सोमवार, 2 मार्च 2020

सरिसवबाली काकी


सरिसवबाली काकी



हम जहिआसँ मोन पाड़ैत छी,सरसवबाली काकीकेँ ओहिना देखलिअनि । उज्जर चक-चक नुआ पहिरने माथ झपने,बहुत नहू-नही बजैत अपन बात कहितथि । अन्हरोखेमे अपन दियादिनी बेरमाबाली काकीक संगे नवका पोखरिपर स्नान-पूजा करबाक हेतु जइतथि । रस्तामे एकाधटा आओर हुनके सन बुढ़ि संग भए जइतथिन । सभगोटे घाटपर स्नान करैत घर-बाहरक गप्प-सप्प करितथि । महादेवकेँ जल ढारितथि आ वापस घर जखन आबि रहल होइतथि तखन गामक लोकसभ ओछाओन छोड़बाक उपक्रममे रहैत । जाढ़क मास रहैत तँ अधिकांश लोक घूरक सेवन करैत रहैत । भोरे-भोर चाह पीबाक चलनि ओहि समय गामसभमे नहि रहैक । मुदा केओ-केओ चाह पीबैत छलाह,से सभ अड़ेरचौकपर पहुँचि जइतथि । किसानसभ जन अढ़बए चलि जइतथि । जँ अगहनक मास अछि तँ दरबजे-दरबजे दाउन होबए लगैत। क्रमशः मौसम बदलैत,लोकक दिनचर्या तदनुकूल बदलि जाइत । मुदा सरसवबाली काकीकेँ नित्य ओहिना देखिअनि । माघोमासमे हुनका ओढ़ना ओढ़ने नहि देखिअनि । स्नान-पूजा कए लौटैत काल जाढ़क मासमे थर-थर कपैत किछु-किछु मंत्र पढ़ैत ओ वापस अपन घर आबि जइतथि ।

हमसभ नेना रही। जबान भेलहुँ । मुदा सरिसवबाली काकी ओहिनाक ओहिना रहथि । हुनका कहिओ भरिमोन हँसैत नहि देखलिअनि । जखन कखनो हुनकर आङन जाइ तँ ओ कोनो -ने -कोनो काजमे बाझल रहतथि। हुनकर हाथक बनाओल भोजनक प्रशंसा जतेक करी ततेक कम । कैकबेर हमरा हुनका ओहिठामसँ नोत होइत छल। आब सोचैत छी तँ सोचिते रहि जाइत छी । कतेक मनोयोगपूर्वक ओ भोजन बनबैत छलीह । आङनमे जाइते लगैत जेना कोनो बहुत पवित्र स्थानपर आबि गेल छी । सौंसे आङनमे एकटा खढ़ नहि देखाइत । सदिखन चमचम करैत रहैत छलनि हुनकर आङन ।

ओहि आङनमे गेलाक बाद एकटा अद्भुत शांतिपूर्ण वातावरण रहैत छल । कुलमिला कए चारिगोटे ओहिघरमे रहथि । भाइजी(स्वर्गीय अनुग्रह नारायण झा),सरिसवबाली काकी,बरमाबाली काकी, आ कामदेव भाइ। यद्यपि संबंधमे ओ काका लगितथि तथापि हमसभ नेनेसँ हुनका भाइजी कहैत छलिअनि । ओ काशीसँ संस्कृत पढ़ने छलाह । ज्योतिष रहथि । हमर गामक मुखिआ सेहो निर्विरोध चुनल गेल रहथि । भूदान आंदोलनमे विनोबा भावे संगे बहुत सक्रिय छलाह  । एकबेर तँ ओ अपनसभटा जमीन भूदान आंदोलनमे दान कए देने रहथि। बादमे बरमा बाली काकीक प्रयाससँ ओ जमीनसभ वापस भेल छल । हुनका लोकनिक ओएह जमीनसँ जीविका चलैत छलनि । तेँ लगैत अछि जे भवावेशमे ओ ई काज कए देने रहथि ।

आब अहाँ कहब जे एतेक बात तँ कहि गेलहुँ मुदा ई नहि कहलहुँ जे आखिर हुनका सभसँ हमरसभक की संबंध छल । तँ से कहिए दैत छी । हमर प्रपितामह स्वर्गीय गुमनी मिश्र बहुत संपन्न लोक रहथि । हुनका छओटा पुत्र आ दूटा पुत्री रहथिन । एकटापुत्र बिआहक बाद कमे बएसमे मरि गेलखिन ।  एकटाकेँ कोनो संतान नहि भेलनि। चारिटाकेँ संतानसभ भेलनि । एकटा कन्याक बिआह वभनगामा(जनकपुर लग ,नेपालमे} रहनि । दोसर कन्याकेँ बिआहक बाद गामे बसाओल गेल । ओहि समयमे बेटीकेँ बसेनाइ,गाममे भगिनमानकेँ राखब, गौरवक बात बूझल जाइत छल । हुनका जमीन,कलम,पोखरि सभचीजमे हिस्सा देल गेल रहनि । हुनका तीनटा  पुत्र भेलनि। ओहिमेसँ एकटा रहथि भाइजी । दोसर रहथि-स्वर्गीय जगदीश झा । ओ वाटसन इसकूल मधुबनीमे पढ़ैत रहथि । गेनखेलीमे नाम केने रहथि । मुदा कमे बएसमे टीबी बिमारीसँ हुनकर मृत्यु भए गेलनि। हुनके पत्नीकेँ हमसभ बरमा बाली काकी कहिअनि । (बरमा बेतिआ लग कोनो गाम छैक ।) हमसभ नेनामे हुनकर एकटा  ग्रूपफोटो देखने रही  जे हुनकर परिवार लगमे हुनकर एकटा निसान छल । गेनखेलीमे ओ बहुत रास मेडलसभ जितने रहथि । सेहो हमसभ नेनामे देखने रही । बरमाबाली काकी बहुत जोगा कए ई दुनू वस्तु रखने रहथि । हुनका एकटा पुत्र छथि कामदेव भाइ । बाबाक बहिनक नाम रहनि दुर्गा दाइ । दुर्गा दाइक तेसर पुत्रक बिआह सरिसवबाली काकीसँ रहनि। हम कहिओ हुनका नहि देखलिअनि । लोकसभ कहैत जे ओ बिआहक किछुए दिनक बाद टीबी बिमारीसँ मरि गेलथि । तकरबाद सरसवबाली काकी विधवा भए गेलीह । हुनकर सौंसे जीवन ओहिना उजरा सारी पहिरने बितए लगलनि ।

हम जखन कखनो ओहि आङन जाइ,सरसवबाली काकीकेँ काजे करैत देखिअनि । घरक काजसँ जखन फुर्सति होनि तँ चरखा काटथि । ओहि समयमे चरखा चलेबाक एकटा हवा बहल रहैक । हमरसभक गामेमे  खादी भंडार रहैक । ओहि माध्यमसँ कतेको गरीब महिलासभक गुजर होइत छलैक । महिला कतिनसभ महीन सँ महीन ताग काटथि । जतेक महीन ताग तकर ततेक बेसी दाम भेटितैक । ताग कतेक महीन भेल तकर निर्णय खादी भंडारक कार्यकर्ता करैत छलाह । चरखासभ सेहो कैक प्रकारक होइत छलैक । सभसँ पैघ चरखाकेँ अंबर चरखा कहल जाइक । ओहि चरखामे एकहि संगे कैकटा सूत निकलैत छल । ओकरा चलबएमे बेसी परिश्रम जरूर होइत छल मुदा सूतक उत्पादन सेहो कैक गुना बेसी होइत छल । कतिनसभ अपन-अपन सूत खादी भंडारमे  जमा कए देथि आ तकरा बदलामे बेसीकाल खादी कपड़ा देल जाइत छल । टाका कमे काल दैत छल । एहि तरहसँ कठोर परिश्रम कए ओ सभ अपन देह झपैत छलीह आ पेटो भरैत छलीह । सरिसवबाली काकी आ बरमा बाली काकी दुनूगोटे अंबरक चरखा चलबैत छलि ।

