शनिवार, 16 मई 2020

आत्मभय


आत्मभय

जरूरी नही कि

 हम जो देखते हैं वह वैसा ही हो,

हमारा अन्तर्मन घटनाओं का

कर देता है रुपांतरण ,

अपने हिसाब से

और अंततः सामने होता है

हमारे ही पूर्वाग्रहों का प्रतिफल।

कई बार छाया को

हम मान लेते हैं असलियत

और हम अपने मन में

पहले से ही व्याप्त भय के वशीभूत

करते हैं पलायन सत्य से,स्वयं से

क्यों कि सत्य स्वीकार नहीं सकते

और असत्य का कोई आस्तित्व होता ही नहीं

इसलिए

जबतक हम समझ पाते हैं

सत्य की मर्यादा और असत्य की व्यर्थता

तबतक समीप होता है जीवन का अंत

चारों तरफ होता है अज्ञानता का सम्राज्य

परंतु अहंकारवश,

हम ढूंढ़ते रह जाते हैं

उसी को

जो है आस्तित्वहीन ,

फिर कहते हैं 

त्राहि माम्,त्राहि माम् !

कहीं भी नहीं रह जाता है कुछ भी अवशेष

अंदर से बाहर तक विस्तृत

अनंत शून्य में

हम रह जाते है अकेले,विल्कुल अकेले

अपने ही कृत्यों से भयभीत ।

दिग्भ्रमित

असत्य को मान लेते हैं सत्य

फिर पूछते हैं-

मै कौन हू?”

और तबतक बहुत देर हो  जाती है

अब तो हमारी छाया भी

हमारा साथ नहीं देती है।

असल में भय का कारण कोई और नहीं

हम स्वयं हैं।

आज हम जो भी हैं

सब हमारे ही  चिंतन के प्रतिफल हैं,

हमारे ही पूर्वकृत कर्म

हमारा भविष्य बन है उपस्थित।

जिनका कोई आस्तित्व भी नहीं

कभी था ही नहीं,

हम उसी में आसक्त

और आत्मभय से त्रस्त

ढूंढ़ते रह जाते हैं,

अपनी अस्मिता,अपनी पहचान

और जीवन का अर्थ।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

१६.५.२०२०

mishrarn@gmail.com


मंगलवार, 12 मई 2020

माया और मुक्ति


माया और मुक्ति



सभी जानते हैं कि

जीवन क्षणभंगुर है

कि इसका नाश होना ही है

कि मृत्यु के उपरांत कुछ भी

साथ नहीं ले जाना है

सब कुछ यहीं छूट जाना है ।

लेकिन आश्चर्य है कि

सब कुछ जानकर भी

हम जीवन भर ,

कुछ और कुछ और के

चक्रव्युह में फँसे रह जाते हैं

और अंत में खाली हाथ चले जाते हैं ।

ऐसा क्यों है?

क्यों नहीं हम समय रहते समझ पाते हैं

इस सब की व्यर्थता

और रह जाते हैं

इसी में लिप्त आजीवन ।

यही है माया

जिसमें अनुरक्त

हम रह जाते हैं अनभिज्ञ

जीवन के सत्य से

काम,क्रोध,लोभ के वशीभूत

गढ़ लेते हैं चतुर्दिक

नर्क ही नर्क ।



धर्म के नाम पर करते हैं

नाना प्रकार के छल -प्रपंच

लोगों को ठगते हैं

कि यह करो,वह करो

मिलेगा स्वर्ग

जहाँ रहोगे सुखी और संपन्न

परंतु,

ऐसा कभी कुछ होता नहीं है

स्वर्ग की कामना

लिए हम चले जाते हैं

दूर,बहुत दूर

जहाँ से कोई लौटकर आया नहीं

 यह कहने कि

उसे स्वर्ग मिला या नहीं ।

अज्ञानतावश

हम सुन नहीं पाते है

आत्मा की आवाज

कि

मैं यहीं हूँ

व्याकुल मुक्ति के लिए ।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

१२.५.२०२०

mishrarn@gmail.com

सोमवार, 11 मई 2020

कोरोना संकट


कोरोना संकट



आज-कल विश्व कोरोना की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । पूरे दुनिया में एक साथ लाखों लोग कोरोना से संक्रमित हैं और लाखों लोग अपनी जान गमा चुके हैं । कुल मिलाकर सारी दुनिया कोरोना के आगे असहाय दिख रही है । इस विमारी का कोई निश्चित इलाज नहीं होने से वचाव ही एकमात्र समाधान लगता है । पर इस वैश्विक महामारी से वचाव भी इतना आसान दीखता नहीं है । क्यों कि अधिकांश संक्रमित लोगों में इसका  लक्षण होता ही नहीं है और लक्षण प्रकट होने से पहले ही वह अनगिनित लोगों को संक्रमित कर चुका होता है । अतएब सामाजिक दूरी बनाए रखना और अपने-अपने घरों में बंद रहना ही एकमात्र समाधान लगता है । यही कारण है कि आज लगभग पूरी दुनिया लाक डाउन की स्थिति में  है । लोग काम-काज छोड़कर जान बचाने के फिराक में अपने-अपने घरों में बंद हैं । स्थिति इतनी खराब है कि अगर सामने कोई व्यक्ति दिख जाता है तो मन में चिंता होने लगती है ।

