रविवार, 15 अप्रैल 2018

गिरफ्तारी ओ जमानत (Arrest and Bail)

गिरफ्तारी ओ जमानत  (Arrest and Bail)

कोनो-ने-कोनो झंझटिमे नहिओ चाहैत कए बेर लोक फँसि जाइत अछि। केबेर निर्दोष लोकक खिलाफ झूठ-फूसके मामला बना देल जाइत अछि जाहिमे पुलिसके घाल-मेल सेहो भए जाइक से भारी बात नहि। टेलेविजन केँ गाम-गाम पसरि गेलासँ अपराधक नव-नव स्वरूप गामो-घरमे  फैलि रहल अछि। कैटा कानूनो एहन भए गेल अछि जे  बिना गलतिओकेँ कैबेर लोक जहलधरि पहुँचि जाइत छथि एहन परिस्थितिमे लोकके जहल  ओ जमानतसँ संवंधित कानूनक जानकारी बहुत आवश्यक भए गेल अछि जाहिसँ व्यर्थक फसादसँ बचि सकथि आ जरूरी भेलापर समाधान कए अपन जीवन ओ इज्जतिक रक्षा करथि।
कैटा कनून एहन हछि जाहिमे पुलिस मामला दाखिल होइते अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि। उदाहरणस्वरूप भारतीय दणड संहिताक धारा ४९८(ए)क तहत कएलगेल मोकदमामे अभियुक्तक हालत बहुत पातर भए जाइत छल।ओकरा सभसँ पहिने पुलिस गिरफ्तार करैत छल,तखन आर किछु। बहुत रास मामलामे देखल गेल जे कएल गेल सिकाइत झूट छल,कोर्टमे साबूतक आधारपर साबित नहि भेल ,अभियुक्त बरी भए गेल,मुदा ताबति ओकर सभ दशा भए जाइत छल,ओकर इज्जति क मटियामेट भए जाइत छल। ऊच्चतम न्यायलय एहिबातक संज्ञान लैति दिशा-निर्देश जारी कए सुनिश्चित करबाक प्रयास केलक जे निर्दोश लोकके एहन मामलामे वेबजह गिरफ्तारी नहि होइक।
संविधानक धारा २२ क अनुसार पुलिस द्वारा गिरफ्तार कएल गेल व्यक्तिकेँ अधिकार अछि जे ओ गिरफ्तारीक कारण जानए,जौँ गिरफ्तारी वारंटक आधारपर भेल अछि तँ ओकरा वारंट देखाओल जाए,वकील वा निकट संवंधीकेँ संपर्क कए सकए। ओकरा गिरफ्तारीक चौवीस घंटाक भीतर मजिष्ट्रेटक सम्मुख उपस्थित करब जरुरी थिक। ओकरा इहो बताएब जरुरी तिक जे ओ जमानतपर छोड़ल जा सकैत छैक कि नहि।
गिरफ्तार कएलगेल व्यक्तिकेँ हथकड़ी लगाएब:
ऊच्चतम न्यायलयक दिशा निर्देशक अनुसार गिरफ्तार कएलगेल व्यक्तिकेँ हथकड़ी लगाबएसँ बचबाक चाही,कारण एहन व्यक्ति सजाआफ्ता नहि होइत छथि। हथकड़ीक प्रयोग अपवादिक परिस्थितिमे तखने कएल जाए जखन कि अभियुक्त हिंसक हो,पुलिसक गिरफ्तसँ भागि जेबाक संभावना होइक,किंवा आत्महत्यापर ऊतारु हो।
सीआरपीसीक धारा ७४क अधीन पुलिस अभियुक्तकेँ गिरफ्तार करबाक हेतु घरमे घुसिकए ओकरा पकड़ि सकैतअछि,ताहिलेल जरुरी भेलापर घरक खिड़कीकेँ तोड़ि सकैत अछि।
कोनो व्यक्तिकेँ गिरफ्तार केलाकवादे ओकर  स्च कएल जा सकैत अछि,पहिने नहि।जौँ गिरफ्तार कएल गेल व्यक्ति महिला छथि तखन महिले पुलिस ई काज कए सकैत अछि।
महिलाक गिरफ्तारी हेतु उच्चतम न्यायलय द्वारा जारी कएल गेल दिशानिर्देश:
उच्चतम न्यायलय द्वारा जारी कएलगेल मार्गदर्शनक अनुसार सामान्यतः कोनो महिलाकेँ साँझक बाद आ भोर हेबासँ पहिने गिरफ्तार नहि कएल जाएत। जौं ततबे आवश्यक भए जाइक आ रातियेमे महिलाक गिरफ्तारी जरूरी होइक,भोरधरि रुकब कानूनक अनुपालन हेतु दिक्कति भए जेबाक संभावना प्रवल होइक,तखन मजिष्ट्रेटक पूर्व अनुमति लए एवम् महिला पुलिस द्वारा ई काज कएल जाएत। गिरफ्तारीक बाद जौं महिलाकेँ  सर्च करब जरूरी होइक तखन ई काज महिला पुलिस द्वारा कराओल जेबाक चाही।पुलिस हाजतिमे महिलाकेँ अलग राखबाक चाहीजौँ महिलाक हेतु अलग हाजति नहि होइक तखन ओकरा अलग कोठरीमे राखल जेबाक चाही।
विना वारंटकेँ गिरफ्तारीः
आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1 9 73 क धारा 41  क अनुसार पुलिस कोनो व्यक्तिकेँ निम्नलिखित परिस्थितिमे बिना वारंटकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि:
 (१) जखन ओ कोनो संज्ञेय अपराध केने हो,
(२) कोनो पुलिस अधिकारीकेँ कर्तव्य निर्वहनमे व्यवधान ठाढ़ केने होइक,
(३) ओकर घरसँ कोनो चोरीक माल पकड़ल गेल होइक,
(४) कानूनी हिरासतसँ मटिआ रहल हो,
(५) सेना, वायु सेना, जलसेनासँ भागि आएल हो,
(६) जौँ ओकरा अपराधी घोषित कएल गेल हो,
(७) जौँ ओ अभ्यस्त अपराधी अछि,
(८) जौँ ओकरापर संज्ञेय अपराध करबाक शक छैक,
(९) जौँ न्यायलय द्वारा छोड़ल गेल अपराधी न्यायलयक शर्तक अनुपालन नहि करैत अछि,
कैटा आओर एहन कानूनसभ अछि जाहि सिकाइत भेलापर पुलिसकेँ अभियुक्तकेँ गिरफ्तार करबाक अजस्त्र अधिकार भए जाइत अछि।


