सोमवार, 20 अप्रैल 2020

लेखक परिचयः


छाप सरायकेला साहित्यिक महोत्सव 2024

आकाश का मौन

विमोचनःभोरसँ साँझ धरि

साहित्यिक कार्यक्रम नई दिल्ली

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कविता पाठ जीवनसंघर्षः




परिचय

 


लेखक परिचयः

नाम : रबीन्द्र नारायण मिश्र
पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र
माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी
जन्म तिथिःभादव शुक्ल चतुर्थी सन् ‍१३६० साल 

पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह
मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी
वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवानिवृत्त)/
स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली(सेवानिवृत्त)
शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक

श्री रबीन्द्र नारायण मिश्रक प्रकाशित कृति :मैथिलीमे:-

प्रकाशन वर्ष:2017
१. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा),    २. ‘प्रसंगवश’ (निवंध), ३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग),

प्रकाशन वर्ष:2018

 ४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)

प्रकाशन वर्ष:2019

 ९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास) १२.स्वप्नलोक(उपन्यास)

प्रकाशन वर्ष:2020

१३.शंखनाद(उपन्यास) १४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)

१५.ढहैत देबाल(उपन्यास) १६.पाथेय(संस्मरण)

प्रकाशन वर्ष:2021

१७.हम आबि रहल छी(उपन्यास) १८.प्रलयक परात(उपन्यास)

प्रकाशन वर्ष:2022

१९.बीति गेल समय(उपन्यास) २०.प्रतिबिम्ब(उपन्यास)२१.बदलि रहल अछि सभकिछु(उपन्यास)22. राष्ट्र मंदिर(उपन्यास) २३. संयोग(कथा संग्रह) २४.   नाचि रहल छलि वसुधा  ( उपन्यास)

प्रकाशन वर्षः2023

२५.दीप जरैत रहए(उपन्यास)        २६.ठेहा परक मौलायल गाछ(उपन्यास) २७.पटाक्षेप(उपन्यास)

 प्रकाशन वर्षः2024

 २८ माटि बजा रहल अछि(यात्रा प्रसंग) २९ जयतु जानकी(उपन्यास)

३० यज्ञसेनी(उपन्यास)

प्रकाशन वर्षः2025

३१. माटि बजा रहल अछि(संस्मरण) ३२.  गाछ बजैत छैक(कथा संग्रह) ३३.सूर्यपुत्र(उपन्यास)

In English: -

Year of publication:2018
1. The Lost House (Collection of short stories)
2. Life is an art

3.The Ganges Whispers (English translation of my Maithili Novel,Ham Aabi Rahal Chhee (हम आबि रहल छी)

हिन्दी में –

प्रकाशन वर्ष:2019
१.न्याय की गुहार

 

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                                                                    सन् ‍१९६६ ई०क फोटो,,,

 सन्‍१९७५ई०क फोटो

सन् ‍१९७५


सन् ‍१९९८ई०क फोटो
सन्२०२२ई०क फोटो(अहमदाबाद) 



जमशेदपुर(सन्२०२४ई) 


सगर राति दीप जरए,निर्मली(सन्२०२४ई०) 

मेघालय(सन्२०२४) 


पेरिस(सन्२००९ई०ऐ


भतिजीक बिआहःगाममे सन्२०‍१५ई०) 



पोर्टब्लेयरमे(सन्२०‍१२ई०) 








सेवानिवृत्ति

सेवानिवृत्ति
सेवानिवृत्ति
स्वर्गीय मोहन भारद्वाजजीक संग सन्२०‍१२ई० पटनामे





मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत !


हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत !




विश्व कर रहा त्राहिमाम्!

दिन-प्रतिदिन सैकड़ों निर्दोष,

 हो रहे अकाल काल- कलवित,

व्यर्थ हो चुके हैं वैज्ञानिक अविष्कार ।

आशा भरी दृष्टि से ,

सभी देख रहे भारत को ।

ऐसे में भारत ही करेगा चमत्कार,

संयम और निष्ठा की पुँजी से

बचा लेगा स्वयं को और विश्व को भी ।

हम फिर बनेंगे ध्वजवाहक,

इस भूधरा पर,

सुख, समृद्धि एवम् शांति के।

विश्व पर मड़राते संकट के बादल,

छट के रहेंगे,

चाहे जितना हो विनाशकारी,

कोरोना का प्रकोप,

हटकर रहेंगे ।

छटेगा अंधेरा और शीघ्र

फैलेगा जीवन में प्रकाश ।

हो चाहे जितना भी वलिष्ट

हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत!

रबीन्द्र नारायण मिश्र


१४.४.२०२०

लहसन उपन्याससँ उठैत जीवन संघर्षक स्वर




लहसन उपन्याससँ उठैत जीवन संघर्षक स्वर

:: रबीन्द्र नारायण मिश्र

समाजक निर्माण सभगोटे मिलि कए करैत छी। सभक सुख-सुबिधाक हेतु प्रकृति अपन समस्त संपदाक निर्माण केने अछि। जे वस्तु जतेक महत्वपूर्ण अछि से ततेक प्रचुर मात्रामे आ सर्वसुलभ करबाक व्यवस्था प्रकृति द्वारा भेल अछि। जेना कि वायु, जल, सूर्यक प्रकाश निरंतर उपलब्ध अछि। तहिना पृथ्वी सेहो सुलभ रहल होएत। मुदा मनुक्खक स्वार्थी प्रवृति कही, वा जे कही, लोक समस्त शक्तिसँ सर्वसुलभ वस्तुसभकेँ दुर्लभ करबाक कोनहु प्रयास नहि छोड़लक।

