सोमवार, 13 मार्च 2017
दृष्टान्त
दृष्टान्त
१. दशरथ माँझी-
पृथ्वीपर एकसँ एक आश्चर्यजनक
घटना घटैत रहैत अछि। मनुखक पुरुषार्थक परिणाम थिक जे लोक चन्द्रमापर पहुँच गेल, तरह-तरहक यंत्रक
निर्माण करैत सौंसे दुनियाँक स्वरूपकेँ बदैल देलक। घरे-बैसल लोक अमेरिका, इग्लैंडक लोकसँ गप
कए सकैत अछि, ओकरा देख सकैत अछि।
किछु दिन पूर्व तक शायद जइ बातक कल्पनो ने केने हएत से सभ साकार भऽ रहल अछि। एहेन
बहुत रास लोक भेला अछि जे अपन संकल्प-शक्तिसँ प्रतिकुल-सँ-प्रतिकुल परिस्थितिमे
अद्भुत काज कऽ गेला। एहने किछु बेकतीक चर्चा हम एतए कऽ रहल छी।
बिहारक गेहलौर पहाड़ी
क्षेत्रमे रहनिहार दशरथ माँझीक पत्नीकेँ पहाड़ीपर चढ़ैतकाल चोट लागि गेलैन।
डाक्टरसँ देखेबाक हेतु दशरथ माँझीकेँ ७० किलोमीटर पहाड़ीक चारूकात चलए पड़लैक। ऐ
बातसँ क्षुब्ध भऽ ओ संकल्प केलैथ जे पहाड़ीकेँ आर-पार सीधा आवागमन हेतु रास्ता बनौल
जाए। हुनका लगमे तीनटा बकड़ी छल। तेकरा बेचि कऽ छोट-मोट औजार कीनलाह आ असगरे
पहाड़ीपर रास्ता बनबैमे लागि गेला। १९६० इस्वीसँ १९८२ वाइस सालक निरन्तर
प्रयासक बाद ओ ऐ काजमे सफल भेला। भोरकऽ खेतमे हरवाही करैथ,आ तेकर बाद दुपहर राति धरि पहाड़ीकेँ तोड़ि कऽ रास्ता बनाबक प्रयास करैथ। पहाड़ीक चट्टानपर लकड़ी जरा कऽ ओकरा गरमा दैत छला। फेर ओइपर पानि ढारि दैत रहथिन जइसँ चट्टानमे टूटन भऽ जाइतछल। तेकर बाद ओ अपन छोट-मोट औजार सबहक सहायतासँ रास्ता बनाबैथ।
बिहार सरकार हुनका राजकीय सम्मानक संग अन्तिम संस्कार केलक। आब ओ पूरा दुनियाँमे पहाड़ी बाबाक रूपमे विख्यात भऽ गेल छैथ।
शुरूमे सभ दसरथ माँझीकेँ पागल
कहइ। मना करै जे ओ काज होमए-बला नहि अछि, मुदा ओ अड़ल रहला आ मात्र हथौरी आ छेनीसँ पहाड़ी काटि
कऽ एतेकटा रास्ता बनाबैमे सफल भेला। ◌
२. श्री लक्ष्मण राव-
दिल्लीक आइ.टी.ओ.क पास चाह
बेचनिहार श्री लक्ष्मण रावक कथा केकरो हेतु प्रेरणादायी अछि।
श्री रावक जन्म २२ जुलाई
१९५४क महाराष्ट्रक अमरावतीमे एक साधारण किसान परिवारमे भेल। १९६३ इस्वीमे मुम्बईसँ
ओ हिन्दी माध्यममे मैट्रिक पास केलाह। बचपनमे श्री राव एकबेर पानिमे डुबि गेला।
ओइ घटनाक दर्दनाक अनुभवकेँ लिपिवद्ध करबाक हुनका जबरदस्त इच्छा भेलैन आ ओ लिखए
लगला। परिस्थितिवश ओ मैट्रिकसँ आगाँ नहि पढ़ि सकला। किछु दिन स्थानीय कपड़ा
मीलमे काज केलाह। तेकर बाद ४० रूपैआक संग सन् १९६५ इस्वीमे भोपाल चल गेला, जेतए किछु दिन
मजदूरी केलाह मुदा मोनमे किछु करबाक छटपटाहट हुनका भोपाल छोड़ि दिल्ली लऽ अनलक।
३० जुलाई १९६५ क ओ दिल्ली आबि गेला।
रवि दिनकेँ दिल्लीक दरियागंज
जा कऽ ओ पुस्तक आनैथ महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, कार्ल मार्क्स, सेक्सपियर आदिक
पुस्तक ओ अध्ययन केलाह। क्रमश: ओ दिल्ली विश्वविद्यालय पत्राचार पाठशालासँ
बी.ए. पास केलाह। राव अपन प्रथम उपन्यास ‘नयी दुनियाँ की नयी कहानी’ १९६९ इस्वीमे लिखला
मुदा कियो प्रकाशक ओकरा प्रकाशित करबाक हेतु तैयार नहि भेल। अन्ततोगत्वा ओ स्वयं
अपन पुस्तकक प्रकाशन करए लगला।
