मैथिलीमे हमर प्रकाशित पोथी

मैथिलीमे हमर प्रकाशित पोथी

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

भोजक परम्‍परा   



भोजक परम्‍परा

अथर्वेदक अनुसार वेद-मंत्रोच्‍चारणक संग जे भोजन बनैत अछि, तेकरा यज्ञशेष अमृतम् कहल जाइत अछि। तइ अमृत स्‍वरुप भोजनकेँ वेदक ज्ञाता व्राह्मण खाथि तँ व्राह्मण-भोजन मानल जाएत। यदि वेदक ज्ञाता व्राह्मण नहि भेटैथ तँ कुमारि कन्‍याकेँ खुआएल जाए, अन्‍यथा व्रह्मदान कएल जाए। यज्ञक प्रत्‍येक आहुतिक संग रूपैआ-पैसा दान कएल जाए आ ओइ पैसासँ युग निर्माण हेतु सत्‍ साहित्‍य कीनि कऽ समाजमे सुयोग्‍य लोकक बीच वितरित कएल जाए।
ऐ विषयमे गुरु नानक केर एकटा कथा बहुत प्रचलित अछि। ओ ई जे अपन यात्राक क्रममे गुरु नानक एकबेर पाकिस्‍तानक सैदपुर गाममे रहनिहार भाइ लालोक ओहिठाम तीन दिन रहला। भाइ लालो हुनकर बहुत सेवा केलक। ओही समयमे ओइ क्षेत्रक मालिक, भागो नामक मुसलमान जमीन्‍दार भोज केलक। ओइमे सभ साधु-सन्‍तकेँ आमंत्रित कएल गेल। मुदा गुरु नानक ओतए नहि गेला। जखन भाइ भागोकेँ ई बात पता लागल, तँ ओ बहुत तमसाएल। तमसाइते गुरु नानक लग आबि पुछलकैन-
अहाँ हमर भोज किए नहि खेलौं? की ऐ दरिद्रक भोज हमरा ओइठामसँ बढ़ियाँ अछि?”
गुरु नानक बजला तँ किछु नहि मुदा दुनू गोटाक ओइठाम बनल रोटीकेँ हाथमे लेला आ दुनू गोटाक समक्षे, भाय लालोक ओइठाम बनल रोटीकेँ दबौलाह तँ ओइसँ दूध निकलए लागल, जखन कि मालिक भागोक ओइठाम बनल स्‍वादिष्‍ट पकवानसँ खून टपकए लागल..! ..तात्‍पर्य, मिहनत ओ इमान्‍दारीक कमाइसँ अर्जित धनसँ बनौल भोजने सही मानेमे खाद्य भऽ सकैत अछि। अर्थात्‍ जेना-तेना धनोपार्जन कए मात्र अहंकारक प्रदर्शन एवं अहंतुष्‍टिक हेतु कएल गेल भोजमे कोनो धर्मिकता नहि भऽ सकैत अछि अपितु पितरक मुक्तिक तँ प्रश्‍ने नहि उठैत अछि...। समस्‍त यज्ञक तात्‍पर्य समाजमे शुभ कर्मक प्रचार थिक। जँ कर्मे ठीक नहि अछि, अन्‍याय द्वारा धनोपार्जित कए धर्मक उपार्जनक प्रयास व्‍यर्थ थिक।
जन्‍मसँ लऽ कऽ मृत्‍युपर्यन्‍त अनेकानेक अवसरपर व्राह्मण भोजन करेबाक प्रचलन अछि। उपनायन, एकादशी यज्ञ, पितृपक्ष, एवं श्राद्ध सन यज्ञ कार्य सेहो व्राह्मण-भोजनक बिना अधूरा मानल जाइत अछि। पितृपक्षक दौरान व्राह्मण भोजन पूर्वजक आत्‍माक शान्‍ति एवं संतुष्‍टिक हेतु कएल जाइत अछि। जइ पूर्वजक मृत्‍यु जइ तिथि-के भेल रहै छैन, तिनका निमित्ते ओइ तिथि-के व्राह्मण-भोजन करौल जाइत अछि। असलमे पितृपक्षक आयोजन पूर्वज लोकनिक प्रति श्रद्धा ज्ञापित करबाक हेतु कएल जाइत अछि। कहल जाइत अछि जे पूर्वज सभ ऐ समयमे अपन सन्‍तानक ओइठाम अबै छैथ एवं हुनका स्‍मरणमे कएल गेल व्राह्म्‍ण-भोजन, दान-पुण्‍य आदि करैत देख बहुत प्रसन्न होइ छैथ, खुशी होइ छैथ एवं अपन सन्‍तानकेँ असिरवाद दइ छथिन।