कोरोना वायरस कैसे उतपन्न हुआ यह एक विवाद है । परंतु यह सभी मानते हैं कि सर्वप्रथम इसकी उत्पति चीन के ह्वुआन शहर में हुई । इसके बाद चीन के इस शहर के हजारों लोगों में इस वायरस का संक्रमण हो गया । देखते ही देखते यह इटली एवम् युरोप के अन्य देशों में तेजी से फैलने लगा । निश्चित रूप से अनुभव की कमी या तत्परता केअभाव में युरोप के देशों में यह विमारी बड़ी तेजी से फैल गया। इसके बाद जो भयावह स्थिति उतपन्न हुई वह सर्वविदित है । लाशों को ठिकाना लगाना मुश्किल हो गया । इलाज करने के लिए अस्पतालों में बेड की कमी हो गई । सुना तो यह भी जा रहा है कि इटली में बुजुर्ग लोगों को अस्पताल नहीं ले जाया जा सका और वे घर में पड़े-पड़े ही मर गए । इसके बाद अमेरिका सहित दुनिया के अन्य देशों में भी यह वायरस फैल गया । आज के दिन में अमेरिका में इस विमारी से मरने वालों की संख्या पचहत्तर हजार के आस-पास पहुँच गई है । शीघ्र ही यह संख्या एक लाख तक पहुँच सकती है ।

भारत में इस वायरस की उपस्थिति सब से पहले केरल में दर्ज हुई जहाँ चीन के ह्वान शहर से आए हुए भारतीय को कोरोना से संक्रमित पाया गया । इसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता यह वायरस अपना पैर समुचे देश में फैल चुका है वह भी तब जब २४ मार्च से पूरे देश में लाक डाउन है । शुरु में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या एक से सौ तक पहुँचने में पैंतालिस दिन का समय लगा । परंतु अब तो नित्य हजारों में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में इजाफा हो रहा है ।

कोरोना से लड़ने के लिए दुनिया भर के लोगों ने पूरी ताकत झोंक दी है । पर कोरोना नियंत्रण में नहीं आ रहा है । नित्य हजारों लोग कोरोना से मर रहे हैं । मरने वालों में अधिकांश वृद्ध लोग हैं परंतु कम उम्र के लोग भी मर रहे है । मृत्यु का इतना दर्दनाक दृश्य कदाचित सायद ही किसी ने देखा होगा । कुछ अस्पतालों में  लाशों के साथ ही मरीजों का इलाज हो रहा है क्यों कि शवगृह भर चुका है और परिजन अपनों का लाश नहीं ले जा रहे हैं ।

सरकार पूरा प्रयास कर रही है कि इस महामारी के प्रसार को अपने देश में रोक दिया जाए । लोगों को कम से कम हानि हो । इसलिए ही अप्रैल महिने के चौवीस तारिख से ही पूर्ण लाक डाउन लागू है । सोचा जा सकता है कि एक सौ तीस कड़ोर के आवादी वाले इसदेश में लाक डाउन लागू करना कितना कठिन निर्णय रहा होगा । इसका अनुपालन करबाना तो और भी कठिन प्रयास सावित हुआ है। यह जानते हुए कि इस महामारी का कोइ सटीक इलाज नहीं है और जान बचाने का एकमात्र उपाय सामाजिक दूरी बनाए रखना है ,जहाँतक संभव हो घर से बाहर नहीं जाना है । वृद्ध,शिशु,विमार और गर्भिणी महिला को तो विल्कुल ही नहीं जाना है ,लोक वारंबार लाक डाउन का उल्लंघन करते नजर आए । चाहे दिल्ली का तबलीगी जमात में शामिल लोग हों या महानगरों से अपने पैतृक घर वापस जाने को आतुर प्रवासी मजदूर सबों ने लाक डाउन में अन्तर्निहित सामाजिक दूरी बनाए रखने के सिद्धांत का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करके इस महामारी को पूरे भारत में फैलने में अहम् योगदान दिया है । अभी चंद दिन पहले शराब के दिबानों ने शराब की बिक्री शुरु होते ही जो भीड़ इकठ्ठा किया है उसका घातक परिणाम भी हम सबको भोगना पड़ सकता है । कारण चाहे जो भी हो किंतु कुल मिलाकर लाक डाउन का जितना फायदा हमें हो सकता था वह हो नहीं पाया । प्राप्त जानकारी के अनुसार ,मरीजों के संख्या में अनवरत  वृद्धि हो रही है । अगर यही हाल रहा तो अनुमान लगाना कठिन है कि महिने दिन बाद हम कहाँ खड़े होंगे?अभी एम्स दिल्लीके निदेशक के हबाले से समाचार आया है कि जुन-जुलाई में संक्रमण पराकाष्ठा पर होगी । भगवान जाने हम किस हाल में होंगे । जाहिर है कि इन समाचारों ने जीवन में अनिश्चितता का माहौल भर दिया है । परंतु ज्यादा सोचने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला है । जो होना है सो होकर रहेगा । हम अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं । यह किसी को नहीं पता है कि आगे क्या होना है या हमें किस तरफ जाना है ।

