । यह बात भी सही है कि अपने-अपने तरीके से लोगों ने इसकी व्याख्या करने की कोशिश की है। लेकीन अभी तक कोई भी नहीं कह सकता है कि इस विषय पर  अमुक व्याख्या सही है या किसी खास व्यक्ति कहना मानने योग्य नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि सभी लोग अंधकार में ही इस सबाल का जबाब ढूंरने का प्रयत्न कर रहे हैं । बड़े-बड़े विद्वान,ज्ञानी-ध्यानी जीवन के रहस्यों को अपने तरीका से सुलझाने में लगे रहे । किसी ने कहा-

“आत्मा अमर है ।”

किसी ने कहा- “शरीर ही सब कुछ है । शरीर नष्ट हुआ तो सब नष्ट हो जाता है । फिर इसके फिर से आने का सबाल ही कहाँ पैदा होता है?”

गलत कौन है,सही कौन है यह व्याख्या करना उतना ही कठिन है जितना कि यह प्रश्न स्वयं है । सच जो भी हो परंतु इतना तो तय है कि हम जिसे जीवन भर देखते रहते हैं,जिस से हमरा जीवन भर जुड़ाव रहता है और जसके द्वारा हमराी इस दुनिया में पहचान है वह हमारा शरीर ही है और वही मृत्यु के बात समाप्त हो जाता है । उस में से निकलकर आत्मा बची रह जाती है और हमारा असली आस्तित्व आत्मा में ही स्थापित है ,इस बात को प्रमाणित करना हमारे-आप के वश में नहीं लगता है ।

सत्य जो भी हो, परंतु यह बात तो तय है कि आजतक कोई भी एकबार इस दुनिया से जाने के बाद लौटकर नहीं आया जिस से पता चलता कि मृत्यु के बाद वह किस हालात में है? क्या उसे मृत्यु से पहले की बातें अभी भी याद हैं? क्या वह अपने निकट संबंधियों के लिए अभी भी चिंता करता है? क्या उसे जीवने के दौरान किए गए अच्छे या बुरे कामों का फल प्राप्त हुआ या हो रहा है ? ऐस आजतक कुछ भी नहीं हुआ । सब कुछ महज कल्पनाओं पर आधारित लगता है । यह करोगे तो वस होगा या अमुक आदमी को उसके बुरे कर्मों का फल मिल रहा है । संसार में जो भी जन्म लिया है ,वह एकदिन मर जाता है । इस दौरान वह स्वभाव और परिस्थिति के वशीभूत होकर नाना प्रकार के कार्यों में लगा रहता है । पर अंतिम परिणाम यही होता है कि वह सबकुछ छोड़कर चला जाता है । कुछभी साथ नहीं ले जाता है । आया है सो जाएगा,राजा रंक फकीर ।

इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि मरने के बाद आप का क्या होता है? आप फिर से कहीं जन्म लेते हैं या सब कुछ तभी समाप्त हो जाता है जब आप इस शरीर को छोड़ते हैं । जो सद्यः दिख रहा है,जिसे हम नित्य प्रति महसूस करते हैं ,वह है हमरा कर्म । हम जैसा करते हैं,वैसा भोगने के लिए विवश हैं । कोई भी इस नियम का अपवाद नहीं है । हो भी नहीं सकता है । देर -सवेर सबको जीवन के अकाट्य सत्य को मानना पड़ता है,समझना पड़ता है ।

