मंगलवार, 19 मई 2020

सत्यम् शिवम् सुंदरम्


सत्यम् शिवम् सुंदरम्



आज-कल

लोग बेचैन हैं

जिसे देखिए वही है अस्तव्यस्त ,

वैसे तो मुलाकात होती ही नहीं

पर सामने आ ही गए

तो बड़बड़ा उठेंगे-

क्या करें

उलझनों में फँसा हूँ

मरने की भी फुर्सत है नहीं ।

पर यह दौर-धूप

दे नहीं सका सुकून

और हम  चलते रह गए बेफजूल

एक-एक पैसे का हिसाब में मसगूल

आस-पास से कटते चले गए

पता भी नहीं चला

कि सामने वाला पड़ोसी

कब गुजर गया?

कब हमारे बाल उजले हो गए?

हम तो सुलझाने के प्रयास में

उलझते ही रह गए,

सब कुछ लगाकर दावपर

खुद हाशिए पर रह गए

और एक दिन हम  चल पड़े

खाली हाथ दुनिया छोड़कर

सब कुछ धरे ही रह गए ।

नहीं मिल सका विश्राम पल भर

सुख-शांति दुर्लभ रह गए

आखिर ऐसा हुआ क्यों ?

क्यों कि

हम आत्मकेन्द्रित रह गए

यदि दूसरों की

उपलव्धियों से सुखी होते

आस-पास निर्मित घरों से

होते वैसे ही प्रसन्न

जैसे थे अपने गृह प्रवेश के दिन ।

तो बात ही कुछ और होती ।

यह समग्र भावना

हमें पहुँचा सकती थी

स्वर्ग के द्वार तक,

परंतु हमने खुद ही कर दिया है पटाक्षेप

खुद को कर दिया है सीमित

 छोटे से दायरे में

और कहते फिर रहे  

कि क्या करूँ?

 मन लगता नहीं है

कैसे लगेगा?

जिन्हें हम अपना समझते रहे

वे पास रहे ही नहीं

और जो हैं वे तो

कभी अपने थे ही नहीं

पर क्या करिएगा?

यह जीवन है

जैसे-तैसे गुजर जाएगा

लेकिन वह खुशी,वह आनंद जो आप

को मिल सकती थी

उसे आपने खुद ही गवाँ दिया

इसलिए ही

अंत-अंत तक हम रह गए

अधूरे,असंतुष्ट और अतृप्त

क्योंकि

 सर्वस्व समर्पण के बिना

असंभव है शांति

और अशांत मन में

व्यर्थ है सुख की कामना

जरुरी है कि

हम खुद को करें

श्रिष्टि से एकलय

सबमें दिखे आत्मभाव

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

जीवन मंत्र हो

सर्वत्र सुख समृद्धि हो

कल्याण हो सबका यही अरमान हो ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

19.5.2020

mishrarn@gmail.com

सोमवार, 18 मई 2020

आल्हाबला


आल्हाबला





ओहि घटनाकेँ कमसँ कम ५५ वर्ष भेल होएत । हम मोसकिलसँ दस वर्षक रहल होएब । जतबे जोरसँ हम आल्हा सुनबाक प्रयास करी ततबे सतर्कतासँ हमर बाबूजी ओकर विरोध करितथि आ जँ पता लागि जानि जे हम ओतए गेल छी तँ तुरंत ओतए पहुँचि हमरा ओहिठामसँ लेने अबितथि । ओहि समयमे हुनकर ई सभ करबाक एकमात्र उद्येश्य रहनि जे हम पढ़ी-लिखी, आओर किछु नहि करी । मोनकेँ एमहर-ओमहर नहि लगाबी । मुदा आल्हाक प्रति हमर आकर्षण ततेक जबरदस्त छल जे हम कहुना-ने-कहुना ओतए जेबाक ब्योंत कइए ली । कैकबेर सफल रही,कैकबेर पकड़ा जाइ । मुदा तेँ आल्हा सुनबासँ बाज नहि आबी ।

