शुक्रवार, 12 जून 2020

मजदूर

मजदूर

भूख और अपमान से त्रस्त

वे छोड़ गए थे सबकुछ

अपना घर,गाँव और परिवार ।

इसलिए कि

अपने ही लोगों से प्राप्त

अपमान और यातनाएं

हो गई थी असह्य

सामने में परिवार था असहाय

अन्न-जल के बिना

बच्चे पत्नी और माता-पिता

भरण-पोषण के बिना बन चुके कंकाल ।

हारकर एकदिन

वह रातों-रात निकल पड़ा था

कुछ भी नहीं था पाथेय

न था रेल-बस का कोई इंतजाम

पैदल स्टेसन पर

पहुँच गया था जैसे-तैसे ।

एक नंबर प्लेटफार्म पर  खड़ी थी

आठ डिब्बों वाली एक ट्रेन

जिसमें पहले से ही खचा-खच भरे थे लोग

साधारण डिब्बा में

बिना टिकट वह घुस गया था

पता नहीं कि

वह ट्रेन जाएगी कहाँ?

न उसे इस बात की परवाह थी

जहाँ जाना हो जाए

पर यहाँ से तो हटे ।

फिर तीसरे दिन

वह पहुँचा था मुम्बई

अर्द्धमृत

किसी सहयात्री ने दयाकर

साथ चलने को कहा था ।

समय कितना आगे बढ़ गया

आज बीस वर्ष हो चुके हैं

उसका परिवार मुम्बई का नागरिक है

वह किसी सेठ का नौकर है

अपने जैसे ही दस-बीस मजदूरों के साथ

किराये के छोटे से घर में रहता है ।

समय ठीक ही बीत रहा था

यदा-कदा आंदोलनकारी

कहते रहते थे-‘वापस जाओ’

पर वह वापस कहाँ जाता?

गाँव में सब कुछ कब्जा हो चुका था

उसके अपने ही लोग

उसे प्रवासी मानकर

सब कुछ ले चुका था ।

पर कौन जानता था?

कि एकदिन पूरे दुनिया को

कोरोना ले लेगा अपने गिरफ्त में

मुम्बई  शहर उसे काटने दौड़ेगा

लाक डाउन में चली जाएगी उसकी नौकरी

और वह पैदल चल पड़ेगा

वापस अपने गाँव को ।

पर किस्मत भी क्या चीज है?

ट्रेन दरभंगा पहुँच तो  गया

परंतु वह उसमें नहीं था

उस में था

उसका प्राणहीन शरीर ,

उसका छोटा सा शिशु

वारंबार प्रयत्न करता रहा

हिला डुलाकर उसको जगाता रहा

लेकिन वह हिला नहीं ।

तबतक ट्रेन आगे जा चुकी थी

स्टेसन खाली हो चुका था

शिशु रोता रह गया

प्राणहीन पिता के वगल में

परंतु कोई उसे बचा नहीं सका

और थोड़ी देर में वह भी सो गया

सद-सर्वदा के लिए

चिर निद्रा में ।



 12.6.2020

गुरुवार, 11 जून 2020

माधवी नानी

माधवी नानी


हम नेना रही । कैकबेर दनानपर बैसल रहितहुँ कि हुनका किछु-किछु बड़बड़ाइत देखितिअनि । कैकबेर ओ किछु-किछु हमरो कहबाक प्रयास करितथि । मुदा हम नहि बूझि पबिऐक जे बात की छैक ?  कैकबेर भगवती लग पूजा करैत काल सेहो हुनका भनभनाइत देखिअनि । मुदा बात नहि फरिछाए । माएकेँ हुनकासँ बहुत लगाव रहनि । ओ हुनकासँ बहुत आदरपूर्वक गप्प करित थि । बादमे माए हुनकेसँ मंत्रो लेलथि । हुनका लेल माएकेँ जे पार लागनि से ओ करबो करितथि । मुदा हुनकर दुख तँ भितरिआ रहनि । तकर निवारण के करैत ?

कृषकाय,उज्जर धोतिमे लपटल हाथमे छोटसन लोटा लेने भोरे-भोर ओ कुट्टीपर स्नानकरबाक हेतु जाइत छलीह । नवका पोखरिबनि गेलाक बाद हमरासभक परिवारक अधिकांश लोक स्नान,पूजाक हेतु ओतहि जाथि । मुदा माधवीनानी सभदिन कुट्टिएपर जाइत रहलीह । माघक जाढ़ होइक वा भदवारिक पानि हुनका लोकनिक स्नान-पूजाक समयमे कोनो परिवर्तन नहि होइत छल । हुनका संगे हुनके बएसक दू-तीनटा आओर महिला स्नान करबाक हेतु कुट्टीपर जाइत छलि । स्नान-पूजा केलाक बाद ओ सभ तीन-चारि गोटे संगहि लौटथि तँ कैकबेर रस्तेमे भेंट भए जाइत छल । कारण हमहु नवका पोखरिपरसँ स्नान कए ओही समयमे वापस अबैत रहैत छलहुँ । कुट्टीपरसँ स्नान-पूजा केलाक बाद ओ हमर बिचला घरमे स्थापित भगवतीक पूजा करैत छलीह । तकरबादे ओ उतरबारिकात बनल अपन घर जाइत छलीह । आश्चर्य आ दुखक बाद थिक जे ओ घर हुनकर अपन घरारीपर नहि बनल छल । ओ जगह हमरा लोकनिक हिस्सामे छल आ बाबू हुनका तात्कालिक देने रहथिन ।

