रविवार, 24 जून 2018

पं० परमानन्द झा( संस्मरण)



पं० परमानन्द झा( संस्मरण )



लोक एहि दुनियाँमे अबैत अछि,चलि जाइत अछि मुदा ओकर कएल काज ओकरा जिबैत रखैत अछि । कतेको व्यक्ति एहि संसारमे एहने भेला अछि जे अपन संघर्षसँ अपन जीवनमे एकटा नव दृष्टान्त उपस्थित केलाह आ हुनका गेलाक बादो लोकसभ हुनक कृतित्वक चर्च कए गौरवक अनुभव करैत छथि । एहने लोकमेसँ छलाह हमर ग्रामीण-स्वर्गीय पण्डित परमानन्द झा ।
हमसब जखन नेने रही तँ हुनका कतेको बेर पैरे अबैत -जाइत देखिअनि । पैरे चलब ओहि समयमे कोनो अजगुतक गप्प  नहि छलैक । मुदा ओ पैरे -पैरे मुजफ्फरपुर साक्षात्कर देबए चलि जाइत छलाह । लौटि कए ओहिना दन-दन करैत रहैत छलाह । कहिओ हुनका बैसल ,आराम करैत नहि देखलिअनि । दिन -राति ओ किछु-ने-किछु करैत भेटताह । व्यर्थ आडंवर किंवा प्रदर्शन करबामे हुनका कोनो रुचि नहि छल । सौंसे  दुनियाँ जँ खिलाफ भए जाए आ हुनका लगतनि जे ओ सहीपर छथि तँ ओ अपन निश्चयपर अडिग रहैत छलाह । 
सत कहल जाए तँ एहन कर्मठ लोक बिरलैके देखएमे अबैत अछि । खेत कोरब,धान रोपब ,धान काटब ,दाउुन करब सँ लए कए इसकूलमे मास्टरी करब फेर विद्यार्थीसभ केँ ट्युशन करब,ततबे नहि पंडिताइ करब,सभटा काज ओ एकसुरे करैत रहैत छलाह। हमसभ जखन नेना रही तँ हुनके घरक पाछा ब्रम्ह स्थानमे हमर सभक इस्कूल छल । ओतए हमसभ पढ़ए जाइत छलहुँ । कै दिन पानि पीबाक हेतु हुनका ओहिठाम आबि जाइत छलहुँ। जखन कखनो ओतए जइतहुँ ओ निरंतर काजमे व्यस्त रहैत छलाह । छोट-छीन फूसक घरमे अपन साधनामे लागल रहैत छलाह । कोनो काज करबासँ हुनका परहेज नहि छल । लोक की कहत से हुनका सुनबाक समय नहि छल । जे अपना ठीक बुझाइन से ओ करथि,जकरा जे मोन हो से कहैत रहए।“हाथी चलए बजार,कुत्ता भुकए हजार |”
जीवन भरि ओ घोर संघर्ष करैत रहलाह । कठोर परिश्रम ओ मितव्यितासँ गामक आस-पास चिकन जमीन-जाएदाद बनओलनि । अड़ेरचौकपर सेहो बहुत कीमती जमीन ओ कीनलथि। सुनबामे आएल जे अट्ठारह बीघा जमीन ओ अपना जीवनमे मेहनति एवम् इमान्दारीसँ कीनलथि । एतबे नहि जाहिठाम एकटा मामूली फूसक घर छल ओतहि पता नहि कतेको कोठरीक घर बना देलथि । ओहिठाम गेलापर अहाँकेँ चारू कात घरे-घर देखएमे आएत। गाम-घरमे जकरा पोखरिआ-पाटन कहैत छैक,ताही तरहक हुनकर ग्रामीण आवास अछि । आ से सभटा मेहनतिसँ केलाह,कोनो ककरो वइमानी नहि,अपितु अपन विद्या ओ वुद्धिसँ निरन्तर समाजकेँ सेवा करैत उपार्जन केलाह ।  ओ निट्ठाह कर्मयोगी छलाह। कखनो बैसल नहि रहितथि। कोदारि पारवसँ लए कए इसकूलक मास्टरी धरि  ओ जीवन पर्यन्त करैत रहलाह। अगहन मासमे माथपर धानक बोझा लदने सीताराम-सीताराम कहैत डेगार दैत अपन धानक खेतसँ खरिहान धरि अबैत-जाइत हम हुनका देखिअनि  । जकरा जे बाजक होइक से बाजए,हुनका लेल धनिसन ।
ओ खाली धने अर्जित करैत रहलाह से बात नहि,अपितु घनघोर संघर्ष कए विद्योपार्जन सेहो केलाह । कतेको विषयमे आचार्य केलाह। फेर अंग्रेजी माध्यमसँ सेहो उच्च शिक्षा प्राप्त केलनि ।  बहुत दिन धरि रहिका उच्च विद्यालयमे संस्कृतक शिक्षक रहलाह आ प्रधानाध्यापकक पद धरि प्रोन्नति प्राप्त केलनि । धर्म ओ अध्यात्मक सेहो हुनका बहुत नीक जानकारी छलनि । कतेकोठाम धार्मिक सभा सभमे प्रवचन सेहो करैत छलाह । दड़िभंगामे संत -समागममे प्रवचन करैत हमहुँ हुनका सुनने रही । ओहि समयमे हम ओतए सी० एम० कालेजमे पढ़ैत रही ।
कतेको दिन हमसभ हुनका साइकलपर इंटा बन्हने,आ स्वयं ओकरा गुरकबैत पैरे-पैरे चलैत देखिअनि । कहिओ सीमेन्टक बोरा,कहिओ बाउल,कहिओ इंटा ओही साइकिल पर ढ़ो-ढ़ोक ओ पक्का मकान बना लेलथि । एहन धुनकेँ पक्का,कर्मठ ओ संकल्पक धनी व्यक्ति डिविआ लए कए तकनहुँ नहि भेटि सकत ।
व्यक्तिगत जीवनमे कै बेर हुनका प्रतिकूल परिस्थितिक सामना करए पड़ल,तथापि ओ धैर्यपूर्वक जीवनयात्रामे लागल रहलाह । आस-पासक गामक बहुत रास लोक हुनकार अध्यात्मिक चेला छल । हुनकासँ मंत्र लेने छल । हुनका प्रति श्रद्धाक भाव रखैत छल आ हुनक मृत्युसँ बहुत दुखी भेल छल ।
आब ओ एहि दुनियाँमे नहि छथि । खिछु साल पूर्व एकाएक हुनकर किडनी खराप भए गेल । मास दिनक भीतरे ओ मार्च २०१४मे चलि गेलाह। ओहि समय हुनकर बएस अस्सीसँ उपरे रहल होएत। मृत्युसँ किछुमास पूर्वे हम गाम गेल रही तँ हुनकासँ भेंट भेल रहए । ओ पूर्णतः स्वस्थ लगैत छलाह । अपितु  बरी काल धरि अध्यात्मिक विषयपर अपन मंतव्य दैत रहलाह । हमर माएसँ सेहो गप्प करैत रहलाह । तकर किछुए दिनक बाद हुनक मृत्युक समाचार भेटल । आश्चर्यमे पड़़ि गेलहुँ ।
हुनक देहावसानसँ गामेक नहि अपितु परोपट्टाकेँ एकटा अपूर्णीय क्षति भेल । कर्मठता एवम् सफल संघर्षक  एहन जीवंत उदाहरण भेटब बहुत मोसकिल काज अछि । हुनका हमर शत-शत प्रणाम !