लक्ष्मण रावजी तेकर बाद
एक-सँ-एक पुस्तक लिखैत गेला। हुनक लेखनीसँ प्रभावित भऽ इन्दिरा गाँधीजी एवं
भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलजी हुनकासँ भेँट केलकैन। हुनका इन्द्रप्रस्थ
साहित्य अकादेमी पुरस्कार सेहो भेट चूकल अछि।
लक्ष्मण रावजीक पोथी सभ दिल्लीक
पुस्तकालय एवं स्कूल सभमे भेटैत अछि।
अखन धरि ओ बीसटा पुस्तक लिखि
चूकल छैथ। तैयो गुजाराक हेतु ओ चाह-पानक दोकान ओहिना कऽ रहल छैथ। हुनक ई दशा
समाजमे रचनात्मकताक अवमूल्यन दिस इंगित करैत अछि।◌
३. श्री हरेकला हजब्वा :
मंगलुरूसँ २५ किलोमीटर दूरीपर
अवस्थित नया पण्डु गामक रहनिहार ‘हरेकला हजब्वा’क तियाग ओ उपलब्धिक खिस्सा
सुनि कियो सोचबाक हेतु विवश भऽ जाएत। ओ अनपढ़ छला। फल बेचि कऽ गुजर करैत छला। एक
दिन एकटा विदेशी हुनकासँ फलक दाम अंग्रेजीमे पुछलक। ओ पढ़ल नहि छल। अंगरेजीमे पुछल
गेल प्रश्नक उत्तर नहि दऽ सकल। आ ओ ग्राहक चलि गेलैक। ऐ बातक ओकरा मोनमे बहुत
कचोट भेलइ। ओ ठानि लेलक जे अपन गाममे स्कूल स्थापित करत जइसँ कियो गामक बच्चा
ओकरा सन अनपढ़ नहि रहि जाए...।
फलक बेचबासँ ओकरा रोजाना लगभग
१५० रूपैआ आमदनी होइत छल। ओइमे सँ किछु पाइ बँचा कऽ तथा किछु कर्जा लऽ कऽ स्कूलक
हेतु जमीन कीनलक आ क्रमश: ओइपर मकान बना कऽ स्कूलक स्थापना भेल। शुरूमे प्राइमरी
स्कूल छल जेकरा बादमे बढ़ा कऽ हाई स्कूल बनाओल गेल।
क्रमश: ओकर ऐ उपलब्धिक चर्चा
बढ़ए लगलै। सरकार,
समाजिक संगठन आ केतेके दानी लोकनि ओकरा मदैत करबाक हेतु आगू एलाह। अखबारमे हजब्वाक
काजक समाचार छपल। तेकर बाद सरकार एक लाख रूपैआक अनुदान ओइ विद्यालयकेँ घर हेतु
देलक। स्थानीय समाचार पत्र ‘कन्नद प्रभा’ हुनका वर्ष पुरुष घोषित केलक एवं एक लाख रूपैआक पुरस्कार
देलक।
तेकर बाद कतेको लोक दान देबए
लगलाह। सी.एन.एन. आइ.बी.एन. टेलीवीजन चैनल हुनका रियल हिरो पुरस्कार देलक। हजब्वा
ओइ स्कूलक विकास समितिक उपाध्यक्ष छैथ परन्तु कुर्सीपर नहि बैसै छैथ एवं स्कूलमे
स्वयं सफाइ करै छैथ।
हजब्वा आब अपन गाममे एकटा
कौलेजक स्थापना करय चाहै छैथ। अखन गामक बच्चाकेँ कौलेजमे पढ़ैले सात किलोमीटर
दूर स्थित सरकारी कौलेजमे जाए पड़ै छइ। बहुत गोटेकेँ प्राइभेट कौलेजमे खर्चा करि
कऽ पढ़ए पड़ै छइ। ऐसँ बँचैले ओ गामेमे कौलेजक निर्माणमे लागल छैथ।◌
४. श्री पोपतराव पवार-
पोपतराव पवारक नाओं, सुनने छी की? ५५ वर्षीय श्री पवार
त्रियारे पवाह (अहमदनगर, महाराष्ट्र)क सरपंज थिकाह। ओ असगरे सुखार ग्रस्त
गामकेँ पानि, बिजली, शिक्षा आ बेहतर स्वास्थ्य
सेवासँ हटल-छुटल केतेको गाममे बदैल देला। ई गाम आत्मवेत्ता एवं स्वशासनक
सिद्धान्तरपर काज करैत अछि।
सन् १९७२ मे ओ शहरसँ स्नातकक
परीक्षा पास कऽ गाम एलाह। गाममे ओ सभसँ शिक्षित बेकती छला। ग्रामीणक आग्रहपर ओ
सरपंचक चुनाव लड़ला आ जीति गेला। तेकर बाद ओ नाना प्रकारक विकास काज कऽ कऽ गामक
भविस बदलै पाछू लागि गेला।
सभसँ पहिने ओ गामक स्कूलमे
मैट्रिक तकक पढ़ाइक बेवस्था केलैन जइसँ गामक धिया-पुताकेँ शिक्षाक स्तरमे सुधार
