बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

बाल्यकाल





 





बाल्यकाल

माएक ध्यान करैत-करैत वाल्यावस्था मोन पड़ि गेल। घरक आगूमे कनीटा जगह छलैक। ओहि जगहमे हमर फुलवाड़ी छल। कतहुँसँ तीरा फूलक बीआ आनि कऽ रोपि दिऐ आ लगले, माने प्राते भेनेसँ बाबाकेँ पुछए लगियनि-

“बाबा! फूल तऽ नहि फुलेलै?”

हमर बात सुनिते बाबा हँसि देथि।

रोज भोरे उठिते यएह काज...। कएक बेर तीराक बीआसँ कनियोँटा पम्ह निकलै आकि फेर दौड़ी बाबा लग। बाबा फेर हँसए लागथि। कएक दिन जखन अहिना बाबाकेँ तंग करियनि तखन कहथि-

“एक्के-दिने थोड़े फूल फुलाइ छैक, समय लगैत छैक।”

फेर बाट ताकी। पानिसँ पटाबी। क्रमश: बीआ गाछ बनबाक दिशामे अग्रसर होइत छल। आठ-दस दिनक बाद, जखन तीराक गाछ बढ़ि जइतैक तऽ फेर बाबा लग जाइ आ हुनका तीराक गाछ लग लऽ जा देखा दियनि। कोंढ़ीक स्थिति देखि बाबा मुड़ी डोलबैत बाजथि-

“हँ! आब फूल आबि जाएत। अहिना पानि पटबैत रहियौ।”

किछु दिनमे रंग-बिरंगक तीराक फूलक कोंढ़ी अबैत आ रोज भोरे फेर जिज्ञासा भरल आँखिसँ फूलक कोंढ़ीकेँ देखैत रही। फूलकेँ कोढ़ीसँ स्‍फुटित होइत देखैत रही, कतेक आनन्द होइत रहए, कतेक आनन्दित भए जाइत रही, तकर वर्णन हठात करब सम्भव नहि। हमर पितामह (स्व. श्रीशरण मिश्र)अपना समयमे पहलवान छलाह। लोक बाजथि जे ओ असगरे चार चढ़ा लैत छलाह। खेती-वाड़ी जमि कऽ करैत छलाह। छह फूट लम्बा, मजगूत कद-काठी आ घोर परिश्रमी लोक छलाह। कर्मठताक संग-संग ओ आस्तिक आओर संस्कार सम्पन्न लोक छलाह। ७५ सालक बएस धरि हुनका घोर परिश्रम करैत हम देखिअनि। ओ भोरे उठैथ आ जन-मजदूर सभकेँ अढ़बए सिनुआरा टोल जाथि, जन लऽ कऽ खेतपर जाथि, जन सबहक पनपियाइ पहुँचाबथि, सभ काज एकसूरे कऽ लेथि।

हमर गामक बिच्चेमे पोखरि अछि। पोखरिक पछवरिया महारसँ कनिक्के हटि कऽ हमरा लोकनिक घर अछि। पोखरिक पुवरिया महारपर ओलार छल जाहिठाम माल-जाल बान्हल जाइत छल। घरक शुद्ध दूध, दही प्रचूर मात्रामे उपलब्ध करबामे ओलार आ ओहिठाम दिन-राति खटैबला चरबाह–मियाँजानक बहुत योगदान छल।

मीआजान चरबाहकेँ घरेपर सँ टाहि देथि-

“महींस पनहा गेल अछि...।”

बाबाक एकटा महींस हुनके हाथे लगैत छल। जखन कखनो ओ कतहुँ चलि जाथि तऽ आफत भए जाइत रहए। महींस चुकैर-चुकैर कऽ जान देबएपर उतारू भए जाइत छल मुदा लगैत नहि छल।

बाबाकेँ एकटा डमरू रहनि जे ओ बजबैत रहैत छलाह। कहथि जे ओ डमरू हुनका महादेव देने छथि। हमरा लोकनिक जन्मक पूर्वेसँ ओ डमरू हुनका लगमे छल। बादमे ओहि डमरूकेँ महादेवक मन्दिरपर लेने गेलाह आ सायंकाल नचारी गबैतकाल आओर महादेवक  आरतीक समय ओ डमरू कखनो बाबा स्वयं वा कखनो-कखनो आओर बुढ़ सभ बजबैत छलाह। बच्चा सभकेँ बाबासँ बहुत सिनेह होइते अछि। हमरो हुनकासँ बड़ सिनेह छल। सदिखन बाबासँ सटल रही। धिया-पुता सभकेँ हमरा घरमे बहुत हिफाजत होइत छल। बाबूजी असगरे छलाह। तँए परिवारमे नब बच्चा स्वागत योग्य होइत छल। एहि तरहेँ हम सभ ९ भाए-बहिनक पैघ परिवारक अंग भेलहुँ। गाममे सुसम्पन्न परिवारक पुरोधा छलाह- हमर बाबा। हुनकर बिआह समस्‍तीपुरक लगपासमे सोतीसलमपुरक शीलानाथ झाक पाँजिमे, ओहि समयक पाँच सए चानीक सिक्का दऽ कऽ भेल रहनि।

बादमे ओ सभ जनाढ़मे बसि गेल रहथि। बाबाक सार सभ गाहे-वगाहे हमरा ओहिठाम अबैत रहै छलाह आ बहुत सम्मान पूर्वक बहुत-बहुत दिन धरि ओ लोकनि रहितो छलाह। बाबाक हेतु छोट-मोट उपहार जेना- ‘चक्कू’, ‘सरौता’ इत्यादि नेने अबथिन। देवोत्थान एकादशी दिन भगवानकेँ जगाओल जाइत छल। बाबा एहि पूजाकेँ बहुत श्रद्धा पूर्वक करैत छलाह। पीढ़ीपर रंग-बिरंगक अरिपन बना चारूकात दीप जराओल जाइत छल, आ चारि गोटे चारूकातसँ मन्‍त्रोच्चारक संग भगवानके ऊपर लऽ जाथि आ फेर नहुए-नहुए निच्चाँ लऽ आवथि। पूजा पाठ होइत, प्रसाद वितरण होइत। अनन्त चतुर्दशीक दिन भगवानक पूजा हमरा ओहिठाम सभ साल होइत छल। सभ अपन-अपन घरसँ अनन्त आनथि, प्रसाद आनथि आ ओकर पूजा विधि पूर्वक बाबा करैत रहथिन।

“किं मथसि, क्षिर निधि

प्राप्तो त्‍वंया, प्राप्तो मया।”

उपरोक्त श्‍लोक कहि कऽ अनन्त सबहक पूजा होइत छल। व्रह्मस्थानमे लखराम महादेवक पूजा होइत आ घरे-घरे लोक माटिक महादेव बना कऽ लऽ जाइत छल। दिन भरि पूजा होइत छल। गाममे समय-समयपर नवाह, अष्टजाम सेहो होइत छल। एहि सभसँ बालक सभमे नीक संस्कार पड़ैत छल।

हमर प्रपितामह (स्व० गुमानी मिश्र) इलाकाक प्रतिष्ठित जमीन्दार छलाह। डा. सुभद्र झाजी कहथि जे ओ जखन घोड़ापर चढ़ि कऽ कर्ज-वसूलीक हेतु निकलथि तऽ लोक घरे- घर नुका जाइत छल। परिवारक आर्थिक सामर्थ्‍य बढ़बैमे हुनक जबरदस्त योगदान छल।

हमर गाममे पीच सड़क छलैक, चौबटिया छलैक, जकरा ओहि समयमे ‘कमाल चौक’ कहल जाइत छल। कारण पुवारि टोलक कमाल नामक एक व्यक्ति ओहिठाम पानक दोकान खोलने रहथि। ताहिसंग चाह आ मधुरक दोकान स्व. सुखदेव साहुक छल। एहि दोकान सबहक अतिरिक्त ठेलापर दूटा आओर दोकान क्रमश: खूजल। कनिक्के हटि कऽ किछु आओर दोकान छल। चाह, मधुर ओतहुँ उपलब्ध छल। कतेको गोटे ओहिठाम बैस कऽ गप्प मारि समय कटैत छलाह। छोट-मोट क्‍लब जकाँ ओ काज करैत छल।

ओहिठामक गप्प-सप्पक विषय बदलैत रहैत छल। एकबेर जबरदस्त विवादक विषय छल जे हमर गामक नाम ‘अड़ेरु डीह’ छिऐ आकि ‘अड़ेर डीह?’ हमहूँ ओतए ई चर्च  सुनैत रही। बच्चामे हमरा होइत छल जे ई सभ अपन समय व्यर्थ बरबाद कऽ रहल छथि, मुदा आब ओकर उपयोगिता बुझा रहल अछि। सही मानेमे ओ बुढ़ सभकेँ जीबाक बड़का सहारा छल।

कनियेँ दूर हटि कऽ बुध आ रवि दिन हाट लगैत छल। तरह-तरह केर तीमन-तरकारी ओतए उपलब्ध रहैत छल। चारूकात किछु स्थायी दोकान सभ छल।

गाम दऽ कऽ दूटा बस चलैत छल। एकटा उजरी बस, जे साहरघाटसँ मधुबनी आ दोसर हरलाखीसँ मधुबनी जाइत छल। दुनू बस बेनीपट्टी, धकजरी, अड़ेर, रहिका होइत मधुबनी जाइत छल। ई दुनू बस जँ छुटि गेल तऽ सिवाय रिक्शाक आओर कोनो सवारी नहि छल। रिक्शा द्वारा गाम-घरक गरीब सबहक गुजर होइत छल। रिक्शो चलब धिया-पुताक मनोरंजन छल। कएटा बच्चा सभ रिक्शापर पाछासँ लटकि जाइत छल आ दूर धरि रिक्शाक पछोर करैत छल आ रिक्शाबला सभ कए बेर तंग भए कऽ झगड़ापर उतारू भए जाइत छल।

हमर गाम बस पकड़ए हेतु दूर-दूरसँ लोक अबैत छल। जमुआरी, एकतारा, नगवास आदि गामसँ लोक अड़ेर आबि कऽ बस पकड़ै छलाह। क्रमश: बसक संख्या बढ़ल।

सरकारी बस सभ चलए लागल। सीतामढ़ीबला रोडक बस चलि गेलाक बाद तऽ बसक संख्यामे बहुत वृद्धि भेल आ आब तऽ अड़ेर छोट-छीन शहर जकाँ सुविधा सम्पन्न भए चुकल अछि। सड़कक काते-काते सभ रंगक सैकड़ो दोकान खुजि गेल अछि। बैंक, ए.टी.एम., थाना, हाइ स्कूल इत्यादि सभ भए गेल। लगपासक आन गाम-सभमे पक्का रोड बनि गेल अछि आ अड़ेर चौकक महत्व बढ़िते जा रहल अछि।

गामक पूबसँ कमला नहरसँ जोड़ल धार बहैत छल। ओहिमे तखने पानि अबैत जखन जयनगरक लगपास बनल फाटकसँ पानि छोड़ल जाइ। भदवारिमे जखन चारूकात बाढ़ि आबि जाइ तऽ ओहूमे पानिक दर्शन होइत। ओहि समयमे हम सभ धारमे खेलाइत छलहुँ। चौकसँ आगाँ बनल पूल, जाहिपर लोहाक घेराबा देल छल, ओहिपर सँ बच्चा सबहक देखा-देखी कुदि जाइत रही। सचमुच ई भयाबह छल मुदा सभ बच्चा देखसीमे एना करैत छल। कएक गोटाकेँ ओहिमे चोटो लगैत रहए। पुलक निच्चाँ पानिक झड़ना छल। ओहिमे तेजीसँ पानि ऊपर-सँ-निच्चाँ खसैत छल। ओहिमे फाटक लगेबाक  सेहो ब्यवस्था छल, जाहिसँ जरूरत भेलापर पानिक बहाव नियंत्रित कएल जा सकए। ओहि झड़नामे अपन गामक बच्चा सबहक संगे हमहूँ कुदि जाइत रही। ओतए पानिक बहाव बहुत तेज रहैत छल आ कएबेर बच्चा सभ गोंता खेला बाद ५-६ मीटर दूर धरि बहि जाइत छल। एकबेर हमरे गामक खुरलुच्च पैघ बच्चा हमरा झड़नाक ऊपरसँ धकेल देलक, जाहिसँ हमर वामा आँखिसँ ऊपर माने भोंह लगक कपार फुटि गेल। तकर बाद जे उपरागा-उपरागी भेल से की लिखू।

गाम-घरमे कोदबासँ बँचबाक हेतु पाच कएल जाइत छल। ओहि समयमे एकरा धार्मिक क्रिया बुझल जाइत छल। शीतला माएक आराधनाक स्वरुपमे झालि बजा-बजा कऽ पचनियाँ गीत प्रसिद्ध छल। बहुत नेम-टेमसँ घरक लोक रहैत छल। कार्यक्रमक अन्तिम दिन तेल चढ़ैत छलैक। पचनियाँकेँ चढ़ौना देल जाइत छल। अखनो धरि ई दृश्य हमरा मोन पड़ैत रहैत अछि। वामा बाँहिपर दूटा नमगर-नमगर चेन्ह अखनो धरि विद्यमान अछिए। पचनियाँ सभ सरकारी कर्मचारी होइत छलाह। आब सोचाइए जे लोकक धर्मिक भावना आओर अज्ञानताक फायदा उठबैत ई सभ पैसाक उगाही करैत छलाह।