सोमवार, 18 जून 2018

डा० सुभद्र झा(संस्मरण)


डा० सुभद्र झा(संस्मरण)





इलाकाक चर्चित व्यक्तित्व छलाह-डा० सुभद्र झा । धोती,मिरजइ सन कुर्ता पहिरने अत्यन्त सरल, साधारण लिबासमे डाक्टर साहेब अड़ेर हाट चौकपर बरोबरि देका जएतथि । गप्प-सप्पमे ओ अपन बिचार अति स्पष्टतासँ रखैत छलाह ।ताहि क्रममे जौं कने-मने विवादो भए गेल किंवा क्यो कटाक्षो कए देलक दँ कोनो बात नहि ।
मिथिलेटा नहि,अपितु समस्त भारतवर्षमे तत्कालीन विद्वान लोकनिमे हुनकर प्रतिष्ठा छलनि । हुनकर विषयमे किछु कहब आ लिखब कठिन काज अछि तथापि स्मरणमे किछु घटना अछि जे लिखि रहल छी ।
घटना सन् १९६५-६६ ई० क थिक । नवतुरियासभ गाममे एकटा पुस्तकालय स्थापित करए चाहैत चलाह । किछु दिनक प्रयासक वाद किछु पोथी ,किछु पैसा चंदा भेल । किछु आलमारी सेहो बनाओल गेल । तकर बाद भेलैक जे ओकर उद्घाटन कएल जाए। उद्घाटन के करताह ? आपसी विचार- विमर्शक बाद डा० सुभद्र झाक नाम पर आम सहमति भेल । डा० सुभद्र झा किछु दिन पूर्व सेवा निवृत भए गामे रहए लागल छलाह । आ यदा-कदा हमर गामक चौकपर अबैत-जाइत देखा जाइत छलाह । उद्घाटन कार्यक्रममे डा० सुभद्र झाकेँ सेहो किछु कहबाक आग्रह कएल गेल । बहुत दुराग्रह कएलापर ओ बजबाक हेतु तैयार भेलाह ।संक्षिप्त भाषणक क्रममे ओ कहलनि जे एहि इलाकामे अनुसंधानक हेतु पर्याप्त सामग्री यत्र-तत्र पसरल अछि । ओकरासभ केँ एहन पुस्कालयमे सुरक्षित राखल जा सकैत अछि । संगहि कबीरदासपर उपलव्ध सामग्रीक उल्लेख करैत ओ कहलाह जे एहि बातक प्रमाण अछि जे कबीरदास मैथिल छलाह आ मैथिलीमे कतेको रचना कएलनि अछि ।
१९७३ ई०मे लगभग एक मास डा० सुभद्र झाक राँची स्थित आवास पर रही। तखन ओ योगदा सतसंग विद्यालयक प्राचार्य रहथि । ओही परिसरमे प्राचार्यक निवासमे ओ  रहैत छलाह। हुनका संगे परिवारक आर सदस्य नहि छल । घरक काज करबाक हेतु एकटा नौकर छल । भोजन ओ स्वयं बनबैत छलाह ।
प्रातःकाल भात-दालि-आलूक सन्ना बनाबथि। रातुक भोजनक व्यवस्था सेहो तखने कए लेथि। रातिमे बेसी काल आँटाक चोकरकेँ दूधमे उसनि कए खाइत देखिअनि । रातिमे सूतबासँ पूर्व ओ नियमित रूपसँ पढ़ैत छलाह ।साँझमे तिन-चारि गोटे बैसि कए शास्त्र चर्चा करैत छलाह।एक दिन साँझमे डाक्टर साहेबक संग कतहु जाइत रही ।रिक्साबला सब जतेक पाइ मांगै,से देबाक हेतु ओ तैयार नहि होथि ।रिक्सातकैत-तकैत अन्ततः सौंसे रास्ता बिति गेल ।
एक दिन एहिना संगे टहलैत रही तँ साईबाबाक चर्चा उठल । ओ हुनकर बहुत प्रशंसा करथि आ कहथि जे साईबाबा सरिपहुँ सिद्ध पुरुष छथि जकर हुनका प्रत्यक्ष अनुभव तखन भेल रहनि जखन ओ बाबाक आश्रममे सिरडी गेल रहथि । कहलाह जे आश्रममे हुनका पहुँचते देरी बाबा हुनकर मोनक प्रश्नक उत्तर देबय लगलखिन । आरो कएकटा प्रसंगसभ ओ सुनओलथि ।
योगदा सतसंग महाविद्यालय नवे बनल छल । डाक्टर साहेब पूर्ण तत्परतासँ ओहि विद्यालयक विकासमे  लागल रहैत छलाह । परिसरमे आश्रमक आबास होइत छल । चारूकात गाछ सभक बीचमे बनल भाषण मंडपसभ । ओही परिसरमे एकदिस आश्रम छल जाहिमे एक दिन माँ आनन्दमयी आयल रहथि । हम डाक्टर साहेबक संगे ओतए रही । माँ आनन्दमयीक अबितहि पूरा हाँलमे शांति पसरि गेल । ओ किछु बजली नहि । चुपचाप सभगोटे ध्यान केलक।कोनो भाषणबाजी नहि भेल ।
एकदिन डाक्टर साहेबक डेरापर आंगनमे ठाढ़ रही । हमरा देखि डाक्टर साहेब गंभीर भए गेलाह आ कहला जे नीकसँ पहिरल-ओढ़ल करह । जीवनमे सफलताक हेतु एहिसभकेँ बहुत महत्व अछि । ताहीक्रममे कहलाह जे एही कारणे ओ कएक बेर उच्च पदसभक चयनमे पछड़ि गेलाह यद्यपि ओ पदक हेतु पूर्ण योग्य रहथि ।
