शनिवार, 22 मई 2021

कोरोना संकट

 

कोरोना संकट

 

पिछले साल से ही संपूर्ण विश्व कोरोना से परेशान है । सायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसके जीवन में कोरोना का असर नहीं हुआ हो । दुख की बात यह है कि भारत में लगभग समाप्त हो जाने के बाद एकबार फिर से कोरोना का दूसरा लहर सामने आ गया है । यह इतने तेजी से फैला है की तमाम लोग अचंभित हैं । कोई उपाय सूझ नहीं रहा है । प्रतिदिन लाखों की तादाद में लोग कोरोना से प्रभावित हो रहे हैं । मरीजों के लगातार बढ़ रहे संख्या के आगे संसाधन कम होते जा रहे हैं । अस्पतालों में रोगियों के लिए बेड नहीं है,आक्सीजन नहीं है,दबाइयां भी बाजार से गायब हैं । ऐसे में कोई कैसे बचेगा? हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि लगता है कि एकबार जो करोना के गिरफ्त में आ गया उसका भगवान ही मालिक है ।

आज जो कुछ हो रहा है उसके लिए देश के नागरिक कम जिम्मेवार नहीं हैं । चिकित्सकों,वैज्ञानिकों द्वारा वारंबार अगाह किए जाने के बाबजूद हमने मामूली सावधानी भी नहीं बरती । मास्क लगाना,सामाजिक दूरी बनाए रखना,वारंबार हाथ साबुन से धोते रहना ,ये सब आसान उपाय थे जिस से कोरोना के वर्तमान तांडव से बचा जा सकता था । लेकिन लोगों ने कुछ भी एतिहात नहीं बरता । तरह-तरह के सामाजिक/धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे । हजारों लोग इन कार्यक्रमों में बिना किसी एतिहात के भाग लेते रहे । कुंभ जैसे कार्यक्रमों का आयोजन करके तो सर्वनाश को निमंत्रित किया गया । लाखों के तादाद में लोग जहाँ-तहाँ से इसमें भाग लेने हरिद्वार पहुँच गए । यहाँ सरकार भी अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा सकी । इस तरह के आयोजन पर प्रतिबंध लगाना जरूरी था । उचित तो यह होता की लोग स्वेच्छा से ऐसे कार्यक्रमों में नहीं भाग लेते । धार्मिक संगठन के प्रमुख लोग लोगों को भीड़ एकट्ठा नहीं  करने का एलान करते । अगर यह सब होता तो सायद यह दिन हमें नहीं देखना पड़ता नदियों में जहाँ-तहाँ अनगिनित लाशें इस तैरते नजर नहीं आते। सबसे दुख की बात यह है कि मृत्योपरांत लोग अपने स्वजनों का सम्मानजनक विदाई भी नहीं कर पा रहे हैं ।

चिंता की बात यह है कि इस बार कोरोना ग्रामीण क्षेत्रों को भी अपने चपेट में लेता जा रहा है । यह कैसे हुआ यह कहने की जरुरत नहीं है। एक तो शहरों से प्रवासी मजदूर फिर से अपने गावों की और लौटने के लिए मजबूर हो गए । जिस तरह से लगातार विभिन्न राज्य सरकारें लाक-डाउन लगाने के लिए विवश हैं ,वैसी परिस्थिति में इन लोगों के पास कोई और विकल्प बचता ही क्या है? हलाकि कई राज्य सरकारों ने इन लोगों को अपने गाँव नहीं लौटने के लिए कहती रहीं और उन्हें कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करने की घोषणाएं भी हुई । परंतु वे कारगार सावित नहीं हुई हैं । सच्चाई में इन घोषणाओं के बदौलत सायद ही कोई बहुत दिन तक शहर में टिका रह सके । इसके अलावा किसान आंदोलन,माघ मेला,कुंभ मेला पंचायतों के चुनाव और विभिन्न राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभाओं के चुनावों का भी कोरोना के दूसरे लहर उत्पन्न करने में बहुत गंभीर योगदान रहा । सबों ने कोरोना को आया गया मान लिया और पहले के तरह सामान्य जीवन जीने लगे। शहर-शहर, गाँव-गाँव सामूहिक कार्यक्रमों की भरमार हो गई । असल में लोग साल भर से संयम करते-करते तंग हो गए थे । उन्होंने देखा की लोग अब बाहर घूमने लगे हैं तो हम भी क्यों नहीं कहीं घूमने निकल जांए।  मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो इस चूक के शिकार हो गए और घर लौटते ही कोरोना से ग्रसित हो गए । निश्चय ही वे अब बहुत अफसोस कर रहे होंगे । परंतु,जो क्षति होना था सो हो गया । कुछ लोग तो अपनी जान गवां बैठे और अपने परिवार को भी संक्रमित कर गए । जिनकी जान बँच भी गयी वे भी अधिकांश परेशानी में ही हैं । अगर हम अग्रसोची होते,संयम से काम करते तो सायद यह दिन नहीं देखना पड़ता । सामान्य लोगों के अतिरिक्त सरकारें भी गफलत में पड़ गयीं । कई राज्यों मे पीएम केयर फंड से भेंटलेटर बेजे गए थे ।  अब यह सुनने में आ रहा है कि कई जगहों पर ये भेंटलेटर वैसे के वैसे ही पड़े रह गए । यह क्या है? एक हिसाब से तो इसे मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध माना जा सकता है । एक तरफ लोग इन सुविधाओं के बिना मर रहे हैं,और दूसरे तरफ प्राण रक्षक उपकरण निष्कृय पड़े हुए हैं । निश्चित रूप से यह एक सभ्य समाज के लिए कलंक की बात है ।

वर्तमान में कोरोना के गिरफ्त में आ चुके लोग और उनके परिजन इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अस्पतालों में जगह नहीं है। प्राइभेट अस्पताल मनमाना पैसा वसूल रहे हैं । इस सबों के बाबजूद लोगों का सही उपचार हो जाए इस बात का कोई गारंटी नहीं है। अस्पतालों में आक्सीजन के बिना लोग मर रहे हैं । जाहिर है कि लोगों में घोर निराशा घर गयी है । जिसे देखिए वही सरकार को जिम्मेदार ठहराने में लगा हुआ है । इस बात से कोई मना नहीं कर सकता है कि मरीजों के इलाज का समुचित प्रवंध करना सरकार की जिम्मेदारी है । पर जब मरीज लाखों की तादाद में सामने आ जाएंगे तो कोई भीसरकार भी क्या कर सकेगी? दुनिया के संपन्न और विकसित देश भी जब अपने नागरिकों की जीवन रक्षा नहीं कर पाए, वहाँ भी कई लोग इलाज के बिना तड़प-तड़प कर मर गए ,तो हम कहाँ ठहरते हैं?