ओहि समयमे ग्रामोफोन होएब बड़का बात छलैक। हमरा गाममे प्राय: तीन गोटेकेँ ग्रामोफोन रहए। ओहिमे गीतक रेकर्ड गोल-गोल चक्का सन चढ़ा कऽ ग्रामोफोनक सुई चला दैत तऽ गाना-बजाना होइक। बच्चा सभकेँ कहल जाइक जे भोपूमे आदमी नुकाएल अछि। आ हम सभ ओहि आदमीकेँ तकैत  छलहुँ। हमरो ओहिठाम एकटा ग्रामोफोन रहैक। हम बारंबार ओकर पार्ट सभकेँ खोलि ओहिमे नुकाएल आदमीकेँ तकैत रहैत छलहुँ।

एक दिन जेना-तेना किछु पाइक इन्तजाम कऽ मधुबनी जा कऽ दूटा ग्रामोफोनक रेकार्ड कीनलहुँ, जाहिमे एकटा ससुराल फिल्‍मक गाना छल ‘तेरी प्‍यारी प्‍यारी सूरत को किसी की नजर न लगे’। सन्‍दुकमे राखल ग्रामोफोनकेँ खोलि ओहिमे रेकर्डकेँ बजबैत कियो देखि लेलक। बात बाबूजी धरि पहुँचल। मुदा कनी-मनी डाँट-फटकारक बाद छोड़ि देल गेलहुँ। हमरा गाममे दाहा अबैत छलैक। बच्चा सभ ओहिमे बड़ा आनन्दित रहैत छल। हम सभ दाहाक नकल करी। करचीमे फूल आ आओर किछु खोपि दिऐ आ सभ बच्चा अपनामे संगोट कय अँगने-अँगने घुमी आ ‘दमदलियाक दाहा हुसे..’ कहि-कहि संगे सभ बच्चा चिचिआइत खूब आनन्दित होइत रही।

छोट-छोट बात सभसँ बच्चामे कतेक आनन्द होइत छल, तकर ई उदारहण अछि। बरखा, थाल-कादो, रौद, पानि-बिहाड़ि इत्यादि सभमे बच्चा आनन्द ताकि लैत अछि। सच कही तऽ वाल्यावस्था ईश्वरत्वक बहुत समीप रहैत अछि। अन्दरक आनन्द यत्र, तत्र, सर्वत्र प्रस्‍फुटित होइत रहैत अछि। हम सभ दरबज्जापर बैसल रहितौं, सिलेट लऽ कऽ लिखैक अभ्यास करैत, कि एकटा पगला अबिते बड़बड़ाइत-

“जलखै, जलखै...।”

किछु-ने-किछु ओकरा कियो-ने-कियो खेनाइ दऽ दैत आ ओ चलि जाइत। बहुत दिन धरि ओ क्रम चलल रहए...। बाल मोनपर जे गड़ि गेल से गड़ले अछि। अर्द्धनग्न शरीर, माटि, थाल-कादो सटने, बकर-बकर बजैत ओ अबैत-जाइत रहैत छल। कहि नहि ओ के छल आ ओकर की अन्त भेल..? भूतकालक घटनाकेँ मोन पाड़ैत अनायास ओहि शिक्षकपर ध्यान चलि जाइत अछि जे हमरा सबहक घरक सटले बच्चा सभकेँ पढ़बैत छलाह। बच्चा जँ कोनो गलती केलक, किंवा सबक नहि रटि सकल, तऽ घोरनक छत्ता विद्यार्थी-सभपर छोड़ि देथि। बाप-बाप चिचिआइत बच्चा सभक स्मरण करैत अखनो रोमांचित भए जाइत छी। सोचल जा सकैत अछि जे ओहि बच्चा सबहक की भविष्य रहल हेतइ। एक्कोटा बच्चा ओहिमे सँ नहि पढ़ि सकल। बच्चाक माए-बाप सभ अपन बच्चा सबहक कल्याणक कामनासँ मूक दर्शक बनल रहल। आ सभ बर्वाद भए गेल।

“सए वीघा खेतक हमहूँ मालिक छलहुँ।”

“ई बसुधा काहू को नाही...।”

“ऐ पछवरिया घरवारी। ऐ पुबरिया घरवारी...।”

ई टनक अबाज छल एकटा भिखमंगाक।

“ई वसुधा काहु को नाही...।”



कएक बेर ओ ई बात चिचिआ कऽ कहैत। हाथमे छड़ी, आँखिपर टुटल-फुटल चश्मा, धोती पहिरने, ओकरे ओढ़ने। ओ हमरे गामसँ सटल गामक छलाह। हमर पितियौत बाबी ओही गामक रहथि। तँए हुनकासँ बेसी ओ अपेक्षा रखैत छल। ओकरा एक तम्मा चाउर देल जाइत तखने लैत, मुट्ठी भरि नहि। जौं मुट्ठी भरि देबाक कियो चेष्टा करैत तऽ ओ चिकरैत-भोकरैत चलि जाइत। मास-दू-मासमे एकबेर अबैत आ भरि तम्मा भीख भेटलाक बाद ओहि दिन दोसर घर नहि जाइत। कड़क अबाज, ब्यवहारक रुक्षता ओ भीखमांगक अन्दाज ओकरा ओहू अवस्थामे अलग पहचान दैत छल। कहि नहि की भेल जे ओकर एहन आर्थिक पतन भेल। निश्चय ओ एकटा अलग लोक छल।

स्कूलक रस्तेसँ अल्‍हाक ढोलकक थाप सुनाइत छलैक। होइत जे दौड़ कऽ रस्ता फानि कऽ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। घर पहुँचते बस्ता रखितौं आ भागितौं।

माए कहथि-

“पहिने किछु खा तऽ लिअ।”

माएक गप्प सुनिते कहि दियनि-

“आबि रहल छी।”

आ अल्‍हा सुनए पहुँच जाइ। हमरा गाममे अल्‍हाक बहुत रेवाज छलैक। दुपहरिया कटबाक ई उत्तम साधन छल। भरि गामक लोक सभ जमा होइत आ अल्‍हाबला जोशा-जोशा कऽ ढोलकपर थाप मारैत आ गबैत अल्‍हा-रुदलक अनेकानेक प्रकरण सुनबैत-

“बाबू सुनो हमारी बात, एक दिन की नहीं लड़ाई, गाबत बीत जाय बारह मास...।”

एहि तरहक पाँति सभसँ गीतमय कथानक रूचिगर छल। बच्चा सबहक हेतु ओ बहुत आकर्षण छल। बेरा-बेरी कतेको दरबज्जापर अल्‍हाक आयोजन होइत रहैत छल। ओ नट हमरा गाममे बहुत प्रसिद्ध भए गेल छल। गाम-घरमे सामान्यत: लोककेँ एहि तरहक मनोरंजन उपलब्ध छल। ओहि समयमे टेलीवीजन नहि रहैक। तहिया रेडियो सेहो ककरो-ककरो रहए। तँए किछु तऽ चाही।

गाममे सामान्यत: लोक भोरे उठि जाइत अछि। हमर बाबा तऽ भोरे उठि कऽ सभ काज कऽ जन अढ़ा कऽ आबि जाइत छलाह, तखनो चहल-पहल कमे रहैत छल। हमहूँ नित्य नियमित नवका पोखरिमे स्नान करी। ओहिठाम भगवान शिवक पंचमुखी मूर्ति छल, पूजा करी, जल ढारी, व्यायाम करी, तखन घर आबी। स्नान करए जाइत रस्तामे हारमोनियमपर भजन गबैत मधुर अबाज सुनएमे अबैत रहैत छल। गामसँ उत्तर-पच्छिम मन्दिरपर ओ पुजारी छलाह, सिघिंऔन गामक। हुनक स्वरक मधुरता समस्त वातावरणमे बहुत आनन्द भरि दैत छल।

सूर्योदयसँ पूर्व हमर स्नान भए जाइत छल। पोखरिमे धराधर डुबकी लगाबी। जाड़क मासमे तऽ यैहले-वैहले स्नान भए जाइत छल। गर्मीमे कनी-मनी हेलनाइ सेहो होइक । ओहि समयमे कुट्टीपर आरतीक घड़ी-घण्‍ट टनाटन करए लगैत छल जे बड़ीकाल धरि चलैत रहैत छल। कुट्टीक बाबा बहुत संग्रही रहथि। ओ बहुत रास गाए पोसथि। मुदा एक राति चुप्पे मन्दिरसँ समान सभ लऽ चलि गेलाह।

सन् १९६१मे सम्पूर्ण रामायण सिनेमा आयल छल। लॉडस्पीकर-पर गामक गाम प्रचार होइत- ‘देखना मत भुलियेगा, शंकर टॉकिज- मधुबनीकेँ विशाल पर्दे पर सम्पूर्ण रामायण...।’

सम्पूर्ण रामायण देखए गाम-गामक लोक उनटि गेल छल। हमरो गामसँ कतेको देखए गेलाह। ओ सिनेमा कतेक चलल से नहि गनल जा सकैत अछि। ओहि सिनेमाक गीत सभ अखनो हम  सुनैत छी तऽ स्वत: अपन वाल्यावस्थामे वापस चलि जाइत छी।

 “बदलो बरसो नयन की ओर से...।”

आ

“हम रामचन्द्र की चन्द्रकला से...।”

ई दुनू गीत तऽ हम बेर-बेर  सुनैत रहैत छी। मोन होइत अछि एकबेर ई गीत अहूँकेँ सुना दी। चलू फेर कखनो। जखन कखनो ई गीत  सुनैत छी तऽ स्वत: आँखि नोरसँ भरि जाइत अछि।

'सीता-जन्म वियोगे गेल, दुख छोड़ि सुख कहिओ ने भेल।'

जगतजननी मैथिली-सीतामैयाक दुखक वर्णन करैत ई गीतमे भावनाक अद्भुत विस्‍फोट अछि। सामाजिक कुब्यवस्था आओर सामन्तवादी सोचक विद्रोह स्वरुप अपन सन्तान द्वारा अन्यायक प्रतिवाद करैत ई गीत-

“हे राम तुम्‍हारी रामायण तब तक होगी सम्पूर्ण नहीं...।

जब तक राज्य के निर्माता, धोबी की बात में आएंगे,

भारत भविष्य की माता को धोखे से वन में ठुकराऐंगे...।”

एहि गीतक एक-एक शब्द रोमांचित करैत अछि। कतेक अन्याय सहए पड़ल मिथिलाक ओहि यशस्‍वी सन्तानकेँ। खैऱ! चलू आगू बढ़ी...।

जीवन यात्रामे एहन कतेको दृश्य अछि, जे मोनमे गड़ि जाइत अछि। जानकीक संग एना किए भेलनि? सोचैत रहि जाएब, मुदा उत्तर नहि भेटत। बाबूजी कएक बेर बजैत रहथि-

“विधि वाम की करनी कठिन, जस सियहि किन्है बाबरो...।”

यद्यपि समय बहुत आगाँ बढ़ि गेल अछि, लोकक विचारो बदलल अछि, तथापि सीता सदृश अनेको मैथिलानी अखनो चौबटियापर न्यायक बाट तकैत देखल जाइत छथि।

धिया-पुताक छोट-छोट बात ओकर भावी जीवनक दिशा निर्देश करैत अछि। हमरा बच्चामे खेलबाक बहुत जतन रहए। आस-पासक बच्चा सभकेँ पकड़ि-पकड़ि कऽ खेलक हेतु इकट्ठा करी। कएक तरहक खेल होइत रहए, बिनु खर्चक आ बिनु कोनो झंझटक- जेना कबड्डी, विट्टू, फूटबॉल, बालीबॉल आदि। कबड्डी तऽ हमरा दरबज्जेपर होइत रहए। स्कूलसँ अबिते देरी  खेलमे लागि जाइत रही। फूटबॉल हमरा गाममे बहुत प्रचलित छल। विष्‍णुपुर टोलसँ सटल खेलक मैदान छल, जाहिमे बरोबरि खेल होइत रहए। बादमे हाई स्कूल बनि गेलाक बाद ओकरे मैदानमे खेल होबए लगलै। पुरना समयमे हमर गामक फूटबॉल टीम बहुत प्रसिद्ध छल। हमर बाबूजी सेहो बढ़ियाँ खेलाइत छलाह। ओ कहथि जे खेलक चक्करमे पढ़ाइ चौपट्ट भए गेल। वाट्सन स्कूल- मधुबनीक छात्र रहथि आ गेनखेलीमे जतए-ततए चलि जाइत रहथि। हुनका कतेको मेडल सेहो भेटल रहनि। जँ आजुक समय रहैत तऽ बाते अलग रहैत। शायद हुनका अफसोच नहि करए पड़ितनि। मुदा ओहि समयमे तेहन परिस्थिति नहि रहए। कलकत्ता गेल रहथि तऽ मोहनबगानमे गेनखेलीमे चुनाव भए गेल रहनि मुदा थोड़बे दिनक बाद गाम आपस चलि अयलाह। लोक सभ बुझेलकनि जे गाममे कोन कमी अछि जे अहाँ कलकत्ता अयलहुँ, आदि-आदि अनेको बात कहलकनि। पश्चात गेनखेलीसँ हुनका ततेक परहेज देखिअनि जे जँ हम कहिओ खेलैत देखा जइतहुँ तऽ पकड़ि कऽ लऽ आबथि। जेना खेलकेँ पढ़ाइक शत्रु मानए लगलाह। परिणाम भेल जे हम खेलक मामलामे चौपट्ट भए गेलहुँ आ सदा-सर्वदाक लेल खेल-धूपसँ विरत रहि गेलहुँ।