लाक डाउन से असंगठित क्षेत्र मे काम करने वाले मजदूर एवम् दैनिक आधार पर काम करने वाले मजदूरों की कमर तोड़ दी है। लाखों के तादाद में ऐसे लोग एकाएक बेरोजगार हो गए । इन लोगों के पास कोई बचत नहीं होता है । ये रोज कमाने और रोक खाने वाले लोग हैं । काम  छूटते ही इन्हें लगा कि अब वे कहाँ जाएं । मकान का किराया,रोज का भोजन ,वच्चों का परवरिश सब असंभव लगने लगे । वे बेतहाशा जहाँ-तहाँ ,जैसे-तैसे भागने लगे । कोई उपाय ढूढ़ने लगे जिस से वे अपने पैतृक गाँव वापस जा सकें । पर जाए कैसे? सारे रास्ते बंद थे । बस,ट्रेन सब बंद । कई दुस्साहसी मजदूर पैदल हजारों मिल अपने परिजनों के पास चल पड़े और रास्ते में ही या तो भूख से मर गए या प्रशासन द्वारा पकड़ लिए जाने के बाद एकांतबास में डाल दिए गए । कुछ तो अत्यंत मर्मांत घटनाओं के शिकार हो गए। अभी औरंगाबाद के पास सोलह मजदूर विश्राम करते हुए मालगाड़ी से कट  गए । उनमें से पाँच का अभी इलाज चल रहा है और शेष घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिए । इस घटना ने सारे देश को झकझोड़ दिया है । लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि लाक डाउन लागू करने से पहले इन चीजों का ध्यान क्यों महीं रखा जा सका ?

अब जबकि पूरी दुनिया करोना से त्रस्त है तो इस से बचने के तरह-तरह के उपाय लेकर अनेको प्रकार के संगठन और लोग सामने आ रहे हैं । कोई कहता है कि यह खाइए,कोई कहता हे वह खाइए,मधु खाइए,गर्म पानी पीजिए,काढ़ा पीजिए आदि,आदि । लोग घबराहट में तरह-तरह का प्रयोग करते भी जा रहे हैं । कुल मिला कर लोग कारोना वायरस से बुरी तरह डर गए हैं । निश्चित रूप से यह सही नहीं है । कहते हैं कि जो डर गया सो मर गया । किसी भी हालात में डरना तो समाधान हो ही नहीं सकता है । फिर क्या किया जाए? अभी तक दो बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि हमें एक-दूसरे से दो गज दूरी बना कर रखना है । दूसरा बाहर कम से कम निकलना है और अगर निकलना जरूरी हो ही गया है तो मास्क जरूर लगाना है । समय-समय पर हाथ साबुन या अन्य प्रकार के कीटनाशक से हाथ धोते रहना है ताकि वायरस का प्रसार में रुकावट हो ।

लाखों लोगों के प्राण जिस विमारी से चले गए हों उस महामारी से बचने का हर संभव प्रयास दुनिया के सारे देश कर रहे हैं । सुनने में यह भी आ रहा हे कि इजरायल और इटली इस दिसा में बहुत आगे निकल गए हैं । इस क्रममें दुनिया का ध्यान चीन पर वारंबार पहुँच जाता है कारण यह विमारी वहीं से शुरु हुई है । चीन इसका टीका बनाने में लगा हुआ है। अमेरिका भी बहुत तत्परता से इस काम में लगा हुआ है । देखना है कि सफलता किसके हाथ लगता है । चाहे जो भी प्रयास सफल हो लेकिन अगर ऐसा होता है तो निश्चित यह पूरी मानवता के लिए वरदान सावित होगा और पूरा विश्व प्रलय की आसन्न संभावना से बच जाएगा ।

दुनिया भर के वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना से निजात पाने का एकमात्र समाधान टीका अविष्कार होना है । यद्दपि इस कार्य में कई देश चेष्टा कर रहे है ,लेकिन इस में पूर्ण सफलता मिलने में समय लग सकती है । तबतक क्या किया जाए? लाकडाउन के बाबजूद विमारी फैलती जा रही है । अपने देश में भी लगातार लाकडाउन लागू है । फिर भी कोरोना से संक्रमित लोगों के संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है । अतएव स्पष्ट है कि खतराके बाबजूद हमें अभी कोरोना के साथ रहना होगा । जाहिर है कि इस में कुछ लोगों की जान जा सकती है परंतु ,अनंत काल तक सब कुछ बंद नहीं रखा जा सकता है । इसलिए संयम के साथ-साथ नित्यप्रति के गतिविधि को चालू करना ही होगा । देखते हैं कि यह सब कैसे हो सकता है ।