सरिसवबाली काकीक स्वरमे अद्भुत मधुरता रहनि । भगवतीक गीत,बिआहक समयक गीत ,बरक परिछन आ बेटीक जेबा काल समदाउन ओ ततेक  मधुर गबैत छलीह जकर वर्णन करब मोसकिल अछि ।

सामाजिक काजमे मदति करबाक जबरदस्त प्रबृति हुनकामे छलनि । ककरो घरमे बिआह,उपनायन होइत तँ ओ दिन-राति  एक कए दितथि । उपनयनक मरबामे लिखिआ-पढ़िआ करबामे हुनका महारत छल । सौंसे मरबामे तरह-तरहक चित्रसभ हाथसँ बनबैत छलीह । आजुक समय रहैत तँ हुनकर एहि प्रतिभासभकेँ समाजमे प्रचार होइत ,हुनका किछु आर्थिक लाभो होइतनि । मुदा ओहि समयमे से सभ तँ नहि रहैक । मधुबनी चित्रकलाक प्रचार-प्रसार भेलैक जरूर मुदा बहुत देरीसँ । ताबे हुनका सन-सन कतेको मौलिक कलाकारसभ साधना करैत-करैत एहि संसारकेँ छोड़ि गेलि ।

गाममे ककरो बेटीक बिआह होइतैक तँ मधुश्रावणीमे कनिआकेँ  खिस्सा कहबाक हेतु ओ जाइत छलीह । हुनका सभकिछु कंठाग्र रहनि । लग-पासक महिलासभ बैसितथि ,कनिआ बैसितथि , जँ बर आएल छथि तँ ओहो बैसितथि आ सभगोटे नियमपूर्वक हुनकर खिस्सा सुनितथि ।

मधुश्रावणीक समाप्तिपर जे विध-व्यवहार होइक से सभ ओ करबैत छलीह । बदलामे हुनका की भेटैत छलनि? जँ कनिआक सासुरसँ हुनको  लेल नुआ आबि गेल तँ से हुनका भेटि जाइत छलनि नहि तँ फोकला । मुदा हुनका एहिसभसँ निर्लिप्त देखिअनि । जेना ओ एहि पृथ्वीपर चुपचाप सभकिछु सहि जेबाक हेतु आएल होथि । कहिओ ककरो कोनो तरहक प्रतिवाद नहि,आग्रह नहि,इच्छा-अभिलाषा नहि ।

कैकबेर पाबनिसभमे हुनका अपना ओहिठाम किछु-किछु बनबैत देखिअनि । जेना तिलासंक्रांतिमे चुरलाइ बनबएमे ओ हमरा माएकेँ मदति करितथि । एहि काजमे तँ बरमाबाली काकी सेहो लागल देखिअनि । सभगोटे गप्प-सप्प करितथि आ चुरलाइओ बनबैत रहतथि । एहि तरहे छिट्टाक-छिट्टा चुरलाइ बनैत छल आ हमसभ तकरा कतेको दिनधरि खाइत रहैत छलहुँ ।

सरसवबाली काकीकेँ अपन कोनो संतान नहि रहनि । भाइजीकेँ सेहो अपन कोनो संतान नहि रहनि । हुनकर पत्नी कहि नहि कहिआ शुरुएमे मरि गेलखिन । कहाँदनि हुनकासभकेँ एकटा पुत्र भेल रहनि जे दस वर्षक भए कए मरि गेलथि । बरमा बाली काकी सेहो शुरुएमे विधबा भए गेलथि । मुदा संयोगसँ हुनका एकटा पुत्र भेल रहथिन-कामदेव भाइ । तीनू फरिकेनमे  ओएहटा संतान रहथि । ओ अखन अस्सी वर्षक छथि । हुनका भरल-पुरल परिवार छनि । सरसवबाली सभदिन हुनके अपन संतान बूझि जीबि गेलीह । कहिओ ककरोसँ किछु अपेक्षा नहि। भगवान छोड़ि केओ मदति केनहार नहि । कहिओ काल हुनका माएक लग नोर पोछैत देखिअनि । साइत मोनमे गड़ल कष्टकेँ असह्य भेए जाइत होनि । कतहुँ तँ ओकरा अभिव्यक्ति चाहैत छलैक । नौकरीक क्रममे हम बाहर चलि गेलहुँ । एकदिन सुनलिऐक जे सरसवबाली काकी नहि रहलीह ।  सदा-सर्वदाक लेल एकटा दुखी आत्मा एहि संसारकेँ छोड़ि गेलीह । बिना किछु कहने,बिना किछु मंगने ।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

2/3/2020

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

बिहार शराबबंदी कानून


बिहार शराबबंदी कानून



भारतीय संविधानक धारा ४७मे  वर्णित नीति निर्देशक सिद्धांतक अनुसार राज्य पूर्ण मद्यनिषेधक हेतु प्रयास करत जाहिसँ लोकक जीवनस्तरमे सुधार होएत । यद्यपि संविधानक ई धारा बाध्यकारी नहि अछि तथापि एतबा तँ स्पष्ट अछि जे मद्य निषेध किंवा एही तरहक कोनो कानून संविधानक उपरोक्त भावनाक अनुकूल अछि । मुदा व्यवहारिक कारणसँ देशक अधिकांश भागमे एहन कोनो कानून आइधरि लागू नहि भेल । बिहारमे सेहो ई कानून बहुत विलंबसँ सन्२०१६मे लागू भेल । मुदा जे कानून बनल से बहुत खोंचाह भए गेल । अपराध आ दंडमे संतुलन नहि रहि गेल ।  ई बात नहि छैक जे एहि कानून बनलाक बाद किछु फाएदा नहि भेलैक । सरेआम शराब पीनाइ वा नशा करब कम जरूर भेलैक ,मुदा आन-आन समस्यासभ ततेक भए गेलैक जे थोड़बे दिनमे ई कानून एकटा भार भए गेल ।

बिहारेमे नहि अपितु सौंसे देशमे एहन कतेको लोक अछि जे शराबक चलते अपन परिवारक भरण-पोषण नीकसँ नहि कए पबैत अछि। शराब वा कोनो प्रकारक नशा केनिहार व्यक्ति तकर जोगार करबाक हेतु कोनो हद धरि जा सकैत अछि । ओकरा शराब चाही चाहे जेना होइ । कतेको बेर ई देखल जाइत अछि जे जँ नशेरी वा शराबीकेँ नशा करबासँ केओ रोकैत अछि तँ ओ हिंसक भए जाइत अछि ,विरोध केनिहार पारिवारिक सदस्यक हत्या पर्यंत कए दैत अछि । शराबक नशामे नशेरीसभ अपन घरमे झगड़ा करैत रहैत अछि, अपशब्द तँ बजिते रहैत अछि। एहिसभसँ पारिवारिक माहौल खराप भए जाइत अछि । नेनासभक पढ़ाइ-लिखाइ चौपट भए जाइत छैक, ओकरसभक विकासपर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत अछि । हमर अधीनस्त एकटा कर्मचारी अपन खिस्सा कहलाह जे हुनकर पिता बहुत अधिक शराबक सेवन करैत छलाह । नशा चढ़ि गेलाक बाद ओ बेकाबू भए सभकेँ तंग करैत रहैत छलाह । एकदिन साँझमे ओ परीक्षाक तैयारी करैत छलाह । हुनकर पिता आबि कए भूगोल पढ़बए लगलखिन जखन कि काल्हि भेने इतिहासक परीक्षा हेबाक रहैक । ओ डरे किछु नहि बाजि सकलाह आ परीक्षामे ओही विषयमे असफल भए गेलाह जाहि कारणसँ हुनकर एकसाल बरबाद भए गेलनि । दिल्लीमे हम एहन कैकटा परिवारकेँ उजरैत देखलिऐक । कैक बेर तँ शराबी/ नशेरीक मृत्यु भेलाक बाद परिवार बेसी सुरक्षित आ सुखी भए जाइत अछि।