एकबेर केना-ने-केना पैसाक जोगार कऽ बड़का गेन किनलहुँ। बच्चा सभ मिलि ओहिमे हवा भरलहुँ। आ कुट्टीक महारपर खेलए गेलहुँ। ओ जगह गामसँ कनियेँ हटल अछि। तँए मोनमे ई आशा रहए जे पकड़ल नहि जाएब, मुदा केना-ने-केना बाबूजी ओतहुँ पहुँच गेलाह, हमरा देखिते तमसाए लगलाह। खेल बन्द भए गेल। एवम् प्रकारेण हम ई सभ निठ्ठाहे छोड़ि देलहुँ आ सोलहन्नी कितावसँ चिपकए लगलहुँ। ओना, एहिसँ पढ़ाइमे फायदा भेल, मुदा खेल-धूपसँ हटि जेबाक कारण कएकटा क्षति सेहो भेल। हमरा हिसाबे ई ठीक नहि भेल, मुदा समय-समयक बात होइत अछि।

ओहि समयमे जे भेलैक से भेलैक। आब लोकक दृष्टिकोण बदलि रहल छैक। खेलक प्रति लोकक सकारात्मक रूखिसँ बच्चाक सर्वांगीण विकास होइत अछि। सामाजिक पक्ष मजगूत होइत अछि एवम् ओकर स्वभावमे सहनशीलता ओ सामंजस्य करबाक भावना बढ़ैत छैक। परीक्षामे अंक आनि लेबे सभ किछु नहि अछि। ओहिसँ हटियो कऽ जीवनक अनेक पक्ष अछि, जाहिपर ध्यान देबाक जरूरी अछि, जाहिसँ जीवन बेसी सुखी ओ शान्त रहि सकैत अछि।

ई निश्चय जे माता-पिताक मोनमे सन्तानक कल्याणक कामना रहैत अछि मुदा ओकरा अपन आकांक्षा किंवा मनोरथक प्रतिविम्ब बनेबाक प्रयास कएक बेर बच्चाक विकासमे बाधक भए सकैत अछि आ भगवानक दृष्टिमे सभ मनुक्ख अपना आपमे एक अद्भुत रचना अछि आ सभ किछु-ने-किछु विशेषता, विशेष क्षमता लऽ कऽ अबैत अछि। परिवार आओर   विद्यालयक दायित्व अछि जे ओकर विशेषताकेँ बुझए आ ओहि दिशामे ओकरा विकासक समुचित सुविधा सेहो भेटए ।  डाक्टर, इन्‍जीनियर बनि जाए, एतबे जीवनक अन्तिम सत्य नहि भए सकैत अछि।

हमरा गामसँ उत्तर-पूबमे चौकसँ कनिक्के हटि कऽ एकटा मन्दिर अछि। जकरा कुट्टी सेहो कहल जाइत अछि। ओहिठाम सावनमे सभ साल झूला ऊत्साहसँ मनाओल जाइत छल। भजन-कीर्तनक गायन होइत छल। आस-पासक गामक लोक साँझमे ओहिठाम एकट्ठा होइत छलाह। कार्यक्रमक अन्तमे प्रसाद वितरण होइत छल। कुट्टीपर बाबाकेँ बहुत रास गाए छलनि। ओही गाएक दूधसँ प्रसाद बनाओल जाइत छल, जाहिमे पर्याप्त मात्रा दूध आ मुट्ठीपर चाउर दऽ कऽ पायस बनाओल जाइत छल। धिया-पुताकेँ ओ पायस खेला बाद स्वर्गक आनन्द भेटैत छल। बड़का थाड़मे पायस राखि कऽ बाँटल जाइत छल। मुदा लोककेँ पायस बहुत कम मात्रामे देल जाइत छल। मुँहमे पायस जाइते देरी लगैत जे गलि गेल। स्वादिष्ट, मधुर एवम् मनमोहक। बच्चा सभ पायस लेबाक हेतु बारंबार प्रयास करैत छल। धक्का-मुक्की होइत छल। वारिक हमरे टोलक रहैत छलाह। ओ सदिखन एहि बातक ध्यान रखैत छलाह जे अपना-लेल पर्याप्त मात्रामे पायस बाँचि जाए, मुदा लोकक आक्रमण देखि ओ फिरसान भए जाइत छलाह। एक बेर तऽ पायसक बट्टा लेने ओ पोखरिमे कुदि गेलाह आ अन्दर पानिमे जा कऽ ताबरतोर पायस सुरकए लगलाह। चारूकात गामक धिया-पुता ओ युवकगण एहि दृश्यकेँ देखैत रहि गेलाह। हमहूँ पोखरिक कातमे आन-आन बच्चा सबहक संगे एहि दृश्यकेँ देखैत रहि गेल रही, जे अखनो धरि नहि बिसराएल।

बाबूजी साइकिलसँ मधुबनी जाइत रहैत छलाह। कहिओ-काल किछु-किछु फरमाइस कऽ दियनि। एकबेर पेन अनबाक हेतु कहलियनि। सड़कक कातमे ठाढ़ भेल बड़ीकाल धरि बाट तकैत रही जे बाबूजी पेन लऽ कऽ आबि रहल छथि। जतेक साइकिल देखा पड़ैत, देखिते होइत छल जे वैह आबि रहल छथि। कतेको काल धरि बाट तकलाक बाद बाबूजी साइकिलपर अबैत देखेलथि। थाकल, अपसियाँत भेल बाबूजीकेँ साइकिलसँ उतरिते पुछलियनि- “बाबूजी, पेन अनलहुँ?”

बजला- “जा! बिसरा गेल..!”

सुनिते देरी बहुत निराश भए गेल रही। पश्चात वौसबाक हेतु बाबूजी अपन हाथसँ घड़ी निकालि कऽ हमरा हाथमे पहिरा देलाह। शर्त ई जे घड़ी देखि कऽ पढ़ब।

मधुबनीमे सर्कस आयल छल, राति-के फोकस लाइट छोड़ल जाइत छल जे दूर-दूर धरि देखल जाइत छल। बाबूजीकेँ खुशामद कएल। हम आ बाबूजी सर्कस देखलहुँ। तरह-तरहक व्यायाम, खेल, धूप आदि ओहि सर्कसमे देखाओल गेल। ततबे नहि, बाघक संग सर्कसमैनक खतरनाक खेल सेहो देखाओल गेल छल। गाम-गामसँ सर्कस देखबाक लेल महिनो भरि लोकक ढवाहि मधुबनीमे लागल रहैत छल। सर्कस देखि कऽ स्वर्गक आनन्द भेल रहए। तरह-तरह केर व्यायाम ओ खतरनाक खेल सभ एकट्ठे देखबाक एहन अवसर गाम-घरमे कम अबैत छल।

हम सभ बच्चा रही तऽ हमरा गामक एक महान संत श्रीपति स्वामीक चर्चा होइत रहैत छल। ओ गौर वर्णक ओजस्‍वी लोक छलाह। सन्यासी रहथि। हाथमे दण्ड-कमण्डल रहनि। माए कहथि जे गीता पढ़ैत-पढ़ैत हुनका मोनमे वैराग्य उत्‍पन्न भए गेल आ ओ जबानिएमे सन्यास लऽ लेलाह। ओ कहिओ काल गाम अबैत छलाह आ अपन शिष्‍यक ओहिठाम रहैत छलाह। गामक पुस्तकालय आओर नवका पोखरिपर लोक सबहक संग ओ धर्म चर्चा करैत छलाह। ओहि समयमे गामक प्रतिष्ठित व्यक्तिमे ओ गनल जाइत छलाह।

गामक पुस्तकालयपर तरह-तरह केर खेलक सामग्री सभ सेहो लागल छल। किछु दिनक बाद एक-एककेँ ओ सभ टुटैत गेल आ क्रमश: नष्टभए गेल। पुस्ताकलयमे थोड़ेक समय धरि बहुत गहमा-गहमी रहैत छल। अखबार, रेडियो अथबा पुस्तक सभ सेहो ओहिमे छल। १९६२ ई.मे, जे चीन युद्धक समय छल, रेडियोसँ समाचार सुनबाक हेतु लोकक भीड़ लागि जाइत छल। एहि सभमे हमर गामक स्व. विश्वम्भर झाजीक गंभीर योगदान छल। दुर्भाग्यवश ओ बेसी दिन नहि रहि सकला। सन् १९६९ मे कमे बएसमे हुनकर देहावसान भेलाक बाद ई सभ गतिविधि नष्ट भए गेल।

गाम-घरक आस-पास एक-सँ-एक प्रतिभाशाली बच्चा सभ छल। ककरो स्वर बहुत नीक छलैक तऽ कियो पहलमानीमे निपुण छल। कियो मधुर गायन आ वाद्ययंत्रक प्रति आकर्षित छल तऽ कियो किछुमे...। मुदा परिवार वा स्कूलमे एहि सबहक विकासक संभावना नगण्‍य छल। परीक्षामे रटि-फटि कऽ नीक अंक अनलहुँ तऽ बड़ नीक अन्यथा सभ व्यर्थ..! एहन बच्चाकेँ नकारा घोषित कऽ देल जाइत छल। परिणामत: कएटा बच्चा जे जीवनक कतेको क्षेत्रमे अग्रगामी भए यशस्‍वी भए सकैत छलाह,ओ विषादपूर्ण जीवन जिबय लेल विवश भेलाह। हमर गामेक एहन कएटा बच्चा छल जिनकामे गेबाक बहुत सामर्थ्‍य छलनि। बिना कोनो प्रशिक्षण लेने जे ओ मैथिली गीत सभ गाबथि से बुझू सुनिते रहि जइतहुँ। मुदा हुनका सभकेँ कोनो प्रकारक संरक्षण, प्रशिक्षण नहि भेल। सभ कलान्तरमे गाँजाक सोंट लगबैत अपन-अपन स्वरकेँ नष्ट कए लेलथि।

बच्चामे हमरो हारमोनियम सीखबाक इच्छा भेल। जेना-तेना पैसाक प्रवन्ध कऽ मधुबनी जा कऽ अपनेसँ एकटा हारमोनियम कीनि अनलहुँ। गाममे एक गोटे हारमोनियम बजाएब जनैत छलाह। हुनकासँ हारमोनियम सीखए लगलहुँ कि गामक बुझनुक लोक सभ हमरा बाबूजीकेँ आबि शिकाइत केलकनि। शिकाइतो एना केलकनि जे ‘ई बच्चा तऽ दुरि भए रहल छथि। केहन बढ़ियाँ पढ़ैत छलाह। आ ताहिपर सँ ध्यान हटि गेलनि..!’ परिणाम भेल जे हम हारमोनियम सीखब छोड़ि देलहुँ। हालाँकि थोड़-बहुत जे हारमोनियम सीखि सकलहुँ, ओ अखनो अबिते अछि। मुदा ततबे...। जे कि किछु लय निकालि सकैत छी मुदा अखनो धरि हम ई नहि बुझि सकलहुँ से कोन तरहेँ हारमोनियम सीखब खराप होइत। खैर! जे हौउ, मुदा पढ़बै-लिखबैमे हमर बाबूजीकेँ बहुत रूचि रहनि, जे कि हरिदम उत्‍साहित करैत रहैत छलाह, आ से मात्र हमरे नहि, गामक आनो-आन बच्चा सभकेँ। बाबूजी जइले प्रेरित करैत रहथि, तकर फायदा तऽ भेबे कएल आ भइए रहल अछि। परीक्षा सभमे लगातार हमरा नीक अंक आयल। मुदा कहक माने जे परीक्षाक अंक अनबाक अतिरिक्त जीवनक अन्य आयाम थिक जकर बुझबाक, विकासक गाम-घरमे कोनो जोगार ने तहिया छल आ ने आइये भए सकल। ‘

भाग्यम फलति सर्वदा, न विद्या न च पौरुष:’