कहल जाइत अछि जे कर्ण जखन मृत्‍योपरान्‍त स्‍वर्ग गेला तँ ओइठाम हुनका नाना प्रकारक वस्‍तु सभ भेटल। चूँकि ओ महादानी छला, अस्‍तु हुनका द्वारा दान कएल गेल वस्‍तु सभकेँ ओतए जाइते कएक गुणा बेसी कए हुनका आपस कऽ देलकैन। मुदा अन्न, पानि किछु ने भेटलैन, जइसँ ओ बहुत परेशानीमे रहैथ। पछाइत ओ धर्मराजसँ चौदह दिनक हेतु पृथ्‍वीपर पठाबक आग्रह केलखिन। से बात धर्मराज मानि लेलखिन। कर्ण १४ दिनक लेल मृत्‍युलोक आबि कऽ पर्याप्‍त मात्रामे अन्न दान केलैन, जल दान केलैन आ १४ दिनक बाद जखन ओ आपस स्‍वर्ग गेला तँ हुनका पर्याप्‍त मात्रामे अन्न आ जल प्राप्‍त भेलैन। तहिए-सँ आसिन कृष्‍ण-पक्षमे पितृपक्षक आयोजन होइत आबि रहल अछि।
श्राद्धक मूल उद्देश्‍य पूर्वजक प्रति श्रद्धाक अभिव्‍यक्‍ति थिक। एकरा तरह-तरहसँ लोक व्‍यक्‍त करैत अछि मुदा कोनो-ने-कोनो तरीकासँ सौंसे दुनियाँमे लोक अपन पूर्वजक प्रति सम्‍मानक अभिव्‍यक्‍ति हेतु प्रार्थना किंवा आन-आन तरहक आयोजन करै छैथ। कहल जाइत अछि जे पितृ-ऋृणसँ उद्धारक लेल श्राद्ध, तर्पण, व्राह्मण-भोजन आदि बहुत सहायक होइत अछि। यदि सन्‍तान नीक काज करै छैथ, वंशक कीर्तिकेँ बढ़बै छैथ तँ पितर हुनकासँ प्रसन्न होइ छथिन एवं हुनकर शुभ कार्यक सफलतामे सभ प्रकारसँ सहयोग सेहो करै छथिन।
मनुख मरि कऽ, केतए जाइत अछि, फेर जन्‍म लैत अछि की नहि, जन्‍म लैत अछि तँ केतए, केना आ कोन-कोन रूपमे..? ऐ सभ विषयपर हजारो सालसँ चर्चा होइत रहल अछि मुदा अखनो धरि कोनो तेहेन सटीक जवाब नहि ताकल जा सकल जे सभ गोटेपर माने सभ बेकतीपर लागू भऽ सकए किंवा सभकेँ संतुष्‍ट कऽ सकए। एतावत ई तँइ अछि जे मुइला बाद मनुखक वर्तमान शरीर नष्‍ट भऽ जाइत अछि। ओकर चेतना समाप्‍त भऽ जाइ छै आ शरीरकेँ व्‍यर्थ भऽ जेबाक कारण ओकरा अपन-अपन रीति-रिवाजक अनुसार जरा देल जाइत अछि, किंवा गाड़ि देल जाइत अछि। किछु गोटेक धारणा छैन जे मृत्‍युपरान्‍त शरीर नष्‍ट भऽ जाइत अछि, मुदा आत्‍मा अजर-अमर थिक, आत्‍मा नष्‍ट नहि होइत अछि। आत्‍माक पुनर्जन्‍म होइ छै, ओकरा नवीन शरीर भेट जाइत छइ। शरीर भेटिते ओकर आकार-प्रकार मनुखक पूर्व कर्मपर निर्भर करैत अछि।
गीतामे कहल अछि जे जइ भावकेँ धियानमे राखि लोक मरैत अछि, तद्दनुसार ओकरा ऐगला जन्‍म भेटै छइ। गरुण पुराणक अनुसार मृत्‍युक १३ दिनक पछाइत यमलोकक यात्रा प्रारम्‍भ होइत अछि, जइ यात्रामे १७ दिन लगै छइ। तेकर बाद ११ मासक धरि ओ यमलोकमे कनैत रहला बाद यमराजक दरबारमे पहुँचैत अछि। ओइ क्रममे ओकरा भोजनक एकमात्र साधन सन्‍तान द्वारा देल गेल पिण्‍डदान होइत अछि। अस्‍तु, मृत्‍युक उपरान्‍त साल भरिक श्राद्धकर्म बहुत महत्‍वपूर्ण होइत अछि।
