शनिवार, 4 जुलाई 2020

रेलक डायरी

रेलक डायरी

 

पहिने यातायातक प्रमुख साधन बस वा रेल छल । हवाइ जहाज तँ सुनबाक वस्तु छल । पैघ लोकसभ ओकर उपयोग करथि । साधारण आदमीकेँ तँ बस,ट्रेन ,रिक्सा नहि तँ पैरे चलबाक जोगार करए पड़ैक । कतहु -कतहु टैक्सी सेहो चलैक । मुदा ततेक महग रहैक जे आपवादिक परिस्थितिएमे लोक ओकर उपयोग करए । टैक्सीक एकटा दोसर रूप अएलैक टेकर माने जीप जाहिमे यात्रीसभ बसे जकाँ कोचल जाथि आ भाड़ा सेहो कमे लगैक । मुदा टेकरक उपयोगिता दस-बीस माइल धरि छलैक । बेसी दूर जँ जेबाक अछि तखन तँ ट्रेनेक टिकट लेबए पड़ैक । ट्रेनेक टिकट लेब आइ-काल्हि जकाँ आसान नहि रहैक । ओहि लेल स्वयं वा कोनो अपन लोककेँ टीसनक खिड़कीपर घंटों पाँतिमे ठाढ़ होबए पड़ैक । ओहि बीचमे कैकबेर धकमधुक्कामे जेबी कटि जाइत छलैक । हारि कए हुनका बिना टिकट लेने वापस होबए पड़नि । जँ गर्मीक छुट्टीसँ पहिने यात्रा करबाक अछि तखन तँ टिकट भेटनाइ बहुत मोसकिल होइत छल । कैकगोटे चारिबजे भोरेसँ टीसनक खिड़कीपर पाँति मे लागि जाइत छलाह । ओहि बीचमे कैकबेर नेटवर्क खराप भए जाइत छलैक । आब ठाढ़ भेल रहू । कहि नहि कखन जा कए फेरसँ नेटवर्क वापस आएत आ टिकट कटनाइ शुरु होएत । एहि तरहे घंटोक  तपस्याक बाद टिकट भेटैक । कैकबेर टिकट खिड़की धरि पहुँचलाक बाद ट्रेनमे जगह भरि जाइत छलैक तखन । जएह-सएह टिकट लोक लए लैत छल । एतेक प्रयासक बाद टिकट लेलाक उपरांत जखन लोक घर वापस आबए तँ लगैक जेना पहाड़ तोड़ि लेलहुँ। मुदा आब समय बदललैक । घरे बैसल आनलाइन टिकट कटि जाइत छैक,बदलि जाइत छैक आ आवश्यक भेलापर रद्दो भए जाइत छैक ।

रेलक पहिल यात्रा हम बाबूकसंगे  दरभंगासँ मुहम्मदपुर टीसन जेबाक हेतु केने रही । हम पहिलबेर अपन मामागाम(सिंघिआ ड्योढ़ी) जाइत रही । ओहि समयमे टेकटारिटीसन नहि बनल रहैक । तेँ मुहम्मदपुर  उतरि कए पैरे पिंडारुछ बाटे सिंघिआ जेबाक रहए । पसिंजर ट्रेन रहैक । दरभंगासँ सीतामढ़ी जाएबला यात्रीसभ ठसा-ठस भरल रहैक । रेलमे बैसलाक बाद लागए जेना सौंसे दुनिआ हिलि रहल छैक । नीचा काठक फट्टाक बीचमे बड़का-बड़का उरीससभ भरल छल । रहि-रहि कए काटैक । गर्मीक समय रहैक । पंखा बंद पड़ल छल । सभ यात्री घामे-पसीने बेहाल रहथि । मुहम्मदपुर टीसन थोड़बे कालक बाद आबि गेल छल । बहुत मोसकिलसँ यात्रा संपन्न भेल। हम प्रसन्नतापूर्वक मामागाम दिस पैरे बाबूक संगे बिदा भए गेल रही । एकर बाद तँ कतेको बेर ट्रेनपर चढ़लहुँ । कतए-कतए ने गेलहुँ। एहिमेसँ रेल यात्राक अनुभवक वर्णन कए रहलहुँ अछि ।

एकबेर हम पटनासँ दिल्ली मगध एक्सप्रेससँ दिल्ली जाइत रही । हमर आरक्षण स्लीपरमे रहए । हमरा संगे हमर श्रीमतीजी सेहो रहथि । जौँ-जौँ रेल पटनासँ आगा बढ़ल बिना आरक्षणबला यात्रीसभक संख्यामे इजाफा होबए लागल । मुगलसराय अबैत-अबैत तँ टस सँ मस हेबाक जगह नहि बाँचल। सौचालय धरिमे यात्री बैसल रहए । गर्मीक मौसम रहैक । ताहिपरसँ ठसाठस भरल यात्री । के ककरा सम्हारत ।  पटनामे बहुत मोसकिलसँ अपन शायिका पर काबिज भेल रही । मुदा रहि-रहि कए केओ-ने-केओ कनीक घुसकबाक आग्रहक संग लगीचमे आबि जइतथि आ जाबे किछु बजितहुँ ताबे ओ अपन जगह बना चुकल रहितथि । तकर बाद हम झगड़ा केनाइ शुरु करितहुँ। बहुत मोसकिलसँ शायिकाकेँ खाली करओलहुँ आ चतरि कए सुति रहलहुँ जाहिसँ केओ फेरसँ नहि बैसि जाए । थोड़े कालक बाद किछु नव यात्रीसभ डिब्बामे पैसलाह आ बैसबाक जोगारमे एमहर-ओमहर घुमए लगलाह । हमरा फेर कान ठाढ़ भेल । अपना भरि साकंछ भेलहुँ । हमर श्रीमतीजीक शायिका तँ ताधरि यात्रीसँ भरि चुकल छल । हम निरंतर प्रयाससँ अपन शायिका बचओने रही ।  दू-तीनटा यात्री हमर शायिका दिस बढ़ल । हमहु विरोध केनाइ शुरु केलहुँ । बाताबाती सेहो होबए लागल ।  ओही बीचमे एकटा यात्री कहैत छथि –लगत है कि ढोढ़ चराबत है । दोसर यात्री सेहो किछु बाजल । तेसर से अपन टीप देलथि । हम असगर हुनका सभसँ शास्त्रार्थ करैत रहलहुँ । ताबत ओहीमेसँ केओ बुधिआर यात्री बाजल

एहि लगारी संगे के जीतत? दोसरठाम चलैत चल ।

आ ओ सभ दोसर डिब्बा दिस बढ़ि गेलि ।

रेलगाड़ी मुगलसरायसँ आगु बढ़ल । मोनमे सोचलहुँ जे आब चैनसँ सुति सकैत छी । कनिके कालक बाद एकटा मोछिअल पुलिसके गलामे बंदुक लटकेने पैर लग ठाढ़ देखलिऐल । जाबे किछु बुझितहुँ,किछु बजितहुँ ताबे तँ ओ अपन काज कए चुकल छल । ओ ससरि कए पैर दिस बैसि गेल रहए । हमरा संतोख दिआबक हेतु कहलक-

अलीगढ़मे उतरि जाएब । ताबे कनी पैर सोझ कए लैत छी ।

ओकर ढब देखि किछु प्रतिवाद करबाक साहस नहि भेल । चुप्पे रहि गेलहुँ । रेल आगु बढ़ि रहल छल । थोड़बे कालक बाद एकटा फौजी माथा लग ठाढ़ देखेलाह । हम करोट बदलबाक प्रयास कए जगह छेकबाक प्रयास करितहुँ ताहिसँ पहिने ओ हमर सिरमा लग बैसि गेलाह । ओ फौजी भेखमे रहथि । मुँहसँ कनी-कनी दारु भभकि रहल छल । की करितहुँ? जान बचबैत  रहि गेलहुँ । शायिकाक दुनू दिस दूगोटे तेना बैसि गेल रहथि जे हमरा सुतल रहब संभव नहि छल । अस्तु,हमहु उठि कए बैसि गेलहुँ । रेल आगु बढ़ैत रहल । आगरा अबैत-अबैत दुनूगोटे उतरि गेल रहथि । शायिका खाली भए गेल रहए । बाहर फरीछ भए रहल छलैक। श्रीमतीजी सेहो उठि गेल रहथि । चाहक अमल जोर पकड़लक । ताबे केओ आबाज देलक-चाह चाह । हम चिकरि कए ओकरा दू कप चाह देबाक आग्रह केलिऐक । कनी कालक बाद चाह बला दूकप चाह देलक । चाह की छल लागल जेना माँर पीबि रहल छी । मुदा उपाय की छल ? जौँ-जौँ परीछ होइत गेल तँ तँ ट्रेनमे बिना आरक्षणबला दैनिक यात्रीसभ पैसैति गेलाह । थोड़े कालक बाद तँ किछु एहन यात्रीसभ पैसलाह जे ट्रेनमे तास खेलाइत जाथि । ई हुनकर सभक नित्यक कार्यक्रम छल । तकैत-तकैत ओ सभ हमरे शायिकाक लग-पासमे बैसि गेलाह । हमरा आग्रह केलाह जे कातक शायिकापर चलि जाइ । उपाय की छल? हम ओतहि चलि गेलहुँ । ओ सभ तास खेलाइत रहलाह । ट्रेन आगु बढ़ैत रहल । अंततोगत्वा,हमसभ नईदिल्ली टीसन पहुँचलहुँ । जाइत-जाइत ओ सभ माफी सेहो मांगि लेलनि । पढ़ल-लिखल लोक जे रहथि । थाकल-ठेहिआएल हमसभ प्लेटफार्मपर उतरलहुँ ।

एकबेर हमर श्रीमतीजी पटना राजधानीसँ दिल्ली आबि रहल छलीह । संगमे हमर पुत्र क्षितिज सेहो रहथि । हम नई दिल्ली टीसनपर हुनकर प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ ।  रेलक आगमन समय भए गेल छल । तथापि ओ आबि नहि रहल छल । पता लागल जे रेल गाजिआबादमे अड़कल अछि ।  बहुत कालक बाद अजमेरी गेट दिस ओहि रेलक आगमनक सूचना प्रसारित होबए लागल । हम गेटे लग ठाढ़ रही जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ कोनो दिक्कति नहि होनि । मोनमे सोची जे राजधानीसँ आबि रहल छथि तेँ कोनो परेसानी नहि भेल हेतनि । नीकसँ खेने हेतीह । थोड़बे कालमे हमर एहि आशापर पानि फिरि गेल । दुनूगोटे बहुत थाकल लागि रहल छलाह । बुझेबे नहि करए जे बात की भेलैक? एतेक परेसान किएक लागि रहल छथि?  सामानसभ गाड़ीमे रखलाक बाद पुछलिअनि-

एतेक थाकलि किएक लागि रहल छी?”