 नित्य अन्हरोखे कुट्टीपर भगवानक आरती होइत छल । घरी-घंटा बजैत छल । ताधरि सूर्योदय नहि भेल रहैत छल । सोचल जा सकैत अछि जे ओ सभ कतेक भोरे स्नानक हेतु कुट्टीपर पहुँचि जाइत छलि । कुट्टीपरहक बाबा ओहिठामक व्यवस्था चाक-चौबंद रखने छलाह ।  ओतए बहुत रास गाएसभक पालन होइत छल आ तकर दूधसँ पाएस बनैत छल । प्रसादमे ओहि पाएसकेँ कनी-कनी कए लोकसभकेँ देल जाइत । ततेक स्वादिष्ट रहैत छल जे होइत जे खाइते रही । मुँहमे जाइते बिला जाइत छल ।  ओ बाबा बहुत दिनधरि कुट्टीपर रहलाह आ एकदिन रातिएमे कुट्टीक बहुत रास समानसभ बैलगाड़ीपर लादि चुपचाप चलि जाइत रहलाह । लोकसभ कहलक जे नेपाल दिस हुनकर भाए बाबाजी रहथिन,ओतहि चलि गेलाह । कुट्टी खाली भए गेल । मुदा माधवीनानी आ हुनकर संगीसभक स्नान चलिते रहलनि ।

माधवीनानीक पति हमर बाबाक सहोदर रहथि । हमर बाबा(स्वर्गीय श्री शरण मिश्र) छओ भाइ रहथि । ओहिमेसँ एकटा माधवीनानीक पति सेहो रहथि । बिआहक बाद मात्र एकटा बेटीक जन्मक बाद ओ असमयेमे मरि गेल रहथि । ओहि समयमे अंग्रेजक बनाओल कानूनक अनुसार विधवाकेँ मात्र खोरिसक अधिकार छलैक । आओर किछु नहि। तेँ हुनकर ई हाल छल । एतेक संपन्न परिवारक पुतहु होइतहुँ ओ अत्यंत कष्टमे जीवन-यापन करैत छलीह । अपने लोकसभ कानूनक भर लैत हुनका किछु नहि देलखिन । नेनामे सुनिऐक जे एकबेर ओ मोकदमा सेहो केलथि मुदा हारि गेलीह । ओहिसमयमे कानूने तेहने रहैक ।

 पुस्तैनी संपत्तिमे हिस्सा नहि भेटबाक कारण हुनका हाकरोस करैत देखिअनि । हमरा नीकसँ मोन अछि जे पारिवारिक संपत्तिमे हिस्सा नहि भेटबाक कारण ओ कतेक बेकल रहैत छलीह। रहि-रहि कए कानए लगितथि। कहितथि-भगवान हमरा संगे तँ अन्याय केबे केलाह,घरोक लोक  बहुत जुलुम केलक। हमर घरबलाक हिस्सा पचा गेल । हुनका बेर-बेर श्राप दैत सेहो सुनिअनि। ओ श्राप सभकेँ पड़िए गेलनि। ओहि आङनक तीनू घरबासीक जे गति भेल से देखलक नगरक लोक ।

माधवीक माएक पोखरौनी बिआह भेल रहनि । हुनका सेहो मात्र एकटा संतान माधवी भेलखिन। माधवी अपन नानीकसंगे रहथि । संभवतः हुनकर माएक देहांत कमे बएसमे भए गेल रहनि (हम हुनका कहिओ नहि देखने रहिअनि) ।माधवी नानी नामसँ ओ जानल जाइत रहलथि । हुनकर नैहर बेतिआ रहनि । बहुत उच्च कुल-शीलक छलनि हुनकर नैहर । तेँ एतेक संपन्न परिवारमे हुनकर बिआह भेल छल । मुदा भाग्य दहिन नहि रहलनि । पतिक अकाल मृत्युक संगहि जीवनक समस्त सुख चलि गेलनि ।

माधवीक पति फौजमे रहथि । फौजमे पोस्टींगक दौरान ओ एकटा रेडिओ अनने रहथि । ऐहि समयमे रेडिओ ककरो-ककरो होइत छलैक । हमरे आङनमे उतरबारिकातसँ लालबाबाक घरक एक हिस्सामे ओ रहथि । ओकरे ओसारापर रेडिओ राखल जाइत चल । ओहिमे तरह-तरहक गीत-नाद सुनि लोक बहुत प्रभावित होइत । अफसोचक बात छैक जे माधवीनानी केँ घरारिओ नहि देल गेल रहनि । बहुतदिनक बाद जखन हुनकर नतिन जमाए (ठाकुरजी) जखन फौजसँ सेवानिवृत्त भेलाह तँ गामक उतरबारि कात कलमसँ सटले ओ घरारीक जमीन किनलनि। ओतहि घर बनओलनि । तकरबाद माधवी नानी सेहो ओतहि रहए लगलीह । कहि नहि हुनकर बएस कतेक रहनि। हमरा जनैत अस्सी सालसँ कम तँ नहिए रहल हेतनि । आधा देह झुकि कए जमीनक समानांतर भए गेल रहए । तेहनो हालतिमे गुरकैत-गुरकैत ओ हमरासभक आङन आबि जाइत छलीह ,कुट्टीपर स्नान करबाक हेतु चलि जाइत छलीह ।