संज्ञेय अपराध की थिक?
संज्ञेय अपराधमे पुलिस बिना कोर्ट आदेशकेँ अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए सकैत अछि। हत्या,वलात्कार,चोरी,राष्ट्रद्रोह,सन अपराधक मामला एहि श्रेणीमे अबैत अछि।
असंज्ञेय अपराध की थिक?
असंज्ञेय अपराध क मामलामे कोर्टक आदेश भेलाक बादे ककरो गिरफ्तार कएल जा सकैत अछि।
जौँ अभियुक्त पुलिसक गिरफ्तसँ भागवाक प्रयास करैत अछि,तँ ओकरा पुलिस उपयुक्त वल प्रयोग कए पकड़ि सकैत अछि,परंतु वलक अनावश्यक प्रयोगसँ पुलिसकेँ बचबाक चाही। मुदा आवश्यक भेलापर पुलिस जानोलए सकैत अछि,वशर्ते ओकर अपराध मृत्युदंड देबए जोगर होइक।
अग्रिम जमानत:
अग्रिम जमानतदेबाक अधिकार उच्च न्यायलय वा सेशन कोर्टकेँ अछि। अग्रिम जमानत हेतु आवेदन निचला कोर्टमे नहि कएल जा सकैत अछि। अग्रिम जमानत देबाकाल न्यायलय सुनिश्चित करैत अछि जे आवेदक मामलाक विवेचनामे वांछित सहयोग करताह,देश छोड़ि बाहर नहि चलि जेताह,कोनो गवाह वा सबूतकेँ प्रभावित नहि करताह। आवेदककेँ जौँ आशंका होइक जे ओकरा कोनो मामलामे फँसाकए गिरफ्तार कएल जा सकैत अछितँ ओ उचित न्यायालयकेँ अग्रिम जमानत हेतु आवेदन कए सकैत छथि।
अग्रिम जमानत ताबते धरिक हेतु देल जेबाक चाही जाधरि चालान कोर्टमे प्रषित नहि कएल गेल अछि,तकर बाद अभियुक्तकेँ नियमित जमानत हेतु संवंधित न्यायलयमे आवेदन देबाक चाही(सजलुद्दीन अब्दुल समद शेख बनाम राज्य महाराष्ट्र)
न्यायक तकाजा थिक जे अग्रिम जमानत देबासँ पूर्व विरोधी पक्षकेँ न्यायलय नोटिस जारी करए जाहिसँ अभियुक्त गलत जानकारि दए किंवा वांछित जानकारीकेँ दबाकए अग्रिम जमानत नहि लए सकए(बालचंद जैन बनाम मध्य प्रदेश )
जमानती वारंट:
गिरफ्तारीक वारंट कोनो कोर्टक पीठासीन अधिकारी द्वारा लिखित रूपमे जारी कएल जाइत अछि। ओहिमे स्पष्ट रूपसँ ई लिखल हेबाक चाही जे कानूनकक कोन धाराक अनुसार ओकर गिरफ्तारीक वारंट जारी कएल गेल अछि,ओकरा कहिआ आ कखन ओहि कोर्टमे  हाजिर हेबाक छैक। ओहि आदेशमे इहो लिखल रहत जे ओकरा उचित जमानात देला पर एहि शर्त संग गिरफ्तारीसँ छूट देल जाइत अछि जे ओ नियत दिन/नियत समय पर कोर्टमे हाजिर भए जाएत,ताहि हेतु एकटा निश्चित रकमक बौंड सेहो ओकरा  देबए पड़ैत अछि,एकाधिक व्यक्तिकक जमानात सेहो दबए पड़ि सकैत अछि।
गैर जमानती वारंट:
गैर जमानती वारंटमे पुलिस अभियुक्तकेँ गिरफ्तार कए संवंधित कोर्टमे हाजिर करैत अछि,तकर बादे ओकर जमानत पर छोड़वाक आवेदनपर कोर्ट विचार करत।कोनो मामलामे जमानत पर अभियुक्तकेँ रिहा करबासँ पूर्व कोर्टकेँ मामलाक गंभीर छानबीन कएल जाइत अछि,कोर्ट ई सुनिश्चित करए चाहैत अछि जे जमानतपर छोड़ि देलाक बाद ओ न्यायिक प्रकृयाकेँ प्रभावित नहि करए,जरुरत भरि मामलाक अनुसंधानमे सहयोग करए,गवाहसभकेँ तोड़बाक प्रयास नहि करए। संगहि ओकर इतिहास एवम् चरित्रक विषयमे सेहो जानकारी लेबाक प्रयोजन होइत अछि जाहिसँ बाहर गेलाकबाद ओ समाजक हेतु समस्या नहि भए जाए।
सेशन कोर्ट वा उच्च न्यायालयसँ जमानत:
जौँ अभियुक्त एहन अपराध केलक अछि जाहि मे मृत्युदंड वा आजन्म कारावासक प्रावधान थिक, तखन ओकरा जमानत सेशन कोर्ट वा उच्च न्यायालयसँ भेटत,ताहिसँ निचला कोर्टसँ नहि।
न्यायलयकेँ जमानत देबाक समय बहुत सावधानीपूर्वक विचार करबाक प्रयोजन अछि कारण अपराध सिद्ध होयबासँ पूर्वे ककरो जहलमे सड़ादेब मानवीय अधिकारक सरासर उल्लंघन थिक मुदा संगहि समाजके व्यापकहितकेँ ध्यान राखब सेहो जरूरी अछि ,जे ओ व्यक्ति बाहर आबिकए एहन ने कए देथि जे कोनो आन व्यक्तिक सम्मान ओ जीवन पर संकट उत्पन्न भए जाइक।
उपसंहार
संविधानक अनुक्षेद २१ एवम २२ क तहत प्राप्त मौलिक अधिकारक रक्षाक हेतु आवश्यक अछि जे बेबजह ककरो स्वतंत्रता पर आघात नहि होइक,लोक निर्वाध अपन जीवनक रक्षा कए सकए। गिरफ्तारी निश्चय एहि संवैधानिक अधिकारकेँ सद्यः सीमिते नहि करैत अछि अपितु ग्रहण लगा दैत अछि। मुदा ककरो स्वतंत्रता एहि हद धरि नहि भए सकैत अछि जे कोनो निर्दोष आदमीक जिनाइ कठिन कए दैक,किंबा कोनो अपराधी बेटछुट्ट भेल घुमैत रहए। अस्तु, पुलिस एवम् न्यायालयकेँ एकटा संतुलित रुखि राखि प्रत्येक मामलामे नीर- क्षीर विवेक रखैत काज करक चाही जाहिसँ कोनो निर्दोष व्यक्तिकेँ फिरसान नहि होबए पड़ैक आ दोषी खुल्ला नहि घुमैत रहए।निश्चय  ई संतुलन बनाएव एकटा कठिन काज थिक मुदा समस्त कानून ओ न्यायालय एहि प्रयासमे लागल रहैत अछि।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