कहए लगलीह- ट्रेनमे भोजन बहुत दिक्कति भए गेलैक । यात्रीसभ पैंट्रीकारक सभटा सामान लुटि लेलकैक ।  जकरा जे हाथ लगलैक से लए कए निकलि गेल ।

एना भेलैक कोना? ”

बैरासभ किछु बोगीमे तँ नीकसँ भोजन करओलक । तकर बाद जेना अंठा देलकैक । ककरो भेटलैक केओ मुँहे देखैत रहि गेल। एही बातपर यात्रीसभ तमसा गेल । बड़ीकाल धरि हल्ला होइत रहल । तेँ गाजिआबाद टीसनपर आबि कए ट्रेन ठाढ़ भए गेल रहैक। बहुत कालक बाद कोना-ने-कोना ट्रेन खुजल ।

आखिर ओ सभ डेरा पहुँचलथि आ जल्दीसँ चाह-पान केलथि । तखन जान-मे-जान अएलनि ।

एकबेर हमरा श्रीमतीजी आ सासुक संगे गरीबरथसँ दिल्लीसँ मधुबनी जेबाक रहए । आनंद विहार टीसनपर पहुँचलाक बाद लगबे नहि करए जे इहो टीसन दिल्लिएमे छैक ।  यात्रीसभक बगए-बानिसँ लगैत जेना दरभंगा टीसनक प्लेटफार्मपर ठाढ़ छी । लोकसभ अपन-अपन गोल बनाकए समानक रक्षा करैत गप्प-सप्पमे लागल छलाह ।  ट्रेन अएबामे अनावश्यक विलंब भए रहल छल जखन कि ओकरा ओतहिसँ बनि कए चलबाक रहैक । ओहि समयमे आनंदविहार टीसन बनले रहए । ओतेक घेर-बेर नहि रहैक । मुदा यात्रीसभ ठसाठस भरल छल। ट्रेनक आगमनमे विलंब देखि हमसभ प्लेटफार्मेपर गर देखि कए बैसि गेलहुँ । कनीके हटि कए पचीस-तीस गोटेक एकटा गुट छल । ओहिमे किछुगोटे बैसल तँ किछु गोटे ठाढ़े रहथि ।  ककरो हाथमे झोड़ा तँ ककरो हाथमे मोटा छल । केओ अपन दुधपीबा नेनाकेँ दूध पिआ रहल छलि । माने ओकरासभकेँ देखलाक बाद कोनो तरहें नहि लागल जे ओ सभ यात्री नहि छथि । किछुकालक बाद ट्रेन प्लेटफार्मपर आएल। चारूकातसँ यात्रीसभ ट्रेन दिस दौड़ल । कनीके कालमे हालति एहन भए गेलैक जे ट्रेनक कोनो डिब्बामे पैसि नहि सकैत छलहुँ । सभ डिब्बाक गेटपर यात्री जेना-तेना लटकल रहए । आबकी कएल जाए? हमरसभक डिब्बा लगीचेमे रहए । मुदा ताहिसँ की? गेटपर हालति देखि ओहिमे पैसबाक साहस नहि होअए । मुदा ट्रेनमे चढ़बाक तँ छलहे । आखिर श्रीमतीजीकेँ सामानसभक रखबारी हतु प्लेटफार्मपर छोड़ि सासुक संगे गेट दिस बढ़लहुँ । गेटकेँ किछुगोटे तेनाक गछारने छल जे ओहिमे पैसले नहि होअए । हमर सासुक हाथमे डाली रहनि ।  जखन गेटसँ आगा बढ़ल नहि भेल तँ वापस प्लेटफार्मपर आबि हुनकर डाली राखि देलहुँ । हम दुनूगोटे गेट फेरसँ पहुँचलहुँ। ताबे तँ डिब्बा ठसाठस भरि गेल छल । गेटक कोनपर एकटा  नवालिग छौंड़ा लटकल छल । ओकरा लाख कोशिश केलहुँ जे कनी हटए से कथी लेल हटत । जेना-तेना आगु बढ़बाक प्रयासमे हम दुनूगोटे आगु-पाछु भए गेलहुँ । ओ अपन शायिका धरि चलि गेलीह। हम वापस प्लेटफार्मपर श्रीमतीजीकेँ आनए गेलहुँ । सामानसभक संगे जेना-तेना गेटसँ अंदर पैसलहुँ । श्रीमतीजी आगु आ हम हुनकर पाछु रही कि किछु गोटे धकमधुक्का करए लागल । हमर पैरमे केओ जोरसँ धक्का मारलक जाहिसँ सामान लेने हम धराम धए खसलहुँ। हाथक सामानसभ सौंसे डिब्बामे पसरि गेल । एहनो हालतिमे एकटा यात्री मदति करए नहि आएल । ताबे हमर सासुकेँ चिकरैत देखलिअनि-काटि लेलक,काटि लेलक ।ओ एतबा बजले हेतीह कि डिब्बाक दोसर गेटसँ पचीस-तीसगोटे धराम-धराम कुदि गेल । ट्रेन ससरए लागल छल । हमर सासुक डाँरमे बान्हल बटुआमेसँ टाका,गहनासभ पाकेटमारीमे चलि गेल छलनि । ततेक सफाइ सँ काज केने छल जे हिनका किछु पता नहि चललनि। जखन अपन शायिकापर बैसि स्थिर भेलीह तँ देखैत छथि जे बटुआ तँ अछिए नहि । मुदा जे हेबाक छल से भए गेल छल । ट्रेन क्रमशः गति पकड़लक आ हमसभ अफसोच करैत रहलहुँ जे बेकारे एहि ट्रेनमे चढ़लहुँ ।

ई बात सन्  २०१० क थिक । हम श्रीमतीजीक संगे ट्रेनसँ अमृतसर जाइत रही । स्लीपर किलासमे हमरा दुनूगोटेक नीचाक शायिका आरक्षित रहए । टीसनपर टेम्पुबलाकेँ भाड़ा देबाक हेतु ओ अपन झोड़ामेसँ टाका निकाललीह । टेम्पुबलाकेँ भाड़ा देलिऐक आ ओ चलि गेल । ओ बाबू ओतहिसँ किछु बदमाससभ हमरासभक पाछा लागि गेल । हमसभ ई बात तँ तखन बुझलिऐक जखन अमृतसर अतिथि घरमे पहुँचि गेलहुँ । ताबे की सभ भेल से कहि रहल छी । ट्रेन खालिए जकाँ रहैक । हमसभ अपन-अपन शायिकापर बैसि गेलहुँ। रतुका समय रहैक । भोर होइतहि ट्रेन अमृतसर पहुँचि जइतैक । से एहि ट्रेनक खुबी छल । थोड़बे कालमे डिब्बा भरि गेल । हमसभ निचैन अपन-अपन जगहपर रही । बीच-बीचमे देखिऐक जे तरह-तरहक यात्रीसभ अबैत अछि,किछु काल रहैत अछि आ चलि जाइत अछि । किछु टीसन बितलाक बाद यात्रीक एकटा दोसर गुट आएल । ओहिमेसँ किछुगोटे हमरे लग-पासमे शायिकाक आरक्षण टीटीबाबूसँ कहि कए करा लेलक । किछुगोटे ऊपर तँ किछु गोटे नीचाक शायिकापर चढ़ि गेल । हमसभ जखन भोजन करए लगलहुँ तँ ओहीमेसँ एकटा ऊपर बैसल यात्रसँ किछु लेबाक उपक्रम करैत हमर श्रीमतीजीक भोजनमे कोनो पाउडर खसा देलकनि । भोजनक बाद जखन ओ हाथ धोबाक हेतु ट्रेनक वास बेसीन दिस बढ़लीह तखनो ओ सभ किछु पाउडर एमहर-ओमहर छिड़िऔलक । किछुए कालक बाद हुनका ततेक निन लगलनि जे सुति रहलीह । मुदा हम जगले रही । हमरा निन्न हेबे नहि करए । भोरे ट्रेन अमृतसर टीसनक प्लेटफार्मपर पहुँचि रहल छल । हमसभ उठि गेल रही । ताबतेमे ओहीमेसँ एकटा यात्री हमर नाम लए कहैत अछि-

मिश्राजी! यह चाभी का गुच्छा आपका है क्या?”

