मैथिलीमे हमर प्रकाशित पोथी

मैथिलीमे हमर प्रकाशित पोथी

शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

ई समय ककरो नहि







 




ई समय ककरो नहि



हम श्यामा भगवतीक दर्शनक हेतु गेल रही। महाराजा रामेश्वरक चितापर बनल ओहि भव्य मन्दिरक अद्भुत सौन्दर्य अछि। टूह- टूह सिंदुरिआ रंगमे रंगल मंदिरक दहिना कात पोखरि अछि जकर जमकल पानिमे हाथ देलासँ स्वच्छता बढ़क बदला घटि सकैत अछि। मोन पड़ि गेल जे जखन सी.एम. कालेज दरभंगामे विद्यार्थी रही तऽ ऐहि ठाम आबी, भगवतीक दर्शनक बाद पोखरिक घाटपर बैसल करी। ओहि समय पोखरिक हाल बेहतर छल।

श्यामा मंदिरमे माँकालीक भव्य मूर्ति ओहिना चमकैत, दमकैत छल। भक्तगणक श्रद्धा ओहिना वा कि पहिनहुँसँ बेसी बुझाइत छल। मंदिरमे कै ठाम भक्तसभ पूजा पाठमे तल्लीन छलाह।



मिथिलेश रमेशस्य चितायं सुप्रतिष्ठित। श्यामा रमेश्वरीपातु रमेश्वर कुलोद्रवान्।

मंदिरक मुख्य द्वारपर लिखल उपरोक्त श्लोक कतेक बेर पढ़ैत रहलहुँ।  

श्यामा मंदिरक बाहर आ अंदरमे प्रसादक विक्रय होइत अछि । अन्दरेमे प्रसाद किनलहुँ। भगबतीकेँ प्रसाद चढ़ौलाक बाद कनीकाल ओतहि बैसि गेलहुँ। कनी कालक बाद बाहर भेलापर चिंता भेल जे प्रसादकेँ बानरसँ कोना बचाबी कारण एक बेर एहिना प्रसाद चढ़ाकऽ निकलल रही कि एकटा बूढ़बा बानर कहाँसँ दौरल आएल आ प्रसाद लूटि लेलक। हम अबाक देखैत रहि गेल रही। अस्तु, प्रसादकेँ अंगाक अंदर कहुना कऽ नुकौलहुँ।
बाहर आगू बढ़लापर चारूकात कोनो-ने-कोनो महराजक चितापर बनल मंदिर सभकेँ देखैत मोनमे दरभंगा महराजक अकूत संपत्ति आ ओकर अपव्ययपर ध्यान हठात चलि जाएब कोनो भारी बात नहि। जँ एहि धनक उपयोग एतेक रास मंदिरक बजाए जनताक कल्याणमे खर्च कएल जाइत तऽ लोक समृद्ध होइत, आ महाराजो यशस्वी होइतथि। मुदा जे हेबाक छल से भेल। महराजक राज चलि गेल। बड़का-बड़का देबार सभ ढहि गेल। राजक हाताक अन्दरक जमीन सभ बिका गेल। आब ओहिठाम होटल अछि, दोकान अछि, सामान्य व्यक्ति सभक घर अछि। ने वो रामा ने वो खटोला। महाराजाक गौरब-गरिमाक बखान करए हेतु ढहैत, ढनमनाइत राज परिसरक दुर्दशा अन्तहीन भए गेल अछि।

श्यामा मंदिरक आस-पास बनल आओर मंदिर सभ कतेको बेर गेल छी। तें रिक्सा पकड़ि सोझे शुभंकरपुर बिदा भए गेल रही। मोनमे होइत छल जे जँ महराज वा हुनकर सलाहकारक जन कल्याणमे कनिको रूचि रहैत तऽ आइ मिथिलाक लोकक भविष्ये किछु आओर होइत।

काली मंदिरसँ आगा बढ़लापर मिथिला विश्वविद्यालयक विशालकाय परिसर आएल। दरभंगा महराजक ओहि महल सभकेँ सरकार अधिग्रहण कए ओहिमे विश्वविद्याल स्थापित कए देलक। महराजक राज-पाट नाम सभ चलि गेल। एतबो नहि भेल जे वोहि विश्वविद्यालयक नाममे महराजक नाम रहैत। मुदा भावी प्रवल। समय बलबान होइत अछि।



जो उग्या सो अन्तवे

फूल्या सो कुमलाही

जो चिनिया सो ढही पड़े,

जो आया सो जाही।



कबीरदासक उपरोक्त कथन ध्यानमे आबि रहल छल। संसारक नियम अछि जकर उदय भेल तकर अस्त होएत। समय रहिते जे किछु कए गेल वएह रहि जाइत अछि।

विश्वविद्यालयक दहिनाकात बदरंग भेल इन्द्रपूजा स्थली आ तकर सामने बड़ीटा खाली मैदान- बिना कोनो देखरेखकें। आश्चर्यक बात थिक जे एहि ऐतिहासिक, सांसकृतिक धरोहरक रखरखावक उचित व्यवस्था किएक नहि भए रहल अछि?