असलमे ओहि समयमे गाम-घरमे मनोरंजनक साधन बहुत सीमित रहैक । आइ-काल्हि जकाँ टेलेवीजन,मोबाइल नहि रहैक । सीनेमा,रेडिओ नहि रहैक । तखन तँ मनुक्ख मनोरंजन सद्यः निर्माण करैत छल जाहिमे शारिरिक संलिप्तता बहुत बेसी रहैत छलैक । लोक  छोटो-छोटो बातसभमे मनोरंजनक जोगार कए लैत  छल । कोनो बड़का आयोजन वा बहुत रास खर्चक प्रयोजन नहि होइत छलैक । तेँ गाम-घरमे आल्हा गाएब,नटुआक नाच देखब ,वा रामलीला देखब बहुत लोकप्रिय मनोरंजन होइत छलैक । आमक मासमे लोक दू-तीन मास कलममे मचानपर बिता लैत छल । आमक रखबारीक संगहि पिकनिक करबाक आनंद सेहो होइत छलैक ।  हाटक दिनक कहिओ काल बीड़ी कंपनीक प्रचारक हेतु नटुआसभ फिल्मी गाना गाबि-गाबि लोककेँ आकर्षित करैत छल आ रहि-रहि कए बीड़ीक वर्षा कएल जाइत चल । एहि तरहें लोककेँ बीड़ी पीबाक अभ्यस्त कए ओकर बिक्री बढ़ाओल जाइत छल । एहने माहौलमे  तत्कालीन ग्रामीण समाजमे मनोरंजनक सस्ता आ सर्वसुलभ साधनमेसँ एकटा छल आल्हा सुनब ।

इसकूलसँ कैकबेर हमसभ कोनो बहाना बना कए पहिने छुट्टी लए लैत छलहुँ । एकतारासँ पैरे झटकारि कए चलैत जखन जमुआरीसँ आगा बढ़ी तँ कैकबेर ढोलपर पड़ैत थाप सुनाइत । पैर अपने-आप आओर फुर्तीसँ आगा बढ़ए लागैत छल । घर पहुँचि झोड़ा राखि चोट्टे पहुँचि जाइत छलहुँ । कतए? जतए आल्हा भए रहल होइत । गर्मी मासक गाम-घरक एकटा सहज मनोरंजन छल आल्हा । आल्हा गेनिहार नटकेँ बेसी तामझाम नहि होइत छलैक , मात्र एकटा ढोल । बेसीकाल असगरे ओ ढोलकेँ पीटि-पीटि परोपट्टाक लोककेँ जमा कए लैत छल । एकाध बेर ओकरा संगे एकटा सहायक सेह देखिऐक । मुदा कमे काल ।

ढोलक थापक प्रतिध्वनि सुनि ई अंदाज लागि जाइत छल जे कतए जेबाक अछि । थोड़बे कालमे हम ओहि दलानपर पहुँचि जाइत छलहुँ। ओहिठामक माहौले फराक रहैत छल । सौंसे दलान लोक भरल रहैत छल । सभक मोनमे प्रसन्नता भरल देखाइत । आल्हाबला ओहिठामक हीरो होइत छल । हमरा सन-सन नेनासभक हेतु तँ ओ बहुत आदरणीय व्यक्त छल । कारण जकरे देखितिऐक ओएह आल्हाबलाक गुनगान करैत भेटैत । आखिर नेना तँ नेने भेल ।

