शनिवार, 11 मई 2019

जीवन संघर्ष


जीवन संघर्ष



जन्म से मृत्यु तक हम किसी न किसी प्रकार की समस्या से जूझते रहते हैं । हमें जो कुछ प्राप्त है उसे बँचा कर रखने के लिए संघर्ष करते रहते है। जो हमें प्राप्त नहीं है उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। यही जीवन है । जबतक सााँस चल रही है हम प्रयत्नशील रहते हैं,रहना भी चाहिए । जो हमें प्राप्त है , अगर हम उसी से संतुष्ट हो कर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएंगे तो हमारा विकास रूक जाएगा । आज जो कुछ हम हैं वह कल तक हमारे द्वारा किए गए प्यासों का ही परिणाम है । अगर हम आगे भी कुछ कर गुजरना जाहते हैं,चाहते हैं कि हमारा नाम भी उनलोगों में सुमार किया जाए जिन्होंने इतहास रचने का काम किया है तो उसके लिए निरंतर प्रयत्न की आवश्यकता है । उपलव्धि जितनी बड़ी होगी उसके लिए संघर्ष भी उतना ही घना होगा। जीवन में विजय के लिए कोई लघुपथ नहीं हो सकता है ।

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हे सबकुछ जन्मजात ही मिला होता है । फिर भी ऐसे लोगों को भी संघर्ष करना पड़ता है। क्यों?  इसलिए ताकि वे जहाँ हैँ,जो कुछ उन्हें मिला हुआ है वह छिन न जाए । वैसे भी विना प्रयत्न के हमें यदि कुछ मिल भी जाता है तो उसमें वह आनंद नहीं होता हे जो हमें कठन परिश्रम से प्रयत्नपूर्वक मिलता है । प्रयत्नशील रहना इसलिए भी जरुरी है कि हम इसके बिना व्यर्थ हो जाते हैं । हमारी शक्तियाँ कुंद हो जाती हैं । हम दूसरों का हक मारने में लग जाते हैं । सबाल यह है कि जो चीज हम स्वयं प्रयास कर प्राप्त कर सकते हैं ,उसके लिए दूसरों के तरफ क्यों मुखातिब हों? क्यों नहीं अपनी प्रतिभा के सदुपयोग से मनोवांछित फल प्राप्त करें? इस तरह हम कह सकते हैं कि संघर्ष हमारे जीवनमें निखार लाती है,हमारे मूल्यों को अर्थपूर्ण करती है और हमें उर्जावान बनाती है जिसके सदुपयोग करने से हम पुरुषार्थ की पराकाष्ठा तक पहुँच सकते हैं।

समाज में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो जीवन भर संघर्ष करते हैं ,फिर भी खाली हाथ रह जाते हैं । योग्यता और पूँजी के अभाव में ऐसे बहुतेरे लोग अकुशल मजदूर के रूप में जीवन भर परिश्रम करते हैं । लेकिन दुर्भाग्य है कि वे आज के जीने के संघ्रष से ही जूझते रह जाते हैं । उन्हें कल के लिए सोचने की फुर्सत ही नहीं होती है। सोचकर भी क्या कर  लेंगे? इसलिए यह सोचना भी वाजिब है कि  हमारे मानवीय मूल्यों को भी समाज में विद्यमान आर्थिक असमानता ने प्रभावित किया हुआ है । सोचने की बात है कि जो लोग दिनभर के कठिन परिश्रम के बाबजूद अपने मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं उनके लिए तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों का क्या माएने रह जाता है? संघर्ष फलित हो और लक्ष्यभेदी हो इसके लिए भी उचित सामाजिक,आर्थक परिवेश जरूरी है । तमाम दाबों के बाबजूद हमारे समाज से गरीबी ,अशिक्षा गई नहीं है,अपितु अभी भी ऐसे लोगों से हमारा समाज भरा हुआ है जो ठंढ में बिना कपड़ों के रहते हैं ,जिनके बच्चे फूटपाथ पर पलते हैं और माताएँ अपने शिशुओं को भूखा छोड़कर किसी निर्माणाधीन भवन में मजदूरी करती हैं । ऐसी विवशताओं से मुक्ति कौन दिलाएगा? यह एक गंभीर प्रश्न है?क्या कभी इनके संघर्षों का कभी भी पूर्णविराम होगा?