डाक्टर साहेबक दोसर पुत्र भास्करजी इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे जर्मन भाषाक व्याख्याता छलाह । हुनकर डेरापर डाक्टर साहेब अबैत -जाइत रहैत छलाह । सन्१९८३ ई० क गप्प अछि । एकदिन हम हुनका दुनू गोटेकेँ नोत देने रहिअनि । दुनूगोटे कोनो कारणसँ आगा-पाछा भए गेलाह । डा० झा पहिने चलल रहथि । भाष्करजी पाछू चललाह आ डेरापर पहुँचि कए बहुत परेशानीमे रहथि जे आखिर ओ कतए चलि गेलाह । हमसभ गोटे हुनका ताकए लगलहुँ । कतहु नजरि नहि आबथि । रातुक समय छल । भोजनमे विलंब भए रहल छल । ताबत थोड़े कालक बाद मकानक नीचासँ ओ जोर-जोरसँ हमर नाम लए कए चिकरि रहल छलाह।हमरा सभकेँ जानमे जान आएल । पता लागल जे ओ हमर डेरा तकैत-तकैत धोबी घाट चलि गेल रहथि । हमर मकान मालिक धोबी छल आ तकरे अनुमानमे ओ धोबी घाट चलि गेल छलाह ।
डाक्टर साहेब अति अध्ययनशील छलाह । जखन कखनो फुरसतिमे रहितथि तँअध्ययन करए लगितथि । एकदिन प्रातः एगारह बजे इलाहाबाद मे भाष्करजीक डेरा पर गेलहुँ । डाक्टर साहेब ओतहि रहथि । कहलाह जे हम एगारह घंटासँ निरन्तर पढ़ि रहल छी । मैथिलीमे शव्दकोशक निर्माणमे लागल छलाह। एकदिन हम डाक्टर साहेबक संगे इलाहाबादमे कतहुँ जाइत रही । रस्तामे पुछलिअनि जे भगवान छथि कि नहि? ओ उत्तर देलनि जे ई कहब तँ कठिन अछि जे भगवान छथि कि नहि परन्तु जौँ भगवान छथि तँ बहुत बइमान छथि,कारण दैत ओ कैटा उदाहरण देलनि । जेना पेटमे बच्चा किएक मरि जाइत छैक ? आखिर ओ जन्मसँ पूर्वे की गलती केलक ?आ जौँ गलती केलक तँ जनमि कए ओकरा भोगए । गप्पक क्रममे ओ कहलाह जे सम्प्रति जीबैत लोकमे बिहारमे संस्कृतक सभसँ पैघ विद्वान छथि ।
साहित्य अकादमीक तत्कालीन अध्यक्ष डा० सुनीति कुमार चटर्जीक ओ बहुत प्रशंसा करथि आ कहति जे हमरा लेल ओ भगवाने छलाह । डाक्टर साहेबक संगे एकदिन टहलैत रही। गप्पक क्रममे ओ अपन प्रवासक दौरान भेल दू गोट घटनाक चर्चा कएलनि । डाक्टर साहेब ट्रेनसँ कतहुँ जाइत रहथि । कोनो टीसनपर गाड़ी रूकल तँ डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन ओहिमे सवार भेलाह ।डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन  बैसबाक हेतु घुसबाक हेतु कहलखिन।डाक्टर सुभद्र झा अड़ि गेलाह एवम् डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्नन केँ जगह नहि देलखिन ।राँचीमे गप्पक क्रममे एकदिन डाक्टर साहेब कहलाह जे ओ  पुस्तकालयमे नौकरी करैत रहथि । ओही क्रममे हुनकासँ जे श्रष्ठ पदपर अधिकारी छलाह से हुनकासँ किछु गलत काज कराबए चाहैत छलाह।ओ से करबाक हेतु सहमत नहि भेलाह । ताहिसँ कुपित भएकए ओ अधिकार हिनका बहुत तंग करैत छलनि । डाक्टर साहेबकेँ पता रहनि जे ओ अधिकारी गलत काज करैत अछि। चुपचाप ओकर गलत काज बला कागजातक प्रतिलिपि ओ रखैत गेलाह । पुस्तकक क्रय-विक्रय मे ओ अधिकारी बहुत हेरा-फेरी केने छलाह,जकर कागजी सबूत डाक्टर झा लग छलनि ।बादमे एहि बातक आरोप भेल एवम् जाँचक बाद ओ अधिकारी दोषी साबित भेल । अपनाकेँ बचाबक हेतु ओ चाहलक जे पुस्तकालयकेँ जे क्षति भेल रहैक से आपस करी मुदा ओकर परिवारक लोक पैसा आपस नहि कएलक । एहिबात सभसँ दुखी ओ भयभीत भए  ओ आत्महत्या कए लेलक।
डाक्टर झा सँ जे  कनी-मनी हमरा संपर्क भेल ओकरा संयोग कहि सकैत छी । बच्चेसँ हम हुनकर नाम सुनैत रही । सौँसे इलाकामे ओ चर्चाक विषय रहथि आ छोटसँ पैघ लोकक संपर्कमे सहजतासँ अबैत छलाह । ओ धुनक पक्का छलाह । जाहि काज मे लागि जाथि तकरा पूर्ण करबाक हेतु प्राण-प्रणसँ जुटि जाथि । हुनका अपन गाममे गाछ सब रोपबाक इच्छा रहनि। कहि नहि,कतए-कतएसँ आनिकए सालक साल ओ आमक गाछ रोपैत रहलाह ।
हुनक प्रतिभा ओ  विद्वताक वर्णन करबाक कोनो आवश्यकता नहि बुझा रहल अछि।आडम्वर रहित जीवन शैली एवम् अतिशय सहज व्यवहारक संग स्पष्टवादिताक लेल ओ सभ दिन मोन पड़ताह । धोती-कुर्ता पहिरने, पैरे खेतक आरिए-आरिए चलैत-चलैत पता नहि ओ निरन्तर कोन चिंतनमे ध्यानमग्न रहैत छलाह । अपन मौलिकता एवम् अपन बातकेँ दृढ़तासँ रखबाक लेल ओ सभ दिन मोन पड़ैत रहताह ।