 ई बात सभ जनैत अछि जे एहि पृथ्वीक एक इंच केओ अपना संगे नहि लए जा सकत, खाली हाथ आएल आ खाली हाथ चलि जाएत तथापि जेना-तेना अधिक-सँ-अधिक भूभागपर अपन कब्जा करएमे दिन-राति लागल रहैत अछि। परिणाम की भेल? पृथ्वी खंड-खंड भए गेलथि। हुनकर आँङन लहु-लहान भेल अछि। केओ सए बिघा जमीन कब्जा कए लेने अछि तँ केओ हजार। कतेको एहनो लोक छथि जिनका घरारिओ नहि छनि, ककरो अनकर जमीनपर बास केने छथि। जखन ओ चाहए भगा दिअए। मनुक्ख एहि प्रवृत्तिक कारण पृथ्वीपर भूमिहीन मजदूरक हुजुम बनि गेल। एहन लोकक केओ माए-बाप नहि। दिनमे खाउ आ साँझ हेतु प्रयासमे लागि जाउ। बात ततबे तक रहैत तखन तँ चलू...। मुदा मनुक्खक राक्षसी प्रवृति आओर आगाँ बढ़ल। भरिदिन काज केलाक अछैतो मजदूर बोनि माङलापर मारल-पीटल गेल। तेँ ने ओ घसल अठन्नी बाजि उठल- “हम कतए जाउ ,अवलंब पाउ...।”[1]

हालत तँ आब ई अछि जे पानि,हवा, रौद किछु सर्वसुलभ नहि रहल। जकरा टाका अछि तकरा लेल सभकिछु सुलभ, नहि तँ बाट तकैत रहू। एकहि समयमे एकहि ठाम रौदी आ दाही दुनू एहि समाजमे विद्यमान देखल जा सकैत अछि।

जाहिर बात अछि जे अभावग्रस्त लोक रोजी-रोटीक फिराकमे जतए-ततए बौआइति रहैत अछि। तेहने एकटा व्यक्ति अछि श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक लिखित उपन्यास ‘लहसन’क नायक- मेवालाल। मेवालाल अपन घरबालीक गहना बेचि कलकत्ता काज करए बिदा होइत अछि। रस्तामे ओकरा किछु आओर सहयात्रीसभ भेटि जाइत छथि। रविनाथक संग भए गेलासँ हुनकर यात्रा आसान भए जाइत छनि। जेना-तेना कलकत्ता पहुँचि जाइत छथि। ओहिठाम पहिनेसँ रहैत कैकटा मजदूरसभ हुनका मदति करैत छथि। कलकत्तामे अपना सन-सन कतेको मजदूरसभसँ मेवालालक परिचय होइत छनि। ओएहसभ हुनका हथरिक्सा चलेबाक काज पकड़बामे सहयोग करैत छथि। कठोर परिश्रमसँ ओ अपन जीवन-यात्राकेँ आगू बढ़बैत छथि। अपनो जीबैत छथि आ गाममे रहि रहल अपन परिवारोकेँ जिआबैत छथि। किछुसाल एहिना बीति जाइत अछि। एकदिन संयोगसँ हुनका एकटा मीलमे नौकरी भेटि जाइत छनि। रहबाक हेतु घर सेहो ओही कंपनी द्वारा देल जाइत छनि। दरमाहा सेहो नीक भए जाइत छनि। तखन गामसँ अपन पत्नी राधाकेँ लए अनैत छथि। पत्नीक आबि गेलासँ समय नीकसँ बीतए लगैत छनि। एहीक्रममे ओही मीलमे काज केनिहारक हिनकर पड़ोसी ‘सुनीलपाल’सँ हुनका दोस्ती भए जाइत छनि। दुनू परिवारमे अबरजात बढ़ैत अछि। मेवालालक पत्नी ‘राधा’ आ सुनीलपालक पत्नी ‘अंतिकापाल’क बीच सेहो निकटता बढ़िते रहैत अछि। संयोग एहन होइत अछि जे सुनीलपालक पत्नी अंतिकापालक दुर्घटनामे मृत्यु भए जाइत अछि। सुनीलपाल घरमे असगर भए जाइत छथि। एहन समयमे हुनकर ध्यान मेवालालक पत्नी राधापर पड़ैत छनि। उपन्यासकारक शब्दमे-

“तेकर बाद राधापर बंशी पथलैन, जे सुतैर गेलैन। सुतैर ई गेलैन जे राधाकेँ अपन पत्नी बना अपना घरमे रखि लेलैन। ओना, बुढ़ाड़ीमे सिनुरदान करब नीक नइ बुझि नइ केलैन। तँए राधा सिनुर नइ करै छैथ सेहो नहियेँ अछि। दुनूक सम्बन्ध सभकेँ बुझल, मुदा तैयो सुनीलपाल राधाकेँ छह मास चोरा कऽ रखलैन।”[2]

पत्नीकेँ तकबाक क्रममे मेवालाल सुनीलपालक ओहिठाम सेहो गेलाह। यद्यपि राधा सुनीलपालक घरमे दोसर कोठरीमे बंद रहथि मुदा ओ सामने नहि अएलीह। सुनीलपाल चाह-पान पिआ कए मेवालाकेँ बिदा करबामे सफल रहलाह। तथापि मेवालालक मोनमे कतहु-ने-कतहु संशय रहबे करनि। हुनकर संशय ओहिदिन सत्यमे बदलि गेल जखन मेवालाल कलकत्ताक बजारमे राधाकेँ सुनीलपालक संगे घुमैत स्वयं देखि लेलनि। परिणाम सोचल जा सकैत अछि। मेवालाल एकर प्रतिकारक हेतु न्यायालयक शरण लैत छथि। न्यायालयमे हुनकर विजय होइत छनि। राधा वापस मेवाला लग अबैत छथि। तकरबाद मेवालाल सहर छोड़ि देबाक निर्णय करैत छथि। राधासंगे गाम आबि कए भोजभात करैत छथि। एकबेर फेर ओ गौंवा भए जाइत छथि।

मनुक्खकेँ जखन पेट जरैत छैक तँ होइत छैक जे कोनो उपायसँ पेट भरए। जखन तकर जोगार भए जाइत छैक तकरबाद आओर-आओर आवश्यकतासभ फुराइत छैक। कहल जाइत अछि जे ‘मन हर्षित तँ गाबी गीत।’ मेवालाक संगे सेहो सएह भेलनि।