हम सभी एक सीमित समय के लिए इस संसार में आते हैं । परिस्थिति और भाग्य के अनुसार कमोवेश सभी को किसी न किसी प्रकार से संघर्ष करना ही पड़ता है । लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमारे प्रत्नों का समाज के अन्य लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव हो रहा है? हम अपने पीछे क्या छोड़ जाएंगे? क्या आने वाली पीढ़ी को हम एक बेहतर पृष्ठभूमि दे पाएंगे ? समाज में अभावग्रस्त एवम् अशिक्षित लोगों को भी विकास करने का पूरा अवसर प्राप्त हो और संवैधानिक एवम् कानूनी अधिकार कागज के पन्नों तक ही सिमटा नहीं रह जाए,इसके लिए हम सभी प्रयत्नशील हों । सौंदर्य और संपन्नता से भरपूर इस संसार में कोई भी सुख सुविधा से वंचित न रह जाए,यही हमारी चेष्टा होनी चाहिए । तभी हम अपने पूर्वजों द्वारा उद्घोषित वसुधैव कुटुम्वकम् को चरितार्थ कर पाएंगे ।

बुधवार, 1 मई 2019

मन की प्रशन्नता


मन की प्रशन्नता



मन की प्रशन्नता एक ईश्वरीय वरदान है । यह पूर्णतः नैसर्गिक है एवम् व्यक्ति के अंतरमन से जुड़ा हुआ है । अगर आप ध्यान दें तो पाएंगे कि कुछ लोगों से मिलते ही मन खुश हो जाता है । मन होता है कि  उनसे बार-बार मिलें । ठीक इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग हैं जिनके नजर पड़ते ही मन में क्षोभ उतपन्न होने लगता है। हम सोचने लगते हैं -"कहाँ से मिल गया ? कैसे इससे पिंड छोड़ाया जाए?"ऐसा क्यों होता है? इसका मूल कारण है कि जो व्यक्ति जैसा होता है उसके इर्द-गिर्द वैसी आभा का निर्माण हो जाता है । समान विचार के लोग एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं और उनके साथ होने पर आनंद का अनुभव  होने लगता है । इसलिए जरूरी है कि हम ऐसे लोगों से जुड़े जो स्वभाव से रचनात्मक हैं ,जो दूसरों का हित सोचते हैं और करते हैं । एसे लोगों की संगति परमसुखदायक है । इसलिए तुलसीदासजी ने कहा था-"संत मिलन सम जग कुछ नाही । " संत हमें अपने सद्विचारों से अच्छा सोचने,करने के लिए प्रेरित कर देते हैं जिस से हम अपना समय और धन का सही उपयोग कर सकते हैं ।

हमारा मन व्रह्माण्ड से सीधे जुड़ा हुआ रहता है । फिर हम इतने छोटी- छोटी बातों में क्यों उलझते हैं। निश्चय ही यह आश्चर्यजनक है ,लेकिन इसके पीछे भी शृ्ष्टिकर्त्ता की ही माया है । वही हमें एक-दूसरे से पृथक करती है । माया से आवृत अपने मन की दीबार को अगर मुक्त कर सकें तो हम तुरंत अनंत व्रह्मांड में समाहित होकर सदा-सर्वदा के लिए सुखी हो सकते हैं । लेकिन हम ऐसा होने दें तब तो?

प्रशन्नता के लिए त्याग जरूरी है । आप जितने अधिक संग्र करेंगे ,उतने ही दुखी रहेंगे । जैसे यात्रा के दौरान कम से कम भार रहने से यात्रा सुगम हो जाता है वैसे ही जीवन में मन के ऊपर कम से कम बोझ सुखदायी होता है। हम अपने मन में अकारण चिंता,भय,क्रोध जैसे निषेधात्मक तत्वों को भरे रखते हैं । फिर मन में प्रशन्नता कहाँ से आएगी? हम अपने मन को स्वच्छंद रहने दें ताकि हम प्रकृति सुलभ सौंदर्य का आनंद उठा सकें। मानसिक प्रशन्नता  के लिए यह भी जरूरी है कि हम वास्तविकता के धरातल पर खड़े हों । जो हमारे वश में है ही नहीं उसपर ज्यादा माथा-पच्ची करना व्यर्थ है । जो सत्य है,अवश्यंभावी है, उसे सहर्ष स्वीकार कर लेने में ही भलाई है । हम सच्चाई से जितना दूर भागेंगे,सुख हमसे उतना ही अलग होता चला जाएगा ।