हमर माए माधवीनानीसँ मंत्र लेने छलखिन । गुरु हेबाक कारण माए हुनका बहुत आदर करैत छलि । जखन अगल घरारीपर ओसभ अपन घर बना लेलनि तखनो माएक आवागमन बनल रहलनि । एकदिन ओतहि माधवीनानीक देहावसान भए गेलनि । बाबू हुनका आगि देलखिन । तकरबाद श्राद्धक समस्या उतपन्न भेल । माएक इच्छा रहैक जे हुनकर श्राद्धक व्राह्मण भोजन आ अन्य विधि-विधान ओही घरारीपर होबए जतए ओ रहैत छलीह । मुदा एकटा फरिकेन ताहि हेतु राजी नहि भेलथि । ओ अलगसँ अपने दरबाजापर व्राह्मण भोजन करओलनि । शेषलोकनि हुनकर अपन घरारिएपर श्राद्धक व्यवस्था केलनि । एहि संबंधमे किछुदिन जबरदस्त घोल-फचक्का भेल रहए । आपसी बैसार सेहो भेल । मुदा सहमति नहि बनि सकल । अ सलमे मरलाक बादो हुनकर स्वतंत्र आस्तित्वकेँ मानबाक हेतु किछुगोटे मानसिक रूपसँ तैयार नहि रहथि जखन कि आब ओहिमे कोनो खतरा नहि छलैक । ओ मरि चुकल रहथि । तखन हिस्सा लेबए थोड़े अबितथिन । 

माधवीनानीक नाम केओ नहि जनैत अछि । भरि जिनगी ओ माधवीनानीक रूपमे जानल गेलीह । हुनका एकटा बेटी भेलनि । तकरो कोनो पहिचान नहि भेलैक ,मुदा माधवीकेँ दूटा बेटा भेलनि । हमरा गाममे ओ सभ कतेको डीहीसँ बढ़ियाँ स्थितिमे छथि आ अपन नानीक स्मृतिकेँ बचओने छथि ।

 माधवीनानीक मरला ३७ साल भए गेल । कानूनक आरिमे हुनका संगे बहुत अन्याय भेल । हुनके कोन,ओहि समयमे जतेक विधवासभ होइत छलीह तिनकर सएह गति होइत छलनि । मुदा आबे की हालति बदलि गेल अछि ? एहि बीचमे हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियममे कतेको संशोधन भेल अछि । कानूनीरूपसँ पैत्रिक संपत्तिमे बेटा-बेटीकेँ बराबरक हक भए गेल अछि । मुदा व्यवहारमे अखनो हालति बहुत नहि बदलल अछि । यद्यपि किछु गोटे अपन हक हेतु कोट-कचहरी धरि जा रहल छथि मुदा सामान्यतः अखनो बेटीक डोली जँ उठि गेल तँ ओ वापस नैहर नहि आएत ,सासुरेमे स्वाहा भए जाएत-क सिद्धांतपर समाज ठाढ़ अछि। केओ-केओ अपवादोमे गनल जा सकैत छथि मुदा अपवाद तँ अपवादे थिक । अपवादिक मामिलाकेँ छोड़िकए बेटीसभक हाथ  अखनहुँ फोकले अबैत अछि । आशा करैत छी जे समाज आबो जागत जाहिसँ माधवीनानीसन लोकक आत्माकेँ शांति भेटतनि ।

 

 

 11.6.2020

 

 

 

सोमवार, 8 जून 2020

यह समय है

यह समय है

 

समय अपना प्रभाव

छोड़ता ही है,

क्या राजा,क्या रंक

सभी हैं मोहताज इसके

बिना किसी अपवाद के ।

कोई कितना भी था प्रतापी,

परंतु,वह बचा नहीं सका

 अपने आप को

उसके समस्त सामर्थ्य

हो गए निष्प्रबावी

और समय अपना

निशान छोड़ गया।

एक मामूली व्याधा ने

कृष्ण जैसे महाप्रतापी के

हर लिए प्राण

और वे निःसहाय देखते  रह गए ।

महावली अर्जुन को

मामूली लूटेरों ने कर दिया परास्त

बेकार हो गया गांडीव

विधवाओं,अवलाओं को लूटकर चले गए

और वे रह गए

असमर्थ,निरुपाय ।

परंतु,हमारा अहंकार

भ्रमित रखता है हमें

और हम निरंतर करते रहते हैं

घात-प्रतिघात उनपर

 जो हैं असमर्थ,असहाय ।

पर भूलिए मत

यह समय है

एक दिन आप स्वयं भी

होंगे इसके गिरफ्त में

कोई बचा नहीं पाएगा

हो चाहे कितना भी समर्थ

और अफसोस करते रह जाएंगे

हाय! मैंने यह क्या किया?