शुक्रवार, 15 जून 2018

सफलताक रहस्य


सफलताक रहस्य

एहि दुनियाँमे क्यो एहन लोक नहि भेटताह जे अपन अधलाह चाहैत होथि,अपितु सभ एही प्रयासमे लागल रहैत छथि जे संसारक अधिक सँ अधिक सुख-सुविधा हमरा भेटए,सभ मनोकामना पूरा होअए,बाल-बच्चा सुखी रहए। एही प्रयास मे हमसभ निरंतर लागल रहैत छी । एहिमे किछु गलत नहि छैक मुदा समस्या तखन होइत अछि जखन सभ प्रयास केलाक बादो मनोवाँछित फल नहि भेटैत अछि। एहि परिस्थितिमे कतेको गोटौ निराश भए जाइत छथि, प्रयास छोड़ि दैत छथि आ कतेकोबेर अनुचित रस्ता सेहो अख्तियार कए लैत छथि ।
कै बेर एहन होइत अछि जे हम कोनो काजमे बर्खोसँ लागल रहैत छी आ जखन लक्ष्य एकदम लगीच रहैत अछि तँ थाकि कए,निराश भए अपन प्रयासकेँ सिथिल कए दैत छी किंबा आधा-अधूरा  छोड़ि दैत छी । परिणाम अनुकूल कोना होएत ?से नहि होइत अछि, तँ विधाताकेँ दोख देबए लगैत छी । दुनियाँमे ज्यादातर असफल लोक आत्म-चिंतन करबाक बजाए अपन असफलताकेँ हेतु दोसर केँ जिम्मेदार ठहराबए लगैत छथि । मुदा ताहिसँ की होएत?  
कोनो प्रकारक काजक सफलताक हेतु जरूरी अछि जे हमर समस्त शक्तिक रचनात्मक उपयोग हो,एकहि संगे दसठाम हाथ देलासँ किछु नहि भए सकैत अछि। कखनो किछु,कखनो किछु जँ करैत रहब तँ बानर बला हाल भए जाएत जे जाही डारिपर जाइत अछि ओकरा दोसर डारि बेसि हरियर लागए लगैत अछि । एकरा लोक कहैत अछि-बनरकूद। कहबाक तात्पर्य अछि जे सबसँ पहिने अपन गंतव्यक निर्धारण करबाक चाही आ तकर बाद संपूर्ण शक्तिसँ ओकरा प्राप्त करबाक प्रयास करबाक चाही ।
एकटा बात तँ तय अछि जे सफलताक कोनो लघुपथ नहि भए सकैत अछि। आइ धरि जे क्यो व्यक्ति सफल आदमीमे सुमार कएल जाइत छथि तिनक जिनगीसँ ई बात बुझल जा सकैत अछि । अपना देशक भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम साहेब अखबार बेचि कए पेट भरैत छलाह। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी महोदय नेन्नामे चाह बेचैत छलाह । एतेक विपन्नता अछैत ओ सभ अद्वितीय कोना भए गेलाह? ई सोचबाक विषय थिक ।एहन कम लोक होइत छथि जे सुविधाक अंबारमे जनमिओ कए पैघ- पैघ काज कए यशस्वी होइत छथि । पैघ उद्येश्य जँ रखने छी तँ ताहि प्राप्त करबाक हेतु तेहने सघन प्रयासो चाही। अर्जुन जकाँ सभकिछु बिसरि मात्र पंक्षीक आँखिपर ध्यान केंद्रित हेबाक चाही आ जँ भीम भाइ जकाँ एकहिबेर सभ किछु देखए लागब तखन की भेटत? फोकला!
महान उपलव्धिक हेतु तेहने कड़गर मेहनति करए पड़ैत अछि । तेहने दृढ़ संकल्पक संग दिन-राति एक करए पड़ैत छैक । एहन नहि भए सकैत अछि जे हल्लुक परिश्रमसँ उत्कृष्ट उपलव्धि भए जाइक। अंग्रेजीमे एकटा कहाबत छैक जे "If wish be the horses, poor ride the first" कहक माने जँ इच्छे केलासँ होइक तँ गरीबे सबसँ पहिने घोड़ा चढ़ए । इच्छाक संग-संग प्रयत्नो तेहने  घनघोर हेबाक चाही ।
जेठक दुपहरिआमे जखन रौदसँ मोन आकुल भए जाइत अछि तखन होइत छैक जे कहुना गाछक छाहड़िमे चली। जखन पिआससँ मोन बेकल भए जाइत अछि तखन इच्छा होइत छैक जे हे भगवान! कहुना कतहुँसँ पानि भेटए। तखन लोक ई नहि देखए लगैत अछि जे पानि डबड़ाक अछि कि गंगाजल । केहनो पानि अमृत लगैत अछि । तहिना जीवनक संघर्षक तपिससँ मोन जखन व्याकुल भए जाइत अछि तँ  लोक थाकल-ठेहिआएल कहि उठैत अछिः” हे भगवान! आब अहीं पार लगाउ” ! संघर्षक समयमे भगवानपर विश्वास बड़का शक्ति दैत अछि । काज करैत रहू आ फलक चिंता हुनका पर छोड़ि दिअ,इएह बात भगवान गीतामे बारंबार कहने छथि ।एहि काज करबाक शक्ति बढ़ैत अछि ।कने-मने असफलतासँ निराशा नहि होइत छैक आ अन्ततः सफलता तँ भेटिते अछि।
मनुक्खक मोनमे परमात्माक बास होइत अछि । तेँ जँ ओ सही प्रयास करए तँ किछु दुर्लभ नहि रहि सकैत अछि । ताहि हेति जरूरी थिक जे लक्षयक प्रति पूर्ण समर्पण होइक । आधा-अधुरा मोनसँ कएल गेल प्रयाससँ सिद्धि नहि भए सकैत अछि । ई बात अक्सर देखल गेल अछि जे हम  उत्तम सँ उत्तम फल चाहैत छी ,जकरा ककरो लग किछु  नीक छैक से हमरा लग किएक नहि रहत? हमसबसँ औअल किएक नहि रहब? से सभतँ ठीक,मुदा जखन प्रयास करबाक गप्प होइत अछि तँ हम पाछा रहि  जाइत  छी।
रामकृष्ण परमहंससँ एकबेर क्यो पुछलकनि जे भगवानक दर्शन कोना होएत? ओ ओहि व्यक्तिकेँ पानि मे डूबा देलखिन आ पुछलखिन जे आब की चाही? ओ चिचिआए लागल-किछु नहि चाही,बस हमरा पानिसँ निकालु । ओकरा तुरंत पानिसँ निकालल गेल । पानिसँ बाहर अबितहिँ ओकरा कहलखिन जे जहिना पानिमे डुबि गेलाक बाद तोरा खाली पानिसँ बाहर हेबाक इच्छा रहि गेलह आओर किछु नहि सुझाह तहिना जखन भगवान केँ प्राप्त करबाक हेतु एकाग्र हेबह तँ ओहो भेटि जेथुन। एहने खिस्सा एकलव्यक अछि । गुरु द्रोणाचार्य द्वारा शिक्षा नहि देबाक निर्णयसँ आहत ओ गुरुक प्रतिमा बैसाए दिन-राति साधना करए लगलाह आ अपन लक्ष्यकेँ पाबि तेहन निपुण धनुर्धर भए गेलाह जे द्रोणाचार्यो घबरा गेलाह आ ओकरासँ अंगूठा मांगबाक नीचता कए गेलाह।
सफलताक कुंजी थिक,आत्मविश्वास । स्वामी रामतीर्थ एकबेर घोर झंगलसँ जाइत रहथि कि एकटा बाघ हुनका सामने आबे गेल । मुदा ओ बिना बिचलित भेनहि ओहि बाघक आँखिमे घुरैत रहलाह आ बाघ अपन रस्ता बदलि लेलक।स्वामीजीक आत्मविश्वाससँ बाघोकेँ रस्ता बदलि लेबाक हेतु विवश कए देलक। जौँ हमरा विश्वास अछि जे हम ई काज  कए सकैत छी तँ बुझि लिअए काज हेबे करत । देर-सवेर भए सकैत अछि,मुदा होएत।
मानव जब जोर लगाता है,पत्थर पानी हो जाता है।

जीवनमे सफल आदमीमे एकटा गुण सभठाम देखबामे आएत जे एहन लोकक रुखि सकारात्मक होइत अछि,ओ दोसरकेँ टंगघिच्चु नहि करैत छथि ,अपितु अपन समस्त शक्तिसँ लक्ष्यकेँ प्रप्त करबाक हेतु लागल रहैत छथि । असफलतासँ ओ निराश भए बैसि नहि जाइत छथि अपितु आओर जोड़सँ काजमे लागि जाइत छथि । एहने दृढ़ संक्लपी व्यक्ति कठिन सँ कठिन काज केँ सरल बना लैत छथि आओर सफलताक पराकाष्ठाकेँ प्राप्त करैत छथि ।