मुदा प्रश्‍न अछि जे जीवनक आ जीवनक पछाइत ई प्रक्रिया की आनो धर्मक लोक सभपर लागू होइत अछि? पारसी, मुसलमान वा क्रिश्चनक धार्मिक विश्‍वास अलग-अलग अछि। की ओकरा सभपर जीवन-मृत्‍युक विधान अलग-अलग हएत? की ओकर सबहक मृतात्‍माकेँ शान्‍ति नहि हेतइ? की ओकरो यमलोक जाए पड़तै किंवा मृत्‍युक बादो धर्मानुसार अलग-अलग बेवस्‍था हएत? मनुखसँ हटि कऽ श्रृष्‍टिमे विद्यमान अनेकानेक जीव-जन्‍तु सेहो अछि, ओहो जीवन-मृत्‍युसँ जुड़ल अछि, ओकरो मृत्‍यु होइ छै। मृत्‍युक बाद ओकरा की हेतइ?
अस्‍तु ई सोचैमे अबैत अछि जे जीवनक अन्‍त केतौ-ने-केतौ होइते अछि। समस्‍त जीवक शरीर नष्‍ट भऽ जाइत अछि। तेकर बाद की होइ अछि? खाएर जे होइत अछि से होइत अछि मुदा हम सभ ऐपर विचारे किए करै छी? एही लेल ने जे मृत्‍युसँ हमर भावुक लगाव रहैत अछि। मुदा नित्‍य प्रति जे हजारोक संख्‍यामे लोक मरैत अछि, तेकरा प्रति हम कोनो संवेदनशीलता कहाँ राखि रहल छी? लोक मरि जाइत अछि तद्दुपरान्‍त ओकर स्‍मृति शेष रहि जाइत अछि। ओकरा प्रति लोकक माने अपन लोकक अनुराग बनल रहि जाइ छै, ओकरा द्वारा कएल गल उपकारक प्रति कृतज्ञताक भाव मोनमे उमरैत रहै छइ, आ ओइ भावक अभिव्‍यक्‍तिक माध्‍यम श्राद्ध भऽ सकैत अछि। मुदा ओकरा कर्मकाण्‍डसँ जोड़ब, नाना प्रकारक विध-विधानसँ जोड़ब किंवा ओइ निमित्ते गाम-गामक भोज करब ई समाजिक परम्‍पराक अंग भऽ सकैत अछि, जएह कालक्रमे एकटा नियम बनि गेल अछि।
स्‍वेच्‍छासँ जे बेकती श्रद्धा पूर्वक एकर निर्वाह करै छैथ, तिनका लेल तँ ओकर औचित्‍य भऽ सकैत अछि, मुदा कोनो परम्‍परा विशेषकेँ अनिवार्यताक हदतक आनि देब, वैज्ञानिक सोचक अनुकूल नहि कहल जा सकैत अछि। जीवन, मृत्‍युक समस्‍त सिद्धान्‍त सभ जाति आ सभ धर्मक लोकपर समान रूपसँ लागू होइत अछि।
आया है सो जाएगा, राजा रंग फकीर
एक सिंहासन चढ़ चले, एक वधें जंजीर।
राजा हो, रंक हो, कोनो जातिक हो, कोनो धर्मावलंवी हो, सभ बच्‍चासँ युवक, प्रोढावस्‍ता, वृद्धावस्‍थाक उपरान्‍त क्रमश: मृत्‍युकेँ ग्रहण करबे करै छैथ।
तात्‍पर्य हमर ई अछि जे जीवनक समस्‍त क्रिया जखन एक्के रंग अछि, तँ जीवनक बादोक क्रियामे वैज्ञानिकता, समानता हेबे करतै। हमरा लगैत अछि जे ऐ सभ प्रश्‍नक वस्‍तुनिष्‍ठ उत्तर कठिन अछि, कारण ई लोकक भावनासँ जुड़ल अछि। निश्चय लोक अपन धार्मिक विश्वासक अनुरूप चलैत अपन लोकक मृत्‍युक बादक स्‍थितिक हेतु प्रयत्न कऽ सकैत अछि, मुदा ऐमे वैज्ञानिक सोचक समावेशसँ कोनो अहितक सम्‍भावना नहि अछि।