Life is not a race!


Life is not a race!

Once Chinese philosopher Chuaang-Ju was catching fish near a river bank. A messenger of the king appeared suddenly and told him about the king`s desire to appoint him as the Prime Minister. Chuaang told the messenger:” I have heard that the king has a shield of a divine tortoise in his museum. Suppose the tortoise becomes alive. Would it in that case like to reside in the museum or would prefer to return to the morass where he was originally born? The representative replied: “He would have liked to return to the morass.” Chuaang-Ju replied: “I too would like the same. Men loose peace of mind after getting power. Sometimes they even lose their lives. “Please tell the king that I too would like to return to the morass”. Happiness is never achieved by running after money and power.

Most of the problems we confront in our day to day life are our own creation. How? Because we are mostly busy in comparing ourselves with others. He has a bigger house. His children are much well placed. His company is making lot of profits. I am not progressing like someone else. My position is superior to others. All these comparisons with others create lot of pressure in our mind. Instead of keeping our minds engaged in such negativities, we can show mercy to ourselves by engaging constructively. It does not mean that we should not try to progress and remain satisfied with our achievements but we should avoid comparison with the achievements of others.

Everybody has its own achievements. Problem arises when we start comparing ourselves with others. Someone is in politics for thirty years. Naturally, he would have grown enough in his own line and became MP, MLA or even Minister. Someone else is in the Government job. He would grow in his own cadre and according to his own seniority. Like that. At the end of the day, you cannot and should not say that you could not rise like your neighbour, or relative or friend for that matter. Actually speaking, we can relish life much better by developing an art of oneness and a sense of integration with the aspirations and achievements of others. If we remain confined to our own self and keep envying with others, we can never live a happy and satisfied life.

Life is not a race. We have come here to live our own lives in our own style and according to our nature. Of course, we cannot exercise our right to live independently without any full stop. There has to be limitations so that there are opportunities for others to live happily. Life is also not meant to mint money. Had it been so, God would have made us adult right way so that we start earning immediately after we come to this world. But there is childhood, then at the end the old age. In between we become young, then middle aged and so on. Thus, requirements of body and mind keep changing. Unfortunately, we sometimes fail to synchronize ourselves with this change. This results in avoidable disappointments.

One of the greatest problem being faced by humanity these days, is trust deficit. We are unable to confide in even with our nears and dears. We cannot share our mental burden with our neighbourhood. We do not mix with our co-workers. The result is- increased number of people are committing suicide. The number of persons with depression is growing tremendously.

Most of the people commit suicide due to self-created isolation. The keep themselves confined. The result is that they are often overpowered by the negativities. It is not possible nor desirable to share and discuss once everything with everybody but the issues which are making our lives miserable need to be shared with the people whom we trust. But the problem is you cannot create trustworthy friendship overnight.

I remember one incident when a friend of mine was immensely upset over some office problem. Luckily, I met with him during morning walk in Lodhi Garden. He did not look normal. He was not answering my queries properly. I understood, all was not well with him. I tried to involve him in talk. He opened up gradually and told me that he was intending to commit suicide because of great injustice done to him by the Department in denying him the promotion which was due. I had a lengthy discussion. I tried to dissuade him from worrying too much about things which were not in our control. He seemed better. Next day he met me again and thanked a lot for healthy discussion but for which he could have gone to any extent ,even  committing suicide. The purpose of narrating this incident here is to make the reader aware about the importance of sharing things with nears and dears.

Many people remain worrying throughout. There could not by anything worse than this. I have myself been a great sufferer due to this habit. Actually, worry does not bring any solution rather it maximizes the problems by creating new problems mainly because we often hurt people, may be unwillingly in such state of mind.

Worry keeps you mentally involved. You lose lot of mental energy in meaningless things. That time and energy could have been better utilized in finding new friends, reading new books or gossiping with friends of positive thinking which could have brought out new light in our lives. If we are in trouble, the answer is not to get engrossed in it rather to remain peaceful and concentrate upon the possible solutions.

We all have to struggle throughout the day to earn livelihood. At the end of the day we come back to our home. Many times, there is a jam on the road. We have to wait for hours to reach our destination. By the time we reach our house, we are tired. We definitely need something to unwind ourselves. It can be a hot cup of tea brought by your wife or smiling children or a   smiling aged parent who kept waiting for hours for their children to return.

Sometimes we get irritated even with the slightest inconvenience. We start shouting at others. He also reacts accordingly. Things get out of hand soon. Many people suffer heavily in such situations. The question is: “why such things happen”? Why people are so much irritated even at small happenings in day to life?

The newspapers are flooded with the reports of violence caused without much justification. Someone bringing his scooter in front of a running car, gets violent for nothing. He strikes against the glass and breaks open it. The driver inside the car also speaks something. Both get out of control and start beating each other with the result that both are seriously injured and one of them dies on way to the hospital. Such incidents are daily reported in the newspapers/televisions. But the question is: why such things are happening? Can we stop such violent behaviour?

Over expectations from others is also often cause of tension. Besides mutual relationship too is adversely affected. We are not bothered about the problems of   others and put our interest above everything. This often leads to conflict of interest. We should not do something which we do not want others to do with me. Suppose someone asks me to help him get a job, or to give a loan of hefty amount without even considering whether it is within my means. Then we may often have to face frustration. Because the expectations which are not rational and are without proper consideration often get rejected and ultimately result in disappointments.