ई बात सर्वविदित अछि जे शराब वा कोनो मादक बस्तुक अभ्यस्त लोककेँ नशाक जोगार चाही चाहे ताहि हेतु ओकरा जे करए पड़ैक। कतेको रिक्सा चालक,मजदूर, वा छोटमोट नौकरी केनिहार लोक नशाक चक्करमे अपन कमाइक अधिकाँश हिस्सा नशा सेवनमे खर्च कए लैत अछि । परिणामतः ओकर घरक स्थिति सदिखन गड़बड़ाएल रहैत अछि । नेनासभ बिलटल रहैत अछि । नशेरीसभक घरक माहौल ततेक विषाक्त भेल रहैत अछि जे ओहिमे के कखन मरि जाएत तकर कोनो ठेकान नहि । कैकबेर तँ विषाक्त शराब पीबि पचासो लोक एकहिठाम सुतले रहि जाइत अछि । नशा करब गरीबे नहि अपितु ककरो लेल खराप होइत अछि । कैकबेर देखल जाइत अछि जे नशा कए कार चलओनिहार भयंकर दुर्घटनाक शिकार भए जाइत अछि । एहनमे कैकबेर तँ पूरा परिवारे सुडाह भए जाइत अछि । अस्तु,शराब वा अन्य कोनो प्रकारक नशाक नियंत्रण करबाक कोनो प्रयास स्तुत्य अछि ।

समाजक एहि स्थितिसँ उबारबाक हेतु बिहार सरकार सन् २०१६मे शराबबंदी कानून लागू केलक । कानून बनि गेल आ लागूओ भए गेल । मुदा एकर प्रावधानसभ आवश्यकतासँ बेसी प्रतिशोधी छल । परिणामस्वरुप, लोकसभ शराबक क्रय-विक्रय नुका कए करए लागल । एकबेर हम  मधुबनीमे रिक्सापर जाइत रही । ओहि समयमे शराबबंदी कानून बिहारमे लागले रहैक । रिक्साबलाकेँ ओहि कानूनक बारे मे पुछलिऐक । ओ कहलक-जकरा पीबाक आदति छैक से तँ पीबे करत चाहे ओकरा जे करए पड़ैक । पहिने दस रुपयामे जतेक तारी भेटि जाइत छलैक आब तकर आधा चारिगुना दामपर  भेटैत छैक आ नशेरीसभ सेहो कीनैत अछि ,पीबैत अछि।

बिहार शराबबंदी कानून २०१६क धारा ३७क मुताबिक जे केओ कतहु शराब पीबैत अछि वा कोनो नशा करैत अछि वा कतहु निशा केने पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा कम सँ कम पाँच साल आ बेसी सँ बेसी सात सालक जहलक संगे कम सँ कम एक लाख आ बेसी सँ बेसी दस लाखक जुर्माना कएल जा सकैत अछि । तहिना जौँ केओ शराब पीबि कए वा कोनो निशा कए झंझट करैत अछि किंवा हिंसा करैत अछि, अपन घर वा बाहर शराब पीबाक हेतु उत्साहित करैत अछि,स्वीकृति दैत अछि,शराबी लोकनिकेँ अपना घरमे जमा करैत अछि तँ ओकरा कमसँ कम दस साल आ बेसी सँ बेसी आजन्म जहल आ एक लाख सँ लए कए दस लाख धरि जुर्माना कएल जा सकैत अछि।

सन्२०१६मे शराबबंदी कानून लागू भेलाक बाद तीन सालमे एक लाख सड़सठि हजार आदमी पकड़ल गेल आ बाबन लाख दू हजार अस्सी लीटर शराब जब्त कएल गेल । सबाल ई अछि जे एतेक मात्रामे शराब बनैत कोना अछि आ ओकरा एकठामसँ दोसर ठाम कोना पहुँचाएल जाइत अछि जखन कि एतेक सख्त कानून पूरा बिहार राज्यपर लागू अछि? एहनो सुनबामे अबैत अछि जे कैकबेर  जब्त कएल गेल शराबकेँ पुलिस स्वयं चोरा कए राखि लैत अछि । कैमूर नामक स्थानपर जखन एहने घटना पकड़ल गेल तँ पुलिस कहलक जे मूस शराब पीबि गेल ।

शराबबंदी कानूनक तहत नार्थ बंगाल स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन बनाम बिहार सरकारक मामिलाक सुनबाइ करैत बिहार सरकारक खिलाफ बहुत सख्त टिप्पणी करैत पटना उच्च न्यायालय कहलथि जे बिहार पुलिस आँखि मूनि कए काज कए रहल अछि आ निर्दोष जनताकेँ बिहार शराबबंदी कानूनक तहत परेसान कएल जाइत अछि । उपरोक्त मामिलामे बेगुसरायक नार्थ बंगाल स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशनक बस पुलिस एहि लेल जब्त कए लेलक जे ओहिमे एकटा यात्रीक संगमे शराबक बोतल पाओल गेल रहैक । माननीय उच्च न्यायालयक कहब रहनि जे चूँकि बस सरकारी छलैक तेँ ओकरा एना सोझे जब्त नहि करबाक चाहैत छलैक अपितु पुलिसकेँ कुर्कीक प्रकृया करबाक चाही । पुलिस द्वारा एहि कानूनक तहत कएल जा रहल ज्यादितीक उदाहरण दैत कोर्ट कहलथि जे एकटा बैंक अधिकारी नोएडासँ बंगाल बदली भेलापर अपन घरक समानसभ परिवहन कंपनीक ट्रक द्वारा पठओने छलाह। ओहि ट्रकमे आनो लोकसभक सामान रहैक ।    पुलिसकेँ ओहि ट्रकमे शराबक बोतल भेटलैक । तकरबाद पुलिस पूरा ट्रकक समानसभ जब्त कए लेलक । परिणामस्वरुप,बैंक अधिकारीकेँ बिना कोनो गलती केनहि बहुत परेसानी भए गेलैक । एहन उदाहरण सभक चर्च करैत कोर्ट कहलथि जे पुलिस बिहार शराबबंदी कानूनक लोकसभकेँ आँखि मूनि कए जहल पठा दैत अछि । जहलसभ एहन लोकसभसँ भरि गेल अछि । कोर्टमे मोकदमाक संख्या बढ़िते जा रहल अछि । पुलिस कार्रवाइ  करबासँ पूर्व जँ माथा लगाबए तँ बहुत रास परेसानीसँ लोक बँचि सकैत अछि ।

बिहार शराबबंदी कानूनक अधीन जहलमे बंद बेसी लोक समाजक निम्न वर्गक छल। जहलमे बंद रहलासँ ओकरसभक परिवारक पालन-पोषण  मोसकिल भए गेल । जनता  त्राहि माम करए लागल । तकर बाद बिहार सरकार केन्द्र सरकारक अनुमतिसँ आममाफी योजना आनि बहुत रास कैदीसभकेँ जहलसँ छोड़ि देलकैक । कहक माने जे बिहार शरबबंदी कानूनक दुरुपयोग ततेक भेल जे सरकारकेँ स्वयं ओहि कानूनमे संशोधन करए पड़लैक ।

न्यायालयसभमे निरंतर बढ़ि रहल केससभक कारण पटना न्यायालय बिहार सरकारसँ पुछबाक हेतु वाध्य भेल जे आखिर दू लाख सड़सठि हजार शराबंदीसँ संबंधित मामिलाकेँ कोना खतम कएला जाएत? कोर्टमे जज एवम् अन्य जरूरी सुबिधाक अभावकेँ देखैत ई एकटा गंभीर समस्या भए गेल अछि । सितम्बर २०१९ धरि मात्र २६२९ एहन मामिलाक निष्पादन भए सकल छल जखन कि लाखों केस कोर्टसभमे अखनो लंवित अछि ।

किछुगोटे बिहार शराबबंदी कानूनकेँ पटना उच्च न्यायालयमे चुनौती देलक । उच्च न्यायलय पटना एहि कानूनकेँ निरस्त कए देलक । एहि निर्णयक खिलाफ बिहार सरकार उच्चतम न्यायालयमे अपील केलक । उच्चतम न्यायालय बिहार सरकारक अपीलपर पटना उच्च न्यायालयक आदेशपर रोक लगा देलक ।