भेल। तेकर बाद ओ गाममे पानिक सुविधा हेतु ४००० खधिया खुनि कऽ जल संरक्षणक बेवस्था
केलैन। गाममे नल-कूपक जगह इनारक उपयोगपर जोड़ देलैन, जइसँ भूजलक स्तर बनल रहए।
एहेन फसल सभ अपनाबक प्रयास भेल जइमे अधिक-सँ-अधिक पैसाक आमदनी होइक आ कम-सँ-कम
पानिक प्रयोजन।
१० सालक अवधिमे ओ करीब १० लाख
वृक्ष लगबौला जइसँ गामक आबो-हवा बदैल गेल।
सन् १९९५ इस्वीमे आदर्श
ग्राम योजना लागू भेलापर रन्हू गामकेँ आदर्श ग्राममे विकसित करबाक हेतु चुनाव
भेल। आई हिवारे बजार गाम प्राय: देशक सभसँ विकसित गाममेसँ अछि। एकर श्रेय कोनो
सरकारी प्रयत्नकेँ नहि, अपितु ग्रामसभाककेँ अछि जे ग्राम संसदक नामसँ जानल जाइत
अछि,
आ जेकरा
गामक विषयमे समस्त निर्णय लेबाक अधिकार छइ।
बेहतर शिक्षा, सुद्धृढ आर्थिक स्थितिक
संग निरन्तर विकास कए ई गाम एकटा उदाहरण भऽ समाजक सम्मुख प्रस्तुत अछि। ऐ गाममे
महिला पुरुखसँ अधिक छैथ। परिवार नियोजन एवं अन्य प्रकारक आधुनिक चिकित्सा सुविधा
सहज सुलभ अछि।
१९९५ इस्वीमे प्रतिदिन १५०
लीटर दूधक उत्पादनक तुलनामे २०१२ मे ४००० लीटर दूध प्रतिदिन उत्पादन होइत अछि।
१९९५ मे गाममे ९० टा इनार छल, जखन कि २०१२ मे २९४. ओइ अवधिक दौरान प्रति बेकतीक
आमदनी ८३० रूपैआसँ बढ़ि कऽ ३०००० रूपैआ भऽ गेल। ऐ गामकेँ १९९५ इस्वीमे आदर्श ग्राम
पुरस्कार, २०००मे यशवंत गाम
पुरस्कार, २००७ इस्वीमे
निर्मल ग्राम पुरस्कार, २००७ मे वनग्राम पुरस्कार, एवं २००७ मे राष्ट्रीय जल
पुरस्कार भेटल।
गामक विकास एवं सुविधा देख
गामसँ पलायन कऽ चूकल लोक सभ पुनश्च गाममे आपस आबि बसि रहल छैथ।
एक बेकतीक तियाग आ कर्मठतासँ
केतेक परिवर्तन भऽ सकैत अछि, तेकर पोपतराव पवार एकटा ज्वलन्त उदाहरण भऽ चूकल
छैथ। जे गाम दुर्भिक्ष आ दरिद्रतामे डुमल छल, तइमे साठिटा करोड़पति रहि
रहल छैथ।◌
५. श्री आलोक सागर-
आइ.आइ.टी. दिल्लीसँ
इन्जिनियर (एम.टेक) श्री आलोक सागर अमेरिकाक हाउसटन विश्वविद्यालयसँ टेक्साससँ
पी.एच-डी. केला पछाइत आइ.आइ.टी. दिल्लीमे प्राध्यापकक काज प्रारम्भ केलाह।
रिजर्व बैंक ऑफ इन्डिया (आर.बी.आई.) क भूतपूर्व गवरनर श्री रघुरमन राजन हुनकर
विद्यार्थी छेलखिन।
१९८२ इस्वीमे सागरजी नौकरी
छोड़ि जमीनी स्तरपर समाज सेवा करबाक उद्देश्यसँ मध्यप्रेदेशक वेतुल एवं
होसंगावाद जिलामे स्थानीय आदिवासीक सेवामे लागि गेला। ऐ लेल ओ आदिवासीक अधिकारक
हेतु संघर्षरत समाजिक संगठन- श्रमिक आदिवासी संगठनसँ जुड़ि गेला।
पैछला ३५ वर्षसँ ओ लगातार
आदिवासी लोकनिक सेवा कए रहल छैथ, मुदा केकरो कहियो अपन परिचए नहि देलखिन। पैछला विधान
सभा चुनावक समय जिला प्रशासन हुनका जिला छोड़बाक आदेश देलक तखन हारि कऽ हुनका अपन
परिचए देबए पड़ल।
सागरजी आदिवासी सभकेँ कम मूल्यपर
बीआ देल करैथ जइसँ श्रृष्टिक रचनात्मकताक प्रचार, विकास होइक। ओ मध्य प्रदेशक
पेतुल जिलामे पचास हजार वृक्ष लागैलाह। सागरजी समाजसेवक एकटा सही पहचान छैथ। ऐ
देशमे राजनीतिक सभ समाज सेवोक नाओंपर झूठ-मूठक क्रिया-कलाप करैत रहै छैथ। जिनका