कहि ने के एकटा कुंजीक झाबा शायिकाक नीचा लटका देने रहैक । हम ओकरा दिस ध्यानसँ देखलिऐक तँ ई स्पष्ट बुझाएल जे हमर नहि अछि । अस्तु,हम मना कए देलिऐक । मुदा एहि बातसँ माथा ठनकल जे ईसभ हमर नाम कोना बुझलक?खैर! चु्प्पे रहि गेलहुँ। ई बात अखनो नहि सोचाएल जे ओसभ लफुआ अछि ।ओ सभ चाहैक जे कहुना हमर ध्यान कनीको काल लेल एमहर-ओमहर होअए जाहिसँ ओ सभ बैगमे सँ टाका निकालि सकए । थोड़ेकालक बाद ओहीमेसँ एकगोटे कहैत अछि-

सीट ऊपर कर लीजिए । स्टेसन आने ही बाला है ।

हम श्रीमतीजीक सामान नीचा राखि सीट ऊपर करए लगलहुँ । ताबतेमेसँ केओ हमर बैगमे हथोरिआ देबए लागल । मुदा ओ किछु करितए ताहिसँ पहिनहि हमर श्रीमतीजी ओतहि ठाढ़ि भए गेलि । हम अपन शायिकापर बैसि गेलहुँ ।  एतबेमे फेर केओ चिचिआइत अछि-

जल्दी उतरिए। स्टेसन आ गया । ताबे हमसभ गेट लग सामान लए कए आबि गेल रही । ओकरसभक प्रयास रहैक जे धक्का दी जाहिसँ हम खसी आ बैग लए ओसभ भागि जाए । मुदा बँचबाक रहए । हम ओकरसभक बातमे नहि अएलहुँ । ओकरा कहलिऐक-

आपको जल्दी है तो आगे बढ़ जाइए ।

मुदा तखनो ई नहि बूझि सकलिऐक जे ई सभ असलमे बदमास  अछि । ओतँ जखन अतिथि गृह पहुँचि श्रीमतीजी बेग खोललथि तँ देखैत छथि जे सभटा टाका निकालि लेने अछि । आओर कोनो सामान नहि छुने छलनि । मुदा हमर बैग बाँचि गेल छल । रातिमे भोजनमे जे पाउडर मिला देने रहनि तकर असर आब जोर पकड़ि रहल छलनि । थोड़बे कालक बाद हुनका अस्पताल लए जाए पड़ल ।  तखन बुझाएल जे ओ सभ सामान्य यात्री नहि अपितु एकटा गैंगक हिस्सा छल आ रस्ता भरि हमरा लोकनिक टाका आ मुल्यवान सामान चोरेबाक फिराकमे लागल छल । बहुत मोसकिलसँ श्रीमतीजीकेँ डाक्टरसभ ठीक केलक । एतबे संतोख भेल जे जान बाँचि गेलनि । घुमनाइ तँ  नहिए भए सकल ।

एकबेर हम जरूरी सरकारी काजसँ ट्रेनसँ जाइत रही । यात्राक कार्यक्रम आकस्मिक बनल आ हम रेलमे बिना आरक्षण चढ़ि गेल रही । मेरठक लगीचमे केओ अकस्मात पैर छुबि गोर लगैत छथि आ आग्रह करैत छथि -

सर! अहाँ हमर शायिकापर बैसि जाउ ।

हम पुछलिअनि-अहाँ के छी? हमरा लेल अपन जगह किएक छोड़ि रहल छी?”

ओ जबाब देलाह-सर! अहींक कृपासँ हमरा नौकरी भेल ।

से कोना? ”

हमरा तँ किछु नहि मोन अछि?”

हम एसएससीक परीक्षा पास कए गेल रही । मुदा हमर कागज कोनो कारणसँ आपत्तिमे पड़ि गेल छल । संयोगसँ अहाँसँ एसएससी इलाहाबादमे भेंट भेल । अहाँ हमर ताकि कए सभटा काज कए देलहुँ जाहिसँ हमरा थोड़बे दिनमे नियुक्तिपत्र भेटि गेल ।

हम हुनकर बात सुनि अबाक रहि गेलहुँ । नौकरीक क्रममे एहन कतेक गोटेक काज होइते रहैत छैक । मुदा ओ युवक एहिबातक संज्ञान लैत हमरा आदरे नहि केलाह अपितु ओहन भीड़मे अपन सीट दए देलाह,ताहि बातसँ हम बहुत आश्चर्यचकित रही ।

एकबेर हम इलाहाबाद(आब प्रयागराज)सँ पटना ट्रेनसँ जाइत रही । हमरा स्लीपरमे आरक्षण रहए । हम अपन शायिकापर बैसले रही कि ढाक्टर जयकान्त मिश्रजीकेँ देखलिअनि । हुनका हाथमे एकटा झोड़ा रहनि आ ओ सीट तकैत एमहर-ओमहर बौआइति रहथि । हुनका आरक्षण नहि रहनि । कहलाह- अकस्मात पटनामे एकटा कार्यक्रममे जेबाक हेतु बिदा भए गेलहुँ । आरक्षण नहि करा सकलहुँ । हम आग्रहपुर्वक अपन शायिका हुनका दए देलिअनि । बहुत कालधरि ओ मना करैत रहलाह । परंतु,हमर आग्रह देखि मानि गेलाह । बादमे हमरो एकटा शायिका भेटि गेल ।

रेल यात्रामे कैकबेर एहन लोकसँ भेंट भए जाइत अछि जकरा बिसरल नहि जा सकैत अछि । जिनकर बातक प्रभाव बहुत दूरगामी होइत अछि । एहने एकटा सहयात्री भेटि गेलाह दरभंगासँ दिल्लीक यात्रामे । ओ मुजफ्फरपुरमे हमरा सामने बला एसी शायिकापर रहथि । दिनक समय रहैक तेँ यात्रीसभ बैसले रहथि । केओ किछु तँ केओ किछु करबामे व्यस्त रहथि । क्रमश: गप्प-सप्प प्रारंभ भेल । ओ अपन पैतृक संपत्तिक बटबाराक प्रसंगमे गप्प करैत-करैत कैकबेर भावुक भए जाथि । कहए लगलाह-

जखन कखनो गाम गेलाक बाद बटबाराक चर्चा करितहुँ तँ भाए सासुर चलि जाइत छलाह । हुनका बूझल रहनि जे किछु दिनक बाद हम वापस भए जाएब । तेँ दस दिनक बाद अबितथि आ तरह-तरहक कबाइत पढ़ए लगितथि । आपसी झंझटिक डरसँ सहर वापस चलि आबी । एहिना कैकबेर होइत रहल ।  अंतमे,एहि विषयक चर्चे छोड़ि देलहुँ । तकर बाद तँ गाम गेलाक बाद पाहुन जकाँ स्वागत होइत छल ।  भाएक हाथमे किछु टाका दए दिअनि । ओ सपरिवार खूब सेवा करथि। नीकसँ गप्प-सप्प करथि । हमहु प्रसन्नतासँ समय बीताबी आ ओहोसभ । कतेक तरहक व्यक्तिगत अनुभवसभ कहैत रहलाह जे सुनि बहुत जानकारी भेटल । दिल्लीमे ट्रेनसँ उतरबासँ पहिने ओ अपन मोबाइल नंबर सेहो देलनि । मुदा तकर बाद फेर कहओ गप्प नहि भए सकल । मुदा हुनकर बातसभ मोनपड़िते रहैत अछि।

एकबेर हम गरीबरथ ट्रेनसँ मधुबनीसँ दिल्ली जाइत रही । सामनेक शायिकापर एकटा महात्माजी आ तकर ऊपर हुनकर चेला शंकर रहथि । हमरा संगे हमर श्रीमतीजी सेहो रहथि । शंकर  महात्माजीक सेवामे लागल रहैत छल । जखन तमाकुलक काज भेल तँ से चुना कए देलक । पानिक काज भेल तँ बोतलमेसँ पानि निकालि कए देलक । भोजनक समय झोड़ामे सँ भोजन निकालि कए देलक । तकरबाद तरह-तरहक दबाइसभ देलक । सभ किछु खेलाक बाद निन्नक गोटी सेहो देलकनि । तखन कहलखिन जे कनी मोटका कंबल निकाल । शंकर मोटका कंबल ओढ़ा देलकनि । तखन प्रसन्न भए महात्माजी बजैत छथि-आब जतेक एसी धुकबाक होइक से धुकओ । हम तँ पड़लिअनि । ताहिसँ पूर्व महात्माजी  रहि-रहि कए दिल्ली स्थित अपन आश्रममे चेलासभकेँ फोन कए हाल-चाल लैत रहलाह । ओहीक्रममे पता लगलनि जे केओ भक्त पचीस हजार टाका दए गेलैक अछि । आब तँ महात्माजी बेस चिंतामे पड़लाह । होनि जे कहीं चेलासभ टाका एमहर-ओमहर ने कए देथि । तेँ रहि-रहि कए फोनपर वारंबार कहैत रहलखिन जे ओहि टाकाकेँ सम्हारि कए राखल जाए आ हुनका दिल्ली अएलापर देल जाए । गप्प-सप्पक क्रममे ओ कहलाह जे हरिद्वारमे हुनका बड़ीटा आश्रम छनि । हमरासभकेँ हरिद्वार आश्रमपर अएबाक आग्रहस सेहो केलाह । दोसरदिन भोर होइतहि ओ चेलासभकेँ फोन करए लगलाह ।  कोन प्लेटफार्मपर ट्रेन अड़कतैक तकर जानकारी लेलथि । केओ भक्त कार लए टीसनपर हुनकर स्वागत करबाक हेतु भोरेसँ ठाढ़ छलाह । मुदा ट्रेन तीन घंटा विलंब चलि रहल छल । मुदा हुनकर भक्त टस सँ मस नहि भेल । कार लेने प्रतीक्षा करैत रहल । आनंद विहार टीसनपर ट्रेन पहुँचि गेल छल । हुनकर भक्तसभ डिब्बामे पैसि गेल । बहुत आग्रहपुर्वक हुनका बाहर लए गेल । मुदा हुनकर ध्यान निरंतर पचीस हजार टाका पर छल । ओ सभसँ पहिने अपन चेलासभसँ तकरे जिज्ञासा केलथि आ सभ तरहें आश्वस्त भेलाक बादे आगु बढ़लाह । हमहुसभ ट्रेनसँ उतरि गेलहुँ । महात्माजीक ठाठ-बाट भरि रस्ता मोन पड़ैत रहल ।

रेल यात्राक एकटा  मनोरंजक अनुभव भेल रहए जखन हम गरीबरथमे आनंद विहारसँ मधुबनी जाइत रही । ई ट्रेन सोझे गाम पहुँचा दैत छलैक,सामान्यतः विलंब नहि होइत छलैक, टिकट अपेक्षाकृत आसानीसँ आ एसी सेहो रहैक तेँ गाम जेबा काल एहि ट्रेनमे यात्रा होइते रहैत छल । हम जेना-तेना अपन-अपन शायिकापर बैसि गेलहुँ । थोड़े कालक बाद ट्रेन अपन गति पकड़लक । डिब्बामे दिल्लीसँ गाम लौटि रहल कतेको  युवक सभ छलाह । सभक हाथमे मोबाइल आ ताहिमे चलैत भोजपुरी गाना । जकरा जतेक जोरसँ मोन होइक ततेक जोरसँ बजा रहल अछि सौंसे डिब्बामे तरह-तरहक संगीत बाजि रहल संगीत चलि रहल छल । कुलमिला कए ओ संगीत नहि एकटा कोलाहलक रूप धए लेलक । लगैत छल जे कान फाटि जाएत । जहन बर्दास्तसँ बाहर भए गेल तँ एकगोटेकेँ टोकलिऐक-

कनी आबाज कम कए दहक । कानमे झर पड़ि रहल अछि ।

से किएक?  हम कोनो टिकट नहि लेने छी । हम अपना सीटपर बजा रहल छी । एहिमे अहाँक आपत्ति करबाक कोन अधिकार?”

