व्रह्मांड
और मैं
वैसे
तो यह दुनिया रहस्यों से भरा हुआ है,लेकिन
मनुष्य स्वयं रहस्यों में भी महान रहस्य है । यह प्रश्न हमारे लिए नया नहीं है ।
यह बात भी सही है कि अपने-अपने तरीके से लोगों ने इसकी व्याख्या करने की कोशिश की
है। लेकीन अभी तक कोई भी नहीं कह सकता है कि इस विषय पर अमुक व्याख्या सही है या किसी खास व्यक्ति कहना
मानने योग्य नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि सभी लोग अंधकार में ही इस सबाल का
जबाब ढूंरने का प्रयत्न कर रहे हैं । बड़े-बड़े विद्वान,ज्ञानी-ध्यानी
जीवन के रहस्यों को अपने तरीका से सुलझाने में लगे रहे । किसी ने कहा-
“आत्मा अमर
है ।”
किसी ने कहा- “शरीर ही सब कुछ है । शरीर नष्ट हुआ तो सब नष्ट हो जाता है । फिर इसके फिर
से आने का सबाल ही कहाँ पैदा होता है?”
गलत
कौन है,सही कौन है यह व्याख्या करना उतना ही कठिन है जितना कि यह प्रश्न स्वयं है
। सच जो भी हो परंतु इतना तो तय है कि हम जिसे जीवन भर देखते रहते हैं,जिस से हमरा जीवन भर जुड़ाव रहता है और जसके द्वारा हमराी इस दुनिया में
पहचान है वह हमारा शरीर ही है और वही मृत्यु के बात समाप्त हो जाता है । उस में से
निकलकर आत्मा बची रह जाती है और हमारा असली आस्तित्व आत्मा में ही स्थापित है ,इस बात को प्रमाणित करना हमारे-आप के वश में नहीं लगता है ।
सत्य
जो भी हो, परंतु यह बात तो तय है कि आजतक कोई भी एकबार इस दुनिया से जाने के बाद
लौटकर नहीं आया जिस से पता चलता कि मृत्यु के बाद वह किस हालात में है? क्या उसे मृत्यु से पहले की बातें अभी भी याद हैं? क्या
वह अपने निकट संबंधियों के लिए अभी भी चिंता करता है? क्या
उसे जीवने के दौरान किए गए अच्छे या बुरे कामों का फल प्राप्त हुआ या हो रहा है ?
ऐस आजतक कुछ भी नहीं हुआ । सब कुछ महज कल्पनाओं पर आधारित लगता है ।
यह करोगे तो वस होगा या अमुक आदमी को उसके बुरे कर्मों का फल मिल रहा है । संसार में
जो भी जन्म लिया है ,वह एकदिन मर जाता है । इस दौरान वह
स्वभाव और परिस्थिति के वशीभूत होकर नाना प्रकार के कार्यों में लगा रहता है । पर
अंतिम परिणाम यही होता है कि वह सबकुछ छोड़कर चला जाता है । कुछभी साथ नहीं ले
जाता है । आया है सो जाएगा,राजा रंक फकीर ।
इस
बात से क्या फर्क पड़ता है कि मरने के बाद आप का क्या होता है?
आप फिर से कहीं जन्म लेते हैं या सब कुछ तभी समाप्त हो जाता है जब
आप इस शरीर को छोड़ते हैं । जो सद्यः दिख रहा है,जिसे हम
नित्य प्रति महसूस करते हैं ,वह है हमरा कर्म । हम जैसा करते
हैं,वैसा भोगने के लिए विवश हैं । कोई भी इस नियम का अपवाद
नहीं है । हो भी नहीं सकता है । देर -सवेर सबको जीवन के अकाट्य सत्य को मानना
पड़ता है,समझना पड़ता है ।
अभी
तक विज्ञान भी ठीक से नहीं समझ पाया है कि आखिर यह व्रह्मांड कब बना,कैसे बना? इसका फैलाव कहाँ तक हैं? कभी-कभी छिटपुट जानकारी वैज्ञानिक देते रहते हैं जिसके अनुसार कभी
हजारो-लाखो मील दूर कोई ग्रह-नक्षत्र के बारे में जानकारी होने की खबर होती है ।
लेकिन सच कहा जाए तो अभी भी इस व्रह्माण्ड के बारे में सही जानकारी सायद ही किसी
के पास हो? सभी अंधेरे में ही हाथ टटोलते नजर आ रहै हैं । पर
जो जानकारी वैज्ञानिक तरीकों से मिल चुकी है उसके अनुसार भी कम चौकाने वाली बात
नहीं है । लाखों-कड़ोरो तारा मंडल व्रह्माण्ड में यत्र-तत्र फैले हुए हैं । इतने
बड़े व्ह्माण्ड के एक बहुत ही छोटे हिस्से में हमारी पृथ्वी है । हम वहाँ एक बहुत
ही सीमित भाग में रहकर सब कुछ जानने का
अहं पालते रहते हैं । यह भ्रम के सिवा कुछ भी नहीं है । इस अनंत संसार में हमरा
जीवन सागर के एक बूंद के तरह है।
फिर
व्यक्ति के अहं का क्या औचित्य है? व्रह्मांड
के अनंतता को स्वीकार कर ही हम महानता को प्राप्त कर सकते हैं ।
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