हर बुराई के साथ कुछ अच्छाई भी निहित होती है । कोरोना के साथ भी ऐसा कुछ लगता है । तमाम कष्टों,असुविधाओं और मानव जीवन पर मड़राते संकटों के बाबजूद कोरोना ने हमें अपने पुरातन संयमी संस्कृति का महत्व फिर से ताजा कर दिया है । सामाजिक दूरी और अन्य तरह की बातें जो अब की जा रही है वह सब हमारे यहाँ नया नहीं है । परंपरा से लोग वचाव द्वारा विमारियों से बचने की चेष्टा करते थे । दैनिक जीवन में व्रत,उपवास ,ध्यान, प्राणयाम आदि का महत्व दिया जाता था जिससे लोग दीर्घजीवी तो होते ही थे साथ ही उनके विचार भी सात्विक होते थे जिस से वसुधैव कुटुम्वकम् जैसी उच्च भावनाओं का प्रचार-प्रसार भी होता था । निश्चय यह विमारी हमे कुछ संदेश देकर जाएगा । सायद हम मानव जीवन को एक नए सिरे से समझने और जीने का प्रयत्न करने के लिए विवश हो जांए


रबीन्द्र नारायण मिश्र

११.५.२०२०

mishrarn@gmail.com






गुरुवार, 7 मई 2020

विश्वास


विश्वास

मनुष्य कभी भी

सायद नहीं रहा इतना संकटग्रस्त

जितना आज है ,

घर में भी हम हैं असुरक्षित

आखिर क्यों?

इसलिए कि

 हम  हो गए अतिशय भौतिकतावादी

जैसे-तैसे सुख करो,

छीन लो दूसरों का हक

चाहे जितना भी करना पड़े अन्याय

समग्र पृथ्वी पर कर लो एकाधिकार

परंतु इस सब का परिणाम

कौन भुगत रहा है?

हम सभी ठगे महसूस कर रहे हैं

अनीति से अर्जित धन

ला रहा है दूध के बदले जहर

हवा के बदले प्रदूषित वायुमंडल

स्कूलों मे संस्कार देने के बजाए

निर्दोष वच्चों में भरा जा रहा है घृणा के बीज

फैलाए जा रहे नफरत

ऐसे माहौल में

कहाँ से विकसित हो सकता है आपसी विश्वास?

स्वार्थवश गला घोंटने को

तत्पर हो जहाँ अपने ही लोग

ताज्जुब है कि फिर भी वे

ढूंढ़ रहे है सुकून,

लेकिन बिना आपसी विश्वास के

यह संभव है कहाँ?

इसीलिए तो,

बड़े -बड़े महल बनाकर भी लोग बेचैन हैं

इधर-उधर भाग रहे हैं,

ढूढ़ रहें हैं शांति

जो कहीं अन्यत्र है ही नहीं

फिर भी लोग क्षण-प्रति क्षण

शक के समुद्र में हैं आत्मलीन

और कह रहे हैं,

मुझे चाहिए और कुछ भी नहीं,

केवल शांति

परंतु यह कैसे संभव है?

विश्वास कोई वस्तु नहीं है

कि

इसे कहीं खरीद लें ,

या प्रयोग कर फेक दें ।

यह तो है तप से विकसित पुष्पवृक्ष,

जिस पर खिलते हैं

सुख,शांति और स्मृद्धि के  फूल



रबीन्द्र नारायण मिश्र

७.५.२०२०

mishrarn@gmail.com


सोमवार, 4 मई 2020

सौराठ सभा


सौराठ सभा

 