इसलिए होइए सचेत

बच सकते हैं तो बचाइए स्वयं को

व्यर्थ के आरोप-प्रत्यारोप से

जो अवसर मिला है

उसे मत गबाइए

कर लीजिए सदकार्य

जिस से हो सके कल्याण

उन सबों का

जो दुखी हैं,बंचित हैं

और आप भी संतुष्ट होकर

विदा लें

इस संसार से ।

रविवार, 7 जून 2020

इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी


 



इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी

 

 

एकदिन साँझमे हम टहलैत गामसँ पूब चलि गेल रही । बेसिक इसकूलक लगीचमे सड़कक कातमे बैसल रही  कि फटकिएसँ ककरो साइकिलपर गेरुआ वस्त्र पहिरने मधुबनी दिससँ अबैत देखलिऐक । जौं-जौं ओ लगीच अबैत गेल  तँ स्पष्ट होइत गेल जे ओ केओ आओर नहि हमर इसकूलिआ संगी श्रीनारायणजी छथि । हम तँ हुनका देखिते रहि गेलहुँ। आखिर ई भेलैक केना? थोड़बे दिन पहिने तँ हुनकर बिआहक समाचार भेटल रहए । तकर बाद एकदम बदलल परिधान- गेरुआ वस्त्र,पैघ-पैघ केश । बहुत आश्चर्यपूर्वक हम हुनका दिस बढ़लहुँ । ओहो सइकिलसँ उतरलाह-

“औ रबीन्द्रजी! की हाल-चाल?”

ततेक उत्सुकता भेल छल जे होअए जे की पुछिअनि,की नहि । मुदा साँझ पड़ैत रहैक । हुनको गाम जेबाक रहनि। तेँ ओ किछुकालक बाद हमरासँ बिदा लैत साइकिलपर चढ़ि गाम दिस बढ़ि गेलाह । बहुतरास जिज्ञासा मोने मे रहि गेल । बुझबे नहि करिऐक जे एना गेरुआ वस्त्र ओ कहिआसँ पहिरए लगलाह । असलमे ओ ओशोसँ दीक्षा लए लेने छलाह । “

हम ई कहिओ नहि सोचने रही जे नित्यप्रति जिनका संगे इसकूलमे एकहि बेंचपर पढ़ैत रहलहुँ,बादमे मधुबनी कालेजोमे संगे रहलहुँ से गेरुआवस्त्रधारी सन्यासी भए जेताह । संन्यासिओ केहन? जे रहताह घरेमे,धीया-पुताक पालन-पोषणसेहो करताह,घरबाली सेहो संगे रहथिन आ भजन-कीर्तन सेहो चलैत रहत । मुदा सएह भेलैक। ओहि समयमे आचार्य रजनीशक हवा बहल रहैक  रेडिओसँ नित्य हुनकर प्रवचन प्रसारित होइत छल । हुनकर किताबसभ खूब पढ़ल जाइत छल । युवकसभकेँ हुनकर विचार बहुत नीक लगलैक । बहुत रास लोक रजनीशक चेला भए गेलाह।

ओही समयमे हमर दूटा इसकूलिआ संगी सेहो हुनकर पकिआ चेला भेल रहथि । एकटा फेकनजी(स्वामी आनंद वैराग्य) आ श्री नारायणजी मुदा दुनूगोटेक जीवन व्यवस्थामे बहुत अंतर छल । श्रीनारायणजी आचार्य रजनीशक किछु बहुत नीक तत्वकेँ ग्रहण करबामे सफल रहलाह । जाहिमे हमरा हिसाबे प्रमुख छल- ध्यान। अपने संगे पूरा परिवारकेँ ध्यान करबाक कलामे पारंगत कए देलाह जकर बहुत नीक परिणाम हुनका लोकनिक भविष्यपर पड़ल। हुनकर दुनू पुत्र(आलोक आ आशीष) बहुत प्रतिभाशाली भेलाह । कला आ संगीतक संग इसकूलिआ पढ़ाइमे नाम कए गेलाह। आशीष तँ ततेक पढ़लाह जकर वर्णन करब मोसकिल । आइआइटीसँ इंजिनीयरिंग केलाक बाद अमेरिकामे छात्रवृत्ति भेटि गेलनि आ ओतहिसँ पीएचडी,आ तकर बादो कतेको तरहक उच्च शिक्षा लेलाक बाद ओतहि वैज्ञानिक भए गेलाह । तहिना आलोक सेहो इसरोमे वैज्ञानिक भए गेलाह ।

ओहि घटनाक पचास साल भए गेल होएत । मुदा श्रीनारायणजीसँ कखनो भेंट होएत तँ ओहिना आकर्षक मुद्रामे स्वागत करैत भेटताह । ई कोनो कम आश्चर्यक बात नहि जे हुनकासँ ५७ वर्षसँ लगातार ओहिना मधुर संबंध बनल अछि । सभसँ पहिने हुनकासँ भेंट भेल छल ९जनवरी १९६३मे जखन ओ अपन काकाक संगे हाइ इसकूल एकतारामे नाम लिखाबक हेतु आएल रहथि आ हमहु अपन बाबूक संगे   ओही लेल गेल रही । इसकूलक बरंडापर बेंचपर इसकूलक किरानी बूचन बाबू रजिष्टरमे लिखा-पढ़ी करैत छलाह आ हमर बाबू आ हुनकर काका हुनका लग बेंचपर बैसल रहथि । हमसभ हुनकासभक पाछा ठाढ़ रही । तकर बाद चारि वर्ष (आठमासँ एगारहमा धरि )हमसभ ओहि इसकूलमे पढ़लहुँ । क्रमशः इसकूलक आओर विद्यार्थीसभसँ परिचय होइत गेल ।