अभी तक विज्ञान भी ठीक से नहीं समझ पाया है कि आखिर यह व्रह्मांड कब बना,कैसे बना? इसका फैलाव कहाँ तक हैं? कभी-कभी छिटपुट जानकारी वैज्ञानिक देते रहते हैं जिसके अनुसार कभी हजारो-लाखो मील दूर कोई ग्रह-नक्षत्र के बारे में जानकारी होने की खबर होती है । लेकिन सच कहा जाए तो अभी भी इस व्रह्माण्ड के बारे में सही जानकारी सायद ही किसी के पास हो? सभी अंधेरे में ही हाथ टटोलते नजर आ रहै हैं । पर जो जानकारी वैज्ञानिक तरीकों से मिल चुकी है उसके अनुसार भी कम चौकाने वाली बात नहीं है । लाखों-कड़ोरो तारा मंडल व्रह्माण्ड में यत्र-तत्र फैले हुए हैं । इतने बड़े व्ह्माण्ड के एक बहुत ही छोटे हिस्से में हमारी पृथ्वी है । हम वहाँ एक बहुत ही सीमित भाग में रहकर  सब कुछ जानने का अहं पालते रहते हैं । यह भ्रम के सिवा कुछ भी नहीं है । इस अनंत संसार में हमरा जीवन सागर के एक बूंद के तरह है। फिर व्यक्ति के अहं का क्या औचित्य है? व्रह्मांड के अनंतता को स्वीकार कर ही हम महानता को प्राप्त कर सकते हैं ।


रविवार, 24 नवंबर 2019

डाइन


डाइन



हमसभ नेनेसँ डाइनक बारेमे सुनैत अएलहुँ अछि । डाइनिसँ बँचि कए रही,ओकर हाथसँ किछु नहि खाइ,ओकर नजरिसँ पराके रही ,नहि तँ गेल घर छी । कखन प्राण लए लेत तकर हिसाब नहि। हालत तँ ततेक खराप रहेक जे कोनो कारणसँ किओ दुखित भए गेल,घरमे चोरी भए गेल, वा किओ मरि-हरि गेल तँ सभक कारण कोनो-ने-कोनो डाइनि वा एहने किछुकेँ मानल जाइत छल । समाधान छलाह भगता,तांत्रिक,ओझा-गुनी  । समाजमे व्याप्त अशिक्षा आ अज्ञनताक कारणेँ एहि तरहक बातसभक खूब बरक्कति होइत छल । जँ ककरो घरमे चोरी भए गेल तँ तकरो समाधान ओझा-गुनी करैत छलाह । चटिबाहसँ बट्टा चलाओल जाइत छल । मंत्रक प्रभाव तेहन सटीक आ कड़गर होइत छल जे ओ जेमहर-जेमहर चोर गेल रहैत छल ताहि बाटे घुमए लगैत छल आ अंतमे चोरकेँ घरमे वा ओकरे लग-पासमे पहुँचि जाइत छल जाहिसँ चोरक बारेमे स्पष्ट अनुमान लोक लगा लैत छलाह । कहबाक जरूरी नहि बुझाइत अछि जे एहन काजसभक परिणाम कै बेर बहुत घातक होइत छल । कैटा निर्दोष लोक समाजमे अपमानित भए जिबाक हेतु विवश होइत छलाह ।

सामान्यतः ई देखल जाइत अछि जे निकट संबंधीमे आपसी कटुता बढ़ि गेलाक बाद कोनो स्त्रीक समगे तरह-तरहक खिस्सासभ जोड़ि देल जाइत अछि  । जेना कि ओ तँ हकल डाइन छैक , राति कए गाछ हकैत छैक , ओकरा तँ हम अष्टमी रातिमे नंगटे नचैत देखलिऐक । कालक्रमे ई सभ बात ततेक फैल जाइत अछि जे ओहि महिलाक लग-पास जेबासँ लोक डराइत अछि । ओकर देल पानि नहि पीबए चाहैत अछि । ओकरा हाथसँ भोजन करबाक तँ प्रश्ने नहि उठैत अछि । एहिसभक कारणें ओ महिला समाजमे एसगरि भए बहुत रास प्रतारणा सहैत रहैत छथि ।

कैठाम देखल जाइत अछि जे दियादी झगड़ाक बाद कोनो महिलाकेँ डाइन घोषित कए देल जाइत अछि । किछु षड़यंत्र कए एहन दृष्य बना देल जाइत अछि जे लोकसभ भ्रमित भए जाइत छथि आ तथाकथित डाइनसँ फटकी रहए लगैत छथि । गाम-घरमे लोकसभ एहन  महिलाक ओहिठआम नोत खेबासँ बचैत रहैत छथि आ ओकरा सेहो नोत नहि दैथ छथि ।  आखिर एना किएक कएल जाइत अछि? जबाब भेटत-अहाँ बाहर रहैत छी । गामक लोकक छिज्जा कीजाने गेलिऐक ? फलनमाक”घरबाली तँ रातिभरि श्मशानमे बैसल रहैत छैक । मुर्दासभक संगे मंत्र सिद्ध करैत रहैत छैक । नहि विश्वास होअए तँ रातिमे हमरासंगे चुपचाप चलब । जखन अपने आँखिसँ देखि लेबैक तँ विश्वास भए जाएत ।