Most of the people are running after money. To them material achievements is everything. They want power. They want high position. They want to be well known. But at what cost? Even when you have already gained these things, your cravings are not over. You want something more. This something more has created an endless struggle within. People are fighting with themselves. They are on constant war with their own self. The question is: why??

Negative thinking is our worst enemy. We keep worrying about the future. This does not help in anyway. It spoils our mental and physical health. It adversely affects our capacity to take on the ups and downs of life. Once we are able to come out of it, we can go much beyond our imagination. There are infinite possibilities. We are here to achieve. But that needs a positive mind.

Problems that we confront in our everyday life is our own creation and we alone can solve them. Making others responsible for our own failures is a human weakness. We assign all good achievements to our own credit and fix responsibilities for our failures on others. That never can bring peace and harmony in our lives. We have to develop the art of acceptance. All good and bad things that happen in course of our lives should not be allowed to dominate us. We cannot control others. We cannot decide about many things that happen in our lives but we can certainly control ourselves and decide how to react. If you can do this, we will be opening the door to perfect peace of mind.

Peace of mind is the greatest asset which we can possess costs nothing but it cannot be bought . It can only be practised.”Ashantasya kuto sukham”?Lord Krishna repeatedly stressed upon the need to renounce attachment but not the world so that one can live in peace with himself and with the world outside. This world is nothing but reflection of our own mind.”Yas munde tas brahmande”that means we see outside only things which are already in our mind. If we constantly think ill about a person, we are bound to treat him accordingly. Naturally, he too would react in the same fashion. Thus, a chain reaction starts. We just keep on reacting. This never gives peace of mind. We have to act and to stop reacting to the developments in order that we are able to live a contended and satisfied life!


मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६


उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६

उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६क मूल उद्देश्य जिला,राज्य एवम् राष्ट्रीयस्तर पर अर्धन्यायिक संस्थाक स्थापना करब अछि जाहिसँ उपभोक्ता विबादकेँ शीघ्र ओ त्वरित समाधान भए जाइ। ई संस्था न्यायक नैसर्गिंक सिद्धांतक आधारपर मामलाक औचित्यक ध्यान रखैत उपभोक्ताकेँ उचित क्षतिपूर्तिक आदेश दए सकैत अछि। एकर आदेश नहि मानलापर उचित दंड देल जा सकैत अछि।

उपभोक्ता संरक्षण कानून १९८६ ग्राहककेँ अपन सिकाइतक निपटान करबाक एकटा वैकल्पिक समाधान प्रदान करैत अछि मुदा ताहिसँ कानूनमे प्राप्त अन्य न्यायलयमे मोकदमा करबाक अधिकार समाप्त नहि भए जाइत अछि। जौँ अन्य न्यायालयमे ई सिकाइत सूनल जा चूकल अछि तैयो एहि कानूननक अनुसार उचित फोरममे सिकाइत कएल जा सकैत अछि।(धनबीर सिंघ बनाम हुडको,२०१२(५)एसएलटी ३५)

एहि कानून क धारा ९क अनुसार राज्य सरकार उपभोक्ता विबादक निपटान हेतु जिला एवम् प्रान्तीय स्तर पर जिला फोरम आओर राज्य आयोगक गठन करत,संगहि केन्द्र सरकार राष्ट्रीय आयोग क गठन करत। जिला फोरम मे जिला जज रहल ,कार्यरत जिला जज,किंवा जिला जजक योग्यता रखनिहार व्यक्ति अध्यक्ष भय सकैत छथि।ओहिमे दूटा आओर सदस्य हेताह,जाहिमे एकटा महिलाक होएब जरूरी। राज्य आयोगक अध्यक्ष उच्च न्यायालयक कार्यरत वा सेवा निवृत न्यायाधीश होइत छथि। एकर अतिरिक्त दू वा अधिक सदस्य सेहो होइत छथि, जाहिमे एकटा महिलाक होएब जरूरी । राष्ट्रीय आयोगक अध्यक्ष उच्चतम न्यायालयक कार्यरत वा सेवा निवृत न्यायाधीश होइत छथि। एकर अतिरिक्त चारि वा अधिक सदस्य सेहो होएत छथि। सदस्य बनबाक हेतु बएस 35 सँ कम नहि हेबाक चाही,योग्यता स्नातक, एवम् अर्थ शास्त्र, कानून, वाणिज्य, लेखांकन, उद्योग, जनसेवा, वा प्रशासनमे दस बर्खक अनुभव होएब जरूरी थिक।

जिला फोरममे एहन सिकाइत कएल जाएत जाहिमे संदर्भित वस्तुक मूल्य वा आपेक्षित क्षतिपूर्तिक मूल्य  २० लाख टाकासँ बेसी नहि होएत। जौं कीनल गेल बस्तुक मूल्य किंवा क्षतिपूर्ति २० लाखसँ बेसी एवम् एक करोड़ सँ कम अछि तँ सिकाइत संवंधित राज्यक आयोगक ओतए करए पड़त। ताहूसँ बेसी दामक बस्तुक हेतु किंवा क्षतिपूर्ति हेतु राष्ट्रीय आयोगक ओहि ठाम सिकाइत करब जरूरी थिक।

एहि तरहक कोनो सिकाइत संवंधित घटनाक दू सालक अधीन करब जरुरी थिक,परंतु संवंधित फोरम/ आयोग लिखित कारण दए वाजिब मामलामे एहि समय सीमामे छूट दए सकैत अछि।

उपभोक्ता कानूनक तहत संवंधित उपभोक्ता ,वा उपभोक्ताक हितक रक्षाक हेतु काज केनिहार मान्यताप्राप्त संगठन वा एकाधिक उपभोक्ता( जतए बहुत रास ऊपभोक्ताक एकरंगाहे सिकाइत होइक),वा राज्य किंवा केन्द्र सरकार स्वतः किम्वा प्रभावित ऊपभोक्ताकक हितरक्षाक हेतु सिकाइत कए सकैत छथि।

जिला फोरम/ राज्य आयोग/ राष्ट्रीय आयोगक ओतए सिकाइत करबाक हेतु  निर्धारित शुल्क:

जिला फोरम
वस्तु/सेवा/क्षतिपूर्तिक कुल दाम
लागत  शुल्क
एक लाख धरि
(जे गरीबी रेखासँ नीचा छथि)
किछु नहि
एक लाख धरि(जे गरीबी रेखासँ उपर छथि)

एक सए टाका
एक लाखसँ उपर ओ पाँच लाख धरि
दू सए टाका
पाँच लाखसँ उपर ओ दस लाख धरि
चारि सए टाका
दस लाखसँ उपर ओ बीस लाख धरि
पाँच सए टाका

राज्य आयोग
बीस लाखसँ उपर ओ पचास लाख धरि


दू हजार  टाका
पचास  लाखसँ उपर ओ एक करोड़ धरि
चारि हजार  टाका

राष्ट्रीय आयोग
एक करोड़ सँ उपर


पाँच हजार टाका



जिला फोरम द्वारा सिकाइतक निपटान:

सिकाइत प्राप्त केलाक २१ दिनक भीतर सिकाइतक प्रतिकेँ जिला फोरम प्रतिवादीकेँ पठाओत। प्रतिवादी अधिकसँ अधिक ४५ दिनक भीतर ओकर जबाब देताह अन्यथा जिला फोरम एकतरफा उपलव्ध सबूत ओ कागजातक आधारपर मामलाकेँ तय कए सकैत अछि। वादी वा प्रतिवादीकेँ वकील राखबाक जरुरत नहि होइत अछि।ओ स्वयं किंवा कोनो प्रतिनिधि द्वारा अपन बात फोरममे राखि सकैत छथि। जिला फोरमकेँ कार्यवाहीकेँ ई कहि चुनौती नहि देल जा सकैत अछि जे मामलामे नैसर्गिक न्यायक सिद्धांतक पालन नहि भेल अछि।

जौँ उचित जाँच पड़ताल एवम् प्रस्तुत सबूतक आधारपर जिला फोरम वादीक सिकाइतसँ सहमत भए जाइत अछि तँ ओ प्रतिवादीकेँ ओहि बस्तुकेँ ठीक करबाक आदेश दए सकैत अछि, नव बस्तु देबाक हेतु कहि सकैत अछि,वा ओकर मूल्य आपस करबाक हेतु, किंवा प्रतिवादीक लापरवाहीसँ सिकाइतकर्ताकेँ भेल कष्ट वा क्षतिक क्षतिपूर्ति करबाक हेतु निर्णय दए सकैत अछि। जिला फोरम सिकाइतकर्ताकेँ प्रतिवादी द्वारा देल गेल सेवाकेँ दोषपूर्ण साबित भेलाक स्थितिमे उचित क्षतिपूर्ति देबाक आदेश दए सकैत अछि। संगहि वाजिब मामलामे दंडात्मक क्षतिपूर्तिक आदेश सेहो कए सकैत अछि।

प्रतिवादीक लापरवाहीक कारण सिकाइतकर्ताकेँ भेल क्षति  वा अवघातक हेतु जिला फोरम क्षतिपूर्तिक आदेश दए सकैत अछि।(एस.के.लकोटिआ बनाम नेशनल इनस्योरेंस कंपनी लिमिटेड)

क्षतिपूर्तिक हेतु सिकाइतकर्ताकेँ साबित करब जरूरी अछि जे प्रतिवादी द्वारा देल गेल सेवामे त्रुटिक संग- संग ओकर लापरवाही सेहो छल,जौँ से नहि छल तखन क्षतिपूर्तिक मांग खारिज भए जाएत (निदेशक,एच.आइ.इ.टी बनाम अनिल कुमार गुप्ता,१९९४(१)सीपीआर १८२ )।

उपभोक्ता फोरम अन्तरिम आदेश नहि दए सकैत अछि।

अपील

जौँ कोनो पक्ष जिला फोरमक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर राज्य आयोगमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि। मुदा जँ जिला फोरम आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पचीस हजार जे कम होइक, जमा करए पड़त। मामलाक निपटान हेतु राज्य आयोग मोटामोटी जिला फोरमक पद्धति एवम् प्रकृयाक अनुसरण करैत अछि।

जौँ कोनो पक्ष राज्य आयोगक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर राष्ट्रीय आयोगमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि। मुदा जँ राज्य आयोग आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पैंतीसहजार जे कम होइक, जमा करए पड़त।

जौँ कोनो पक्ष राष्ट्रीय आयोगक आदेशसँ संतुष्ट नहि अछि तँ ओ तीस दिनक भीतर उच्चतम न्यायलयमे निर्धारित प्रपत्रमे अपील कए सकैत छथि।मुदा जँ राष्ट्रीय आयोग आर्थिक क्षतिपूर्ति किंवा दंडक आदेश देने अछि तँ ओहि आदेशकेँ चुनौती देबासँ पूर्व ओहि रकमक आधा वा पचास हजार जे कम होइक, जमा करए पड़त।

राज्य आयोग ,राष्ट्रीय आयोग नब्बे दिनक भीतर ओकरा समक्ष कएल गेल अपीलक निपटान कए देत,मामलाक सुनबाइक दौरान सामान्यतः स्थगन नहि देल  जाएत। जौं नब्बे दिनमे फैसला नहि भए पबैत अछि तँ तकर कारण लिखित रूपमे देल जाएत।

जिला फोरम / राज्य आयोग/राष्ट्रीय आयोग द्वारा देल गेल निर्णयकेँ जौँ तय समय सीमाक भीतर अपील नहि कएल जाइत अछि तँ ओ निर्णय अन्तिम भए जाएत।

सिकाइतकर्ताक आवेदनपर किंवा स्वयं राज्य आयोग कोनो जिला फरममे चलि रहल मामलाकेँ दोसर जिला फोरममे पठा सकैत अछि।

ग्राहकक कर्तव्य :

ग्राहकक कर्तव्य अछि जे ओ कीनएबला बस्तुक बारेमे उचित जानकारी प्राप्त करए,ओकर गुणवत्ता बारेमे स्वयं जाँच पड़ताल करए एवम् दोकानदारक बातपर आँखि मूनिकए विश्वास नहि करए अपितु वस्तु विशेषपर बनल चेन्ह जेना आइएसओ आदिकेँ नीकसँ ठेकानि लेथि।

देश भरिमे करीब पाँचसएस्वयंसेवी संगठन उपभोक्ता संरक्षणक हेतु काज कए रहल छथि। ग्राहककेँ उचित सलाह देबाक हेतु एवम् ओकर वाजिब हितक रक्षाक हेतु एहन संगठनसभ सकृय योगदान करैत छथि। ग्राहक जरूरी भेलापर हिनका लोकनिक मदति लए सकैत छथि।







शनिवार, 31 मार्च 2018

घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005




घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005







घरेलू हिंसा  की थिक ?