“ओना, गाममे चारि कोठरीक पक्का मकान सेहो मेवालाल बना नेने छला, मुदा पत्नीकेँ संग रखने मकानमे ताला लगबए पड़लैन। सालमे एकबेर दुनू परानी गाम अबै छला आ मास दिन तक रहै छला। तही बीच बेटियो-नातिकेँ अपना ऐठाम लऽ अबै छला आ कलकत्ता जाइसँ दू-तीन दिन पहिने, सासुर पठा दइ छेलखिन। माने बेटी सासुर चलि जाइ छेलैन। ओना, अखनो धरि दुनू परानीक मनमे गामक प्रति सिनेह छैन्हे जइसँ ने कलकत्तामे आन नोकरिहारा जकाँ घरे बनौलैन आ ने रहैक विचारे केलैन। नीक दरमाहा रहने मेवालाल गाममे दू बीघा खेतो अरजलैन।”[3]

महानगरसँ गामधरि परिवर्तन भेल अछि। देशमे लोकतंत्रक स्थापनाक बाद संविधानमे देशक सभ नागरिककेँ समानताक अधिकारक संगहि आओर कैकटा मौलिक अधिकार प्राप्त अछि। मुदा एखनो ढाकीक-ढाकी लोकसभ गाम-घर छोड़ि जहाँ-तहाँ वौआ रहल अछि। अखनो महानगरसभक गगनचुंबी महलसभकेँ लज्जित करैत हजारो लोक सड़कक कातमे सुतल रहैत अछि आ कैकबेर निसाँमे मातल वाहन चालकक द्वारा पीच देल जाइत अछि। अखनो महानगरसभमे एहन लोकसभक हुजुम अछि जे भोर खाइत अछि आ साँझक हेतु व्योंतमे लागल रहैत अछि। महलसभमे रहनिहार विशिष्ट वर्गक लोककेँ एहन लोकक स्थिति-परिस्थितिक सुधि लेबाक कोन काज? मुदा उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल फाँढ़ बान्हि कए आगू अबैत छथि आ लहसने टामे नहि अपन कतेको रचनासभमे समाजक एहन उपेक्षित वर्गकेँ महत्व दैत छथिन। ई मामूली बात नहि अछि। कारण बलगरहासभक संगे तँ अनेरे लोकसभ ठाढ़ अछि आ तरह-तरहक फएदा उठा रहल अछि। जकर केओ नहि अछि,जे एक हिसाबे बौक अछि, तकर कण्ठमे स्वर देबाक काज करी तखन ने। से काज मण्डलजी केलाह अछि। ताहि दृष्टिसँ जँ अपने ‘लहसन’ उपन्यास पर दृष्टिपात करब तँ लागत जे ई कतेक भारी काज केलाह अछि।

उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डल साहित्यिक क्षेत्रमे परिचयक मोहताज नहि छथि। मैथिली साहित्यक विभिन्न विधामे ओ अपन रचनासभक पथार लगा देने छथि। करीब एक सए किताब मण्डलजीक हाससँ लिखल प्रकाशित भए चुकल अछि। आ अखन ओ हाथ थोड़े बारि देलनि अछि, लिखिए रहल छथि।

लहसनक नायक मेवालाल अपन कलकत्ता-प्रवासमे बचनू, भूषण, दुखी आ मखनलाल उर्फ बौनभाइ सन-सन जन-बनिहारसभक सम्पर्कमे अबैत छथि आ देखैत छथि जे ओ सभ केना सालक-साल कलकत्ता सन महानगरमे संघर्ष कए अपन हालतमे सुधार केलनि। गाममे जमीन-जथा बनओलनि। पक्का घर बनओलनि। हुनकालोकनिक कलकत्तामे एकटा अपन पहिचान छनि। अपन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश छनि। एहने परिवेशक वर्णन करैत उपन्यासकार लिखैत छथि-

“रौतुका खेनाइसँ पहिने आने दिन जकाँ धरमशल्लामे ढोलको-झालि बजए लगल आ ताशक संग गाम-घरसँ लऽ कऽ देश-दुनियाँक गप-सप्प सेहो चलए लगल। एक घर  आ एकरंगाह जिनगी  रहितो अनेको समाजमे विभाजित अछिए। कियो ताशक जुआमे अपन कमेलहो गमा रहल अछि तँ कियो मेहनतक कमाइक संग जुओसँ कमा रहल अछि। तही बीच किछु गोरे एहनो तँ छथिये जे साज-बाजक संग भगवत-भजन सेहो कइये रहला अछि। दुनियाँमे दिन-दिनक घटना सेहो घटिये रहल अछि। तहूमे छोट घटनासँ लऽ कऽ पैघ धरि घटिते अछि। रंग-रंग देखनिहारो-सुननिहार अछिए। लोक अपना मुँहमे ताला थोड़े लगा लेत आकि काने केना मुइन लेत। सेहो तँ चलिते रहत। यएह ने भेल दुनियाँक तमाशा जइमे सभ केनिहारो छी आ देखनिहारो।”[4]

