शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

लोकतंत्र का महाभारत


लोकतंत्र का  महाभारत



भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है । संबैधानिक व्यवस्थाओं के अनुसार  हमारे देश में केन्द्र सरकार और राज्यों में अलग-अलग सरकारों का प्रावधान है। केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकार और कार्यक्षेत्र बंटे हुए हैं । केन्द्रीय सरकार/ राज्य सरकारों के  गठन के लिए लोकसभा और विधानसभाओं  का चुनाव प्रत्येक पाँच साल पर कराना होता है । अगर जरुरी हुआ तो मध्यावधि चुनाव भी कराये जा सकते हैं। संबैधानिक व्यवस्थाओं के अनुकूल ही देश में अगले लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव मई २०१९ में कराया जाना है। यद्यपि चुनाव की विधिवत अधिसूचना अभी नहीं हुई है ,फिर भी पूरे देश चुनावी माहौल में रंगा नजर आने लगा है । सत्ता पक्ष और विपक्ष तरह-तरह की घोषणाएं कर रही हैं सभी जनता को आकर्षित करने के लिए लोक-लुभावन वादे भी करते जा रहे हैं ।  चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है । देश में लोकतंत्र को बनाए रखने का यही साधन है । इसलिए जो कुछ हो रहा है वह सामयिक ही है । परंतु चिंता की बात यह है कि देशभर में अभी से कटुतापूर्ण वातावरण बनता जा रहा है । 
देश के सब से पुराने और साठ साल तक देश  राज करने बाले कांग्रेस पार्टी पर चार पुस्तों से एक ही परिवार राज कर रहा हे । यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि इतना पुराने राष्ट्रीय दल अपने लिए एक परिवार से हटकर कई नेता नहीं ढूंढ़ सका। पारिवारिक सदस्यों की पकड़ और मजबूत करने के लिए उसी परिवार के एक अन्य सदस्य को महासचिव बनाकर चुनावी मैदान में उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य की कमान सौंप दी गई ,वह भी ऐसे समय जब यह कहने के पर्याप्त कारण हैं कि ऐसा करते समय उनके दिमाग में जरूर यह बात रही होगी कि एकबार राजनीति में आ गये तो पारिवारिक सदस्यों पर आर्थिक अपराधों से जुड़े तरह-तरह के आरोपों से बचने का बहुत ही आसान बहाना मिल जाएगा। वे आसानी  से कह सकते हैं कि हमलोगों से  राजनीतिक बदला लिया जा रहा है । सब से चिंता की बात यह है कि देश में भ्रष्टाचार को अब सहजता से लिया जाने लगा है । एसे लोग जेल जाते समय ऐसी भाव भंगिमा बनाते हैं जैसे कि वे स्वतंत्रता सेनानी हों । 
पिछले कुछ महिनों से कांग्रस अध्यक्ष लगातार राफेल सौदे के बारे में तरह-तरह की बातें कर रहे हैं । देश के चुने हुए प्रधानमंत्री के बारे में इस तरह की बातें  बिना पुख्ता सबूत के करते रहना देश हित में नहीं है , वह भी तब जब कि इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि इसमें किसी भी प्रकार से कोई गड़बड़ी नहीं हुई है । जब  आब इस के बाद जेपीसी की बात उठाना और कुछ,कुछ कहते रहने का साफ माने यह निकलता है कि कांग्रेस पार्टी के नेता खासकर कांग्रस अध्यक्ष  इस मुद्दे को लोकसभा के आनेबाले चुनाव तक चलाते रहना चाहते हैं ताकि कुछ लोगों में भ्रम पैदा करने में वे सफल हो सकें । पता नहीं वे इस मकसद में कितना कामयाब हो पाते हैं लेकिन इतना तो तय है कि इस तरह के दुषप्रचार से देश की प्रतिष्ठा को व्यापक क्षति पहुँची है । अगर कांग्रस अध्यक्ष के पास इस मामले में सबूत थे तो उन्होंने इसे उच्चतम न्यायालय के सामने क्यों नहीं रखा? इस बात में विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि उनमे पास कोई सबूत है ही नहीं,बस वे जैसे,तैसे एक ही झूठ बार-बार दोहराए जा रहे हैं । ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि विपक्ष के पास मोदी हटाओ के सिवा कोई और मुद्दा है ही नहीं।
हाल ही में सीबीआइ के अधिकारियों के साथ कोलकाता में कोलकाता पुलिस द्वारा की गई कार्यबाई कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है । वहाँ के पुलिस आयुक्त से पूछताछ करने गये सीबीआइ के अधिकारियों के साथ धक्कामुक्की की गई,उन्हें थाना ले जाया गया और घंटो वहाँ उन्हें पुलिस हिरासत में रखा गया । उतना ही नहीं,पुलिस ने वहाँ के सीबीआइ के संयुक्त निदेशक के सरकारी आवास को भी घेरे रखा जिस वजह से उनके पारिवारिक लोगों को घंटो दहशत में रहना पड़ा । यह मामला उच्चतम न्यायालय तक गया और कोलकाता के पुलिस आयुक्त को सीबीआइ के सामने शिलांग में पेश होने का आदेश दिया गया। इस से स्पष्ट है कि सीबीआइ को कोलकाता के पुलिस आयुक्त के पास पूछताछ के लिए जाना सही था । अब उनको शिलांग  में सीबीआइ के पास पेश होना होगा । इस से यह भी स्पष्ट है कि माननीय न्यायालय को भी कोलकाता में इसके लिए उचित  माहौल का अभाव लगा । इसी विषय पर वहाँ के मुख्यमंत्री का सरेआम धरना पर बैठना तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन तो है ही, देश के संघीय ढांचा का भी खुल्लमखुल्ला चुनौती है । सबाल है कि जब देश ही नहीं बचेगा तो लोकतंत्र कहाँ से बंच पायेगा? लेकिन दुख  की बात यह है कि इन नेताओं को तो चुनाव जीतने के अलावा और कुछ दीखता ही नहीं है । पश्चिम बंगाल में भाजपा के नेताओं को राजनैतिक रैलियाँ निकालने,बैठक करने में तरह-तरह से दिक्कतें पैदा की जा रही है । कई राष्ट्रीय नेताओं के हेलीकाप्टर को उतरने नहीं दिया जा रहा है । यहाँ तक कि प्रधान मंत्री के रैलियों में भी पर्याप्त सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की जाती है। आश्चर्य बात है कि ऐसे कार्य करने बाले लोग भी मोदीजी को अलोकतांत्रिक बताने में सब से आगे हैं । इस सब से स्पष्ट है कि इन के करनी और कथनी में कहीं से साम्य नहीं है । 
आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री चार साल तक एनडीए के साथ थे । सभी को पता है कि बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत लोकसभा में प्राप्त था और सरकार चलाने के लिए किसी अन्य दल की आवश्यकता नहीं थी । फिर भी एनडीए के घटक दलों को केन्द्रीय सरकार में शामिल किया गया और वे हुए भी। उन्होंने सायद सोचा कि भागते भूत की लंगोटी ही सही । परिस्थिति ही ऐसी बन गई की एनडीए के घटक दलों के पास सौदेबाजी की शक्ति नहीं रह गई । जिसको जो विभाग मिले ,सबों ने लेने में ही भलाई समझी । जब पूरे चार साल तक राजसुख भोग लिया तो उनको  एकाएक अपने राज्य को विशेष दर्जा दिलाने की सुधि आई । उन्हें लगने लगा कि उनके राज्य के साथ बहुत ही अन्यायपूर्ण व्यवहार  केन्द्र सरकार कर रही है । फिर तो उन्होंने ऐसा समा बांधा कि एनडीए से नाता ही नहीं तोड़ा,क्या-क्या कहने लगे यह सभी जानते हैं । अब तो ऐसा लगता है कि मोदीजी हट गये तो उनके राज्य में स्वर्ग आ जाएगा । अगर ऐसा ही था तो वे चरसाल तक चुप क्यों रहे? साल-दोसाल काफी था । असल में चुनावी गणित को प्रमुखता देते हुए ही सारे लोक अपना भविष्य का निर्णय ले रहे हैं । इस में कुछ गलत भी नहीं है ,परंतु लोकतांत्रिक समाज में यह सबों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यवहार में शालीनताऔर ईमान्दारी का परिचय दें । मतभेद व्यक्त करते हुए मर्यादाओं का ध्यान भी रखा जा सकता था खासकर जब चारसाल तक आप कंधा से कंधा मिलाकर चल रहे थे,केन्द्र सरकार में शामिल थे। जाहिर है कि राजनीतिक स्वार्थ या अहं के टकराव को राज्य हित  का बहाना बनाकार लोगों को भ्रमित करना एक आम बात हो गई है और यह बात केवल वहीं तक सीमित नहीं रह गई है।
सभी जानते हैं कि बिहार के चर्चित चारा घोटाला में कुछ महत्वपूर्ण लोग क्यों जेल में बंद हैं । बिहार के गरीब जनता के पैसों को चरबाहा विद्यालय और जानबारों के चारा खरीदने के नाम पर सरेआम लूटा गया । यह लूट सालों चलती रही । भला हो कुछ ईमानदार अधिकारयों का, जिन्होंने इस लूट को पकड़ा और नौकरी को जोखिम में डालकर उचित कानूनी कार्रवाई की । बहुत सारे ऐसे मामलों में सालों चली कानूनी प्रकृया के बाद अदालतों ने उनको  एवम् अन्यों को इस  भयानक भ्रष्टाचार के मामलों में सजा देने में कामयाब रही । अभी भी कुछ मामलों में फैसला होना बाँकी है । अगर कोई भी उपाय होता तो भ्रष्टाचारी बँच निकलते पर वे ऐसा नहीं कर सके क्यों कि अभी भी ईमान्दार अधिकारी और न्यायाधीश देशहित को सर्वोपरि रखकर काम करते हैं। ऐसे ही  लोगों के बजह ये लोग सलाखों के पीछे जीने के लिए मजबूर हैं । मजबूरी में उनके लोगों को यह स्वीकार करना पड़ा है परंतु वे जेल से बँच निकलने की भरपूर कोशिश अभी भी करने से बाज नहीं आ रहे हैं । अब उन्हें लगने लगा है कि मोदीजी के रहते तो कानूनी फंदों से बँच निकलना नामुमकीन है तो लोकसभा का चुनाव आशन्न देखकर उमीद लगाए हुए हैं की कोई ऐसी सरकार केन्द्र में बन जाए जिससे वे जमानत पर ही सही जेलों से बाहर हो सकें । आश्चर्य की बात है कि इस तरह भ्रष्टाचार के मुकदमो में सजा पाए लोग भी मोदीजी को ईमानदारी से काम करने की सलाह देते है । वे अपने समर्थकों को यह बताने से भी नहीं चूकते हैं कि मोदीजी के बजह से ही उनको फँसाया गया है । इसे आप क्या कहेंगे? निश्चय ही ये लोग मान बैठे हैं कि वे जब और जैसा चाहेँ अपने अंध समर्थकों को मूर्ख बनाते रह सकते हैं । परंतु उन्हें इस बात का अंदाज होना चाहिए की देश की जनता अब बहुत सजग है । वह वारंबार अपना मत बड़ी स्पष्टता से प्रकट भी कर रही है । लेकिन तब सत्य को समझ कर भी वे जनता को मूर्ख समझने की कोशिश करते हुए पाए जाते हैं। लेकिन भ्रम की इस स्वनिर्मित  मायाजाल से वे कब तक सच्चाई को दबा सकते हैं? । यही कारण है कि वे आज इतने हताश दिख रहै हैं ।