मन की प्रशन्नता के लिए जरूरी है कि हम अपने  मन पर चिंताओं का अनावश्यक बोझ न डालें । जो अपने वश में नहीं है उसे सहर्ष स्वीकार कर लें । जो हमें प्राप्त है उसे उचित सम्मान के साथ सहेज कर रखें । प्राप्त का आदर करना सीखें । हम दूसरों से तुलना करना बंद करें । कई बार दूर से सुंदर दीखनेवाले वास्तविक में वैसा होते नहीं हैं । सच्चाई विल्कुल भिन्न होती है । सपनों की दुनिया से हटकर    असलियत में पाँव जमाने की कोशिश करें । अगर हम ऐसा करेंगे तो निश्चित रूप से बहुत सारे व्यर्थ के विवादों से बँच जाएंगे और सुखी रहेंगे।


शनिवार, 27 अप्रैल 2019

अनंत से अनंत की ओर


अनंत से अनंत की ओर

इतनी विविधताओं से भरा हुआ यह संसार आश्चर्यों से लबालब भरा हुआ है । हम सोच नहीं पाते हैं कि आखिर यह सब कैसे हुआ ,इस सबके पीछे कौन है? कौन है वह जादूगर जो नित्य सौंदर्यमयी प्रातःकाल की रचना करता है । कौन हमें पृथ्वी पर चतुर्दिक फैले सुंदर हरितिमा का दर्शन करने का अवसर प्रदान करता है? दूर-दूर तक फैले हुए समुद्र कहाँ से आए? बात यहीं तक होती तो क्या कहना था ? अनंत व्रह्मांड में फैले हुए असंख्य ग्रहों,नक्षत्रों का निर्माता कौन है? कहते हैं हमारे सूर्य से भी हजारों गुना बड़े-बड़े सूर्य अंतरिक्ष में विद्यमान हैं । और वह ब्लैक होल (काला धब्बा) क्या है जिसके पास जाते ही कोई भी ग्रह,नक्षत्र साबूत नहीं बच पाता, उसी में सदा-सर्वदा के लिए समा जाता है?

हमारी पृथ्वी इस व्रह्मांड का एक बहुत ही लघुतम अंशमात्र है । व्रह्मांड कहाँ तक फैला हुआ है और इस में क्या-क्या है इसका सही-सही आकलन अभी भी कोई नहीं कर सका है । हजारों-लाखों प्रकाश वर्ष दूर अनेक तारा मंडलों को देखा जा सका है । पर वहीं अंत नहीं है । वैज्ञानिक  कहते हैं कि व्रह्मांड निरंतर बढ़ता जा रहा है । अनंत से अनंत की ओर यह यात्रा मानवीय सोच से परे है । क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इस असीम व्रह्मांड के मौलिक  स्वरूप का दर्शन भी विज्ञान अभी तक नहीं कर सका है । मनुष्य की आयु इस तुलना में कहाँ ठहरती है? फिर भी हम छोटी-छोटी बातों में उलझे रहते हैं ।

देखने,सुनने,और समझने की हमारी शक्तियों की अपनी सीमाएं हैं । विज्ञान इस बात को साबित कर चुका है कि जो आस्तित्व में है, सब कुछ दृष्य हो, यह जरूरी नहीं है । हम एक सीमा के अधीन ही सुन सकते हैं,देख सकते हैं । कुत्ता मनुष्य से दस हजार गुना ज्यादा घ्राण शक्ति रखता है । कई जीव हमसे ज्यादा सुन सकते हैं,देख सकते हैं । फिर भी हम कई बार अड़ जाते हैं कि हम जो देखते हैं वही प्रमाणिक है । शृष्टि में जो चीजें हैं उनमें से बहुत कम हम देख पाते हैं । हमारी ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति सीमित हैं । लेकिन जो चीजें हम देख रहे हैं,सुन रहे हैं उनको भी ठीक से समझ नहीं पाते हैं । इसके कई कारण हो सकते हैं । जैसे कि मोहवश हम अपनोंके मृत्यु से उद्विग्न ,दुखी हो जाते हैं । परंतु ऐसा ही अज्ञात लोगों के मरने से नहीं होता है । एक ही प्रकार की घटनाएं अलग-अलग से अपना प्रभाव छोड़ती हैं तो इसलिए कि हमारा  दृष्टिकोण एक जैसा नहीं रहता है। हम निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं ।