दुर्भाग्यवश देश में वर्तमान संकट का राजनीतिकरण किया जा रहा है । विभन्न विपक्षी दल सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए अमादा हैं । क्या इस से विमारी को नियंत्रित किया जा सकेगा? कोरोना एक संक्रामक रोग है जो नित्य नए रुप में प्रकट हो रहा है। दुनिया भरे के लोग इस से तबाह हैं । पिछले साल सब से ज्यादा तबाही अमेरिका में हुआ था । कई अन्य विकसित देशों में इस महामारी ने भारी तबाही मचायी थी । इसलिए हम नहीं कह सकते कि अमुक कारण से ही ऐसा हुआ है । परंतु,जब इस स्तर का संकट देश और दुनिया पर आ गयी है तो हमें क्या करना चाहिए? क्या हाथ पर हाथ रखकर दूसरों की गलती निकालते रहना चाहिए या कुछ सकारात्मक (जो भी हमारे वश में हो) करना चाहिए? इतने बड़े देश में कोई भी अकेले इस भयावह स्थिति से मुकाबला नहीं कर सकता है । इसके लिए पक्ष-विपक्ष,किसान,मजदूर,अधिकारी,कर्मचारी सबों को मिलकर काम करना होगा । अगर अब भी हम आपस में दोषारोपण करते रहै,तो हमारा भगवान ही मालिक ।

कोरोना एक ऐसी महामारी है जिसमें बचाव ही समाधान है । हलाकि विश्व भर में तरह-तरह के टीकों का प्रयोग हो रहा है । कुछ विकसित देश जैसे अमेरिका,ब्रिटेन ने अपने अधिकांश नागरिकों का टीकाकरण करबा लिया है । परंतु, भारत एक विशाल जनसंख्या बाला देश होने के कारण सभी को टीका लगाना कोई आसान काम नहीं है। इस सच्चाई को जानते हुए भी कुछ लोग इस मौके का राजनीतिक लाभ उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं । असलियत तो यह है कि वही लोग  शुरू में टीका का माखौल उड़ा रहे थे । लोगों में भ्रम पैदा कर रहे थे कि टीका सही नहीं है,यह हो जाएगा,वह हो जाएगा । उस समय देश में कोरोना नियंत्रण में था और लोग खुद भी टीका लगाने में उत्सुक नहीं थे । यहाँ तक कि डाक्टर और अग्रिम पंक्ति के कुछ अन्य लोगों ने भी टीका लगाने में ढ़िलाइ बरती । अब जब फिर से कोरोना बढ़ गया है,तो सभी हाय-तोबा मचा रहे हैं ।  टीके का उत्पादन और उसका उपयोग सीमित संशाधनों के कारण एक हद से ज्यादा तेजी से नहीं चलाया जा सकता है । इसलिए जरूरी है कि विपक्षी दल दुष्प्रचार छोड़कर कुछ रचनात्मक काम करें । अपने साधनों से भी कुछ लोगों का भला करें । इस से एक अच्छा माहौल बनेगा । लोगों में भी उनकी छवि अच्छी होगी ।

कोरोना महामारी के इस दौर में जीवन और मृत्यु के बीच गंभीर संघर्ष चल रहा है । संपूर्ण मानवता के लिए यह एक महान चुनौती है । नित्य अनगिनित लोग अकाल काल के गाल में समाते जा रहे हैं । एसे विकट समय में भी हमारे देश में सरेआम छुद्र राजनीति किया जा रहा है। देश का प्रधानमंत्री  किसी जिले के कलक्टर से सीधे इस विषय में बात करना चाहते हैं तो उसी सम्मेलन में मौजूद उस राज्य के मुख्यमंत्री उन्हें प्रधानमंत्री से बात करने से मना कर देते हैं । यह दृष्टांत अपने -आप में काफी कुछ कह जाता है । क्या देश का सर्वोच्च प्रशासक किसी राज्य के कलक्टर से ऐसी विपिदापूर्ण परिस्थिति में बातचीत नहीं कर सकता है? लेकिन यह सब सोची-समझी रणनिति के तरह किया जा रहा है । राजनेता तो अपना बोटबैंक मजबूत करेंगे चाहे देश को जो हो जाए । जरुरत इस बात की है कि जनता इस सब बात को ठीक से समझे और सोच-समझकर  निर्णय ले ताकि ऐसे लालची और स्वार्थी नेताओं को सबक सिखाया जा सके ।