कहल जाइत अछि जे विधाता जन्मसँ पूर्वे मनुक्खक भाग्य लिखि कऽ पठा दैत छथि। हमर स्कूलक प्रयोगशाला कक्षमे उपरोक्त पाँति मोट-मोट अक्षरमे लिखल छल। जीवन यात्राक क्रममे घटित नाना प्रकारक घटना एवम् अनका-अनका जीवनक तथ्‍य दिस देखि, सुनि ई कथन एकदम सत्य लगैत अछि। एक आदमी जनमिते जीवनक समस्त सुख-सुविधा सम्पन्न भए जाइत अछि, दोसर तरफ कतेको एहन लोक छथि जे जीवन भरि जीबाक हेतु संघर्ष करैत रहि जाइत अछि। तकर माने ई नहि जे भाग्यपर छोड़ि कऽ आदमी कर्तव्यहीन भए जाए, आ कामना करैत रहि जाए जे- जे भाग्यमे हेतै से हेतइ। प्रयास तऽ करब उचिते अछि,मुदा ई बात मानि कऽ चलू जे सभ किछु अपने मोनक नहि भए सकैत अछि। जँ अपना मोनक हो तऽ नीक आ जँ अपना मोनक नहि हो तऽ आओर नीक। कारण ओहिमे ईश्वरक इच्छा सम्‍मिलित रहैत अछि। बेचैन रहलासँ बढ़ियाँ अछि जे नियतिकेँ स्‍वीकार कए मोनकेँ शान्त राखल जाए, कारण शान्त मोनमे विकासक अनन्त सम्‍भावना रहैत अछि।

बच्चाक दुनियाँ माए-बाप, काका काकी किंवा आस-पासक अन्य निकट सम्बन्धीक इर्द-गिर्द सिमटल रहैत अछि। ओकर सम्पूर्ण व्यक्तित्वक निर्माणमे परिवार आओर पारिवारिक परिस्थितिक गंभीर प्रभाव होइत अछि। आस-पासमे रहनिहार लोक एवम परिवेश सेहो ओकरा प्रभावित करैत अछि। निश्चित रूपसँ हम एहि मामलामे भाग्यवान रही। माता-पिता आओर पितामहक बहुत सिनेह आओर समर्थन हमरा भेटल।

९ भाए-बहिनक पैघ परिवारमे कखनो ई नहि भेल जे कियो किनकोसँ कम महत्वपूर्ण छल। सभपर बरोबरि ध्यान देल गेल। हमरासँ ज्‍येष्ठ पाँचटा बहिन छली। हुनका लोकनिक बिआह-दान एकटा दीर्घकालीन घटना क्रम छल। १०-१२ वर्ष लगातार घरमे बिआह, कोजागरा, मधुश्रावणी, द्विरागमन सहित नाना प्रकारक विध-ब्यवहार होइत रहल। एतेक भारी पारिवारिक जिम्‍मेदारीक अछैत माए-बाबूजी बहुत आशावादी आओर आस्थावान छलाह। हमरा निरन्तर आगू बढ़बाक हेतु प्रेरित करैत रहलाह। गामक लोकक आओर  परिवेशक सकारात्मक रूखि सेहो हमरा उत्‍साहित करैत रहल। ओ सभ प्रणम्य छथि, जिनकर स्मरण करैत-करैत हम ओहि गामसँ दूर रहितो सदिखन अपनाकेँ ओहीठाम अनुभव करैत रहैत छी।

◌





गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

दिल्‍ली आगमन   






दिल्‍ली आगमन   

दिल्‍ली एकटा ऐतिहासिक महानगर अछि। सौंसे देशसँ लोक जीवन-यापन हेतु एतए अबैत अछि। वर्तमान समयमे ई देशक राजनीतिक केन्‍द्र बिन्‍दु अछि। ऐठाम प्राचीन एवं आधुनिक सभ्‍यताक समागम अछि। पुरना दिल्‍लीमे अखनो मुगल समयक छाप भेट जाइत अछि। कुतुव मिनार, लाल किला,  हुमायुक मकबरा दिल्‍लीक अतीतक स्‍मरण करबैत अछि। ओत्तै मेट्रो रेल, नेहरू स्‍टेडियम, लोटस टेम्‍पल, बड़का बड़का मौल, फ्लाइ ओभर इत्‍यादि दिल्‍लीक आधुनिक कालक विकास यात्राक प्रमाण अछि।

पाण्‍डवक समयमे दिल्‍लीकेँ इन्‍द्रप्रस्‍थ कहल जाइत छल। ११९२ ई.मे दिल्‍लीपर मोहम्‍मद गोरीक कब्‍जा भऽ गेलइ। १२०६ ई.मे दिल्‍ली साल्‍तनक स्‍थापना भेल। १३९८ ई.मे तैमुरद्वारा दिल्‍लीपर आक्रमणक संग सल्‍तनक अन्‍त भऽ गेल। अन्‍तिम सल्‍तनक लोदी वावरसँ हारि गेला। १५२६ ई.मे पानीपतक लड़ाइक बाद मुगल साम्राज्‍यक स्‍थापना भेल। १८०३ ई.मे दिल्‍ली अंग्रेजक अधीन भऽ गेल। १९११ ई.मे भारतक राजधानी कलकत्तासँ दिल्‍ली आबि गेल।  

एहेन ऐतिहासिक रूपे समृद्ध शहर जेबाक, ओइठाम रहबाक एवं विकास करबाक इच्‍छा मनमे रहबे करए, अत: तीव्र अभिलाषाक संग हम दिल्‍ली विदा भेल रही। दिल्‍लीक विषयमे लोक सबहक तरह-तरह केर धारणा रहइ। बहुत दूर तँ छइहे। खर्चो-बर्च बढ़ि जेबाक अन्‍दाज सही छल। परिवारमे बहुत दिन धरि हम दिल्‍ली जाइ वा नहि जाइ, ऐ विषयपर चर्च होइत रहल। हमर पिताजीकेँ दिल्‍लीमे जा कऽ नौकरी करब एकदम पसिन नइ रहैन। दड़िभंगामे टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टर बनल रही से हुनका बेहतर बुझाइत रहैन। गामक लग रहब, भेँट-घाँट होइत रहत। पाइयो बाँचत इत्‍यादि...।

ओना, किछु हद तक हुनक सोच ठीके रहैन मुदा हम दिल्‍ली जाए चाही, कारण ओइठाम बेहतर भविसक सम्‍भावना बुझाइत रहए। प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा सबहक तैयारीक बेहतर अवसर भेट सकै छल। किछु दुरदर्शी लोकक मन्‍तव्‍य छेलैन जे दिल्‍ली अबस्‍स जेबाक चाही। ओइठाम वेहतर भविस हएत। धिया-पुताकेँ वेहतर शिक्षाक अवसर भेटत। अपनो आगू बढ़ि सकब। मुदा कहब छै जे ‘दिल्‍लीक लड्डू जे खेलक सेहो पछताएल आ जे नइ खेलक सेहो पछताएत।’ किछु हद धरि से सही।  

दड़िभंगासँ बरौनी होइत हम दिल्‍ली आएल रही। ऐसँ सन् १९७२ ई.मे पहिल बेर स्पेशल क्लास रेलवे अपरेन्टीसक संघ लोक सेवा आयोगक साक्षात्‍कारक क्रममे हम दिल्‍ली आएल रही। ओइ समयमे जे.एन.यू. दिल्‍ली स्‍कूल ऑफ इन्‍टरनेशनल स्‍टडीज रहइ। सप्रु हाउसमे हमर गौंआँक मित्र विद्यार्थी छला। हुनके संगे चारि दिन ओइ छात्रावासमे रहि कऽ शाहजहाँ रोड स्‍थितसंघ लोक सेवा आयोग जाइ छेलौं। सप्रु हाउसमे बहुत रास विदेशी विद्यार्थी सभ सेहो छला। हमरा ओइ वातावरणमे असोकर्ज होइत छल, अन्‍यथा ओइठाम बहुत सुविधा रहइ आ हमरा बहुत नीकसँ रखने रहैथ। दोबारा हुनकासँ भेँट नहि भेल। बादमे पता लागल जे ओ ऐ्एन्यू्मे प्रोफेसर भऽ गेल रहैथ।

२ अगस्‍त १९७७ ई.मे हम दिल्‍ली पहुँचल रही। हमर गामक कोरियानी टोलक एक गोरे दिल्‍लीमे रहै छला। रातिमे हुनके ओइठाम रहल रही। सम्‍भवत: ओ मंगोलपुरीमे रहै छला। एक्के पाँतिमे छोट-छोट केतेको घर सभ छल। बहुत रास लोक सभ। चारि बजे भोरे कियो चिकैर-चिकैर कऽ सभकेँ उठा रहल छेलइ। प्राय: ड्यूटीपर जेबाक हेतु। ३ अगस्‍त १९७७ ई.के हम पहिल बेर दिल्‍ली स्‍थित नार्थ ब्‍लॉकमे नौकरी ग्रहण केलौं। ओइ दिन बर्खा होइत रहै आ नार्थ ब्‍लॉक अबैत-अबैत हम अधभिज्‍जू भऽ गेल रही।

नार्थ ब्‍लॉकक वर्णन की कएल जाए। ब्रिटिश साम्राज्‍य द्वारा भारतपर शासन करबाक शक्ति केन्‍द्र छल नार्थ ओ साउथ ब्‍लॉक। हायसीना पर्वतपर बनल- एक तरफ विशालकाय राष्‍ट्रपति भवन आ दुनू समानान्‍तर ठाढ़ नार्थ ओ साउथ ब्‍लॉक।

सन्‍ १९११ ई.मे भारतक राजधानी दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरणक पछाइत दिल्‍लीक नवनिर्माणक जिम्‍मा लाइटनकेँ देल गेलैन। ओ राष्‍ट्रपति भवन (ओइ समयक भाइसराय हाउस) क निर्माण केलाह। हर्वर्टवेकर दच्‍छिन अफ्रिकासँ आबि कऽ हुनकर सहयोगीक रूपमे काज करए लगला।

नार्थ एवं साउथ ब्‍लॉकक निर्माणक जिम्मा वेकरकेँ देल गेल। कालान्‍तरमे दुनू गोटेमे मतभेद भऽ गेल। फाइटन चाहै छला जे नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉक वाइसराय हाउसक हिसाबसँ कम ऊँच बनै जइसँ राजपथसँ ओकरा अनचोके देखल जा सकइ। मुदा वेकरकेँ ई बात पसिन नहि छेल आ अन्‍ततोगत्‍वा वेकरेक चलल। नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉकक ऊँचाई भाइसराय हाउसक बरबैर राखल गेल।

भारतक राजधानी दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरणक बाद उत्तरी दिल्‍लीमे बनल अस्‍थायी सचिवालयसँ भारतक शासन चलल। ब्रिटिश भारतक विभिन्न भागमे कार्यरत कर्मचारी सभकेँ दिल्‍ली आनल गेल ओ गोल मार्केटमे हुनका लोकनिक आवासक निर्माण भेल।

पुरना सचिवालयमे बादमे दिल्‍ली सरकारक कार्यालय रहल। १९३१ ई.मे भारतक शासन नार्थ ब्‍लॉक, साउथ ब्‍लॉकसँ होमए लगल। ओही आसपास सन्‍ १९२१ ई.मे संसद भवनक निर्माण प्रारंभ भेल।

नार्थ ब्‍लॉक ओ साउथ ब्‍लॉकक निर्माण एक्के रंग अछि। भूतलक अलावा दू सतह आरो अछि। प्रथम तलपर सामान्‍यत: वरिष्‍ठ अधिकारी एवं मंत्रीगणक कार्यालय अछि। जखन सुरक्षा बेवस्‍थामे एतेक सख्‍ती नहि छल, तखन सामन्‍य आदमी नार्थ ब्‍लॉकक मुख्‍य द्वारासँ होइत आरपार निकैल जाइत छल। मुख्‍य द्वारसँ घुसिते अन्‍दर गोलाकार खाली स्‍थान अछि जइमे तापक्रम अपेक्षाकृत कम रहैत अछि आ गरमीमे लोक सभ ओइमे बैस कऽ सुस्‍ताइत अछि। आबक सुरक्षा परिवेशमे नार्थ ब्‍लॉक वा साउथ ब्‍लॉकमे प्रवेश बहुत कठिन काज थिक। 

यदि अहाँकेँ नार्थ ब्‍लॉकक भूगोलक सही जानकारी नहि अछि, तँ अपनेकेँ वौआ जाएब आसान बात अछि। विभिन्न स्‍थानसँ सरकारी काजसँ नार्थ ब्‍लॉक एनिहार अधिकारी लोकनिसँ केतेको बेर सम्‍बन्‍धित स्‍थान वा कक्षक जानकारी लैत देखिऐन। नार्थ ब्‍लॉक ठीक सामने बामा कातमे इण्‍डिया गेट अछि। नार्थ ब्‍लॉकसँ उतैर कऽ कनिक्के आगू बढ़ू तँ विजय चौक अछि, जेतए गणतंत्र दिवस समारोहक बाद वीटींग रीट्रीटक आयोजन कएल जाइत अछि।

