रविवार, 7 जून 2020

इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी


 



इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी

 

 

एकदिन साँझमे हम टहलैत गामसँ पूब चलि गेल रही । बेसिक इसकूलक लगीचमे सड़कक कातमे बैसल रही  कि फटकिएसँ ककरो साइकिलपर गेरुआ वस्त्र पहिरने मधुबनी दिससँ अबैत देखलिऐक । जौं-जौं ओ लगीच अबैत गेल  तँ स्पष्ट होइत गेल जे ओ केओ आओर नहि हमर इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी छथि । हम तँ हुनका देखिते रहि गेलहुँ। आखिर ई भेलैक केना? थोड़बे दिन पहिने तँ हुनकर बिआहक समाचार भेटल रहए । तकर बाद एकदम बदलल परिधान- गेरुआ वस्त्र,पैघ-पैघ केश । बहुत आश्चर्यपूर्वक हम हुनका दिस बढ़लहुँ । ओहो सइकिलसँ उतरलाह-

औ रबीन्द्रजी! की हाल-चाल?”

ततेक उत्सुकता भेल छल जे होअए जे की पुछिअनि,की नहि । मुदा साँझ पड़ैत रहैक । हुनको गाम जेबाक रहनि। तेँ ओ किछुकालक बाद हमरासँ बिदा लैत साइकिलपर चढ़ि गाम दिस बढ़ि गेलाह । बहुतरास जिज्ञासा मोने मे रहि गेल । बुझबे नहि करिऐक जे एना गेरुआ वस्त्र ओ कहिआसँ पहिरए लगलाह । असलमे ओ ओशोसँ दीक्षा लए लेने छलाह ।

हम ई कहिओ नहि सोचने रही जे नित्यप्रति जिनका संगे इसकूलमे एकहि बेंचपर पढ़ैत रहलहुँ,बादमे मधुबनी कालेजोमे संगे रहलहुँ से गेरुआवस्त्रधारी सन्यासी भए जेताह । संन्यासिओ केहन? जे रहताह घरेमे,धीया-पुताक पालन-पोषणसेहो करताह,घरबाली सेहो संगे रहथिन आ भजन-कीर्तन सेहो चलैत रहत । मुदा सएह भेलैक। ओहि समयमे आचार्य रजनीशक हवा बहल रहैक  रेडिओसँ नित्य हुनकर प्रवचन प्रसारित होइत छल । हुनकर किताबसभ खूब पढ़ल जाइत छल । युवकसभकेँ हुनकर विचार बहुत नीक लगलैक । बहुत रास लोक रजनीशक चेला भए गेलाह।

ओही समयमे हमर दूटा इसकूलिआ संगी सेहो हुनकर पकिआ चेला भेल रहथि । एकटा फेकनजी(स्वामी आनंद वैराग्य) आ श्री नारायणजी मुदा दुनूगोटेक जीवन व्यवस्थामे बहुत अंतर छल । श्रीनारायणजी आचार्य रजनीशक किछु बहुत नीक तत्वकेँ ग्रहण करबामे सफल रहलाह । जाहिमे हमरा हिसाबे प्रमुख छल- ध्यान। अपने संगे पूरा परिवारकेँ ध्यान करबाक कलामे पारंगत कए देलाह जकर बहुत नीक परिणाम हुनका लोकनिक भविष्यपर पड़ल। हुनकर दुनू पुत्र(आलोक आ आशीष) बहुत प्रतिभाशाली भेलाह । कला आ संगीतक संग इसकूलिआ पढ़ाइमे नाम कए गेलाह। आशीष तँ ततेक पढ़लाह जकर वर्णन करब मोसकिल । आइआइटीसँ इंजिनीयरिंग केलाक बाद अमेरिकामे छात्रवृत्ति भेटि गेलनि आ ओतहिसँ पीएचडी,आ तकर बादो कतेको तरहक उच्च शिक्षा लेलाक बाद ओतहि वैज्ञानिक भए गेलाह । तहिना आलोक सेहो इसरोमे वैज्ञानिक भए गेलाह ।

ओहि घटनाक पचास साल भए गेल होएत । मुदा श्रीनारायणजीसँ कखनो भेंट होएत तँ ओहिना आकर्षक मुद्रामे स्वागत करैत भेटताह । ई कोनो कम आश्चर्यक बात नहि जे हुनकासँ ५७ वर्षसँ लगातार ओहिना मधुर संबंध बनल अछि । सभसँ पहिने हुनकासँ भेंट भेल छल ९जनवरी १९६३मे जखन ओ अपन काकाक संगे हाइ इसकूल एकतारामे नाम लिखाबक हेतु आएल रहथि आ हमहु अपन बाबूक संगे   ओही लेल गेल रही । इसकूलक बरंडापर बेंचपर इसकूलक किरानी बूचन बाबू रजिष्टरमे लिखा-पढ़ी करैत छलाह आ हमर बाबू आ हुनकर काका हुनका लग बेंचपर बैसल रहथि । हमसभ हुनकासभक पाछा ठाढ़ रही । तकर बाद चारि वर्ष (आठमासँ एगारहमा धरि )हमसभ ओहि इसकूलमे पढ़लहुँ । क्रमशः इसकूलक आओर विद्यार्थीसभसँ परिचय होइत गेल ।

एकतारा इसकूलमे लगपासक गामक बहुत रास विद्यार्थीसभ पढ़ैत छलाह ,जेना नवकरही,करही,परजुआरि,चंपा,नवटोली,कुशमौल,जमुआरी । किछु विद्यार्थी बेलौजा,सिनुआरा,विष्णुपुरसँ सेहो ओतए पढ़बाक हेतु अबैत छलाह । एकतारा,विचखानाक तँ बहुत रास विद्यार्थी छलाह । कुलमिला कए देहातक ओ बढ़ियाँ इसकूलमेसँ मानल जाइत छल । नवकरहीक नारायणजी,विजयजी,एकताराक फेकनजी, नगवासक श्रीनारायणजी किछु एहन विद्यार्थीसभ छलाह जे अखनो स्मृतिमे ओहिना बैसल छथि जेना पचास साल पूर्व रहल हेताह ।