उत्तरप्रदेश में लोकसभा के अस्सी सीटों का चुनाव होना है । जातीय आधार पर मतों का ध्रुवीकरण सुनिश्चित करने के लिए बासपा और सपा ने आपस में गठवंधन किआ है । इस से कांग्रेस को बाहर रखा गया है।उनका कहना है कि वहाँ कांग्रेस के पास जनाधार है ही नहीं फिर उनको साथ लाकर क्या होगा? कांग्रेस के लोग उनको आगे लाकर चुनावी परिदृष्य को कितना प्रभावित कर सकेंगे यह तो भविष्य ही बताएगा लेकिन यह तो तय है कि उत्तरप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में ही महागठवंधन फेल होता नजर आ रहा है और चुनाव में कई पक्षों के होने की संभावना बढ़ती नजर आ रही है। इस तरह स्पष्ट है कि इस चुनावी महाभारत में सभी पार्टियां मोदीजी को पदच्युत करने के लिए कटिवद्द लग रही हैं। पर सबाल है कि क्या देश की जनता भी उनके साथ जाने के लिए तैयार है । इस प्रश्न का जबाब तो लोकसभा के चुनाव के परिणाम के आने के बाद ही मिल सकता है । पर इतना तो साफ है कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से लोहा लेने के लिए सारे विपक्षी नेताओं को एकजुट होने के लिए विवश होना पर रहा है । फिर भी वे इस सबों पर अकेले ही भारी पड़ते लग रहे हैं। देश में मान लीजिए महागठबंधन बनाकर वे तमाम विपक्षी पार्टियाँ केन्द्र में मोदीजी को हराने में सफल हो भी जाती हैं तो क्या वे एक सफल सरकार दे पाने की स्थिति में होंगे? अगर आप इनलोगों से पुछेंगे तो जबाब यही देते हैं कि इन सारी बातों पर चुनाव के बाद मिनटों मे निर्णय ले लिया जाएगा,कोई दिक्कत नहीं आएगी,आदि,आदि। वे इसके अलावा कुछ और कह भी नहीं सकते हैं,क्योंकि वहाँ दर्जन से भी ज्यादा प्रधामंत्री के प्रत्याशी मौके की ताक में घूम रहे हैं ।
देश चुनावों के दौरान बूथ कब्जा करने के दौर से बड़े मुश्किल से बाहर आ पाया है । इस के लिए शत-प्रतिशत योगदान इभीएम मशीनों का है । चुनाव में इन मशीनों को लगाने का फैसला कांग्रेस सरकारों के दौरान ही हुए थे,उसी दौरान ये मशीन  खरीदे गये और इनका सफलतापूर्वक उपयोग भी हुआ । चुनाव पर चुनाव इन्हीं मशीनों के सहारे होते रहे । यहाँ तक कि सन् २०१४ के लोकसभा और उसके बाद हुए कई विधानसभाओं के चुनावों में भी इन मशीनों का सदा-सर्वादा की तरह उपयोग होते रहे । परंतु, सन् २०१७ के उत्तर प्रदेश के विधानसभा में विपक्षी दलों को कराड़ी हार के बाद उन्होंने हार का टिकड़ा इभीएम मशीनों पर फोड़ना शुरु कर दिया । ऐसा इसीलिए कया गया कि मतदाता खासकर अपने समर्थकों को भुलावा में रखने और अपनी गिड़ती हुई साख को बचाने के लिए इनके पास कुछ भी विकल्प नहीं दिख रहा था । तभी से योजनावद्ध ढंग से इभीएम मशीनो को हैक करने की झूठी खबरें चलाई जा रही है । कभी दिल्ली की विधानसभा में तो कभी लंदन तक में इस मशीन की तथाकथित निकंम्मेपन की जानकारी प्रचारित की जात है । निश्चय ही इसके लिए काफी खर्चा भी किया जाता होगा । कोई इस तरह का नाटक मुफ्त में क्यों करेगा? दुख की बात यह है कि जब इन अफवाहों का संज्ञान लेते हुए देश के चुनाव आयोग ने सभी दलों को इभीएम मशीन के तकनीकी विश्लेषण हेतु आमंत्रित किया तो विपक्षी दलों ने इस में पर्याप्त रूचि नहीं दिखाई । एसा होना ही था ,क्यों कि उनको इस मशीन को सही साबित करना ही नहीं है । उनका एकमात्र मकसद जनता और अन्य लोगों में यह भ्रम फेला देना है कि चुनाव ठीक से होते ही नहीं अन्यथा वे ही चुनाव जीतते ,आदि,आदि । आश्चर्य की बात यह है कि जब  और जहाँ विपक्षी चुनाव जीतते हैं वहाँ की इभीएम मशीन कैसे ठीक काम करने लगती है और वे गलत चुनाव को सही कैसे मान लेते हैं,चुपके अपनी सरकार क्यों बना लेते हैं ,क्यों नहीं यह कहकर इस्तिफा दे देते हैं कि इस मशीन से चुनाव कराया गया ,इसलिए यह सही नहीं है?
विपक्षी दल यह भी नहीं  सोचते हैं कि इस तरह के गलत प्रचार से विदेशों में भारत की खासकर  हमारे चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को धक्का लगेगा। देश की प्रतिष्ठा रहे या जाय,उनको तो हर हाल में खुद को सही और सरकार को गलत साबित करना ही है । इस तरह की हठधर्मिता और पूर्वाग्रहित कार्य से देश का सर्वनाश तो  होगा ही उन दलों का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता है । उनको यह समझना चाहिए कि देश में लोकतंत्र जिंदा है तभी वे सरकार के खिलाफ इस तरह बोल पा रहे हैं और आने बाले चुनावों में अपनी जीत का सपना देख पाते है । परंतु सत्ता हथिआने का सरल मार्ग अपनाकर देश की जनता को इस कदर मूर्ख बनाने की कोशिश उल्टा ही पड़ेगा ।
जिस तरह ठीक चुनाव से पहले तथाकथित असहिष्णुता  की बातें जोड़ पकड़ लेती हे उस से यह कहीं-न-कहीं शक जरुर पैदा होता है कि यह सब प्रायोजित तो नहीं है? विहार के विधानसभा के चुनाव के समय देश के कई लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाने शुरु किए । जैसे ही विहार का चुनाव संपन्न हो गया वे सभी इस तरह चुप हो गये जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो । अगर सचमुच के वे लोग इस मामले मैं चिंतित थे तो इस आंदोलन को आगे बढ़ाते और अपने लक्ष्य तक पहुँचने तक जारी रखते । परंतु ऐसा नहीं हुआ । अब फिर थोड़े दिन पहले ठीक उसी प्रकार से सीनेमा जगत के एक चर्चित कलाकार ने असहिष्णुता की बात उठाई है । कुछ लेखक,वुद्धिजीवी ने देश में फैल रहे इस समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए संकट को इतना गंभीर बताया है कि इस से उनके बच्चों के भविष्य को भी खतरा लगने लगा है । इस में कोई शक नहीं लगता है कि बिहार के चुनाव के तरह लोकसभा के चुनाव को प्रभावित करना ही उनका मूल लक्ष्य है और चुनाव संपन्न होते ही ये सभी दृष्यपटल से ऐसे ही गायब हो जाएंगे जैसे कि बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद  गायब हुए थे ।
वारंबार यह कहा जा रहा है कि देश की तमाम संबैधानिक संस्थाएं खतरे में है । यह कहने बाले क्या खुद इस के लिए जिम्मेदार नहीं है? भारत के उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव  लाने बाले कौन थे और उन्होंने ऐसा क्यों किया था ? सभी जानते हैं कि वे लोग मुख्य न्यायाधीश को सकते में रखना चाहते थे । जब फैसला उनके पक्ष में हो तो सही नहीं तो सब कुछ गलत । ऐसे लोगों से क्या उम्मीद लगा सकते हैं?देश में आपत्तिकाल क्यों लगाया गया? पूरा देश जेलखाने में तब्दील कर दी गई । लोक अपनी बात रख नहीं सकते थे । हालात ऐसी थी कि कोई अगर सच बोलता तो जेल जाएंगे । वही लोग आज कह रहे हैं कि संबैधानिक संस्थाएं खतरे में है । 
जरूरी इस बात की है कि लोग संस्थाओं के ऊपर स्वार्थबश दबाब लगाना बंद करें । चुनाव आयोग हो,उच्चतम  न्यायालय हो,सीबीआइ हो सभी को व्यर्थ के विवादों में घसीटने से बचना चाहिए । तभी देश में लोकतंत्र फल-फूल सकता है । ठीक है, चुनाव महत्वपूर्ण है ,चुनाव के दौरान मतभेद की अभिव्यक्ति भी जरुरी हो सकता है लेकिन ऐसा नहीं लगना चाहिए की हम किसी शत्रु देश से भिड़े हुए हैं। सभी अपने ही देश के नागरिक है और सब से ऊपर राष्ट्रहित है,ऐसा भाव लेकर हमें चलान ही चाहिए । तभी हम सार्थक सावित हो सकते हैं । 
भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्थिति की यह विचित्रता है कि यहाँ पर चुनाव होता ही रहता है । जब-जब चुनाव होगा आचार संहिता भी लगेगा । उस दौरान उस क्षेत्र की सरकार कोई नीतिगत निर्णय लेने से असमर्थ हो जाएगी । फिर चुनाव होगा,उसके परिणाम आयगा । कोई जीतेगा,कोई हारेगा । लोकतांत्रिक पद्धति अपनाने बाले सभी देशों में ऐसा ही होता है। पर दुनियाँ में ऐसा सायद ही कोई देश होगा जहाँ हर साल किसी- न -किसी राज्य में चुनाव होता रहता हो । उतना ही नहीं लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव के अतिरिक्त राष्ट्रपति का चुनाव,उपराष्ट्रपति का चुनाव और पता नहीं क्या-क्या चुनाव होता ही रहेगा । फिर आप ही बताइए की कोई भी सरकार काम कब करेगी? विकास की बातें तो चुनावी घोषणापत्र में होंगे पर उनका कार्यान्वयन कब होगा और कौन करेगा ? सभी लोग तो चुनाव में उल्झे रहते हैं । फिर देश की समस्यायें जस की तस नहीं रह जायेंगी तो और क्या उम्मीद की जा सकती है ? इसलिए जरूरी है कि चुनावी  महाभारत में मर्यादा बनाए   रखा जाए और देशहित को प्रमुखता देते हुए संबैधानिक संस्थाओं को व्यर्थ के विवाद में न घसीटा जाए ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की आजादी के लिए हजारों लोगों ने अपने कुर्वानी दी थी । कितने युवकों को इसीलिए फाँसी पर चढ़ा दिया गया कि वे देशभक्त थे,वंदे मातरम गाना चाहते थे । आज जब हम आजाद हैं, हम एकबार फिर वैसी गलती नहीं दुहराएं जो पहले हो चुके हैं और जिस वजह से हम हजारों साल गुलाम रहे । आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र के इस पर्व का सही उपयोग करें ताकि इस से एसा समाधान हो जिस से देश  मजबूत हो   और भावी पीढ़ी के लिए एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज बिरासत के रूप में छोड़ जाँए ताकि वे हम पर गर्व करें।