नार्थ ब्‍लॉकमे पहिल बेर गेलाक बाद श्री विनय सेखडीजीसँ भेँट भेल जे हमरा आवश्‍यक कागत सभपर दस्‍तखत करा कऽ नव नौकरीमे पदभार ग्रहण करौलैथ। नार्थ ब्‍लॉकक पैघ-पैघ कक्षक अन्‍तहीन श्रृंखला देख हम गुम रही। केतौ कियो चिन्‍हारे नहि छल। किछु बुझल नहि छल। सत् पुछल जाए तँ हमरा ठक-विदरो (चक-विदोर) लागि गेल रहए। कार्यभार ग्रहण कऽ हमर बैसक  इण्‍डिया गेटक एकदम सामने पड़ै छल। कोठरीमे बैसले-बैसल इण्‍डिया गेट देखल जा सकै छल।

कखनो काल अवर सचिव महोदय ओइ कोठरीमे आबैथ आ कहैथ जे अहाँ केतेक भाग्‍यवान छी जे बैसले-बैसल इण्‍डिया गेटक दर्शन करैत रहै छी। ओइ समयमे अवर सचिवक बड़ धाक रहइ। हम तँ एतेक डराएल ओ अपसियाँत रहै छेलौं जे किछु काज करब कठिन छल। भारत सरकार लिखल देख कऽ होइत छल जे आब की हएत। भारत सरकारक मंत्रालयमे भारत सरकार नहि लिखल जेतै तँ आर की लिखल जेतइ? क्रमश: ई स्‍थिति सामान्‍य भेल।

गृह मंत्रालय, नार्थ ब्‍लॉकमे पदभार ग्रहण करबाक दौरान जे भेट भेल से क्रमश: दोस्‍तीमे बदैल गेल।  गोरनार, मेहनती एवं इमानदार अधिकारी छला श्री सेखडीजी। जलंधर शहरक निवासी छला आ योजना रहनि जे सेवा निवृत्तिक बाद ओहीठाम शेष समय बिताएब। हुनकर धिया-पुता सभ अति शिक्षित छेलखिन। मुदा संयोग देखू, निदेशक पदसँ सेवा निवृत्ति भेलाक चारि-पाँच मासक अन्‍दरे हुनकर स्‍वर्गवास भऽ गेल। एक दिन भोरे टहैल कऽ आएल रहैथ आ घर पहुँचते छातीमे दर्द भेलैन आ जाबे किछु लोक बुझितै ओ मरि गेला। सभ योजना धाएले रहि गेल। एहेन क्षणभंगुर जीवनक हेतु लोक कतेक योजना बनबैत रहैत अछि..! युधिष्‍ठिरक यक्ष प्रश्‍नक उत्तर जे निरन्‍तर मरैत देखितो लोक अपनाकेँ ओइ नियमसँ फराक बुझैत अछि! केतेक सटीक  अछि!

शेखरीजीक स्‍मरण सदैत होइत रहैत अछि ।हुनक असामयिक निधनसँ हमर एकटा मित्रे नहि अपितु एकटा नीक सलाहकार सदा सर्वदाक लेल अनन्‍तमे बिला गेल छल।

३ अगस्‍त १९७७ ई.के नार्थ ब्‍लॉकमे कार्यभार ग्रहण कऽ हम साँझमे अपन गौंआँक ओइठाम गेलौं। ओ मोतीनगरमे रहै छला। परिवारो संगे रहैन। एक्केटा कोठरी किरायापर लेने छला। अपना भरि पूरा सत्‍कार केलाह। रातिमे भोजनक बाद हम बाहर खाटपर सुति रहलौं। एकाध दिन अहिना बीतल। तेकर बाद वएह अपन मकान मालिकक एकटा फ्लैट मोती नगरमे किरायापर दिया देलैन।

दिल्‍लीमे आवासक बेवस्‍था भऽ गेला बाद आश्वस्‍त भेलौं। मोती नगरसँ नार्थ ब्‍लॉक ८० नम्‍बरक बस चलैत छल। ओइ समयमे बस नार्थ ब्‍लॉकमे एकदम नजदीक तक अबैत छल। उतरू आ दस डेग चलिते नार्थ ब्‍लॉकक अन्‍दर आबि जाउ।

ओइ समय दिल्‍लीक सुरक्षात्‍मक वातावरण आइ-काल्‍हि जकाँ नइ छल। मोती नगरमे राति-राति भरि लोक सभ अपन फ्लैटक आगाँ खाट लगा कऽ सुति रहै छल। मुदा हम कार्यालय, बाहर ओ घर सभठाम नव वातावरण, नव लोक एवम्‍ अलग जीवन शैलीक कारण अपसियाँत रही। कखनो-कखनो अफसोच होइत छल जे दड़िभंगाक नौकरी छोड़ि कऽ दिल्‍ली किएक एलौं?

मोतीनगरमे डेराक अगल-बगलक लोकसँ कोनो परिचय नहि छल। रातिके छतपर सुति रही। खाटपर सतरंजीक तरमे लोहाक डंडा नुका कऽ रखने रही जे जँ कोनो संकट औत तँ देखल जेतइ। एक राति एकटा पड़ोसी–सरदारजी–भेँट करए आएल। खाटपर बैसल की ओ लोहाक रौड निच्‍चाँ खसि पड़लै। ओकरा संशय बढ़ि गेलइ, जे की बात छिऐ? दोसर दिन भेनेओ हमर मकान मालिक ओतए पहुँचल। मकान मालिक ओकरा आश्वस्‍त केलकै तखन ओ चैन भेल।

कार्यालयमे अपन लेाक ताकबाक प्रयास करए लगलौं तँ वित्त मंत्रालयमे एकटा झाजी भेटला। बुढ़ लोक। मैथिलीमे बजबाक प्रयास कएल, मुदा ओ मैथिली नइ बुझथिन। कहला जे २-३ पुस्‍त पहिनहि हुनका लोकनिक पुर्वज गाम-घर छोड़ि जयपुरेमे बसि गेल रहैथ। हुनका मैथिली बुझए तँ अबैत छेलैन मुदा बाजि नहि सकैथ। हुनकर डेरा आर.के.पुरममे छल। ओत्तौ गेलौं। हुनकर परिवारमे सभ कियो मैथिली सीखए चाहैत छला, मुदा तेकर उचित सुविधा नहि भऽ रहल छेलैन।  किछु दिन बाद कोइलखक श्री आर.आर. झाजी नार्थ ब्‍लॉक, वित्त मंत्रालयमे भेटला। हुनकासँ गप करिते मोन बहुत आश्वस्‍त भेल। दड़िभंगा लगक हमरे नामधारी मिसरजी भेटला। हुनका सभसँ जे सम्‍पर्क भेल से अद्यावधि बनल अछि।

यद्यपि दिल्‍लीक धक्कम-धुक्काबला जिनगीसँ अपसियाँत रही, मुदा तत्‍काल कोनो विकल्‍पो नहि छल। जेतइ देखू, लोक पाँति बना कऽ ठाढ़ अछि। दूधक पाँति तँ चारि बजे भोरेसँ लागब शुरू भऽ जाइक। डी.एम.एस. दूध कनीक सस्‍त होइत छल। मुदा तइ हेतु टोकन लेमए पड़ैत छल जे आसान नहि छल। जेतइ जाउ तेतइ पाँति लागल लोक सभ भेटत। कार्यालयमे भरि दिन काज करू आ तेकर बाद शुरू भऽ जाउ पाँतिमे। बसमे चढ़बासँ पहिने पाँति लगाउ। जँ छुट्टी हेबासँ पाँच मिनट पहिने आबि गेलौं तँ आसानीसँ बसमे सीट भेट जाएत, नहि तँ ठाढ़े धक्का-मुक्की करैत घर पहुँचब। हमर अधिकारी एकटा मद्रासी छला। अपने बजैथ आ अपने बुझैथ।

दिल्लीक धक्कामुक्कीसँ हम तंग भय गेल रही।ओइ समयमे कर्मचारी चयन आयोगमे इलाहाबाद हेतु किछु लोकक पदस्‍थापना हेबाक रहइ। हम दर्खास्‍त देलिऐ आ हमर स्‍थानान्‍तरण ओइठाम भऽ गेल। सन्‍ १९७८ ई.क ९ जनवरीकेँ हम इलाहाबाद कर्मचारी चयन आयोग पहुँचलौं।

पाँच महिना धरि दिल्‍लीमे रहलाक बाद हम इलाहाबाद चलि गेल रही। ऐ अल्‍प अवधिमे दिल्‍लीक जानकारी प्राप्‍त करब आसान नहि। ओइठाम दिल्‍लीमे प्रदूषण चरमसीमापर छल। अकास धुआँसँ भरल रहै छल। रातियोमे तारा नहि देखल जा सकै छल। दिन भरि काज भेलाक बाद डेरा लौटैत-लौटैत कपड़ा सभ बेहद मैल भऽ जाइत छल। यद्यपि आब दिल्‍लीक जनसंख्‍या तहियाक तुलनामे बहुत बढ़ि गेल अछि, अपेक्षाकृत वायुमण्‍डल कम प्रदूषित अछि। अकास साफ देखाइत अछि एवं यातायातक बेवस्‍था (खास कऽ मेट्रोक कारण) बहुत बेहतर भऽ चूकल अछि। ओइ समयमे दिल्‍लीमे सरकारी आवासक बहुत पैघ प्रतीक्षा सूची छल।

२०-२५ साल नौकरी केलाक बाद जा कऽ सरकारी आवास भेटैत छल। बहुत रास बात सभ रहल हएत जे हम स्‍वेच्‍छासँ दिल्‍लीसँ स्‍थानान्‍तिरित भऽ इलाहाबाद चलि गेलौं। मुदा दिल्‍ली तँ दिल्‍ली थिक। सन १९८७ मे आपस स्‍थानान्‍तरण दिल्‍ली भऽ गेल आ फेरसँ अपनाकेँ एतए बेवस्‍थित करए पड़ल। प्राय: इलाहाबाद गेनाइ कोनो बहुत लाभकारी नहि रहल।

सन्‍ १९७७ क चुनाव हारि गेलाक बाद स्‍व. श्रीमती इन्‍दिरा गॉंधी अपन आवासपर सुलभ भऽ गेल रहथि आ बहुत रास लोक हुनकासँ भेँट करए हुनकर आवासपर जाइत छल। हमहूँ सभ अपन परिवारक संग इन्‍दिराजीक आवासपर गेल रही। ओतए कियो आम जनता बेरोक-टोक चल जाइत छल। हमहूँ सभ पहुँच गेल रही। मुदा संजोगवश ओ डेरापर नइ रहैथ। बाहरेसँ हुनकर आवास देख आपस भऽ गेलौं। तीन मूर्ति भवन, तेकर बगलमे बनल अन्‍तरिक्ष शाला, राजघाट, सफदरजंगक मकबरा, लोदी गार्डेन, नेहरू पार्क, कुतुबमीनार, लोटस टेम्‍पल, योगमाया मन्‍दिर इत्‍यादि सभ जगह घुमलौं। ओइ समयमे केतौ आएब-जाएब सुरक्षा दृष्‍ट्रिमे आसान छल। अस्‍तु, यथासाध्‍य हम मुख्‍य-मुख्‍य स्‍थान सभ देखलौं।

जनवरी १९७८ ई.क बात छी, ट्रेनसँ दिल्‍लीसँ इलाहाबाद विदा होइत बहुत आनन्‍दित भेल रही। संगे पत्नी ओ बच्‍चा सेहो। एवम्‍ प्रकारेण हम दड़िभंगासँ दिल्‍ली एलौं, मुदा किछुए मासमे इलाहाबाद चल गेलौं। इलाहाबादमे ९ बर्ख धरि रहला बाद मार्च १९८७ ई.मे दिल्‍ली आपस एलौं। मुदा ऐपर चर्चा फेर कखनो करब।

◌

दड़िभंगा प्रवास   




 




दड़िभंगा प्रवास   





दड़िभंगा आबि जाएब बच्‍चामे बड़ीटा बात होइत छल। रहिका बाटे चुनिन्‍दा बस छल। ओइ बसक समय बान्‍हल छेलइ। जँ ओ छुटि गेल तँ बाट तकैत रहू। टेकरक चलती आइ-काल्‍हि जकाँ तहिया नइ छल। मधुबनी बाटे दड़िभंगा जेबाक रेबाज नहि छल। दड़िभंगा जाइत काल हवाई अड्डा अबैत छेलइ। फटकीए-सँ बड़ीटा कारी, उज्‍जर रेघाबला झण्‍डा फहराइत देखाइत रहै छल। एकाध बेर ओइठाम छोट-छीन हवाई जहाज देखने रहिऐक। हवाई जहाज ओइ समय एतेक मात्रामे नहि चलैत छल। कहियो काल अकासमे हवाई जहाज देखाइत छल। बच्‍चा सबहक धियान अकस्‍माते ओइपर पड़ि जाइत छल।

पहिल बेर ट्रेनपर चढ़ि कऽ दड़िभंगासँ मुहम्मदपुर गेल रही। बाबू संगमे रहैथ। ट्रेनमे पहिल यात्राक स्‍मरण अखनो एकटा होइत रहैत अछि। ट्रेन चलै तँ डोलै रहै, आ हमहूँ सभ डोली। डरो होइत छल। नीको लगैत छल। साधरण किलासमे उड़ीसक भरमार रहैत छल।