लहसनक नायक ‘मेवालाल’ ग्रामीण परिवेशमे रहनिहार एकटा सरल व्यक्ति छथि। ओ कलकत्तासन महानगरक छल-प्रपंचसँ भरल जिनगीसँ अनभिज्ञ रहथि। असलमे महानगरोमे दू तरहक जीवन एकहि संगे चलैत रहैत अछि। एकदिस सुसज्जित भवनसभमे रहनिहार संपन्न लोकसभ छथि तँ दोसर दिस मेवालाल सन मेहनतकश लोकसभ जे भोर खाइ छथि आ साँझक भोजन व्योंतमे भरि दिन यत्र-तत्र संघर्षरत रहैत छथि। साँझमे कतए जाथि, राति कतए बिताबथि तकरो कोनो ठेकान नहि। जाबे मेवालाल अपनेसन लोकसभक बीचमे रहैत छथि ताबे हुनका सामाजिक रूपसँ कोनो परेसानी नहि होइत छनि। मुदा जखने हुनका नीक नौकरी भेटि जाइत छनि, हुनकर सभकिछु बदलए लगैत अछि। ओ कंपनीक फ्लैटमे रहए लगैत छथि। ओहिठाम सुनीलपालसन सहरिआ लोकसँ हुनका दोस्ती होइत अछि। शुरुमे तँ हुनका ई दोस्ती बहुत नीक लगैत अछि। मुदा सुनीलपाल छल सातिर लोक। ओ मेवालालक पत्नी राधाकेँ पटा लैत अछि,ततबे नहि राधाकेँ अपनासंगे राखिओ लैत अछि आ मेवालाकेँ फुसला दैत अछि जेना ओ किछु जनिते नहि होथि। मेवालाक आँखि तखन खुजैत छनि जखन ओ राधाक संगे सुनीलपालकेँ कलकत्ताक बजारमे टहलैत देखि लैत छथि। तकरबाद ओ राधाकेँ फेरसँ प्राप्त करबाक हेतु न्यायालयक शरण लैत छथि। न्यायालय मेवालाक पक्षमे फैसला कए दैत छथि आ राधा फेरसँ मेवालाल लग आबि जाइत छथि। एहिठाम उपन्यासकार कानूनक व्यवस्थाकेँ मेवालालक पक्षमे करैत काल कानूनक प्रतिकूल जाइत देखाइत छथि। लगैत अछि जेना न्यायालय सेहो स्त्रीकेँ पुरुषक संपत्ति मानि लेलक, जे सही नहि भेल। जखन राधा स्वेच्छासँ सुनीलपालक संगे रहैत छलीह आ ओतए प्रसन्नो छलीह तखन मेवालाल राधाकेँ अपना संगे रहबाक हेतु बिवश नहि कए सकैत छलाह। मेवालाल राधासँ तलाक लए सकैत छलाह। मुदा एहि घनचक्करमे नहि पड़ि उपन्यासकार सोझ समाधान केलथि।

 ई उपन्यास हुनका लोकनिक हेतु एकटा मार्गदर्शकक काज कए सकैत अछि जे सहर गेलाक बाद आधुनिकताक प्रवाहमे अपनासन लोककेँ छोड़ि विशिष्ट बनबाक फिराकमे पैघ लोकसभसँ सटैत छथि आ ताहि क्रममे सभ किछु गमा लैत छथि। मिथिलाक अधिकांश लोक गुजर करबाक हेतु दिल्ली,पंजाब,कलकत्ता आ आन-आन सहरसभमे पसरि गेल छथि। कतेको गोटे तँ अरब चलि गेल छथि। किएक? तकर मूल कारण थिक अपना ओहिठाम रोजगारक अभाव।

जे किछु, मुदा एतबा तँ तय अछि जे एहि उपन्यासकेँ पढ़लासँ पाठक थोड़बे कालमे समाजक निम्नतम पौदानपर ठाढ़ लोकक जिनगीक बारेमे बहुत किछु बुझि सकैत छथि। किछु एहन करबाक प्रेरणा प्राप्त कए सकैत छथि जाहिसँ मेवालाल सन-सन गरीबलोकसभकेँ गाम छोड़ि कलकत्ता सन महानगर पलायन नहि करए पड़नि। एहिसँ प्रेरणा लए समाजक समृद्ध लोकनि किछु करथि जाहिसँ गाम-घरसँ पलायन बन्द होअए आ गाम एकबेर फेर पल्लवित-पुष्पित भए जाए।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com















[1] घसल अठन्नी, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ पृष्ठ संख्या- ....
[2] लहसन, जगदीश प्रसाद मण्डल, पृष्ठ संख्या- 95
[3] तत्रैव,    „             „             पृष्ठ संख्या- 87-88
[4] तत्रैव,    „             „             पृष्ठ संख्या- 78

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कोरोना का प्रकोप



कोरोना का प्रकोप



आज से छ महिने पूर्व सायद किसी ने कोरोना शब्द सुना भी नहीं होगा । एकाएक नबंबर-दिसंबर में चीन से कोरोनाका आगाज हुआ । तब भी अधिकांश लोग यही सोचते रहे कि मामला चीन का है और उधर ही सलट जाएगा । हम तो दूर-दूर तक उस से प्रभावित नहीं हो सकते  हैं । इसी सोच के कारण चीन में हो रहे व्यापक प्रसार के बाबजूद दुनिया के तमाम देश अपने-अपने देशों में इस विमारी से बचने के लिए किसी भी प्रकार से रक्षात्मक उपाय करते नहीं दिखे । सायद उन्हें कोरोना के विनाशकारी प्रभाव का ज्ञान नहीं हो सका था ।

इसमें कोई शक नहीं कि चीन तब तक भुक्तभोगी होने के कारण दुनिया का मार्गदर्शन कर सकता था और कोरोना के दुष्प्रभाव से अन्य देशों को बचा सकता  था । परंतु उसने ऐसा किया नहीं । ऐसा क्यों हुआ इसका उत्तर ढूंढ़ने मे सायद बहुत वक्त लगेगा । लेकिन इतना तो तय है कि चीन के इस नीति से दुनिया के तमाम देश आज विनाश के कगार पर खड़े दिख रहे हैं । दुनिया में आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न युरोप,अमेरिका सब के सब निरुपाय,हतप्रभ हो गए । तमाम प्रयासों के बाबजूद उनके हजारों नागरिक अकाल मृत्यु के  शिकार हो गए । पूरे विश्व में लाखों नागरिक कोरोना से अभी  भी संक्रमित हैं।