ओहिदिन नाम लिखेलाक बाद बाबूक संगे हम गाम वापस अएलहुँ। ओही रातिमे लालबाबा(हमर बाबाक छोट सहोदर भाए स्वर्गीय जनार्दन मिश्र)क देहांत भए गेलनि । जखन हम इसकूलसँ वापस अएलहुँ तँ उतरबरिआ ओसारापर कैकटा महिलासभ लालबाबीक संगे कनैत छलीह । केओ-केओ बजैत छलैक जे लालबाबाक हालति बहुत खराप छनि । हमरा लगैत अछि जे रातिक नओ बजे बड़ी जोरसँ कन्ना रोहटि शुरु भेल । लालबाबा चलि गेल रहथि -दूर-बहुत दूर जतएसँ आइधरि केओ वापस नहि आएल । हमर संगे लालबाबाक दोसर पुत्र विन्ध्यनाथ मिश्र सेहो आठमामे नाम लेखओने रहथि । लालबाबाक देहांत आ हमर एकतारा इसकूलमे नाम लेखेबाक घटना एकहि संगे एकहि दिन भेल रहए आ जखन-तखन दुनू घटना हमरा मोनमे अखनो एकहि संगे उभरि जाइत अछि ।

लालबाबाकेँ क्षय रोग रहनि । बहुतदिनसँ ओ ओछाओन धेने रहथि । देहमे हड्डिएटा बाँचल रहनि । कैकदिन हुनका आङनमे रौदमे पटिआपर पड़ल देखिअनि । टीवी पटएबला विमारी रहैक । तथापि, हमसभ हुनका लग-पासमे ओहिना अबैत जाइत रहैत छलहुँ । ओहिसमयमे टीबी विमारीसँ हमरा गाममे बहुत लोग कमे बएसमे मरि गेल रहथि । जाहिमे स्वर्गीय शशिधर मिश्र,स्वर्गीय जगदीश झाक चर्च बहुत दिनधरि होइत रहैत छल । श्वर्गीय शशिधर मिश्र  स्वर्गीय कुमर मिश्रक पुत्र छलाह । सुनिऐक जे ओ बहुत प्रतिभाशाली रहथि। वाटसन इसकूल मधुबनीमे पढ़थि । मुदा कमे बएसमे टीबी विमारीक शिकार भए गेलाह । अंग्रेजीमे लिखल हुनकर बहुत रास कवितासभ हम देखने रही जे कालांतरमे धएल-धएल नष्ट भए गेल । स्वर्गीय जगदीश झा गेनखेलीमे माहिर रहथि। बहुत रास मेडलसभ जितने रहथि।  बिआहभए गेल रहनि। एकटा संतान(कामदेव भाइ) मात्र रहनि । ओतबे कम बएसमे ओहो टीबी विमारीसँ चलि गेलाह ।

लालबाबा चलि गेलाह । तकरबाद ध्रुब काका(हुनकर ज्येष्ठ संतानऐक बिआह भेलनि । हुनका सासुरमे एभोन साइकिल देने रहनि । विन्ध्यनाथजी ओही साइकिलसँ एकतारा इसकूल जाए लगलाह । हम पएरे जाइ । एमहरसँ विंध्यनाथजीक साइकिल पाछूसँ कृष्ण कुमार बाबू(बेलौजा ग्रामक हमरसभक शिक्षक)क टीटों करैत साइकिल अबैत छल तँ सामनेसँ श्रीनारायणजीक काकाक साइकिलक बसुरिआ आबाज सुनाइत छल । ई दुनू साइकिल हमरासभक इसकूलक रस्तामे कतहु- ने- कतहु जरूर टकराइत आ ओहीसँ हमसभ अंदाज लगाबी जे इसकूल सही समयपर जा रहल  छी कि नहि ।

हाइ इसकूल एकतारा देहातक इसकूल छल । ओहिमे पढ़इक अतिरिक्त अन्य गतिविधिक बेसी गुंजाइस नहि रहैक । कहिओ काल सांस्कृतिक कार्यक्रमक नामपर इसकूलक बरंडापर विद्यार्थीसभ जमा होइत छल,शिक्षक लोकनि सेहो कुर्सीपर बैसि जाइत छलाह । केओ-केओ गाना गबैत,केओ कोनो समसामयिक विषयपर रटल लेख बोकरि दैत । एकटा छोटसन कोठरीमे पुस्कालयक नामपर किछु किताबसभ राखल छल । जँ ओ पुस्तकालय खुजि गेल तँ बुझू जे चमत्कार भए गेल । ताहि माहौलमे किछु प्रतिभाशाली विद्यार्थीसभ बहुत नीक पढ़ाइ केलाह आ आगा जीवनमे सेहो नीकसँ स्थापित भए सकलाह तँ एकटा चमत्कारे कहबाक चाही । किछु नीक विद्यार्थीसभ किलासक अगिला बेंचपर बैसैत छलाह । भुसकौल विद्यार्थीसभ प्रयास कए पछिला बेंच धेने रहैत छलाह । किलासमे सबक नहि पूरा करबाक कारण एहन विद्यार्थीसभकेँ शिक्षक लोकनि ततेक हतोत्साहित करथि जे हुनकर सभक प्रतिभा आ आत्मसम्मान माटिमे  मिलि जाइत छल । मोटा-मोटी पाँच-सातटा विद्यार्थी एहिसभसँ बाँचल रहि जाइत छलाह आ मैट्रिकक परीक्षा नीकसँ पास कए कालेज पहुँचैत छलाह ।

सामान्यतः एकटा बेंचपर चारिटा विद्यार्थी बैसैत छल । हम,नारायणजी,श्रीनारायणजी,विजयजी, सामान्यतः अगिला बेंचपर बैसैत छलहुँ । हमरा लोकनि नीक विद्यार्थी  मानल जाइत छलहुँ । एकर सकारात्मक प्रभाव हमरा लोकनिक व्यक्तित्वपर सेहो पड़ब स्वभाविक छल । मैट्रिकक परीक्षाक परिणाम आएल तँ एकतारा इसकूलक परिणाम नहि बाहर भेल छल । किछु तकनीकी समस्या भए गेल रहैक । एकाध मास बादमे जखन परिणाम बाहर भेल तँ चारिटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल रहैक । हम,नारायणजी,श्रीनारायण आ विजयजी । परिणाम देरीसँ बाहर हेबाक कारणे नीक कालेजसभमे नामांकन बंद भए गेल रहैक । परिणामतः हम चारूगोटे आर.के.कालेज मधुबनीमे प्री-साइंसमे नाम लिखओलहुँ । आर.के .कालेज मधुबनी इलाकाक पुरान कालेज मानल जाइत छल । ओहि समयमे स्वर्गीय ए.के.घटक कालेजक कार्यकारी प्राचार्य  छलाह ।