रबीन्द्र नारायण मिश्र

mishrarn@gmail.com


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

बिसारिए न हरि नाम

बिसारिए न हरि नाम

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर: |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||

गीताक ई अंतिम श्लोक अछि । ओना तँ गीताक एक-एक शव्द अर्थपूर्ण ओ जीवनदायी अछि मुदा एहि अंतिम श्लोकमे एकहिठाम संजयक मुँहे सभकिछुक सारांश कहि देल गेल अछि । विजय ओकरे जतए भगवान श्रीकृष्ण छथि । महाभारत युद्धमे दुर्योधनकेँ युद्धक परिणामक चिंता छलनि । रहि-रहि कए ओ संजयसँ एतबे पुछैत रहैत छलाह जे युद्ध क्षेत्रमे हुनकर पुत्रसभक की हाल अछि? ओ सभ जीत सकताह की नहि? संजय साफे कहैत छनि जे एहि युद्धमे संख्या ओ शस्त्रवलक कोनो अर्थ नहि गेल अछि । विजय,विभूति ओ श्री ओतहि होएत जतए भगवान श्रीकृष्ण छथि,जतए धनुर्धारी अर्जुन छथि ,कारण हुनके संगे धर्म अछि ।
चिंता करब मनुक्खक कमजोरी थिक । जाहि  व्यक्ति वा वस्तुसँ लोककेँ जतेक बेसी लगाव रहैछ तकरा विषयमे ओ ततेक बेसी सोचैत अछि । सोचलासँ होइते की छैक?किछु नहि ,अपितु बसी सोचैत रहब तँ स्वास्थ्य सेहो गड़बड़ेबाक संभावना भए जाइत अछि । मुदा मोन अछि जे मानिते नहि अछि  आ  लोक वारंबार चिंता करैत रहैत अछि । असलमे चिंता करब नकारात्मक प्रवृत्ति थिक । एहिसँ किछु फैदा  नहि होइत अछि । तथापि लोक स्भाववश चिंता करिते अछि ।
जीवन भरि प्रयास केलाक बादो कै बेर होइत छैक जे हम की केलहुँ? कहीं हमर जिनगी व्यर्थ तँ नहि चलि गेल? कै बेर लोके खीधांस करैत भेटत ।" एह! की केलहुँ? कोनो पोखर -इनार खुनेलहुँ की? आदि,आदि?
आब पोखरि-इनार खुनेबाक जमाना नहि रहलैक । पहिलुका समयमे एकर महत्व एहि लेल छलैक जे लोक केँ एहिसँ जीवनमे सुविधा होइक । आब तँ समय बदलि गेल । सभक घर-आंङनमे चापाकल छैक,सौचालय-स्नानगृहक व्यवस्था छैक,तखन किओ पोखरि दिस किएक जाएत? समयक अनुसार लोकक अपेक्षा बदलि जाइत छैक। एकहि जिनगीमे लोककेँ पिछला बातसभ कै बेर अप्रासंगिक लागए लगैत छैक।तखन की करब? जखन जे भेलैक,से भेलैक,ओहिपर माथापच्ची केनाइ व्यर्थ थिक। लोक की कहैत छथि वा की कहताह ताहि हिसाबे चलब तखन तँ भए गेल । जरुरी अचि जे अपन मोनकेँ स्थिर कए सोची जे हमर की कर्तव्य अछि,हम की कए सकैत छी । अहाँ अपन हालतकेँ सभसँ नीकसँ अपने बुझि सकैत छी । तैँ जे अपना ठीक बुझाए सएह करबाक चाही आ जे बात बीति गेल तकरा बारे मे सोचि-सोचि समय नहि बिताबक चाही ।
सुख-दुख तँ जीवनमे लगले रहैत अछि । एहन नहि होइत अछि जे सभदिन अन्हरिए रहए । जँ धैर्यपूर्वक समयक संगे चलैत रहब तँ आइ ने काल्हि इजोरिओ अएबे करत । कहबाक माने जे धैर्यपूर्वक सही दिशामे प्रयासरत रहलासँ हाथक रेख सेहो बदलि जाइत अछि । कोनो जरुरी नहि अछि जे हम जएह चाहबै सएह हेतैक । मुदा जे भए रहल अछि तकरा सहर्ष स्वीकार कए, बिना बेसी उठापटककेँ जीवन जीवाक कला विकसित कएल जा सकैत अछि । मोनमे संतोख होअए तँ कनीकोमे लोक शांतिपूर्वक जीवन चला सकैत अछि। आखिर किओ किछु लादि कए अपना संगे नहि लए जा सकल,ने आगुओ किओ लए  जाएत । ई बात सभ बुझैत अछि । तखन समस्या कथीक अछि? मोनक फेर छैक आओर किछु नहि । दोसर संगे  जे हम अपनाकेँ तौलए लगैत छी सएह कष्टकारी प्रयोग भए जाइत अछि । सभक अपन कर्म छैक । अपन-अपन भाग्यसँ लोक जीवैत अछि । एहिमे ककरोसंगे घेंटजोड़ी करबाक कोन काज। कोनो जरुरी नहि जे जकरा हमसभ बहुत सुखी आ संपन्न बूझैत छी से सही मानेमे सुखी होथि । अंदरक हाल तँ ओ स्वयं कहि सकैत छथि। कहबी छैक जे –
"राजा दुखी,प्रजा दुखी योगीकेँ दुख दुन्ना ।
कहत कबीर सुनो भाइ साधो,एकहु घर नहि सुन्ना ।।
आस्तिक वुद्धि आ भगवानमे विश्वास रहलासँ पैघ सँ पैघ संकटपर विजय पाओल जा सकैत अछि । जीवन अपना आपमे बहुत रहस्यात्मक अछि । कखनो किछु,कखनो किछु होइते रहैत अछि । ओहि सभकेँ शांतिपूर्वक निबाहैत जीवन यात्राकेँ गंतव्य धरि पहुँचाएब एकटा महान यज्ञ थिक । एहन बात नहि छैक जे गरीबेकेँ कष्ट रहैत छैक । जीवनमे दुख-सुख लागले रहैत अछि । की पैघ की छोट सभ एहि अवस्थासँ प्रभावित होइत छथि । तखन केहनो अवस्थामे जिनकर विश्वास बनल रहैत अछि से बेसी सहजतासँ टपि जीवनमे आगू बढ़ि जाइत छथि । जिनका से नहि होइत अछि वो तरह-तरहसँ परेसान भए जाइत छथि । कै गोटे तँ अवसादग्रस्त भए जाइत छथि । कतेकोगोटे आत्महत्या धरि कए लैत छथि । जीवन संघर्षमे एहि बातकेँ सदिखन ध्यान राखबाक चाही जे हम असगर नहि छी,इश्वर हमरा संगे छथि  आ ओएह पार लगओताह ।
"हारिए न हिम्मत, बिसारिए न हरि नाम ।
जाहि विध राखे  राम,ताहि विध रहिए ।।"