सौराठ सभा हमरासभक ओहिठाम पाबनि जकाँ मनाओल जाइत छल । सामान्यतः सभा मइ-जूनक महिनामे  लगैत छल । ओहि मासमे वर्षाक बहुत संभावना रहैत छल । तेँ सभाक लग-पासक गामक लोकसभ पहिनेसँ सभाक पाहुन हेतु तैयारी केने रहैत छलाह । दरबाजासभपर जारनि सुखा कए राखल रहैत छल । घरमे दनौरी,तिलौरी,सँ लए कए अनेकानेक प्रकारक अँचारसभ तैयार रहैत छल जाहिसँ मौसमक कुप्रभाव भेलापर पाहुनकेँ कोनो दिक्कति नहि होनि । सभाक पँचकोसीमे बसल गामसभक कोनो घर एहन नहि रहैत छल जतए सभैती पाहुन नहि आबथि । सौंसे गाम पाहुनसँ गजल रहैत छल । दसबजे भोरे धरि पाहुनसभ भोजन भात कए तैयार भए जाइत छलाह । तकरबाद सभाागाछी बिदा होइतथि । अधिकांश लोकसभ पैरे जाइत छलाह कारण बससभ लदालद भरल रहैत छल । ओना सरकारक तरफसँ अतिरिक्त बससभ देल जाइत छल मुदा सभाक भीड़क आगु ओ कम पड़ि जाइत छल । अड़ेर पुरबारि टोलसँ कनेक आगु जा कए एकपेरिआ रस्ता छलैक जे बाधै-बाधे सोझे पोखरौनी चौकपर ऊपर होइत छल । पोखरौनी चौकसँ मोसकिलसँ एक माइल सभागाछी अछि । ओतए जाइते सभाक गहमा-गहमी शुरु भए जाइत छल । रहिका दिससँ बस-जीप-रिक्सासभ धरा-धर आबि रहल अछि । ओमहर जयनगर दिससँ सेहो सएह हाल अछि । कनीके आगु बढ़ब तँ मधुबनी दिससँ से यात्रीसभक करमान लागल अछि। कहि नहि सकैत छी जे सभगाछी पहुँचैत देरी केहन मनोरम दृश्य देखाइत छल ।

सौराठ सभाक विशेषतामेसँ एकटा प्रमुख छल सोमनाथ महादेव। कहल जाइत अछि जे  गुजरातक सोमनाथक मंदिरसँ आनि शिवलिंग एतए राखल गेल रहथि जाहिसँ मलेच्छक आक्रमणसँ हुनका बचाओल जा सकए । सभागाछीमेसोमनाथ महादेवक मंदिर जाए भक्तलोकनि हुनकासँ नीक कथा पटि जेबाक गोहार लगबैत छलाह । महादेवक दर्शन बाद लोकसभ सभसँ पहिने अपन गामक अड्डापर पहुँचि हाल-चाल लैत छलाह । तकरबाद शुरु होइत सभा घुमनाइ आ ओहीक्रममे घटकैती । सभ समाप्त हेबाक जखन दू-तीन दिन बाँचल रहैत तखन तँ सभाक भीड़ बेकाबू भए जाइत छल । जेम्हरे देखू तेम्हरे लोके-लोक । लगैत जेना चारूकात मानवक समुद्र पसरि गेल अछि। तेहनोमे लोकसभ सभामे घुमिते रहैत छलाह । एहि गामसँ ओहि गामक डेराक बीचमे कथासभक जानकारी लैत रहैत छलाह । ई क्रम साँझ धरि चलैत रहैत छल । कन्यागतसभ वरसभक अभिवावकसँ गप्प-सप्प करितथि। वरसँ ओकर परिचय लितथि। वरक योग्यता आ उपलव्धिक विषयमे जानकारी प्राप्त करबाक हेतु तरह-तरहक प्रश्न-प्रतिप्रश्न कएल जाइत । मुदासभ किछुक बाद बात बजरि जाइत दहेजपर । कतेक टाका लेब आ कतेक देब । यद्यपि सभागाछीमे ठाम-ठाम  बैनर लटकओने लोकसभ दहेजक विरोध करितथि मुदा व्यवहारमे बात किछु आओरे छल । एहन साइते कोनो कथा होइत जाहिमे टकाक लेन-देन नहि होइत । एहिबातसँ सभागाछी बदनाम भए गेल । लोकसभ ओकरा मेलाक संज्ञा देबए लागल । ततबे नहि कैकबेर लोक ठका सेहो जाइत छलाह । वर आ कन्या पक्ष दुनू  गलत जानकारी देथि जाहिसँ कैकबेर जीवनमे बहुत दुखद प्रसंगसभ होबए लागल । क्रमशः लोकसभक सभागाछीसँ विश्वास भंग होबए लागल । बिआह हेतु लोक घरकथापर निर्भर होबए लागल । सभा आबि कए जानकारी लितथि मुदा निर्णय बादमे होइत ।

सौराठसभामे बाहर अएनिहारक हेतु रहबाक हेतु व्यवस्था सेहो छल । मंदिरसँ सटले चारूकात धर्मशाला छल । ओहिठाम रहनिहार लोकसभ अपनसभटा ओरिआन करैत छलाह । कैकगोटे गामसँ अपन भनसिआआ बर्तन-बासन लेने अबैत छलाह । ओछाओन-बिछाओन तँ रहिते छलनि । एकगामक लोकक डेरा एकहिठाम रहैत छल । ओसभ भोर-साँझ डेरापर विश्राम करैत छलाह आ दिनभरि सभागाछीमे रहैत छलाह । असलमे ओहि समयमे लोकसभ सभागाछीकेँ बहुत गंभीरतसँ लैत छलाह । जँ ककरो घरमे बिआहयोग्य वर-कनिआ अछि तँ ओ सभागाछी जेबे करताह । आओरनहि किछु तँ कम सँ कम किछु जानकारिए भेट जेतनि । किछु परिचित,निकट संबंधीसभसँ भेंटे भए जेतनि । अस्तु,जँ सभा लागल अछि तँ लोक ओतए जेबे करथि ।