मनुख अपन-अपन कर्मानुसार जीवन किंवा ओकर बादो सुख-सुविधा प्राप्‍त करैत अछि। नीक काज केनिहार लोक चाहे ओ कोनो धर्मक होथि, मृत्‍युक बादो बेहतर स्‍वरुपमे रहत तेकर अनुमान कएल जा सकैत अछि। धार्मिक अनुष्‍ठान किंवा कर्मकाण्‍डक एतबा महत्‍व तँ निश्चित अछि जे ओ मृतक परिवारक लोककेँ श्रर्द्धांजलिक अभिव्‍यक्‍तिक अवसर प्रदान करैत अछि।
ऐ सभ विषयमे लोकक मान्‍यता सामान्‍यत: लीकसँ हटि कऽ चलैसँ मनाही करैत अछि। एक केलक, दोसर केलक, गाममे सभ केलक, आ करिते चल गेल। परन्‍तु शास्‍त्रमे जे बात सभ नहि अछि, सेहो लोक श्रद्धापूर्वक अपनौने रहैत अछि। आ कालक्रमे ओ एकटा समाजिक कानूनक रूप धऽ लैत अछि। श्राद्धक भोजमे सेहो सएह भऽ रहल अछि। जेतेक गामक भोज हेतैक तेतेक बेसी मृतककेँ पैठ हेतैन, हुनका स्‍वर्गमे बेसी सुख हेतैन। एहेन केतेको लोक छैथ जे दवाबमे किंवा भावनाक आवेशमे गामक-गाम भोज करैत गेला, खेत-पथार बेचि-बेचि कऽ भोज केलाह आ तेकर बाद वर्षक वर्ष कर्जा सधबैत रहला इत्‍यादि...। निश्चित रूपसँ ऐ सभ विषयपर विचार करबाक प्रयोजन बुझाइत अछि, मुदा विलाड़िक गारामे घण्‍टी बान्‍हत के?
हमरा एकबेर एकटा सरदारजी भेटला। ओ कोनो सरकारी विभागमे उच्‍च अधिकारी छला। भेँट होइते जखन गप-सप्‍प भेल तँ ओ कहला जे हुनका सभमे विवाहक अलगसँ शुभ दिन नहि ताकल जाइत अछि। रबि दिनक दिनेमे गुरुद्वारामे विवाह भऽ जाइत अछि। जँ ओ दिन ग्रहक हिसाबे होइत तँ कोनो सरदार जीवित नहि रहितैथ। मुदा देखते हेबै जे सरदारजी सभ केहेन हृष्‍ट-पुष्‍ट होइ छैथ। कहक माने जे नीक काज करैत रहू, सभ ग्रह अहाँक अनुकूले रहत। अपना सभमे कनिक्कोटा किछु होइए कि लोक भदवा, दीर्घशूल ,नीक दिनक विचार करए लगैत अछि। सरदारजी कहला जँ दिनक हिसाबे होइतै तँ कियो सरदार जीबैत नहि, कारण ओकरा सभमे दिन तका कऽ काज करबाक चलैन नइ अछि।
अपना ऐठाम श्राद्धक अलावा उपनायन एक-भुक्‍त एकादशी यज्ञ आदि-आदि अनेको अवसरपर सेहो भोज करबाक परम्‍परा अछि। अपनायनमे दू वा तीन दिन भोज होइत अछि। असलमे यज्ञोपवितक मूल उद्देश्‍य तँ पाछू रहि जाइत अछि। आर-आर तरहक आडंवरपूर्ण तरीकासँ एकरा मना कऽ लोक संतुष्‍ट भऽ जाइत अछि। उपनायनक मूल उद्देश्‍य बच्‍चामे नीक संस्‍कार देव थिक। मुदा आब तँ ओ एकटा उत्‍सवक रूप लऽ लेने अछि। ऐ अवसरपर लोक भोज-भात, गाना-बजौना करैए। जेकरा जेतेक आडंवर पार लगलै से केलक आ भऽ गेल उपनायन। केकरो कियो कहबो की करत? ओना, जे तरहेँ लोक जहाँ-तहाँ पसैर गेल अछि, माने गाम-घरसँ जे दूर रहैत