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी







प्रभुदत्त ब्रह्मचारी



अलीगढ़ जिलाक एकटा गरीब ब्राह्मण परिवारमे सन् १९८५मे प्रभुदत्त ब्रह्मचारीक जन्म भेल रहनि । शुरुएसँ संस्कृतमे हुनका बहुत रूचि रहनि । ताहि हेतु ओ मथुरा,वृंदावनक कतेको गुरुकुल गेलाह । अंततः ओ काशीक गुरुकुल पहुँचलाह जतए हुनकर करपात्रीजी संगी रहथिन । स्वतंत्रता आंदोलनमे ओ सकृय रहलाह आ ताहिक्रममे  जेलो गेलाह । जवाहरलाल नेहरु जेलमे हुनकर संगे रहथिन । प्रभुदत्त ब्रह्मचारी परिब्राजकक जिनगी जीबैत विभिन्न स्थानक यात्रा करैत रहलाह । ओहिक्रममे हुनका महान संत उरिया बाबा आ हरिबाबासँ भेंट भेलनि । हिनका दुनूगोटेसँ ब्रह्मचारीजीकेँ बहुत प्रेरणा भेलनि आ हुनके सभक प्रेरणासँ ज्ञान प्राप्त करबाक हेतु ओ हिमालय चलि गेलाह ।

हमसभ जखन नेन्ना रही तँ बाबूजी बरोबरि प्रभुदत्त ब्रह्मचारीक चर्चा करैत छलाह। ओहि समयक मानल संतमे हुनकर नाम छल । चर्चाक क्रममे ओ कहितथि जे कोना ओ हिन्दू कोड बिलक मामलापर नेहरुजीक खिलाफमे लोकसभाक चुनाव १९५२मे लड़ल रहथि । संगमक ओहिपार पूलसँ लोक झूसी जाइत अछि । गंगाक कातमे हुनकर आश्रम छल । ओतहि एकटा संस्कृत महाविद्यालय सेहो ओ चलबैत छलाह । तहिएसँ ओ स्थान संकीर्तन भवनक नाओँसँ जानल जाइत अछि। गाहे-वगाहे हुनकर चर्चा होइते रहैत छल ।  समाचार पत्रसभमे हुनका बारेमे छपैत रहैत छल । ओही समयमे हुनकर लिखल किताब "शोक नाश" पढ़बाक अवसर भेटल । अद्भुत  किताब छल ओ । एहिमे ओ अपना संगे घटल एकटा दुखद प्रसंगक वर्णन केने छथि । दक्षिण भारतक अपन एकटा भक्तक ओहिठाम ट्रेनसँ जाइत काल किछु सहयात्रीसभ हुनका संगे सीटक विवादक क्रममे हुनकर झोटा पकड़ि कए ततेक जोर-जोरसँ खिचलक जे सौंसे माथक केससभ ऊखरबाक हालत भए गेल । दर्दसँ ओ छटपटाइत चलाह । इसारासँ ओ कै बेर ओकरा मना करथि । मुदा ओ अत्याचार करैत रहल । ओहि असह्य पीड़ाकेँ ओ सहैत रहि गेलाह । किछु बाजिओ नहि सकलाह,कारण ओहि समय ओ मौनमे रहथि,बाजि नहि सकैत छलाह । जखन ट्रेनसँ उतरबाक काल हुनकर स्वागतमे भक्तक भीड़ लागि गेल आ से बात ओ लड़ाका यात्री देखलक तँ ओकरा अपन गल्तीक अंदाज भेलैक । ओ हुनकर पैर पर खसि पड़ल । महात्माजी ओकरा आशीर्वाद दैत अपन भक्तसभक संगे चलि गेलाह। ककरो किछु नहि कहलखिन।

शोक नाश पुस्तकमे बर्ह्मचारीजी अपन आश्रममे रहैत एकटानेन्नाकेँ अकस्मात गंगामे नहाइत काल डुबि जेबाक प्रसंगक वर्णन करैत लिखैत छथि जे ओहि बालककेँ ओ  दिन-राति ध्यान रखैत छलाह । नित्यप्रति ओ गंगा स्नान करैत छल । ओहिदिन हुनके संगे नहाइत-नहाइत ओ गंगाक पानिक घुर्मीमे फँसि गेल आ डुबल से डुबले रहि गेल । आस-पास ठाढ़ गोताखोरसभ बहुत तकलक,अपनाभरि बहुत प्रयास केलक मुदा ओ कतहु नहि भेटल। एहि तरहेँ दुर्घटनामे ओहि नेन्नाक आकस्मिक मृत्युसँ महात्माजी बहुत दुखी भेलाह । कै दिन अन्न-जल ग्रहण नहि केलाह । फेर लोकेसभ हुनका बुझओलक जे एकटा सन्यासीक लेल एतेक शोक करब उचित नहि । ओहि बालकक स्मृतिमे संकीर्तन भवनमे भगवानक नवाह कएल गेल । आश्चर्यक बात जे ओहि बालकक पिता एहि समाचारसँ उद्वेलित नहि भेल आ कहैत रहि गेल जे महात्माजीक आश्रयमे ओकर मुक्ति भए गेल एहिसँ बेसी भाग्यक बात आोर की भए सकैत छल ?