स्वभाविक रूप से जीवन यात्रा शुरु होकर मृत्यु के बाद स्वतः समाप्त हो जाता है । अगर ऐसा नहीं भी होता है,और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता ही है तो उसमें हमें करने के लिए क्या रह जाता है? प्रकृति का नियम समस्त जीव-जन्तुओं पर समान रूप से स्वतः लागू होता है । हम चाहकर भी उसके अपवाद नहीं बन सकते हैं। फिर हमें क्या करना चाहिए? जीवन को ईश्वर का वरदान समझ कर प्रकृति के साथ संयोजन करते हुऐ आनंदपूर्वक जीवन विताना चाहिए । इसके लिए जरूरी है कि हम सकारात्मकता से जुड़ें और और अपने सोच में नकारत्मक तत्व जैसे क्रोध, घृणा ,प्रतिशोध को स्थान नहीं दें । इस तरह हम इस छोटे से जीवन को सुख,शांति के साथ  बिता सकते हैं,संतुष्ट रह सकते हैं ।

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

कपिलेश्वर स्थान



कपिलेश्वर स्थान





अपना सभ दिस कपिलेश्वर स्थान एकटा प्रमुख तीर्थमेसँ मानल जाइत अछि । कपिलेश्वर स्थान हमरासभक गामसँ लगीचे अछि । कतेको गोटे सभ सोमदिन कए कपिलेश्वर स्थान जेबे करथि आ ओहिठाम महादेवकेँ जल चढ़ाबथि । हर-हर महादेव ….. कहैत लोकसभ अति उत्साहमे कपिलेश्वरक यात्रा करैत छलाह । पहिने तँ लोकसभ बाधे-बाधे, पैरे-पैर ओतए घंटाभरिमे पहुँचि जाइत छल । ओना रहिका बाटे रोडसँ जुड़ल रहबाक कारणे बससँ जेबाक सुविधा सेहो बहुत दिनसँ अछि । पहिने बस कम चलैक। तैँ लोक पैरे-पैरे गेनाइ पसिंद करैत छल ।

 शिवरातिमे ओहिठाम जबरदस्त मेला लगैत छल । गाम-गामसँ लोकसभ  महादेवपर जल चढ़ेबाक हेतु अबैत छलाह । किछु-किछु सनेस कीनैत छलाह । ओहिठाम कुश्तीक आयोजन सेहो होइत छल । ओहिमे इलाकाक पहलवानसभ अबितथि आ अपन जोर अजमाइस करितथि । सतलखा डीहटोलक नामी पहलबान स्वर्गीय कामेश्वर झा अगुआ रहैत छलाह । हमरो गामसँ कै बर पहलबानसभ ओहिठाम कुश्ती लड़ैत छलाह । कुश्ती शुरु हेबासँ पहिने  एकटा ढोलिआ ढोल बजबैत अखाड़ाक चारूकात घुमि जाइत । ढोलक आबाज सुनि कए लोकसभ जमा भेनाइ शुरु होइत । देखिते-देखिते अखाड़ाक चारूकात लोकक करमान लागि जाइत । साँझ होएबासँ पहिने सभ अपन-अपन घर आपस चलि जाइत छलाह ।

कपिलेशवर गेनिहारि वृद्धासभ महादेवक निर्माल अनैत छलीह । ओहिसँ हमरसभक माथपर आशीर्वाद स्वरूप हँसोथि देथि । हमसभ नेन्ना रही,की बुझबैक जे ई की होइत छैक?नेन्नामे जखन हमर  बहिनसभ कपिलेश्वरसँ आपस होइत काल सनेसमे छोटसन तिपहिआ गाड़ी अनैत छलीह तँ हमर खुशीक अंत नहि रहैत छल । ओहिमे उपरमे ढ़ोल लागल रहैत छल। जहिना ओहि तिपहिआकेँ आगू दिस घीचल जाए कि ओ ढ़ोल बाजि जाइत । तेँ ओ एकहि संगे दूटा काज करैत छल -गाड़ी जकाँ घुसकैत छल आ ढ़ोल जकाँ बजैत सेहो छल। ओ खेलौना देखितहि हम आनंदविभोर भए जइतहुँ । लगपासक देखितहि सभकेँ बजबितहुँ आ तिपहिआ संगे खेलमे मस्त भए जइतहुँ । मुरही,झिल्ली, मधुर सेहो प्रसाद कहि भेटैत छल।