बुधवार, 6 जून 2018

अशांतस्य कुतः सुखम्


अशांतस्य कुतः सुखम्

जीवनमे सभ किछु भेटलाक बादो कखनहुँ काल लोकक मोन होइत रहैत अछि जे कोनो एहन ठाम चली जाहिसँ मोन निचैन भए जाए,सभ किछु बिसरि किछु दिन शांतिसँ बिताबी  आ झंझटिसभकेँ कात कए दी । कखनो-कखनो चिज वस्तुसभ  व्यर्थ लागए लगैत छैक ,होइत छैक जे कहुना ओहिसभसँ पिंड छोड़ाबी किंवा किछु एहन कए ली जे निश्चिंत भए सूति सकी । से किएक होइत छैक?
सबदिन हमसब अपन धीया-पुताक सुख-सुबिधाक हेतु काज करैत रहैत छी।समाजमे,अपन लोक-बेदक बीचमे मान-संमान हो,हमरा श्रेष्ठ बुझल जाए,अनकासँ हम सेसर रही,एही लफड़ासभमे जीवनक मूल्यवान समय चलि जाइत अछि आ अंतमे हाथ अबैत अछि फोकला। मनुक्खक मोहवंधन ततेक मजगूत होइत अछि जे ओ अंत -अंत धरि ओकरे फाँसमे फँसल मेहिआ बड़द जकाँ बहैत रहि जाइत अछि आओर एकदिन मुट्ठी बन्हने एहि दुनियाँसँ प्रस्थान कए दैत अछि । सभ किछु ठामहिँ रहि जाइत अछि ।क्यो एकर अपवाद नहि रहैत अछि ।

आया है सो जाएगा, राजा-रंक फकीर ।

एक सिंघासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर ।।

एकबेर एकटा महिलाकेँ लकबा मारि देलकै । ओ अस्पतालमे भर्ती रहथि । बाजल नहि होनि। कै दिनक प्रयासक बाद हुनका कनी-मनी होश भेल । कहुनाक मुँहसँ आवाज फुटलैक । होश होइतहि पहिल बात ओ इएह बाजल जे सूदि वसूलल गेल कि नहि ? सोचियौ ,जे टाकासँ केहन मोह छलेक ओकरा ! जान जाए पर छलैक , अस्पतालक आपत्तिकालीन विभागमे भर्ती छल , हैथ-पैर सुन्न भेल छलैक ,मोसकिलसँ कहुनाक आवाज फुटलैक तँ सभसँ पहिने की बाजल ? इएह थीक माया । ई जनितो जे सभटा एतहिँ रहि जाएत, लोक अंत-अंत धरि टाका बटोरबामे,लूट-खसोटमे लागल रहैत अछि । तखन शांति कतएसँ होएत ?
एकटा राजाक महल लग एकटा लोहार दिन-राति खट-खट करैत रहल छल । राजा एहि बातसँ तंग भए गेलाह । कोनो उपायसँ चाहथि जे एहि खट-खटीकेँ बंद कराबी । एक दिन ओ ओहि लोहारकेँ बजओलथि।लोहार डरा गेल । ओकरा नहि बूझएमे अबैक जे ओकरासँ कोन अपराध भेल जे ओकरा राजा बजा रहल छथि ।  खैर! ओ राजासँ भेँट करए पहुँचल । ओकरा देखिते राजा कहलखिन जे तोरा जतेक टाका चाही से लए लएह मुदा ई खटर-पटर बंद करह । राजाक बात काटत के ? ओ राजासँ यथेष्ट टाका लेलक आ ओहि दिनसँ अपन काज केनाइ बंद कए देलक । काज बंद तँ कए देलक मुदा ओकरा तहिआसँ निन्ने नहि होइक। की करए ? कतेको राति करोट बदलैत बीति गेलैक । एहिसँ ओ ततेक तंग भए गेल जे होइक जे जान चलि जाएत । हारि कए ओ राजाक ओतए दौड़ल गेल आ जे टाका लेने छल से आपस कए प्रार्थना करए लागल जे ओकरा अपन काज फेरसँ शुरु करबाक  आज्ञा देल जाइक  । राजा छगुंतामे पड़ि गेलाह । पुछलखिन जे बात की थिक,ओ किएक टाका आपस कए रहल अछि? लोहार कहलकैक-"सरकार! जहिआसँ काज छोड़लहुँ,हमर सुख चैन हरा गेल । हमरा माफ कएल जाए , हम अपन पहिलका जीवन जीबए चाहैत छी । ओहीसँ हमरा शांति भए सकैत अछि ।” राजा ओकर समस्या बूझि गेलाह आ ओकर बात मानि  लेलाह। तकर  प्रातेसँ ओ लोहार अपन काज शुरु केलक । ओहि राति ओ  बहुत चैनसँ सूतल । फेरसँ वएह ठक-ठकी सूनिकए राजा बहुत जोरसँ हँसलाह । ई कथा बहुत लोककेँ बूझले होएत,मुदा एहिमे बहुत गंभीर शिक्षा भरल अछि । धन-संपत्तिसँ  सुख चैन नहि भेटि सकैत अछि। लोभ-लालचसँ नहि,अनकर हक मारि लेलासँ नहि अपितु परिश्रमपूर्वक उपार्जित धनसँ जीवन-यापन केनेसँ मोनमे शांति भेटि सकैत अछि। 