चारूकात ओकरेसन लोक भरल रहैक । तेँ बेसी बजनाइ ठीक नहि बुझाएल । चुप्प भए गेलहुँ । बहुत मोसकिलसँ समय कटल। घंटा भरिक बाद जखन टिकट चेकर अएलाह तँ हुनका सभटा बात कहलिअनि । ओ ओकरापर बहुत जोरसँ तमसेलखिन तखन जा कए मोबाइलक नाच-गानसभ बंद भेल । जानमे -जान आएल । एहि यात्राक बाद गरीबरथसँ यात्रा केनाइ छोड़ि देलहुँ ।

एकबेर हम  नई दिल्लीसँ मधुबनी प्रथम श्रेणी एसीमे जाइत रही छपरामे एकटा यात्री ओहि मे हमरासभ लग पहुँचलाह । ओहिसँ पहिने ओहि कुपेमे हमही असगरे रही । मुजफ्फरपुरसँ निकललाक बाद ट्रेनक गति बहुत मंद होबए लागल । एक- एक टीसनपर ठाढ़ भए जाइत छल आ आगु घुसकबाक नामे नहि लैत रहैत छल । मुजफ्फरपुरसँ दरभंगा पहुँचबामे ओहि ट्रेनकेँ सात घंटा समय लागि गेलैक । बीचमे ओहि यात्रीसँ गप्प होइत रहल । ओ छपरामे पुलिस विभागमे डीएसपी छलाह । एतेक भारी अधिकारी छलाह ओहो पुलिसमे तखन टिकट लेबाक कोन काज? ओ कहलाह जे छपरामे काज करैत छथि आ डेरा छनि दरभंगामे । तेँ ओ बेसी काल ओहि ट्रेन सँ जाइत-अबैत रहैत छथि । प्रथम श्रेणी एसी खाली रहैथ छैक तेँ ओही डिब्बामे यात्रा करैत छथि । से तँ बुझलहुँ । मुदा आश्चर्य भेल जे जखन साल-डेढ़ सालक बाद फेर ओही ट्रेनसँ हम जाइत रही तँ प्रथम श्रेणी एसीक कुपमे छपरामे ओ हमरा फेर भेटि गेलाह । हम हुनका चिन्हि गेलिअनि आ कहबो केलिअनि जे पछिला बेर अहाँ एही ट्रेनमे हमरा भेटल रही । एहि बातपर ओ हँसैत कहलाह जे आब ओ सेवानिवृत्त भए गेल छथि आ किछुदिनक बाद ओ दरभंगे रहए लगताह । तखन हुनका ओहि ट्रेनक चक्कर छुटि जेतनि ।

एहन साइते केओ होएत जकरा रेलयात्रासँ जुड़ल रोमांचकारी अनुभव नहि भेल होइक । चाहे रेलक टिकट लेबा काल ,वा रेलमे चढ़बा काल वा चढ़ि गेलाक बाद मुदा कतहु-ने-कतहु किछु -ने- किछु अविस्मरणीय घटित होइते रहैत अछि । गोटैक बेर तेहन सहयात्री भेटि जेताह जे रस्ता भरि हँसति-हँसति पेट फुलि जाएत । कहिओ एहनो सहयात्रीसँ भेंट भए जाइत अछि जे एको क्षण बिना झगड़ाक नहि बितैत अछि । रेल यात्रा करबाक उद्येश्य सभक सभरंग होइत छैक । केओ विद्यार्थी छुट्टीक बाद अपन कालेज जा रहल छथि तँ केओ इलाज करबाक हेतु सहरक अस्पताल जेताह । ककरो बिआहक बरिआती जेबाक रहैत छैक तँ ककरो तीर्थ यात्रा करबाक रहैत छैक । अस्तु,नानाप्रकारक उद्येश्यक लोकसभ एकहि रेलसँ यात्रा करैत रहैत छथि । मुदा सभक उद्येश्यमे ई समानता रहैत छैक जे यात्रा सुगम होइक,रेल समयपर गंतव्य स्थानपर पहुँचि जाइक ,रस्तामे कोनो कष्ट नहि होइक । आब ई तँ एकटा संयोगे होइत छैक जे ककर यात्रा केहन होइत छैक । ओना आब तँ रेलसभक हिसाब-किताब बहुत सुधरि गेल छैक,बहुत रास रेलसभ समयपर  चलैत अछि,दुर्घटना कम सँ कम होइत छैक । मुदा छैक तँ अले-कलक विन्यास । तेँ लाख प्रयत्नक अछैतो कैकबेर लोक संकटमे पड़ि जाइत अछि । कैकबेर तँ जान बचेनाइओ पराभव भए जाइत छैक । से जे होउक मुदा तेँ लोक रेल यात्रा छोड़ि देत से तँ संभव नहि छैक । जीवन छैक तँ नीक बेजाए लगले रहतैक । तेँ लोक  अपना भरि संभव  प्रयत्न करैत अछि जे यात्रा मंगलमय होइक । यात्रा चाहे कोनो ट्रेनमे करैत होइ ,कोनो किलासमे करैत होइ मुदा ई बात ध्यान राखब जरूरी थिक जे यात्रा कए रहल छी,ट्रेनमे बैसल छी ,घरमे नहि छी । बेसक अहाँकेँ आरक्षण होबए मुदा आनो यात्रीसभक यात्रा ओतबे महत्वपूर्ण रहैत अछि जतेक अपन । तेँ आपसी सहमति आ सहयोगक भाव रहलासँ यात्रा बेसी सुखकर भए सकैत अछि ।

सुबिधा-असुबिधाक गप्प जौँ छोड़ि देल जाए तँ कुल मिला कए ट्रेन यात्रा बहुत शिक्षाप्रद भए सकैत अछि । बहुत किछु सिखबाक,जानबाक स्वतः आ स्वभाविक अवसर भेटैत अछि। एहिक्रममे स्वर्गीय संत प्रभुदत्त व्रह्मचारीजीक रेलयात्राक चर्च बहुत प्रासंगिक अछि । एकबेर ओ ट्रेनसँ किछु संतसभक संगे दक्षिण भारतक यात्रापर जाइत रहथि । ओहि समयमे ओ मौन लेने रहथि । तेँ सहयात्रीसभसँ गप्प नहि कए पाबथि । संयोगसँ किछु सहयात्रीसभक संगे सीटक हेतु विवाद भए गेल । व्रह्मचारीजी मौनमे हेबाक कारण किछु बाजथि नहि । मुदा ओ सभ अंट-संट बजैत रहल । व्रह्मचारीजीक संगीसभ अपना भरि हुनका सभके बहुत बुझओलखिन मुदा तकर कोनो असर नहि भेल । सहयात्रीसभक आक्रमकता बढ़िते गेल । ओ सभ व्रह्मचारीजीक माथक केस पकड़ि कए खीचए लगलाह । कैकटा केस उखरि गेलनि । एहि कारणसँ हुनका माथमे बहुत दर्द होबए लगलनि । मुदा व्रह्मचारीजी अवाक भेल सभटा सहैत रहलाह । किछु कालक बाद हुनकर गंतव्य टीसनपर रेल ठाढ़ भेल । हुनकर स्वागत हेतु बहुत रास लोकसभ टीसनपर आएल छल । आब हुनकर सहयात्रीसभकेँ हुनकर असली परिचय पता लगलनि । ओसभ बहुत दुखी भेलाह । वारंबार हुनकासँ क्षमा मागि रहल छलाह । मुदा आब अफसोच केलासँ की होइत? जे हेबाक छल से भए गेल छल । व्रह्मचारीजी बिना किछु बजने रेलसँ उतरि अपन शिष्यसभक संगे आगु बढ़ि गेलाह । ओ तँ पहुँचल संत चलाह,सभकिछु बिसरि गेल हेताह । मुदा सामान्य आदमी रहैत तँ एहन घटनाक बाद मोकदमा करैत, थाना -पुलिस लग जाइत । अपनो परेसान होइत आ सहयात्रियोकेँ करैत  

असल मानेमे ई जीवनो एकटा रेल यात्रा सन थिक । रंग-विरंगक लोक, नाना प्रकारक स्थानसँ जाइत हमसभ अंतमे अंतिम टीसनपर पहुँचि जाइत छी आ तकर बाद सभकिछु एतहि छोड़ि जाइत अछि । इएह थिक जीवन ।


4.7.2020

शुक्रवार, 26 जून 2020

लोधी गार्डेन

 

लोधी गार्डेन

लोधी गार्डेन आधुनिक दिल्लीक एकटा महत्वपूर्ण स्थान अछि । एहिठाम सभसँ पहिने १४१४ ई०मे सैय्यद राजवंशक दोसर शासक मोहम्मद शाहक  मकबरा अलाउद्दीन आलम द्वारा बनाओल गेल छल ।    तकर बाद वर्ष 1517 में सिकंदर लोधीक  मकबरा हुनकर पुत्र इब्राहिम लोधी (लोधीवंशक अंतिम शासक )द्वारा बनाओल गेल छल । मुगलवंशक तेसर शासक अकबर एहि स्थानक उपयोग वेधशालाक रूपमे केलथि। अंग्रेज सेहो एहि स्थानकक जीर्णोद्धार करबैत रहलाह । ९ अप्रैल १९३६क एहि पार्कक नाम लेडी वेलींगटन पार्क राखल गेल जे स्वतंत्रताक बाद बदलि कए लोधी गार्डेन राखि देल गेल । ९० एकड़मे पसरल लोधी गार्डेनमे २१० प्रकारक करीब ५४०० वृक्ष लागल अछि । एहिठाम लागल वृक्षसभमे प्रमुख अछि- अर्जुन,चंपा,अमलतास,नीम,जामुन,मौलश्री,पीपड़,कचनार,किसुम,अशोक,पाकड़ि .. करीब दू एकड़ जमीनमे बनल रोज गार्डेनमे ५००० गुलाबक फूल लागल अछि । एकहिठाम एतेक प्रकारक गाछ-बृक्ष हेबाक कारण वनस्पतिशास्त्रक विद्यार्थीकेँ ओहिठाम बहुत जानकारी भेटि सकैत अछि । लोधी गार्डेनमे कैकटा दुर्लभ पक्षीसभ देखबामे आएत  जेना सुग्गा,देशी मैना,कोइली,उल्लू,सातभाइ,बुलबुल,कौआ, कठफोरा आदि,आदि ।