अल्हा गाबए बला सामान्यतः अधबएसु होइत छल । कुल जमापूँजी एकटा ढोल । सामान्यतः असगरे गबैत छल । हँ जखन ओ तावमे अबैत छल आ जोशमे ढोलपर थापपर थाप पीटैत छल तँ ओकर छवि देखएबला रहैत छल । लगैत छल जेना हनुमानजीक साक्षात अवतार होअए । जखन जोशीला भाव प्रकट करैत ओ सुर-तान धरैत छल तँ लागए जे ओ ढोलपर आब छरपत तँ ताब । कैकबेर एकटा ठेहुन ढोलपर राखि ओ भावपुर्ण मुद्रामे गबैत-गबैत मूरीकेँ जोर-जोरसँ पटकैत छल । कानपर एकटा हाथ राखि सभक ध्यान आकर्षित करैत  छल-बाबू सुनो हमारी बात,एकदिन की नहीं लड़ाई गाबत बिति जाइ बरहमास.... ओकर संगीतमय अभिनयक मनमोहक कथोपथनसँ समस्त श्रोतागण मंत्रमुग्ध रहैत छलाह । पूरा दनान मिस परैत रहैत छल । केओ टससँ मस नहि होइत । बाह रे कलाकार! साँझ होबएसँ पहिने आल्हा समाप्त होइत छल । कैकबेर अड़ेर चौकपर तकरबाद ओ देखाइत । नेनासभ बहुत आदरभावसँ ओकरा देखैत आ ओकरासँ गप्प-सप्प करबाक चेष्टा करैत छल ।

आल्हा सुनबाक हेतु उपस्थित लोकसभ  एकदम बकोध्यान लगओने आल्हाबलाक संगे भावात्मक रूपसँ एकाकार भए जाइत छलाह । लगबे नहि करैत जे एतेक लोक ओतए जमा छथि । एहि तरहेम दससँ पनरह दिन धरि ई कार्यक्रम चलैत । अंतिमदिनक कार्यक्रममे अगिला कार्यक्रमक सूचना देल जाइत  जे काल्हिसँ फलना बाबूक ओहिठाम आल्हाक कार्यक्रम होएत । लोकसभ अपना ओहिठाम आल्हा करेबाक हेतु लाइन लगओने रहैत छलाह । हमसभ नेनामे सोचिऐक जे आल्हाबला कतेक योग्य आदमी अछि । सभटा आल्हा ओकरा कंठाग्र रहैक । केकबेर सुनिऐक जे ब्रह्माक लड़ाई जल्दी नहि गाओल जाइत छैक । ओकरा गेलासँ गाम-घरमे झगड़ाक संभावना रहैत छैक ,आदि,आदि । कहि नहि ई कतेक सत्य रहैक । जे रहैक,से रहैक मुदा एतबा तँ निश्चित सही रहैक जे आल्हा गायन ओहि समयमे गाम-घरक लोकसभक हेतु मनोरंजनक प्रमुख साधन छल । गर्मीक मौसममे दुपहरिआ काटबाक ई बढ़ियां जोगार छल । संगहि आल्हाबलाकेँ गुजर सेहो भए जाइत छलैक ।

बादमे कैक साल धरि ओ आल्हाबला हमर गाम नहि आएल। पता लागल जे ओ अपन डेराक लगीचेमे रहनिहार कोनो महिलाक संगे नेपाल दिस भागि गेल । की भेल,नहि भेल मुदा फेर कहिओ ओकर ढोलक थाप हमरा नहि सनाएल । हमहु पढ़बाक हेतु गामसँ बाहर चलि गेलहुँ । मुदा गाममे दोसर,तेसर आल्हाबला अबिते रहल आ आल्हा होइते रहल ।

शनिवार, 16 मई 2020

आत्मभय


आत्मभय

जरूरी नही कि

 हम जो देखते हैं वह वैसा ही हो,

हमारा अन्तर्मन घटनाओं का

कर देता है रुपांतरण ,

अपने हिसाब से

और अंततः सामने होता है

हमारे ही पूर्वाग्रहों का प्रतिफल।

कई बार छाया को

हम मान लेते हैं असलियत

और हम अपने मन में

पहले से ही व्याप्त भय के वशीभूत

करते हैं पलायन सत्य से,स्वयं से

क्यों कि सत्य स्वीकार नहीं सकते

और असत्य का कोई आस्तित्व होता ही नहीं

इसलिए

जबतक हम समझ पाते हैं

सत्य की मर्यादा और असत्य की व्यर्थता

तबतक समीप होता है जीवन का अंत

चारों तरफ होता है अज्ञानता का सम्राज्य

परंतु अहंकारवश,

हम ढूंढ़ते रह जाते हैं

उसी को

जो है आस्तित्वहीन ,

फिर कहते हैं 

त्राहि माम्,त्राहि माम् !