आम तौर पर घरेलू हिंसा मात्र घरमे मारि-पीट बूझल जाइत अछि।  सही मानेमे बालिका क अरमान केँ दबा देब ,घरक अंदर परिवारक सदस्‍य द्वारा रोज-रोज मानसिक प्रताड़ना  देब, तामसमे ओकर परसल भोजन फेँकि देब , ओकरा संगे गार-मारि करब, ओकर इच्छाक विरुद्ध ओकर पढ़ाइ रोकि देब , सेहो घरेलू हिंसाक रूप अछि। एकर अलावा यौन उत्‍पीड़न सेहो भारी हिंसा अछि, जाहि हेतु आम तौर पर दूरक रिश्‍तेदार वा पड़ोसक लोग जिम्‍मेदार होइत अछि। एहनमे जखन बालिका विरोध करैत अछि, तँ बदनामीक हवाला दए ओकर मुँह बंद कए देल जाइत अछि। एहि तरहक प्रतारणा नैहर,सासुर सभठाम होइत अछि। 

घरेलू हिंसा  पारिवारिक संवंधक परिपेक्ष्यमे एहन व्यवहार ओ संवंधसँ जुड़ल अछि जे अपन जीवन संगीपर अधिकार जताबए एवम् मनमाना नियंत्रण करबाक हेतु कएल जाइत अछि। प्रताड़ना मनोवैज्ञानिक,शारीरिक,भावात्मक,आर्थिक,किछु भए सकैत अछि। घरेलू हिंसा विवाहित किंवा आपसी सहमतिसँ प्रेम संवंधसँ जुड़ल जोड़ी, ककरो संगे भए सकैत अछि ।


घरेलू हिंसाक कारण की थिक ?

घरेलू हिंसाक प्रारंभ तखने होइत अछि जखन बालिका अपने माए-बापसँ खिलौना मांगैत अछि। हमर समाज ओकरा नेन्नेसँ  कमजोर बनबैत अछि। जखन बेटा छोट रहैत अछि, तँ हम ओकरा हाथमे बैट-बाल वा स्‍पोर्टस क सामान दैत छी, जाहिसँ ओ शारीरिक आओर मानसिक रूपसँ मजगूत बनैत अछि। मुदा बालिकाक खेलक हेतु गुड्डा-गुडि़या वा चूल्‍हा बर्तन बला खेलौना देल जाइत अछि जाहिसँ ओ शारीरिक आओर मानसिक रूपसँ कमजोर होइत चलि जाइत अछि। एकर संगे भावनामे भसिआएल चल झाइत अछि। अब बालिका  जेना- जेना पैघ होइत अछि घरक पाबंदी आओर समाजक यातना ओकरापर हावी होइत चलि जाइत अछि। दाम्पत्य जीवनमे घरेलू हिंसाक कारण हीन भावना,ईर्ष्या,क्रोधपर नियंत्रणक अभाव, जीवनसंगीसँ शिक्षा किंवा सामाजिक परिवेशमे न्योन होएब किछु भए सकैत अछि।

घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 किएक लागू करए पड़ल ?

घरेलू हिंसाक अनगिनत घटना हमर देशमे होइत अछि, मुदा महज सौ-पचास दर्ज होइत अछि, ओहो चरम पर पहुँचलाक  बाद। कतेकोठाम बालिकासभ साँझक बाद घरक अपेक्षा सड़कपर अंजान लोकसंग रहब ज्यादा सुरक्षित अछि कारण घरमे अपन लोक द्वारा बेसी दुर्घटना, हत्या आओर हिंसा करबाक संभावना रहैत अछि, । बालिका जखन रस्ता पर बहराइत अछि, तँ ओकरा पता नहि होइछ कि शहरक  चकाचौंधमे ओकरा संगे कखन कोनठाम छेड़खानी भए जाएत । बात अगर गामक करी तँ बालिका सुन्न रस्ता पर जएबासँ डराइत अछि मुदा ओहि डरक की करी, जकर जड़ि घरक अंदर होइत अछि आओर बालिकाक संगे पैघ होइत अछि। ओहि डरक की करी जे ओकरा जनमिते ओकर माथामेमे बैसि जाइत अछि आओर आधा जिनगी धरि रहैत अछि।

घरेलू हिंसा क बात करैत काल ऑनर किलिंगक घटनासभकेँ फराक नहि कए सकैत छी। ऑनर किलिंगक बीज असलमे घरेलू हिंसा अछि। किएक तँ कोनो माए-बाप, भाए, काका कखनो सेहो अपनी बेटी वा बहिनके, सोझे मारि नहि देत, ओहिसँ पूर्व नाना प्रकारक यातना ओकरा देल जाइत अछि ।

एकटा सांख्यिकीय गणनाक अनुसार :

(i)नित्य चारिटा महिला, एकटा पुरुष, आओर पाँचटा बच्चा घरेलू हिंसाक कारण अकाल मृत्युक शिकार भए जाइत छथि।

(ii)अपन जीवन कालमे प्रत्येक चारिटामेसँ एकटा महिला घेरलू हिंसाक शिकार भए जाइत छथि।

(iii)२०-२४ बर्खक महिलाक उपर घरेलू हिंसाक सभसँ बेसी खतरा रहैत अछि।

(iv)२००५ ई०मे कएल गेल एकटा सर्वेक अनुसार ओहि सालमे ३८९१०० महिला आओर ७८१८० पुरुष अपन जीवनसंगी द्वारा कएल गेल घरेलू हिंसाक शिकार भेलथि।

 तदनुसार, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 स्त्री क सुरक्षा, ओ स्त्रीक अधिकारक अधिक प्रभावी ढंगसँ लागू करबाक हेतु आनल गेल ।


एहि अधिनियमकेँ पारित करएसँ पहिने कानूनी स्थिति की छल?