लोधी गार्डेनमे लोधीरोडसँ सटले आमक गाछी अछि । ऐहिमे टिकुलासँ लए कए आमक पकबाक समय धरि लोकसभ आम बिछैत रहैत अछि । कैकगोटे तँ झोड़ाक -झोड़ा काँच आम अँचार बनेबाक हेतु लए जाइत छथि । मुदा नीक आमसभ नहि अछि । तथापि जे-से ओकरापर झटहा फेकैत रहैत  अछि आ पकबाक दिन धरि मोसकिलसँ कतहु-कतहु आम बाँचल रहि पबैत अछि । लोधीगार्डेनक बीचमे सेहो आमक गाछसभ अछि । आमक अतिरिक्त रोडसँ सटले कोनपर बाँसक तरह-तरहक प्रकारसभ रोपल अछि । संभवतः ओ बाँस सभक म्युजिअम थिक । आइ-काल्हि एहि स्थानक देख-भाल एनडीएमसी द्वारा कएल जाइत अछि । दिन-राति सताधिक कर्मचारी एहिमे लागल रहैत छथि । तकर परिणाम थिक जे एतेकटा परिसर कोनो आंङनसँ बेसी स्वच्छ आ सुंदर लगैत रहैत अछि । चारूकात हरल- भरल गाछ,फूलसभ मिलिकए तेहन मनोरम दृश्य बनओने रहैत अछि जे होएत जे  घुमिते रहि जाइ । जँ कनीको काल एतए बैसि जाएब वा टहलि लेब तँ मोन अतिशय  प्रसन्न आ प्रफुल्लित भए जाइत अछि । सभ दुख-चिंता हरा जाइत अछि। लगैत अछि जेना सरिपहु स्वर्गमे आबि गेलहुँ ।

रातिक दस बाजि रहल हो वा भोरक चारि, ओ स्थान कखनो खाली नहि भेटत । केओ-ने-केओ ओतए चलैत-फिरैत भेटिए जाएत।  जँ केओ नहिए भेटल तइओ कोनो बात नहि । असगरो अहाँ सुरक्षित रहि सकैत छी । कोनो डरक बाते नहि । एक चक्कर जँ लगा लेलहुँ तँ सवा दू किलोमीटर पुरि गेल । एहि तरहे कैक गोटे सात-आठ चक्कर लगा लैत छलाह । केओ एक्के चक्करमे थाकि कए बैसि जाइत छलाह। सामान्यतः लोक दू वा तीन चक्कर लगबैत भेटि जेताह । ताहूमे सभक गति भिन्न होइत अछि । केओ बहुत तेज चलैत  छथि तँ केओ नहु-नहु।  साउथ एक्सटेंसनसँ एकटा सेवानिवृत्त फौजी लोधी गार्डेनमे नित्य टहलए अबैत छलाह । ओ अपन घरेसँ पैरे बिदा होइतथि आ लोधी गार्डेनमे सात चक्कर लगबैत छलाह । टहलैत काल ओ जोर-सोरसँ अपन मुरी हिलबैत रहैत छलाह । हुनकर टहलबाक गति सेहो बहुत अधिक रहैत छल । लोधी गार्डेनमे टहललाक बाद ओ फेर पैरे अपन घर  वापस होइत छलाह । कैक साल धरि हुनकर टहलबाक ई क्रम चलैत रहल । मुदा बादमे पता नहि हुनका की भए गेलनि जे टहलनाइ तँ कम भइए गेलनि अपितु मुरीक  जोर-सोरसँ हिलेनाइ सेहो चलि जाइत रहलनि । कहुना कए एकटा ठेंगा पकड़ि कए थोड़ बहुत टहलि लैत छलाह-ओहो बहुत दिनक बाद । संभवतः हुनका कोनो स्वास्थ्य संबंधी समस्या भए गेलनि ।

जौं-जौं समय बितैत अछि लोधी गार्डेनमे लोकक संख्या बढ़ैत जाइत अछि । सात बजे भोर होइत-होइत तँ ओहिठाम टहलनिहारक मेला लागि जाइत  अछि । कैकगोटे टहललाक बाद अपन मित्रसभक संगे चाह पीबैत भेटि जेताह । किछुगोटे कहिओ काल ओतए जलखैक ओरिआन सेहो केने रहैत छथि । कहिओ-कहिओ तँ लोकसभकेँ ताकि-ताकि कए जलखै कराओल जाइत अछि ।  गुरुपर्व क दिन किछु गोटे लंगर करबैत छथि । एहिसभ तरहक दृश्य लोधी गार्डेनमे कोनो-ने-कोनो रूपमे सालभरि चलैत रहैत अछि ।

लोधी गार्डेनमे प्रातः वा सायंकाल भ्रमण केनिहार लोकक आपसी दोस्ती हुनकर टहलबाक समय आ गतिपर निर्भर करैत अछि। एकदिनक बात होइक तहन तँ लोक ठहरि जाएत,दूटप्पी कए लेत । मुदा नित्यप्रति टहलएबलासभक हेतु  से संभव नहि थिक । किछुगोटे तँ झुंड बनाकए चलैत छथि । ओसभ टहलैत कम गप्प बेसी करैत छथि । ओहिठाम भोर-साँझ टहलनिहार लोकसभमे एक सँ एक गणमान्य लोक रहैत छथि । असलमे लोधी गार्डेनक लग-पासमे उच्च सरकारी अधिकारी लोकनिक आवास अछि । तेँ हुनका लोकनिक हेतु लोधी गार्डेनमे टहलनाइ बहुत सुगम होइत छनि ।  अपन फ्लैटसँ निकलु आ पाँच-सात मिनटमे  लोधी गार्डेनमे चलि आउ ।  ओहिमे पैर रखिते हवाक स्वाद बदलि जाइत छैक । जौं अहाँ लोधी हार्डेन लगीचसँ गुजरैत छी तखनहि अहाँकेँ हवाक  बदलल रुखिक अंदाज लागि जाएत । लोधी गार्डेनमे  विद्यमान वृक्षसभक एहिमे बहुत योगदान अछि । गार्डेनक भीतर टहलबाक हेतु छोट-पैघ कैकटा ट्रैक अछि। लोक अपन सुविधानुसार रस्ताक चुनाव करैत छथि । कैकगोटे भीतरे-भीतर चलबाक इच्छुक रहैत छथि । तिनका चलैत काल कमेगोटेसँ भेंट हेबाक संभावना रहैत छनि । अस्तु,असगर टहलबाक आनंद एहि रस्ते भेटि सकैत अछि । जँ अपने मुख्यट्रैकपर चलब आ फरीछ भए गेल अछि तखन तँ लोकक हुजुम देखबामे आबि सकैत अछि । कैकठाम गाछतरमे लोकसभ सुस्ताइत देखेताह । किछुगोटे चाह-पानोक ओरिआन रखने रहैत छथि । कहक माने जे ओहिठाम टहलबाक संगे पिकनिकक आनंद लैत छथि । भोरे-भोर टहलैत काल शरीरकेँ नवीन उर्जा भेटैत छैक । अंग-अंगमे उत्साह भरल रहैत अछि । लोक सभकिछु बिसरि एक-दोसरकेँ प्रातः अभिवादन करैत छथि। लगैत रहैत अछि जेना सभ केओ उर्जासँ भरल छथि ।

लोधी गार्डेनमे भोर-साँझ टहलनिहारसभक हेतु ओ जीवनक एकटा महत्वपूर्ण अंग थिक । कैकगोटेक तँ आपसी संवध ततेक प्रगाढ़ छनि जे ओ अपन दुख-सुख बिना कोनो संकोचकेँ बाँटैत छथि । कैकगोटेकेँ तँ ओ जीवनदायी सिद्ध भेल अछि । जीवनमे घटित दुर्भाग्यपूर्ण स्थितिमे  लोधी गार्डेनक हुनकर मित्रलोकनि बहुत मदति केलखिन आ ओ सबटा दुख बिसरि फेरसँ ठाढ़ भए गेलाह । जँ हुनका लोधी गार्डेनक समाजक सहयोग नहि भेटल रहैत तँ कहि नहि आइ हुनकर की हाल भेल रहैत ?