दुख के इस घड़ी में कई लोगों ने अद्भुत काम किया है । कई लोगों ने अपनी जान की बाजी लगा दी है । इसी क्रम में हमें उन सैकड़ों डाक्टरों /नर्सों और अन्य पैरामेडिकल कर्मचारियों का योगदान अवश्य याद करना चाहिए । पहले बार से भी ज्यादा दूसरे बार भारी तादाद में डाक्टर और उनके सहयोगी यों की मृत्यु इस महामारी में हुयी है । सोचिए,जहाँ एकबार भी जाने से लोग घबराते हैं वहाँ ये लोग दिन-रात काम करते हैं । कई लोगो तो महिनो अपने घर नहीं जा पाते,न ही अपने परिवारजनों से मिल पाते हैं । फिर भी यदा-कदा उन्हें मरीजों के रिश्तेदारों का कोपभाजन बनना पड़ता है । ऐसा इसलिए भी होता है क्यों कि वे सबसे आगे रहकर ऐसी परिस्थितयों का मुकाबला कर रहे होते हैं । जब किसी के रिश्तेदार,मित्र वा किसी नजदीकी लोगों  का विमारी से जान चली जाती है तो उन्हें दुख तो होता ही होगा। वे मानसिक रूप से परेशान भी हो ही जाते होंगे । परंतु,एसे हसमझना चाहिए कि डक्टर खुद भी कई बार अपनी जान नहीं बचा पाते हैं । ऐसा लगता है कि अभीतक इस विमारी का सही इलाज नहीं ढूंढ़ा जा सका है । सभी प्रयास अनुमान पर आधारित हैं और यह कोई भी नहीं कह सकता है कि अमुक इलाज कराने से रोगी ठीक हो ही जाएगा । निश्चय ही यह बहुत ही दुखद परिस्थिति है । संपूर्ण मानवता के सामने इस महामारी ने आस्तित्व का प्रश्न उपस्थित कर दिया है। अभीतक समस्या के समाधान के बहुत प्रयास हुए हैं लेकिन कह नहीं सकते हैं कि भारत जैसे विशाल जनसंख्याबाले देश में स्थिति को सम्हालने में कितना समय लगेगा? लेकिन हमें आशावान रहकर निरंतर प्रयत्नशील रहना होगा । फिलहाल इस समस्या का कोई और विकल्प है भी नहीं ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

mishrarn@gmail.com

mishrarn.blogspot.com

 

शुक्रवार, 14 मई 2021

आनलाइन भोज

 

आनलाइन भोज

पछिलाबेर नबंबरमे जखन माएक चारिम बरखीक करबाक छल तँ बहुत चिंतामे परि गेल रही। जकरे देखू सएह कोरोनाक चर्च करैत भेटैत । लोकक आबाजाही बंद,भेंट-घांट बंद । आखिर कोना की कएल जाए?

गामक बात जरूर फराक छल । ओतए सभकिछु पूर्वबते चलि रहल छल । ओहिना भोज-भात,ओहिना उपनयन,बिआह आ श्राद्ध भए रहल छल । मुदा गाम जाएब तखन ने? ओतए जेबेक क्रममे जँ कोरोना गिरफ्तमे लए लेलक तखन? ग्रेटर नोएडा स्थित हमर घरक आसपास कोनो गड़बड़ी नहि छल । सभटा ओरिआन भए जाइत । मुदा ब्राह्मणक जोगार कोना होइत? कम सँ कम एगारहटा ब्राह्मण तँ चाहबे करी ।

ओना हम पहिल वर्षीक बात गया जा कए पिंडदान कए देने रही । मुदा कैकगोटे कहए लगलाह जे पाँचटावर्षी तँ करबाक चाही । ओना पंडितजीक हिसाबे गयामे पिंडदान केलाक बाद साले-साल वर्षी करबाक अनिवार्यता नहि रहि जाइत छैक । तथापि हम सोचलहुँ जे पांचो वर्षी कइए लेल जाए । ताही क्रममे पछिला साल नबंबरमे माएक चारिम वर्षी छलनि । ओहि समयमे कोरोना किछु कम भए गेल रहैक । मुदा खतम नहि भेल रहैक । तेँ ब्राह्मणलोकनिकेँ घरमे एकठाम जमा करब ठीक नहि बुझाएल । तखन की कएल जाए? आओर विकल्पसभपर सोचए लगलहुँ ।

किछुए दिन पहिने हमरे सोसाइटीमे हमर एकटा परिचित मैथिल ब्राह्मणक ओहिठाम हुनकर माएक दोसर वर्षी रहनि। हमरा ओना ओ अवश्य नोत दैत छलाह । मुदा एहि बेर हुनका ओहिठामसँ नोत नहि आएल । भेल जे वर्षी करताह कि नहि? मुदा एकदिन जखन दुपहरिआमे घरसँ सड़क दिस जाइत रही तँ कर्त्ताकेँ केस कटओने देखलिअनि। पात्रकेँ कर्मक ओरिआन करैत देखलिअनि । एक-दू गोटे लगपासमे बैसलो देखेलाह । हम ओम्हरे ससरि कए गेलहुँ। भेल जे पता करिऐक जे कोना-की कए रहल छथि ?

गाछतर कर्मक तैयारी भए रहल छल । हम ओहिठाम जा कए ठाढ़ भेलहुँ । कर्त्ता अपने बाजए लगलाह-“एहिबेर कोरोनाक कारण ककरो नोत नहि दए सकलिऐक । महापात्रजीक अतिरिक्त ब्राहम्ण भोजनक हेतु मंदिरमे पंडितजीकेँ किछु अन्न आ टाका दए देबनि ।” हम टहलि कए वापस अबैत काल फेर ओतए कनी काल ठाढ़ भेलहुँ। असलमे हम देखए चाहैत छलहुँ जे एहन परिस्थितिमे ओ माएक वर्षी कोना कए रहल छथि । कर्ता खूब नीकसँ मास्क लगओने रहथि । मुदा महापात्रजीक लगमे मास्क नहि छल । हुनकर सहायक लग सेहो मास्क नहि छल । एकाध गोटे जे ओतए बैसल छलाह,तिनको लगमे मास्क नहि छल । एनामे कोरोनासँ वचाव कोना होइत?