हमसभ नेना रही । तखनेसँ सालमे एकबेर होबए बला एहि सभाक प्रतीक्षा रहैत छल । हमसभ चारि-पाँचगोटे सभा पहुँचि जाइत छलहुँ । कहिओ काल बाबूजीक संगे सेहो जाइत छलहुँ । उद्येश्य रहैत छल सभागाछीमे  बानरसी पान खाएब,नानाप्रकारक लाल-पिअर रंगक सरबतसभ पीबाक आनंद लेब,आदि,आदि ।

जहिना लोक तरह-तरहक पाबनिसभ मनबैत छल तहिना सालमे एकबेर सौराठसभाक सेहो स्थान अबैत छल । लग-पासक गाममे रहनिहार धीया-पुतासभक हेतु ओ मनोरंजनक एकटा जबरदस्त अवसर रहैत छल । सभाक समय दुपहरिआमे जेम्हरेसँ देखू लोकक हुजुम सौराठ सभादिस जाइत देखाइत । किछुगोटे बससँ जाइत छलाह । मुदा बससभक दशा ततेक खराप रहैत छल जे अधिकांश लोक पैरे जाएब पसिंद करैत छलाह । ओहि समयमे टेकर ओतेक नहि चलैत छलैक । हमरा लोकनि बाधे-बाध पैरे चलैत-चलैत पोखरौनी चौक लग ऊपर होइत छलहुँ । ओहिठामसँ तँ सभा लगे छलैक । दस मिनट आओर पैरे चलू आ पहुँचि जाउ सभागाछी ।

सभागाछी पहुँचतहि हम महादेवक दर्शन करैत छलहुँ । तकरबाद बनारसी पानक दोकान लग पहुँचितहुँ । ओहिठाम अगल-बगलमे कैकटा दोकान एकपाँतिसँ लागल रहैक । कोनोमे आइसक्रीम बिका रहल अछि तँ कोनोमे किछु । से सभ केलाक बाद पहुँचितहुँ अपन गामक डेरापर । सभामे बैसबाक व्यवस्था बहुत वैज्ञानिक छल । सभ गामक आ कैकबेर एकहि गामक कैकटा टोलसभक डेरासभक स्थान नियत छल । सभसाल लोक ओतहि रहैत । एहिसँ सभामे ककरो ताकब आ भेंट करब बहुत आसान भए जाइत छल ।

सभागाछीमे एकबेर बिहारक तत्कालीन मुख्यमंत्री आएल रहथि । भाषणक क्रममे ओ सौराठसभाकेँ मेला कहि कए संवोधित केलनि । औ बाबू! तकरबाद जे हंगामा भेल से की कहू? चारूकातसँ लोकसभ मंच दिस बढ़ल। लोकसभ जोर-सोरसँ हुनका खिलाफमे नारा लगा रहल छल । कनिके कालमे लगलैक जेना उजाहि उठि गेल होइ ।पुलिससभ बहुत मोसकिलसँ मुख्यमंत्रीजीकेँ ओहिठामसँ बाहर केलक । हुनकर काफिला इएह-ले ओएह-ले ओहिठामसँ घसकल ।

सभासँ बिआह अनचोके होइत छल । कैकबेर तँ एहन होइत छल जे अभिवावक लोकनि रस्तेमे रहि जाइत छलाह आ बिआह भए जाइत छल । राति-बिराति सबारी नहि भेटबाक कारण बरिआतीसभ कैकबेर पछुआ जाइत छलाह । वरकेँ जेना-तेना लए कए कन्यागतसभ आगु बढ़ि जाइत छलाह । जखन बरिआती पहुँचथि ताबे तँ बिआह संपन्न भेल रहैत छल । एकबेर सभासँ हमरा गाममे बिआह ठीक भेलैक । दस हजार व्यवस्था तय भेल रहैक । बरिआती दरबाजा पर पहुँचि गेल । मुदा केओ स्वागत केनिहार नहि छल । कन्याक पिताक कोनो पता नहि छल । लगपासक लोकसभ हुनका ताकए लगलाह । लोकसभ हुनकर आङन गेलाह तँ देखैत छथि जे कन्याक पिताकेँ दाँती लागल छनि,ओ बेहोश पड़ल छथि। घरमे कोनो जोगार नहि छल । वरपक्षकेँ देबाक हेतु गछल गेल दस हजारक कोनो जोगार नहि भए सकल । घरबैआक ई हालति देखि गौंवासभ वरपक्षसँ गप्प कए सभटा बात कहलखिन । जेना-तेना बरिआतीसभक भोजनक व्यवस्था भेल । वरपक्ष वस्तु स्थिति केँ बुझैत टाकाक मांग छोड़ि देलनि आ बिआह संपन्न होइतहि भोरे वापस भए गेलाह ।