योग्यता नहि अछि सेहो झूठ डिग्री बना कऽ समाजमे प्रचार करैत रहै छैथ जे ओ केतेक
विद्वान छैथ। मुदा सागरजीकेँ देखू। अद्भुत शैक्षणिक उपलब्धि एवं उच्च स्तरीय
नौकरीकेँ तिलांजलि दए आइ केतेको वर्षसँ समाजक निम्नतम् स्तरक लोक सबहक कल्याणक
हेतु काज कऽ रहल छैथ।
आलोक सागरजी कोचमू गाममे रहै
छैथ। ओइ गाममे ७५० आदिवासी रहै छैथ। कोचमू गाम दूर-दराजमे अवस्थित अछि। ओइ गाममे बिजली
नहि अछि। ओ सरल, साधारण जीवन जीबै
छैथ। हुनका लगमे तीनटा कुर्ता रहै छैन आ साइकिलपर गामे-गाम घुमैत रहै छैथ। ओ स्थानीय
भाषा सहित अनेको भाषाक जानकार छैथ। हुनकर कहब अछि जे भारतीय समाजमे लोक सीभकेँ
केतेको गंभीर समस्या सभ घेरने अछि। मुदा लोक सभ तेकर समाधान करबाक बजाय अपन मेधाक
प्रर्दशन अपन डिग्रीसँ करैत रहै छैथ। तियाग ओ तपस्याक एहेन प्रतिमूर्ति ऐ युगमे
भेटब असंभव नहि तँ बहुत कठिन अवश्य अछि।◌
६. श्री जादव पायंग-
१६ सालक उम्रमे जादव पायंग
(मोलाइ) धियान आस-पास मरि रहल साँप सभपर गेल जे जंगलक अभावमे ऐ दुर्दशामे छल।
चिड़ै-चुनमुनीक घटैत संख्या एवम् अन्य जंगली जीव-जन्तुक पराभवसँ ओ बहुत दुखी
भऽ गेल। ई गप सन् १९७९क थिक। ऐ विषयपर ओ अपन आस-पासक लोक सभसँ गप केलाह मुदा कियो
धियान नइ देलक। मुदा हुनका चैन नहि भेलैन। ओ ठानि लेल जे ओइ क्षेत्रमे नवीन जंगलक
निर्माण करता।
ब्रह्मपुत्र नदीक कछेरमे तथा
बीरान क्षेत्रमे नित्य नव गाछ रोपए लगला। नित्य प्रति ओ ई काज करए लगला। क्रमश:
गाछक संख्या बढ़ए लगल आ ओइमे पानि देब एकटा गंभीर समस्या भेल जाइत छल। तेकर उपाय ओ
ई केलैन जे प्रत्येक गाछक ऊपर पानिसँ भरल डाबा टाँगि कए ओइमे भूर कए दैथ, जइसँ निरन्तर
टिपिर-टिपिर पानि खसि ओइ गाछकेँ सिंचित करैत छल।
सन् १९८० मे गोलाघाट जिला
जोरहाट अवस्थित अरूना चपोरीक २५० एकड़ क्षेत्रमे वन विभागक वृक्षारोपण योजनामे
शामिल भऽ गेला आ पाँच वर्ष धरि ओइमे काज करैत रहला।
पछाइत ओ ओहीमे आर गाछ सभ लगबैत
रहला जइसँ ओइ क्षेत्रमे एकटा नीक जंगलक निर्माण भऽ सकए।
आसामक मिसिंग जनजातिक श्री
पायंग जंगलमे अपन पत्नी ओ तीनटा बच्चाक संग एकटा झोपड़ीमे रहैत छैथ। हुनकर मित्र
सभ नीक-नीक स्थानपर शहरमे चलि गेला। उत्तम शिक्षा आ उत्तम पद प्राप्त केलाह।
परन्तु ओ जंगलमे वृक्षारोपणमे मगन रहला। हुनकर कहब जे पुरस्कार ओ प्रतिष्ठा ओ
अर्जित केला वएह हुनक सम्पैत अछि आ ओहीसँ हुनका आनन्द भेटैत रहै छैन।
२२ अप्रैल २०१२ क जवाहर लाल
नेहरू विश्वविद्यालयक पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा पुरस्कृत भेला। ओइ
विश्वविद्यालयक उपकुलपति हुनक नाओं भारतक फोरेस्टमैन रखि देल। तथा अक्टूबर २०१३
मे भारतीय वन प्रवन्धन संस्थान द्वारा आयोजित वार्षिकोत्सवमे सेहो हुनका पुरस्कृत
कएल गेल।
ऐ आदमीक इच्छा शक्ति देख कऽ
कियो बेकती गुम पड़ि सकै छैथ। असगरे तीस सालक अविरल साधना द्वारा एक बीरान १३६०
एकर क्षेत्रमे जंगल निर्माण कए देलक। ऐ जंगलकेँ ओकर उपनामपर ‘मोलाइ’ कहल जाइत अछि।
मोलाइ जंगलमे वंगालक बाझ, भारतीय हरिण, गेड़ा तथा सैकड़ो