कहीं भी नहीं रह जाता है कुछ भी अवशेष

अंदर से बाहर तक विस्तृत

अनंत शून्य में

हम रह जाते है अकेले,विल्कुल अकेले

अपने ही कृत्यों से भयभीत ।

दिग्भ्रमित

असत्य को मान लेते हैं सत्य

फिर पूछते हैं-

मै कौन हू?”

और तबतक बहुत देर हो  जाती है

अब तो हमारी छाया भी

हमारा साथ नहीं देती है।

असल में भय का कारण कोई और नहीं

हम स्वयं हैं।

आज हम जो भी हैं

सब हमारे ही  चिंतन के प्रतिफल हैं,

हमारे ही पूर्वकृत कर्म

हमारा भविष्य बन है उपस्थित।

जिनका कोई आस्तित्व भी नहीं

कभी था ही नहीं,

हम उसी में आसक्त

और आत्मभय से त्रस्त

ढूंढ़ते रह जाते हैं,

अपनी अस्मिता,अपनी पहचान

और जीवन का अर्थ।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

१६.५.२०२०

mishrarn@gmail.com


मंगलवार, 12 मई 2020

माया और मुक्ति


माया और मुक्ति



सभी जानते हैं कि

जीवन क्षणभंगुर है

कि इसका नाश होना ही है

कि मृत्यु के उपरांत कुछ भी

साथ नहीं ले जाना है

सब कुछ यहीं छूट जाना है ।

लेकिन आश्चर्य है कि

सब कुछ जानकर भी

हम जीवन भर ,

कुछ और कुछ और के

चक्रव्युह में फँसे रह जाते हैं

और अंत में खाली हाथ चले जाते हैं ।

ऐसा क्यों है?