अछि। हुनका सभकेँ ऐ सभ तरहक अवसर भेटने अपन लोक-वेदसँ आपसमे भेँट-घाँट होइ छैन। सबहक मनमे रहिते अछि गाम जाइ किंवा अपन लोक-वेदसँ भेंटे-घाँट करी। जँ तइ हिसाबे ऐ सबहक समाजिक महत तँ अछिए। मुदा आब तँ बिआह-दान, उपनायन आदि आनो-आन काज सभ लोक शहरेमे सम्‍पन्न कऽ लइ छैथ, कारण ओइठाम बेवस्‍था करब असान रहैत अछि। गाम-घरसँ क्रमश: सम्‍पर्क कम भेल जा रहल अछि। गाम जा कऽ काज करब तँ खर्चा ओ झंझट दुनू बेसी भऽ जाइत अछि, तँए लोक सभ ऐसँ बँचबाक प्रयास करैत रहै छैथ।
प्रचुर मात्रामे भोज आनन्‍दक अभिव्‍यक्‍तिक प्रमुख साधन अछि। तौर-तरीका चाहे जे हो, मुदा भरिपोख भोजन करब ओ कराएब सभ दिनसँ सुखद रहल अछि। आखिर हमरा लोकनि जे एतेक परिश्रम करै छी, नौकरी करि धनोपार्जन करै छी, किंवा तरह-तरहक व्‍यवसाय करै छी, से किए? अही लेल ने जे नीकसँ जीबी, प्रतिष्‍ठा अर्जित करी आ जे अभिलाषा अछि तेकर पूर्ति करी। भोजन करब जीवन रक्षाक हेतु अनिवार्य अछि। जेकरा बहुत छै ओतरह-तरहक भोजन कऽ सकैत अछि आ जे गरीब, कम साधनबला लोक अछि, ओकरो भोजन अनिवार्य। जेकरा किछु नइ छै सेहो कहुना-ने-कहुना, किछु-ने-किछु खेबे करत। नहि खाएत तँ मरि जाएत। सही मानेमे भोजन जीवनक पर्याय थिक। यएह कारण थिक जे जँ किछु मौका भेटै छै तँ लोक सभ भोजन विन्‍यासमे लागि जाइत अछि। 
बच्‍चामे भोज खेबाक जबरदस्‍त जिज्ञासा रहैत छल। एक दिन पहिनहिसँ गाममे गर्द पड़ि जाइत छल जे फल्‍लाँ बाबूक ओइठाम सभजाना भोज छइ। भोर भेने घरे-घर नौत देल जाइक। बच्‍चा सभक उत्‍सुकता बढ़ल जाइक। दिन बितैत-बितैत बिझो होइत आ लोक सभ भोज खा विदा भऽ जाइत। ओइ समयमे पूरी-जिलेबीक भोज चर्चाक विषय भऽ जाइत छल। कियो-कियो खाजा वा मुंगबा सेहो जोड़ि दैथ।से तँ थैहर-थैहर भऽ जाइत छल।
हम सभ जखन हाइ स्‍कूलमे रही तँ गामे पुरी-जिलेबीक भोज रहइ। मास्‍टर साहैबकेँ कहि कऽ सबेरे स्‍कूलसँ छुट्टी लऽ लेने रही। अपना गामक चारि-पाँचटा विद्यार्थी सभ उत्‍साह पूर्वक स्‍कूलसँ गाम विदा भेल रही- भोज खेबाक हेतु। भोजमे विझो भेल। हम सभ सही समयपर गाम आबि गेल रही। उत्‍साह पूर्वक अपन संगी सबहक संगे भोजमे बैसलौं। आँजुर भरि-भरि जिलेबी परसल जाइत देख जे आनन्‍द होइत छल से की कहूँ...। जिलेबी खाइत-खाइत जखन लोक थाकि जाइक तँ खाजा, मुंगबा उठौल जाइक। भूख बाँचल रहैत नहि, तथापि अपना भरि लोक परियास करए। कियो-कियो भोज खाइमे माहिर होइ छला, से अन्‍तिम लेल भूख बँचा कऽ राखैथ, जइसँ कोनो नीक अवसर हाथसँ नहि निकैल जाए। सभसँ अन्‍तमे दही, चीनी, नोन, आदि-आदि। खाइत-खाइत लोक नकसका जाइ छल। जेतेक लोक खाइत छल, ओइसँ बेसी पातपर