एकतारा इसकूलमे लगपासक गामक बहुत रास विद्यार्थीसभ पढ़ैत छलाह ,जेना नवकरही,करही,परजुआरि,चंपा,नवटोली,कुशमौल,जमुआरी । किछु विद्यार्थी बेलौजा,सिनुआरा,विष्णुपुरसँ सेहो ओतए पढ़बाक हेतु अबैत छलाह । एकतारा,विचखानाक तँ बहुत रास विद्यार्थी छलाह । कुलमिला कए देहातक ओ बढ़ियाँ इसकूलमेसँ मानल जाइत छल । नवकरहीक नारायणजी,विजयजी,एकताराक फेकनजी, नगवासक श्रीनारायणजी किछु एहन विद्यार्थीसभ छलाह जे अखनो स्मृतिमे ओहिना बैसल छथि जेना पचास साल पूर्व रहल हेताह ।

ओहिदिन नाम लिखेलाक बाद बाबूक संगे हम गाम वापस अएलहुँ। ओही रातिमे लालबाबा(हमर बाबाक छोट सहोदर भाए स्वर्गीय जनार्दन मिश्र)क देहांत भए गेलनि । जखन हम इसकूलसँ वापस अएलहुँ तँ उतरबरिआ ओसारापर कैकटा महिलासभ लालबाबीक संगे कनैत छलीह । केओ-केओ बजैत छलैक जे लालबाबाक हालति बहुत खराप छनि । हमरा लगैत अछि जे रातिक नओ बजे बड़ी जोरसँ कन्ना रोहटि शुरु भेल । लालबाबा चलि गेल रहथि -दूर-बहुत दूर जतएसँ आइधरि केओ वापस नहि आएल । हमर संगे लालबाबाक दोसर पुत्र विन्ध्यनाथ मिश्र सेहो आठमामे नाम लेखओने रहथि । लालबाबाक देहांत आ हमर एकतारा इसकूलमे नाम लेखेबाक घटना एकहि संगे एकहि दिन भेल रहए आ जखन-तखन दुनू घटना हमरा मोनमे अखनो एकहि संगे उभरि जाइत अछि ।

लालबाबाकेँ क्षय रोग रहनि । बहुतदिनसँ ओ ओछाओन धेने रहथि । देहमे हड्डिएटा बाँचल रहनि । कैकदिन हुनका आङनमे रौदमे पटिआपर पड़ल देखिअनि । टीवी पटएबला विमारी रहैक । तथापि, हमसभ हुनका लग-पासमे ओहिना अबैत जाइत रहैत छलहुँ । ओहिसमयमे टीबी विमारीसँ हमरा गाममे बहुत लोग कमे बएसमे मरि गेल रहथि । जाहिमे स्वर्गीय शशिधर मिश्र,स्वर्गीय जगदीश झाक चर्च बहुत दिनधरि होइत रहैत छल । श्वर्गीय शशिधर मिश्र  स्वर्गीय कुमर मिश्रक पुत्र छलाह । सुनिऐक जे ओ बहुत प्रतिभाशाली रहथि। वाटसन इसकूल मधुबनीमे पढ़थि । मुदा कमे बएसमे टीबी विमारीक शिकार भए गेलाह । अंग्रेजीमे लिखल हुनकर बहुत रास कवितासभ हम देखने रही जे कालांतरमे धएल-धएल नष्ट भए गेल । स्वर्गीय जगदीश झा गेनखेलीमे माहिर रहथि। बहुत रास मेडलसभ जितने रहथि।  बिआहभए गेल रहनि। एकटा संतान(कामदेव भाइ) मात्र रहनि । ओतबे कम बएसमे ओहो टीबी विमारीसँ चलि गेलाह ।

लालबाबा चलि गेलाह । तकरबाद ध्रुब काका(हुनकर ज्येष्ठ संतानऐक बिआह भेलनि । हुनका सासुरमे एभोन साइकिल देने रहनि । विन्ध्यनाथजी ओही साइकिलसँ एकतारा इसकूल जाए लगलाह । हम पएरे जाइ । एमहरसँ विंध्यनाथजीक साइकिल पाछूसँ कृष्ण कुमार बाबू(बेलौजा ग्रामक हमरसभक शिक्षक)क टीटों करैत साइकिल अबैत छल तँ सामनेसँ श्रीनारायणजीक काकाक साइकिलक बसुरिआ आबाज सुनाइत छल । ई दुनू साइकिल हमरासभक इसकूलक रस्तामे कतहु- ने- कतहु जरूर टकराइत आ ओहीसँ हमसभ अंदाज लगाबी जे इसकूल सही समयपर जा रहल  छी कि नहि ।

