मैथिलीमे हमर प्रकाशित पोथी

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मंगलवार, 6 अगस्त 2019

भारत का भविष्य


भारत का भविष्य



भारत का धार्मिक आधार पर विभाजन आधुनिक इतिहास का अत्यंत दुखद प्रसंगों  में सदा स्मरण किया जाएगा । यह समझना कठिन है कि तत्कालीन नेताओं ने अंग्रेजों का विभाजन के पीछे का चाल क्यों नहीं समझा । वे कभी भी हमारे शुभचिंतक नहीं थे । उनका मकसद ही हमें इतना कमजोर कर देना था कि हम आगे चलकर भी स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित नहीं हो सकें । अंग्रेजों ने देश के टुकड़े-टुकड़े कर देने के अपनी योजना को कार्यान्वित करने के लिए देश के भीतर सैकड़ों देशी नरेशों को स्वतंत्र रहने की छूट दे दी । इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों के जाते ही सैकड़ों स्वतंत्र देश के उदय की संभवना प्रवल हो गई । विभाजन की व्यवस्था इतनी बिचित्र  थी कि हजारों मील दूर पूरबी पाकिस्तान(अब वंगला देश) और पश्चिमी पाकिस्तान एक देश बन गए । भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं,सांस्कृतिक रूप में भी वे विल्कुल भिन्न थे । उनका रहन-सहन,खान-पान,भाषा सब कुछ विल्कुल अलग था । बस इसलिए कि वहाँ मुसलमानों की संख्या अधिक थी ,वे एक देश बन गए । बन तो गए पर एक रह नहीं सके । रह भी नहीं सकते थे । एक साथ रहने का कुछ भी तो हो । पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाबी सेना और प्रशासन के प्रमुख पदों पर इस तरह काबिज हो गए की  पूरबी पाकिस्तान के लोगों को द्वेम दर्जे का नागरिक भी नहीं माना जाता था । उनका तरह-तरह से शोषण होता था । हद तो तब हो गई जब चुनाव जीत जाने के बाद,बहुमत प्राप्त कर लेने के बाद भी मुजीबुर रहमान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया गया । उसके बाद जो हुआ बस इतिहास है । अंततोगत्वा, पूरबी पाकिस्तान टूटकर अलग राष्ट्र बंगलादेश बन गया ।

जो व्यवस्था अंग्रेजों ने की थी और हमारे तत्कालीन नेताओं ने मानी थी उसके अनुसार देश के बीचोबीच हैदराबाद पाकिस्तान का हिस्सा हो जाता । और भी कई स्वतंत्र देश बन गए होते । भला हो वल्लभ भाइ पटेल का जिस से हम बच गए । उन्होंने दिन -रात मिहनत कर के सैकड़ों देशी नरेशों को भारत में विलय के लिए मना लिया । परंतु काश्मीर के मामले में पेंच फँस गया जिसका परिणाम आज भी हम भुगत रहे हैं ।

काश्मीर समस्या  हमारे देश के लिए खतरे की घंटी बनी हुई है । दुनिया के कई देश पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को दबाने की कोशिश करते हैं । वे मनमाने तरीके से इस समस्या का समाधान ढ़ूंड़ते हैं और फिर हम से अपेक्षा करने लगते हैं कि हम वैसा ही करें जैसा वे चाहते हैं । हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दिया जा रहा मध्यस्तता का प्रस्ताव ऐसा ही कुछ संदेश देता नजर आ रहा है । जबकि भारत ने वारंबार स्पष्ट किया है कि काश्मीर समस्या का समाधान भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय वार्ता से ही संभव है ,किसी तीसरे पक्ष का इसमें कोई हस्तक्षेप हमें मंजूर नहीं है । पर अमेरीका है कि मानता ही नहीं । आजकल वह इमरान खान को खुश करने के चक्कर में लगातार भारत के हित के खिलाफ बयान देता जा रहा है । निश्चय वे एसा अफगानिस्तान में पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं । पर उन्हें यह भलीभाँति पता होना चाहिए कि भारत का वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व  बहुत ही मजबूत इरादोंवाला और परिपक्व है और वह राष्ट्रहित के खिलाफ किछ भी नहीं कर सकता है ।

आज यह स्थिति है कि काश्मीर का अधिकांश हिस्सा हमारे कब्जे में है ,परंतु इसका कुछ भाग अभी भी पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में है । इसे  पाकिस्तान अधिक्रित काश्मीर  कहा जाता है । यह बात सभी जानते हैं कि अगर तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाइ पटेल को कुछ और  समय मिल गया होता तो पूरा-का -पूरा काश्मीर हमारा होता । परंतु नेहरुजी ने हस्तक्षेप कर आगे बढ़ते हुए भारतीय फौज को रोक दिया। उन्होंने ही काश्मीर मामले में यूएनओ के हस्तक्षेप की गुंजाइस कर दी । अब क्या हालात है वस किसी से छिपा नहीं है । नित्य हमारे जबान आतंकिओ द्वारा मारे जा रहे हैं । कास्मीरी पंडितों को अपने  पूर्वज की भूमि से खदेर दिया गया है । उनकी  जायदाद पर अनाधिकार कब्जा कर लिया गया है  और अपने ही देश में वे शरणार्थी बने हुए हैं । इस से ज्यादा दूर्भाग्यपूर्ण स्थिति क्या हो सकती है?