समस्या अछि जे लोकसभ सभ किछु बूझितो एतेक फिरसान किएक रहैत अछि जखन कि क्यो से चाहैत नहि अछि? कारण सहजे ताकल जा सकैत अछि । अधिकांश व्यक्ति अनकर सुखसँ दुखी रहैत छथि । ओ किएक बढ़ि रहल अछि,ओकर मकान हमरासँ पैघ किएक छैक,ओकर बच्चा कतहुँ पढ़लकैक अछि,ओ सभतँ सभ दिन हमरासभसँ दव रहल आब कतएसँ पैघ भए जाएत ? एहीठाम हम मारि खाइत छी । जँ हम सकारात्मक सोच- बिचार राखी,अनको उपलव्धिसँ प्रशन्न हेबाक भाव राखी तँ निश्चय हमरा प्रशन्न हेबाक बेसी अवसर भेटि सकैत अछि । छै ने सत बात?
नान्हिटा जीवनकेँ के कोना बिताबए चाहैत अछि से बात बहुत हद धरि ओकरेपर निर्भर करैत अछि। समयतँ बीतिए जाएत चाहे जेना बीता लिअ,हँसिकए बीता लिअ चाहे कानि कए । असलमे कोनो घटना विशेष ककरा पर केहन प्रभाव करत से ओकर प्रवृतिपर निर्भर करैत अछि । ई ओहिना भेल जेना एकटा गिलास मे आधा पानि भरल अछि तँ क्यो कहत जे आधा पानि खतम भए गेल,तँ क्यो कहत जे एखन तँ आधा पानि बाँचले अछि,चिंता कथीक? एकटा अपन मकान बनलासँ कतेक खुशी होइत छैक । तहिना जँ अनको मकानसँ हम  खुश हेबाक प्रवृति विकसित कए ली तँ नित्य -निरंतर प्रशन्नताक वरखा होइत रहत एहिमे कनिको शंका नहि ।
चमक-दमक मे रहनिहार अनेको लोककेँ देखलासँकै बेरि मोनमे होइत छैक जे ई बहुत भाग्यवान अछि, बेस  मौजमे जीवि रहल अछि । मुदा ई बात कै बेरि कपोल -कल्पना साबित होइत अछि । कतेको फिल्मी कलाकार आत्महत्या करैत छथि । जौं धन-संपत्ति,ओ सामाजिक प्रतिष्ठासँ लोक सुखी रहैत तँ वएह सभ रहितथि। मुदा से असलियत मे नहि अछि । 
लोक दिन-राति पूजा -पाठ करैत रहैत अछि,कथी लेल ? जाहिसँ मनोकामना पूरा होअए,अधिकांश  लोकक संग ई बात फिट बेसैत अछि,परिणाम होइत अछि जे  पूजा करितो काल हम शांत नहि रहि पबैत छी। हम गाममे कै बेरि पूजा करैत काल लोककेँ चिकड़ैत-भोकरैत देखने छी,महादेवपर जलढ़री करैत काल अनका शरापैत सुनने छी,आ  कबुला-पाँती करैत तँ के-के ने देखने होएत । जखन  माथमे एतेक ओझर लए कए पूजा-पाठ कएल जाएत तँ  शांति कोना भेटि सकत ? भेटत-अहीँ कहू ? इएह थिकैक समस्याक जड़ि।
यद्यपि आयु बढ़िते जाइत अछि, लोकक मोह घटिते नहि अछि । सभकिछु हमरे भए जाएत से कतहुँ संभव होइक! ई जीवन अपूर्णतासँ भरल अछि । सभ किछु नहि भेटि सकैत अछि । तखन मर्जी अहाँक अछि जे हाय! हाय ! करैत रही किंवा जे किछु अदिष्टसँ भेटल तकरा सहर्ष स्वीकार कए संतुष्ट रही ।
ई बात तँ बूझि गेलिऐक जे शांतिसँ रही,एकर बहुत नफा छैक,मुदा शांति प्राप्त कोना भए सकैत अछि? ताहि हेतु की कएल जाए? की नहि कएल जाए? असलमे  उपदेश देलासँ किंबा किताबमे पढ़ि लेलासँ शांति प्राप्त नहि कएल जा सकैत अछि । ई तँ जीवन कला थिक एवम् निरंतर अभ्यासेसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि । तथापि किछु बात मोटा-मोटी जँ ध्यानमे राखल जाए तँ बहुत रास झंझटिसँ बँचल जा सकैत अछि आओर ओही अनुपातमे शांत जीवन बिताओल जा सकैत अछि।मोनमे संतोखक भाव एवम् अनावश्यक प्रतिस्पर्धासँ बचबाक चाही। आवश्यकताकेँ सीमित करबाक चाही । आय ओ व्ययमे संतुलन हेबाक चाही आ सभसँ जरूरी अछि जे मोनमे लोक कल्याणकारी भावना विकसित करबाक चाही । जे बात अपना नीक नहि लगैत अछि,से अनका संग नहि करी ।  अनकर उपलव्धिसँ ओहिना प्रशन्न होइ जेना अपनसँ । अनकर निंदासँ बची। परिवारमे सभक उचित महत्व दी । खाली अपने बात चलओनिहारकेँ अन्ततोगत्वा निराशा हाथ लगैत अछि । शांतिक हेतु जरूरी थिक जे मन कल्याणकारी विचारसँ ओत-प्रोत हो। दोसरक हितकारी भावना हो । जहिना हम अपन प्रगति चाहैत छी ,तहिना अनको लेल सोचियैक । से सभ जौँ हमर मोनमे रहत तँ निश्चय हम शांति ओ आनंदक अनुभव कए सकैत छी ।  तखने सुखी रहि सकैत छी ।
गीतामे कहल गेल अछि जे जकर शांति नहि तकरा सुख कतए?