क्यों नहीं हम समय रहते समझ पाते हैं

इस सब की व्यर्थता

और रह जाते हैं

इसी में लिप्त आजीवन ।

यही है माया

जिसमें अनुरक्त

हम रह जाते हैं अनभिज्ञ

जीवन के सत्य से

काम,क्रोध,लोभ के वशीभूत

गढ़ लेते हैं चतुर्दिक

नर्क ही नर्क ।



धर्म के नाम पर करते हैं

नाना प्रकार के छल -प्रपंच

लोगों को ठगते हैं

कि यह करो,वह करो

मिलेगा स्वर्ग

जहाँ रहोगे सुखी और संपन्न

परंतु,

ऐसा कभी कुछ होता नहीं है

स्वर्ग की कामना

लिए हम चले जाते हैं

दूर,बहुत दूर

जहाँ से कोई लौटकर आया नहीं

 यह कहने कि

उसे स्वर्ग मिला या नहीं ।

अज्ञानतावश

हम सुन नहीं पाते है

आत्मा की आवाज

कि

मैं यहीं हूँ

व्याकुल मुक्ति के लिए ।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

१२.५.२०२०

mishrarn@gmail.com

सोमवार, 11 मई 2020

कोरोना संकट


कोरोना संकट



आज-कल विश्व कोरोना की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । पूरे दुनिया में एक साथ लाखों लोग कोरोना से संक्रमित हैं और लाखों लोग अपनी जान गमा चुके हैं । कुल मिलाकर सारी दुनिया कोरोना के आगे असहाय दिख रही है । इस विमारी का कोई निश्चित इलाज नहीं होने से वचाव ही एकमात्र समाधान लगता है । पर इस वैश्विक महामारी से वचाव भी इतना आसान दीखता नहीं है । क्यों कि अधिकांश संक्रमित लोगों में इसका  लक्षण होता ही नहीं है और लक्षण प्रकट होने से पहले ही वह अनगिनित लोगों को संक्रमित कर चुका होता है । अतएब सामाजिक दूरी बनाए रखना और अपने-अपने घरों में बंद रहना ही एकमात्र समाधान लगता है । यही कारण है कि आज लगभग पूरी दुनिया लाक डाउन की स्थिति में  है । लोग काम-काज छोड़कर जान बचाने के फिराक में अपने-अपने घरों में बंद हैं । स्थिति इतनी खराब है कि अगर सामने कोई व्यक्ति दिख जाता है तो मन में चिंता होने लगती है ।

कोरोना वायरस कैसे उतपन्न हुआ यह एक विवाद है । परंतु यह सभी मानते हैं कि सर्वप्रथम इसकी उत्पति चीन के ह्वुआन शहर में हुई । इसके बाद चीन के इस शहर के हजारों लोगों में इस वायरस का संक्रमण हो गया । देखते ही देखते यह इटली एवम् युरोप के अन्य देशों में तेजी से फैलने लगा । निश्चित रूप से अनुभव की कमी या तत्परता केअभाव में युरोप के देशों में यह विमारी बड़ी तेजी से फैल गया। इसके बाद जो भयावह स्थिति उतपन्न हुई वह सर्वविदित है । लाशों को ठिकाना लगाना मुश्किल हो गया । इलाज करने के लिए अस्पतालों में बेड की कमी हो गई । सुना तो यह भी जा रहा है कि इटली में बुजुर्ग लोगों को अस्पताल नहीं ले जाया जा सका और वे घर में पड़े-पड़े ही मर गए । इसके बाद अमेरिका सहित दुनिया के अन्य देशों में भी यह वायरस फैल गया । आज के दिन में अमेरिका में इस विमारी से मरने वालों की संख्या पचहत्तर हजार के आस-पास पहुँच गई है । शीघ्र ही यह संख्या एक लाख तक पहुँच सकती है ।

भारत में इस वायरस की उपस्थिति सब से पहले केरल में दर्ज हुई जहाँ चीन के ह्वान शहर से आए हुए भारतीय को कोरोना से संक्रमित पाया गया । इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता यह वायरस अपना पैर समुचे देश में फैल चुका है वह भी तब जब २४ मार्च से पूरे देश में लाक डाउन है । शुरु में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या एक से सौ तक पहुँचने में पैंतालिस दिन का समय लगा । परंतु अब तो नित्य हजारों में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में इजाफा हो रहा है ।

कोरोना से लड़ने के लिए दुनिया भर के लोगों ने पूरी ताकत झोंक दी है । पर कोरोना नियंत्रण में नहीं आ रहा है । नित्य हजारों लोग कोरोना से मर रहे हैं । मरने वालों में अधिकांश वृद्ध लोग हैं परंतु कम उम्र के लोग भी मर रहे है । मृत्यु का इतना दर्दनाक दृश्य कदाचित सायद ही किसी ने देखा होगा । कुछ अस्पतालों में  लाशों के साथ ही मरीजों का इलाज हो रहा है क्यों कि शवगृह भर चुका है और परिजन अपनों का लाश नहीं ले जा रहे हैं ।