अर्से से लोग कहते रहे हैं की देश के अन्य राज्यों की तरह काश्मीर में कानूनी रूप से वही व्यवस्थाएं होनी चाहिए जैसा कि कहीं अन्यत्र हैं । भारत के संसद ने काश्मीर मे लागू धारा ३७० के प्रावधान को संशोधित कर दिया है जिस से जम्मू और काश्मीर भारत का अभिन्न अंग हो गया है । अब इस पर वे सभी कानून लागू होंगे जो देश के अन्य भाग में लागू हैं । इस तरह जम्मू और काश्मीर को संविधान द्वारा प्राप्त विशेषाधिकार समाप्त हो गया है । यह काम तो बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था । लेकिन राजनीतिक कारणों से ऐसा नहीं किया जा सका । अब जबकि  संविधान के प्रावधानों मे जरूरी संशोधन करके जम्मू और काश्मीर को प्राप्त विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया है,हम आशा कर सकते हैं कि देश के अन्य भागों में हो रहे विकास कार्यों का लाभ जम्मू और काश्मीर की जनता को मिलेगा और वे  पहले से कहीं ज्याद सुखी रहेंगे ।

यद्यपि भारत एल लोकतांत्रिक गणराज्य है और देश के नागरिकों को कहीं भी बसने,जीविकोपार्जन करने का मौलिक अधिकार संविधान से प्राप्त है लेकिन व्यवहार में इसका कार्यान्वयन दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है । लगभग सभीलोग चाहते हैं कि  उस राज्य की नौकरी में बाहरी प्रान्तों के लोग नहीं आएं । अगर नौकरी ही नहीं कर पाएंगे तो बसेंगे कहाँ से? कहने का मतलब है कि संवैधानिक अधिकार होते हए भी देश के नागरिक अपने अधिकारों से वंचित  रह जाएंगे । ऐसे माहौल में राष्ट्रीय एकता कहाँ से स्थापित हो सकती है । यही कारण हैक यदा-कदा देश को तोड़ने की चर्चा भी करते हुए लोग पाए जाते हैं और उनको भी समर्थक मिल जाते हैं ।

अपने देशमें ज्यादा ही लोकतंत्र है । कुछभी करके लोग कहते सुने जाते हैं कि वह तो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है । इसके लिए कानूनी व्यवस्थाओं को तरह-तरह से व्याख्या की जाती है । सत्ता प्राप्त कर लेना राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्षय लगता है । इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं । जाति व्यवस्था को फिर से देश के केन्द्रविंदु में खड़ा कर देना इसका प्रमाण है । कम से कम शहरी क्षेत्रों से जातिवाद समाप्त प्राय हो गया था । किंतु राजनीतिक स्वार्थ के लिए अब इस समस्या को इतना महत्व दे दिया गया है कि वे लोग जाति को वोटवैंक का सबसे आसान जरिया समझा जाने लगा है । फिर और कुछ करने का बबाल क्यों किया जाए। जाति के नाम पर देश की आर्तिक संपदा को लूटने में भी वे पीछे नहीं रहते । फिर कोई समस्या हो तो जाति का ही सहारा लेकर बच निकलने में कई बार कामयाब हो जाते हैं । यह देश का दूर्भाग्य ही समझिए की स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों के बाद भी हम गुण-दोष के आधार पर मतदान करने के बजाए जाति और धर्म को प्रमुखता देते हैं जिस कारण सही लोग राजनीति के दंगल में टिक ही नहीं सकते हैं ।  जिस दिन भारत वर्ष में नागरिक ऐसा करेंगे,और लोकसभा/विधानसभा में उम्मीदवारों का चयन  उसके कार्य  एवम् चरित्र पर आधारित होने लगेगा उस दिन देश का भविष्य ही कुछ और हो जाएगा । हम इस विषय पर गंभीरता  से विचार करें और संकल्प लें कि हम अपने देश को उत्कर्ष पर पहुचाने के लिए कुछ भी कसर नहीं छोड़ंगे । हम ऐसे लोगों को कभी भी  तरजीह नहीं देंगे जो स्वार्थवश समाज को धर्म  और जाति के नाम पर बांटते हैं और अभी  भी फूट डालो और राज करो के सिद्धांत पर चल कर देश और समाज का घोर अहित कर रहे हैं ।








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