छुता जाइत छल। ऐकात-सँ-ओइकात धरि पात सभपर केतेको मधुर, दही, तरकारी, पुरी सभ ऐंठमे पड़ल रहि जाइत छल। लगैत जेना कोनो भयानक युद्ध कऽ दुखद अन्‍त भेल हो। जे होइक, से होइक मुदा अपव्‍यय तँ होइते छल। जाधैर समान छुटा नहि जाइ ताधैर जेना खेनिहारकेँ सन्‍तोषे ने होनि। आब तँ बिना रसगुल्‍लाक गाममे कोनो भोज होइते ने अछि। गाममे लोकक अभाव भऽ गेल अछि। सभ गाम छोड़ि शहर धऽ लेलक तँए भोजक पाँतिमे एकछाहा बुढ़ वा बच्‍चा भेटत। मुदा भोज चलिए रहल अछि। जबार भोज करब आब आम बात भऽ गेल अछि।
गाम सभमे अखनौं नाना प्रकारसँ भोजक आयोजनमे निरन्‍तर खर्चा होइत रहैत अदि। यद्यपि ऐ तरहक आयोजनक तात्‍कालिक प्रभाव भऽ सकैत अछि। लोकमे चर्चा भऽ सकैत अछि, मुदा एकर कोनो दीर्घकालीन प्रभाव नहि होइत अछि। ऐतरहेँ व्‍यय होइत धनशक्तिक उपयोग जँ गामक कल्‍याणमे कएल जाए तँ गामक नक्‍शा बदैल सकैत अछि। गाममे सार्वजनिक महत्‍वक अनेकानेक काज जेना बेहतर चिकित्‍सा बेवस्‍था, वृद्ध लोकनिक सेवा केन्‍द्र, बच्‍चा सबहक हेतु उत्तम शिक्षा बेवस्‍था कएल जा सकैत अछि। हम ई कदापि नहि कहि रहल छी जे मान्‍य परम्‍परामे एकदमसँ ब्रेक लगा दियौ, से सम्‍भवो नहि अछि, मुदा क्रमश: ओकर रूपान्‍तरण कएल जाए। भोजोकेँ अपना जगहपर अपन महत छै, मुदा गामक-गाम नौतल जाए, ऐ चक्करमे जे हम केकरोसँ कम.., से बात आब बहुत प्राशंगिक नहि रहि गेल।
फेर जखन गाममे सभजाना भोज होइ छै तँ स्‍त्रीगणकेँ किएक ने निमंत्रित कएल जाए? ओना, केतौ-केतौ हुनको सभक हेतु खाएक पठेबाक चलन अछि ओ ओ पर्याप्‍त नहि अछि। केतेक बेर तँ खाएक पहुँचैत-पहुँचैत १२-१ राति भऽ जाइत अछि। सोचल जा सकैत अछि जे ओइ खाएकक बाट तकैत रहत? ओहो फेकाइते अछि। कहक माने जे जखन भोज करिते छी तँ अपन गामक आधा जनसंख्‍याकेँ किएक छोड़ि दइ छिऐ? आब युग बदैल रहल अछि, बदलियो गेल अछि। महिला सशक्तिकरणक युगमे हमरा लोकनि केतेक दिन पछुआइत रहब। जखन गाममे सभजाना होइते अछि, तँ स्‍त्रीगण सभकेँ सेहो आमंत्रित कएल जाए। हुनका सभकेँ अलग पाँतिमे बैसा सकै छी वा पहिने स्‍त्रीगणे सभ खा लैथ तेकर बाद दोसर खेपमे शेष लोक खा सकैत अछि, मुदा स्‍त्रीगणकेँ गामक सभजाना भोजमे कात कऽ देब अनुचित थिक आ ऐ विषयपर  विचार अपेक्षित अछि। अपन गामक लोक छुटि जाइत अछि आ आन-आन गामक लोककेँ जबारक चक्करमे नौतल जाइत अछि। अपन समाजमे अनेकानेक विकार सभ अछि जइमे भोज-भातक वर्तमान परम्‍परापर अबिलंब धियान देब जरूरी अछि। 