सरकार पूरा प्रयास कर रही है कि इस महामारी के प्रसार को अपने देश में रोक दिया जाए । लोगों को कम से कम हानि हो । इसलिए ही अप्रैल महिने के चौवीस तारिख से ही पूर्ण लाक डाउन लागू है । सोचा जा सकता है कि एक सौ तीस कड़ोर के आवादी वाले इसदेश में लाक डाउन लागू करना कितना कठिन निर्णय रहा होगा । इसका अनुपालन करबाना तो और भी कठिन प्रयास सावित हुआ है। यह जानते हुए कि इस महामारी का कोइ सटीक इलाज नहीं है और जान बचाने का एकमात्र उपाय सामाजिक दूरी बनाए रखना है ,जहाँतक संभव हो घर से बाहर नहीं जाना है । वृद्ध,शिशु,विमार और गर्भिणी महिला को तो विल्कुल ही नहीं जाना है ,लोक वारंबार लाक डाउन का उल्लंघन करते नजर आए । चाहे दिल्ली का तबलीगी जमात में शामिल लोग हों या महानगरों से अपने पैतृक घर वापस जाने को आतुर प्रवासी मजदूर सबों ने लाक डाउन में अन्तर्निहित सामाजिक दूरी बनाए रखने के सिद्धांत का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करके इस महामारी को पूरे भारत में फैलने में अहम् योगदान दिया है । अभी चंद दिन पहले शराब के दिबानों ने शराब की बिक्री शुरु होते ही जो भीड़ इकठ्ठा किया है उसका घातक परिणाम भी हम सबको भोगना पड़ सकता है । कारण चाहे जो भी हो किंतु कुल मिलाकर लाक डाउन का जितना फायदा हमें हो सकता था वह हो नहीं पाया । प्राप्त जानकारी के अनुसार ,मरीजों के संख्या में अनवरत  वृद्धि हो रही है । अगर यही हाल रहा तो अनुमान लगाना कठिन है कि महिने दिन बाद हम कहाँ खड़े होंगे?अभी एम्स दिल्लीके निदेशक के हबाले से समाचार आया है कि जुन-जुलाई में संक्रमण पराकाष्ठा पर होगी । भगवान जाने हम किस हाल में होंगे । जाहिर है कि इन समाचारों ने जीवन में अनिश्चितता का माहौल भर दिया है । परंतु ज्यादा सोचने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला है । जो होना है सो होकर रहेगा । हम अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं । यह किसी को नहीं पता है कि आगे क्या होना है या हमें किस तरफ जाना है ।

लाक डाउन से असंगठित क्षेत्र मे काम करने वाले मजदूर एवम् दैनिक आधार पर काम करने वाले मजदूरों की कमर तोड़ दी है। लाखों के तादाद में ऐसे लोग एकाएक बेरोजगार हो गए । इन लोगों के पास कोई बचत नहीं होता है । ये रोज कमाने और रोक खाने वाले लोग हैं । काम  छूटते ही इन्हें लगा कि अब वे कहाँ जाएं । मकान का किराया,रोज का भोजन ,वच्चों का परवरिश सब असंभव लगने लगे । वे बेतहाशा जहाँ-तहाँ ,जैसे-तैसे भागने लगे । कोई उपाय ढूढ़ने लगे जिस से वे अपने पैतृक गाँव वापस जा सकें । पर जाए कैसे? सारे रास्ते बंद थे । बस,ट्रेन सब बंद । कई दुस्साहसी मजदूर पैदल हजारों मिल अपने परिजनों के पास चल पड़े और रास्ते में ही या तो भूख से मर गए या प्रशासन द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद एकांतबास में डाल दिए गए । कुछ तो अत्यंत मर्मांत घटनाओं के शिकार हो गए। अभी औरंगाबाद के पास सोलह मजदूर विश्राम करते हुए मालगाड़ी से कट  गए । उनमें से पाँच का अभी इलाज चल रहा है और शेष घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिए । इस घटना ने सारे देश को झकझोड़ दिया है । लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि लाक डाउन लागू करने से पहले इन चीजों का ध्यान क्यों महीं रखा जा सका ?