एकटा वर बिआहक हेतु सभागाछी गेल रहथि । सौंसे शुद्ध बिति गेल मुदा हुनकर बिआह कतहु ठीक नहि भए सकल । अंततोगत्वा, सभगोटे वापस गाम जाइत रहथि । रस्तामे गप्प-सप्पक क्रममे बरकेँ उदास देखि वरक पिता हुनका कहलखिन-

जखन भाग्यमे हेतह तँ बिआह भए जेतह ।

वर बजलाह -हौ! भाग्य तँ तोहर हाथमे अछि । तूँ ओकरा खुजए देबहक तखन ने? ”

कहक माने जे पिता द्वारा बिआहक प्रस्तावकेँ नीकसँ नहि सम्हारल गेल अन्यथा हुनकर बिआह भए गेल रहितनि । एहिना कतेको वर-कनियाक अभिवावकसभ सभा बिति गेलाक बाद निराश भए वापस भए जाइत छलाह।

पहिने सौराठ सभाक बहुत महत्व छल । देश-विदेश सँ मैथिल व्राह्मण  एक सप्ताह वा दस दिनक हेतु एकठाम एकट्ठा होइत छलाह । ओहिसँ एकहिठाम कतेको तरहक वर-कनिआक जानकारी संबधित  पक्षकेँ भेटि जाइत छलनि । यद्यपि सभागाछीमे कनिआ नहि जाइत छलीह मुदा हुनका बारेमे बहुत रास जानकारी अप्रत्यक्ष रूपसँ भेंटि जाइत छल । सभामे एकटा सभसँ पैघ फएदा ई होइत छल जे एकहिठाम बहुत रास इष्ट-मित्रसभसँ भेंट भए जाइत छल । संगहि बिआहक बहुत रास सूचना बहुत आसानीसँ एकहिठाम भेटि जाइत छल ।

सभामे पीपरक गाछक पातसभ मौला गेल अछि ।

एकर माने जे आइ सभागाछीमे एकलाखसँ बेसी लोक जमा भए गेल छथि ।

-से कहबी रहैक सौराठ सभाक ।

सौराठसभाक समय सरकारी बस एवम् अन्य सुविधासभ रहैत छल । बादमे जातीय आधारपर गठित सरकारसभ सौराठसभाकेँ जाति विशेषक संगठन बूझि उचित सहयोग नहि देलक । आब तँ जे हालत अछि से सभ जनिते छी । मोसकिलसँ सए लोक सभामे भेटताह । लाख आदमीक जमा होएब आ पीपरक पातकेँ मौलाएबाक बात तँ दूरक बात भेल । सौराठ सभा क महत्व क्रमशः झूस होइत गेल आ आबतँ ओ नष्टप्राय भए गेल अछि ।

कालक्रमे एहि व्यवस्थामेमे ह्रास होइत गेल । सभागाछीमे दहेजक मांग हाबी भए गेल । लोकसभ झूठ बाजि-बाजि बिआह-दान करबए लगलाह । एहिसँ कतेको वर-कन्याक जीवन तबाह भए गेल। सौराठ सभामे कैकबेर  लोक ठका जाइत छल । वर वा कनिआ पक्षक लोक  सही जानकारी नहि देथि । परिणामतः कैकटा वर वा कनिआक जीवन तबाह भए गेल । कैकटा नीक परिवारक कन्याक बिआह दरिद्र वरसँ करा देल गेलनि । कैकटा बहुत सुंदर  वरकेँ कारी खुट-खुट कनिआसँ बिआह भए गेलनि । एहि तरहक समस्यामे लगातार बृद्धि हेबाक कारणे लोकसभ घरकथेसँ बिआह करए लागल । क्रमशः सभागाछी गेनिहार लोकसभक संख्या घटैत गेल ।  कालांतरमे सभा जाएब कोनो वर हेतु अप्रतिष्ठाक बात भए गेल । सभा ओएह वर जाइत छलाह जिनका बिआहमे दिक्कत रहैत छल । सामान्यतः संभ्रांत परिवारक वरसभ सभा गेनाइ छोड़ि देलाह । घरकथासँ बिआह होबए लागल ।