 ओहिठामसँ लौटलाक बाद हम सोचए लगलहुँ जे हमरो तँ माएक वर्षी करबेक अछि । तखन कोना की कएल जाए?  मंदिरमे जा कए सीधा आ टाका दए देब हमरा पसिंद नहि पड़ल । ब्राह्मणसभकेँ नोत दए घरमे भोजन कराएब परिस्थितिक अनुसार काज नहि होइत,कारण कोरोना संक्रमणक खतरा भए सकैत छल । तखन एकटा नवप्रयोग करबाक विचार भेल । हम दुनू बेकती एहिपर सहमत भेलहुँ । जिनका ओहिठाम हम वर्षी देखि आएल रही सेहो एकरा पसिंद केलनि,संगहि दूटा ब्राह्मण उपलव्ध करेबाक सेहो जोगार केलनि ।

नवप्रयोग ई छल जे ब्राह्मणलोकनिकेँ हुनके घरपर स्थानीय प्रसिद्ध भोजनालयसँ भोजन आनलाइन आदेश कए नियत समयपर पठा देल जेतनि । हमरे सोसाइटीमे रहैत दोसर मैथिल परिवार सेहो सहमति देलनि । ओना ओ तँ हमर घरोपर आबि कए ब्राह्मण भोजन करबाक हेतु तैयार रहथि । आओर कैकगोटे अपन सहमति देलनि ।

वर्षीक एकदिन पहिने  हम एकभुक्त केने रही । केस कटाबक रहए । पछिला आठमाससँ केस जस-के-तस छल । कोरोनाक कारण हजाम लग नहि गेल रही । मुदा वर्षीमे तँ केस कटेबेक छल। हमर छोटपुत्र आनलाइन एकटा हजामक जोगार केलनि । जेना-तेना केस कटेलहुँ । साँझमे एकभुक्त केलहुँ । दोसर दिन नियत समयपर पंडितजी आबि गेलाह । कर्मक समानसभ पहिनेसँ तैयार छल । विधि-विधानपूर्वक कर्म संपन्न भेल । पंडितजीके यथेष्ट दक्षिना देलिअनि । ओ नीकसँ भोजन केलनि । तकरबाद अपन-अपन घरमे बैसल ब्राह्मणलोकनिकेँ डेलीभरी व्आय द्वारा भोजन समयपर पहुँचि गेलनि । फोनसँ तकर संपुष्टि कएल गेल । ओ सभ अपन-अपन घरमे भोजन केलनि । कैकगोटे तँ भोजन करैत फोटो सेहो पठा देलनि । आनलाइन ब्राह्मणभोजन करेबाक प्रयोग सफल रहल । एहि तरहेंमाएक चारिम वर्षी शांतिपूर्ण षंगसँ संपन्न भेल ।


14.05.2021

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जोरबागमे झपटमारी

 

 

जोरबागमे झपटमारी

ई बात सितंबर २०१०क थिक । ओहि समय हम योजना आयोग(आब निति आयोग)मे  उप सचिवरही । हमर संयुक्त सचिव श्री तुहीन कांत पांडेयजी(संप्रति भारत सरकारमे सचिव ) कहैत छथि-

“आइ अहाँक आबाज एतेक भारी किएक भेल अछि ?”

हुनका तकरबाद सभटा बात कहलिअनि जे ओहिदिन भोरे हमरा लोकनिक संग घटित भेल रहए । हुनका की सभ कहलिअनि से अहूँ बूझि लिअ ।

हमसभ नित्य भोरे पाँच बजे लोदि गार्डेन टहलबाक हेतु जाइत छलहुँ । छओ-सवा-छओ बजे वापस भए जाइत छलहुँ । ओहि बीचमे लोदी गार्डेनक दू चक्कर लगबैत छलहुँ । ओहूदिन तहिना हम सभ लोदि गार्डेन टहलबाक हेतु गेल रही । घरसँ जखन बाहर भेलहुँ तँ थोड़बे दूरपर किछु विकलांग भिखमंगासभ देखाएल । किछुदिनसँ ओ सभ एही समयमे हमरासभकेँ लोदीरोड वा आसपास कतहु देखाइत छल। ओना ओकरसभक मुख्य स्थान सांइ मंदरिक बाहर रहैत अछि जतए सएसँ बेसिए एहन-एहन विकलांगसभ भिखमंगा बनि बैसल रहैत अछि । ओकर हालति देखि लोककेँ दया आबि जाइत अछि । फेर लोकसभ पूजा करबाक मानसिकतामे रहैत अछि । तेँ किछु ने किछु ओकरासभकेँ दए देबामे संकोच नहि होइत छैक । मुदा लोदीरोडपर वा आसपास सड़कपर ओ सभ घरहेर किएक केने छल,ओहिमे ओकरसभक किछु योजना छलैक से हमरासभकेँ सोचेबो नहि करए । सामान्यतः हमरा लोकनिक लोदी गार्डेन जेबाक आ ओहिठाम टहललाक बाद वापस अएबाक रस्ता तय छल । हमसभ खालिए हाथ रहैत छलहुँ । सामान्यतः रस्तापर चलैत केओ-ने-केओ परिचित भेटिए जाइत छलाह । बेसीकाल तँ सरदार वलदेव सिंह सपत्नीक देखा जइतथि । हुनका संगे गप्प-सप्प करैत हमसभ लोदी गार्डेनमे प्रवेश करितहुँ । किछुदिन पूर्व एहिना हमसभ लोदी गार्डेनसँ टहलि कए अपन डेरा वापस जाइत रही । डेरा आब लगीचेमे छल । जोरबागक कोनटा परहक पानक दोकान लग एकटा मोटर साइकिल बला पता पुछलक-

“फलना जगह कोन बाटे जेबैक?”