पहिलबेर हमरा हुनकासँ १९७८ ई०मे भेंट भेल । ओहि समयमे हमर पोस्टींग प्रयागराजमे रहए । हमरासंगे हमर अनुज रहथि । ओ विस्तारसँ हमरासँ गप्प-सप्प करैत रहलाह । संगहि हमर अनुजसँ सेहो हुनकर पढ़ाइ-लिखाइक बारेमे पुछऔत रहलखिन । आग्रह केलखिन जे ओ हुनकार संस्कृत कालेजमे शास्त्रीमे नाओँ लिखा लेथि । मुदा ताहि हेतु ओ तैयार नहि भेलाह । हमसभ घंटा-दूघंटा ओहिठाम बिता कए आपस अपन डेरा चलि आएल रही । तकर बाद कै बेर हम हसगर आ परिवारक संगे हुनकासँ भेंट करबाक हेतु जाइत रहलहुँ। संकीर्तन भवन पर गेलासँ एकटा अद्भुत सात्विक आनंदक अनुभव होइत छल । कै बेर तँ ओ लिखबा मे व्यस्त रहैत छलाह । हमरा सभक गेलापर  किओ चेला जा कए हुनका कहतनि जे भक्तसभ आएल छ थि तँ ओ बाहर आबि जइतथि । संकीर्तन भवनमे जन्माष्टमीक पर्व धूमधामसँ मनाओल जाइत छल । कै बेर बेर हमहु ओहिमे सामिल भेल रही ।

संत तँ ओ छलाहे,अपना समयकेँ उत्कृष्ट लेखकमे सेहो हुनकर सुमार होइत छल । करीब दू सए पोथी ओ लिखने छथि । साहित्यिक क्षेत्रमे हुनकर योगदानक बहुत प्रशंसा भेल आ हुनका कैटा पुरस्कार सेहो भेटल।

हुनकर प्रमुख पुस्तकमे भगवती कथा (११८  खण्ड),भगवत चरित सप्ताह(मूल) , भागवत चरित सटीक (दू भाग),महात्मा कर्ण ,महावीर हनुमान ,चैतन्य चरितावली, आदि प्रसिद्ध अछि । देबराहा बाबा माघ मेलामे हुनकर भागवत चरित सटीक दुनू खण्ड आशीर्वाद स्वरुप भक्तगणकेँ कीनबाक प्रेरणा दैत छलाह ।

ब्रह्मचारीजीक वसंतगाँव स्थित आश्रममे हनुमानजीक विशाल मुर्तिक स्थापना करबाक हेतु मुर्ति दक्षिण भारतक कर्कलासँ आनल गेल छल । कै महिनाक प्रयासक बाद ओहि विशालकाय मुर्त्तिकेँ वसंतगाँव स्थित आश्रममे ठाढ़ कएल गेल । ओहि समयमे ब्रह्मचारीजी प्रयागमे माघक कल्पवास कए रहल छलाह। ओ माघभरि ओतए नित्य गंगामे स्नान करैत छलाह । तथापि ओ वसंतगाँव स्थित आश्रममे हनुमानजीक मुर्त्तिक स्वागत हेतु २४ जनबरी १९९०क अएलाह । हनुमानजीक विशालकाय मुर्त्ति देखि कए ओ भावविभोर  भए गेलथि । मुदा माघक स्नान संगममे करबाक रहनि । तैँ ओ ओतए ओही राति लौटि गेलाह । माघमेलाक बाद ओ सुनरेखा गाँव स्थित सौबरी ॠषिक आश्रमक जीर्णोद्धार कार्यक्रममे भाग लेबए अएलाह आ तकर बाद वृंदावन चलि गेलाह । ओहिठाम हुनकर स्वस्थ्य बहुत तेजीसँ खराप होबए लागल । देवराहा बाबा एहि समाचारकेँ सुनि बहुत दुखी रहथि । ओ निरंतर हुनकर हालचाल लैत रहलाह । परंतु ओ दबाइ खेबासँ साफे मना कए देने रहथि । खराप स्वास्थ्यक बाबजूद ओ ओहिठामसँ वसंतगाँव स्थित अपन आश्रम अएलाह आ हनुमानजीक पास भावविभोर भए कानए लगलाह । हुनकर आग्रहपर भक्तसभ हुनका कुर्सीपर बैसाकए हनुमानजीक परिक्रमा करओलथि। दोसर दिन भोरे ११ मार्च १९९०क ओ एहि संसारकेँ छोड़ि अनंतमे विलीन भए गेलाह । प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजी अपना समयके यशस्वी विद्वान,लिखक आ प्रतिष्ठित संत छलाह । जीवनभरि कोनो-ने-कोनो रूपमे ओ समाजक सेवा करैत रहलाह । ओ  सनातन धर्मक एकटा मजगूत खाम्ह छलाह । हुनकर निधनसँ देश ओ संस्कृतिक अपार क्षति भेल । हुनकर चलाओल गेल काजसभकेँ हुनक शिष्य एवम् प्रशंसक लोकनि आगा बढ़बैत रहथि सएह हुनकर प्रति सही मानेमे श्रद्धांजलि होएत ।




शनिवार, 26 जनवरी 2019

फिर मोदी ही क्यों?


फिर मोदी ही क्यों?