हाथी रहैत अछि। एकर ३०० एकड़ क्षेत्रमे बाँस लागल अछि। एक आदमीक अविरल साधनासँ
धारक कछेरपर दुनियाँक सभसँ पैघ जंगलक निर्माण संभव भेल।
अस्तु संसार एक-सँ-एक वीर
पुरुषसँ भरल अछि जे तमाम कष्ट ओ अभावक अछैत किछुक गुजरला आ आबए बला पीढ़ीक हेतु
एकटा दृष्टान्त ठाढ़ कऽ देला। कठिनाइ एवम् संघर्ष हुनकर प्रयत्नकेँ कखनो कमजोर
नहि कऽ सकल। आइ वएह सभ समाजक सामने एकटा दृष्टान्त बनि चूकल छैथ। मानव सभ्यताक
इतिहासमे प्रकाश स्रंम्भ जकाँ ओ सदिखन जगमगाइत रहता, स्मरणीय रहता।◌
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
क्रोध
क्रोध
मनुख भावुक प्राणी होइत अछि।
दैहिक आवश्यकताक पूर्तिक संगहि संग ओकर मनोवैज्ञानिक आवश्यकताक पूर्ति सेहो आवश्यक
अछि। जखन कियो केकरो दैहिक वा मानसिक कष्ट दैत अछि तँ ओकरा मोनमे क्रोधक
प्रादुर्भाव होइत छइ। अतएव क्रोधक हेतु आवश्यक थिक जे कियो केकरो कष्ट पहुँचबैक
संगहि ईहो आवश्यक जे कष्ट पहुँचेनिहारक पता होइक। अज्ञात बेकती द्वारा उत्पन्न
कष्ट किंवा स्वयं अपनेसँ भेल कष्टपर क्रोध नहि होइत अछि। उदाहरण स्वरूप अगर
दाढ़ी बनबए-काल गालक चमरी कटि जाए, खून बहि जाए वा हाथक लोढ़ा धोखासँ पैरपर खसि पड़ए आ
पैरक आँगुर थकुचा जाए तँ क्रोध नहि होएत अपितु पश्चाताप होएत जे एना बेसम्हार
दाढ़ी नहि काटक छल वा लोढ़ाकेँ सम्हारि कऽ रखबाक चाही छल। किंतु जँ कियो आन हमरा
पाथरसँ मारए किंवा मारबाक उपक्रमो करए तँ तामस धड़ दय भय जाएत।
क्रोधक भोजन थिक विवेक।
विवेके रहलासँ मनुख जानवरसँ फराक अछि। मनुख सोचि सकैत अछि। नीक-बेजाए केर विचार कए
सकैत अछि। किन्तु ई सभ काज विवेकसँ उत्पन्न होइत अछि। मुदा जाहि मनुखक विवेक नष्ट
भऽ जाइत छै ओ बहुत रास अनुचित कथा बजैत अछि एवम् कर्म आ अकर्मक बीच भेदभाव बिसैर
जाइत अछि। क्रोध अबिते नीक-सँ-नीक लोककक विवेक मरि जाइत छइ। आकृति बिगैड़ जाइ छै
एवम् रक्तचाप बढ़ि जाइ छइ। क्रोधावेगमे मनुख गड़बड़ काज कऽ लैत अछि। अर्थ-अनर्थक
भेद बिसैर जाइत अछि आ तँए सोभाविक रूपेँ विनास दिस अग्रसर भऽ जाइत अछि।
क्रोधक प्रवल वेगमे मनुख ईहो
नहि सोचि पबैत अछि जे ओकरा जे कष्ट पहुँचौलक तेकरा एहेन अभिप्राय रहइ वा नहि।
ऐप्रकारक सभसँ नीक दृष्टान्त चाणक्यक ओइ आचरणमे भेटैत अछि जखन किओ कुश गड़ि
जेबाक कारणेँ सभ कुशकेँ उखारि ओकरा जरिमे धोर देबए लगला।
केतेक बेर एहेन होइत अछि
पाथरसँ चोट लगलासँ लोक पाथरेपर चोट करए लगैत अछि। एहेन क्रोधकेँ जड़क्रोध कहल जाइ
अछि। कारण क्रोधीकेँ एतबो अन्दाज नहि रहै छै जे ओगलत स्थानपर गलत रूपेँ क्रोध कऽ
रहल अछि।
क्रोधक जन्म कष्टसँ होइत
अछि। सोभाविक अछि जे जेकरामे सहनशीलता जेतेक बेसी हेतै तेकरा क्रोध तेतेक कम हेतइ।
वर्तमान समयमे बढ़ैत महत्वाकांक्षा एवम् वैज्ञानिक विकासक कारणेँ पारस्परिक
टकरावक संभावना सेहो बढ़ि गेल अछि। जखन एक्के वस्तुक हेतु कएक गोटे प्रयत्नशील
हेता तँ संघर्ष अनिवार्य भऽ जाइ छइ तथा असफल रहनिहार बेकतीकेँ क्रोध होएब सोभाविक।
क्रोधमे लोकक आत्मसंयम समाप्त