हम सामान्यतः एहन प्रश्नक उत्तर देबाक प्रयासमे नहि पड़ैत छी । ओकरोसभक प्रश्नक जबाबमे हम किछु नहि बाजल रही । हमर श्रीमतीजी हमरा पाछु कनीके दूरपर रहथि । साइत ओ रेकी कए रहल छल वा झपटमारी करबाक ओकरसभक प्रयास ओहि दिन खाली चलि गेल रहैक । हमसभ सकुसल घर वापस भए गेल रही । ई तँ सपनोमे नहि सोचाएल जे ओ सभ कोनो तरहें गड़बड़ आदमी छल किंवा हमरेसभक पाछा पड़ल छल ।

आन दिन जकाँ ओहूदिन हमसभ पाँचबजे भोरे डेरासँ श्रीमतीजीक संगे टहलए बिदा भेल रही । कनीके आगु बढ़लहुँ की दू-तीनटा विकलांग भिखमंगा हमरासभक आगु-पाछु गुड़कैत देखाएल । आश्चर्यो लागल जे एतेक भोरे ई सभ एहिठाम किएक घुमि रहल अछि ?खैर! हमसभ आगु बढ़ैत गेलहुँ । कनीके आगु बढ़लापर लोदी गार्डेनक भीतर आबि गेलहुँ । प्रसन्नतापूर्वक दू चक्कर लगेलाक बाद हमसभ वापस अपन डेरा दिस बिदा भेलहुँ । लोदीरोड टपलहुँ । कनीके आगु जर्मन विकास परिषद(GDC   )क कार्यालय छल । ओहिठाम दुबगली चौकीदारसभ अपन-अपन जगहपर ठाढ़ छल । फरीछ भइए गेल छल । केओ अबैत छल,केओ जाइत छल । थोड़बे आगु जोरबाग मार्केट छल । हम दुनूगोटे निधोख आगु बढ़ि रहल छलहुँ । । हम हुनकासँ पाँच-छओ हाथ पाछा चलैत रही ।

एकाएक एक आदमी गमछा ओढ़ने हमरासभ दिस अबैत देखाइत अछि । ओही समयमे कैकगोटे लगीचेसँ गुजरि रहल छलाह । तेँ कोनो शंकाक प्रश्ने नहि छल । ओ आदमी एकदम सुभ्यस्त रूपसँ हमर श्रीमतीजीक लगीचमे आबि जाइत अछि आ ओकर दोसर हाथ झोरासँ झाँपल अछि। ओकर दोसर हाथमे कट्टा छल जे ओ हमर श्रीमतीजीक पेटमे सटा देने रहनि । अचानक देखैत छी जे ओ आदमी हमर श्रीमतीजीक गलासँ चेन छिनि रहल अछि । हमर श्रीमतीजी जी-जानसँ ओहि चेनकेँ बँचेबाक प्रयास कए रहल छथि । एतबेमे ओ आदमी बजैत अछि-

“पीछे देखो । अभी उसको साफ कर दूंगा ।”

हमरा दिस ओकरा इसारा करैत देखि हमर श्रीमतीजी अचानक पाछु घुमि हमरा देखैत छथि । ओ आदमी हुनकर पेटमे कट्टा सटा देने रहए। दोसर हाथे चेन छिनि कए भागल । हम ई सभ देखि रहल छी । मुदा एकटा शब्द हमरा मुँहसँ नहि निकलैत अछि । हम एकदम बौक भए गेल छी । हमरा लागल जेना करेंट लागि गेल अछि । कनीके पाछु एकटा युवक मोटर सइकिलसँ घटनास्थल लग आएल । चेन छिननाहर  ओकरा पाछुमे बैसि गेल । हमर श्रीमतीजी मोटर साइकिल बलाकेँ गोहरबैतरहलाह । हुनका होनि जे ओ केओ तेसर आदमी अछि । मुदा ओ तँ झपटमारक दोस्त रहए । ताबे हमहु मोटर साइकिलबला लग पहुँचि गेल रही । मोटर साइकिल आगु बढ़ल । ओकर पाछुमे बैसल झपटमार तमंचा लहरबैत रहल । मोटर साइकिल आगु बढ़ैत रहल । जाबे ओसभ लगीचमे छल,हम अबाक भेल ठाढ़ रही। जहन ओ सभपाँच-छओ लग्गासँ बेसी बढ़ि गेल,तखन जेना हमर आबाज फुटल । हम जोर-जोरसव चिकरए लगलहुँ-

“एकरा पकड़ू ,ई चेन छिनने जा रहल अछि । पकड़ू..पकड़ू...।”

सड़कपर दुनू कात लोक-अबैत जाइत रहल । कथी लेल केओ ओ करासभकेँ टोकबो करत । ओ सभ लोदीरोडपर चढ़ि कए बामा कात मुरि गेल । हम चिचिआइत आगु बढ़ैत गेलहुँ । लगपासमे कैकगोटे जमा भए गेलाह..बस तमासा देखबाक हेतु  । बातो सही छैक ,केओ अपन जान किएक संकटमे दैत । ओ दुनूगोटे  आरामसँ आगु बढ़ैत गेल आ किछु कालमे अदृश्य भए गेल ।

हम दुनूगोटे अपन डेरा वापस अएलहुँ । हमर श्रीमतीजी बहुत आहत रहथि । ओ ओहि चेनकेँ बाइस वर्षसँ पहिरैत छलीह । छलैक हल्लुके मुदा हुनकर माता-पिताक देल उपहार छलनि । तेँ ओहिसँ बेसी लगाव भए गेल रहनि । मुदा आब की होइत? जे हेबाक छल से भए गेल। हमर श्रीमतीजीक इच्छाक अनुसार हम दुनूगोटे थाना जा कए एहि घटनाक सूचना देलिऐक । । हमर श्रीमतीजी थानामे दर्खास्त देलखिन। ओ सभ ओकरा राखि लेलक । मुदा प्रथम सूचना रपट(FIR) नहि केलक । हमरासभक संगे एकटा युवक उप-निरीक्षक घटना स्थलपर अएलाह,थोड़े काल एमहर-ओमहर केलनि आ वापस थाना चलि गेलाह । ओकरा सभक पूरा प्रयास मामिलाकेँ टरका देबाक रहैक। हम एहि बातसँ बहुत क्षव्ध रही ।