बादमे की भेल की नहि, सभागाछीमे देल जा रहल सरकारी सुबिधासभ हटा लेल गेल । सरकारी बससभक संख्या क्रमशः कम होइत गेल । पहिने सभा गाछीमे बिआह ठीक भेलापर सिद्धांत पत्र देखेलापर चीनी आ अन्य समानसभ भेटि जाइत छलैक,बादमे ओहोसभ समाप्त भए गेल । निश्चित रूपसँ एहिमे राजनीति सेहो सन्हिआ गेल। जाति विशेषक संस्था बूझि सरकार आ राजनेतासभ एकरा वक्र दृष्टिसँ देखए लगलाह । मुदा सभसँ क्षति भेल अपने लोकसभसँ । सभामे नीक वरसभ गेनाइ छोड़ि देलनि । छल-प्रपंच द्वारा कतेको गलत-सलत बिआह करा देल गेल । जाहि वरकेँ कोनो औकात नहि रहैक तकरो धनिक बना कए नीक परिवारक कन्यासँ बिआह करा देल गेल । एहि तरहें कतेको परननीक कन्यासभक जीवन बरबाद भए गेल । परिणाम भेल जे लोकक सभासँ विश्वास उठि गेल । लोक सभा अएनाइ छोड़ि देलक । जखन लोके नहि रहत तँ सभा कथीक । से कालक्रमे सभागाछी निठ्ठाह बैसि गेल । आब तँ ओ मात्र इतिहासक वस्तु भए गेल अछि ।

सौराठसभा आइ-काल्हिक एकल खिड़की बला व्यवस्थाक परिचायक छल । वर-कनिआ पक्षक लोक एकठाम आठ-दस दिन उपस्थित रहैत छलाह । आपसमे वर-कनिआक परिचयक आदान-प्रदान करैत छलाह । गाम-घरक लोकसभसँ गप्प-सप्प कए कथाक विषयमे जरूरी जानकारीक संपूष्टि करैत छलाह । ततबे नहि ,लगेमे बैसल पंचकार लोकनिसँ आपसी संबंधक निर्णय लैत छलाह जाहिसँ  बिआह भए सकैत अछि कि नहि से स्पष्ट होइत छल । पंजी व्यवस्था एहन सटीक छल जे पुस्त-दर-पुस्त जानकारी एकहिठाम भेटि जाइत छल ।  सभकिछु होइतहु दहेजक समस्या ओहिसमय बहुत प्रवल छल ।  एहि कारणसँ कतेको नीक कन्याक अनुकूल बिआह नहि होइत छलनि । कैकबेर वर पक्षक लोक अपन आर्थिक परिस्थितिक गलत सूचना दए नीक घरक कन्यासँ मोट दहेज लए बिआह कए लैत छलाह । बादमे कन्याकेँ जीवनभरि कष्टक सामना करए पड़ैत छलैक । तहिना कैकबेर  सुंदरसँ सुंदर वरक बिआह कुरूप कनिआसँ करा देल जाइत छलनि । ओहि समयमे कनिआ देखबाक परंपरा नहि छल । लोक एक-दोसरपर विश्वास कए लैत छल आ ठका जाइत छल । एहिसभक प्रतिकूल परिणाम सभागाछीपर पड़ल । लोकसभाक अपेक्षा घरकथासँ बिआह करए लगलाह । सभा गेनाइ छोड़ि देलनि ।

जहिआ कहिओ सभागाछी जाइ ओतए दहेज विरोधी बैनर मंदिरक देबालसँ लटकल देखाइत । किछुगोटे गुट बना कए दहेजक विरोधमे मिटिंग से करथि । सभागाछीमे घुमि-घुमि कए पर्चा सेहो बाँटथि । मुदा तकर किछु प्रभाव नहि पड़ैक । दहेज लेनिहारसभ डंकाक चोटपर टाका गनबैत छल । जखन कखनो कोनो वरकेँ बेसी टाका गनल जाइत तँ सौंसे सभागाछीमे गर्द पड़ि जाइत । वरक पितासभ मोंछ फेरैत कहितथि-जखन ओहन वरकेँ एतेक टाका गनाएल तँ सोचल जा सकैत अछि जे हमर पुत्रक की मांग हेबाक चाहिअनि? हमरो बेटा पढ़ल लिखल,तैपर चासो बास छैक। अहीं कहू एकर की बजा छै? ई गीत एहि परिस्थितिक सद्यः वर्णन करैत अछि । एहि तरहें एक हिसाबे सभागाछीमे वरसभक बोली लागि जाइत छल । क्रमशः ई विमारी बढ़िते गेल । घरकथो सँ तय होबएबला बिआहसभमे टाका प्रमुख विषय बनि गेल । निश्चय एहिमे किछु परिवर्तन आब आएल अछि । बेटीसभकेँ शिक्षा आ आर्थिक आत्मनिर्भर्तासँ दहेजक मांग कमल अछि । मुदा ग्रामीण क्षेत्रमे अखनो कमोवेश ओएह हाल अछि । कहि नहि अपन समाज कखन एहि दुर्गुणसँ पार पाओत ।

सभ वस्तुक अपन आयु होइत अछि । सएह बात सभागाछीपर सेहो लागू भेल । एक समयमे समस्त मिथिलाक मिलन विंदु साबित होबए बला सौराठ सभा आब अपन समस्त गौरब गरिमाकेँ बिसरि गेल अछि । मुदा मिथिलाक इतिहाससँ बहुत नीकसँ जुड़ल एकर योगदान तँ बनले अछि आ बनले रहत ।