शराबबंदी कानूनक उल्लंघनक मामिलासभ लाखोंमे कोर्टसभमे लंवित अछि । कोर्ट सेहो परेसान अछि । जनता तँ परेसान छलहे । समाजक गरीब लोकसभकेँ  एहि कानूनक प्रावधानसँ प्रताणना बढ़ि गेलैक । लोकसभ थाना-पुलिस,कोट-कचहरीक चक्करमे पड़ल रहैत छल । एहि बातसभक जानकारी बिहार सरकारकेँ भेलैक । उपरोक्त कानूनक कैकटा प्रावधानकेँ सन् २०१८मे बिहार सरकार बदलि देलक जाहिसँ लोकके परेसानी कम होइक ।

असलमे सन् २०१६क कानून ततेक कठोर छल जे लोकसभ परेसान भए गेल । संगहि एहि कानूनक दुरूपयोगक सिकाइति सेहो सरकारकेँ प्राप्त भेलैक । ताहिसभ बातकेँ ध्यानमे रखैत एहि कानूनमे निम्नलिखित महत्वपुर्ण संशोधन कएल गेल-

१.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिकेँ थानासँ जमानत भेटि सकैत छैक ।

२.पहिल बेर शराब पीबाक अपराधमे पकड़ल गेल व्यक्ति पचास हजार जुर्माना दए छुटि सकैत अछि । मुदा जुर्माना नहि देला पर तीन मासक कारावास हेतैक ।

३.जौँ दोसर बेर केओ शराब पीबैत पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा एक लाख जुर्माना वा एक सालक जहलक दंड हेतैक ।

४.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिक संपति जब्त करबाक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि । मुदा शराबकेँ अपन घर वा गाड़ीमे संग्रह करए बला व्यक्तिकेँ कोनो छूट नहि देल गेल अछि ।

५.सामुहिक दंडक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि ।

६.शराब पीबैत पकड़ल गेल व्यक्तिकेँ जिला बदर करबाक प्रावधानकेँ समाप्त कए देल गेल अछि ।

७. सन् २०१६मे  लागू भेल शराबबंदी कानूनक अनुसार जौँ केओ शराबक संग्रह केने पकड़ल जाइत अछि तँ ओकर परिवारक सदस्य(पत्नी,पति आ आश्रित संतान)केँ सेहो अपराधिक मामिला कएल जा सकैत अछि । संगहि मकान मालिककेँ खिलाफ सेहो अपराधिक मोकदमा कएल जा सकैत अछि । कानूनी प्रावधानक अनुसार अपराध साबित भेला पर कम सँ कम दस सा धरि जहल आ एकलाख जुर्माना कएल जाएत । पारिवारिक सदस्य किंबा मकान मालिककेँ एहि तरहेँ प्रताड़ित करब भारतीय संविधानक धारा १४ एवम् २१क उल्लंघन होइत छल । उपरोक्त कानूनमे २०१८मे कएल गेल संशोधन द्वारा उपरोक्त प्रावधानकेँ हटा देल गेल अछि।

८.जौँ केओ शराब बनबैत पहिल बेर पकड़ल जाइत अछि तँ ओकरा दू साल धरि जहल हेतैक । मुदा दोबारा ई गलती केलापर कमसँ कम दस सालक जहल हेतैक ।

९. कोनो मकानमे शराब भेटलापर पहिलुका कानूनमे पूरा मकान सील करबाक प्रावधान छल । संशोधनक बाद आब मात्र ओहि कोठरी मात्रकेँ सील कएल जाएत जतए शराब राखल छल ।

१०.विषाक्त शराब पिलापर भेल मृत्युपर संबंधित दोषी व्यक्तिकेँ फाँसी देबाक प्रावधान कएल गेल अछि ।

बिहार सरकार शराबबंदी कानूनक उल्लंघनक सिकाइत हेतु टालफ्री फोन संख्या १५५४५ वा १८००३४५६२६८  पर कएल जा सकैत अछि । सिकाइति केनिहारक नाम गोपनीय राखल जाइत अछि । सिकाइति प्राप्त भेलापर ओकरा संबंधित पुलिस अधिकारीकेँ कार्रवाइ हेतु अग्रेषित करैत अछि । पुलिससँ प्राप्त जानकारी/ प्रतिवेदनसँ सिकाइत केनिहार व्यक्तिकेँ अवगत कराओल जाइत अछि । जौँ ओ कएल गेल कार्रवाइसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओकर आग्रहपर दोबारा जाँच सेहो कएल जा सकैत अछि ।

बिहारक अतिरिक्त गुजरात,मिजोराम,नागालैंड आ केन्द्र शासित क्षेत्र लक्षद्वीपमे पहिनेसँ शराबबंदी कानून लागू अछि । मुदा कतहु एहन अव्यवहारिक कानून नहि बनल,ने कतहु कानून बनलाक बाद एतेक उठा-पटक भेल। ओहि राज्यसभमे शराबबंदी कानून लागू भेलासँ लोक शराब पीनाइ छोड़ि देलक से नहि कहल जा सकैत अछि । एहू राज्यसभमे कैकठाम शराब जेना-तेना बिकाइते अछि आ लोक पीबिते अछि । गुजरातमे तँ शराब तरकारी जकाँ घरे-घर पहुँचा देल जाइत अछि। कानून बनओनाइ एकटा बात थिक आ ओकरा लागू भेनाइ दोसर बात । एक सँ एक कानून बनि कए ब्यर्थ साबित भए चुकल अछि । बिआहमे दहेज देबा-लेबाक विरुद्ध कानून कहिआसँ बनल अछि मुदा ई सभ केओ जनैत अछि जे व्यवहारमे एकर बिना साइते कोनो बिआह होइत होइक । जतए सोझा-सोझी टाका नहिओ लेल जाइत अछि ओतहु आन-आन तरहें कन्यापक्षसँ उगाही होइते अछि । कहबाक माने जे सामाजिक क्षेत्रमे सुधार हेतु कानूनक अतिरिक्त चरित्र एवम् व्यक्तित्व निर्माण बहुत जरूरी अछि । तखने समाजमे सुधार भए सकैत अछि,तखने शराबसँ मुक्ति भए सकैत अछि ।

कैक बेर एहनो देखल जाइत अछि जे शराबीक संतान शराब छुबितो नहि अछि। दिन-राति पारिवारिक कलह देखैत-देखैत एहन नेनाक मोनमे कतहु-ने-कतहु शराब वा अन्य कोनो प्रकारक नशाक घृणा भए जाइत अछि। तकर कैक बेर सकारात्मक प्रतिकृयास्वरुप ओसभ शराबसँ जीवनभरि फटकी रहैत अछि। परिस्थितिवश ओकर व्यक्तित्वमे शराब वा कोनो अन्य निशाक प्रति एकटा अरुचि भए जाइत अछि ।

एहि बातमे कोनो संदेह नहि अछि जे शराब पीनाइ अधलाह थिक मुदा एकर आदति छोड़ेनाइ पहाड़ चढ़ब थिक । जे होइक मुदा कानून बनि गेलासँ एकटा अवरोध तँ भइए गेलैक अछि । आशा अछि जे लोक एहि कानूनक जन कल्याणक भावना बुझैत सरकारकेँ आवश्यक सहयोग देताह जाहिसँ एकर उद्देश्यपूर्ति संभव होअत ।



लेखकःरबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

26.02.2020

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

दिल्ली विधानसभा का आगामी चुनाव


दिल्ली विधानसभा का आगामी चुनाव





अब जब कि भारत के चुनाव आयोग ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव का बिगुल बजा दिया है और  ८ फरबरी को पूरे दिल्ली में एक साथ चुनाव होना तय हो गया है तो स्वभाविक प्रश्न उठने लगा है कि दिल्ली का चुनाव इस बार कौन जीतेगा? क्या आम आदमी पार्टी फिर सत्ता पर काविज हो पाएगी या बीजेपी एक लंबे अवधि के बाद दिल्ली में फिर से राज कर पाएगा । पहले एक आम धारणा हुआ करती थी कि दल्ली पूरे देश के नब्ज को इंगित करता है ,याने जो दिल्ली का चुनाव जीतने में सफल होगा वही देश पर भी राज करेगा। इसका कारण यह भी था कि दिल्ली का चुनाव कांग्रेस और बीजेपी में हुआ करता था । बीजेपी का दिल्ली में तब भी एक निश्चित जनाधार हुआ करता था जब पूरे देश में कांग्रेस पार्टी की तूती बोलती थी । कोई तीसरा दल यहाँ थT ही नहीं । पर पिछले छ; सालों से दिल्ली का परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है । ऐसा आम आदमी पार्टी के उदय से हुआ है । सायद कुछ साल पहले तक किसी ने नहीं सोचा होगा कि राजनीतिक गलिआरे में एकदम अपरिचित श्री  अरविंद केजरीवाल,दिल्ली के मुख्यमंत्री बनेंगे,वह भी अपार जनसमर्थन से । सन् २०१५ के दिल्ली के विधानसभा चुनाव में ७० में से ६७ सीट जीकर उन्होंने एक कीर्तिमान स्थापित किया । निश्चय ही लोगों ने श्री केजरीवाल में अपार संभावना देखी होगी,बड़ी उमीदें पाली होंगी और उन्हें लगा होगा कि दिल्ली का भविष्य वहीबदल सकने में सक्षम होंगे । इतनी बड़ी जीत के पीछे उनके आम आदमी का समर्थक होने का प्रचार का बहुत योगदान था । दिल्ली में रह रहे गरीब, पीड़ित लोग यहाँ फैले कुशासन से तंग आकर श्री केजरीवाल में इस सबसे मुक्ति का नायक देखा था । सबाल है कि अब जबकि वे दिल्ली पर पाँच साल राज कर चूके हैं और अब अगले पाँच साल के लिए चुनाव घोषित हो चुका है तो क्या दिल्ली की जनता एकबार फिर उनमें विश्वास व्यक्त करेगी या उन्हें बदलकर बीजेपी या कांग्रेस की सरकार स्थापित करना चाहेगी?

दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री के राजनीतिमें प्रवेश श्री अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के परिपेक्ष्य में हुआ था । सन् २०१४ के आम चुनाव से पूर्व देश में कई राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। अन्ना हजारे के नेतृत्वमें श्री  अरविंद केजरीवाल सहित कई नामी लोग,सामाजिक कार्यकर्ता,कलाकार लोकपाल के गठन सहित कई अन्य मांगो के लिए आंदोलन कर रहे थे । इन्हीं आंदोलनों के दौरान कुछ लोगों का मत हुआ कि एक नया राजनीतिक मंच वा दल बनाकार चुनाव लड़ना चाहिए जिससे व्यवस्था के भीतर से भ्रष्टाचार पर वार किया जा सकेगा । लेकिन कुछ लोग  जिनमें श्री अन्ना हजारे स्वयं भी शामिल थे,राजनीति में भाग लेने के विल्कुल खिलाफ थे । इसी बीच दिल्ली विधानसभा हेतु चुनाव की घोषणा हुई । श्री  अरविंद केजरीवाल समेत कुछ अन्य लोग जैसे श्री प्रशांतभूषण,श्री योगेन्द्र यादव आदि ने एक नया राजनीतिक दल बनाकर दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ने का फैसला कर डाला । उस समय कुछ युवकों का उत्साह देखने योग्य था । कई युवक विदेशों में अच्छ-अच्छे नोकड़ियों को छोड़कर पहले श्री अन्ना हजारे और बाद में दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री के साथ हो गए। दिल्ली के लोदी गार्डेन सहित कई अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर इन युवकों को सितार एवम् अन्य वाद्ययंत्र बजा-बजाकर आम आदमी पार्टी के पक्ष में समर्थन मांगते देखा जाता था । ऐसा लगता था कि दिल्ली में कोई महाक्रांति होनेवाली है । सबकुछ बदल जाना है । गरीबों का तो कायाकल्प हो जाएगा । पूर्ण स्वराज की परिकल्पना से लोगों को सम्मोहित किया जा रहा था । यह भी कहा जा रहा था कि अगर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री सरकार बना सके तो भ्रष्टाचार तो देखते ही देखते समाप्त हो जाएगा । इस सबका दिल्ली के मतदाताओं पर व्यापक असर हुआ । सन् २०१३ में कराए गए दिल्ली विधानसभा के चुनाव का परिणाम आया । दिल्ली के विधानसभा में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था । लेकिन आम  आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर आई  थी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने में कामयाब रही थी । सरकार बन तो गई लेकिन ज्यादा दिन चल नहीं सकी । श्री  अरविंद केजरीवाल ने श्री नरेंद्र मोदीजी के खिलाफ वनारस से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला किया और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया । दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । २०१४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अकेले लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला । दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री वनारस से लोकसभा का चुनाव हार गए । इसके बाद उन्होंने फिर आंदोलन का रस्ता पकड़ा। दिल्ली के छोटे-मोटे समस्यायों से जूझते रहे। इस सबका फैदा उनको छः महिने बाद दिल्ली में फिर से कराए गए चुनाव में मिला। उनके नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने सत्तर में से सड़सठ सीटें जीत लिया। भारतीय जनता पार्टी को मात्र तीन सीट मिले जबकि कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया ।

सोचने की बात हे कि दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्रीके नेतृत्व में ऐसा क्या दिखा कि दिल्ली के तथाकतित स्मार्ट मतदाता उनके उपर इस तरह फिदा हो गए कि २०१५ में कराए गए विधानसभा के चुनाव में विपक्ष का नामोनिशान मिट गया । जरा पाँच साल पीछे  जाइए तो इसका अनुमान लग जाएगा कि लोगों को क्या-क्या सब्जबाग दिखाए गए ।

सभी बसों में मार्सल लगाए जाएंगे , सीसीटीभी लगाए जाएंगे । पूरे दिल्ली में मुफ्त वाइ-फाइ की सुविधा दी जाएगी। कच्ची कालोनिओं में सभी मौलिक सुबिधाएं मुहैया कराई जाएंगी । बिजली बिल आधा कर दिया जाएगा । मुफ्त पानी दिया जाएगा । दो लाख जन-सौचालय बनाया जाएगा । बीस नए डिग्री कालेज खोले जाएंगे । आठ लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी । सभी को सस्ता मकान उपलव्ध कराया जाएगा । दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा । आदि,आदि ।

 ऐसे-ऐसे बहुत सारे लोक लुभावन वादे किए गए । आम नागरिकों को लगा कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनते ही उनका दुख-दर्द समाप्त हो जाएगा और वे भी दिल्ली में सम्मानित जीवन-यापन कर सकेंगे। इसके साथ ही पिछले सरकारों  में चतुर्दिक व्याप्त भ्रष्टाचार तो मुद्दा था ही । अन्य पार्टियों के अंदरुनी झगड़े का लाभ भी आम आदमी पार्टी को मिला ।

लोगों का आम आदमी पार्टी के प्रति समर्थन इतना जोरदार था कि स्वर्गीया शीला दिक्षित जैसी कांग्रेस की कद्दावर नेता अपनी सीट नहीं बचा सकी । एक हिसाब से यह गलत निर्णय था क्यों कि स्वर्गीया शीला दिक्षित ने दिल्ली के अपने पन्द्रह साल के शासन के दौरान दिल्ली के कायापलट करने में अहं योगदान दी थी । दिल्ली में इस दौरान अनेकानेक फ्लाइओभरों का निर्माण हुआ । उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर तत्कालीन सरकार ने दिल्ली में प्रदूषण हटाने/ कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया,  वरना रात के दौरान दिल्ली का आकाश धुंध से भरा रहता था , ढूंढ़ने से भी कोई तारा नजर नहीं आता था । इस सबके बाबजूद वह चुनाव हार गई। दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री उनके विरुद्ध भारी मतों से चुनाव जीते ।