एहि मामिलामे हम थाना जेबाक पक्षमे नहि रही । हम बुझिऐक जे ओहिसभसँ आब किछु होबए बला नहि छल । मुदा हमर श्रीमतीजीक बहुत जोर देखि हम नार्थ ब्लाकमे गृहमंत्रीजीक कार्यालयमे कार्यरत ओएसडी नागराजजी(जे हमर परिचित छलाह)  लग गेलहुँ । हुनका सभबात कहलिअनि । ओ थानामे फोन केलखिन आ हमरा फेर थाना जेबाक हेतु कहलाह । साँझमे कार्यालयसँ लौटि हम सोझे लोदीरोड थाना गेलहुँ । ओहि समयमे थानेदारक रंगति बदलि चुकल छल । ओ हमरा देखिते कुर्सीपर बैसेलाह । कोलड्रिंक पिएलाह आ तुरंत एफआइआर करबाक आदेश कए देलखिन । सचमुचकेँ एफआइआर भए गेलैक । हम डेरापर वापस आबि श्रीमतीजीकेँ ई समाचार देलिअनि ।

एकर बात तँ नित्य दूटा पुलिस हमर डेरापर आबए लागल । आसपास लोकसभकेँ कान ठाढ़ हबए लगलैक जे बात की छैक? हिनका ओहिठाम पुलिस किएक अबैत रहैत छनि? एकदिन तँ ओ सभ किछु अपराधीक फोटो संगे आएल आ हमरासभकेँ तिहार जेलमे पहचान परेडमे उपस्थित हेबाक हेतु कहलक । हमसभ एहिबातसँ बहुत परेसान भए गेलहुँ । जे क्षति हेबाक छल से तँ भेबे कएल । आब पुलिस संगे जहाँ-तहाँ बौआइत रहू । हम तत्कालीन पुलिस उपायुक्त श्री आर.के. झा जीकेँ फोन केलिअनि । हुनका आग्रह केलिअनि जे कहुना ई केस बंद करा देथि जाहिसँ पुलिससँ छुटकारा होअए । जे बात छैक ओ हमरा ओहिठाम आएल एएसआइकेँ कहलखिन जे एहि केसकेँ बंद कए देल जाए । ताहि हेतु हमसभ पुलिसकेँ लिखि कए सेहो देलिऐक । इहो लिखि देलिऐक जे हमसभ अपराधीकेँ नहि चिन्हि सकब । हमरासभकेँ पहचान परेडमे लए गेलासँ पुलिसक केस कमजोर पड़ि जाएत । तकर बाद हमरा ओहिठाम पुलिसक आवागमन बंद भेल । हमसभ निचैन भेलहुँ ।

 करीब डेढ़ सालक बाद एकदिन कोर्टसँ समन भेटल । ओहिमे हमर श्रीमतीजीकेँ साकेत कोर्टमे उपस्थित हेबाक हेतु कहल गेल रहनि । हमसभ नियत समयपर कोर्टमे हाजिर भेलहुँ । पुलिस दूगोटेकेँ पकड़ने छल आ हमरोसभक मामिलामे ओकरेसभक नाम दए देने छल । असलमे ओ सभ हमर श्रीमतीजीक चेन झपटमारीमे सामिल नहि रहए । जाबे हमसभ कोर्ट पहुँचलहुँ ताबे  एहि मामिलामे अगिला तारिख दए देल गेल रहैक । हमसभ जज साहेबकेँ आग्रह केलिअनि जे संभव होइक तँ आइए सुनबाइ कए लेल जाए । संयोगसँ मध्यावकाशक बाद ई मामिला फेरसँ लागि गेल । दुनू अपराधी कोर्टमे उपस्थित छल । हमर श्रीमतीजी कहलखिन जे ओ ओहि अपराधीसभकेँ नहि चिन्हैत छथिन । बातो ओएह छल । जज वारंबार पुछलकनि- “आप दबाब में तो नहीं बोल रहे हैं?”

हमर श्रीमती जी कहलखिन-“नहीं सर! हम स्वेच्छा से सही बात कह रहे हैं ।”

तकर बाद हमरासभकेँ कोर्टक तरफसँ यातायात खर्चा देल गेल आ हमसभ वापस अपन डेरा आबि गेलहुँ । मोनमे वारंबार अफसोच होइत छल जे बेकारे पुलिसमे रपट केलहुँ । चेन तँ गेबे कएल ऊपरसँ व्यर्थक परेसानीसभ होइत रहल ।

बुधवार, 24 मार्च 2021

श्री प्रकाशचंद्र पाण्डेय

 

श्री प्रकाशचंद्र पाण्डेय


श्री प्रकाशचंद्र पाण्डेयसँ हमर पहिलबेर भेंट भेल जखन ओ दिल्ली डेस्कमे हमर व्यक्तिगत सहायक(पीए)क रूपमे काज शुरु केलनि । ओ नौकरी शुरुए केने छलाह आ हमरासंगे हुनकर ई पहिल पोस्टींग रहनि । हुनकासंगे हुनकर पिता सेहो आएल रहथि,जेना छोटनेना संगे ओकर अभिभावक इसकूल जाइत छथि। ओ सभ उत्तराखंडक रहनिहार छथि । हुनकर पिता सेहो सरकारी सेवामे रहथि । इन्टर पास करिते ओ आशुलेखन सिखि लेले रहथि जाहिसँ हुनका कर्मचारी चयन आयोगक माध्यमसँ ई नौकरी भए गेलनि ।