जब सारी दुनिया इस अज्ञात विमारी से इस तरह जूझ रहा हो तब हमारा देश इस से कबतक बच सकता था । यद्यपि हमारे आदरणीय प्रधानमंत्रीजी ने समय रहते  अद्भुत दूरदर्शिता का परिचय देते हुए संपूर्ण देश में २१ दिनका लाकडाउन लगा दिया ,लेकिन इस व्रह्मास्त्र का लाभ जितना मिल सकता  था उतना होता नजर नहीं आ रहा है । दुनिया के तमाम देश और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माननीय मोदीजी द्वारा लिए गए कड़े कदम की सराहना की है । परंतु कुछ लोग हैं जो इस आपत्ति काल में भी बहरे-अंधे बने हुए हैं । इतना ही नहीं,कुछ लोग तो अपनी मूर्खतापूर्ण व्यवहार से इस घातक विमारी को बढ़ाने का काम कर रहे हैं । हद तो तब हो गई जब राजधानी में कुछ लोगों ने  जाने-अनजाने हजारों कोरोना मरीज उतपन्न कर उन्हें सारे देश में फैला दिया। परिणामतः देश के जो क्षेत्र संयोग से कोरोना से बचे हुए थे वे भी  इसके चपेट में आते हुए नजर आ रहे हैं ।

सोचने की जरुरत है कि आखिर प्रकृति ने कोरोना जैसे संकट का अविष्कार क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने लगातार  हो रहे वैज्ञानिक उपलव्धियों के घमंड में संपूर्ण प्रकृति को ही चुनौती दे डाला हो और यह संकट इसी का प्रतिफल हो? सायद प्रकृति कह रहा हो-देखा आपने तो बहुत उछल-कूद किया,चंद्रमा पर चले गए,मंगल ग्रह की परिक्रमा भी कर डाली,पृथ्वी पर तरह-तरह के औजार बनाकर तमाम प्राणियों के लिए संकट उतपन्न करते रहे,परंतु अब यह सब बेकार क्यों हो गया? एक मामुली सा वायरस संपूर्ण पृथ्वी पर हाहाकार मचा रखा है । क्या राजा,क्या रंक सब परेसान हैं । ब्रिटेन के प्रधान मंत्री से लेकर नोएडा के झुग्गी में रहने वाले मजदूर सभी प्राण बचाने में लगे हए हैं । अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशके राष्ट्रपति भारतके प्रधानमंत्री को गुहार लगा रहे हैं कि मलेरिया की दवाई दे दीजिए । बताइए यह सब क्यों हो रहा है? संभवतः प्रकृति यह शिक्षा दे रही है कि अब बहुत हो गया । कृपया अपनी जिंदगी बचाना चाहते हैं तो दूसरे जीव-जंतुओं को बक्स दीजिए । अपना घमंड छोड़िए । देखिए आप का जीवन कितना लघु है । पानी के एक बुलबुले की तरह आप भी आए-गए हो जाएंगे । कृपया प्रकृति माता द्वारा निर्मित अद्भुत संतुलन को मत बिगाड़िए। तभी आप सुखी और सुरक्षित रह पाएंगे ।

मनुष्य ने अपने वुद्धि के वल से नाना प्रकार के संसाधनों का अविष्कार किया है । तरह-तरह की विमारियों के इलाज हेतु अचूक दवाइओं का निर्माण भी किया है । यहाँ तक कि जरुरत पड़ने पर शरीर के अंग तक बदल दिए जाते हैं । पहले मामुली विमारियों से लोक मर जाते थे । क्रमशः कैंसर जैसे भयानक विमारियों का भी काफी हद तक इलाज संभव हो गया । इब सब कारणों से मनुष्य में घमंड आ गया कि वह जो चाहे कर सकता है । यहाँ तक कि प्रयोगशाला में इक्षित गुणों वाला मनुष्य उतपन्न कर लेने का प्रयोग भी होने लगा । इतना ही नहीं ,मनुष्य ने अपने सामर्थ्य के घमंड में तमाम जीव-जन्तुआओ का जीवन कठिन कर दिया । ऐसा लगने लगा जैसे इस पृथ्वी के समस्त वैभव पर उसका एकल अधिकार हो । कहते हैं कि चीन में तो किसी भी जानवर,पक्षी को नहीं छोड़ा जाता है । वहाँ के लोग चमगादर,साँप और पता नहीं क्या-क्या खा जाते हैं हैं । यहीं सबसे बड़ी भूल हो गई । वैज्ञानिकों का मत है कि चमगादरों के खाने से ही करोना वायरस का जन्म हुआ।

करोना वायरस कितना खतरनाक है ,यह अब सभी जानते हैं । दुनिया भर में हजारों लोक इस विमारी से अपनी जान गवाँ चुके हैं । लाखों लोग विमार हैं । शहर-के-शहर बंद कर दिए गए हैं । स्कूल,कालेज,कारखाना,न्यायालय सभी बंद कर दिए गए हैं । लोगों को अपने-अपने घरों में ही बंद रहने के लिए कहा गया है । निश्चय यह संपूर्ण मानवता के लिए एक इम्तहान का क्षण है । घरों में बंद लोगों का ऊब जाना स्वभाविक है । सबाल है कि लोग कबतक इस हालात में रह पाएंगे? लगातार चल रहे लाकडाउन से जरुरी सामानों का उत्पादन भी प्रभावित होगा । लोगों के क्रयशक्ति में ह्रास होगा । कहने का तात्पर्य यह है कि इस विमारी के चपेट में पड़े दुनियाके तमाम देश आज त्राहिमाम् कर रहे हैं । दुर्भाग्य की बात है कि तमाम कोशिशों के बाबजूद अपना देश भी इस महामारी का शिकार होता जा रहा है । इस विमारी से कुछ लोगों का जान बचा भी है,परंतु उससे कई गुना लोग अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज करबा रहे हैं ।