लोधी गार्डेनमे सालोंसँ घुमैत-घुमैत कएगोटेकेँ आपसमे बहुत भावुक सिनेह भए गेल छनि । हमर एकटा संगी तँ बाजल करथि जे जँ हम मरी तँ अंतिम संस्कारसँ पूर्व हमरा लोधी गार्डेनमे  एकबेर अवश्य घुमा देल जाए । आब ओ सेवानिवृत्तिक बाद लोधी कालोनीसँ चलि गेल छथि आ लोधी गार्डेनसँ सेहो फटकी भए गेल छथि । मुदा लोधी गार्डेनसँ हुनका ओहिना सिनेह बनल छनि । अखनो ओ कहिओ काल ओतए अबैत छथि आ अपन पुरानसंगीसभसँ भेंट कए बहुत तृप्तिक अनुभव करैत छथि ।

लोधी गार्डेनक पुरान सिनेहीमेसँ छथि सरदार अजीत सिंह । ओ टैक्सी स्टैंडक इंचार्ज छथि । पचासोटा टैक्सी रखने छथि आ ताहिसँ बहुत नीक आमदनी केने छथि । लोधी गार्डेनक लगीचेमे घर छनि । भोर-साँझ-दुपहरिआ जखन देखू ओ लोधी गार्डेनमे घुमैत भेटि जेताह । ओहिठामक गाछ-बृक्ष,फूल-पातसभसँ हुनका बहुत सिनेह छनि । एकबेर केओ भोरे टहलैत काल बेलीक फूल तोरैत रहथि। सरदारजी हुनका फूल तोड़ैत देखि लेलखिन । औ बाबू! तकर बाद जे हंगामा भेल से की कहू । बात बढ़ैत-बढ़ैत दुनूगोटेमे  मारि-पीट होबए लागल । सरदारजीक हाथमे चोट लागि गेलनि । ओ अस्पताल जाए पलस्तर करओलनि आ पुलिसमे केस सेहो कए देलनि । आब तँ ओ सरदारजीक निहोरा करए जे कहुना पुलिस केस हटा लेथि । बहुत दिन धरि ई झंझटि चलैत रहल । आखिर ओ घटी मानलाह आ जेना-तेना मामिला शांत भेल ।

लोधी कालोनीमे सरकारी आवास आवंटित भेलाक बाद हमहु नित्य लोधी गार्डेनमे घुमए लागल रही । एकदिन पूजाक हेतु किछु फूल तोड़ैत रही कि सरदारजीक नजरि हमरापर पड़लनि । ओ फटकिएसँ चिकरब शुरु केलाह । हम इएह-ले ओएह-ले भागलहुँ । बादमे अपन मित्र सरदार वलदेव सिंहसँ एहि घटनाक चर्चा केलहुँ । हुनकेसँ सरदार अजीत सिंहक बारेमे पता लागल । असलमे ओ लोधी गार्डेनक स्वयंभु रक्षक बनि गेल छथि आ जे केओ कोनो अनट काज करैत देखाइत छनि तकरासँ लड़बामे  कोनो संकोच नहि करैत छथि। बादमे सुनलिऐक जे एनडीएमसी हुनका लोधी गार्डेनक संरक्षक बना देने छनि । कालक्रमे सरदार अजीत सिंह हमर नीक मित्र बनि गेलाह आ जखन कखनो मोन होइतनि तँ ओहि घटनाक चर्च कए आनंद उठबितथि ।

दिल्लीक प्रसिद्ध इन्डिआ इन्टरनेसनल सेंटर लोधी गार्डेनसँ सटले अछि । अपितु,ओ लोदिए गार्डेनक एक भाग लगैत अछि । ओहिठाम बेसीकाल गीत-नाद होइत रहैत अछि । एक सँ एक कलाकार ओहिमे सामिल होइत छथि । लोधी गार्डेनमे टहलैत काल साँझमे ओ मधुर- मधुर गीत जँ कानमे पड़ितए तँ मोन होइत जे कनी काल ठाढ़ भए जाइ ,गीत सुनि ली ।  असलमे ओहिठाम लगीचेमे कैकटा महत्वपूर्ण संस्थानसभ छलैक जतए एहन-एहन कार्यक्रमसभ होइते रहैत छल । चिन्मयानंद मिसन,इस्लामिक सेंटर,इन्डिआ हैबिटाट सेंटर मे निरंतर किछु-ने-किछु एहि तरहक कार्यक्रम होइते रहैत छल । यद्यपि हम लोधी कालोनीमे आठसाल रहलहुँ मुदा एहिसभ कार्यक्रममे बेसी नहि जाइत छलहुँ । अंतिम सालमे किछुदिन एकर आनंद उठा सकलहुँ । तखन तँ बहुत अफसोच होइत छल जे पहिने किएक नहि एहिमे सामिल भेलहुँ  

लोधी गार्डेनक चारूकात एक सँ एक महत्वपूर्ण स्थानसभ अछि । लगीचेमे विश्वप्रसिद्ध खान मार्केट अछि । ओहिठाम देश-विदेशक संभ्रांत लोकसभ बजारमे बौआइति भेटि जेताह । खानमार्केटसँ सटले मेट्रोक टीसन बनि गेलासँ ओहिठाम आबा-जाही सुगम भए गेल अछि । ओही इलाकामे साइ मंदिर सेहो अछि । वृहस्पति दिन कए ओतए भक्तलोकनिक जबरदस्त भीड़ होइत अछि । अहलभोरेसँ भक्तलोकनि पाँति बना कए दर्शनक उत्सुक रहैत छलाह । लोधीगार्डेनसँ सटले वरिष्ठ सरकारी अधिकारी लोकनिक सरकारी आवास अछि। हुनकासभक हेतु लोधी गार्डेन तँ जेना दनान अछि । सफदरजंग मदरसा सेहो लोधी गार्डेनसँ सटले अछि । ओ दिल्लीक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थानमेसँ अछि । जँ अहाँ प्रायोजित दिल्ली दर्शनक हेतु बिदा होएब तँ ओतए जेबे करब । अहाँक बस ओतए ठाढ़ हेबे करत । असलमे ई सभ स्थान दिल्लीक इतिहाससँ जुड़ल अछि । एकसमयमे ओहिठाम की चुहचुही रहल होएत से सोचल जा सकैत अछि।

लोधी गार्डेनमे लगभग आठसाल हम भोर-साँझ टहलि सकलहुँ । ब्लाक २१,लोधी कालोनीक सरकारी आवास जून २०१४मे छुटि गेल आ तकर बाद लोधी गार्डेन सेहो छुटि गेल ।  मुदा ओकरासँ जुड़ल बहुत रास घटनासभ अखनो स्मृतिमे ओहिना बनल अछि । भोरे जखन लोधी गार्डेनमे टहलबाक हेतु जाइत छलहुँ तँ ओहिमे जाइते देरी अकटा अलग दुनिामे पहुँचि जाइत छलहुँ । ओतए कतेको लोकसभसँ परिचय भेल । ओहिमे महत्वपूर्ण व्यक्तिमे सँ छलाह सेवानिवृत्त आइएएस श्री भुरेलालजी । ओ उत्तरप्रदेश काडरक अधिकारी छलाह । स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह जखन भारतक प्रधानमंत्री रहथि तँ भुरेलालजी हुनकर प्रमुख सचिव रहथि । एकसमयमे देशक सभसँ शक्तिमान सरकारी अधिकारी रहल श्री भुरेलालजी समय संगे केहन तालमेल केने छथि से लोधी गार्डेनमे हुनका देखि कए पता लगैत अछि । अहंकार जेना हुनका अछिए नहि । सभसँ बेस अपनत्वसँ गप्प-सप्प करताह,आगु बढ़ि कए भोरे हरिओम कहि कए स्वागत करताह आ संगे-संह घुमैत रहताह । लगबे नहि करत जे एहन पैघपदपर रहल लोकक संगे छी । ततबे नहि,ओ ठाकुरद्वारा ट्रस्ट बनओने छथि जे  बहुत तरहक सामाजिक काजसभ करैत अछि । ओसभ लोधी गार्डेनमे एकटा बैसारक स्थान बनओने छथि आ नित्यभोरे पचास-साठिगोटे ओतए बैसैत छथि,योग-व्यायाम करैत छथि,चाह-पान करैत छथि,कहिओ-कहिओ तँ जलसा सेहो होइत अछि । एहिसभसँ हुनका एकटा बहुत जीवंत समाज भेटि गेल छनि जकरा संगे सेवानिवृत्तिक बाद बहुत नीक समय बिता रहल छथि । लोधी गार्डेनमे एहन-एहन कैकटा गुट अछि । समय-समयपर ओसभ उत्सव मनबैत छथि,भोजन करैत छथि आ वापस अपन-अपन घर चलि जाइत छथि ।

लोधी गार्डेनमे प्रातःकाल दसबजेसँ रातिमे आठ-नओ बजेधरि प्रेमी जोड़ासभक बाढ़ि रहैत अछि । ओसभ दोगमे कतहु करोट धेने रहैत छथि । मुदा किछु दर्शकसभ हुनकासभक पछोड़ केने रहैत छथि । केओ आबओ,केओ जाओ हुनकासभक भाव-भंगिमापर कोनो प्रभाव नहि पड़ैत अछि कारण ओसभ तँ अपनेमे मस्त रहैत छथि,बेहोश रहैत छथि । लोधी गार्डेनमे दिन-देखार ईसभ होइत रहैत अछि मुदा पुलिस आ प्रशासन के जेना कोनो मतलबे नहि । जे होइत छैक से होऊ । कखनो काल जखन कुकांडभए जाइत अछि तखन जरूर पुलिस डंडा हिला दैत अछि । अन्यथा ककरो कोनो मतलब नहि । लोक आबि रहल अछि,जा रहल अछि मुदा प्रेमी जोड़ासभ अपन दुनिआमे  मस्त रहैत छथि । मुदा ओहिठाम सुच्चा टहलनिहार लोकसभकेँ एहि फसादसभसँ कोनो मतलब नहि रहैत छनि । ओ तँ प्रकृतिक आनंद लैत अपन स्वास्थ बनबएमे लागल रहैत छथि ।

एकबेर दियाबातीक प्रात अन्हरोखे हम दुनू बेकती ओतए टहलए चलि गेल रही । फटक्का प्रदूषणक कारण एकडेग नहि देखाइत छल । अन्हार गुज्ज,भयावह वातावरणमे ओतए एकडेग ससरब मोसकिल छल । लगैत छल जे सौंसे लोधी गार्डेनमे हमही दुनूगोटे आएल  छी । तथापि साहस कए हमसभ आगु बढ़ैत रहलहुँ । किछु फटकी मनुक्खक आबाज सुनाएल तखन जान मे जान आएल । कहुना कए एक चक्कर लगओलहुँ । दोसर चक्कर लगेबाक साहस नहि भेल आ डेरा वापस आबि गेलहुँ ।