देशमे करोड़ो लोककेँ अखनो दुनू साँझ भोजन नहि भेटैत छइ। बच्‍चा सभ पौष्‍टिक अहारसँ बंचित रहि कुपोषणक शिकार अछि! विद्यालय जेबाक तँ  बाते छोड़ू जे सरकारक निरन्‍तर प्रयत्नक अछैत आवासक सुविधा नहि छइ। शहरी गरीबक हालत तँ आरो दयनीय अछि। सवाल अछि जे एक तरफ सम्‍पन्न वर्ग जश्न मना रहल अछि, कोनो मौकाटा हेबाक चाही, तरह-तरहसँ पंच सितारा होटलमे पाटी करैत रहैत अछि, साधारणो परिवेशक लोक समाजिक परम्‍पराक निर्वाहक हेतु भोज-भात करैत रहैत अछि, दोसर दिस ओइ आसपासक गरीब-गुरबा जीवनक समस्‍त सुख सुविधासँ वंचित महा कष्‍टमे जीब रहल अछि। अपन छोट-छोट सन्‍तानक रक्षामे असमर्थ अछि। पढ़ाइ-लिखाइ आ चिकित्‍सा सभ किछु नदारद छइ। आखिर ऐपर हमर सबहक धियान किएक ने जाइत अछि? अपने समाजक वंचित बेकतीक उचित सहायता कऽ ओकर जीवन यात्राकेँ सुगम ओ आनन्‍दमय बनाबक सहयोगी भऽ जे आन्‍तरिक संतुष्‍टि भेट सकैत अछि, से प्राय: अन्‍यथा सम्‍भव नहि। यद्यपि भोज करबाक परम्‍परा अति प्राचीन अछि एवं नाना प्रकारसँ लोकक धर्मिक भावनासँ जुड़ल अछि, मुदा वर्तमान समाजिक, आर्थिक परिवेशमे एकर पुनरावलोकन जरूरी अछि। धार्मिक एवं समाजिक पक्षक संग एकर आर्थिक प्रभाव सेहो विचारणीय अछि। यद्यपि गामो-घरमे लोकक आर्थिक स्‍थिति सुधरल अछि, फूसक घरक स्‍थान पक्का मकान सभ लेने जा रहल अछि, तथापि अखनो बहुत रास लोक जीवनक तमाम सुख सुविधासँ वंचित छैथ। सम्‍पन्नो घरक विधवा, बुढ़ किंवा स्‍त्रीगण सभ-तरहेँ सम्‍पन्न, सुखी नहि रहि पबैत छैथ। केतेको कुशाग्र, प्रतिभाशाली बच्‍चा अखनो उचित सुविधाक मोहताज रहि जाइत अछि आ हुनकर भविस वर्तमानक संघर्षमे नष्‍ट भऽ जाइत अछि।
हम सभ जँ जनकल्‍याणक भावनासँ प्रेरित भऽ अपनो समाज, अपनो गामक ओहन उपेक्षित लोकक कल्‍याणमे अपनाकेँ जोड़ि सकी तँ निश्चय समाजक स्‍वरुप बदैल जाएत। धार्मिक अनुष्‍ठानकेँ धियान रखैत समाजक वर्तमान परिस्‍थितिक अनुरूप मान्‍य परम्‍परामे रचनात्‍क सुधार भऽ सकैत अछि आ हेबाको चाही। समाजिक समरसता एवं पारस्‍परिक सहयोगक भावनाक निरन्‍तर विकास होइत रहए एवं जनशक्ति, धनशक्ति एवं राजशक्तिक उपयोग जनकल्‍याण हेतु भऽ सकए ऐसँ नीक धर्मिकता की भऽ सकैत अछि?
अष्‍टादश पुराणेषु व्‍यासस्‍य वचनद्वयं
परोपकाराय पुण्‍याय पापाय परपीड़नम्।
बड़का-बड़का सन्‍त महात्‍मा लंगर करै छैथ जइमे गरीब-गुरबा, सन्‍त-फकीर सभ भोजन कए अपन प्राण रक्षा करै छैथ। जीवन रक्षार्थ कएल गेल एहेन प्रयास स्‍तुत्‍य अछि, परन्‍तु वाह्य आडंवर किंवा अहंकारक प्रदर्शनक उद्देश्‍यसँ कएल गेल जबार भोज सभमे जनकल्‍याणक भावना गौण भऽ जाइत अछि। अस्‍तु समाजमे धन एवं जनशक्‍तिक उपयोग जन कल्‍याण हेतु भऽ सकए, तद्दनुकूल प्रयास हेबाक चाही।

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