आर्थिक उपार्जन हेतु श्रीनारायणजी फेकनजीक संगे मिलि कए टाइपिंग आ सार्टहैंड कोचिंग इसकूल चलबैत छलाह । ओहिमे निरंतर विद्यार्थीसभक भीर रहैत छल । कालक्रममे ओ ओकर  पूरा मालिक भए गेलाह । किछुदिन ओ ज्योतिषक काज सेहो केलनि। हुनकासँ टिपनि बनेबाक हेतु लोकसभ लाइन लगओने रहैत छल । तारीफक बात ई थिक जे एही आमदनीसभसँ ओ अपन दुनू संतानकेँ बिना कोनो प्रकारक ॠण लेने बहुत नीक शिक्षा देबामे कामयाब रहलाह । आब तँ हुनकर घर जाएब तँ देखिते रहि जाएब। साइते मधुबनी शहरमे ककरो घर एतेक सजल-धजल हेतैक । ऊपर दूमहला बनि गेल अछि । घरमे एक-एक चीज बहुत व्यवस्थासँ राखल भेटत । सभसँ  बेसी आकर्षित करैत अछि ओहिठामक शांति। हम कैकबेर जहन थाकि जाइ तँ हुनका ओहिठाम चलि जाइत छलहुँ आ थोड़बे कालमे सभटा थकान खतम भए जाइत । श्रीनारायणजी ओशोक कोनो प्रवचनबला टेप चला दितथि । किछुकाल धरि हमसभ ओकरा सुनितहुँ । फेर श्रीनारायणजी ओहिपर अपन मंतव्य दितथि। एहि तरहें बहुत नीकसँ समय कटि जाइत छल ।

श्रीनारायणजी अपन बाबासँ मंत्र लेने छलाह । कहक माने जे ओ हुनकर प्रथम गुरु रहथिन । बाबासँ हुनका शिक्षा भेटलनि जे कहिओ ॠण नहि ली । ताहिबातक ओ अंतधरि पालन करैत रहलाह । मधुबनी वाल्मिकी नगर(नीलम टाकीजसँ आगू) हुनकर घर छल । ओहि घरकेँ कतेको किस्तमे बनैत हम देखने छी । मुदा हुनका जखन जतबे आमदनी भेलनि ततबे काज करबैत गेलाह । तहिना नेनासभहक पढ़ाइमे सेहो ओ बैंकोसँ ॠण नहि लेलाह ।

श्रीनारायणजीक संग हमर परिचय सन् १९६३मे भेल छल। ५७ वर्ष बिति गेल ।  हुनकासँ ओहिना संबंध बनल अछि जेना इसकूलक समयमे छल । मधुबनी जेबाक एकटा प्रमुख आकर्षण श्रीनारायणजी रहैत छथि । हम सन्१९८८मे मधुबनीमे मकान बनेनाइ प्रारंभ केलहुँ । ओहि काजमे श्री नारायणजी निरंतर सहयोग करैत रहलाह । मिस्त्री तकनाइ.सामान किननाइ,मकान बनि गेलाक बाद ओकरा भारा लगेनाइ आ तकर बाद भारा वसूल केनाइ सभ काजमे ओ सहयोगी रहलाह । ततबे नहि जखन भेल जे ओ मकान बेचल जाएत तँ ताहुमे ओ सहयोग करबाक हेतु तत्पर रहथि । मुदा संयोग एहन भेलैक जे मकान एकहि दिनमे बिका गेल आ हुनका ओकर रजिष्ट्री भेलाक बादे हुनका सूचना दए सकलिअनि ।  असलमे मधुबनी मकानक किरायेदार जखन तेरह वर्ष रहलाक बाद मकान खाली केलाह तखन श्रीनारायणेजी ओहिमे आठटा ताला किनि कए ओकर सभटा केबारकेँ बंद केलथि । मकान निर्माणक काज जखन शुरु भेल रहए तँ सुखिआ-दुखिआ नाम दुनू मिस्त्रीकेँ ओएह ताकि कए देने रहथि । बिना कोनो स्वार्थकेँ एतेक दिनधरि ओ मकानक काजमे सहयोग करैत रहलाह। एहन उदाहरण भेटब बहुत मोसकिल । हमरा इच्छा रहए जे ओ मकान किनि लेथि । मुदा हुनका तकर प्रयोजन नहि रहनि । आखिर, ओ मकान बिका गेल मुदा जाधरि ओ रहल ओहिमे किछु-ने-किछु काज चलिते रहल आ ताहिमे श्रीनारायणजी मदति करिते रहलाह ।

श्रीनारायणजीक छोटपुत्र आशीष पीएचडी करबाक हेतु अमेरिका जाइत रहथि । श्रीनारायणजी सपरिवार रामकृष्णपुरमके हमर सरकारी आवासपर ठहरल रहथि । यात्राक दिन आबि गेल छल । हमसभगोटे हवाइ अड्डा बिदा भेलहुँ । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी उदास रहथि । एतेक सुयोग्य पुत्र एतेक दूर जा रहल छलखिन । मुदा हर्षक बात रहैक जे हुनका विश्वविद्यालयसँ छात्रवृत्ति भेटल रहनि । अपना दिससँ किछु खर्च नहि करबाक रहनि । एहन अवसर भेटलापर केओ गर्व कए सकैत अछि , से भाग्य हुनका सभकेँ उपस्थित कए देने रहनि । तखन अपनलोकक वियोगसँ दुख तँ स्वभाविके थिक । चेक-इन केलाक बाद एकबेर फेर ओ फटकिएसँ प्रणाम करए आएल रहथिन । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजीक आँखिसँ नोर झहरि रहल छल । कनी कालक हेतु तँ हमरो मोन दुखी भए गेल । मुदा हुनका लोकनिक एही त्यागक फल भेल जे ओ अमेरिका गेलाक बाद पीएचडी तँ केबे केलाह ,तकर बाद सेहो आगु पोस्टपीएचडीक पढ़ाइ केलाह आ ओतहि बहुत नीक प्रतिष्ठानमे वैज्ञानिकक काज आब कए रहल छथि । आशीषक अमेरिका जेबाक ओ दृष्य अखनहुँ हमरा ओहिना मोन पड़ैत रहैत अछि,जेनाक काल्हिए घटल होइक ।