कपलेश्वरस्थानक मुख्य मंदिर छोटेसन अछि । ओहिमे स्थापित शिवलिंग निरंतर घर्षणसँ  खिआइत जाइत छल । भक्तसभ चारूकातसँ हुनका ऊपर जल ढारैत रहैत छलाह । धन्यवाद दी हुनकर शहनशीलताकेँ जे जाढ़-ठार ,गर्मी,बरखासभ मौसममे बिना कोनो प्रतोरोधकेँ भक्तक मनोरथ पूरा करैत रहैत छथि । बहुत दिनक बाद किछुमास पूर्व हम कपिलेश्वर बाटे गाम जेबाक क्रममे ओतए बाबाक दर्शन केलहुँ । मंदिरक हालत बेहतर बुझाएल । चारूकात रंग-रोसन कए देल गेल अछि । मुदा मंदिरक मौलिक स्वरुप ठामहि अछि । मिथिलाक एतेक पुरान तीर्थमे आओर कोनो तरहक विकास नहि देखाएल । अनदिना रहैक तेँ भक्तलोकनिक सेहो अभावे छल । पंडासभ जरूर एमहर-ओमहर घुमैत रहथि । हमरासभकेँ देखि सक्रय भेलाह । हमसभ भगवान शिवक पूजा कए गाम दिस बिदा भए गेलहुँ ।

कपिलेश्वर स्थान एवम् लगपासक अन्य तीर्थसभ मिथिलाक लोकक प्राणवायु थिक । गाम-घरमे रहनिहार लोकसभ खास कए स्त्रीगणसभ  एही तरहें नित्यप्रतिक काजसँ हटि कए  एकटा स्वस्थ  मनोरंजनक अवसर प्राप्त करैत छथि । जरुरी एहिबातकेँ अछि जे एहिस्थान सभकेँ सरकार द्वारा उचित विकास कएल जाए जाहिसँ मिथिलांचलक एहि पवित्र तीर्थमे देश-विदेशसँ पर्यटक लोकनि आकर्षित होथि,एहिठाम आबथि आ मिथिलाक संस्कार ओ संस्कृतिसँ लाभान्वित होथि।

रविवार, 14 अप्रैल 2019

अमरता का संदेश


अमरता का संदेश



इस दुनिया में हम जन्म लेते हैं,जीते हैं,और मर जाते हैं । सबाल है कि जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद हम कहाँ थे? सायद कहीं भी नहीं-यह एक आसान उत्तर हो सकता है । हम जन्मे,फिर बढ़े और बढ़ते-बढ़ते  युवावस्था, प्रौढ़ावस्था  से गुजरते हुए वृद्धावस्था में पहुँच गए । इसके बाद एक दिन अकस्मात हमारी मृत्यु हो जाती है । हमारा पूरा-का-पूरा शरीर  जस-का-तस रह जाता है । पर क्या है जिसके नहीं रहने से या चले जाने से हमारा शरीर व्यर्थ हो जाता है। चल-फिर नहीं सकता,बोल नहीं सकता,कुछ भी महसूस नहीं कर सकता है । इतना ही नहीं, अगर उसे थोड़ी देर वैसे ही छोड़ दिया जाए तो उस से ऐसा भयानक दुर्गंध आना शुरु हो जाता है कि अपने लोग ही उसे उठा-पुठाकर  श्मशान घाट ले जाकर जलाने के लिए विवश हो जाते हैं ।

यह सब अकस्मात नहीं होता है । जन्म से मृत्यु पर्यंत हमारे शरीर में  निरंतर परिवर्तन होता रहता है । परंतु कभी भी, भूल से भी हमें यह नहीं लगता है कि हम वह नहीं रहे जो कल थे ,जबकि परिवर्तन का यह सिलसिला अनवरत,बिना किसी अपवाद के चलता रहता है । कई बार जब हमारे मित्र,परिचित काफी दिनों के बाद मिलते हैं तो वे हमारे शरीर में हो रहे परिवर्तन को तुरंत तार जाते हैं लेकिन नित्य-प्रति देखने बाले लोग इसे महसूस नहीं कर पाते  या तब करते हैं जब हम में कोई भारी गड़बड़ी हो जाती है । मसलन ,जब कोई बिमार हो जाता है तो कई बार हमारे रूपरंग में बहुत परिवर्तन हो जाता है । तब लोग इस पर अपनी प्रतिकृया देते हैं । लेकिन सत्य यही है कि जो आज हैं ,वह कल नहीं होंगे और एक दिन यह शरीर  प्राणरहित होकर व्यर्थ हो जाएगा। तब कोई क्षण भी इसे रखना उचित नहीं समझेगा । फिर भी हम इस शरीर को ही सर्वस्व मानकर जीवन भर परेशानी में पड़े रहते हैं , यही विडंवना हैहमारे दुख का कारण ही यही है कि हम सत्य को स्वीकारना नहीं चाहते हैं और जो कुछ है ही नहीं उसके पीछे पड़े रह जाते हैं ।