२०१९ के लोकसभा का आम चुनाव दस्तक दे रहा है । सभी पार्टियां ताल ठोक रही हैं। तरह-तरह के समाचार नित्य अखबार और सोसल मिडिआ में सुर्खी बटोरने लगी हैं । नित्य टीवी चैनलों पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। लोकतंत्र के लिए इस से शुभ क्या हो सकता है कि देश में यत्र-तत्र समय से पहले से ही आगामी सरकार के गठन और संरचना पर देशव्यापी चर्चा हो? पर सोचने की बात यह है कि इन तमाम चर्चाओं का निहितार्थ क्या है ? जो प्रस्ताव जनता के सामने राजनीतिक दलों ,नेताओं द्वारा किए जा रहे हैं क्या वे भारतीय गणतंत्र के लिए सचमुच शुभ होंगे? क्या हम विश्व में एक सम्मानित देश के नागरिक के रूपमें अपने को खड़ा कर सकेंगे? निश्चय ये सबाल हमारे मन में आ रहे होंगे और अगर नहीं आ रहे हैं तो भी हमें सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? जिस तरह से विपक्षी पार्टियां नित्य नये तौर-तरीके लगाकर वर्तमान मोदी सरकार के पतन के लिए कटिवद्ध दिख रही हैं क्या वे सचमुच उचित है ,देश के लिए लाभदायी है?
लोकतंत्र में विपक्ष का अपना महत्व है । उन्हें सरकार के खिलाफ विचार रखने का पूरा हक है । सरकार अगर कहीं गलत है तो उसे स्पष्टता से बताया जाना ही चाहिए । परंतु  मात्र विरोध के लिए विरोध करते रहने से देश वा जनता का कुछ भी  लाभ संभव नहीं है । देखा जा रहा है कि सरकार जो कुछ करती है, विपक्षी दल खासकर कांग्रेस पार्टी उसके खिलाफ बोलने लगते हैं । इसका कोई अच्छा प्रभाव  जनता में नहीं होता है । लोक सोचते हैं कि ये लोग तो ऐसे ही बोलते रहते हैं । फिर इनके बातों पर माथापच्ची क्यों किया जाए?सरकार का विरोध करने और हो-हल्ला करते रहने की विमारी इस कदर फैल चुकी है कि शायद ही किसी दिन संसद चल पाता है। आखिर इतने खर्च कर देश के गरीब जनता के पैसे से चल रहे संसद का समय इस तरह वर्वाद करते रहना कहाँ तक उचित है? संसद  होता ही है चर्चा के लिए । सभी पक्ष अपना विचार विधि संम्मत तरीके से रखें ,सरकार को उसकी त्रुटिओं के तरफ ध्यान खीचें और जरूरी पड़ने पर और उचित बहुमत होने पर लगातार गलत कर रहे सरकार को बहुमत द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पास कर बदल दें । जब संविधान द्वारा इतने अधिकार एक सांसद को प्राप्त है तो यह कहाँ तक उचित है कि आये दिन संसद में हंगामा होता रहे,बात-बात में संसद की बैठक स्थगित हो जाए और जनता मूकदर्शक बना रहे?
लोकतंत्र में विपक्ष की अपनी भूमिका होती है । लेकिन यह भूमिका मात्र हो-हल्ला कर लेने से  पूरा नहीं हो सकती है । सरकार बदलना भी लोकतंत्र की सार्वभौमिकता को सिद्ध करती है । चुनाव से पूर्व भी लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव बहुमत से पारित कर सरकार को हटाया जा सकता है । जनता चाहे तो चुनाव के समय मतदान द्वारा  ठीक काम नहीं करने बाले सरकार को बदल दे । ऐसा कई बार हो भी चुका है । जब श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार से लोग नाराज हुए तो उसे चुनावमें बुरी तरह पराजय का मुँह देखना पड़ा । विपक्ष के तमाम नेता आपत्तिकाल में में  बंद थे । देश में नागरिकों के सारी लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गये थे । स्वर्गीय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सभी विपक्षी दल इंदिरा गांधी को हराने के लिए एकजुट हुए । जनता दल के नाम से एक नये दल का सृजन हुआ जिस में जनसंघ सहित कई विपक्षी दल शामिल हुए । इंदिरा गांधी चुनाव हार गई । देश में नयी सरकार मोरारजी भाई के नेतृत्व में बनी । सरकार बन तो गई पर चल नहीं पाई । कुछ साल बाद ही जनता दल के नेताओं के अहं का टकराव इस कदर बढ़ गया कि जनता दल का विभाजन हो गया । मोरारजी भाई को इस्तिफा देना पड़ा । चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में जो कांग्रेस समर्थित सरकार बनी वह कभी लोकसभा का विश्वास नहीं प्राप्त कर सकी । देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा । इस तरह के कई प्रयोग बाद में भी हुए जिस में कार्यकाल पूरा करने की बात तो छोड़िए,कांग्रेस समर्थित सरकार चाहे वह चनद्रशेखर के नेतृत्व में बनी या देवगौड़ा के ज्यादे दिन नहीं चल सकी और देश में मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा ।
कहने का तात्पर्य यह है कि मात्र विरोध के लिए विपक्षी दलों का एकत्र होना कोई सार्थक काम नहीं कर पाती हैं। उल्टे इस मौकापरस्ती से बनी सरकार में सिर फुटौअल होती रहती है । प्रधान मंत्री नाम मात्र के प्रधान रह जाते हैं। समर्थक दलों में सभी के पास में  बीटो करने का अधिकार आ जाता है । अगर एक भी समर्थक दल नाराज हो गई तो सरकार गई । इस तरह के आया राम ,गया राम बाली सरकार जनता का क्या भला कर सकती है? कर ही नहीं सकती है। सभी दल अपना स्वार्थ पूरा करने में लगे रहते हैं । उन्हें पता रहता है कि यह सरकार ज्यादा दिन चलने बाली नहीं है, इसलिए जितना हो सके जल्द से जल्द वसूली कर लिया जाए । सोचिए,ऐसी खतरनाक स्थिति एकबार फिेर हम आने देंगे क्या?
वर्तमान में ऐसा लग रहा है कि मोदीजी को हरा देना और अगले बार उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोकना ही सभी विपक्षी दलों का एकमात्र एजेंडा है । इस अभियान में भाजपा के कुछ भूतपूर्व और वर्तमान लोक भी शामिल दिखाइ देते हैं। यह समझ से बाहर है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटा मात्र देने से देश की समस्यायों का समाधान कैसे होने बाला है? क्या उन्होंने इन्दिरागांधी की  तरह देशपर आपत्तिकाल लगा दिया है ? क्या अपने कार्यकाल में उन्होंने देश की संप्रभूता की रक्षा करने से नाकामयाब रहे हैं? क्या उन्होंने देश के सरकारी खजाने का इस तरह दुरुपयोग कर दिया है कि देश कंगाल हो गया है? कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति कहेगा कि इस सभी में से कुछ भी नहीं हुआ है । देश पहले की तरह या उससे भी ज्यादा सुरक्षित लगता है । दुनयाँ में भारत एक चर्चा का विषय है । शक्तिशाली देश भी अब भारत के खिलाफ जाने से परहेज करते हैं ।  दुनियाँ में पाकिस्तान के साथ खड़ा होने बाला देश शायद ही कोई बचा है । 
आखिर विपक्षी दल ऐसा क्यों कर रहे हैं? आप कह सकते हैं कि विपक्षी दल ऐसा नहीं करेंगे तो क्या सरकार का प्रचार करेंगे? विल्कुल नहीं । उनसे ऐसी अपेक्षा कदापि वाजिब नहीं है । सरकार के गलत नीतिओं के खिलाफ जनता और सरकार का ध्यान उन्हेँ आकर्षित करना ही चाहिए। यदि सरकार जनहित के मामलों की अनदेखी करती है तो उन्हें यह देश को बताना ही चाहिए । परंतु वे ऐसा करने के बजाए जब संसद बैठती है तो शोरगुल करके ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर देती हैं कि संसद चले ही नहीं । ऐसा क्यों हो रहा है ? वह भी एकबार नहीं बार-बार हो रहा है । कोई भी समझदार व्यक्ति आसानी से कह देगा कि या तो इनके पास कोई मुद्दा ही नहीं है या ये संसद को चलने देने से वाधित कर सरकार को रचनात्मक काम करने से रोकना चाहती हैं । संभवतः दोनो ही बातें सही हो । कारण इतना हो-हल्ला करने के बाद भी सभी विपक्षी दल देश को यह नहीं बता पा रहे हैं कि वे गठवंधन बनाकर इस सरकार को हरा देने में कामयाब हो भी जाते हैं तो वे लोग देश का शासन किस आधार पर चलाएंगे? प्रधानमंत्री कौन होगा? क्या वे लोक विना किसी नीति के इतने बड़े देशपर शासन कर पायेंगे? और तो और, इस से भी युक्तिसंगत प्रश्न तो यह है कि इस कदर जैसे-तैसे आपस में एकत्रित विपक्षी दलों की भीड़ सत्ता प्राप्त करने के बाद भी एकठ्ठा रह पायेगी या पिछले अनुभवों की तरह  आपस में लड़-झगड़ कर देश को जल्दी ही दोबारा मध्यावधि चुनाव कराने पर मजबूर कर देंगी । जब आप इतने बड़े देश पर शासन करना चाहते हैं तो इन सब बातों की स्पष्टता के साथ समाधान तो होना ही चाहिए । अफशोस की बात है कि कहीं भी भूल से भी इन बातों पर चर्चा नहीं हो पा रही है । होगी भी कैसे? इन्हें तो बस यह फिक्र है कि हाय राम! मोदीजी कहीं दुबारा न आ जांय? इसलिये जैसे-तैसे महागठवंधन बनाकर और क्या- क्या करके मोदीजी को हटाने में लगे हैं।
सबाल है कि इतने बड़े देश में करोड़ो रुपये खर्च कर हम चुनाव क्यों कराते हैं? इसका आशान उत्तर है कि यह एक आवश्यक संवैधानिक आवश्यकता है । देश में केन्द्र और राज्य सरकारों का गठन लोकतांत्रिक तरीकों से हो जिसे संविधान के अनुसार मान्यता प्राप्त हो, इसलिए ही लोकसभा,और राज्यों के विधान सभा का चुनाव कराया जाता है । जरुरी यह है कि चुनाव के बाद देश में एक स्थिर और स्पष्ट सोचबाला सरकार का गठन हो । यह तभी हो सकता है जब सरकार के पास लोकसभा  में पर्याप्त बहुमत हो । अगर एक दल को स्पष्ट बहुमत मिल जाए ,जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिला था, तो केन्द्र की सरकार ठीक ढंग से बिना किसी दबाब के अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा करे । समस्या तब आती है जब किसी भी दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिले । ऐसी स्थिति में सरकार चलाने के लिए कई दल आपस में चुनाव से पहले वा चुनाव के बाद भी गठजोड़ करते हैं । ऐसे गठजोड़ों का एकमात्र लक्ष्य जैसे-तैसे बहुमत का आकड़ा जुटाना और जुटाए रखना होता है । कई बार तो यह भी देखने में आया कि चार-पाँच सदस्यबाले दल भी अपनी मांग मनबाने के लिए केन्द्र सरकार को ब्लैकमेल करते रहे । जब सरकार स्वयं अपनी हैसियत बचाती फिड़ेगी तो वह देश और जनता की रक्षा कैसे कर पायेगी? यह एक ऐसा सबाल है जिसका उत्तर विपक्ष में महागठवंधन बनाने के लिए प्रयत्नशील दलों को जनता को देना चाहिए, देना ही पड़ेगा।
गठवंधन द्वारा सरकार बनाना और चलाना कैसा होता है वह देश की जनता देख चुकी है,भुगत चुकी है । जब प्रधानमंत्री अपने मर्जी का मंत्री भी नहीं रख सकते तो वे प्रधानमंत्री बेशक हों , संविधान में निहित भावना और व्यवस्था के अनुकूल कार्य नहीं कर रहे होते हैं। होता तो यह है कि सभी घटक दल अपने-अपने मंत्रियों की सूची प्रधानमंत्री को पकड़ा देते हैं जिसे मानना उनकी मजबूरी रहती है ,अन्यथा सरकार  नहीं चल पायेगी। चुपचाप सब कुछ सहते रहो और देश का प्रधानमंत्री बने रहो ,यह कहाँ का सही हो सकता है? ऐसी मिली जुली सरकार में प्रधानमंत्री की हैसियत कई बार दयनीय हो जाती है । यह समझ से पड़े नहीं है कि ऐसी मजबूर सरकार राष्ट्र हित की रक्षा कैसे कर सकती है?