भऽ जाइ छइ। ऐ अवस्थामे लोक बहुत रास अन्ट-सन्टबाजि जाइत अछि। परिणामस्वरूप
पुरान-सँ-पुरान सम्बन्ध ओ मित्रता नष्ट भऽ जाइ छइ। तँए उचित जे तामसमे गुम्म
भऽ जाइ। जँ कियो तमसाएल अछि तँ ओ अन्ट-सन्ट बाजि सकैत अछि, जे सुनि हमहूँ
उत्तेजित भऽ सकैत छी। परिणामत: मारि-पीट वा एहने कोनो अशुभ काज भऽ सकैत अछि। तँए
उचित जे जेतए उत्तेजना होइक तैठामसँ ससैर जाइ जइसँ अनर्गल कथा ओ काज देख हमरो
उत्तेजना नहि भऽ जाए।
क्रोधक सीमित ओ संयत प्रयोग
लाभकारी भऽ सकैत अछि। मानि लिअ जे कियो गोटे अहाँक टका रखने अछि आ लाख प्रयासक
अछैतो ओ टका आपस नहि कए रहल अछि तखन क्रोधक प्रयोग केलासँ भऽ सकैत अछि ओ बेकती टका
आपस कए दिए। परन्तु एहेन लाभकारी क्रोधकरबामे आत्मसंयमक प्रयोजन होइत अछि कारण
क्रोध करैत-करैत जँ सीमाल्लंघन भऽ गेल, बहुत रास तामस भऽ गेल तँ परिणाम अनिष्टकारी भऽ सकैत
अछि। टका तँ बुड़िये जाएत संगे ऊपरसँ मारियो लागि सकैत अछि।
क्रोधक प्रयोग प्रतिकारक हेतु
सेहो होइत अछि। जँ ट्रेनसँ यात्रा करैत कियो धक्का मारि दैत अछि किंवा ट्रेनसँ
धकिया कए निच्चाँ खसा दैत अछि तँ ओकरापर कसि कऽ तामस भऽ जाइत अछि। परिणामस्वरूप
हमहुँ ओकरा कोनो-ने-कोनो दण्ड देबए चाहैत छिऐ। यद्यपि ऐ बातक कोनो संभावना नहि
रहैत छै जे ओइ आदमीसँ दुबारा कहियो भेँट होएत वा नहि।
क्रोधक प्रयोगयदा-कदा आत्मस्वार्थ
सेहो होइत अछि। कारण जँ कियो बेकती अहाँकेँ कोनो प्रकारक क्षति पहुँचा दैत अछि तँ
अहाँक सोभाविक इच्छा रहैत अछि जे दुबारा फेर एहने क्षति नहि हो। तँए ओइ बेकतीपर
क्रोधक प्रयोग कए घटनाक पुनरावृत्तिकेँ रोकबाक प्रयास कएल जाइत अछि। ऐ प्रकारसँ
कएल गेल क्रोधमे आत्म रक्षाक भाव बेसी होइत अछि।
क्रोधक शिकार नीक-सँ-नीक लोक
भऽ जाइत अछि। कोनो आवश्यक नहि जे अहाँ कोनो गलती केनहि होइ आ तही कारणेँ अहाँकेँ
कोपभाजन होमए पड़ल हो। असल बात तँ ई थिक जे क्रोधित मनुखक दृष्टिमे जँ अहाँ कोनो
प्रकारसँ क्षति पहुँचेबाक चेष्टा कएल अछि तँ ओ क्रोधित भऽ जाएत। एहेन परिस्थितिमे
क्रोधसँ बँचबाक एक मात्र साधन सहनशीलता थिक।
क्रोध दुखक चेतन कारणक
साक्षात्कार वा परिज्ञानमे होइत अछि। अतएव जेतए कार्य कारणक सम्बन्धमे त्रुटि
होएतैक ओतए क्रोधमे धोखा भऽ सकैत अछि। दोसर बात जे क्रोध केनिहार लोक जेमहरसँ
क्रोध अबै छै तेम्हरे देखैत अछि। अपना दिस नहि देखैत अछि। क्रोधक ई प्रवल इच्छा
होइ छै जे जे बेकती ओकरा कष्ट देलक अछि ओकर नाश होइक मुदा ओ कखनो ई नहि सोचि सकैत
अछि जे ओ जे कऽ रहल अछि से अनुचित छै, किंवा तेकर की परिणाम हेतइ।
कखनो-कखनो लोक क्रोधमे अपने
माथ पटकए लगैत अछि। तेकर कारण जे हुनकर ऐ काजसँ हुनक निकट सम्बन्धी, जिनकासँ ओ क्रुद्ध
रहै छैथ, हुनका कष्ट होइ
छैन। तँए हेतु क्रोधमे जँ कियो अपन माथ पटकए किंवा स्वयंकेँ कहुना कष्ट दिअए तँ
बुझी जे ओ कोनो अपने बेकतीपर कुद्ध अछि।
कोनो बातसँ खौंझाएब क्रोधक
एकटा रूप छिऐ। एहेन बेकती मानसिक रूपसँ रोगग्रस्त होइ छैथ। ओ सामान्यत: छोट-मोट
गड़बड़ी भेलासँ खौंझा जाइ छैथ। केतेको बुढ-बुढानुसकेँ अहाँ कोनो गप्प कहियौ, सुनिते देरी ओ ठेंगा