हमरा हिसाबे श्रीनारायणजीक एहि उपलव्धिक पाछा हुनकर माता-पिताक आशीर्वाद बहुत काज केलक । ओ दुनू व्यक्ति संपूर्ण शक्तिसँ अपन माता -पिताक सालों सेवा करैत रहलाह । एहि मामिलामे एहन उदाहरण साइते भेटत । कारण सामान्यतः जँ बेटाकेँ इच्छा रहितो छैक तँ पुतहु संग नहि दए पबैत छथिन माता -पिताक सेवा नहि भए पबैत अछि । मुदा श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी प्रशंसाक पात्र छथि । ओ निरंतर श्रीनारायणजीक संग पुरलथि आ सेहो बहुत सहर्ष । जखन कखनहुँ हम श्रीनारायणजीक डेरापर गेलहुँ हुनकर परिवारमे अद्भुत समन्वय आ शांति देखलहुँ । दुनू व्यक्तिमे एहन तालमेल तँ डिबिआ लए कए ताकब तखनो भेटत की नहि । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी पाक कलामे अद्वितीय छथि । बारीक साग,बारीक नेबो,बारीक सजमनि सभ किछु मौलिक आ टटका होइत जे खाइते रहि जाइ ।

श्रीनारायणजी घरक पाछूक बारीमे तरह-तरहक फल,तरकारी सभ उपजबैत छथि । काते-काते कैक तरहक फूलक गाछसभ । सामनेमे ओशोक ध्यान आश्रम अछि जाहिमे भोर-साँझ ओशोक भक्त लोकनि ध्यान-पूजा करैत छथि । एकाधबेर हमरो ओतए रहबाक मौका भेटल छल । अत्यंत आकर्षक ध्वनिपर शांतिपूर्ण वातावरणमे भक्तलोकनि ध्यान करैत छथि आ अंतमे प्रसाद लए अपन-अपन घर चलि जाइत छथि । एहिसभ तरहक गतिविधिमे श्रीनारायणजी भोरसँ साँझ धरि ततेक व्यस्त रहैत छथि जे हुनका आओर कोनो चीजक वा आन ककरो कोनो प्रयोजन साइते रहैत होनि ।

श्रीनारायणजी सपरिवार अनेको बेर अमेरिकाक यात्रा कए चुकल छथि । ओहिठामक गत्र-गत्र घुमि चुकल छथि । एहूसाल ओ छ मास ओतहि छलाह । जेबा काल कहने रहथि जे वापसीमे हमरासभसँ भेंट करिते जेताह । ओ दिल्ली अएबो केलाह । मुदा कोरोनाक प्रकोप ताबे पसरि गेल छल । भेंट तँ नहि भए सकल मुदा फोनपर गप्प-सप्प भेल । मधुबनी वापस पहुँचलाक बादो हुनकासँ लगातार गप्प भइए रहल अछि । चिंता रहए जे अमेरिकासँ लौटलाक बाद कहीं कोरोना तंग ने करनि मुदा ओ पूर्ण ठीक छथि। हुनकामे खूबी अछि जे जखन जतहि रहैत  छथि ओतहि संपूर्ण रूपसँ समर्पित भए जाइत छथि । ओ बेर-बेर इएह कहैत हैत छथि-“”Let us live moment to moment .”ऐहि कथनकेँ ओ अपन जीवनमे पूर्णतः अंगीकार केने छथि । एहि प्रकारें एकटा सहज सरल जीबैत ओ सभतरहें उत्कृष्टताकेँ प्राप्त कए समाजमे सभक हेतु प्रेरणा पात्र भए गेल छथि । एहन विनम्र आ संस्कारी व्यक्ति सहीमे  एहि संसारमे बहुत कमे होइत छथि । प्रसन्नताक बात जे ओ हमरासभक बीचमे छथि आ निरंतर आनंदित केने रहैत छथि । अपन व्यवहारसँ ओ सन्यासी रहितहुँ सफल गृहस्थ  साबित करबामे सफल रहलाह ।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।5.10।।

(जे सभ कर्म व्रह्ममे अर्पण कए आसक्तिक त्याग करैत छथि ओ कमलक पात सन(जे पानिमे रहितहुँ पानिसँ फराक रहैत अछि) पापसँ लिप्त नहि होइत छथि ।)

गीताक उपरोक्त श्लोककेँ जीवंत उदाहरण छथि श्रीनारायणजी । हम एहिबातसँ गौरवान्वित छी जे नियतिवश एतेक दीर्घ अवधि धरि हुनकर निकटताक आनंद उठेबाक सौभाग्य हमरा भेटल ।

 ७.६.२०२०




सोमवार, 1 जून 2020

शांति और सुख

 

शांति और सुख

 

 

हमें क्या चाहिए?

थोड़ा सा वस्त्र और थोड़ी आनाज

रहने के लिए छोटा सा घर

जहाँ हो सुकून

जहाँ अपनों से दिल खोलकर

कर सकें वार्तालाप

जहाँ बैठने-उठने से मन में हो शांति

लेकिन नहीं जनाब!