दरभंगा द्वारवंगसँ बनल अछि। द्वार आ वंग माने वंगालक प्रवेश द्वारा (गेट वे ऑफ बंगाल) किछु गोरक कहब जे दरभंगा नाम द्वार ओ भंगासँ मिलि कऽ बनल अछि। १३२६ ईस्‍वीमे तुगलक आक्रमणक दौरान किलाघाटक आसपास किलाकेँ तोड़ि देल गेल रहए। १८६५ ईस्‍वी तक दरभंगा सरकार तिरहुतक भाग छल। तेकर बाद ई अलग जिला बनल। १८४५ ईस्‍वीमे दरभंगा सदर, १८४६ ई.मे मधुबनी, आ १८६७ ई.मे समस्‍तीपुर सवडिभीजनक निर्माण भेल। १९०८ ई. धरि दरभंगा पटना डिवीजनक हिस्‍सा छल। तेकर बाद ई तिरहुत डिविजनक हिस्‍सा भऽ गेल। १९७२ ई.मे मधुबनी, दरभंगा आ समस्‍तीपुर सवडिविजनकेँ अलग जिला बनि गेलाक बाद दरभंगा डिविजनक मुख्‍यालय बनि गेल।

दरभंगा महराज द्वारा बनौल गेल नरगौना पैलेश, आनन्‍दवाग भवन, बेला पैलेशक अतिरिक्‍त अनेको मन्‍दिर, तालाव एवं बाग-बगीचा दड़िभंगा शहरकेँ ऐतिहासिक महत प्रदान करैत अछि। श्‍यामा मन्‍दिर आस्‍थाक केन्‍द्र बिन्‍दु भऽ गेल अछि। मिथिला विश्वविद्यालय, अखिल भारतीय संस्‍कृत विद्यालय सहित अनेकानेक शिक्षण संस्‍थान दरभंगाक महत प्रदान करैत अछि।

दड़िभंगाक संगे बहुत रास स्‍मरण जुड़ल अछि। विद्यार्थी जीवनमे १९६८ सँ १९७२ तक दड़िभंगामे रही। प्राइवेट लॉज सभमे डेरा रहए। एक साल तक उमा सिनेमाक पाछाँ मिसर टोलामे उेरा रहए। ओना तँ मकान मालिक बहुत नीक लोक रहैथ आ गाहे-वगाहे मदैत सेहो करैथ, मुदा कोठरीमे बिजली जरैत देख ओ चिन्‍तित भऽ जाइ छला। बहुत राति धरि पढ़बाक कार्यक्रम होइत छल। हुनका चिन्‍ता होनि जे बिजली जरा कऽ सुति गेला। बगलक कोठरीसँ अवाज दैथ हम जोरसँ हूँ कहि कऽ ई बुझा दिऐन जे जगले छी। कएक बेर ऐ तरहक जखन भऽ जाइ तँ कहि दैथ-

“सुति जाह, आब बहुत राति भऽ गेल।”

असलमे हुनका हमर चिन्‍ता नइ रहैन, बिजली बेसी जरि रहल अछि, तइ चिन्‍तासँ परेशान भऽ जाथि। कारण बिजलीक शुल्‍क, कोठरीक किरायामे शामिल छेलइ।

किछु दिन पूनम सिनेमा हॉल लग एकटा प्राइवेट छात्रावासमे रही। ओइ समयमे पूनम सिनेमा हॉल बनियेँ रहल छल। ओइठामसँ दड़िभंगा टावर नजदीक छल। दयाल भंडारक चुरा, दही आ पेरा स्‍मरण करैत अखनो आनन्‍दित भऽ जाइ छी।


सी.एम. कौलेजक चर्चा होइ आ प्रो. शाहीजीक नाओं नहि आबए, से नहि भऽ सकैत अछि। शाहीजी रसायन शास्‍त्र विभागक अध्‍यक्ष छला। अनुशासनक मामलामे बहुत सख्त रहैथ। स्‍कूल जकाँ सबक देल जाइक। ऐगला किलासमे एक-एकटा विद्यार्थीक काज देखल जाइक, पूछताछ होइक। परिणामत: आर्गेनिक केमेस्‍ट्रीमे हम सभ पारंगत भऽ गेल रही आ परीक्षामे खूब नम्‍बर आएल। ओहि समयमे डॉ. एल. के. मिश्रजी प्रचार्य रहैथ। ओ अनुशासनक हेतु प्रसिद्ध छला।

सी.एम. कौलेजमे पढ़ाइक स्‍तर ओइ समयमे बढ़ियाँ छल। यद्यपि आन कालैज सभमे हड़ताल होइत रहैत छल, परीक्षामे नकल करबाक खबरि सेहो बरबैर अबैत रहै छल, मुदा सी.एम. कौलेज एकर अपवाद छल। तेकर श्रेय काफी हदतक प्राचार्य डॉ. एल. के. मिश्रजीक छेलैन। अनुशासनक मामलामे ओ टससँ मस नहि होइत छला। ओइ समयमे विज्ञान एवं कला संकाय सभ एक्के छल। विद्यार्थी सभ खूब मिहनतसँ पढ़ैत छला आ आगाँ नीक-नीक ठाम उच्‍चतर शिक्षण संस्‍थान सभमे नामांकन भऽ जाइत छेलैन। इलाकाक समान्‍य परिवारसँ अबैबला विद्यार्थी सबहक हेतु ई वरदान छल। हमहूँ जोर-सोरसँ परिश्रम कए इंजीनियरिंगमे प्रवेशक हेतु तैयारी केने रही। हमरा नीक नम्‍बर एबो कएल। ओइ समय नम्‍बरक आधारपर इंजीनियरिंगमे नामांकन भऽ जाइत छल मुदा हम कतिपय कारणसँ बहुत नीक नम्‍बर अनलाक बादो इंजीनियरिंगमे नामांकन नहि लऽ सकलौं। ई बात सन् १९६९ ई.क थिक। तेकर बाद सी.एम. कौलेजक भौतिक शास्‍त्र (प्रतिष्‍ठा) मे आगाँक पढ़ाइ करबाक निर्णय भेल आ ऐगला दू साल धरि ओहीमे लागल रहलौं।

डॉ. सी.के.आर. वर्मा भौतिकी विभागक अध्‍यक्ष रहैथ। विद्यार्थी सभमे हुनका वैज्ञानिकक मान्‍यता प्राप्‍त रहैन। कहल जाइत जे हुनकर रिसर्च विदेशी पत्रिकामे छपैत रहैन। कुल मिला कऽ शिक्षक सभ मेहनती छला। सामान्‍यत: क्‍लास खाली नहि जाइत। मुदा विषय-वस्‍तु ऐ तरहेँ नहि पढ़ाएल जाइ, जइसँ विद्यार्थीकेँ विषयक समझ होइक आ ओ ओइ विषयमे किछु मौलिक समझ उत्‍पन्न कऽ सकितए अपितु परीक्षामे अधिकाधिक नम्‍बर अननाइ मूल लक्ष्‍य छल। एकटा अध्‍यापक तँ पूरा नोट पढ़ैथ आ विद्यार्थी ओकरा लिखि लिअए। केतेको प्राध्‍यापक सभ ट्यूशन करैत छला। बहुत रास विद्यार्थी ट्यूशन पढ़ैथ, ऐ लोभ सँ जे प्रैक्‍टिकलमे खूब नम्‍बर दिया देता। मुदा किछु प्राध्‍यापक एकर अपवादो रहैथ। ईमानदारी ओ मिहनतसँ पढ़ाइ कराबैथ। चेष्‍टा करैथजे विद्यार्थी सभकेँ विषय-वस्‍तुमे पैठ होइक। मुदा ओहन शिक्षक कम रहैथ। डॉ. एल.के. मिश्रजी केँ प्राचार्य पदसँ हटि गेलाक बाद कौलेजमे अराजकताक महौल आबि गेल। पढ़ाइ-लिखाइ चौपट। परीक्षा बेवस्‍था तँ तेना चरमराएल जेकर चर्चो करब लज्ज्‍यास्‍पद। कएक सालक पछाइत नागर्माण आइ.ए.एस. अधिकारीकेँ बिहार विश्वविद्यालयक उप कुलपति बनौल गेल, तेकर बाद हालत सुधरल।

बी.एस-सी. आनर्सक लिखित परीक्षा समाप्‍त भेला बाद गाम आबि गेल रही। गाममे हमरा बड़ नीक छल। अधिकांश पढ़ाइ, लिखाइ हम गामेमे करै छेलौं, आ तइमे कोनो असुविधा नहि होइत छल। बेसी एकान्‍तक प्रयोजन हो तँ नवका पोखैरपर भालसरी गाछ तरक छाहैर लग चल जाइत रही।

प्रैक्‍टिकल परीक्षाक तिथि घोषित नइ भेल छल। गाममे रहि कऽ कहीं परीक्षा छुटि ने जाए से चिन्‍ता हुअ लगल छल। मुदा से नहि भेल। सही समयपर अपन ग्रामीण (जे ओही कौलेजमे विद्यार्थी रहैथ)क माध्‍यमसँ प्रैक्‍टिकल परीक्षाक कार्यक्रमक सूचना भेटल आ सही समयपर हम ओइमे भाग लऽ सकलौं। परीक्षो नीक भेल। समय-साल ओतेक खराप रहितो, बिना कोनो अतिरिक्‍त प्रयाससँ हमरा ठीक-ठाक नम्‍बर आएल।

बी.एस.सी. लिखित परीक्षाक दौरान हमर डेरा दोनार पोखैरक कातमे छल। ओइमे आरो कएकटा विद्यार्थी सभ छला। ओइ समयमे भारत-पाकिस्‍तानक युद्ध चलि रहल छल। १६ दिसम्‍बरकेँ भारतीय फौज बंगला देश जीत चूकल छल आ ओही दिन हमर लिखित परीक्षा समाप्‍त भेल रहए। ई एकटा अद्भुत संजोग छल।

बादमे हम टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टरक नोकरी करबाक क्रममे टेलीफोन एक्‍सचेंज लहेरियासरायमे ट्रेनिंगपर रही आ बलभद्रपुरमे डेरा रहए। अपेक्षाकृत शान्‍त ओ स्‍वच्‍छ मोहल्‍ला छल। सामनेमे पोखैर। कनिक्के दूर हटि कऽ एक्‍सचेंज रहइ। टेलीफोन एक्‍सचेंजमे अधिकाश काज हाथेसँ (मैनुअली) होइत छेलइ। ट्रेनिंगक पछाइत किछु दिन जमशेदपुर, फेर सुपौलमे काज केलाक बाद ३जून १९७५ केँ डीहरी ऑफिस दड़िभंगा आबि गेलौं।

डीइटी ऑफिस कादिराबादमे छल। बस स्‍टैण्‍डसँ डीहरी ऑफिस पएरे आएब-जाएबक क्रममे दड़िभंगा राजक महलमे बनल ललित नारायण विश्वविद्यालसँ जेबाक रस्‍ता रहइ। एतेक सम्‍पन्न महाराजक एहेन दुर्गति भेल से सदिखन सोचाइत रहै छल। ओ चाहितैथ तँ दड़िभंगाक एवं ओइठामक लोकक आइ दोसर भविस रहैत। तथापि महाराज रामेश्‍वर सिंहक चितापर बनल श्‍यामा मन्‍दिर सबहक श्रद्धाक केन्‍द्र बनल अछि आ भक्त लोकनिक निरन्‍तर प्रवाह ओतए देखल जा सकैत अछि।

सन्‍ १९७७ मे जखन केन्‍द्रिय सचिवालय सेवामे संघ लोक सेवा आयोगक माध्‍यमसँ हमरा चयनक बाद गृह मंत्रालयसँ नियुक्ति पत्र भेटल तँ हम दड़िभंगामे टेलीफोन इन्‍सपेक्‍टरक काज करैत रही। बेलामे हमर डेरा छल। हमर मकान मालिक दड़िभंगा राजमे खजांची छला। सोचल जा सकैत अछि जे अपन समयमे हुनकर केतेक चलती रहल होएत। तखन तँ ओ वृद्ध भऽ गेल रहैथ। आर्थिक हालत झूस भऽ गेल रहैन। मकानक एक भागमे अपने सपरिवार रहैथ आ तीनटा कोठरीमे तीनटा किरायेदार छल जइमे एकटा हमहूँ रही। घरक पाछाँमे बड़ीटा पोखैर छल। ओइमे कहियो-कहियो स्‍नान करए जाइत छेलौं अन्‍यथा अधिकांशसमय बेल पैलेशक अन्‍दरस्‍थित पानिक टोंटी रहइ, ओइमे भोरे-भोर स्‍नान करी। डी.ई.टी. दरभंगा कार्यालयमे लेखाधिकारी श्री एस.पी.चटर्जी महोदयक सरकारी आवास ओहीठाम छल। ओ भोरे-भोर स्‍नान-ध्‍यानक पछाइत नित्‍य पाठ करैत रहै छला।