अब जबकि पूरी दुनिया करोना से त्रस्त है तो इस से बचने के तरह-तरह के उपाय लेकर अनेको प्रकार के संगठन और लोग सामने आ रहे हैं । कोई कहता है कि यह खाइए,कोई कहता हे वह खाइए,मधु खाइए,गर्म पानी पीजिए,काढ़ा पीजिए आदि,आदि । लोग घबराहट में तरह-तरह का प्रयोग करते भी जा रहे हैं । कुल मिला कर लोग कारोना वायरस से बुरी तरह डर गए हैं । निश्चित रूप से यह सही नहीं है । कहते हैं कि जो डर गया सो मर गया । किसी भी हालात में डरना तो समाधान हो ही नहीं सकता है । फिर क्या किया जाए? अभी तक दो बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि हमें एक-दूसरे से दो गज दूरी बना कर रखना है । दूसरा बाहर कम से कम निकलना है और अगर निकलना जरूरी हो ही गया है तो मास्क जरूर लगाना है । समय-समय पर हाथ साबुन या अन्य प्रकार के कीटनाशक से हाथ धोते रहना है ताकि वायरस का प्रसार में रुकावट हो ।

लाखों लोगों के प्राण जिस विमारी से चले गए हों उस महामारी से बचने का हर संभव प्रयास दुनिया के सारे देश कर रहे हैं । सुनने में यह भी आ रहा हे कि इजरायल और इटली इस दिसा में बहुत आगे निकल गए हैं । इस क्रममें दुनिया का ध्यान चीन पर वारंबार पहुँच जाता है कारण यह विमारी वहीं से शुरु हुई है । चीन इसका टीका बनाने में लगा हुआ है। अमेरिका भी बहुत तत्परता से इस काम में लगा हुआ है । देखना है कि सफलता किसके हाथ लगता है । चाहे जो भी प्रयास सफल हो लेकिन अगर ऐसा होता है तो निश्चित यह पूरी मानवता के लिए वरदान सावित होगा और पूरा विश्व प्रलय की आसन्न संभावना से बच जाएगा ।

दुनिया भर के वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना से निजात पाने का एकमात्र समाधान टीका अविष्कार होना है । यद्दपि इस कार्य में कई देश चेष्टा कर रहे है ,लेकिन इस में पूर्ण सफलता मिलने में समय लग सकती है । तबतक क्या किया जाए? लाकडाउन के बाबजूद विमारी फैलती जा रही है । अपने देश में भी लगातार लाकडाउन लागू है । फिर भी कोरोना से संक्रमित लोगों के संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है । अतएव स्पष्ट है कि खतराके बाबजूद हमें अभी कोरोना के साथ रहना होगा । जाहिर है कि इस में कुछ लोगों की जान जा सकती है परंतु ,अनंत काल तक सब कुछ बंद नहीं रखा जा सकता है । इसलिए संयम के साथ-साथ नित्यप्रति के गतिविधि को चालू करना ही होगा । देखते हैं कि यह सब कैसे हो सकता है ।

हर बुराई के साथ कुछ अच्छाई भी निहित होती है । कोरोना के साथ भी ऐसा कुछ लगता है । तमाम कष्टों,असुविधाओं और मानव जीवन पर मड़राते संकटों के बाबजूद कोरोना ने हमें अपने पुरातन संयमी संस्कृति का महत्व फिर से ताजा कर दिया है । सामाजिक दूरी और अन्य तरह की बातें जो अब की जा रही है वह सब हमारे यहाँ नया नहीं है । परंपरा से लोग वचाव द्वारा विमारियों से बचने की चेष्टा करते थे । दैनिक जीवन में व्रत,उपवास ,ध्यान, प्राणयाम आदि का महत्व दिया जाता था जिससे लोग दीर्घजीवी तो होते ही थे साथ ही उनके विचार भी सात्विक होते थे जिस से वसुधैव कुटुम्वकम् जैसी उच्च भावनाओं का प्रचार-प्रसार भी होता था । निश्चय यह विमारी हमे कुछ संदेश देकर जाएगा । सायद हम मानव जीवन को एक नए सिरे से समझने और जीने का प्रयत्न करने के लिए विवश हो जांए


रबीन्द्र नारायण मिश्र

११.५.२०२०

mishrarn@gmail.com