हाइ इसकूल एकतारा देहातक इसकूल छल । ओहिमे पढ़इक अतिरिक्त अन्य गतिविधिक बेसी गुंजाइस नहि रहैक । कहिओ काल सांस्कृतिक कार्यक्रमक नामपर इसकूलक बरंडापर विद्यार्थीसभ जमा होइत छल,शिक्षक लोकनि सेहो कुर्सीपर बैसि जाइत छलाह । केओ-केओ गाना गबैत,केओ कोनो समसामयिक विषयपर रटल लेख बोकरि दैत । एकटा छोटसन कोठरीमे पुस्कालयक नामपर किछु किताबसभ राखल छल । जँ ओ पुस्तकालय खुजि गेल तँ बुझू जे चमत्कार भए गेल । ताहि माहौलमे किछु प्रतिभाशाली विद्यार्थीसभ बहुत नीक पढ़ाइ केलाह आ आगा जीवनमे सेहो नीकसँ स्थापित भए सकलाह तँ एकटा चमत्कारे कहबाक चाही । किछु नीक विद्यार्थीसभ किलासक अगिला बेंचपर बैसैत छलाह । भुसकौल विद्यार्थीसभ प्रयास कए पछिला बेंच धेने रहैत छलाह । किलासमे सबक नहि पूरा करबाक कारण एहन विद्यार्थीसभकेँ शिक्षक लोकनि ततेक हतोत्साहित करथि जे हुनकर सभक प्रतिभा आ आत्मसम्मान माटिमे  मिलि जाइत छल । मोटा-मोटी पाँच-सातटा विद्यार्थी एहिसभसँ बाँचल रहि जाइत छलाह आ मैट्रिकक परीक्षा नीकसँ पास कए कालेज पहुँचैत छलाह ।

सामान्यतः एकटा बेंचपर चारिटा विद्यार्थी बैसैत छल । हम,नारायणजी,श्रीनारायणजी,विजयजी, सामान्यतः अगिला बेंचपर बैसैत छलहुँ । हमरा लोकनि नीक विद्यार्थी  मानल जाइत छलहुँ । एकर सकारात्मक प्रभाव हमरा लोकनिक व्यक्तित्वपर सेहो पड़ब स्वभाविक छल । मैट्रिकक परीक्षाक परिणाम आएल तँ एकतारा इसकूलक परिणाम नहि बाहर भेल छल । किछु तकनीकी समस्या भए गेल रहैक । एकाध मास बादमे जखन परिणाम बाहर भेल तँ चारिटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल रहैक । हम,नारायणजी,श्रीनारायण आ विजयजी । परिणाम देरीसँ बाहर हेबाक कारणे नीक कालेजसभमे नामांकन बंद भए गेल रहैक । परिणामतः हम चारूगोटे आर.के.कालेज मधुबनीमे प्री-साइंसमे नाम लिखओलहुँ । आर.के .कालेज मधुबनी इलाकाक पुरान कालेज मानल जाइत छल । ओहि समयमे स्वर्गीय ए.के.घटक कालेजक कार्यकारी प्राचार्य  छलाह ।

आर्थिक उपार्जन हेतु श्रीनारायणजी फेकनजीक संगे मिलि कए टाइपिंग आ सार्टहैंड कोचिंग इसकूल चलबैत छलाह । ओहिमे निरंतर विद्यार्थीसभक भीर रहैत छल । कालक्रममे ओ ओकर  पूरा मालिक भए गेलाह । किछुदिन ओ ज्योतिषक काज सेहो केलनि। हुनकासँ टिपनि बनेबाक हेतु लोकसभ लाइन लगओने रहैत छल । तारीफक बात ई थिक जे एही आमदनीसभसँ ओ अपन दुनू संतानकेँ बिना कोनो प्रकारक ॠण लेने बहुत नीक शिक्षा देबामे कामयाब रहलाह । आब तँ हुनकर घर जाएब तँ देखिते रहि जाएब। साइते मधुबनी शहरमे ककरो घर एतेक सजल-धजल हेतैक । ऊपर दूमहला बनि गेल अछि । घरमे एक-एक चीज बहुत व्यवस्थासँ राखल भेटत । सभसँ  बेसी आकर्षित करैत अछि ओहिठामक शांति। हम कैकबेर जहन थाकि जाइ तँ हुनका ओहिठाम चलि जाइत छलहुँ आ थोड़बे कालमे सभटा थकान खतम भए जाइत । श्रीनारायणजी ओशोक कोनो प्रवचनबला टेप चला दितथि । किछुकाल धरि हमसभ ओकरा सुनितहुँ । फेर श्रीनारायणजी ओहिपर अपन मंतव्य दितथि। एहि तरहें बहुत नीकसँ समय कटि जाइत छल ।

श्रीनारायणजी अपन बाबासँ मंत्र लेने छलाह । कहक माने जे ओ हुनकर प्रथम गुरु रहथिन । बाबासँ हुनका शिक्षा भेटलनि जे कहिओ ॠण नहि ली । ताहिबातक ओ अंतधरि पालन करैत रहलाह । मधुबनी वाल्मिकी नगर(नीलम टाकीजसँ आगू) हुनकर घर छल । ओहि घरकेँ कतेको किस्तमे बनैत हम देखने छी । मुदा हुनका जखन जतबे आमदनी भेलनि ततबे काज करबैत गेलाह । तहिना नेनासभहक पढ़ाइमे सेहो ओ बैंकोसँ ॠण नहि लेलाह ।