निश्चित रूप से सारी मानवता आज महान संकट से गुजर रही है । दुनिया भर में लाखों लोग विमार हैं । मनुष्य का सारा पुरुषार्थ कोरोना के आगे नतमस्तक है । अभी तक हजारों लोग अपनी जान गवाँ चुके हैं । यद्यपि दुनिया भर के वैज्ञानिक दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं कि इस विमारी से बचने का कुछ तरीका निकले परंतु अभी तक ऐसा कुछ हुआ नहीं है । आशा करते हैं कि जल्द ही इस विमारी का इलाज ढूंढ़ लिया जाएगा और पृथ्वी पर एक बार फिर से वही प्रसन्नता व्याप्त हो सकेगी जो कभी हुआ करती थी  ।

हर परजाय में जय की संभावना छिपी रहती है । सायद इसबार भी यही हो । लोक  इस परेशानी के दौर से निजात पा भी लें तो भी इन्हें सदा-सर्वदा के लिए एक सीख तो मिल ही जाएगी। वह यह कि प्रकृति से ज्यादा छेड़छाड़ उचित नहीं है । अगर प्रकृति का धैर्य टूटा तो पता नहीं क्या हो? संभवतः हम आगे चलकर प्रकृति को ज्यादा तरजीह दें और तमाम जीव -जन्तुओं के जीवन की रक्षा वैसे ही करना सीखें जैसा हम अपने लिए प्रयत्नशील हैं ।



लेखकःरबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

कमाल चौक,अड़ेर


कमाल चौक,अड़ेर

कोनो पैघसँ छोट घरक नीव केओ नहि देखैत अछि,देखिओ नहि सकैत अछि । नीव होइते अछि तपस्या करबाक लेल । अपन समस्त शक्तिसँ सभक सभटा भार बिना कोनो प्रतिवादकेँ सहि लेबाक हेतु । ओकरा इहो नहि बूझल रहैत छैक जे जकर ओ भार सहि रहल अछि से खोपरी अछि की महल? ओ तँ बस अपन कर्तव्य कए निश्चिंत भए जाइत अछि । कोनो पुरस्कार,कोनो मान-सम्मानक अभिलाषा नहि । सएह हाल छलनि अड़ेर पुरबारिटोलक कमालजीकेँ जे नित्य भोरसँ साँझ धरि अड़ेर चौकपर एकटा मचानपर टिनहा पेटी लेने बैसल रहैत छलाह । ओहि टिनहा पेटीसँ निकलैत छल पानक पात आ ओहिमे देल जाए जोगर रंग-विरंगक सचार जेना चून,कत्थ,जार्दा,किमाम । सुपारि आ कखनो काल इलाइचीक सेहो ओरिआन रहैत छल । कमाल देखबामे गोर-नार,बेस नमगर आ बगए बानि पातर छितर छलनि । हमरा अखनो कथसँ रङल हुनकर हाथ ध्यानमे आबि रहल अछि । डीह टोल,पुरबारिटोल ,बेलौंजा,सिनुआरा,विष्णुपुरक युवकसभ अड़ेर चौकपर अबिते रहैत छलाह । लग-पासक गामक लोकसभ सेहो कोनो-ने-कोनो काजे ओतए देखल जैतथि । ओ सभ गाहे-वगाहे कमालजीक पानक दोकानपर अवश्य अबितति । पान खैतथि आ जीह लाल केने आगा बढ़ि जैतथि । एहिक्रममे कमालजी युवकसभक संगे हँसी ठठ्ठा सेहो करैत रहैत छलाह । ओहन गरिबिओमे ओ निरंतर प्रसन्न रहैत छलाह । एहि तरहे सालक-साल ओ अपन काजमे लागल रहलाह । कोनो भारी बात नहि जे बहुतदिन धरि अड़ेर चौककेँ कमाल चौकक नामसँ लोक सुमार करैत छल ।

कहबी छैक -जे ननुआ से गर्भहि ननुआ । ओएह हाल कमाल चौक ,अड़ेरोक छल । यद्यपि किछुसालक बाद कमालक मृत्य भए गेलनि । ताबे ओहि लग-पासमे कठघरामे दूटा दोकान खुजि गेल छल । एकटा कठघरा सड़कक बामा दिस तँ दोसर दहिना दिस रहैक । दुनू दोकानमे एकहि तरहक समानसभ रहैत छल । लटगेनाक समानक अतिरिक्त पान सेहो ओतए भेटैत छल । बामाकात बला कठघरापर रेडिओ बजैत रहैत छल । रेडिओ सिलोनसँ पुरनका गीत भोरमे साढ़े सात बजेसँ नित्य बजैत छल । आधघंटाक एहि कार्यक्रमक अंतमे सहगलक कोनो गीत बजैत छल । रेडिओ सीलोन बहुत मोसकिलसँ पकड़ैत छल । सड़कक बामा कात स्वर्गीय रामधनी साहुक मधुरक दोकान छल । ओतए लग-पासक गामसँ लोक लोकसभ आबि चाह पीबैत गप्प-सप्प करैत रहैत छलाह । एक हिसाबे ओ ग्रामीण क्लब छल । हुनकर दुनूपुत्र स्वर्गीय सुखदेव साहु आ स्वर्गीय जगदेव साहु ओहि दोकानकेँ चलबैत छलाह । थोड़बे दूर पश्चिम दिस हटि कए एकटा दोकान छल जतए चाह-पान -जलखैक जोगार रहैत छल । बुनिआ, सेओ ,घीमे तरल चूरा आ खोआक पेराक हेतु ओ दोकान प्रसिद्ध छल । भोर-साँझ ओतहु लोकसभक बैसार होइत छल । मूलतः समय बितेबाक उद्देश्यसँ ओतए लोकसभ अबैत छलाह आ तरह-तरहक गप्प-सप्प करैत राति कए लैत छलाह ।