श्री  अरविंद केजरीवाल ने प्रचंड बहुमत से सन् २०१५ में दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीत तो लिया परंतु उसके बात उन्होंने क्या किया? सबसे पहले अपने पुराने दोस्तों श्री प्रशांत भूषण और श्री योगेन्द्र यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया । उन्हें पता था कि इतने बहुमत से चुनाव जीतने के बाद उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं होने बाला है ।  सो,निष्कंटक राज करने के लिए पार्टी के अंदर मुखर रहने वाले लोगों को ठिकाना लगाना जरूरी लगा । समय बीतने के साथ अंदरुनी असंतोष बढ़ता गया और आम आदमी पार्टी के कई मूर्धन्य नेतागण जैसे श्री कुमार विश्वास,श्री कपिल मिश्रा,पत्रकार आशुतोष, श्री आशीष खेतान, श्री मयंक गांधी, मधु भादुड़ी, श्री आनंद कुमार,अंजलि दामनिया,साजिआ इल्मी,एस एस धीर बारी-बारी से पार्टी छोड़कर चले गए । फिर नित्य भारत के प्रधानमंत्री को तरह-तरह से जलील करनेवाला वक्तव्य देते रहे। बात इसी पर नहीं रूकी । वे कई कद्देवार नेताओं के खिलाफ  अनाप-सनाप आरोप लगाते रहे जिससे उन्हें कई मानहानि के मुकदमों का सामना करना पड़ा और अंततः ऐसे कई मुकदमो में उन्हें माफी मांगनी पड़ी । केन्द्र सरकार के साथ अधिकारों की लड़ाई करते-करते उच्चतम न्यायालय तक पहुँच गए । वर्षों चली इस लड़ाई के दौरान दिल्ली सरकार के काम-काज पर क्या असर पड़ा सो सभी को ज्ञात है । दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है । यह एक केन्द्र शासित क्षेत्र है जिसमें कुछअधिकार केन्द्र सरकार के पास है तो कुछ दिल्ली सरकार के पास । दिल्ली सरकार में भी राज्यपाल की भूमिका अन्य राज्यों से विल्कुल भिन्न है । राज्य सरकार के मातहत आने वाले विषयों में भी असहमत होने पर उस मामले को अंतिम निर्णय के लिए राज्यपाल केन्द्र सरकार के पास भेज सकते हैं और केन्द्र सरकार का निर्णय ही अंतिम माना जाएगा । इस तरह की पेचीदा व्यवस्था दिल्ली में पहले से चल रही थी । स्वर्गीया शीला दिक्षित ने इसी परिस्थिति में बहुत काम करके दिखाया । लेकिन दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री ने दिल्ली के राज्पाल का घेराव तक किया । सोचा जा  सकता है कि इस माहौल में राज्य का शासन कैसे चला होगा ? बात बिगड़ते-बिगड़ते इस हद तक पहुँच गई कि राज्य के तत्कालीन मुख्यसचिव श्री अंशुप्रकाश को मुख्यमंत्री आवास में रात के बारह बजे एक मिटिंग में बुला कर प्रताड़ित किया गया(यह मामला न्यायालय के विचाराधीन है) । कहने की जरूरत नहीं है कि कि यह सब क्यों किया गया?

दिल्ली में पहले जनसंघ ,भारतीय जनता पार्टी चुनाव में जीतते रहे। ऐसा क्या हुआ कि लगातार पिछले बीस साल से वे सत्ता से बाहर हैं और लाख प्रयास के बाबजूद चुनाव नहीं जीत पा रहे है? इसका प्रमुख कारण दिल्ली में हर साल  बिहार और उत्तर प्रदेश से रोजी-रोटी के खोज में आने वाले लोग हैं । ऐसे लोगों की तादाद हर साल लाखों में होती है । वे यहाँ आते ही नहीं, दिल्ली में जैसे-तैसे बस जाते हैं । हजारों की संख्या में बने अनिधिक्रित कालोनियाँ इसके गवाह हैं । वे सभी क्रमशः दिल्ली के मतदाता बन जाते हैं । एक समय था जब कि बिहारी  शब्द दिल्ली में गाली के रूप में प्रयोग किया जाता था । अब बात बदल गई है । इनके भारी जनसंख्या वल के आगे सारी राजनीतिक पार्टियाँ नतमस्तक हैं । दिल्ली में यत्र-तत्र-सर्वत्र छठ का आयोजन इतने व्यापक तौर पर सरकार द्वारा कराया जाना इसी जनशक्ति का द्योतक है । मैथिली-भोजपुरी अकादमी बनाकर वहाँ के लोगों को सम्मानित करने का एक और सरकारी प्रयास किया गया । यह सब मजबूरी में उठाए गए कदम हैं । लाखों की संख्या में दिल्ली में आकर यहाँ के मतदाता बने हुए ऐसे लोगों का मत किसी भी चुनाव में निर्णायक सावित हो रहा है । इस तरह रोजी-रोटी के खोज में दिल्ली आए लोगों की समस्याएं बिल्कुल अलग किस्म की होती हैं । वे तो समाज के निम्नतम पौदा पर खड़े हैं और नित्य जीवन-मरण से जूझते रहते हैं । बड़े-बड़े पूल और गगनचुंबी महलों से इन्हें क्या लेना-देना?

इनलोगों को दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उम्मीद की किरण दिखी । उन्होंने भ्रष्टाचारमुक्त स्वराज स्थापित करने का सपना दिल्लीवासियों को दिखाया जो वहाँ के समाज के निम्नतम स्तर के लोगों को भी बहुत ही आकर्षित किया और इनलोगों ने एकमुस्त आम आदमी पार्टी का समर्थन कर दिया । इस तरह दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री के आम आदमी पार्टी को दिल्ली में मिले चुनावी सफलता में पूर्वांचलियों का जबरदस्त योगदान था ।

दिल्ली में पूर्वांचलियों की बढ़ी हुई तादात और आगामी चुनाव पर पड़ने वाला इनका व्यापक असर सभी दलों को बेचैन कर रखा है । केन्द्र सरकार ने अनधिक्रित कालिनियों को नियमित करने हेतु संसद से कानून पारित करबा दिया है । अब ऐसे कालोनियों में रह रहे लोगों के जमीन- मकान का पंजीकरण भी हो रहा है । आम आदमी पार्टी की सरकार बहुत सारी सुविधाओं को मुफ्त करने का एलान कर चुकी है । पानी-बिजली पर तो पहले से ही रियायत दी जा रही थी । अब सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा करने की सुबिधा दी गई है । मोहल्ला क्लिनिक खोला जा रहा है । मुफ्त वाई-फाई की सुबिधा कई जगहों पर दी जा रही है । सरकारी स्कूलों की उपलव्धियों का नित्य गुणगान किया जा रहा है । अखबारों के पन्ने दिल्ली सरकार के विज्ञापनों से भरे रहते हैं । इतना ही नहीं, कहा यह भी जा रहा है कि कि अगर आम आदमी पार्टी फिर से सत्ता में आती है तो दिल्ली को स्वर्ग बना दिया जाएगा । सबाल है कि अगर ऐसा हो सकता है तो पिछले पाँच साल में क्यों नहीं किया गया? लेकिन यह जनतंत्र है। सब को अपनी बात कहने का अधिकार है । दिल्ली के तथाकथित प्रवुद्ध नागरिकों को  एक बार फिर निर्णय लेना है कि अगले पाँच साल तक उनको कैसी सरकार चाहिए? सबाल यह भी है कि क्या भारती जनता पार्टी अपने राष्ट्रवादी छवि और केन्द्रीय सरकार के काम-काज के द्वारा दिल्ली के जनता का विश्वास जीत पाएगी?  हाल ही में कई राज्यों में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय समस्यायों का वर्चस्व रहा है ,उस परिपेक्ष में सही वक्त पर सही निर्णय की जरूरत है । इतना तो तय है कि दिल्ली में चाहे कोई दल क्यों न हो ,वह पूर्वांचलियों के समर्थन के विना सरकार नहीं बना पाएगी। इसलिए सभी दल प्रयास रत है भी। देखना है कि आखिर बाजी किसके हाथ लगती है ।





लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

नागरिकता संशोधन कानून 2019


नागरिकता संशोधन कानून 2019



भारत के संसद के दोनो सदनो ने संविधान द्वारा तय प्रकृया का पलान करते हुए अपार बहुमत से संसद के हाल ही में संपन्न हुए  शीतकालीन सत्र में नागरिकता संशोधन कानून २०१९ पास किया  है । इसके बाद बारत के माननीय राष्ट्रपतिजी ने इस कानून को अपनी मंजुरी भी दे दी है । भारत के राजपत्र में यह कानून प्रकाशित भी हो गया है । इस तरह यह कानून पूरे भारतवर्ष में लागू हो गया है । इस कानून के लागू होते ही कुछ लोगों ने इसके खिलाफ भारत के उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दिया है । इसके बाद माननीय उच्चतम न्यायलय ने केन्द्र सरकार सहित सभी संवद्ध पक्षों को नोटीस जारी कर दिया है । २२ जनवरी २०२० को इस मामले में आगे की सुनवाई होना तय है । फिर ऐसा क्या हुआ कि इस कानून को लेकर पूरे देश में आग लगा हुआ है? विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इसे असंवैधानिक,सांप्रदायिक,मुस्लिमविरोधी और न जाने क्या-क्या कहती जा रही है । क्या इस कानून के विरोधियों को भारत के उच्चतम न्यायलय पर से भी विश्वास उठ गया है? क्या उन्हें यह पता नहीं है कि संसद में तमाम विपक्षी दलों ने अपने तर्क-कुत्रक द्वारा इस कानून का विरोध किया था । बाबजूद इसके अपार बहुमत से यह कानून संसद के दोनो सदनो में पारित हो गया । इस सब के बाबजूद कुछ विपक्षी दल असमाजिक तत्वों का सहयोग  लेकर सड़क पर उतड़ चुके हैं और हर संभव प्रयास कर समाज के एकवर्ग को भड़काने में लगे हुए हैं । क्या सचमुच वे लोग लोकतंत्र से अपना विश्वास खो चुके हैं ? अन्यथा संसद में बहुमत से पास इस कानून को इस तरह सड़कों पर विरोध नहीं करते वह भी तब जबकि इसके विरुद्ध माननीय उच्चतम न्यायलय सुनवाई कर रही है?

इस कानून के विरुद्ध में सबसे पहले उत्तर-पूर्व के राज्यों से उठना शुरु हुआ । वहाँ के राज्यों खासकर आसाम में विदेशी घुसपैठियों की समस्या बहुत पुरानी है । न्यायालय के आदेश पर आसाम मे राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC)वहाँ पर हाल ही में बनकर तैयार हुआ जिसमें करीब उन्नैस लाख विदेशी चिन्हित किये गए हैं जो गलत तरीके से सालों से वहाँ जमे हुए है । पहले तो अनुमान था कि यह संख्या चालीस लाख से कम नहीं है । लेकिन जब  तय प्रकृया द्वारा उन्नीस लाख  लोग राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC)से बाहर रह गए तो तभी से कुछ लोगों ने इसके पक्ष और विपक्ष में आबाज उठाना शुरु कर दिया था । सही बात तो यह है कि सायद ही कोई पक्ष इस तरह तैयार राष्ट्रीय नागरिकता पंजी(NRC) से संतुष्ट हो । इसी परिस्थिति से गुजर रहे वहाँ के समाज को कुछ दन बाद ही नागरिकता संशोधन कानून का सामना करना पड़ा । जाहिर है कि वहाँ के लोगों में पहले से ही विद्यमान अनिश्चितता का माहौल और गहरा गया । चारो तरफ अराजकता का माहौल बन गया। हिंसा होने लगी । सरकारी संपत्तियों को जलाया जाने लगा । केन्द्र सरकार ने यथासंभव कार्रवाई कर वहाँ के लोगों का गुस्सा शांत करने में  लग गई ,पर देखते ही देखते यहा आंदोलन पूरे देश में फैल गया ।

दिल्ली में और देश के अन्य प्रान्तों में यह आंदोलन अत्यंत तीव्र गति से फैलता गया । दुख की बात यह है कि आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय संपत्तियों का भारी नुकसान किया । जहाँ-तहाँ आगजनी,लूटपाट का माहौल बना दिया गया । जाहिर है इस परिस्थिति में पुलिस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती थी । आंदोलनकारियों के हिंसक व्यवहार का प्रतिरोध कानून के राज्य को बनाए रखने के लिए अनिवार्य था । सो पुलिस को जहाँ-तहाँ शक्ति प्रयोग करना पड़ा । इसके बाद पुलिस को गाली देने का दौड़ प्रारंभ हो गया । संभव है कि लगातार चल रहे उग्र और हिंसक आंदोलन को सम्हालने के क्रम में पुलिस से भी गल्ती हुई हो परंतु इसके लिए आंदोलनकारी ज्यादा जिम्मेदार हैं । आखिर इस कानून में ऐसा क्या है कि उनको इस तरह त्वरित और उग्र कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा जबकि इसी मामले पर उच्चतम न्यायलय में मामल लंवित है और सुनवाई की तारिख भी तय हो चुकी है । क्या यह उचित नहीं थT कि विपक्षी दल और आंदोलनकारी लोग उच्चतम न्यायलय के फैसले का इंतजार करते? इस से तो यस साफ स्पष्ट होता है कि ये लोग हर हाल में हंगामा खड़ा करना चाहते थे । पता था कि  उनके विरोध प्रदर्शन में कोई कानूनी दम नहीं है। फिर भी वे मोदी सरकार के विरुद्ध इस अवसर को पूरी तरह इस्तमाल कर लेना चाहते थे । चूंकि लोकतांत्रिक तरीके से वे इस सरकार का सामना नहीं कर पा रहे हैं ,अस्तु, उनको लगा कि सरकार को बदनाम करने का ,इसे अस्थिर करने का यह स्वर्णिम अवसर लगता है । इस तरह सुचिंतित कार्रवाई कर इनलोगों ने देश का माहौल बिगाड़ने का काम किया है ।

जिस तेजी से यह आंदोलन  पूरे देश में फैलता चला गया वह अपने-आप में रहस्यात्मक है । कारण यह कानून बेशक लागू हो गया है परंतु  व्यवहारिक तौर पर किसी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो ऐसा संभव नहीं  लगता है । तमाम विपक्षी नेता इस प्रकार एक स्वर से इस कानून के खिलाफ खड़े हो गए हैं जैसे कि कोई बहुत बड़ा अनर्थ हो गया हो । वास्तविक में इन सबको बोटबैंक बनाने का एक सुंदर अवसर लग रहा है । समाज के एकवर्ग को भयभीत कर ,कानून की गलत-सलत  एवम् मनमानी व्याख्या कर भ्रम की स्थिति पैदा करने में वे तात्कालिक रूप से सफल होते नजर आ रहे हैं । परंतु,राष्ट्रीय एकता को अकारण हो रहे क्षति को कोई सोच नहीं पा रहे हैं । देश-विदेश में भारत की प्रतिष्ठा को अकारण खराब किया जा रहा है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो संयुक्त राष्ट्र तक को दखल देने का आग्रह कर दी है । साथ ही उन्होंने और कई और मुख्यमंत्रियों ने इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं करने का एलान कर दिया है । लेकिन सबसे आगे तो केरल के मुख्यमंत्री ने राज्य के विधानसभामें इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव भी पास करबा दिया है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिन-रात संविधान की दुहाई देनेवाले राजनेता स्वयं संवैधानिक प्रावधानों का कुछ भी ख्याल नहीं कर पा रहे हैं । यह सर्वविदित तथ्य है कि राज्य की विधानसभा इस मसले  पर प्रस्ताव पास नहीं कर सकती है क्यों कि नागरिकता  के विषय में संसद ही कानून बना सकती है । फिर कैसे कोई राज्य संसद द्वारा विधिवत पास कानून को लागू नहीं करने का सरेआम एलान कर सकता है और साथ ही स्वयं को संविधान का रक्षक घोषित कर सकता है?