मनुष्य ही नहीं,समस्त जीव-जन्तु में जीवन और मृत्यु का यह चक्र अनवरत चलता रहता है । अंतर सिर्फ इतना है कि हम तरह-तरह के वैज्ञानिक अविष्कारों से अपने और दूसरों के जीवन को प्रभावित करते हैं जबकि प्रकृति में विद्यमान अन्य प्राणी नैसर्गिक रूप से जो कुछ होता है,उसे होते देखते रहते हैं,सब कुछ जैसा जो है वह भोगते हैं। इस तरह बेहतर वुद्धि और विद्या उपार्जित कर मनुष्य ने एक तरह से समस्त पृथ्वी को अपने मुठ्ठी में करने का प्रयास किया है । उसके इसी स्वभाव के कारण दुनिया एक विशाल कारागार में तबदील हो गई है । वे सभी जीव-जन्तु जो आजाद रहने के अभ्यस्त हैं, किसी भी प्रकार से प्रकृति के व्यवस्थाओं में छेड़-छाड़ नहीं करते हैं,मनुष्य निर्मित विपदाओं से घिरे रहते हैं । उदाहरणस्वरूप, हमने चिड़ियाखाना बनाकर उनमुक्त विचरण करने बाले पंक्षियों,जानबारों को सीमाओं में रहने के लिए विवश कर दिया है। हमने ऐसा क्यों किया है? संभवतः इसीलिए कि हम इस शृष्टि के समस्त संपदाओं का अपने तात्कालिक स्वार्थ के लेए अधिक-से-अधिक दोहन कर लेना चाहते हैं । हमारा यह स्वार्थ ही इस दुनिया को नर्क बना दिया है । सो तो जो है सो है, परंतु हमें क्या वह सब हासिल हो गया है जिसके लिए हमने ऐसा किया है? उत्तर है, विल्कुल नहीं । हम पहले से कहीं अधिक दुखी-संतप्त जीवन जी रहे हैं । हो भी क्यों नहीं? तालाव के जल में जहर घोलकर आप उस में से अमृतपान की उमीद कैसे कर सकते हैं ?

ईश्वर ने हमें वुद्धि दी है । सोच-विचार करने का सामर्थ्य दिया है ।  लेकिन इसका उपयोग हमने कैसे किया है? हमने एटम बम बना लिया है । अंतरिक्ष में भयानक युद्ध करने की क्षमता अर्जित  करने के लिए प्राण-प्रण से प्रयास किया जा रहा है । हमारे अंदर की निषेधात्मकता इतना सर्वव्यापी हो गया है कि हमें अपने आप से  डर लगने लगा है । हम चारो तरफ भयानक युद्धोन्माद पैदा करने में लगे हुए हैं । यह सब इसलिए कर रहे हैं क्यों कि हम सोचते हैं कि सायद इस तरह हम सुरक्षित हो सकेंगे । पर ऐसा भी कभी हुआ है क्या?

हम बहुधा मृत्यु के बाद की चिंता करते रहते हैं । इस से कभी कुछ प्राप्त हुआ है क्या? न हुआ है, न होगा । मृत्यु के बाद जो होना है उस पर किसी का कुछ वश नहीं है । लेकिन जीवन में जो हो रहा है उसके बारे में हम सोच सकते हैं। विचार कर निर्णय ले सकते हैं । अच्छे-बुरे का हमें ज्ञान हो सकता है । अपने स्वार्थ में अंधा होकर दूसरों को कष्ट देना कम कर सकते हैं । लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम व्यर्थ के आडंवर में समय बिता देते हैं । खुद भी अशांत रहते हैं और दूसरों का जीवन भी नर्क कर देते हैं।

समस्त शृष्टि के प्रति अपने कर्तव्य की भावना से अभिभूत होकर जब हम जीना सीखेंगे तभी हमारे मन में आनंद का विकास होगा । हम प्रकृति के साथ एक लय में होंगे । सभी जीव-जंतु हमारे अपने हो जाएंगे । हम अपने अधिकार को दूसरों पर थोपना भूल जाएंगे । फिर मृत्यु के बाद हमें स्वर्ग की कल्पना नहीं करनी होगी । यहीं ,इसी जीवन में हम स्वर्ग का सुख भोग सकेंगे। फिर मृत्यु स्वयं अमरता का संदेश दे जाएगी । हम सद -सर्वदा के लिए मुक्त हो जाएंगे।