फटकिएसँ जहाँ उजरीबस देखाइत की यात्रीसभ सतर्क भए जइतथि। बस कनीक आगू बढ़ैत तँ ओकर छतपर जेना-तेना बैसल हिलैत-डोलैत यात्रीसभ सेहो देखैतथि । ओ कनीक आओर आगू बढ़ैत तँ दृश्य कनीक आओर फरिछाइत । बसक गेट आ पछुअतिसँ लटकल यात्रीसभ सेहो देखाइत । से सभ मिलिकए बसक से भयावह दृश्य लगैत जे बसक घंटोसँ प्रतीक्षा कए रहल यात्रीगण परेसान भए जइतथि । एकाध गोटे जिनकर जेबीमे टाका छलनि से तँ रिक्सा खए आगू बढ़ जइतथि। शेष यात्री उजरी बसक प्रतीक्षा करितथि । बस आबिओ जाइत । ठाढ़ो होइत मुदा ओहिमे चढ़ब केना? एहि समस्याक अंत कैकबेर सहयात्रीक संगे झंझटसँ होइत । कैकबेर बसक परिचालक संगे मुँहाठुठी होइत । केओ कहुना कए बसमे घुसिआ सकितथि आ कैकगोटे बाटे तकैत रहि जइतथि आ बस खुजि जाइत । कैकबेर तँ बस ओतए ठाढ़े नहि होइत । किछु आगा बढ़ि कए यात्रीकेँ उतारबाक हेतु ठाढ़ होइत आ जाबे आगू गेनिहार यात्रीसभ दौरि ओतए पहुँचितथि ताबे बस खुजि जाइत । ई दृश्य नित्य भोरे कमाल चौक अड़ेरपर देखल जा सकैत छल । बसमे चढ़बाक हेतु एतेक मारामारीक मूल कारण छलैक बसक कमी । ओहि समयमे  मात्र दूटा बस अड़ेरबाटे मधुबनी धरि जाइत छल । एकटा उजरीबस छल-जे साहरघाटसँ खुजि मधुबनी जाइत छल। दोसर बस कनीक पैघ छल । ओ बस बेनीपट्टीसँ अबैत छल । एहि दुनू बसक अतिरिक्त यातायातक साधन मानवचालित रिक्सा छल । जँ बस नहि भेटल तँ किछुगोटे तँ पैरे आगू बढ़ि जाइत छलाह । जिनका जेबीमे  टाका रहनि से रिक्सा कए रहिका चलि जइतथि । एकटा रिक्सापर दूसँ तीनटा यात्री बैसि जाथि । एहिसँ किराया कम भए जाइत छल । एहि झंझटसँसँ बँचबाक हेतु लोकसभ बस पकड़बाक प्रयास करैत छलाह । ताहि हेतु नगवास,परजुआरि,एकतारा,जमुआरी,बेलौजा,कतेकोगामक लोकसभ भोरेसँ मुस्तैद रहैत छलाह । कहक माने जे ओहू समयमे अड़ेर चौक पर भोरेसँ आबा-जाही बनल रहैत छल

एकबेर हमहु एहिना चौकपर बसक प्रतीक्षा करैत रही । हमरा दरभंगा जेबाक रहए । बस आएल तँ ठसाठस भरल छल । हम बसक पछिलका बोनेटपर लटकि गेलहुँ । बस खुजलैक तँतते क जोरसँ झटका लागल जे हम बससँ नीचा फेका गेलहुँ। हाथ-पैर सौंसे चिला गेल । कैकठामसँ खुन बहए लागल । चौकपर गप्प-सप्प करैत कैकगोटे हमरा खसल देखि दौरलाह । जेना-तेना हम ठाढ़ भेलहुँ आ लङराइत चौकपर वापस अएलहुँ ।  हमरा ओहि समय जे चोटक निसान बनल से अद्यावधि अछिए

अड़ेर चौकक महत्व एहूलेल विशेष छल जे एहिठामसँ थोड़बे  दूरउतरबारिकात रबि आ बुध दिन कए हाट लगैत छल । ओतए गाम-गामसँ आबि कए लोकसभ अपन जरुरतक चीज-वस्तुसभ कीनैत छलाह । कहिओ काल कए हाटपर बीड़ीक प्रचारक हेतु नटुआ अपन मंडलीक संग नचैत छल आ रहि-रहि कए बीड़ी फेकैत रहैत छल । चारूकात नाच देखैत लोकसभ बीड़ी लुटबाक हेतु झपट्टा मारैत छल । एहि तरहे लोककेँ बीड़ी मंगनीमे बाटि कए बीड़ी पीबाक हेतु अभ्यस्त कएल जाइत छल । चौकपर दाड़ी बढ़ौने एकटा बृद्ध गाजाक सोंटा लगबितो छलाह आ गाजा बेचितो छलाह । कैकगोटे गाहे-वगाहे ओहिठाम चोरा-नुकाकए एहि काजमे संलिप्त रहैत छलाह । ओ बुढ़ा अपना आगुमे भगवानसभक फोटो सेहो रखने रहैत छलाह जाहिमे एकटा फोटोमे लिखल रहैत छल-“\सभ तीरथ बार-बार,गंगा सागर एकबार ।”

चौकपर एकटा बड़ीटा पाकड़िक गाछ छल जकर छाहरिमे यात्री लोकनि विश्राम करैत छल । कहिओ काल मुंसीजी एकटा पथिआमे नेना-भुटकामे लोकप्रिय बंबइ मिठाइ सहित कैकटा चुसनासभ रहैत छल । मुंसीजी हमरसभ मिडिल इसकूलपर सेहो कहिओ काल ओएह वस्तुसभ  बेचबाक हेतु जाइत छलाह । हमसभ बहुत प्रयास कए ओसभ कीनबाक हेतु पाइ अनैत छलहुँ । एक पाइ,दू पाइ सँ लए कए एक आना ,दू आना इसकूल जाइत काल जोगार  कएल जाइत छल । एतबेमे काज चलि जाइत छल । जौं पाइक जोगार नहि भए सकल तँ उधारिओ चलि जाइत छल ।