लऽ कऽ दौग जाएत। ..क्रोधक ई रूप सामान्यत: वृद्ध वा रोगीमे देखना जाइत अछि।
चाहे जे हो एतबा तँ
निर्विवादे जे क्रोधक परिणाम बिरले नीक होइत अछि। सामान्यत: क्रोधमे समस्याक
समाधान हेबाक बजाय नव-नव समस्याक प्रादुर्भाव भऽ जाइत अछि। क्रोधक आवेगमे कएल गेल
गलती केतेको-बेर मरण-पर्यन्त पश्चातापक कारण भऽ जाइत अछि।
अतएव क्रोध सबहक लेल घातक
होइत अछि। ऐसँ अध्यात्मिक प्रगतिमे व्यवधान तँ होइते अछि संगे सांसारिक विकास सेहो
अवरूद्ध भऽ जाइत अछि। अस्तु क्रोध अवश्य त्याज्य थिक।
लेखक-
रबीन्द्र नारायण
मिश्र
दिनांक-
२४.०१.१९८८
गुरुवार, 2 मार्च 2017
आजादक अन्त्येष्टि
आजादक अन्त्येष्टि
२७ फरबरी १९३१केँ इलाहाबादक एलफ्रेड पार्कमे
(जेकर नाम आब चन्द्रशेखर आजाद पार्क राखि देल गेल अछि) आजादक मृत्यु पुलिसक संग
भेल मुठभेड़मे भेलैन। हुनक दाह-संस्कार दोसर दिन गंगाक रसूलावाद बाटपर कएल गेल।
गुप्तचर विभागक उपलेख, स्वर्गीय शिवनायक मिश्रक
संस्मरण तथा महामना मदनमोहन मालवीयक प्रपौत्र श्री पद्मकान्त मालवीयसँ ओइ घटनाक
जानकारी होइछ।
पं. शिवनायक मिश्र, आजादक निकटक सम्बन्धी
छला। ओ बनारसमे छला आ हुनका ऐ काण्डक सूचना श्रीमती कमला नेहरू द्वारा पठौल गेल
संवादवाहक द्वारा ११ बजे रातिमे भेटलैन। रातिमे इलाहावाद एबाक साधनक अभावक कारणेँ
ओ प्रात:काल छोटी लाइनक गाड़ीसँ इलाहाबाद एला। आनन्द भवन गेलाक बाद कमला नेहरूसँ
पता लगलैन जे आजादक लाशक पोस्टमार्टम भऽ रहल छैन।
टमटमपर (इक्कापर) ओ अस्पताल गेला, जेतए पता लगलैन जे लाशकेँ
पोस्टमार्टमक पछाइत दाह-संस्कारक हेतु पुलिस लऽ गेल। पोस्टमार्टम मोहनलाल आ
कर्नल टाउनसेन्ड कएलैन। मिश्रजी तुरन्त जिलाधीशक ओतए गेला, जेतए जिलाधीशसँ हुनक गम्भीर
बाता-बाती भऽ गेलैन। जिलाधीशक कहब रहैन जे अहाँ अपन सम्बन्धीकेँ एतबा दिन
अबारागर्दी करबसँ किएक नहि रोकि सकलौं? अन्ततोगत्वा ओ दारागंजक
थानेदारकेँ आदेश देलक जे पुलिसक देख-रेखमे हुनका आजादक अन्त्येष्टि करबाक अमुमति
देल जाए।
आजादक अन्त्येष्टिक समय श्री पद्मकान्त मालवीय
उपस्थित छला। हुनका अनुसारेँ २७-२८ फरबरीक रातिमे पं. मदनमोहन मालवीय हुनका फोनपर
कहलखिन जे चूँकि आजाद एकटा वीर आ क्रान्तिकारी लोक छला तँए हुनक संस्कारो ओही
तरहक हेबाक चाही। राजर्षि टंडनक सहयोग लेबाक परामर्श सेहो ओ देलखिन।
श्री पद्मकान्त मालवीय आ श्री शिव विनायक मिश्र
जिलाधीशक आदेश दारागंजक थानेदारकेँ पढ़ि सुनौलखिन। ओ हुनका लोकनिकेँ संगमपर लऽ
गेलखिन, मुदा ओतए किछु नहि भेटलैन।
ओइठामसँ लौटैतकाल तुलारामवागमे एकटा छात्र नेता कहलकैन जे आजादक लाश रशूलबाद घाटपर
गेलैन अछि। ओइठामसँ ओ लोकनि रशूलबाद पहुँचला।
मालवीय आ मिश्रजी जखन रशूलबाद पहुँचला तँ चितामे आगि
लगा देल गेल छल। ओहीठाम एकटा पुलिस इन्सपेक्टरसँ ओ लोकनि बेर-बेर आग्रह केलखिन, जे ओ लाश हुनका लोकनिकेँ दए
देल जाइन। मुदा ओ इन्सपेक्टर समय काटक हेतुए अनेकानेक प्रश्न पुछैत रहल। ताधैर
आजादक आधा लाश जरि चूकल छेलैन। तेकर बाद ओ लाशक संस्कार करबाक अनुमतिमे विलम्ब