सबाल अछि जे आखिर एहिसभ बातमे कतेक सत्यता थिक आ जँ से नहि अछि तँ एना किएक होइत अछि? हमरा हिसाबसँ तँ एहिसब बातमे कोनो सत्यता नहि अछि । कै बेर हम स्वयं अन्हरोखे एहन स्थानसभ पर जाइत रही जतए लोक एहन संभावना कहैत रहैत छल । मुदा हमरा कहिओ किछु नहि अभरल । ने कोनो प्रकारक क्षति भेल। तेँ एहि तरह गप्पसभ मात्र दुष्टताक अतिरिक्त किछु नहि अछि । लोक अपन दियादी औल चुकता करबाक हेतु एहि तरहक दुष्प्रचार करैत अछि । दुर्भाग्यक बात थिक जे मूलतः अज्ञानतावश एहि तरहक दुष्प्रचारकेँ जन समर्थन सेहो भेटि जाइत अछि । रहल बात ई जे आखिर लोक एना किएक करैत छथि? तकर की कहल जाए? मुदा एतबा तँ निश्चय जे आपसी दुश्मनी वा इर्ष्या-द्वेषवश एहन घटनासभ होइत अछि आ अज्ञनतावश किंवा अंधविश्वासक वशीभूत भए लोकसभ एकरा सही मानि लैत छथि ।

निश्चित रूपसँ समाजमे व्यप्त अशिक्षा आ अंधविश्वासेक परिणाम थिक जे एखनो लोकसभ डाइन वा एहि तरहक वस्तुसभक मान्यता दैत छथि । ततबे नहि ओहि चलते कैटा लोकक जिनगी बरबाद भए जाइत अछि । कै बेर तंत्र-मंत्रक चक्करमे पड़ि कए निर्दोषक नेनासभक वलप्रदान धरि दए देल जाइत अछि । एहिसँ पैघ अन्याय की भए सकैत अछि? अस्तु,ई जरूरी अछि जे समाजमे एहि तरहक कुवृतिक प्रति लोककेँ सतर्क कएल जाए जाहिसँ निर्दोष व्यक्तिक जीवन आ प्रतिष्ठाक रक्षा कएल जा सकए ।

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

जगले रहब यौ!


जगले रहब यौ!



हमसभ जखन नेना रही तँ परीक्षाक समयमे कै बेर बहुत राति धरि जगले रही । ओसारापर लालटेनक मद्धिम प्रकाशमे  औंघाइत-पौंघाइत पढ़ैत रहैत छलहुँ । कहि नहि एतेक नीन्न कतएसँ अबैक । एहि संघर्षक बीचमे एकाएक ध्यान तोड़ैत छल एकटा स्वरवद्ध कड़क आवाज-"जगले रहबै यौ । से कहैत -कहैत गामक चौकीदार आगा बढ़ि जाइत । ओकर आवाज तँ फटकिएसँ अएनाइ शुरु भए जाइत छल। सड़केपरसँ ओकर  जागरण मंत्र कानमे पड़नाइ शुरु भए जाइत जकर तीव्रता क्रमशः बढ़िते रहैत । हमरा घर लग अबैत-अबैत ओ आबाज आओर जोर पकड़ि लैत । एहि तरहें चिकरैत-भोकरैत ओ सौंसे गाम घुमि जैतथि ।  अन्हरिआ रातिमे तँ ई कनी बेसिए होइत छल ।  गाम-घरमे चोरी नहि होइक .तेँ एहि तरहक व्यवस्था कएल गेल छल ।