शुरुमे प्रकाशजीकेँ नौकरी करबामे दिक्कति होनि । हम कैकबेर तमासइतो छलिअनि । कैकबेर रुसि कए ओ घर बैसि जाथि । तखन हुनकर पिता संगे आबि कए हुनकर मनोवल बढ़ाबथि । एहि तरहें हुनकर काज आगु बढ़ल । क्रमश: ओ काजसभ सिखैत गेलाह । बादमे तँ ओ ततेक पारंगत भए गेलाह जे एकबेर जे टंकित  करथि तकरा दोबारा देखबाक काज नहि रहैत छल । साइते कहिओ कोनो गलती भेटैत । सरकारी काजक अतिरिक्त हमर कैकटा व्यक्तिगत काजसभ सेहो ओ बहुत मनोयोगपूर्वक करथि । हम किछुदिन ट्युशन करैत छलहुँ । प्रकाशजी विद्यार्थीक हेतु नोटसभेँ टाइप कए देथि । आओरो कैक तरहें ओ मदति करथि । मधुबनीक मकानकेँ खाली करेबाक हेतु ककरा-ककरा ने चिठ्ठी लिखल गेल । ताहूमे ओएह हमरा मदति करथि । एकबेर कहबाक काज-जे फलानक नामे चिठ्ठी बनाउ । तकर आधाघंटाक बाद सजल-धजल चिठ्ठी भेटि जाइत ।

कैकदिन एहन होइत छल जे हम आ प्रकाश काज करैत रहैत छलहुँ आ सौंसे कोठरी खाली भए गेल रहैत । संसद सत्रक समयमे एहन होइत रहैत छल । हमरा लोकनिक पासमे बहुत काज रहैत छल । कतबो प्रयास कएलाक बादो राति भइए जाइत चल । कारण जखन दिल्ली सरकारसँ जानकारी अबैत तकरबादे संसदीय प्रश्नक जबाब बनाओल जाइत । सभटा काज करैत-करैत कैकबेर दूपहर राति भए जाइत । घर वापस हेबाक कोनो साधन नहि रहैत छल । ओना बेसी राति भेलाक बाद कार देबाक व्यवस्था रहैक मुदा ओ बेसीकाल कारगर नहि भए पाबैत छल । जँ कहिओ काल कार भेटिए गेल तँ ओ जिलेबी जकाँ घुमैत कैकगोटेकेँ पहुँचबैत चलैत । ओहिमे तँ आओर देरी भए जाइत छल । एकबेर रातुक बारहसँ बेसी भए गेल छल । हम आ प्रकाशजी नार्थ ब्लाकक सामनेमे दिल्ली पुलिसक जीपक बाट तकैत रही जे हमरासभकेँ घर पहुँचबैत। मुदा संवादप्रेषणमे कोनो गड़बड़ीक कारण जीप नहि आबि सकल आा हम दुनूगोटे बाटे तकैत रहि गेलहुँ । बहुत मोसकिलसँ राष्ट्रपति भवनबला द्वारिक आगुमे १०० नंबरबला एकटा जीप ठाढ़ रहैक । ओकरा  सभटा बात कहलिऐक तखन थोड़ेक कालक बाद एकटा पुलिसक जीप आएल आ हमरा लोकनिकेँ अपन-अपन घर पहुँचओलक । एवम् प्रकारेणहम प्रकाशजीक संगे लगभग ६ साल धरि सुख-दुखमे संगे रहि दिल्ली डेस्कमे काज केलहुँ ।

गृह मंत्रालयमे कतहु ककरोसँ जँ कोनो काज पड़ैत तँ प्रकाशजी ओकरा  कए लतथि । प्रशासनसँ जँ कोनो काज पड़ैत तँ ओ ओकरा करबा दितथि । जँ कोनो फाइल नहि भेटि रहल अछि तँ ओ कतहुसँ ताकि अनितथि । कहबाक माने जे प्रकाशजी दिल्ली डेस्क आ हमर समस्यासभक समाधान करबामे माहिर छलाह । क्रमश: हुनकर दक्षताक ततेक प्रचार भए गेल जे कैकटा वरिष्ठ अधिकारीसभ हुनकर माङ करए लगलाह । बहुत मोसकिलसँ हुनका अपना संगे राखि सकलहुँ । काज तँ ओ करबे करथि संगहि हुनकर स्वभाव सेहो बहुत मृदुल छल,व्यक्तित्वमे नम्रता भरल छल ।सभसँ ऊपर हमरा प्रतिए व्यक्तिगतरूपसँ ओ निष्ठावान छलाह । हुनकापर हम आँखि मुनि कए विश्वास कए सकैत छलहुँ । एहन लोक आइ-काल्हि कतए पाबी ?

दिल्ली डेस्कमे सन् १९९३-९७क बीचमे लगभग चारि साल प्रकाशजी हमरा संगे काज केलथि । तकरबाद हम लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज दिल्लीमे प्रतिनियुक्तिपर चलि गेलहुँ । दू सालक बाद जखन हम गृह मंत्रालय लौटलहुँ तखन फेर हमर पोस्टींग दिल्ली डेस्कमे भए गेल आ एकबेर फेर प्रकाशजी हमर पी.ए. भए गेलाह । मुदा दूसालक अंतरालमे हुनकामे आ दिल्ली डेस्कमे बहुत परिवर्तन भए गेल छल । तथापि हुनका हमरा प्रति सिनेह ओहिना रहनि। हमर काज ओ ओहिना तत्परतासँ करैत छलाह । मुदा हमरा अपने आब दिल्ली डेस्कमे मोन नहि लगैत छल । तत्कालीन संयुक्त सचिव स्वर्गीय जलालीजीक व्यवहारसँ हम तंग भए गेल रही । तेँ बहुत प्रयाससँ हम ओतएसँ अपन बदली करा एन.इ.(नार्थ इस्ट) डेस्क चलि गेलहुँ । एहि तरहे प्रकाशजीसँ सेहो हम फराक भए गेलहुँ । मुदा तकर बादो ओ हमरा समय-समयपर भेटैत रहैत छलाह । अखनो कखनो काल हुनकासँ गप्प-सप्प भए जाइत अछि। आब तँ ओ वित्त मंत्रालयमे आप्त सचिव(प्राइभेट सेक्रेटरी) भए गेल छथि । हुनकर पारिवारिक जीवन बहुत सुखि अछि । हुनकर पुत्र बहुत प्रतिभाशाली छथि आ युट्युबपर हुनकर कैकटा कार्यक्रमसभ देखबामे आबि जाइत अछि ।