एकदिनहम छुट्टीक दिनमे दस बजे लोधी गार्डेन टहलए गेल रही ।  गेटसँ थोड़बे अंदर गेलाक बाद एकटा अधबएसू बहुत भावबिभोर भए गबैत छलाह- ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले..हम रह गए अकेले....ओकर गीत सुनिकए हम ठामहि ठाढ़ भए गेलहुँ । गीतक स्वरमे ततेक दर्द भरल छल जे लागल जेना लकबा मारि देलक ।  ओ किछुकाल धरि अहिना गबैत रहल आ कहि नहि कतए बिला गेल । बादमे फेर ओ कहिओ नहि देखाएल । बहुत दिन धरि ओ गीत फेरसँ सुनबाक मोन होइत रहल । संभवतः ओ व्यक्ति सेहो छुट्टीक मूडमे अपन मनोव्यथा संगीतक रूपमे अभिव्यक्त कए रहल छलाह। एहने एकटा दृश्य एकदिन लोधी गार्डेनक बीचमे  देखलहुँ। एकटा ओकील साहेब पाथरपर बैसि कए तरह-तरहक शास्त्रीय संगीत गाबि रहल छलाह । हुनकर गेबाक भाव-भंगिमासँ लगैत छल जेना ओ अंदरसँ हिलि गेल छथि । गबैत-गबैत ओ नाचए लागथि । चारूकात तमासा देखनिहारक भीड़ लागि गेल छल । ओना ओ गीतो नीक गबैत छलाह मुदा ओहूसँ बेसी हुनकर आकृतिसँ निकलैत संकेत छल जे कोनो गंभीर  आंतरिक दुखक दिस इसारा करैत छल । एहि तरहें कतेको तरहक दृश्य लोधी गार्डेनमे देखबाक अवसर भेटैत छल । छुट्टी दिन कए तँ ओतए मेला लागल रहैत छल । लोकसभ सपरिवार  आबि ओतए आनंद मनबैत छलाह । जेम्हरे जाउ नेना,युवक आ बूढ़सभ नाना प्रकारक मनोरंजन करैत  देखेताह । साँझ होइत-होइत लोकसभक भीड़ ससरि जाइत छल ,रहि जाइत छल नियमित टहलएबलासभ जे सामान्यत: लगीचक सरकारी आवाससभसँ अबैत छलाह । ई क्रम बारहो मास आ तीसो दिन ओतए चलैत रहैत छल ।

लोधी गार्डेनक लगीचमे रहि हमसभ ओकर बहुत फएदा उटओलहुँ । आठ वर्षसँ बेसी समय धरि मगनीमे स्वस्थ मनोरंजन होइत रहल । लोकसभ महग होटल वा कल्वमे जा कए जे उसासक अनुभव करैत  हेताह से हमसभ मगनीमे लोधी गार्डेनमे उठओलहुँ । सभसँ फएदा तँ ई भेल जे नीक लोकसभक संगति भेटल । एक सँ एक विद्वान लोक ओहिठाम टहलैत भेटलाह । ओहिमेसँ कैकगोटे दोस्तो बनि गेलाह । स्वास्थकेँ तँ जेना असीर दबाइ छल ओ स्थान । हमर श्रीमतीजीकेँ पैरमे दर्द होइत रहैत छलनि । कतेको डाक्टरसँ देखेलहुँ । कहि ने कोन-कोन एक्सरे करओलहुँ । मुदा ठीक भेल लोधीगार्डेनमे चललासँ । शुरुमे तँ हुनका चलबामे परेसानी बुझाइनि मुदा क्रमशः ओ फुर्तीसँ चलए लगलीह आ कालक्रमे तँ ओ हमर कोन कथा कैकटा तेज टहलएबलासभकेँ पछुआ दैत छलीह । लोकसभ एहिबातसँ बहुत प्रसन्न होइत छलाह । मुदा अंतिम दूसाल ओ लोधी गार्डेनमे भोरक टहलनाइ छोड़ि देलीह । बहुतदिन धरि लोकसभ हुनकर हाल-चाल पुछैत रहलाह ।

जून २०१४मे लोधी कालोनीक सरकारी आवास छोड़ि देलाक बाद हमहु लोधी गार्डेन घुमबाक सुखसँ बंचित भए गेलहुँ । आब तँ तकर कतेको साल बिति गेल । तथापि,लोधी गार्डेनक स्मरण अबिते रहैत अछि । ओहिठाम भोरसाँझ टहलैत लोकसभ मोन पड़िते रहैत छथि । मुदा ई जीवन थिक । सभ नीक-बेजाए वस्तुक अंत होइते अछि । लगैत अछि जेना लोधी गार्डेनक स्मृति कोनो बहुत नीक सिनेमाक एकटा सुखद अंश छल । आशा करैत छी जे कहिओ फेर एहन समय अएतैक जे हमसभ लोधी गार्डेन पहिने जकाँ भोर-साँझ टहलि सकब आ जीवनमे ओएह स्फ्रुति ,ओएह आनंद फेरसँ भेटि सकत ।

 

26.6.2020

 

 

 



बुधवार, 24 जून 2020

नियति

 

 

नियति

 

 

नियतिवश हम कर लेते हैं

गलत विकल्पों का चुनाव

और भटकते रह जाते हैं,

बंचित रह जाते  हैं

सार्थक समाधान से

रह जाते हैं दुखी और अशांत

नियति का कुछ भी नहीं है विकल्प

अगर ऐसा होता तो

दुर्योधन मान लेता

 कृष्ण का समझौता प्रस्ताव

दे दिया होता बस पाँच गाँव

और टल जाता महाभारत

बंच जाते लाखों लोक कटने-मरने से

परंतु ऐसा हो न सका

क्यों कि अहंकारी दुर्योधन

पढ़ नहीं सका अपना भविष्य

होनी को कोई टाल नहीं सका

व्यास को सब पता था

परंतु कोई सुना नहीं

वह भी दिव्यचक्षु देकर चलते बने

 

युद्ध का परिणाम कितना दुखद था

सुखी कोई नहीं रहा

जीतने वाले भी हार गए

कोई अपना रहा नहीं

जिसके साथ विजय का सुख बाँट सकते

रक्तरंजित राज भोग नहीं सके

आखिर,सबकुछ त्यागकर चले गए

जब अहंकारवश

सही और गलत में नहीं कर पाते हैं फर्क

और

दूसरों का ऐश्वर्य, मान-सम्मान पर

करते रहते हैं प्रहार

तो होता है विनाश

समझने की जरूरत है कि

यह दुनिया लेने के लिए नहीं

देने का लिए है

लोभ के संवरण से

त्याग से ही

हम हो सकते है मुक्त

नियति के पाश से


24.6.2020

शनिवार, 20 जून 2020

दिल्लीक दुरंगी दुनिआ

 

दिल्लीक दुरंगी दुनिआ

 

भोर होइते चारूकात लोकसभ गर्द पड़ए लगैत अछि । चारिबजे भोरेसँ लोकसभ कथु-ने-कथुक पाँतिमे ठाढ़ भए जाइत अछि । ककरो दूध लेबाक छैक,ककरो रेलक टिकट । ककरो कार्यालय जेबाक जल्दी छैक तँ ककरो कालेज जेबाक छैक । बस,रेल,कारसभक समय बान्हल छैक । तरह-तरहक इंतजामो छैक मुदा लोकक जनसंख्या ततेक छैक जे व्यवस्था धएले रहि जाइत छैक । बसमे चढ़बाक काल धकमधुक्का,अस्पतालमे डाक्टरसँ देखेबाक अछि तँ धकमधुक्का । अस्पतालमे देखेबाक अछि तँ चारि बजे भोरेसँ पाँतिमे लागि जाउ । माने कोनो एहन स्थान नहि भेटत जतए लोकक हुजुम नहि रहैत अछि,जतए अनगिनित लोक पाँति लगाए प्रतीक्षा नहि कए रहल अछि । ई तँ हाल अछि देशक राजधानी-दिल्लीक ।

दिल्लीमे जखन पैसि कए देखबैक तँ ओकर कैकटा विकृति देखाएत । अहाँक दुनिआ अपन फ्लैट धरि समटल रहत । अहाँक अगल-बगल के छथि,चोर छथि,कि उचक्का छथि कि कोनो विद्वान वा कलाकार छथि तकर कोनो जानकारी नहि भेटत । लोक सौंसे दुनिआकेँ नोति लेत मुदा पड़ोसीकेँ कोनो सूचना नहि रहत । जँ सीढ़ीपर कोनो पड़ोसी देखा जाएत तँ लगतैक जे आब की कएल जाए? ओ प्रयासपूर्वक नुका जाएत जाहिसँ भेंट ने भए जाए। बीच सड़कमे केओ ककरो छूरा मारि रहल अछि,कोनो महिलाकेँ कोनो लफंगा तंग कए रहल अछि, कि कोनो घर मे कोनो बूढ़केँ ओकरे परिवारक लोक फज्जति कए रहल अछि,केओ किछु नहि कहत , कात बाटे तेना ने ससरि जाएत जेना ओ किछु नहि देखलक,जेना किछु भेवे नहि कएल । सैकड़ों लोक कोनो घटनाकेँ देखत मुदा मौकापर एकटा गवाह नहि भेटत । तेहन बेदर्द थिक दिल्ली ।

दिल्लीक कोनो टीसनपर चलि जाउ नित्य लाखोंक तादातमे गाम-घरसँ पलायन कए मजदूर दिल्ली अबैत अछि । कैकगोटे तँ अपन गौंवाक संगे अबैत अछि । तकरासभकेँ अएलाक बाद रहबाक ठौर भेंटि जाइत अछि। मुदा दिल्ली अएनिहार बहुत रास एहन लोकसभ होइत अछि जकरा कोनो ठेकान नहि रहैत अछि,जे टीसनसँ कतए जाएत सेहो नहि बूझल रहैत छैक । प्रचंड इच्छाशक्तिक एकमात्र पूँजी लेने ओ सभ जीवन संग्राममे कुदि जाइत  अछि आ अंततोगत्वा, जीवि जाइत अछि । कैकगोटे तँ दिल्लीमे जेना-तेना अपन घरो बना लैत अछि ,अपन रोजगार बना लैत अछि मुदा सभ एहने भाग्यवान नहि होइत छथि । सोचिऔक ओकरासभक हेतु दिल्ली केहन क्रूर रहैत हेतैक जे माघक जाढ़मे रोडपर सुतबाक हेतु विवश रहैत अछि । बात ओतबे पर रहि जइतैक तँ बरदास्त कए लैत मुदा कैकबेर सुतलेमे ओकरापर ट्रक,बस वा कार गुजरि जाइत अछि आ ओ अभागल व्यक्ति फेरसँ सूर्योदय नहि देखि पबैत अछि ।