होइत देख मिश्रजीकेँ नहि देखल गेलैन। ओ बाजि उठला-
“अंग्रेजक नून खाइत-खाइत तोहर
आत्मा सेहो बिका गेलह की? आजादक संस्कार ओइ सरकारक
पैसासँ कदापि नहि भऽ सकैत अछि। जेकर विरोध करैत-करैत ओ अपन प्राणक आहुति देलैन।”
एकर बाद शिवकान्त मिश्र आ पद्मकान्त मालवीय दुनू
गोटे मिलि कऽ चिताकेँ मिझौलैथ। फेर शास्त्रीय विधान आ मंत्रोच्चारक संग चितामे
आगि देल गेल। ताधैर पुरुषोत्म दास टंडन आ
श्रीमती कमला नेहरू सेहो ओतए आबि गेल रहैथ। जल देमक समय एकटा फोटोग्राफर फोटो लेलक
मुदा पुलिस ओकर कैमरा आ ओकर रील दुनू छीनि लेलक। अन्तमे शिवनायक मिश्र अस्थि
संचय कए ओकर किछु भागकेँ गंगामे प्रवाहित केलैन। एकटा पोटरीमे भष्मावशेषकेँ
वएह वनारस लऽ गेला।
मूलत: आजादक संस्कार संगमपर करबाक निश्चय कएल गेल
छल। मुदा ओतए बहुत अधिक दर्शकक भीड़ लागि जेबाक भयसँ ओ सभ अपन निर्णयकेँ अन्तिम
क्षणमे परिवर्तित कएलैन। दाह-संस्कारसँ आपस भेलापर शिवविनायक मिश्र टंडनजीक ओइठाम
एला। आ टंडनजीक निर्देशानुसार आपस हेबाकाल छात्र संघक तत्वावधानमे एकटा विशाल
जुलुसक आयोजन भेल। सम्पूर्ण शहरमे अपूर्व तनाव छल। कखनौं किछु भऽ सकैत छल। ऐ स्थितिसँ
निपटबाक हेतु शहर भरिमे सशस्त्र पुलिसबल नियुक्त कए देल गेल छल।
सायंकाल अभ्युदय प्रेस लगसँ एक विशाल जुलुस निकलल
जइमे हजारो युवक, स्त्री तथा पुरुष शामिल
भेला। ऐ हेतु टंडनजीक दृढ़ समर्थन सहायक सिद्ध भेल। ओ ललैक कए कहलखिन-
“आजादक रास्ता भने हमरा
लोकनिसँ पृथक रहल होनि, मुदा ऐमे कोनो दूटा विचार
नहि भऽ सकैत अछि जे ओ एक महान देशभक्त छला, आ तँए हुनक सम्मानमे जुलुस
सभ आदि नहि करब एक बड़ पैघ राष्ट्रभक्तक अपमान करब होएत।”
जुलुसमे आजादक भष्मावशेष एकटा कारी कपड़ामे बान्हि
चौकीपर राखि घुमौल गेल।
जानसेनगंज मुहल्लामे लोकक जमघट अनियंत्रित भऽ गेल आ
पुलिस डरे मुँह तकैत रहल। तदुपरान्त पी.डी. पार्कमे सभा भेल जइमे पुरुषोत्तम दास
टंडन, कमला नेहरू, प्रसिद्ध क्रान्तिकारी
श्री सचिन्द्रनाथ सन्यालक पत्नी आ पं. शिव विनायक मिश्र बजला। सभ गोटे आजादक
महान त्यागक प्रशंसा करैत हुनक हार्दिक श्रर्द्धांजलि देलाह।
ऐ प्रकारे भारतक एकटा महान सपूत आजादीक हेतु लड़ैत
सदैत आजाद रहैत आत्म बलिदान कएल। जइ गाछक औढ़मे ओ गोली चलौलैन किंवा अन्ततोगत्वा
सीनामे गोली लगलैन, ओही गाछक दर्शन करक हेतु लोक
हजारक-हजार संख्यामे आबए लागल। जइसँ तंग भऽ अंग्रेज शासक ओकरा कटबा देलक। आइ-काल्हि
ओहीठाम एकटा दोसर पाकरिक गाछ रोपल अछि आ ओकर सामनेमे अछि आजादक भव्य मूर्ति जइमे
हुनक एकटा हाथ मोँछपर आ दोसर हाथ पिस्तौलपर अछि। ऐठाम अखनौं हजारो लोक हुनका
प्रति अपन सम्मान अर्पित करबाक लेल अबैत रहैत अछि। सरिपहुँ आजाद भारतक आजादीक
लड़ाइमे प्राणक आहुति दए अमर भऽ गेला।
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रबीन्द्र नारायण मिश्र
ग्राम : अड़ेर डीह
पो. : अड़ेर हाट
जिला : मधुबनी (बिहार)
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