चौकीदारसभ सरकारी महकमासँ जुड़ल तँ रहैत छलाह,थानेदारक हुकुम बजबैत छलाह मुदा हुनका सरकाी सेवकक सभटा सुविधा नहि भेटैत छलनि ने ओ नियमित सरकारी कर्मचारी मानल जाइत छलाह । हाथमे खूब नोकगर भाला ,देहमे हरिअरका पट्टी पहिरने जखन चौकीदार कोनो मामिलाक संदर्भमे थाना बजाओल जाइत छलाह तँ निश्चय हुनको होइत रहल हेतनि जे ओ किछु छथि । कै बेर थानाक पुलिस आबि कए हुनका अपनासंग कए लेथि । गामे-गाम पुलिसक संगे घुमथि किंवा कोनो मामिलाक तहकीकात करबामे सहयोग करथि मुदा ताहि एबजमे हुनका गारि-फज्जतिक अतिरिक्त किछु भेटैत रहल हेतनि तकर कोनो उमीद नहि बुझाइत अछि । चौकीदारक सामान्य कर्तव्यक निष्पादन तँ ओ करिते छलाह ,तकर अतिरिक्त ओ थानाक एकटा स्थानीय जासूस सेहो छलाह । हुनकासँ अपेक्षा कएल जाइत छल जे हुनकर लग-पासमे भए रहल घटनासभक जानकारी थानेदारकेँ देथिन । एहिसभ काज करबाक एबजमे हुनका दस वा पन्द्रह टाका महिना थानाक तरफसँ भेटैत छल । एहि तरहैं कै ठाम तँ कै पुस्त चौकीदारी करिते बीत जाइत छलनि ।

चौकीदार जखन गाममे पहरा दैत छलाह तँ ककरो घर लग अएलाक बाद हुनकर नाम लए कै बेर आबाज दितथि जाहिसँ ओ व्यक्ति जँ सुति रहल छथि तँ हुनकर उपस्थितिकेँ संज्ञान लेथि । कै गोटे तँ खखसि कए तकर प्रतिउत्तर दैतो छलाह । ओहिमे हमर एकटा काकाजीक नाम प्रसंगवस मोन पड़ि जाइत अछि । ओ तँ रातिमे सुतलोमे ढहकैत रहैत छलाह जाहिसँ लग-पासक लोककेँ लगैत छलैक जेना ओ जगले छथि । परीक्षासभक तैयारीक क्रममे हम कै बेर बहुत  देर रातिधरि जागल रहैत छलहुँ । हमरा हुनकर आबाज सुनिकए लागए जेना ओ जगले छथि मुदा बात से रहैक नहि । ओ तँ सुतले-सुतल ई काज करैत छलाह । जे जोइक मुदा चोरसभकेँ ओ आबाज सुनि कए जरूर परेसानी होइत रहल हेतैक ।

सालक साल बीति गेल मुदा चौकीदासभक स्थितिमे कोनो सुधार नहि भेल । हँ, एतबा जरूर भेल जे सहरीकरणक बाद गामसँ भागि कए लोकसभ सहरमे आबि गेल आ जकरा कोनो काज नहि भेटल से सभ चाहे ओ कतबो पढ़ल होथि वा मूर्ख होथि,चौकीदार बनि गेलाह । सहरमे चौकीदारक माने भेल सेक्युरिटीगार्ड । रंग-विरंगक परिधान पहिरने हाथमे डंडा लेने कोनो पैघ मकानक गेटपर बारह-बारह घंटा निरंतर ठाढ़ रहए बला किओ आओर नहि चौकीदारे भए सकैत छथि ।  सोचल जा सकैत अछि जे जे आदमी बारह घंटा निरंतर ठाढ़ रहतैक ओ तँअपन जानबँचा लिअए सएह बहुत ,ओ अहाँक रक्षा की करताह? चाहिओ कए नहि कए सकैत छथि ,कारण एक तँ देहमे कतहु दम बाँचल नहि रहि जाइत छनि,दोसर हुनकासभक हाथमे तँ एकटा लाठिओ नहि रहैत छनि । कहबी छैक जे विभुक्षितः किम् न करोति पापम्। तेँ कै बेर सहरी चौकीदार स्वयं चोरी,डकैती वा एहने कोनो आओर जघन्य अपराध करैत पकड़ल जाइत छथि ? तरह-तरहसँ एहन व्यक्तिकेँ यातना देल जाइत अछि। मुदा साइते किओ सोचैत हेताह जे आखिर एना भेलैक किएक?