यहाँ तो होड़ लगी है

कई पुस्तों के भविष्य  बनाने की

चाहे  जो भी करना पड़े

भले दूसरों का हक छीनना पड़े

लालच  का कोई अंत नहीं

कितने ऐसे हैं

जो सारी पृथ्वी मिल जाए तो भी रहेंगे बेचैन

और

पता नहीं कितने घर उजाड़ेंगे

कितनों की जिन्दगी करेंगे तबाह

ताकि वे अपने सपने का महल बना सकें

और जीवन भर रहेंगे अशांत

मकरे के जाल जैसे

हम   बुनते रहते हैं

 नित्य नए  विवाद

और उसी में उलझकर रह जाते हैं

जीवन भर

सत्य जो सुलभ है

करते नहीं स्वीकार

दैहिक सुख को बनाकर इष्ट

हम हो नहीं पाते कभी संतृप्त

और छूट जाते हैं अकेले

जहाँ से चले थे

जो हमारा है नहीं

वही हम को चाहिए

जो हमारे भाग्य में है  नहीं

 उसे पाने के लिए

करते  हैं छल-प्रपंच

अकेले थे अकेले जाएंगे

साथ कुछ भी नहीं जा पाएगा

जो भी संग्रह किया

सबकुछ यहीं रह जाएगा

वासनाओं से विरत मन

हो स्वयं में लीन

ढूंढ़ता है जब स्वयं को

सतत अंतर्लीन

तब हँसी आती स्वयं पर

कुछ नहीं रखा यहाँ

व्यर्थ यह संसार

सब छोड़ने के हेतु व्याकुल मन

कर रहा -चित्कार-

कुछ नहीं चाहिए’’

और छोड़ देता है सकल संसार

जब वासना हो शिथिल

मन कामनाओ से मुक्त

हम रहे निर्लिप्त

क्षणिक सुख -भोग से

 सही माने में वही है

सुख-शांति का सम्राज्य ।

 1.6.2020

शनिवार, 30 मई 2020

ग्रामोफोन


ग्रामोफोन



कारी गोल चक्का घुमि रहल छल । ओकर बीचमे एकटा मुरुत सेहो घुमि रहल छल । कतहु केओ नहि देखा रहल छल । तथापि, एकटा बक्साक बीचमेसँ आबाज अबैत छल । गाना सुनाइत छल । ओहि समयमे एहिसँ बेसी अजगुत बातक कल्पनो नहि कएल जा सकैत  छल । ओ छल ओहि समयक प्रमुख मनोरंजनक साधन-ग्रामोफोन । गाममे मोसकिलसँ दू-तीन गोटेकेँ से रहनि । गाममे कतहु सत्य नारायण भगवानक पूजा भेल,वा एहि तरहक कोनो आयोजन भेल तँ ओ बजाओल जाइत छल । नेनासभ बहुत उत्सुकतासँ ओकरा घेरने रहैत छल ।

हमसभ नेनामे कैकबेर ग्रामोफोनक रेकार्डकेँ घुमैत काल ओकर बीचमे नचैत चित्रकेँ देखि सोचिऐक जे इएह गाबि रहल छैक । कैकबेर होअए जे ग्रामोफोनक भीतर केओ नुकाऐल अछि आ गाबि रहल अछि । कैकबेर ग्रामोफोनक बक्सा खोलि कए देखबो करिऐक मुदा किछु नहि देखाइत छल । तखन ई गाना के गबैत अछि? ई आबाज कतएसँ आबि रहल छैक? एहि प्रश्नक जबाब के दैत? गाममे तँ तखनो ग्रामोफोन दुर्लभ छल । कोनो विशेष अवसरपर बजाओल जाइत चल-जेना ककरो ओहिठाम जँ सत्य नारायण भगवानक पूजा होइत तँ लोकसभक आग्रहपर अमीर काकाकेँ खुशामद करैत । तखन ग्रामोफोन आनल जाइत । डेढ़ हाथक पेटी खुजैत । ओहिमे एकटा नोकीला सुई गोलका चक्कामे लगाओल जाइत । हाथकेँ घुमा-घुमा कए ओकर स्प्रिंगकेँ तानल जाइत । ग्रामोफोनक बीचमे रेकार्डकेँ राखल जाइत । सभसँ अंतमे ओकर स्वीचकेँ घुसकाओल जाइत  आ शुरु होइत संगीत । बाह! की कमालक मसीन अछि - लोक मोने-मोन सोचैत। बेसी काल रामायणक रेकार्ड लगाओल जाइत । कैकबेर नचैत-नचैत रेकार्ड ठाढ़ भए जाइत । आबाज खतम । गीत बंद । नेनासभ  चारूकातसँ लुधकि जाइत । सभकेँ जिज्ञासा जे आखिर भेलैक की?

हमरा गाम(अड़ेर डीह टोल)मे स्वर्गीय घुरन बाबूक ओहिठाम सेहो ग्रामोफोन रहनि । ओ ग्रामोफोन बेहतर चल । हुनकर पुत्र डाक्टर सच्चिदानंदजीक संगे हम ओहि ग्रामोफोन धरि कैकबेर पहुँचल रही । कहि नहि सकैत छी जे कतेक उत्सुकताक संग ग्रामोफोनक गीत सुनने रही । किछुदिनक बाद एकटा ग्रामोफोन हमर बाबू सेहो लेलाह । मुदा ओ ग्रामोफोन स्थानीय मिस्त्री बनओने रहए । कखनहुँ चलैक आ कखनो बैसि जाइक । ओहिमे एकटा भोपू लागल रहैक जाहि बाटे आबाज बाहर होइक । ऐकबेर किछु टाका जेना-तेना ओरिआन कए हम बिंदूकाकाक संगे मधुबनी जा कए ग्रामोफोनक रेकार्ड किनने रही । किशोरीलाल चौक मधुबनीसँ सटले  ओ दोकान रहैक। ओ ससुराल फिल्मक गाना रहैक । एकदिस -तेरी प्यारी-प्यारी सुरत को किसी की नजर न लगे…….दोसर दिस रहैक-अपने उल्फत पे जमाने का नजर ना होता तो कितना अच्छा होता..............

नेनामे कोनो बातक  जिज्ञासा बहुत होइत छैक । ग्रामोफोनसँ निकलैत आबाजकतएसँ अबैत अछि? ई जानबाक इच्छा प्रवल रहैत छल । केओ कहितए जे ग्रामोफोनक भीतर एकटा बुढ़िया रहैत छैक । ओएह गबैत छैक,केओ किछु । हम ग्रामोफोनकेँ खोलि-खोलि ओकर पाट-पाटमे ओहि बुढ़या गबैयाकेँ तकैत रहैत छलहुँ । मुदा कतहु किछु कहिओ नहि देखाएल ,उल्टे कैकबेर मसीन खराप भए गेल। कैकबेर ग्रामोफोनक भोपूमे मुरी पैसा कए देखैत रही मुदा जेहो आबाज अबैत छल सेहो क्रमश; बंद भए जाइत छल । अस्तु,ग्रामोफोन एकटा रहस्य बनल छल । मुदा केओ ई नहि बूझा सकल जे आखिर ई कोना काज करैत अछि आ एहिमे सँ निकलि रहल आबाजक पाछू कोन विज्ञान छैक?