(i)             घरेलू हिंसा कानूनमे कोनो स्पष्ट मान्यता नहि छल,
(ii)           (आईपीसी की 498 ए) क तहत घरेलू हिंसाक संपूर्ण अवधारणा विवाहित स्त्रीपर कएल गेल क्रूरताक धरि सीमित छल,
(iii)         दुखसंतप्त बहिन, माए, बेटी वा अविवाहित स्त्री एहिमे सामिल नहि छल,

(iv)          प्रताड़ित भेलापर विवाहित स्त्रीकेँ सीमित विकल्प छल: तलाक लए लिअए वा  धारा 498 ए क अनुसार मोकदमा करए,

घरेलू हिंसा दू प्रकारक होइत अछिःआपराधिक आओर गैर-आपराधिक:

आपराधिक घरेलू हिंसा:

 बिना सहमतिकेँ शारीरिक संपर्क जेना यौन उत्पीड़न,लात मारब, अनावश्यक पछोड़कए भयभीत करब, कंप्यूटर हैकिंग, आपराधिक अलगाव

गैर-आपराधिक घरेलू हिंसा:

मित्र वा आन सामाजिक सरोकारीसँ संपर्क बाधित करब,टेलीफोनक संपर्क नहि होमए देब,

घरेलू हिंसा कानूनक तहत कोनो पीड़ित महिलाजे अपराधिक संगे रहैत छथि,एहि कानूनक अनुसार मोकदमा कए सकैत छथि।

घरेलू हिंसाक सबसँ खराब प्रभाव ओहि परिवारक छोट बच्चासभ पर होइत छैक।

 एकटा सर्वेक अनुसार:

प्रति घंटा ११५टा बच्चा घरेलू हिंसाक शिकार भए जाइत अछि।

कलहपूर्ण परिवारक ९०% बच्चा अपन माएकेँ बापक हाथे पिटैत देखैत अछि।

११सँ २० बर्खक बएसक हत्यारोपी  बच्चा ६० % मामलामे माएके पिटनाहर बापक हत्या कए दैत अछि।

कलहपूर्ण वातावरणमे रहएबला बच्चा १५०० गूना अधिक उपेक्षित वा प्रताड़ित रहैत हछि।

बच्चा वातावरणक उपज होइत छथि,एहने बच्चा बादमे जाकए घरेलू हिंसा करैत छथि वा ओकर शिकार भए जाइत छथि।

घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा२(क्यु):

घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा२(क्यु)क तहत मात्र पुरुष अपराधीक खिलाफ कार्रबाइक प्रावधानके असंबैधानिक घोषित करैत सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और रोहिंटन एफ नरीमन  पीठ निर्णय देलक जे एहि कानूनक तहत महिला अपराधीकक खिलाफ सेहो मोकदमा चलि सकैत अछि।माननीय न्यायाधिश लोकनिक कहब छनि:

“स्त्रीगणक खिलाफ कतेकोबेर स्त्रिए साजिसक तहत काजकए घरेलू हिंसामे सामिल होइत छथि, तेँ एहि कानूनक उपरोक्त धारा कानूनक मूल उद्दयेश्यसँ भुतिआ गेल लगैत अछि, तेँ ओकरा कानूनसँ हटा देल जाइत अछि।“

घरेलू हिंसा कानूनक तहत केना मदति लेल जा सकैत अछि?

(१) कोनो प्रकारक हिंसासँ वचाव हेतु आदेश प्राप्त करब,

(२) निवास करबाक अधिकारक हेतु आदेश प्राप्त करब,

(३) मौद्रिक राहत

(४) कस्टडी ऑर्डर

(५) क्षतिपूर्तिक हेतु आदेश

(६)अंतरिम आओर एकपक्षीय आदेश

सुरेश बनाम जयबीर(२००९):

सुरेश बनाम जयबीर(२००९)क मामलामे न्यायलय ई आदेश देलक जे घरेलू हिंसा कानूनक धारा 12 क  उपखंड (1) क  तहत आवेदनक निपटारा करैत अंतरिम आदेशमे न्यायिक दंडाधिकारी गुजाराक हेतु अन्तरिम राहत दए सकैत अछि।

प्रथम श्रणी न्यायिक दंडाधिकारी वा महानगर दंडाधिकारीक ओतए सिकाइत कएल जा सकैत अछि:

(१) जतए दोषी व्यक्ति रहैत हो,

(२) जतए अपराध कएल गेल होइक,

(३) जतय प्रताड़ित व्यक्ति रहैत हो,

न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष सिकाइतक निपटान:

पीड़त व्यक्ति संरक्षण अधिकारी,पुलिस किंवा सेवा प्रदाता(कल्याण अधिकारी)क मदति लए सकैत छथि। हिनका लोकनिक कर्तव्य अछि जे पीड़त व्यक्तिक जरुरी मार्गदर्शन करथि एवम् न्यायलय द्वारा देल गेल मौद्रिक क्षतिपूर्तिक आदेशक पालन सुनिश्चित कराबथि। संरक्षण अधिकारीक दायित्व अछि जे वो प्रताड़ित व्यक्तिक सिकाइतक घरेलू हिंसा प्रतिवेदन(DIR) तैयार कए न्यायालयकेँ उपलव्ध कराबए। संगहिँ प्रताड़ित व्यक्तिकेँ सेवा प्रदाताक वारेमे उचित मार्गदर्शन दैक जाहिसँ ओ ओहि कानूनी सुविधाक लाभ उठा सकए। सेवा प्रदाता कोनो कंपनी, महिलाक कल्याण हेतु कार्यरत गैर सरकारी संगठन, भए सकैत अछि । सेवा प्रदाताक ई कर्तव्य थिक जे प्रताड़ित व्यक्तिकेँ कानूनमे निहित ओकर अधिकारक बारेमे जानकारी देथि एवम् कानूनी उपचार लेबाकक हेतु उचित व्वस्था करएमे ओकरा मदति करथि। पुलिसक कर्तव्य थिक जे ओ प्रताड़ित व्यक्तिकेँ संरक्षण अधिकारी एवम् सेवा प्रदाताक बारेमे जानकारी देथि।संगहिँ भारतीय दंड संहिताक अनुक्षेद ४९८(अ) मे प्राप्त अधिकारक जानकारी सेहो देथि।