गामक चौकीदारसभ तँ कम सँ कम भाला लए कए चलैत छल, अपन घरमे रहैत छल आ जे किछु घरक बनल भोजन करैत छलाह मुदा सहरमे  तँ हुनका लोकनिक भगवाने मालिक । ने खेबाक ठेकान ने रहबाक, ताहिपरसँ बारह-बारह घंटाक ड्युटी आ पगार कतेक ,बहुत तँ दस हजार । कोनो छुट्टी नहि । जँ मोन खराप भेल तँ दरमाहा कटत । बेसी दिन छुट्टी रहब तँ नौकरिओ खतम भए जाएत । कहक माने जे हुनकर जिनगी भगवानेक भरोसे चलैत अछि । एहन हालतमे ओ अनकर की रक्षा करताह? ओ तँ अपने रक्षा कए लेथि तँ बड़का बात ।

किछु समयपूर्व भेल देशक लोकसभा चुनावमे चौकीदारक खूब चर्चा भेल । सही भेल,गलत भेल ,जे भेल मुदा सौंसे देस कोनो-ने-कोनो रुपमे चौकीदार बनि जेबाक घोषणा कए देलक । सोचल जा सकैत अछि जे भारतक लोकक चेतनामे चौकीदार कतेक गहींर धरि धसल अछि । समाजक एतेक महत्वपूर्ण अंग जकर काजे सभक रक्षा करब थिक उपेक्षित रहए से कतहु सँ उचित नहि लगैत अछि । मुदा सएह भए रहल अछि । जरुरी अछि जे  सरकारक नीति निर्माता लोकनि चौकीदारक सेवाक सही मुल्यांकन करथि आ ओकरासभक पगार आ अन्य सुविधा कमसँ कम एतेक तँ हेबे करैक जाहिसँ ओहोसभ अपना एहि देसक सम्मानित नागरिक हेबाक अनुभव करथि । से जँ हेतेक तँ ओकर फएदा सभकेँ हेतैक । इसकूलमे पढ़निहार नेना सुरक्षित रहत,ओकर अपहरण नहि भए सकतैक,गाम-घरमे रहनिहार किसानसभ अन्न-पानि सुरक्षित रहतैक आ सुरक्षित रहताह सहरमे रहनिहार श्रीमान लोकनि जिनकर घरक आगामे  एकटा सशक्त व्यक्ति हुनकर सुरक्षा करत ने कि एकटा मजबूर,विमार आ शक्तहीन व्यक्ति जे अपने लेल सदरिकाल झकैत रहैत अछि ।

उमीद पर दुनिआ कायम छैक। तें हमरा लोकनि आशा करी जे एकदिन चौकीदारो सभक दिन फिरतैक। देशमे बहि रहल विकासक बिहारि हुनको दरबाजा धरि पहुँचत । हुनको धीया-पुता आधुनिक शिक्षा प्राप्त कए अपन जीवनमे सकारात्मक परिवर्तन आनि सकताह आ पुस्तक-पुस्त भाला लेने हकासल-पियासल गामक चौकीदार करैत व्यक्ति बीतल बात भए जाएत ।