चौकपर सटले पूबदिस कमला नहरिपर बनल पुल छल । कैकटा युवकसभ साँझमे ओहिठाम गप्प-सप्प करैत देखल जा सकैत छलाह । जखन धारमे पानि भरल रहैक तँ धीया-पुतासभ ओहि पुलपर सँ नीचा कुदि जाइत  छल । एकाध बेर हमहु ई काज केने रही । एकटा कुदल,दोसर कुदल तकरा देखाउँसे तेसर कुदल । एहि तरहें ई खेल चलैत छल । असलमे गाम-घरमे नेनासभकेँ खेलेबाक हेतु एहने जोगारसभ करए पड़ैत छलैक । ओहि समयमे रेडिओ,टेलेवीजन तँ रहैक नहि । तखन तँ इएह सभ होइक । कबड्डी,चिक्का,तास सभसँ जौँ मोन भरि गेल तँ नेनासभ कहिओ काल गेनखेली देखबाक हेतु सेहो चलि जाइत छल । ओना हमर गामक गेनखेली बहुत प्रसिद्ध रहैक । ओकरे बदौलत कैकटा खेलाड़ीसभकेँ रैयाम चिनी मीलमे नौकरी लागि गेल रहनि ।

कालान्तरमे अड़ेर चौकपर गतिविधि बढ़ैत गेल । हम नौकरीक दौरान जखन कखनो गाम जाइ तँ सभबेर ओतए किछु-ने-किछु नव देखाइत । जेना एकबेर गाम गेलहुँ तँ चौकसँ सटले डीहटोल जेबाक हेतु ग्रामद्वार बनल देखाएल जाहिमे श्री राज किशोर मिश्र(सेवानिवृत्त मुख्य महाप्रवंधक,बीएसएनएल) आ ग्रामीण लोकनिक योगदानक चर्च अछि ।

हमसभ जखन  सात-आठ वर्षक रही तँ अड़ेर चौकसँ सटले दछिनबारि दिस मीना बजार लागल छल । हमरा कनी-कनी अखनो ओ मोन पड़ैत अछि । बड़ीटा हाताक गेटपर बड़का-बड़का रंगल-ढंगल घैलसभसँ स्वागत द्वार सजाओल गेल छल । अंदरमे बहुत रास वस्तुसभक प्रदर्शनी लागल छल । ओही साल हमर दोसर बहिनक बिआह भेल छल । हमर बहिनोइ स्वर्गीय सुखदेव झा (ग्राम-करहरा,मधेपुरा,मधुबनी) ओहि प्रदर्शनीक आयोजकमे सँ छलाह । ओ राज्य सरकारक अधीन काज करैत छलाह ।

कालक्रमसँ अड़ेर चौकपर टेलीफोन एक्सचेंज,बैंक,एटीएम खुजल । अड़ेर थाना सेहो बनि गेल । ओकर कार्यालय सोसाइटी आफिसमे स्थापित भेल । चौकपर पूबसँ पश्चिम दूसएसँ बेसी दोकानसभ खुजि गेल ।  दबाइक एगारहटा दोकान खुजि गेल । आब जखन कहिओ गाम जाइत छी तँ चौकपर हेराएले रहैत छी । लोकसभक रंग-ढंग सेहो सहरुआ भए गेल । केओ ओतबे बाजत जतबा पुछबैक । जँ किछु भइओ गेल,कोनो तहरक प्रतिवादक बिना लोकसभ सहटि जाएत ।  मुदा भरिदिन लोकसभ चौकपर भरल देखाएत । आब तँ ई हाल अछि जे अड़ेर चौकपर आन-आन गामसँ आबिकए लोकसभ दोकान खोले लेने छथि ।

अड़ेर होइत बेनीपट्टी ,पुपरी जाएबला रोड बेस चाकर भए गेल अछि ।  बसक संख्यासभमे जबरदस्त इजाफा भेल अछि । रहि-रहि कए मधुबनी,दरभंगा,पटनाक बस चलैत रहैत अछि । टेकर आ छोटकाबस(मिनी बस)सभक तँ हाल पुछु नहि । दू सँ तीन मिनटक भीतर कोनो-ने-कोनो सबारी भेटिए जाएत । एतेक चलता रोड भए गेल अछि जे जँ कनिको ध्यान एमहर-ओमहर गेल तँ दुर्घटना भेनहि अछि । कैकगोटे एहनमे जान गमा चुकल छथि । बात एतबेपर नहि ठहरल अछि । आब तँ सुनैत छिऐक जे अड़ेरक लग-पास होइत ट्रेन लाइनक सेहो सर्वे भए गेल अछि । कुलमिला कए अड़ेर चौकपर एकटा छोट सहरक धमक देखबामे आबि जाइत अछि । सुनबामे अबैत अछि जे अड़ेर चौकक लग-पासमे चालीस लाख रुपया कठ्ठा जमीन बिकाएल अछि । ई तँ सहरोकेँ कान काटि रहल अछि ।

आजुक अड़ेर चौक आ पचास साल पूर्वक अड़ेर चौकमे आकास-पातालक फर्क आबि गेल अछि । अएबेक चाही । संभवतः पहिने केओ नहि सोचने होएत जे गामक एकटा चौक एतेक विकास कए लेत । हमरा तँ लगैत अछि जे किछु दिनमे ई मधुबनी सहरकेँ टक्कर दए सकत । मुदा किछु बात ककरो कचोटि सकैत अछि । जहिना ओहिठाम व्यापार बढ़ल   अछि तहिना मानवीय मूल्यक ह्रास सेहो होइत गेल । ओहिठाम लोकसभक  भीड़ बेसक बढ़ि गेल अछि,दोकानक संख्यामे बहुत इजाफा भेल अछि मुदा लोकक आपसी अपनैती विलुप्त  भए गेल । छोट-छोट बात लए कए कैकबेर  ओतए झंझट होइत देखल जाइत अछि । आशा करक चाही जे चौकक समृद्धिक संगहि लोकक आपसी बंधुत्व आ सिनेह सेहो बढ़ि सकत । से जँ भए सकल तँ सोनामे सुगंध ।



लेखकःरबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

1/4/2020