दड़िभंगाक बेला स्‍थित हमर डेराक कनियेँ हटि कऽ उत्तर दिस डॉ. लखन झाजी रहैत छला। कहियो-कहियो हुनका ओइठाम सेहो जाइत रही। घरमे पुस्‍तक भरल छेलैन। असगरे ओ ओइ घरमे रहैत छला। अपने भोजन बनबैथ, अपने सभ काज करैथ। डॉ. लखन झा बी.ए. पास केला बाद अक्‍सफोर्ड विश्वविद्यालयमे एम.ए.क हेतु आवेदन देलखिन। हुनकर साक्षात्‍कारसँ प्रभावित भऽ एम.ए. पासक डिग्री दऽ देल गेलैन आ सोझे पी.एच-डी.मे प्रवेश भेटि गेलैन।

डॉ. लखनजी कर्पूरी ठाकुरजीक संगी रहथिन। ओ जय प्रकाश नारायणजीक संग समाजवादी आन्‍दोलनसँ जुड़ल छला। कर्पुरी ठाकुरजी जखन बिहारक मुख्‍यमंत्री भेला तँ हुनका (लखनजीकेँ) ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयमे उप कुलपति बनौल गेल। ओ मात्र एक टका दरमाहा लैत छला आ खराउँ (खराम) धोती पहीरि कऽ विश्वविद्यालय जाइत छला। हुनकर कार्यकालमे दड़िभंगा महाराजक बनौल ऊँच-ऊँच देबालकेँ आधासँ अधिक ढाहि देल गेल। पता नहि, ऐसँ समाजक की उपकार भेलइ..! बादमे ओ वेलाक घर खाली करि कऽ अपन गाम रसियारी चलि गेला।

सन्‍ १९७७ मे आपत्तिकालक बाद केन्‍द्रमे जनता दलक सरकार बनल रहइ। ओही समयक बाद हमरा दिल्‍ली जेबाक रहए। दिल्‍लीक नोकरीमे जाइ की नहि, से असमंजसमे रही। ओइ समयमे दिल्‍ली जाएब औझुका जकाँ आमबात नहि छल। कियो-कियो दिल्‍ली जाइत छल। दिल्‍ली चलि जाएब से सोचि बेलाक डेरा छोड़ि देने रही। तेकर बाद किछु दिन अपन गौंआँ एवं मित्र नारायणजीक संगे दड़िभंगा महराजक रामवाग स्‍थित काली मन्‍दिर लग बनल कोठरीमे रहलौं। काली मन्‍दिर ओइ समयमे सुन्न लगैत छल। पचाढ़ीक पुजारी छला मन्‍दिरमे। ओ भोरेसँ भाँग घोरए लगैत छला। मन्‍दिरक आगाँमे पोखैर छल। ओहीमे स्‍नान कऽ भगवतीक आराधनाक सौभाग्‍य भेटैत छल। किछुए दिन ओइ डेरामे रहलाक बाद असमंजस दूर कऽ दिल्‍ली जेबाक निर्णय कएल आ दड़िभंगाक नोकरीसँ इस्‍तिफा दऽ देल। तद्दुपरान्‍त ३१ जुलाइकेँ (१९७७) दिल्‍ली विदा भेलौं।दड़िभंगाक नोकरी छोड़ि कऽ दिल्‍लीमे नोकरी करबाक निर्णय आसान नहि छल। जकरेसँ पुछिऐ, सएह तरह-तरह केर तर्क लऽ कऽ अस्‍थितर भऽ जाइत छल। मुदा किछु गोरेक स्‍पष्‍ट मत रहैन जे भविसक दृष्टिये दिल्‍ली जाएब बेसी नीक रहत। तखन हम दिल्‍ली विदा भेल रही।

ओइ दिन दड़िभंगा टीशनपर ट्रेन पकड़ए गेल रही तँ मेघसँ सम्‍पूर्ण अकास अच्‍छादित छल। टिपिर-टिपिर पानि पड़ैत छल।दड़िभंगा टीशनपर स्‍व रामनन्‍दन मिश्र एवं स्‍व. नूनू बच्‍चा सहित कएक गोरे हमरा विदा केने रहैथ।  स्‍व. रामनन्‍दन मिश्रजी एवं स्‍व. नूनू बच्‍चासँ बड़ीकाल धरि गप होइत रहल। ओ दुनू गोरेक बीच जे आपसी छेलैन ओ गाममे सभ जनैत अछि। रामनन्‍दन मिश्रजी कुशाग्र बुधिक एवं संस्‍कार सम्‍पन्न बेकती छला। हमरासँ हुनका बहुत लगाव रहैन। जमशेदपुरमे हम टेलिफोन इन्‍सपेक्‍टर रही तँ ओ जँ ओइठाम अबैत छला तँ बिना भेँट केने आपस नहि होथि। दिल्‍ली एलाक बादो ई क्रम बनल रहल। हमर जीवन-संघर्षक यात्रामे ओ सकारात्‍मकताक सम्‍वर्धक छला। निरन्‍तर विकास करैत रहला आ अपन सन्‍तान सभकेँ सुन्‍दर संस्‍कार देलखिन। जइसँ हुनकर परिवार गामेमे नहि, इलाकामे प्रतिष्‍ठित अछि।

कनीकालक बाद गाड़ी आबि गेल आ हम बरौनी होइत दिल्‍ली हेतु प्रस्‍थान केलौं।

दड़िभंगा टावरपर परुकाँ गेल रही। ४५-४६ बर्खक बादो ओहिना बुझि पड़ल। दतमैन बिकाइत, चाह बिकाइत, आस-पासमे ओहिना रिक्शा...। गन्‍दगीक तँ ई हालत रहैत जे जँ भोरे-भोर टावारपर पहुँच जाएब तँ ठाढ़ नहि रहि सकब। आस-पासक सभटा कूड़ा-करकट ओत्तै जमा कएल जाइत अछि आ ओतए-सँ दस बजेक आस-पास नगरपालिकाक गाड़ीमे ओकरा उठौल जाइत अछि। ओइ भयावह दुर्गन्‍धसँ भगवान दड़िभंगा टावरकेँ मुक्ति दैथ से प्रार्थना।

घुमैत-घुमैत सी.एम. कौलेजक अन्‍दर सेहो गेल रही। थोर-बहुत परिवर्तन भऽ गेल अछि। अन्‍दरमे किछु नव भवन बनि गेल अछि। कामेश्‍वर भवन ओहिना। आस-पासक विभाग सभ जस-के-तस।

काली मन्‍दिरक पासमे आब होटल बनि गेल अछि। चाहरदिवारीक अन्‍दर बहुत रास तरह-तरहक दोकान सभ खुजि गेल अछि। लोक सभ जमीन कीनि अपन घर बना लेलक अछि। एक हिसाबे ओइठाम एकटा जन क्रान्‍ति भऽ चूकल अछि। किछु दिन पूर्व हम ओइ होटलमे ठहरल रही। प्रात: भेने मन भेल जे दोबारा जा कऽ मन्‍दिर परिसरकेँ देखी। सएह केलौं। ओइठाम जा कऽ भगवतीक दर्शन केला पछाइत बगलमे बनल कोठरी दिस बढ़लौं। ओकर स्‍वरूप बहुत बदैल चूकल छल। एकटा वृद्ध भीतरसँ निकलला। बहुत उत्‍सुकता पूर्वक हम कहलिऐन जे ३७ बर्ख पूर्व हम अहीठाम रहै छेलौं। मुदा हुनकर गप ओ गप्‍पक तौर-तरीका सुनि क्षुब्‍ध रहि गेलौं।

हुनका भेलैन जे कहीं हुनकर ओइठाम रहबाक अधिकार पर आक्रमण तँ ने भऽ रहल अछि? हम कहलिऐन जे ऐ मन्‍दिरपर पहिने पचाढ़ीक पण्‍डितजी रहैथ। तँ ओ बजला-

“रहल हेता।”

फेर हम कहलिऐन-

“हमहूँ ऐ बगलबला कोठरीमे रहैत रही।”

ई सुनिते जेना हुनक धैर्यक सीमान टुटए लगलैन। बहुत क्षुब्‍ध होइत बजला-  

“तँ केहेन .............।”



शनिवार, 28 जनवरी 2017

चाह पीवि लिअ   



भोरमे उठिते पहिल चीज जे धियानमे अबैत अछि, से थिक चाह। कएक बेर मन होइत अछि जे भोरुका सभ काज–जेना टहलब, नहाएब–छोड़ि दी आ चाह पीवि ली। फेर देखल जेतइ। चाहक आगमन देख मनमे हुलास भऽ जाइत अछि। चाहक एक-एक घोंट जेना शरीरक भीतर जाइते उत्‍साहित करए लगैत अछि। नव-नव गप फुरए लगैत अछि। चाहकेँ भफाइत देख उत्‍साहसँ मन भरि जाइत अछि। ई क्रम सालोसँ चलि रहल अछि।

आब तँ भोरक आकर्षणे भऽ गेल चाह, अर्थात मॉरनिंग टी। चाहक भाफ जेना आगॉं बढ़ि कऽ कहैत हुअए-

“गूड मॉरनिंग।”

चाहक स्‍वादक वर्णन करब कठिन अछि। ओकर अन्‍दाज तँ चाह पीलेसँ भऽ सकैत अछि। चाह पीबू आ टनटना जाउ। कनीकालक लेल चिन्‍ता-फिकिरसँ मुक्ति भऽ जाइत अछि, कारण मन चाहक संगे गपमे ओझरा जाइत अछि।

चाह आइ-काल्‍हिक सभ्‍यताक अभिन्न अंग बनि गेल अछि। केकरो ओतए जाउ, चाहक आग्रह अबस्‍स हएत आ जँ से नहि भेल तँ कहक विषय भऽ जाएत जे चाहो नइ पुछलकै। कोनो बैसार हौउ, ओइमे चाह अबस्‍से परसल जाएत।

पहिने गाममे चाहक एतेक प्रचार नहि छल। माने ग्रामीण क्षेत्र ऐसँ बाँचल छल। हमरा गाममे चौकपर दोकान सभपर चाह भेटै आ लोक सभ ओत्तै चाह पीबैत छला। गामक अधिकांश घरमे चाह नहि बनैत छल। मुदा आब समय बदलल। चाह घरक अभिन्न अंग बनि गेल अछि।

बहुत दिन धरि हम चाह नहि पीबैत छेलौं। बादमे नौकरी पकड़ला पछाइत भोर-साँझ चाह पीबए लगलौं। क्रमश: एकर संख्‍या बढ़ैत गेल। नार्थ ब्‍लौक, दिल्‍लीमे पोस्टींगक क्रममे कॉफीक चलन बढ़ल। सस्‍ता ओ सुलभ रहबाक कारण दिनमे कएक बेर कॉफी भऽ जाइत छल। संगे टी बोर्डक  चाह सेहो उपलब्‍ध छल। दूध, चीनी, चाह फराक-फराक देल जाइक। अपन रूचिक अनुसार चाह बना लिअ। चीनी कम दिअ, पत्ती कम पड़ि गेल, आदि-आदि झंझटसँ मुक्ति।

हमर एकटा अधिकारी (आए.ए.एस.) चाहक बड़ शौकीन छला। हुनकर कार्यालयमे चाह बनेबाक पूरा सरंजाम रहैत छल। आध-आध घन्‍टापर ओ चाह पीबैथ। हुनका लगमे तरह-तरह केर चाहक पत्ती रहै छेलैन। कोन समयमे केहेन चाह बनत सभ तँइ छल। जे कियो ओइ समयमे पहुँच गेल, तिनका सेहो ओइ चाहमे स्‍वत: भागी बनौल जाइत छल।

कालक्रमे दुपहरियाक बाद चाह पीअब हम छोड़ि देलौं। तेकर कारण रातिक निन्नक दिक्कत छल। कएक ठाम पढ़लौं जे चाहमे कैकीन होइत अछि, जेकरा पचबामे बारह घन्‍टा लागि जाइत अछि आ ओ निन्नमे बाधक भऽ सकैत अछि। ई बात केतेक सही अछि से नहि कहि, मुदा हम दुपहरियाक बाद चाह पीअब छोड़ि देलौं। मुदा भोरक जबरदस कपसँ चाह पीबए लगलौं। एक्के कपमे सामान्‍य कपक चारि- पाँच कप आबि जइतैक। एकबेर हमर ग्रामीण ओइ कपसँ चाह पीबैत देख अबाक् रहि गेला। मुदा कालक्रमे चाहक मात्रा कम भऽ गेल।  

चाह कम कऽ देला पछाइत बैसार सभमे किंवा कोनो आगन्‍तुक संगेचाह नहि पिलापर निर्विवाद रूपसँ चर्चाक विषय भऽ जाइत अछि। ई जे चाह किएक नहि पीबैत छी। कनिक्के पीवि लीअ। चाह तँ नीक चीज छै। आदि-आदि। केकरा-केकरा बुझैबै जे हम चाह मात्र भोरुके पहरटा मे पीबै छी। दुपहरियाक बाद नइ पीबै छी। कारण, निन्नमे दिक्कत भऽ जाइत अछि।