शनिवार, 17 अगस्त 2019

स्वास्थ्य का महत्व



प्रकृति आश्चर्यों से भरा हुआ है । उनमें एक हमारा-आपका जीवन भी है । छोटे से छोटे और बड़े से बड़े प्राणियों में जीवन के सारे तत्व प्रकृति ने भरे हैं । एक छोटी सी चिटी भी ,पता नहीं कैसे मीठे वस्तुओं की उपस्थिति को तार जाती है । देखते ही देखते ऐसी वस्तुओं के इर्द-गिर्द चीटियां भर जाती हैं । बरसात के मौसम में सैकड़ो चीटियां पंक्तिवद्ध होकर चलती रहती हैं और कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हैं । कहने का तात्पर्य  है कि ईश्वर ने तमाम जीव जन्तुओं को जीने लायक क्षमता दी है । उसके शरीर में वे सारे अवयव दिए  हैं जिसकी उसे आवश्यकता है । जैसे जंगली हिंसक जानवरों को बड़े-बड़े दाँत दिए हैं ताकि शिकार के बाद वे उन्हें खा सकें । अगर हमें कुछ नहीं दिया है तो इसका मतलब है कि वह हमारे लिए जरूरी है ही नहीं ।

आप कितने भी विद्वान हों,कतने भी गुणी हों लेकिन यदि आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते हैं । किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी हे कि आदमी  में संघर्ष की क्षमता हो । वह तो तभी होगा जब वह कठिन से कठिन परिश्रम करने में सक्षम हो । विना परिश्रम के कुछ भी नहीं पाया जा सकता है । एक-से-एक पद पर पहुँच कर भी लोग स्वास्थ्य के अभाव में असफल हो जाते हैं । कई प्रतिभाशाली लोग अल्पजीवी हुए जिससे लोग उनके गुणों से उतना लाभ नहीं उठा सके जितना वे कर सकते थे । इसीलिए हमें स्वास्थ्य पर शुरु से ही ध्यान देना चाहिए । कहते हैं कि शत्रु और विमारी को कभी हल्के नहीं लेना चाहिए ।

हम वैज्ञानिक युग में रह रहे हैं । एक समय था जब लोग मामुली विमारी से मर जाते थे । इलाज के नाम पर संयम और पथ्य के अलावा कुछ भी नहीं था । बुखार हो जाने पर रोगी का खाना बंद करा दिया जाता था । तरह-तरह के परहेजों से उसे गुजरना पड़ता था । कई बार तो सहते-सहते रोगी की आंत उलझ जाती थी जिस से उनकी मौत भी हो जाती थी । एसी एक घटना मैंने स्वयं देखी है । एक चौदह साल के बच्चे को बुखार में सहते-सहते उसकी आंते उलझ गई और बड़े मुश्किल से शल्यकृया द्वारा उसकी जान बचाई जा सकी । परंतु हालात अब बदल गए हैं ।  एक से एक बिमारियों का इलाज संभव हो गया है । लोग कैंसर जैसे विमारी से भी बंच जाते हैं । लेकिन इसका दुखद पहलू भी है । एक तो इलाज काफी महगा हो गया है , दूसरा नित्य नए-नए विमारियां पैदा होती जा रही हैं जिसका इलाज विज्ञान के पास है ही नहीं । असल में हम चाहे क्रोटि उपाय कर लें,एक-न-एक दिन हमें इस दुनियां से जाना तो है ही । यह प्रकृति का नियम है । आया है सो जाएगा,राजा रंक फकीर । इसलिए हमें प्रकृति के इस साश्वत सत्य को भी स्वीकार करना ही होगा । लेकिन इसका मतलब नहीं होना चाहिए कि हम स्वस्थ रहने का प्रयत्न ही छोड़ दें । हम जबतक जीएं, स्वस्थ जीएं ,प्रशन्न रहें और कुछ ऐसा कर जाएं कि भावी पीढ़ियां हमें याद करें ।

चाहे आप कितना भी बड़ा पद प्राप्त कर लें लेकिन अगर आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो आप अपनी उपलव्धियों का सुख  नहीं उठा सकते हैं । ऐसे कई उदाहरण देखने को मिलता है जब कई महत्वपूर्ण पद से स्वास्थ्य कारणों से लोगों को इस्तिफा देना पड़ा । इसलिए हमें निरंतर स्वास्थ्य के प्रति सचेष्ट रहना चाहिए। परंतु यह संभव हो  कैसे ?