सोमवार, 22 मार्च 2021

श्री नंद लाल मिश्र

 

श्री नंद लाल मिश्र

ई जीवन अद्भुत अछि । भगवानक बनाओल एहि दुनिआमे कोनो चीजक कमी नहि अछि,कोनो चीजक अंत नहि अछि । जाही दिस देखबैक एक सँ एक लोक देखबामे आबि जाएत । विद्वानेमे एक सँ एक लोक भेलाह, छथि आ आगुओ हेताह । तहिना एक सँ एक धनवान एहि दुनिआमे भेलाह आ छथिओ । एक सँ एक गबैआ,चित्रकार,साहित्यकार एहि दुनिआमे अएलाह आ चलि गेलाह । तखन? हमसभ की करी? अपनाकेँ कतए देखी? कतहु देखबाक कोन काज? ककरोसँ अपन तुलना जँ करब तँ करिते रहि जाएब आ अंततोगत्वा दुखी भए एहि दुनिआसँ चलि जाएब । जे जतए,जाहि रूपमे अछि सएह कमाल अछि । सभमे भगवान किछु चमत्कारिक गुण देने छथि,सभ किछु-ने-किछु कमाल केने अछि । जरूरी थिक सही दृष्टिकोणक। हमरा जीवनमे एक सँ एक लोक भेटलाह जिनकर गुणक वर्णन करब बहुत कठिन काज अछि। हुनका बारेमे किछु कहब संभवतः हुनका छोट कए देब होएत । एहन कैकटा हमर मित्र अखनो छथि जे  जीवनभरि हमरा मदति करैत रहि गेलाह । हे ओ सभ तँ कोनोठाम संग भेलाह,संपर्कमे अएलाह आ क्रमशः जुड़िते चलि गेलाह । मुदा एकटा एहन व्यक्ति भेलाह जे अप्रत्यासित हमरा सामने प्रकट भेलाह ,ओहो तखन जखन हम हुनका देखनो नहि रही,कहिओ भेंटो नहि रहए आ तकर बाद बहुत आत्मीय भए गेलाह आ जीवन यात्रामे बहुत मदतिगार साबित भेलाह । ओ व्यक्ति छथि-डुमरी(मधुबनी) गामक श्री नंदलाल मिश्रजी ।

हमर मधुबनीक मकानक पहिल किरायेदार माप-तौल विभाग,बिहार सरकार जखन मकान खाली कए देलक तकर बाद तीनसाल धरि ओ खाली पड़ल रहल । तकर कैकटा कारण छल । एक तँ हम किरायेदारीसँ तंग भए गेल रही । माप-तौल विभागकेँ बहुत मोसकिलसँ भगेने रही । तकर बाद? मकान खाली कतेक दिन रहैत । मकानमे बहुत रास काज बाँकी रहैक । हमरा छुट्टी रहए नहि । तखन केना की होइत? आखिर हमर श्रीमतीजी तैयार भेलाह। हुनका पठओलहुँ आ संगे हमर ज्येष्ठ पुत्र भास्कर सेहो रहथि । ओसभ दिन-राति मेहनति कए मकानक बहुत रास जरूरी काज करओलथि । तकरबादो मकानक की होएत? अपने तँ रहि नहि सकैत छलहुँ । तेँ ओकरा किराया लगाएब जरूरी छल । ओही समयमे मधुबनी स्थित हमर मित्र श्रीनारायणजी श्री नंदलाल मिश्रजीकेँ तकलनि । हुनका मकानक जरूरति रहनि । ओ मधबनीक उद्योग विभागमे बड़ाबाबू छलाह । हमरा अनुपस्थितिएमे श्रीनारायणजीक सहमतिसँ मकान किरायापर दए देल गेल । नंदलाल मिश्रजी ओहि मकानमे तेरह वर्ष रहलनि । बीच-बीचमे हुनकर बदली दरभंगा,सहरसा आ कतए-कतए होइत रहलथि । मुदा मकान इएह रहलनि । किराया कनी-मनी बढ़बैत रहलाह । कैकबेर किराया बाँकी रहि जाइक । मुदा बादमे ओ पाइ-पाइ जोड़ि कए चुकता करैत रहलाह । बैंकड्राफ्ट बना कए दिल्ली हमर डेरापर पठा दैत छलाह । मकानक बिजलीक बिल लए कए थोड़ेक समस्या जरूर भेल। कोनो कारणसँ बिजलीक बिल अबितहि नहि छल । एहिप्रकारेण सालो बिजली तँ जड़ैत रहल मुदा बिलक भुगतान नहि भेल । बादमे शासन सख्ती केलक आ बाँकी किरायाक संग जुर्माना सेहो हुनका देबए पड़लनि । हम हुनका समय-समयपर कहिअनि जे बिजली बिल जमा करैत रहथि । मुदा से नहि कए सकलाह आ घाठा उठाबए पड़लनि । मुदा से ओ सहि गेलाह । ओहि मकानमे ओ एकटा समांग जकाँ रहलाह आ आसपासक चीज-वस्तुक रक्षो करैत रहलाह । बगलमे हमर संबंधी लोकनिक खाली पड़ल भूखंडक सेहो ओ ध्यान रखैत रहलाह । ई सभ तँ भेल किरायेदारी बात । ओहुना ओसभगोटे बहुत नीक लोक छथि । सभदिन बहुत नीक व्यवहार रखलनि । जखन कखनो हम ओतए गेलहुँ हमरा लागल जेना अपने लोकसँ भेंट भए रहल अछि। जखन कखनो हम हुनका बारेमे सोचैत छी तँ मोन हुनका प्रति सद्भावनासँ भरि जाइत अछि । लगैत अछि जे हमर अंतरमन एकटा सुखद स्मृतिसँ गुजरि रहल अछि । सही मानमे अखनो एहि दुनिआमे बहुत नीक लोकसभ छथि आ तेँ ई चलिओ रहल अछि ।