संविधान निर्माताओं ने संभवतः देश में ऐसी परिस्थिति  होगी,ऐसा सोचा भी नहीं था,परंतु अब जब ऐसी संभावनाएं बार-बार हो रही हैं तो  संविधान में संशोधन कर गठवंधन से बननेबाली सरकारों के लिए मापदंड बनाया जाना चहिए । हो सकता है कि ऐसे में सामुहिक कार्यक्रम तय कर एक साथ चुनाव लड़ने बाले दलों के गठवंधन पर दल-बदल कानून को भी लागू कर दिया जाए ताकि समर्थक दल सोझ-समझकर ही सरकार से समर्थन वापस लें । समर्थन वापसी से पूर्व यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए की सरकार  गिड़ने  की स्थिति में बहुमत संपन्न वैकल्पिक सरकार बन सके । अगर ऐसा नहीं होगा तो वारंवार चुनाव होंगे और देश का बेड़ा तो गर्त होगा ही । अभी जो गठवंधन होता आया है उस में जब जो चाहे सरकार से बिना खामिआजा भुगते समर्थन वापस ले ले । सरकार गिड़ जाए और आगे कोई सरकार कैसे बने ,इसपर कोई स्पष्टता तो छोड़िए, कोई संभावना भी दूर-दूर तक नजर नहीं होती है। फिर देश बचे कैसे?पहले कई बार ऐसी दिक्कतें हुई है,सरकारें आई-गई । मध्यावधि चुनाव हुए । फिर भी स्पष्ट बहुमत की सरकार नहीं बन सकी । इस सब के बाबजूद कानून में कोई सुधार नहीं हो सकी जिस से इस तरह की परिस्थिति से बचा जा सके । 
यह एक संयोग ही कहिए कि तीस साल के बाद देश में स्पष्ट बहुमत से श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में एक मजबूत सरकार २०१४ के चुनाव के बाद बनी । सरकार पाँच साल का अपना कार्यकाल पूरा करने जा रही है । जनता को यह पूरा अधिकार है कि वह केन्द्र सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा करे और अगला चुनाव में इस बात का ध्यान रखते हुए अपना मतदान करे ।
यहाँ यह विचार करने की जरूरत है कि क्या मोदी सरकार ने  पिछले पाँच सालों में ठीक से काम किया?चाहे नोटबंदी हो या जीएसटी कानून,इन सब को लागू करने के लिए सरकार ने मजबूत इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है । राज्यसभा में अल्पमत होने  और कई विपक्षी दलों द्वारा लगातार वाधा खड़े करते रहने के बाबजूद सरकार ने इन उद्येश्यों की प्राप्ति हेतु प्रयास किए,और सफल रही। अब यह कहना कि नोटबंदी से क्या हुआ,या जीएसटी कानून से अपक्षित लाभ नहीं हो रहा है,उचित नहीं है । इस में कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि सरकार के इरादे सही थे । जनता ने इस बात को सराहा भी अन्यथा नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश में इतना भारी बहुमत से बीजेपी की सरकार नहीं बनती । पाकिस्तानी सीमा के अंदर घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक करना कोई मामूली घटना नहीं थी । पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति संपन्न देश है । फिर भी सरकार ने जोखिम भरा फैसला लिया और हमारी सेना ने बहादुरी का मिसाल कायम की  जिस से सारी दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ा। देश में सरकारी कल्याण योजनाओं में हो रहे भूगतान को आधार से जोड़कर सरकार ने लाखों  फर्जी लाभार्थियों को चिन्हित करने में कामयाबी हाशिल की जिस से करोड़ो रुपये का गलत भूगतान रोका जा सका। राष्ट्रव्यापी स्वच्छता अभियान चलाकर शहर कि तो बात छोड़िए गाँव-गाँव में जो सफाई के प्रति रूझान पैदा हुआ है,इसे कौन नजरअंदाज कर सकता है?
नोटबंदी में क्या हुआ,नहीं हुआ पर इतना तो तय है कि सरकार की मजबूत इच्छा शक्ति का संदेश पूरे देश को मिला कि सरकार राष्ट्र में आर्थिक सुचिता लाने के लिए कटिवद्ध है । क्या इतने बड़े देश में यह काम एक ही व्यक्ति याने श्री  नरेंद्र मोदी कर सकते हैं? कदापि नहीं । उन्होंने मार्ग दर्शन दिया, जोखिम भरा निर्णय लिया और देश में पारदर्शी अर्थव्यवस्था लागू करने का भरपूर प्रयास किया । इतना तो तय है कि इस घटना के बाद पूरे देश में डिजीटल लेन-देन को बढ़ाबा मिला और नगदी कारोबार धीमा हो गया । मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने कि लिए और काला धन को कानूनी प्रकृया के अधीन लाने में कई कड़े फैसले किए ।  नोटबंदी के बाद  सन् २०१६ में बेनामी संपत्ति कानून में किया गया संशोधन उसी दिशा में लिया गया एक सही कदम था ।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईमान्दार छवि को आघात पहुँचाने के एकमात्र लक्ष्य से श्री राहुलगांधी लगातार राफेल का मुद्दा गरमाये रखना चाहते  हैं, जबकि माननीय उच्चतम न्यायलय ने तमाम बातों पर विचार कर इस सौदे में किसी भी प्रकार से  गड़बड़ी से इन्कार किया है । उचित तो यह था कि जब एकबार उच्चतम न्यायलय इस विषय में अपना निर्णय दे दिया है तो बात वहीं खतम हो जाती । इसके बाबजूद लगातार इस मुद्दे को उछाला जाना क्या सावित करता है? यही कि कांग्रेस पार्टी और श्री राहुलगांधी के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और वे सिर्फ भ्रम फैला कर लोकसभा का चुनाव जीत लेने का सपना देख रहे हैं। देश की जनता काफी प्रवुद्ध है और वह इसका सबूत वारंबार देती रही है । नोटबंदी की घोषणा के बाद विपक्ष के सारे नेता इसके खिलाफ बोल रहे थे , परंतु इसके बाद उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती । क्या पता महागठवंधन के नेताओं, खासकर श्री राहुलगांधी द्वारा राफेल के मुद्दे पर फैलाए जा रहे भ्रम का फिर वही हस्र हो ।
 अच्छा होता ,अगर श्री राहुलगांधी एवम् महागठवंधन बनाने बाले अन्यदल के नेतागण एक वैकल्पिक सरकार की स्पष्ट रूपरेखा जनता के सामने प्रस्तुत करते । साथ ही वे यह भी बता सकते कि किस प्रकार वे एक बेहतर सरकार दे सकते हैं और उसका मुखिया कौन होंगे? यह सब कुछ नहीं हो पा रहा हैं न होने की उम्मीद लग रही हैं कारण वहाँ तो प्रधानमंत्री पद के दर्जनभर  दावेदार हैं । शायद नाम की घोषणा नहीं होने तक ही वे साथ दिखें,ऐसा लोगों के मन में भाव उत्पन्न हो जाना अस्वभाविक नहीं हैं।
दोकलाम में जिस तरह चीन के दबाब के आगे भारत की सेना अडिग रही,यह बिना मजबूत सरकार के संभव नहीं हो सकता था । अफशोस की बात है कि जब सारा देश इस समस्या से जूझ रहा था और हमारी सरकार और सेना चीन को माकूल जबाब देने में लगी थी तब श्री राहुलगांधी गुप- चुप चीन के राजदूत से क्यों मिले? वहीं नहीं,जब वे मान सरोवर की यात्रा करने गये थे उस दौरान भी वे चीन के मंत्री से मिले । उनका इरादा जो भी रहा हो,परंतु इस तरह की गतिविधि प्रश्नचिन्ह तो खड़ा करता ही है कि आखिर उनको इस मुलाकात की जरूरत क्यों पड़ी और अगर  पड़ ही गई तो सरकार को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की अखंडता और संप्रभुता सर्वोपरि है । इस उद्येश्य की प्राप्ति के लिए ही हम संविधान सम्मत तरीके से देश के शासन तंत्र की व्यवस्था करते हैं । चाहे कोई भी व्यक्ति किसी भी दल का हो , है तो अपने ही देश का । चाहे सरकार किसी दल या दलों के समूह का हो उसका लक्ष्य देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के साथ- साथ देश के सभी नागरिकों का बिना किसी भेदभाव के कल्याण की व्यवस्था करना ही है । अगर ऐसा है तो फिर इतनी कटुता और वाद-विवाद क्या कोई औचित्य नहीं रह जाता है? लेकीन आज-कल ऐसा लग रहा है कि श्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के पद से हटाना अंग्रेजों को भारत से हटाने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है । बिना किसी पूर्व सोच-विचार के आपस में बिरोधी विचार धारा के लोक इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकजुट होते दिखाई पड़ रहे हैं । मान लीजिए कि वे अपने प्रयास में सफल हो भी जाते हैं तो आगे देश कैसे चलाएंगे? विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दोंपर उनका क्या रुख होगा ? क्या  पता वे सब कब आपस में लड़ पड़ेंगे और देश एकबार पिर अनिश्चितता के दौर में पहुँच जाएगा ? महागठबंधन बना रहे दलों को शायद इन बातों का परबाह नहीं है,क्यों कि वे जातीय और धार्मिक आधार पर मतदाताओं की गिनती करते रहते हैं और इस बात से आश्वस्त हैं कि अमुक जाति वा संप्रदाय के मतदाता तो उनके साथ हैं ही । शायद वे यहीं भूल कर रहे हैं ।  देश में युवकों की एक ऐसी प्रवल जनसंख्या मतदाता बन चुकी है जो इन झमेलो में पड़ना नहीं चाहती है । उन्हें शिक्षा चाहिए, नौकरी चाहिए । ऐसे मतदाताओं ने ही पिछले बार मोदीजी में विश्वास व्यक्त कर उन्हेँ असाधारण विजय दिलाया था । कहने का तात्पर्य है कि देश के अधिकांश युवा बहकाबे में आने बाले नहीं हैं । वे जानते हैं कि महागठवंधन करके जैसे-तैसे बनी सरकार बेशक बन जाए पर जनता की भलाई नहीं कर सकेगी । वे तो दिन-रात अपने हितों के टकरावों को सुलझाते रह जाएंगे । फिेर देश का क्या होगा?
 जाहिर है कि मतदाताओं को बहुत सावधानी से निर्णय करना होगा ताकि देश एकबार फिर से कहीं ऐसे ही जगह न पहुँच जाए जहाँ वह २००४ से २०१४ तक थी । जिस दौर में हर सरकार का समर्थक दल अपने को प्रधानमंत्री से कम नहीं आंकता था और उसके दल को आवंटित मंत्री से जो चाहे करबाता रहे,प्रधानमंत्री मूकदर्शक बना रह जाता था। मिली- जुली सरकारों का क्या हस्र हुआ है यह देश से छिपा नहीं है । किस तरह देश को सोना विदेशी बैंक में गिरबी रखने की नौबत आ गई,यह शायद ही भुलाया जा सके । पिछले युपीए सरकार में अनिर्णय पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी। सरकारी अधिकारी फाइलों की ढ़ेर पर बैठे रहते थे । घोटाला पर घोटाला  की खबर आम बात हो गई थी । यह भी कहा जा रहा था कि देश का शासन तो असंवैधानिक हाथों से हो रहा है ,आदि,आदि । क्या हम फिर उसी दौर में दोबार वापस जाना चाहेंगे?सरकार चलते रहे,इस हेतु देश को क्या-क्या नहीं झेलना  पड़ा था । घोटाले पर घोटाले होते रहे । फिर भी संवंधित व्यक्ति मंत्री बने रहे । अगर प्रधानमंत्री कुछ करते तो अपनी कुर्सी ही गमा बैठते । फिर भी उस दौर में प्रायः प्रत्येक सजग नागरिक यही कहता था कि प्रधानमंत्री अगर कुछ और नहीं कर सकते हैं तो त्यागपत्र तो दे ही सकते हैं । ऐसा माहौल क्या हम फिर से देखना चाहेंगे? अगर नहीं तो इसका एकमात्र समाधान तो यही दिखता है कि मोदीजी को एकबार फिर मौका दिया जाए ताकि वे अपने बचे हुए योजनाओं को मूर्तरूप दे सकें और देश प्रगतिपथ पर बढ़ता रहे ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