हर व्यक्ति का प्रकृति, स्वभाव एवम् रुचि भिन्न होता है । साथ ही सब अनवांशिक रूप से भी एक-दूसरे  से कई मामले में भिन्न-भिन्न होते है । इसीलिए सबों के लिए कोई एक पैमाना नहीं नियत किया जा सकता है । लेकिन इतना तय है कि सब को अपने परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार स्वास्थ्य के लिए कुछ जरूरी उपाय करना चाहिए ताकि वे विमारियों के चंगुल में न पड़े और अगर विमारी हो ही गई है तो उस से यथाशीघ्र निजात पा लें ।

भारतीय जीवन पद्धति में विमारी से वचाव के लिए खान-पान और दिनचर्या पर बहुत जोर दिया गया हे । इस बात का पूरा ध्यान रखा गया हे कि विमारी हो ही नहीं । इसके लिए नियमित आहार-विहार,स्वस्थ आदतें एवम् सात्विक चिंतन को आधार बनाया गया है । नियमित प्राणायाम और योगासन से शरीर को उर्जामय बनाने का प्रत्न किया जाता हे । शाकाहारी भोजन पर  जोर दिया जाता हे । इस बात का बहुत ही महत्व दिया जाता हे कि लोग प्रकृति से जुड़ें और  नैसर्गिक सुख-सुविधाओं का लाभ उठाएं ।

अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति में तरह-तरह के रासायनिक उत्पादों से दवाइओं का निर्माण किया गया है जिसके उचित मात्रा में प्रयोग कर विमारी को ठीक करने का प्यत्न किया जाता है । कई बार विमारी ठीक तो हो जाती है लेकिन कई नये समस्याओं को जन्म दे जाती है । उदाहरणस्वरुप, अगर आप एनटीबायोटिक लेते हैं तो साथ-सात पेट खराप हो जाने का और भूख नहीं लगने की परेशानी हो जाती है । इसी तरह लगातार दर्द निवारक दवाइओं का प्रयोग करते रहने से किडनी जैसा महत्वपूर्ण अंग खराप हो जाता है । कहने का मतलब है कि एलोपैथी चिकित्सा पद्धति अपने-आप में पूर्ण नहीं है । एक समस्या को ठीक करते-करते कई और नई समस्या पैदा कर देती है । शल्यकृया एलोपैथी चिकित्सा पद्धति  का एक महत्वपूर्ण देन है । इस से कई बार गंभीर विमारयों से मुक्ति मिल जाती है । अंगप्रत्यार्पण द्वारा कई बार बेकार हुए अंगों को बदल दिया जाता है और अवश्यंभावी मृत्यु को सालों सफलतापूर्वक टाल दिया जाता है ।

असल में प्रकृति से कटते रहना और और नित्य नए व्यसनों का आदी होना हम पर बहुत भारी पड़ा है। प्रकृति में कोई भी जीव -जन्तु बीड़ी-सिगरेट पीने का आदी नहीं होता है । कोई भी जनवार शराब नहीं पीता है। स्वभाविक रूप से जो कुछ उनके स्वभाव के अनुसार उपलव्ध है उसी से जीवन चलाते हैं । कई पशु तो पूरी तरह शाकाहारी होते हैं , वहीं कुछ मांसाहार पर ही निर्भर होते हैं । लेकिन एक हम हैं जो अपनी बुद्धि का दुरुयोग कर तरह-तरह की आदतों के शिकार हो जाते हैं । परिणामस्वरुप, हम नित्य नये-नये विमारियों का इलाज कराते फिरते हैं ।

मरना-जीना तो ईश्वर के हाथ है । यह भी सत्य है कि दीर्घायु होना कई बार दुखकर ही हो जाता है । कई ऐसी घटनाओं को देखना पड़ता है जिेस से अपार दुख होता हे । परंतु नियति के आगे हम विवश हो जाते हैं । लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जीवन ईश्वर का अनमोल उपहार है । हम इस दुनिया में बहुत कुछ देख सकते हैं,कर सकते हैं । इसलिए जरूरी है कि हम जब तक जीवित हैं यथासाध्य स्वस्थ रहने का प्रयत्न करें ताकि हमारा जीवन अधिक से अधिक अर्थपूर्ण हो सके ।