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।




गुरुवार, 24 मई 2018

घमंड


 घमंड 


जीवनमे बहुत रास अनुभव होइत रहैत अछि। नित्य किछु ने किछु एहन घटना घटित होइत अछि जे हमर आँखि खोलि सकैत अछि मुदा से होइत कहाँ अछि ? हमसभ नियतिवस चलिते जा रहल छी,सोचि नहि पबैत छी जे हम एना किएक कए रहल छी ?  ई बात प्रायः सभ जनैत अछि, जे जन्मल अछि से मरत। मृत्यु अवश्यंभावी अछि,तथापि हमसभ सोचैत रहैत छी जे हम तँ अहिना रहब । युधिष्ठिर द्वारा यक्षकेँ देल गेल एहने प्रश्नक उत्तर एखनो ओहिना सार्थक अछि जहिना ताहि समयमे रहल होएत। आखिर एना कोना होइत अछि जे हम  सद्यः घटित होइत घटनाक प्रति अनजान बनल रहि जाइत छी आओर एकदिन  सभ किछु एतहि छोड़ि कए सभदिनक हेतु एहि दुनियाँसँ आँखि मुनि लैत छी ।
आखिर किछु तँ छैक जे मनुक्ख मात्रकेँ निरंतर ओझरौने रहैत अछि । हम निरंतर अपन आस्तित्वक रक्षाक हेतु संघर्षशील रहैत छी। हम जे कहैत छी से लोक मानए,हमर महत्व बुझए एवम् हमर श्रेष्ठत्वकेँ स्वीकार करए। एहिसभक पाछा हमर घमंड प्रमुखतासँ मुखरित होइत रहैत अछि। जीवनसँ लए कए मृत्यु पर्यंत हमरा लोकनिक व्यवहारकेँ  पाछा ई तत्व विद्यमान रहैत अछि । हम जाने-अनजाने दोसरसँ अपनाकेँ श्रेष्ठ साबित करबाक फेरमे पड़ि अपन जीवनकेँ तँ  अशांत केनहि रहैत छी ,संगहि दोसरोकेँ तंग कए दैत छी कारण एहन स्वार्थमूलक सोचसँ व्यक्तिक अहंमे टकराव उतपन्न होइत अछि आओर लोक अपनाकेँ पैघ देखेबाक प्रयासमे दोसरकेँ छोट साबित करए लगैत अछि । परिणाम होइत अछि ,व्यर्थक अनवरैत चलैत अन्तरद्वंद ।
मान -सम्मान , प्रतिष्ठाक लिप्सा मनुक्ख मात्रमे ततेक बलबती रहैत अछि जे ओ कोनो हालातमे ताहि हेतु किछु करए हेतु तैयार रहैत अछि । लोक हमरा बुझए,मान्यता दिअए,हम समाजमे देखगर लोकमे गनल जाइ,एहि समस्त भावनाक पाछा जँ देखल जाए तँ ओकर घमंडे काज करैत रहैत अछि। एहन घटना नित्य-प्रति देखएमे अबैत अछि जे कतेको गोटे बेबजह अनकर मामलामे टांग अरबैत रहताह । जेना कि ओ चैनसँ रहिए नहि सकैत छथि। एहन आदमी हेतु इहो कहल जा सकैत अछि जे ओ अपन चालिसँ लाचार छथि । कोनो,ककरो बात उठल कि ओ अपनाकेँ ओहि बीचमे ठाढ़ कए देताह। तरह-तरहक ब्यर्थ उदाहरण दैत रहताह जाहिसँ ई कहुना सिद्ध होउक जे हुनके टा सभबातकेँ बुझए अबैत छनि किंबा ओ जे कहैत छथि सैह व्रह्मसत्य थिक । एहन आदमीकेँ अहाँ की कहबैक? “एकोहं द्वितीयो नास्ति" --एहि तरहक सोच कोना कारगर भए सकैत अछि ?
हमर गाममे एकबेर श्राद्ध भोज होइत रहए। एकटा प्रतिष्ठित व्यक्तिक देहावसान भए गेल छल । अपना जीवन कालमे ओ खूब संपत्ति अर्जित कएलाह । संघर्ष करबामे हुनकर सानी नहि भेटि सकैत अछि । तखन तँ मृत्यु सभक होइत अछि से हुनको भए गेलनि । अपने जीवनमे लीखसँ लाख करबाक पुरषार्थ हुनकामे भगवान देलखिन । मृत्युक बाद लोकसभक आग्रह जे जबार होउक,एतेक संपत्ति अरजि कए गेल छथि । मुदा से तँ नहि भेलैक , गामे लए कए भोज हेबाक निश्चय भेलैक । संयोगसँ हमहूँ हाले मे सेवा निवृत भेल  रही आ गामे पर रही। भोज खेबाक हेतु गेलहुँ तँ देखैत छी एकटा हमर ग्रामीण ,जे भरि जिनगी बाहर कमाइत रहलाह, घरक दरबाजाकेँ गछारि कए ठार भेल छथि,गरजि रहल छथि,बारंबार चेता रहल छथि जे एक-एक कए लोक अन्दर जाथि । हुनकर चिकरब-भोकरब ततेक प्रखर चल जे अनेरे  ककरो ध्यान हुनका पर पड़ि जाइत छल । एवम् प्रकारेण हुनका अपन महत्वक प्रदर्शन करबाक आ ताहिसँ संतुष्टिबोध प्राप्त करबाक पर्याप्त अवसर भेटलनि । जँ ओ नहि चिकरितथि,किंवा घरक केबार धए ठाढ़ नहि रहितथि,लोक अपने अबैत   जाइत ,तैओ भोज भए जैतैक,प्रायः बेसी नीकसँ होइतैक कारण ओ तँ अनेरे केबारकेँ पकड़ि चिकरि कए महौलकेँ गड़बड़ा रहल छलाह,मुदा हुनका तँ देखेबाक रहनि जे ओ एतेक महत्वपूर्ण व्यक्ति छथि,सबके कस्तन कए रहल छथि,हुनके आज्ञासँ लोक भोज खाए अन्दर जाएत नहि तँ ओतए बबाल भए जाएत । बिचारि कए देखबैक तँ एकरा व्यक्ति विशेषक घमंडक अतिरिक्त किछु आओर नहि कहल जा सकैत अछि।
की पैघ,की छोट सभ क्यो कतहुँ  ने कतहुँ,कहुना ने कहुना घमंडक चपेटमे पड़िए जाइत छथि। शास्त्र-पुराणसभमे सेहो कतेको एहन प्रसंगक वर्णन अछि जाहिमे एक सँ एक संत महात्मा,देवी-देवता एकर  प्रकोपमे पड़ि गेलाह । महाभारतमे एहि संवंधमे बहुत मार्मिक घटनाक वर्णन अछि । एकबेर हनुमान बूढ़ बानरक रूपमे भीमके रस्तामे बैसि गेलाह । भीम हुनका अपन नांगरि हटेबाक हेतु कहलखिन  कारण हुनका जल्दी जेबाक रहनि मुदा ओ बानर टस सँ मस नहि भेल, उल्टे व्यंग करैत कहलकनि जे जखन अहाँ एतेक बलवान थिकहुँ तँ नान्हिटा हमर नामगरिकेँ उठाए किएक नहि आगू बढ़ि जाइत छी ? भीमकेँ ई बात बहुत अनर्गल बुझेलनि आओर ओ ओहि बूढ़ बानरक नांगरिकेँ हटबएमे लागि गेलाह,सभ प्रयत्न कए थाकि गेलाह मुदा नांगरि ठामहि रहल । हारि कए भीम कहलखिन जे अहाँ साधारण बानर नहि छी,के छी से सत-सत बाजू । तखन हनुमानजी अपन भेद खोलि कहलखिन जे हम आहीँक भाए हनुमान छी । भीम बहुत लज्जित भेलाह आ हुनकासँ घट्टी  मानलथि । एहि तरहेँ हनुमानजी हुनकर घमंडकेँ चकना चूर केलाह । कहक माने जे घमंड एकटा एहन व्याधि थिक जे अनेरे हमरा लोकनिक आँखिपर पट्टी लगा दैत अछि आ हम सत्यकेँ देखितहुँ ओकरासँ फराक रहि जाइत छी ।