श्रीनारायणजीक संग हमर परिचय सन् १९६३मे भेल छल। ५७ वर्ष बिति गेल ।  हुनकासँ ओहिना संबंध बनल अछि जेना इसकूलक समयमे छल । मधुबनी जेबाक एकटा प्रमुख आकर्षण श्रीनारायणजी रहैत छथि । हम सन्१९८८मे मधुबनीमे मकान बनेनाइ प्रारंभ केलहुँ । ओहि काजमे श्री नारायणजी निरंतर सहयोग करैत रहलाह । मिस्त्री तकनाइ.सामान किननाइ,मकान बनि गेलाक बाद ओकरा भारा लगेनाइ आ तकर बाद भारा वसूल केनाइ सभ काजमे ओ सहयोगी रहलाह । ततबे नहि जखन भेल जे ओ मकान बेचल जाएत तँ ताहुमे ओ सहयोग करबाक हेतु तत्पर रहथि । मुदा संयोग एहन भेलैक जे मकान एकहि दिनमे बिका गेल आ हुनका ओकर रजिष्ट्री भेलाक बादे हुनका सूचना दए सकलिअनि ।  असलमे मधुबनी मकानक किरायेदार जखन तेरह वर्ष रहलाक बाद मकान खाली केलाह तखन श्रीनारायणेजी ओहिमे आठटा ताला किनि कए ओकर सभटा केबारकेँ बंद केलथि । मकान निर्माणक काज जखन शुरु भेल रहए तँ सुखिआ-दुखिआ नाम दुनू मिस्त्रीकेँ ओएह ताकि कए देने रहथि । बिना कोनो स्वार्थकेँ एतेक दिनधरि ओ मकानक काजमे सहयोग करैत रहलाह। एहन उदाहरण भेटब बहुत मोसकिल । हमरा इच्छा रहए जे ओ मकान किनि लेथि । मुदा हुनका तकर प्रयोजन नहि रहनि । आखिर, ओ मकान बिका गेल मुदा जाधरि ओ रहल ओहिमे किछु-ने-किछु काज चलिते रहल आ ताहिमे श्रीनारायणजी मदति करिते रहलाह ।

श्रीनारायणजीक छोटपुत्र आशीष पीएचडी करबाक हेतु अमेरिका जाइत रहथि । श्रीनारायणजी सपरिवार रामकृष्णपुरमके हमर सरकारी आवासपर ठहरल रहथि । यात्राक दिन आबि गेल छल । हमसभगोटे हवाइ अड्डा बिदा भेलहुँ । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी उदास रहथि । एतेक सुयोग्य पुत्र एतेक दूर जा रहल छलखिन । मुदा हर्षक बात रहैक जे हुनका विश्वविद्यालयसँ छात्रवृत्ति भेटल रहनि । अपना दिससँ किछु खर्च नहि करबाक रहनि । एहन अवसर भेटलापर केओ गर्व कए सकैत अछि , से भाग्य हुनका सभकेँ उपस्थित कए देने रहनि । तखन अपनलोकक वियोगसँ दुख तँ स्वभाविके थिक । चेक-इन केलाक बाद एकबेर फेर ओ फटकिएसँ प्रणाम करए आएल रहथिन । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजीक आँखिसँ नोर झहरि रहल छल । कनी कालक हेतु तँ हमरो मोन दुखी भए गेल । मुदा हुनका लोकनिक एही त्यागक फल भेल जे ओ अमेरिका गेलाक बाद पीएचडी तँ केबे केलाह ,तकर बाद सेहो आगु पोस्टपीएचडीक पढ़ाइ केलाह आ ओतहि बहुत नीक प्रतिष्ठानमे वैज्ञानिकक काज आब कए रहल छथि । आशीषक अमेरिका जेबाक ओ दृष्य अखनहुँ हमरा ओहिना मोन पड़ैत रहैत अछि,जेनाक काल्हिए घटल होइक ।

हमरा हिसाबे श्रीनारायणजीक एहि उपलव्धिक पाछा हुनकर माता-पिताक आशीर्वाद बहुत काज केलक । ओ दुनू व्यक्ति संपूर्ण शक्तिसँ अपन माता -पिताक सालों सेवा करैत रहलाह । एहि मामिलामे एहन उदाहरण साइते भेटत । कारण सामान्यतः जँ बेटाकेँ इच्छा रहितो छैक तँ पुतहु संग नहि दए पबैत छथिन माता -पिताक सेवा नहि भए पबैत अछि । मुदा श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी प्रशंसाक पात्र छथि । ओ निरंतर श्रीनारायणजीक संग पुरलथि आ सेहो बहुत सहर्ष । जखन कखनहुँ हम श्रीनारायणजीक डेरापर गेलहुँ हुनकर परिवारमे अद्भुत समन्वय आ शांति देखलहुँ । दुनू व्यक्तिमे एहन तालमेल तँ डिबिआ लए कए ताकब तखनो भेटत की नहि । श्रीनारायणजीक श्रीमतीजी पाक कलामे अद्वितीय छथि । बारीक साग,बारीक नेबो,बारीक सजमनि सभ किछु मौलिक आ टटका होइत जे खाइते रहि जाइ ।

श्रीनारायणजी घरक पाछूक बारीमे तरह-तरहक फल,तरकारी सभ उपजबैत छथि । काते-काते कैक तरहक फूलक गाछसभ । सामनेमे ओशोक ध्यान आश्रम अछि जाहिमे भोर-साँझ ओशोक भक्त लोकनि ध्यान-पूजा करैत छथि । एकाधबेर हमरो ओतए रहबाक मौका भेटल छल । अत्यंत आकर्षक ध्वनिपर शांतिपूर्ण वातावरणमे भक्तलोकनि ध्यान करैत छथि आ अंतमे प्रसाद लए अपन-अपन घर चलि जाइत छथि । एहिसभ तरहक गतिविधिमे श्रीनारायणजी भोरसँ साँझ धरि ततेक व्यस्त रहैत छथि जे हुनका आओर कोनो चीजक वा आन ककरो कोनो प्रयोजन साइते रहैत होनि ।