 

यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि नागरिकता संशोधन कानून का हिंसक विरोध उनही राज्यों में हुआ जहाँ बीजेपी या उसके सहयोगी/ समर्थक दलों की सरकारे हैं । इस तरह से खास-खास जगहों पर हिंसक घटनाएं घटित होना प्रायोजित ही लगती हैं । उसमें शामिल वे लोग ही हो सकते हैं जिनका इस देश की संपत्तियों को वर्वाद करने में तनिक भी दुख नहीं होता है,जिन्हें इस तरह के आचरण से चतुर्दिक भय का वातावरण कायम करना ही मूल उद्देश्य है,जो भारत की तरक्की नहीं देखना चाहते हैं,जो दुनिया में भारत को बदनाम करना चाहते है,इसकी एक गलत छवि बना देना चाहते हैं । ताज्जुब की बात है कि यह सब इतने तेजी से हुआ । ऐसा लग रहा है कि वे लोग घात लगाए मौका का पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे थे । अब जब कई राज्यों में हिंसा  फैलाने वाले लोग पकड़े जा रहे हैं तो उनमें विदेशी  ताकतों की संलिप्तता स्फष्ट हो रही है । जनतंत्र में विरोध करने का,सरकार से अलग राय रखने और व्यक्त करने का अधिकार देश के नागरिक को है । इस में कोई दो राय नहीं हो सकता है । परंतु विरोध शांतिपूर्ण ढ़ग से व्यक्त किया जाना चाहिए । किसी को हिंसक आंदोलन को चलाने का या समर्थन देने का अधिकार नहीं है । अगर इस तरह हिंसक गतिविधि चलता रहा तो देश में लोकतंत्र कबतक सुरक्षित रह पाएगा?



इन तमाम विवादों में उत्तर प्रदेश की सरकार ने एक अच्छा मिसाल कायम किया है । जो लोग सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट करने में शामिल पाए जा रहे हैं उन्ही लोगों से उसका हर्जाना अदा करने का आदेश दिया जा रहा है और सुनते हैं कि कुछ लोगों ने दिया भी है । इस तरह की कार्रवाईके बाद उत्तर प्रदेश में हिंसक विरोध कमा है । उपद्रवी भयभीत हैं । उन्हें लगने लगा है कि गलत करने वालेलोग कानून की गिरफ्त से बँच नहीं पाएंगे । अन्य राज्यों में भी ऐसा ही हो तो ऐसे अराजक तत्वों को हिंसक गतिविधि करने का साहस नहीं होगा और वे भाग खड़े होंगे ।

 सबाल ये भी है कि इस कानून का विरोधकरनेवाले लोग क्या वास्तविक रूप से परेशानी में पड़ गए हैं । क्या इस कानून ने उनसे कुछ भी छीन लिया है जो अबतक उनको सुलभ था ?इस कानून का सबसे पहले आसाम में विरोध होने का मूल कारण आसामी लगों के मन में उपजा यह भय है कि  इस से वंगलादेश से आए विदेशी लोगों का वहाँ बसना आसान हो जाएगा जिसे उन लोगों का सांस्कृतिक एवम् भाषायी विरासत खतरे में पर सकता हे । सभी जानते हैं कि इनही कारणों से आसाम में लंबे अवधि तक आंदोलन हुआ था जिसका अंत आसाम समझौता द्वारा संभव हो सका । आसाम समझौते के तहत  २४ मार्च १९७१ तक वहाँ  बसे हुए लोगों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने के उपयुक्त माना जा सकता है , लोगों का नागरिकता पंजी में नाम अंकित हो सकता है जबकि नये कानून के अनुसार  ३१ दिसम्बर २०१४ तक भारत में आ चुके शरणार्थियों को पात्रता मिल जाती है ।

नागरिकता संशोधन कानून २०१९ में यह प्रावधान है कि ३१ दिसम्बर २०१४ तक पाकिस्तान,बंगला देश और अफगानिस्तान से आकर भारत में शरण लेने वाले  वहाँ के उत्पिड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दी जा सकती है । इस कानून का विरोध करने वालो  का  कहना  है कि यह कानून  भारतीय संविधान की मूल आत्मा- धर्म निरपेक्षता के खिलाफ है । यह संविधान के अनुच्छेद १४ में दिए गए समानता के सिद्धान्त के भी खिलाफ है । उनके कहने का सारांश यह है कि अन्य धर्मावलंवियों के तरह पाकिस्तान,वंगलादेश और अफगानिस्तान से आए हुए मुसलमानों को भी इस कानून के तहत नागरिकता प्राप्त करने दिया जाए । नागरिकता कानून में इस संशोधन करने का मूल तात्पर्य ही इन देशों में प्रताड़ित  हो रहे अल्पसंख्यकों को  राहत  देना है । नागरिकता कानून के संशोधित प्रवधानों के तहत  पाकिस्तान,वंगलादेश और अफगानिस्तान से आए प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को छ: वर्षों की छूट मिल जाती है। जबकि सामान्यतः इस तरह नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारत में एगारह वर्ष रहना जरूरी होता है,इस कानून के तहत यह अवधि पाँच वर्ष कर दी गई है । सोचने की बात है  विशेष रूप से सताए गए लोगों के हित में बस इतने से अंतर के लिए, इस तरह का बबाल खड़ा कर देना क्या उचित है? इस कानूनी संशोधन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो भारत के किसी भी नागरिक के खिलाफ हो । एक अनुमान के  मुताबिक संशोधित अधिनियम के तात्कालिक लाभार्थी 31,313 लोग होंगे- 25,447 हिंदू, 5,807 सिख, 55 ईसाई, 2 बौद्ध और 2 पारसी। निश्चय ही इतने बड़े भारत देश के लिए यह संख्या बहुत नगण्य है ।

सरकार और प्रवुद्ध नागरिकों द्वारा निरंतर हो रहे प्रयास के बाबजूद आंदोलनकारी जनता में इस कानून के प्रति भ्रम फैलाने में लगे हुए हैं । वे वारंबार कहते जा रहे हैं कि भारत में रह रहे मुस्लिमों के नागरिकता पर समस्या हो सकती है । एनपीआर राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी का हबाला देकर मुस्लिमों को डराया जा रहा है । यह सब तब भी हो रहा है जब प्रधाममंत्रीजी ने खुद कईबार स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय नागरिकता पंजी पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है और इसका नागरिकता संशोधन कानून से कोई लेना-देना नहीं है।

यहाँ यह जान लेना उपयुक्त होगा कि एनपीआर ‘देश के सामान्य निवासियों’ की एक सूची है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, ‘देश का सामान्य निवासी’ वह है जो कम-से-कम पिछले छह महीनों से स्थानीय क्षेत्र में रहता हो या अगले छह महीनों के लिये किसी विशेष स्थान पर रहने का इरादा रखता है। देश में लोगों की संख्या का रजिस्टर, जो गांव, कस्बे, तहसील, जिला, राज्य, राष्ट्रीय स्तर पर तैयार होता है। 2010 में यूपीए शासन ने इसे लागू किया था।

एनपीआर का विचार यूपीए शासनकाल के समय वर्ष 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा लाया गया था। लेकिन उस समय नागरिकों को सरकारी लाभों के हस्तांतरण के लिए सबसे उपयुक्त आधार प्रोजेक्ट का इससे टकराव हो रहा था। एनपीआर के लिए डाटा को पहली बार वर्ष 2010 में जनगणना-2011 के पहले चरण, जिसे हाउस लिस्टिंग चरण कहा जाता है के साथ एकत्र किया गया था। वर्ष 2015 में इस डाटा को एक हर घर का सर्वेक्षण आयोजित करके अपडेट किया गया था। इसे अपडेट करना कानूनी बाध्यता है।राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के लिए जानकारियां जुटाने के तरीके में केंद्र सरकार में कुछ बदलाव किए हैं। अब एनपीआर में बायोमैट्रिक जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी और न ही किसी प्रकार का कोई दस्तावेज लिया जाएगा। इसे पूरी तरह से स्वघोषित रखा जाएगा।

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 (क्रमांकित) 2004 का अधिनियम 6 के तहत केन्द्र सरकार भारतीय नागरिकों का राष्ट्रीय पंजी तैयार करबा सकती है ।1955 का नागरिकता अधिनियम भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य पंजीकरण और उसे राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने का प्रावधान करता है। 2003 के नागरिकता नियम, 1955 के नागरिकता अधिनियम के तहत बनाए गए, राष्ट्रीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर की तैयारी का तरीका बताते हैं। एनआरसी में अवैध अप्रवासियों की पहचान करने की बात कही गई है, चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या धर्म के लोग हों । एनआरसी बहरहाल सिर्फ असम में लागू है जबकि सीएए देशभर में लागू होगा।



लेखक-रबीन्द्र नारायण मिश्र

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