..तँ हम समाधान तकलौं जे जे कियो चाहक आग्रह करैथ से मानि ली। हुनका संगे चाह पीब शुरू करी, आ थोड़ेकालक बाद राखि दी। हँ, ऐमे चाहक बेरबादी तँ होइ छल मुदा एकटा सद्य: लाभ होइत छल जे बिबादसँ बँचि जाइ छेलौं। क्रमश: लोक सभ ई बात बुझि गेल आ हमरा संग चाहक आग्रह कम भऽ गेल। चाहसँ निन्नक कमी होइत अछि की नहि मुदा हम चाह पीअब कम कऽ देलौं। मुदा केते गोरेकेँ सुतबासँ पूर्व चाहक आदत होइ छैन आ तेकरबाद ठाठसँ सुतैत देखै छिऐन। जे होइ मुदा चाह चाहे थिक।

चूँकि चाहक संख्‍या कम भऽ गेल छल तँए हमर प्रयास रहैत छल जे चाह उम्‍दासँ उम्‍दा होइक। तइले हम चारूकात चाहक पत्ती तकैत रहलौं। किछु दिन तँ हमर एकटा मित्र सिलीगुड़ीसँ चाह अनैत छला, मकाइवाड़ीक चाह, जेकर सुगन्‍ध अद्भुत ओ आनन्‍ददायी छल। बादमे हुनकर स्‍थानान्‍तरण भऽ गेल एवं ओ चाह ताकबाक हेतु हम केतेको प्रयास केलौं। कर्नाट पलेस दिल्‍लीक केतेको दोकानपर केतेको प्रकारक चाह अनलौं। ओही क्रममे केपचु रेडलेवल चाह तकलौं। ओइ चाहक स्‍वाद एवं सुगन्‍ध हमरा सभकेँ पसिन भेल आ बहुत दिन धरि ओ चाह चलल। बादमे ओइ चाहक अभाव रहय लागल। दोकान सभपर कएक बेर भेटिते ने छल। तइ क्रममे लोदी कालोनीक मेन मार्केट स्‍थित चाहक थौक विक्रेताक पता लागल। ओ चाह विक्रेता योग्‍य बेकती छला एवं मधुबनी सहित इलाकाक आन-आन स्‍थानक जानकारी सेहो रखैत छला। हुनकर दोकानपर चाह किनबाक क्रममे गप-सप्‍प होइत छल जइसँ बुझाएल जे ओ बहुत योग्‍य बेकती छला एवं दुनियाँक अनेको देश घुमल छला। किछु दिनक बाद जखन हम फेर चाह लेबए ओतए गेलौं तँ पता लागल जे ओ गुजैर गेला। अचानक हृदयाघात भेलैन आ ओ नहि बँचि सकला। ऐ घटनासँ बहुत दुख भेल। तेकर बादो हम ओइ दोकानपर जाइत रहलौं मुदा बादमे लोदी कालोनीक डेरा छुटलापर आवागमन कम भऽ गेल आ तेकर बाद केपचु छुटि गेल।

पानिक बाद चाह दुनियाँमे सभसँ बेसी प्रचलित पेय अछि। आम धारणा अछि जे चाह कएक प्रकारक बिमारीसँ निजात आनि सकैत अछि। कहल जाइत अछि जे चाह रक्त चाप कम करैत अछि। हृदयक हेतु ई नीक अछि। चाह एन्‍टीऑक्‍सीडेन्‍ट सेहो होइत अछि। मुदा चाहपर भेल अनुसन्‍धानमे पाओल गेल जे ऐमे कीटनाशक औषधिक मात्रा सामान्‍यत: अधिक रहैत अछि। बहुत रास चाहक पत्तीकेँ नीकसँ धोल नहि जाइत अछि आ डिब्‍बामे बन्‍द कऽ देल जाइत अछि, जइसँ कैंसर हेबाक डर रहैत अछि। कएक बेर चाहमे सुगन्‍ध करक हेतु हानिकारक रसायन मिला देल जाइत अछि। कएक बेर चाहक पुड़ियामे राखल रहैत अछि। ओइ पुड़ियाकेँ गरम पानिमे डुबा कऽ चाह बनौल जाइत अछि। ओइ क्रममे चाहमे प्‍लास्‍टिकक पुड़ियासँ हानिकारक तत्व मिलि जाइत अछि। किछु अवगुणक चर्चाक अछैतो चाहक प्रेमीक संख्‍या अपार अछि। चाहक समाजिक-सांस्‍कृतिक योगदान केकरा नहि बुझल अछि। कोनो बैसार बिना चाहक नहि होइत अछि। चाह परक चर्चा तँ प्रसिद्ध भऽ गेल अछि। चाहक केतेको प्रकार अछि। हरियर, कारी किंवा औषधीय (हर्वल) चाह। अपन-अपन पसिनक अनुसार लोक एकर चुनाव करैत अछि। कारी चाह पिलासँ दाँतमे खोधैरसँ बँचाव होइत अछि। हरियर वा कारी चाह पिलासँ हृदयाघातक संभावना २१ प्रतिशत कम भऽ जाइत अछि। एक वा दू कप कारीचाह विपैबला बेकतीकेँ टाइप टू मधुमेह हेबाक संभावना ६० प्रतिशतकम भऽ जाइत अछि। कारी चाह तनाव बढ़बैबला हारमोन कम करैत अछि। ऐमे विद्यमान अल्‍कलामाइन एन्‍टीजेन रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़बैत अछि।

कहल जाइत अछि हरियर चाह कारी चाहसँ बेसी गुणकारी होइत अछि। तेकर कारण एकर बनबक क्रियामे फरमेन्‍टेसन नहि हएब थिक। हरियर चाहमे एन्‍टीऑक्‍सीडेन्‍ट एवं पोलीफेनोल अधिक रहैत अछि। कहल जाइत अछि जे चीनक द्वितीय राजा सेन तुँग सन्‍ २७३७ इसा पूर्व चाहक अविष्‍कार केलैन। उबलैत पानिमे संयोगसँ किछु पत्ती उड़िया कऽ पड़ि गेलइ। ओ पीवि कऽ हुनका बहुत नीक स्‍वाद लगलैन।

दुनियाँ भरिमे चाहक करीब-करीब १५०० प्रकार उपलब्‍ध अछि जे मूलत: छह प्रकारक पत्तीसँ बनौल जाइत अछि। अमेरिकामे कारी चाहकेँ लाल चाह कहल जाइत अछि।

१७०० ईस्‍वीक आसपास ब्रिटेनमे चाह लोकप्रिय पेय भऽ गेल।

अफगानिस्‍तान एवं इरानक राष्‍ट्रीय पेय चाह थिक।

दुनियाँमे सभसँ बेसी चाह आयरलैंडमे पीअल जाइत अछि।

प्रतिवर्ष औसतन तीन कड़ोर टन चाहक उपज होइत अछि। ब्रिटिस इस्‍ट इण्‍डिया कम्‍पनीक प्रभाव बढ़िते भारतमे चाहक व्‍यापारिक उत्‍पादन बढ़ल। ओइ समयमे बहुत रास उपजाउ जमीनकेँ चाहक उत्‍पादनमे लगा देल गेल। टी वोर्ड द्वारा सन् १९२० ईस्‍वीक आसपास चाहक विज्ञापन जोर-सोरसँ कएल गेल। आइ-काल्‍हि भारत दुनियाँक सभसँ अधिक चाहक उपज करैबला देशमे सँ एक अछि। देशमे उपजल ६० प्रतिशत चाह एत्तै खपत भऽ जाइत अछि। विश्व प्रसिद्ध आसाम एवं दार्जिलीग चाह सेहो अहीठाम उपजैत अछि। मनीराम देवान (१८०६-१८५८) प्रथम भारतीय चाह उत्‍पादक छला एवं आसामी चाहक व्‍यापारिक उत्‍पादनक श्रेय हुनके जाइत अछि।

दार्जिलीगमे चाहक उत्‍पादन१८४१ ईस्‍वीमे आर्थर कैम्‍पवेल द्वारा प्रारंभ भेल। ओ सिविल सार्जन छला। काठमाण्‍डूसँ १८३९ ईस्‍वीमे हुनका स्‍थानान्‍तरण दार्जिलीग भऽ गेल। १८४१ ईस्‍वीमे ओ चीनक चाहक बीज दार्जिलीगमे लगेला आ क्रमश: ओकर व्‍यापारिक उत्‍पादन प्रारंभ भेल।

चाहक स्‍तुतिमे तरह-तरहक बात कहल गेल अछि। विलियम एवार्ट ग्‍लैडस्‍टोनक निम्‍नलिखित पाँति उद्धरणीय अछि-

“If you are cold, tea woll warm you

If you are too heated, it will cool you,

If you are depressed, it will cheer you,

If you are excited, it will calm you.”

कहक माने जे चाह सर्वगुणी अछि। चाह कोनो दुख दूर कऽ सकैत अछि। सुखक वर्षा कऽ सकैत अछि। The book of Tea केर लेखक जापानी विद्वान एवं कलाकार Okakura Kakuzo  कहै छैथ-

“Tea is a raligion of the art of life”

कहक माने जे चाहक चुस्‍कीक संग जीवनक रंग बदैल सकैत अछि। जीवनक समस्‍याक समाधान भऽ सकैत अछि।

रूसक विद्वान उपन्‍यासकार Fyodor Melehalouich Postyevaky कहने छैथ-

“I say let the world go to hell, but

I should always have my tea.”

जे हेतै से हेतै, मुदा पहिने चाह पीवि ली।

उपरोक्‍त कथानक सभ चाहक उपयोगिताकेँ प्रमाणित करैत अछि। गरीब, धनीक, गाम, शहर सभठाम भोर होइते चाहक सुमार होइत अछि। दड़िभंगा टावर हो वा तिरुपतिक धर्मशाला, सभठाम भोरे-भोर चाह उपलब्‍ध भऽ जाइत अछि।

एतेक प्रसिद्ध एवं सर्व व्‍यापी चाहक बिक्री केनिहार अधिकांश बेकती गरीब परिवेशसँ अबै छैथ। गाम-घरसँ भागि अपन भविसक निर्माण हेतु पैघ शहर जेना- दिल्‍ली, मुम्‍बई, अबै छैथ। सालो फुटपाथपर चाह बेचैत रहि चाइ छैथ मुदा हुनकर आर्थिक स्‍थितिमे सुधार नहि भऽ पबैत अछि। ई अलग बात अछि जे भारतक वर्तमान प्रधानमंत्री बचपनमे चाह बेचै छला मुदा एहेन भाग्‍यवान कम होइ छैथ।

दिल्‍लीक आइ.टी.ओ.क आसपास रोडक कातमे सालोसँ चाह बेचनिहार श्री लक्ष्‍मण राव केर कथा फराक अछि। चाहक दोकान करैत ओ लगातार लेखनक काज सेहो करैत रहै छैथ। अखन धरि २४ टा पोथी लिखि चूकल छैथ।

चाह बेचनाइक संग अपन लिखल पोथी सेहो बेचैत रहै छैथ। ओ मैट्रिक पास करि कऽ चाह बेचनाइ प्रारंभ केला। फेर बी.ए. केला। निरन्‍तर लिखैत रहला मुदा चाहसँ हुनक लगाव बनल रहल। मुदा अधिकांश चाह विक्रेता अहिना भाग्‍यवान नहि होइ छैथ। जीवन पर्यन्‍त चाह बेचैत-बेचैत ओ जहिना-तहिना रहि जाइ छैथ।

जीवन अद्भुत अछि। कहि नहि जीव केतए-सँ आएल आ केतए जाएत? कहि नहि पुनर्जन्‍म हएत कि नहि? स्‍वर्ग जाएब वा नर्क सेहो ठेकान नहि। आ जौं स्‍वर्ग चलिये गेलौं तँ कहि नहि ओतए चाह हेतैक कि नहि? तँए जाबत जीवन अछि एकरा नीकसँ जीवि लिअ। आनन्‍द बना लिय। जँ भऽ सकए तँ ओरियान कऽ लिअ जे स्‍वर्गोमे चाह भेटैक। तँए हम अपन माइक श्राद्धमे चाह-चिन्नीक संग चाह बनेबाक सभ सामग्री जेना गैसबला चूल्‍हि आदि-आदि, दान कएल। आ दानक वस्‍तु हुनका देल जे चाहक प्रेमी छला। माय हुनका केतेको बेर चाह पीवि लिअ कहितथि। चाहक ऐ आग्रहमे बहुत जान होइत छल। हुनका लग लोकसब अबैत जाइत रहैत छल। ओ सदिखन प्रसन्न रहैत छेली। मारफत चाह। अस्‍तु हमहूँ-अहाँ चाहक पक्का ओरियान राखी आ प्रयत्न करी जे स्‍वर्गोमे चाह भेटैत रहए।



रबीन्द्र नारायण मिश्र