न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष पीड़िता द्वारा सिकाइत प्राप्त भेलाक तीनदिनक भीतर मामलामे सुनबाइक तारिख तय होएत। न्यायालयसँ समन भेटलाक दूदिनक भीतर संरक्षण अधिकारी तकर जानकारी प्रतिवादीकेँ देत। प्रतिवादीकेँ देल गेल समनक संग घरेलू हिंसा कानूनक धारा 12 क  उपखंड(३)क तहत सिकाइतक प्रतिलिपि सेहो देल जाएत। प्रतिवादी द्वारासे प्राप्त भेलाक बादे एकतरफा सुनबाइ भए सकैत अछि आ स्थाइ अन्तरिम आदेश कएल जा सकैत अछि। जरुरी बुझलापर न्यायलय एकतरफा सुनबाइ कए अन्तरिम आदेश दए सकैत छथि। न्यायिक दंडाधिकारी ६० दिनक भीतर एहन सिकाइतक निपटान करताह। हुनकर आदेशक खिलाफ संबंधित पक्ष ३० दिनक भीतर सेशन कोर्टमे अपील दाएर कए सकैत छथि।

प्रतिवादी द्वारा संरक्षण आदेश किंवा अंतरिम संरक्षण आदेशक पालन नहि करब संज्ञेय एवम् गैर जमनती अपराधक श्रणीमे अबैत अछि। हुनका ताहि कारणसँ एक साल धरि जेल किंवा बीस हजार रुपया जुर्माना भए सकैत अछि। जौं संरक्षण अधिकारी दंडाधिकारी द्वारा देल गेल आदेशक पालन करबामे बिना कोनो वाजिब कारणके आनाकानी करैत छथि तँ हुनको एहि तरहक दंड देल जा सकैत अछि,  मुदा ताहि हेतु विभागीय अधिकारीकेँ पूर्व अनुमति आवश्यक थिक। पीड़ित व्यक्तिकेँ संयुक्त परिवारक साझी निवासमे रहबाक हेतु न्यायलय निवास करबाक आदेश दए सकैत अछि भले ओहि घरमे  प्रतिवादीक हिस्सा होइक वा नहि होइक।

एस आर बतरा एवम् अन्य बनाम श्रीमती तरुना बतराक मामलामे उच्चतम न्यायालय ई फैसला देलक जे घरेलू हिंसा अधिनियमक धारा १७(१)क अनुसार प्रताड़ित महिला मात्र साझी आवासमे रहबाक हकदार  भए सकैत अछि। साझी आवासक माने पति द्वारा कीनल किंवा किरायापर लेलगेल घर अछि वा एहन साझी घर अछि जाहिमे पतिक हिस्सा होइक। कहक माने जे जाहि घरमे ओकर पतिकेँ कानूनी अधिकार नहि छैक ताहिमे प्रताड़ित व्यक्तिकेँ रहबाक अधिकार न्यायलय एहि कानूनक तहत नहि दए सकैत अछि।

घरेलू हिंसा रोकबाक समाधान :

घरेलू हिंसा रोकबाक एकटा समाधान ई भए सकैत अछि जे पति न्यायिक दंडाधिकारीक समक्ष सपथ-पत्र देथि जे ओ आगा अपन पत्नीक संग सम्मानपूर्ण व्यवहार करताह,एहन  किछु नहि करताह जाहिसँ ओकरा कोनो प्रकारक यंत्रणासँ फेर गुजरए पड़ैक,तकर संपूष्टिमे अपन संपत्तिकेँ गारंटी देथि जाहिसँ घरेलू हिंसाक पुनरावृति भेलापर ओकरा जब्त कए लेल जाएत।

उपसंहार

आपसी संबंध प्रेम,आदर,ईमान्दारी, एवम भावुक लगावसँ सराबोर हेबाक चाही। आपसी अविश्वाससँ हिंसा ओ  दुराचर बढै़त अछि,एहन दंपति निरंतर आशंकाग्रस्त रहैत छथि जाहिसँ जीवन नर्क भए जाइत अछि। जीवनक ई कटुसत्य अछि जे अहाँ दोसरकेँ नहि बदलि सकैत छी,हम अपनेटाकेँ बदलि सकैत छी। कमसँ कम एतबातँ कइए सकैत छी जे जाहि संबंधमे लज्जति नहि रहि गेल अछि,जतए अविश्वासक पराकाष्ठा पहुँचि गेल अछि, ओतए फसाद बढे़नाइ छोड़ि  कानून सम्मत तरीका अख्तिआर करी।

महिला संगठन सिर्फ जागरूकता पैदा कए सकैत अछि, पुलिस सिर्फ उत्‍पीड़न करएबलाकेँ जेल पठा सकैत अछि, कोर्ट सिर्फ न्‍याय दए सकैत अछि ,एहिमे सँ कोनो अहाँक घरक हालत ठिक नहि कए सकैत अछि,घरमे पैसि नित्य-प्रतिक समस्याक समाधान नहि कए सकैत अछि । अस्तु सिर्फ सोच बदलक जरूरत अछि ।



“हम अपन भाग्यक मालिक छी, हम अपन आत्माक नायक छी”


विलिअम हेलीक कविता “Invictus (अपराजेय)" सँ प्रेरणा लैत जीवनक दुखमय परिस्थितिसँ हारि नहि मानि नव ओ सुंदर जीवन जिबाक हेतु सचेष्ट रहैत पिड़ित व्यक्तिकेँ ई विश्वास बनौने रहक चाही जे सुंदर समय आवहिँबला अछि,अएबे करत।

§ Invictus



§ Out of the night that covers me,
Black as the pit from pole to pole,
I thank whatever Gods may be
For my unconquerable soul.

§ In the fell clutch of circumstance
I have not winced nor cried aloud.
Under the bludgeonings of chance
My head is bloody, but unbowed.

§ Beyond this place of wrath and tears
Looms but the Horror of the shade,
And yet the menace of the years
Finds and shall find me unafraid.

§ It matters not how strait the gate,
How charged with punishments the scroll,
I am the master of my fate:
I am the captain of my soul.



§ William Henley
























of the abuser.



abuse.