Email:mishrarn@gmail.com

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

वकालतनामा


वकालतनामा





जँ अहाँकेँ कोट कचहरीक चक्कर पड़ल अछि तँ वकालतनामाक बारेमे अवश्य सुनने होएब कारण बिना वकालतनामाकेँ कोनो ओकील अहाँक मोकदमा कोर्टमे लड़िए नहि सकैत अछि । जहाँ कोनो मोकदमा लड़बाक उद्यश्यसँ लोक कोर्ट बिदा भेल तँ पहिल स्टाप ओकीलक दरबाजापर होइत अछि । ओकील साहबे मोछपर हाथ दैत छथि जे चलू एकटा आओर मोअक्किल फँसल । ओ करबो की करताह? हुनकर तँ ओएह पेशा छनि । बिलारि जँ मूससँ दोस्ती कए लेत तँ जीबत कोना? खाएत की? सएह बात एतहुँ लागू होइत अछि । सामान्यतः ई देखबामे अबैत अछि जे जँ अहाँ ओकील लग चल गेलहुँ तँ ओ अहाँकेँ मोकदमा लड़बाक हेतु ततेक उत्साहित कए देताह जे होएत जे गाम घुरएसँ पहिनहि मोकदमा फाइल केनहि जाइ । मोअक्किलकेँ अपना काबूमे लेबाक हेतु ओकिल साहेब झट दए ओकलातनामा पर दस्तखत करओताह आ किछु फीस सेहो चाहबे करी । तकरबाद अहाँ घुमैत रहू हुनका पाछू-पाछू ।

कै बेर मोअक्किल नहि बुझैत छथि जे ओ कुन-कुन कागजपर दस्तखत कए ओकिलकेँ दए रहल छथि। ओना एतेक विश्वासतँ ओकिलपर करै पड़ैत छैक । एहन कागज सभमे वकालतनामा तँ जरूर रहैत अछि । ओकलातनामा मोअक्किल वा ओकर अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा ओकरा एबजमे कोर्टमे ओहि मामलाक पैरबी करबाक आज्ञा पत्र थिक । एकरा मोख्तारनामा वा ओकीलपत्र सेहो कहल जाइत अछि ।

ओकालतनामामे निम्नलिखित बात होएब जरुरी थिकः-

१. ओकालतनामा निष्पादनक तारिख,

२.केसक नाओँ जाहि हेतु ओकालतनामा बनाओल जाइत अछि,

३.कोर्टक नाओँ जाहि हेतु ओकालतनामा बनाओल जाइत अछि,

४.अधिवक्ता नियुक्त केनिहारपार्टीक नाम,

५.ओकिलक नाओँ आ पता,

६.केस संख्या आ केसक शीर्षक,

७.अधिवक्ताकेँ देल गेल शक्ति / निर्णय लेबाक अधिकार,

८.पार्टी आ अधिवक्ता क हस्ताक्षर,

ओकालतनामाक मार्फत ओकिलकेँ बहुत रास अधिकार प्राप्त भए जाइत अछि । मोअक्किलकेँ ओकालतनामापर दस्तखत करएसँ पहिने ओकरा बहुत ध्यानसँ पढ़बाक चाही आ जे  अधिकार ओ ओकीलकेँ नहि देबए चाहैत अछि तकरा हटा देबाक चाही । समझौता करबाक अधिकार,ओकिल नियुक्त करबाक अधिकार,पैसा लेबाक अधिकार देलासँ कै बेर बहत क्षति हेबाक संभावना भए सकैत अछि ।

ओकालतनामा केस लड़निहर व्यक्ति स्वयं वा ओकरा द्वारा अधिकृत व्यक्ति हस्ताक्षर कए सकैत अछि। पार्टीक एबजमे व्यापार वा व्वसाय करए बला व्यक्ति सेहो ओकालतनामापर हस्ताक्षर कए सकैत छथि। जौँ कोनो मामलामे कै गोटे सामिल छथि तँ सभगोटे संयुक्त रूपसँ एकाधिक ओकिलकेँ ओकालतनामा दए सकैत छथि ।

माननीय उच्चतम न्यायालय उदय संकर त्रीयार बनाम राम कलेश्वर प्रसाद सिंह एवम् अन्य(2005(11) TMI-436 SC)क मामलामे ओकालतनामाक संवंधमे विस्तृत मार्गदर्शन जारी करैत स्पष्ट केलक अछि जे कोनो मामलामे ओकालतनामा बहुत सावधानीक संग बनाओल जेबाक चाही आ कोर्टक रजिष्ट्रीकेँ ई चाही जे सुनिश्चित करए जे ओकालतनामा सही अछि अन्यथा ओकरा शुरुएमे रोकि देबाक चाही जाहिसँ आगू परेसानी नहि होइ । एकबेर ओकालतनामापर संवंधित व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर भए गेलाक बाद ओकरा तय अवधिमे मामलासँ संवंधित अन्य कागजातक संगे कोर्टमे जमा कएल जाएत । तकरबाद बिना न्यायालयक मंजूरीकेँ मोअक्किल वा ओकिल वकालतनामाकेँ खारिज नहि कए सकैत छथि । जँ दुनू पक्षमेसँ किओ मरि जाइत छति छथि वा संवंधित मोकदमाक कोर्ट द्वारा निस्तारण भए जाइत अछि तँ ओकालतनामा स्वतः खारिज भए जाएत।

माननीय उच्चतम न्यायालयक रामप्पय्या  बनाम शुभम्मा एवम् अन्य(1947)2 MLJ 580 मामलामे ओकील द्वारा ओकालतनामामे बिना स्पष्ट  प्रावधानकेँ केसमे समझौता करबाक विषयपर आदेश देलक । अस्तु, ई स्पष्ट होइत अछि जे कोनो मोकदमामे  मओअक्कल द्वारा ओकालतनामापर दस्तखत करब बहुत महत्वपूर्ण काज अछि आ तकरा बहुत सावधानीसँ ओकरा पढ़ि कए करबाक चाही ।मुदा सामान्यतः लोक आँखि मूनि कए ओहिपर हस्ताक्षर कए दैत छथि । कै बेर ओकर परिणाम प्रतिकूल भए जाइत अछि खास कए जखन कि संवंधित ओकिल तकर दुरुपयोगपर उतारू भए जाए ।  मोअक्कील केँ तकर अनुमानो नहि भए पबैत छनि आ जखन से होइत छनि ताबे कोर्टमे मामिला बहुत आगू भए गेल रहैत अछि ।