ग्रामोफोनक ओएह रुप-रेखा हम बहुत दिनक बाद देखलिऐक दिल्लीक कनाट प्लेसमे  । हमुमान मंदिरसँ दर्शन कए बाहर भेल रही । काफी होमक नीचाबला परिसरमे कोनपर ग्रामोफोन राखल छल । ओएह छवि,ओहने छटा जेहन हम नेनामे अपन गाममे देखने रहिऐक । ओकर आकार कनेक पैघ जरूर छलैक । बड़ीकाल धरि हम ओकरा देखिते रहि गेलहुँ । फेर मोबाइलसँ ओकर फोटो खिचलहुँ। पता लागल जे ओ सौकिआ ओतए राखल छैक ,बिकेतैक नहि । जँ बिकेबो करितैक तँ आब केओ सजाबटेक हेतु लेत ,ओहिसँ आओर काज तँ करत नहि । कारण आब तँ एक सँ एक यंत्र आबि गेल अछि । गाना-बजानाक साधनक कमी नहि अछि । नान्हिटा रेडिओसँ,मोबाइलसँ हजारों गाना बजाओल जा सकैत अछि । टीवीक तरह-तरहक प्रकारसँ बजार भरल अछि । से जे होउक मुदा ग्रामोफोन संगीतक दुनिआक इतिहासक अभिन्न अंग रहल अछि आ ताहि बातकेँ बिसरलो नहि जा सकैत अछि ।



30.5.2020

मंगलवार, 26 मई 2020

पिताक देहावसान





पिताक देहावसान

 

 

भैया नहि रहलाह ।

की भेलनि?”

आइ भोरे छातीमे दर्द उठलनि ।   योगीजी पानि चढ़ओने रहथिन। मुदा हाल गड़बड़ाइते गेलनि आ किछुकाल पहिने चलि गेलाह।

मधुबनीसँ नबोनाथजीक फोन छल । समाचार सुनि कनी काल लेल सुन्न पड़ि गेलहुँ । फेर सम्हरलहुँ,शांत भेलहुँ ।  सोचलहुँ जे अखन तुरंत तँ गाम गेनाइ संभव नहि अछि । आइ-काल्हि जकाँ धर दए हवाइ जहाजपर चढ़ि जेबाक समय नहि रहैक ने हमरा लग ततेक पैसाक जोगार छल । श्राद्धक हेतु सेहो पैसाक जोगार करबाक छल । अस्तु, नवोनाथजीकेँ कहलिअनि-

अनुज लोकनिकेँ कहबनि जे आगु बढ़थि ।

कहक माने जे पिताक अंतिम संस्कार कए देल जानि । हमर प्रतीक्षा नहि करथि । सएह भेवो कएल । हमरासँ छोट सुरेन्द्रजी बाबूकेँ आगि देलखिन। आओर दुनू भाइ सेहो ओतए उपस्थित रहथि । गाम-घरक लोग तँ रहबे करथि ।

जखन नबोनाथजीक फोन आएल तँ हम कार्यालयमे रही। करीब चारि बजेक समय रहल हेतैक । ७ फरबरी १९८९क (फाल्गुन शुक्ल द्वितिया )दिन रहैक । ओहि समय हम गृह मंत्रालयक आंतरिक वित्त विभागमे डेस्क अधकिारी रही ।  ए.के. हुइ हमर अधिकारी छलाह । हुनका सभ बात कहलिअनि । ओ बहुत सहृदयतापूर्वक हमरा हेतु रेलक टिकटक ओरिआन केलाह । कार्यालयसँ छुट्टी सेहो भेटल। तकरबाद सरोजिनी नगर स्थित सरकारी आवासपर पहुँचलहुँ । श्रीमतीजीकेँ सभबात कहलिअनि।

पिताक देहांतसँ पूर्ब रातिभरि हमरा निन्न नहि भेल रहए। भरि राति टुकुर-टुकुर करैत बिति गेल छल । संभवतः आसन्न दुर्घटनाक आहट मोनकेँ भए गेल हेतैक । मधुबनीमे घर बनाएब प्रारंभ केने रही। हमर आग्रहपर नबोनाथजी बाबूकेँ डाक्टरसँ बेनीपट्टीमे देखओने रहथि ।  यद्यपि ओ बहुत कमजोर भए गेल रहथि,भूख नहि लगनि मुदा एहन नहि लगैक जे एतेक जल्दी चलि जेताह । हमर छुट्टी बिति गेल छल । पटना बाटे टिकट छल । मुदा पटना पहुँचतहि पता लागल जे ट्रेनमे हड़ताल भए गेल छैक । ट्रेन नहि चलत । तखन की कएल जाए? सपरिवार साढ़ूजीक डेरापर पटना पहुँचलहुँ । दोसर दिन जा कए ट्रेन खुजल । हमसभ दिल्ली पहुँचलहुँ । तकर दू दिनक बादे ई समाचार भेटल ।

ई हमर दुर्भाग्य जे हम पिताक अंतिम समयमे हुनका लग नहि रहि सकलहुँ ,हुनकर अंतिम संस्कारमे भाग नहि लए सकलहुँ। मुदा आब एहिसभपर सोचलासँ की फएदा? हम कइए की सकैत छलहुँ? हवाइ जहाजसँ जा सकब से तँ सोचेबो नहि कएल छल? एतबा ध्यानमे आएल जे हुनकर श्राद्धक हेतु यथासाध्य टाकाक जोगार केने चली नहि तँ गाम गेलाक बाद ओहो एकटा महासंकट भए जाएत । ककरासँ मंगितिऐक? दिल्लीमे तँ तइओ जोगार भए सकैत छल । गाम तँ गामे थिक । दिल्लीक लड्डू जे खेलक सेहो पछतेलक आ जे नहि खेलक सेहो ।  गाम जेबासँ पूर्व टाकाक जोगार करब जरूरी छल आ सएह सोचि दू दिनक बाद गाम बिदा भेलहुँ ।

असलमे समाचार भेंटलाक तुरंत बाद नहि जेबाक कारण श्राद्धक हेतु टाकाक जोगार करब छल । गाम खाली हाथ गेनाइ उचित नहि बुझाएल । जेना-तेना तेसरदिन रातिमे हम गाम पहुँचलहुँ । सबसँ पहिने माए भेटलीह । सदा-सर्वदा जकाँ शांत । अपन बच्चासभकेँ देखि संतोख केने । हमरा देखितहि कहलीह-