श्रीनारायणजी सपरिवार अनेको बेर अमेरिकाक यात्रा कए चुकल छथि । ओहिठामक गत्र-गत्र घुमि चुकल छथि । एहूसाल ओ छ मास ओतहि छलाह । जेबा काल कहने रहथि जे वापसीमे हमरासभसँ भेंट करिते जेताह । ओ दिल्ली अएबो केलाह । मुदा कोरोनाक प्रकोप ताबे पसरि गेल छल । भेंट तँ नहि भए सकल मुदा फोनपर गप्प-सप्प भेल । मधुबनी वापस पहुँचलाक बादो हुनकासँ लगातार गप्प भइए रहल अछि । चिंता रहए जे अमेरिकासँ लौटलाक बाद कहीं कोरोना तंग ने करनि मुदा ओ पूर्ण ठीक छथि। हुनकामे खूबी अछि जे जखन जतहि रहैत  छथि ओतहि संपूर्ण रूपसँ समर्पित भए जाइत छथि । ओ बेर-बेर इएह कहैत हैत छथि-“”Let us live moment to moment .”ऐहि कथनकेँ ओ अपन जीवनमे पूर्णतः अंगीकार केने छथि । एहि प्रकारें एकटा सहज सरल जीबैत ओ सभतरहें उत्कृष्टताकेँ प्राप्त कए समाजमे सभक हेतु प्रेरणा पात्र भए गेल छथि । एहन विनम्र आ संस्कारी व्यक्ति सहीमे  एहि संसारमे बहुत कमे होइत छथि । प्रसन्नताक बात जे ओ हमरासभक बीचमे छथि आ निरंतर आनंदित केने रहैत छथि । अपन व्यवहारसँ ओ सन्यासी रहितहुँ सफल गृहस्थ  साबित करबामे सफल रहलाह ।

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।5.10।।

(जे सभ कर्म व्रह्ममे अर्पण कए आसक्तिक त्याग करैत छथि ओ कमलक पात सन(जे पानिमे रहितहुँ पानिसँ फराक रहैत अछि) पापसँ लिप्त नहि होइत छथि ।)

गीताक उपरोक्त श्लोककेँ जीवंत उदाहरण छथि श्रीनारायणजी । हम एहिबातसँ गौरवान्वित छी जे नियतिवश एतेक दीर्घ अवधि धरि हुनकर निकटताक आनंद उठेबाक सौभाग्य हमरा भेटल ।

 ७.६.२०२०




सोमवार, 1 जून 2020

शांति और सुख

 

शांति और सुख

 

 

हमें क्या चाहिए?

थोड़ा सा वस्त्र और थोड़ी आनाज

रहने के लिए छोटा सा घर

जहाँ हो सुकून

जहाँ अपनों से दिल खोलकर

कर सकें वार्तालाप

जहाँ बैठने-उठने से मन में हो शांति ।

लेकिन नहीं जनाब!

यहाँ तो होड़ लगी है

कई पुस्तों के भविष्य  बनाने की

चाहे  जो भी करना पड़े

भले दूसरों का हक छीनना पड़े ।

लालच  का कोई अंत नहीं

कितने ऐसे हैं

जो सारी पृथ्वी मिल जाए तो भी रहेंगे बेचैन

और

पता नहीं कितने घर उजाड़ेंगे

कितनों की जिन्दगी करेंगे तबाह

ताकि वे अपने सपने का महल बना सकें

और जीवन भर रहेंगे अशांत ।

मकरे के जाल जैसे

हम   बुनते रहते हैं

 नित्य नए  विवाद

और उसी में उलझकर रह जाते हैं

जीवन भर ।

सत्य जो सुलभ है

करते नहीं स्वीकार

दैहिक सुख को बनाकर इष्ट

हम हो नहीं पाते कभी संतृप्त

और छूट जाते हैं अकेले

जहाँ से चले थे ।

जो हमारा है नहीं

वही हम को चाहिए

जो हमारे भाग्य में है  नहीं

 उसे पाने के लिए

करते  हैं छल-प्रपंच ।

अकेले थे अकेले जाएंगे

साथ कुछ भी नहीं जा पाएगा

जो भी संग्रह किया

सबकुछ यहीं रह जाएगा ।

वासनाओं से विरत मन

हो स्वयं में लीन

ढूंढ़ता है जब स्वयं को

सतत अंतर्लीन

तब हँसी आती स्वयं पर

कुछ नहीं रखा यहाँ

व्यर्थ यह संसार

सब छोड़ने के हेतु व्याकुल मन

कर रहा -चित्कार-

“कुछ नहीं चाहिए’’

और छोड़ देता है सकल संसार ।

जब वासना हो शिथिल

मन कामनाओ से मुक्त

हम रहे निर्लिप्त

क्षणिक सुख -भोग से

 सही माने में वही है

सुख-शांति का सम्राज्य ।

 1.6.2020