जँ कहिओ छुट्टी भेटए(ओना दिल्लीमे ककरो कहिओ आफियत रहैत नहि छैक) तँ चलि जाउ कोनो वृद्धाश्रम। ओहिठामक दृश्य देखिते रहि जाएब । ओतए काहि कटैत बूढ़सभ कोनो गरीब घरक नहि होइत छथि । ओसभ अपन जवानीमे कैकटा महल बना चुकल छथि,अपन पुत्रक सुख सुविधाक हेतु बैंकमे कड़ोरो टाका जमा केने छथि,कतेकोगोटेकेँ तँ अखनहुँ बड़का-बड़का कारोबार चलि रहल छनि । मुदा तेँ की? धीया-पुता बुझैत छनि जे ओसभ तँ ओकर अछिए आ ओकरे हेतैक ,ताहि लेल एहि बूढ़केँ कतेक दिन माथपर रखने रहब । कैकटा बूढ़ बेटाक मुँह देखबाक प्रत्याशामे मरि जाइत छथि । कैकटाकेँ अंतिम संस्कारोमे परिवारक केओ नहि आबि पबैत छनि । ओसभ विदेशमे बसि गेल छथिन,ओतएसँ आएब-जाएब बहुत मोसकिल । अपन मजबूरी बता कए संतोख कए लैत छथि । बाह रे! आधुनिक दिल्लीक आधुनिक लोक़ ।

दिल्लीक हाल पुछि रहल छी तँ कहि रहल छी । एकदिस एकसँ एक महल,सुविधा संपन्न कोठीसँ सजल मोहल्लासभ आ तकर सटले भेटत उजरल-उपटल लोकसभक खोपड़ीक शृंखला जकरा दिल्लीक भाखामे कहल जाइत अछि झुग्गी-झोपड़ी कालोनी । जतेक चोर,उचक्का,अपराधीसभ होइत छथि से सभ एहने ठाम नुकाएल रहैत छथि । अपराध करब हुनका लोकनिक मुख्य रोजगार छनि । ओकरेसभक संगे जेना-तेना  देहकेँ झपने ,पेट भरने  दिन-राति गारि मारि सुनैत जिनगी बितबैत रहलाह लाखों बिहारी मजदूरसभ अछि । कालक्रममे ओहीमेसँ किछुगोटे सुभ्यस्त भए गेलाह तँ फेर घुरिओ कए ओहिठाम नहि गेलाह । केओ नेता बनि गेलाह,ककरो दोकान खुजि गेलनि तँ केओ कोनो सरकारी कार्यालयमे छोट-मोट काज पकड़ि लेलनि । जिनका जोगार भए गेलनि,कोनो पैघ अधिकारीसँ संपर्क भए गेलनि तँ स्थायी सरकारी नौकरी सेहो भए गेलनि । से जँ नहिओ भेलनि आ नैमित्तिक आधारपर काज करैत छथि तैओ गाम जा कए हवा दैत छथिन जे ओ सरकारी काज करैत छथि । कैकगोटेकेँ तकर फाएदा भेलनि,नीक परिवारमे बिआह भए गेलनि । जखन ओ सहरमे कनिआ अनलनि आ ओ हुनकर हालति देखलखिन तँ छाती पीटैत रहि गेलीह ।

जे-से मुदा दिल्ली अएबाक क्रम लगातार बनले रहल । गामक-गाम उपटि कए दिल्ली आबि गेल । आब तँ ई हाल अछि जे गामसँ बेसी गौंवा दिल्लिएमे भेटि जेताह । मुदा दिल्ली अछि बेदर्द से तँ कहनहि छी । कोरोनाक कारण जखन सभकिछु बंद भए गेल तँ प्रवासी मजदूरसभक हाथ-पैर फुलि गेलैक । काज छुटि गेलैक । सरकारी सहायताक कतहु कोनो पता नहि । मालिकसभ काजसँ हटा देलकैक । एहन हालतिमे पहुँचलाक बाद सभकेँ अपन गाम मोन पड़लैक । भेलैक जे जेना-तेना गाम वापस चलि जाइ । सभ दिल्ली छोड़ि देलक । किछुगोटे गाम घुरबाक प्रयासमे रस्तेमे  मरि गेल । मुदा गाम-गामे होइत छैक । जे पहुँचि गेल से सभ बहुत उसासमे छल । बेसक एहिबेर ओकरासभक देहपर नवका जींस नहि रहैक, गमकौआ तेल माथमे नहि लागल रहैक मुदा गामक माटिमे  पैर पड़िते ओकरासभकेँ स्वर्गक सुख भेटलैक ।

दिल्लीक चारूकात बड़का-बड़का  अट्टालिका,मीलों नमगर ओभरब्रिज,सैकड़ों दोकानसँ सजल-धजल माल दिस देओ आकर्षित भए जाएत । ओकरा के बनओलक? ओएह बिहारी मजदूर जे आब कोरोनाक संकटमे जान बँचेबाक हेतु गाम वापस चलि गेल अछि । मुदा जखन ओ दिल्लीमे छल तखनहु ओहि मालमे ओ फेर नहि गेल,नहि किनि सकल कोनो दामी चीज-वस्तु , नहि लए सकल अपन शिशु हेतु कोनो आकर्षक खेलौना जकरा गाम गेलाक बाद ओ ओकर हाथमे दैत गर्वक अनुभव करैत ।  ई छैक दिल्लीक दुरंगी दुनिआक कटुसत्य ।

ओना दिल्लीमे भारतक इतिहासक गहींर दर्शन होइत अछि । कहि नहि कतेको राजा एतए अएलाह आ गेलाह मुदा दिल्ली ठामहि अछि । ऐतिहासिक महत्वक एकसँ एक वस्तु एहिठाम भेटत । मुदा से के देखैत अछि? गाम-घरसँ आएल जन-बनिहारसभ दिल्ली अबितहि पेटक जोगारमे जे लगैत अछि से लगले रहि जाइत अछि । आइ-काल्हि करैत ओकर जिनगी गुजरि जाइत छैक । दिल्लीमे रहितहुँ ओ किछु नहि देखि पबैत अछि । सही मानमे कहल गेल अछि - जे दिल्लीक लडू खेलक सेहो पछतओलक आ जे नहि खेलक सेहो ।

दिल्ली भने देसक राजधानी होअए,एकर कोनो अपन व्यक्तित्व नहि छैक । सौंसे विश्वक लोकसभ एतए आबि कए अपना हिसाबे जीबि रहल अछि । सभ अपन-अपन फ्लैटमे मुनल अछि । बगलमे की भए रहल अछि तकर कोनो जानकारी नहि,कोनो मतलबो नहि । जँ केओ मरिओ गेल तँ परेसानी तखने होइत छैक जखन लाससँ निकलैत दुर्गंधक कारण रहनाइ मोसकिल भए जाइत छैक । अन्यथासभ होटल जकाँ फराक-फराक जिनगी जीबैत रहैत अछि । पैघलोकक सभसँ प्रिय मित्र ओकर विदेशी जातिक कुकूर भए गेल अछि । ओकरे संगे जीबैत अछि,ओकरे संगे सुख-दुख बाँटबाक प्रयास मे लागल रहैत अछि । एहन संभ्रांत परिवेशमे रहनिहारक मोनमे  ओकर लगीचेमे झुग्गी बनाकए रहनिहार काजबालीक कोनो चिंता नहि ,कोनो मतलब नहि रहैत छैक । ओसभ तँ संपन्न वर्गक हेतु मात्र इस्तमाल करबाक वस्तु थिक , एक नहि तँ दोसर भेटि जेतैक ।

 सालक -साल दिल्लीमे रहलाक बादो अपन कनो पहिचान बनबएमे असफल रहबाक बाद प्रवासी मजदूर लोकनि कैकबेर वापस अपन गाम जेबाक विचार करैत छथि । मुदा कतेको बेर हुनकर ई इच्छा मोनमे धएले रहि जाइत छनि आ एकदिन परदेशेमे एहि संसारकेँ छोड़िकए चलि जाइत छथि । सौंसे जिनगीक संघर्ष यात्राक एकटा दुखद अंत भए  जाइत अछि । ककरा फुर्सति छैक जे ओकरा हेतु शोक मनाओत वा श्रद्धांजलि देत । एहन थिक ई बेदर्द दिल्ली ।

दोष दिल्लीक नहि थिक । ओ तँ सभदिनसँ राजदरवार रहल अछि । तरह-तरहक राजासभ एहि सहरपर अपन कब्जा जमओलक आ भारतपर शासन केलक । कहल जाइत अछि जे पाण्डवलोकनि सेहो एतहिसँ राज केलथि । पाण्डवकालीन कैकटा मंदिरसभ दिल्लीमे अखनो अछि । दिल्लीमे जेम्हरे जाएब ढहल-ढनमनाइत राज-प्रसादसभ अपन-अपन खिस्सा कहबाक हेतु आतुर भेटत । मुदा ककरा समय छैक जे ओकरसभक दारुण व्यथा-कथा सुनए आ अपनो मोनकेँ दुखी कए लिअए ।  राजा रहैक,राजबारा रहैक ,ओकरे नौकर-चाकर रहैक । मुदा आब समय बदलल छैक । सभ अपनाकेँ राजे मानैत अछि । कहैत अछि जे देशमे प्रजातंत्र आबि गेल छैक । संविधान बनि गेल छैक , सभ बरोबरि अछि । मुदा ई सभ  कागज-किताबमे सीमित छैक । वास्तविकता इएह छैक जे आम आदमीकेँ जे दिल्ली हाथ लगैत छैक से ततेक ने कठोर आ विद्रुप अछि जे ओकरा पाथरपर माथा फोड़ैत रहबाक हेतु विवश कए दैत छैक जखन कि ओतहि केओ श्रीमान दिन-राति गगनचुंबी महलमे  बैसल देशक प्रगतिक ढोल बजबैत रहैत छैक ।

उमीदेपर ई दुनिआ ठाढ़ छैक । तेँ हमसभ आशा करी (आ किएक नहि करी) जे एकदिन एहनो अएतैक जखन दिल्ली  सही मानेमे सुंदर भए जएतैक । दिल्लीक नीक अस्पतालसभ गरीबोक हेतु सुलभ होएतैक। गरीबोक नेनासभ पव्लिक इसकूलमे  पढ़तैक आ सभगोटेएकस्वरमे कहतैक-वाह रे दिल्ली!


20.6.2020