आब कमसँ कम शांतिसँ काज होएत ...।

तकरबाद माए बाबूक देहांतक परिस्थितिक चर्च करैत रहलीह । बड़का-बड़का आँखिसँ ढबर-ढबर नोर धारा प्रवाह बहि रहल छलनि । की कहितिअनि? कोना संतोख दितिअनि ? लगभग बाबन वर्षक संग छुटि गेल रहनि । दुखक बात तँ रहबे करैक । मुदा एकर कोनो समाधानो तँ नहि भए सकैत छल । से ओ बुझैत छलीह । एहन असीम धैर्य भगवान सभकेँ देथुन । मोनमे अपार पीड़ाकेँ निरंतर झपने दिन-राति ओहनो समयमे ओ परिवारमे घिरनी जकाँ बहैत रहलीह,काज करैत रहलीह -बिना कोनो प्रतिपूर्तिक अभिलाषाकेँ । के उतारत हुनकर ॠण ? मुदा अंत- अंत धरि हमरा मोनमे ई भाव अबैत रहल जे जन्म-जन्म ओएह हमर माए होथि । हम हुनकर जे ॠण नहि उतारि सकलहुँ से आगु उतारबाक प्रयास करी । कैकबेर अखनो हमरा मोनमे होइत रहैत अछि जे कनीको कालक हेतु ओ घुरि अबितथि तँ हम हम हुनकर पैर पकड़ि माफी मांगि लितहुँ । कहितिअनि-हे माते! हमरासँ जे त्रुटि भेल ताहि हेतु क्षमा करू । मुदा से कतहु भेलैक अछि? एहि संसारसँ जे एकबेर गेल से घुरि नहि आएल , कदापि नहि ।

एक हिसाबे हम श्मशानेमे बैसल रही । बाबूक साराक आगि मिझा गेल छल । हम,हमर अनुज लोकनि आ महापात्रजी ओहिठाम रही । सभ मिलि कए छाउरमेसँ हड्डीक अवशेष(फूल) चुनैत रही । तकर बाद माटि,पानि आ बचलाहा छाउर सभकेँ मिला कए सारा बनाओल गेल । ओहिपर तुलसी रोपल गेल ।  मंत्र पढ़ल गेल । ई सभ करैत-करैत किछु समय लागल । बीच-बीचमे खाली समयमे बाबूक संग बिताओल समय ,हुनकर हमरासँ आशा-अभिलाषाक कतेको प्रसंग मोन पड़ैत रहल । ई स्थिति श्राद्धक बादो बहुत दिन धरि बनल रहल ।

सभ माता-पिता अपन संतानकेँ यथासंभव मानैत अछि,नीकसँ पालन करैत अछि । मुदासभक भाग्य एकरंग होइक तखन ने? केओ जनमिते राजाक घरमे पहुँचि जाइत अछि आ केओ सड़कपर कनैत रहैत अछि आ माता-पिता असहाय भेल मजदूरी करैत रहैत अछि । हमर माता-पिताक नओटा संतान छलनि । पाँचटा बेटी आ चारिटा बेटा। हम हुनकर छठम संतान छलिअनि।  हमर बाबूक हालत जखन गड़बड़ेलनि तँ ओ सोचथि जे हम ततेक भारी अधिकारी बनब जे सभ क्षतिपूर्ति कए देबनि । सभ भाए-बहिनकेँ जकरा-जतेक मदतिक काज हेतनि से कए देबनि आ अपन तँ कइए लेब । हम मेहनतिसँ पढ़ी,अपना भरि जे पार लागए से करी,प्रयास इएह रहए जे पिताक मनोरथ पूर्ण कए सकिअनि । मुदा कहबी छैक जे हाथ आ मुँहक बीचमे  बहुतक फासिला होइत छैक।

मनुक्ख केहन पाथर जीव होइत अछि? की- की ने सहि जाइत अछि? कहि नहि सकैत छी जे हमर पिता हमरा कतेक मानथि,कतेक प्रेरित करथि,दिन-राति एहि प्रयासमे रहथि जे हम नीकसँ-नीक करी,ताहि हेतु जे पार लगलनि से केबो केलाह । मुदा कर्ण जकाँ हुनको जीवन रथक पहिआ फँसि गेल रहनि । आर्थिक पराभव तेहन भए गेलनि जे ऐन मौकापर सभकिछु ठमकि गेल । सभ तैयारी धएले रहि गेल।

चारिमदिन सारा झपलाक  बाद हमरा उतरी स्थानांतरित कएल गेल । तहिआसँ द्वादसा धरि तरह-तरहक कर्मकाण्ड कएल गेल । ओहि समयमे हमरो आर्थिक परिस्थिति ठीक नहि छल । जेना-तेना किछु टाकाक जोगार कएलहुँ । हमर अनुज सुरेन्द्रजी सेहो यथासाध्य योगदान देलथि । एहि तरहें गामभरि ब्राह्मण भोजन(दुनू दिन)क व्योंत भेल । जेना-तेना बाबूक श्राद्ध संपन्न भेल। श्राद्ध भए गेलाक बादमाएक मोन बहुत आश्वस्त लागि रहल छलनि ।

हमर परिश्रम आ निष्ठाक प्रशंसा बाबू बेर-बेर आन भाए लोकनिक समक्ष करथि जाहिसँ हुनकोसभकेँ ओहिना करबाक प्रेरणा होनि । मुदा भेल उल्टे । ओ सभ नहि तँ कमसँ कम हमर एकटा भाएक मोनमे तेहन ग्रंथि बनि गेलनि जे ओ जीवन भरि ओहिसँ उबरि नहि सकलाह आ हमरा ओहि कारण जे दुर्गति केलाह से हमही जनैत छी । अभिवावककेँ चाही जे एकटा बच्चाक प्रशंसा दोसर-तेसर बच्चालग करैत समयमे सावधानी राखए,नहि तँ संतानसभमे आपसी कलहक कारण बनि जाइत अछि ।