घमंड किम्वा अहंकेर टकरावसँ कतेको  लोकनिक पारिवारिक जीवान नर्क भए जाइत अछि । हम ककरासँ कम ? हमरा ई कहलक,ओ कहलक,हम ओकर बात किएक सहबैक, एहने-एहने छोट-छोट बात केँ पकड़ि कए लोक धए लैत छथि जाहिसँ आपसी प्रेम ओ विश्वास नष्ट भए जाइत अछि ,बात ततेक बढ़ि जाइत अछि जे संवंध विच्छेद धरि भए जाइत अछि । जौँ एहन समयमे क्यो बुझनिक होथि,एक डेग पाछा भए जाथि,हारि मानि लेथि तँ बहुत रास परिवार खंडित हेबासँ बँचि सकैत अछि,बहुत रास धीया-पुताकेँ पारिवारिक आश्रय बनल रहि जाएत एवम् परिवारमे समन्वय,शांति बनल रहत । मुदा ई बात बुझब आ बुझिओ कए व्यवहारमे आनब कै बेर बहुत मोसकिल भए जाइत अछि कारण क्यो अपन अहंकेँ छोड़बाक हेतु तैयारे नहि होइत अछि । परिणाम सामने अछि । नान्हिटा टेल्हकेँ माए-बापक बीच कलहक दृष्य देखए पड़ैत छैक। बच्चासभ घरक वातावरणसँ तंग भए घरसँ भागल-भागल रहए लगैत अछि आ गलत संगतिमे पड़ि कए कै बेर नशेड़ी भए जाइत अछि । सोचए बला बात हछि जे माए-बापक व्यर्थक अहंक कारण एहन वच्चाक भविष्यक संगे कतेक अन्याय होइत अछि ?
एहन नहि अछि जे कमे पढ़ल-लिखल लोक घमंडक प्रदर्शन करैत छथि अपितु एक सँ एक विद्वान ओ पैघ-पैघ लोकमे एकर व्यापक प्रभाव देखएमे अबैत अछि । जे जतेक पैघ तकर घमंड ततेक विनासकारी भए सकैत अछि । इराकक राष्ट्रपति सद्दाम ओ अमेरिकाक राष्ट्रपति बुशके बीच जे एतेक भारी युद्ध भेल तकर पाछु की छल ? महज अहंक टकराव ? जहिना गाम-घरमे मूर्ख लड़ैत अछि तहिना ओ सभ आपसमे ताधरि लड़ैत रहलाह  जाधरि सद्दामक विनाश एहि हदधरि नहि भए गेल जे ओ अपन प्राणोसँ हाथ धोलक । बादमे पता चलल जे ओकरा लगमे कोनो रासायनिक हथियार नहि छल जकरा आधार बनाए इराकपर अमेरिका आक्रमण केलक । कार्यालयमे अधिकारी लोकनि कए बेर अहं पर चोट पड़लापर अधीनस्त कर्मचारीकेँ तबाह करबाक कोनो ब्योंत बाम नहि जाए दैत छथि । बदली कएदेब.काजसँ हटा देब आ ताहुसभसँ संतोष नहि भेलनि तँ नौकरीसँ मुअत्तल कए देब सामान्य बात थिक। जे ततेक पैघ अधिकारी तिनक अहंसँ ततेक बेसी सावधान रहब जरुरी थिक । काज करी वा नहि करी मुदा हुनकर सलामीमे कोनो कमी नहि हेबाक चाही । जँ से भेल तँ अहाँक भगवाने मालिक ।
असलमे घमंडी व्यक्ति भीतरसँ असंतुष्ट होइत छथि । हुनका लगैत रहैत छनि जेना सौँसे दुनियाँ हुनका पाछा पड़ल अछि,जेना क्यो हुनका संगे न्याय नहि कए रहल अछि ,एहि तरहक फिजुल बातसभ हुनकर मोनमे बैसल रहैत हछि जाहि कारणसभ हुनकर व्यवहार स्वयं असंतुलित भए जाइत अछि किंवा लोकसँ बहुत बेसीक अपेक्षा रखैत अछि । परिणाम  ई  होइत अछि जे ओ बात-बात पर लोक सभसँ मरए-कटए हेतु तैयार रहैत छथि । सोचबाक बात थिक जे एहन लोककेँ शांति कतएसँ भेटि सकैत अछि आ "अशांतस्य कुतो सुखम्" ? एहि तरहक अशांत प्रवृतिक लोकमे घमंड भरल रहैत अछि । जाहिर अछि जे एहम लोक आस-पासकेँ लोककेँ तरह-तरहसँ कष्ट पहुँचबैत छथि । अपने तँ दुख कटिते छथि दोसरोक जीवनकेँ नर्क कए दैत छथि।
घमंड कतेको कारणसँ भए सकैत अछि आ कए बेर तँ बिना कोनो औचित्यकेँ  स्वभाववश सेहो लोक घमंडी भए जाइत अछि। एहन उदाहरण अहाँकेँ कतेकोठाम देखबामे आएत । हमरा गाममे एकटा भिखमंगा कहिओ काल अबैत छलाह । यद्यपि ओ भिख चाहैत छलाह मुदा हुनक बाजबाक चहटिसँ क्यो नहि कहैत जे ओ भिखमंगा थिकाह । असलमे ओ पहिने बहुत धनीक छलाह मुदा कालक्रमे गरीब भए गेलाह । जमीन -जायदाद बिका गेलनि । कहबी छैक जे जौर जड़ि गेल मुदा एंठन अछिए । सैह गप्प छलैक ।
महाभारत मे खिस्सा अछि जे द्रोपदीकेँ अपन सौंदर्यपर बहत घमंड रहनि आओर गाहे -बगाहे ओ एहि कारणसँ कतेको शत्रु बना लेलीह। परिणामसभकेँ बुझल अछि । मामला द्रोपदी चीर हरणधरि पहुँचि गेल । की -की तमाशा ने भेल । भयानक युद्ध भेल आओर समस्त परिवार विनाशकेँ सीमानधरि पहुँचि गेल । कहक माने जे घमंड चाहे जिनका होनि,आओर जाहि कोनो कारणसँ होनि,एकर परिणाम  खराबे होइत अछि ।
घमंड एकटा मानसिक रोग थिक जे मनुक्खकेँ सत्यक दर्शन करएसँ ओहिना रोकि दैत अछि जेना सीसीमे कोनो वस्तुकेँ पैसबासँ ठेपी । घमंडी व्यक्ति एक हिसाबे आन्हर होइत अछि जे  मदांध भए सही विचारकेँ कदापि नहि सुनैत छथि । एहने मानसिकता रावणकेँ रहैक जाहि कारणसँ घरहंज भए गेलैक , सभ किछु नष्ट भए गेलैक । मेघनाद सन बीर ओ तेजस्वी संतानसँ हाथ धोअए पड़लैक,कुंभकरण सन भातृभक्त भाए मारल गेलैक,विभीषण घर छोड़ि भागि गेलाह। सभ ओकरा बुझबैत रहलैक ,एहि हद धरि जे मंदोदरीक कथन धरिकेँ ओ सौतिआ डाह कहि अपमानित केलक । परिणाम सभकेँ बुझल अछि । अस्तु,घमंड सर्वथा त्याज्य थिक ।
जँ बिचारिक् देखल जाए तँ एहि दुनियाँमे कोनो तरहेँ पार पाएब आसान नहि अछि । पढ़ले देखू तँ एक सँ एक विद्वान छथि। आइन्सटाइन,सेक्सपीयर,कालीदास,राधाकृष्नन,कतेको नाम अछि,ककर नाम लेब ,ककर छोड़ब,पन्नाक पन्ना भरि जाएत । धनिकमे गिनती करब तँ गनिते रहि जाएब । एहिना पद,सौंदर्य,वुद्धि सभ तरहेँ एकसँ एक लोक एहि संसारमे भेलाह आआोर छथिहो । तखनो जँ क्यो कथुक घमंड करैत छथि तँ की करबै? हँसबे करबै ने ? अस्तु ,विनम्र होएब सबसँ नीक ऐश्वर्य अछि जे सही कही तँ भाग्यवाने लगमे होइत अछिः

बरसहि जलद भूमि निअराए,

नबहि यथा बुध विद्या पाए ।

विनम्रता विद्वताक परिचायक थिक । जरुरी अछि जे सही ज्ञान प्राप्त कए स्वभावमे विनम्रताकेँ आनल जाए आओर घमंडसँ मुक्ति पाओल जाए,जाहिसँ जीवन सुखमय होएत ।