सन्१९८९मे पिताक देहांतक बाद २७ वर्ष माए रहलीह । सभदिन ओहिना शांत,संघर्षरत । पिताक देहांतक बाद सभसँ बेसी चिंता हमरा माए हेतु भेल । हम निश्चय केलहुँ जे जीवनपर्यंत माएक सेवा करैत रहबनि जाहिसँ हुनका कोनो कष्ट नहि होनि । हमरा एहि बातक संतोख अछि जे हम एहि संकल्पक पालन केलहुँ । कतबो परेसानी भेल मुदा सभ मास बिना कोनो अपवादकेँ हम माएक नामे मनीआर्डर पठबैत रहलहुँ । कतेको बेर बहुत जरूरी खर्चामे  कटौती कए एहि काजकेँ कएल जा सकल । यद्यपि हमरा नीकसँ बूझल छल जे माए हमर पठाओल टाकामेसँ गाममे हुनका लग रहैत परिवारक अन्य सदस्य लोकनि पर खर्च करैत रहलीह-इच्छा वा अनिच्छापूर्वक । मुदा ओ आर्थिक आधार हुनका जीवनमे बहुत मदति केलकनि । हम एहि बातक हेतु निरंतर प्रयास केलहुँ जे ओ हमरा संगे दिल्ली रहथि मुदा ओ ताहि हेतु कहिओ तैयार नहि भेलथि । हमरा जनैत तकर मूल कारण छल जे ओ स्वतंत्र रहए चाहैत छलीह । दोसर कारण हुनकर गाममे रहनिहार हमर अनुज आ हुनकर परिवार छलनि । माए तँ सभहक होइत छैक। नओटा संतान हुनका रहथिन । जाहिर  छैक जे सभक प्रति हुनकर अनुराग रहनि । तेँ ओ कहिओ गामसँ बाहर रहबाक हेतु राजी नहि होथि । जे परिस्थिति छलैक ओहिमे जे संभव  छलैक से हम केलहुँ ।

हमर पिताक अभिलाषा रहनि जे हम बहुत पढ़ी,बड़का हाकिम बनी,तकर बाद पूरा परिवारकेँ जकरा जे जरुरत होइक से पूरा करैत रही । मुदा जीवनमे एहन साइते होइत होइक । ने हमरा ओतेक सामर्थ्य भगवान देलनि जे सभक भार उठा लितहुँ आ जकरा,जखन जाहि वस्तुक प्रयोजन होइतैक से पूरा करैत चलि जइतहुँ । खैर! जे हेबाक छलैक से भेलैक । आब ओकर की घमरथन होएत । माता-पिताक प्रतिए सभ संतानक कर्तव्य होइत अछि । मुदा से कहाँ होइत अछि? माता-पिता नओटा संतानक पालन केलनि आ जखन माए दुखित भए ओछाओन धए लेलीह आ हुनका परिवारक जरुरत भेलनि तँ जे हाल भेल से लिखल नहि भए रहल अछि।

ई जीवन छैक । एहिठाम सभकिछु मनोनुकूल नहि होइत छैक । भावी प्रवल होइत छैक । समय ककरो नहि छोड़ैत अछि । कृष्ण सन महान व्यक्ति एकटा मामूली व्याधाक हाथे मारल जाइत छथि । अर्जुन लुटेरासभक सामनेमे हथप्रभ रहि जाइत छथि आ ओ सभ द्वारकाक विधवा आ ओकरसभक धन-संपत्तिकेँ लुटि लैत अछि । एहन-एहन अनेको उदाहरण एहि संसारमे भेटत । एहिसभ बातपर विचार केलासँ शांति भेटि सकैत अछि । अन्यथा तँ जीवनमे लोक सोचिते रहि जाएत ।

समय बिति जाइत छैक,मुदा बात मोन रहि जाइत छैक । आइओ जखन असगरमे सोचैत छी तँ बाबू बहुत मोन पड़ैत छथि आ मोन पड़ैत अछि हुनकर सतत जीवंत आ आशावान व्यक्तित्व। अखनहु कैकबेर लगैत अछि जेना बाबू ठाढ़ छथि,हम हुनका गोर लागि रहल छी आ ओ हमरा आशीर्वादक वर्षा कए रहल छथि .. 



26.5.2020




सोमवार, 25 मई 2020

जीवन यात्रा






जीवन यात्रा



जीवन एक यात्रा है

सभी चलते जा रहे हैं

कोई आगे कोई पीछे

यद्यपि पता नहीं है गंतव्य

और चलते-चलते हो जाते हैं विलुप्त

कोई भूलकर भी नहीं आता वापस

बताने कि उधर क्या था?

या कुछ है ही नहीं

जो गया बस चला ही गया

छोड़ गया हमें अपने हालपर

कि हम सोचते रहें

तलासते रहें

कि सही क्या है?

परंतु,कौन देगा उत्तर?

सभी तो स्वयं में हैं प्रश्न ।

किसी को नहीं पता कि

मृत्यु अपने आप में अंत है या नहीं ?

इसके बाद कुछ है कि नहीं?

मृत्यु के बाद कुछ बचा या नहीं ?

शरीर से पृथक आत्मा है या नहीं?

परंतु,क्या रखा है इन विवादों में ?

जो विद्यमान है

जिसे हम सद्यः देखते हैं

वह है आज का जीवन,

इसे सार्थक बनाइए

छोड़िए कल की चिंता

जो होना है सो होगा,

इसपर सोचते रहने से क्या लाभ?

सामने जो समस्या है

उसका समाधान कीजिए

काम,क्रोध ,लोभ को छोड़कर

शांति को अपनाइए,

जीवन का अर्थ ही बदल जाएगा

कलतक जो पराए थे

सब अपने बन जाएंगे

सब कुछ यहीं है

बात इसी पर है कि

 आप  क्या अपनाते हैं,

वही हवा पीकर सर्प बना लेता है विष

और

बेली के फूल से निकलता सुगंध है ।

जो है उसे तो जी लीजिए

समय पर सही निर्णय से

जीवन को सही दिशा दीजिए,

वह अपना गंतव्य पहुँचेगा

बिना किसी अपवाद के ।

सोचिए और समझिए कि

जीवन एक अवसर है

मुक्त होने का स्वयं से

और उनसे भी

जिसे हम चाहे अनचाहे

जीवन भर सहेजते रहे

 और

चाहकर भी अपना न सके।





रबीन्द्र नारायण मिश्र

२५.५.२०२०

mishrarn@gmail.com