कनीक आओर बढ़ू तऽ बड़का-बड़का देबार जे महाराजा सभ बना गेलाह ओहिमे यत्र तत्र गाछ सभ जनमि रहल अछि। देबारक बीचमे बनल हनुमानजीक मूर्तिकेँ लोक सभ पूजा करैत देखाइत। आश्चर्यक बात ई थिक जे बिना कोनो देखरेखकेँ एतेक पुरान देबार सभ अखनो ठाढ़  अछि?

श्यामा मंदिरसँ शुभंकरपुर लौटबाक क्रममे महराजी पूलसँ पहिने जाम लागि गेल छल। रिक्सा आगू नहि बढ़ि सकैत छल। संगहि साइकल, स्कूटर, ठेला, पैदलयात्री,कार आ पैदलयात्री तेना ने लदमलद भए गेलाह जे कनी काल लेल भेलैक जे आब एतहिसँ आपस होमए पड़त। पैरे जेबाक सेहो जगह नहि बाँचल छल। चूपचाप रिक्सा पर बैसल रहि जेबाक अतिरिक्त किछु विकल्प नहि छल।

जाबत ओहि जामकेँ हटि जेबाक प्रतीक्षा करैत रही ताबतेमे किछु गोटे राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है बजैत एकटा मृतककेँ कान्हपर उठौने ओतहि आबि कऽ अटकि गेलाह। हुनका पाछा- पाछा २०-२५ लोक चलि रहल छलाह जे मृतकक अन्तिम संस्कारक हेतु ओकरा पाछा -पाछा वएह सभ बजैत चलि रहल छलाह।

कहुना कऽ कनीक जाम खुजलै। उसास पबिते अन्तिम यात्रापर निकलल वोहि मृतक आ तकरा कान्ह देनिहार सभकेँ लोक सभ आगा जाए देलक। महराजी पूल पार करैत वो सभ आगा बढ़ि गेलाह। हम ताधरि रिक्सेपर थामहि प्रतीक्षा करैत रही जे आब लोक आगा बढ़त तऽ ताब। 

 कनीके कालक बाद फेर वएह ध्वनि। राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है...।

किछु गोटे मृतककेँ कान्ह देने छलाह। आगा आगा गोरहाक सुनगैत आगि, कोहा लेने कर्त्ता आ तकर पाछा पाछा मृतकक महायात्राक गवाह सभ राम नामक महिमा गबैत आगा बढ़ि नहि सकबाक कारणें ओहिठाम ठमकि गेल रहथि। हम रिक्सापर रही आ ठीक हमरा सामानान्तरमे पीताम्बरीसँ आवृत, गेनाक फूलसँ लादल वोहि मृतकक निष्प्राण शरीर छल। ओहि दिवंगत आत्माकेँ मोने-मोन प्रणाम कएल। किछु-किछु सोचाए लागल। मोन कनी एमहर ओमहर भेल। ताबे जाम कनी ढील भेलैक। ओ सभ राम नाम सत्य है, सबका यही गत्त है, बजैत आगा बढ़ि गेल। आ हम रिक्सासँ महराजी पुलपर चढ़ि गेलहुँ।

कनीके आगा पुलपर रिक्सा चढ़ले छल कि फेर वएह ध्वनि। राम नाम सत्त है, सबका यही गत्त है। किछु गोटे एकटा मृतकक शवयात्राक संगे राम नामक महिमा गबैत आगा बढ़ि रहल छलाह। मृतकक फूलक मालासँ लादल चारि गोटेक कान्हापर आगा बढ़ि गेल। अगल-बगल कतेको लोक मूकदर्शक छलाह जेना कोनो खास बात नहि भेल हो। तरकारी वाली तरकारी बेचि रहल छल। माछक दोकानपर ओहिना माछक खण्ड बिका रहल छल। कोन पर चाहक दोकानपर लोक चाह पीबि रहल छलाह। कतहु कोनो प्रकारक आलाप, प्रलाप नहि। रिक्साबला गप्पक क्रममे कहलक जे एहिठाम तऽ नित्य एहने दृष्य रहैत अछि। आगा बनल श्मशान घाटमे ओकर दाह संस्कार होइत अछि।

संभवत: मृत व्यक्ति सभ वृद्ध छलाह जाहिसँ वातावरणमे, संगे कटिहारी गेनिहार लोकोमे कोनो भाव विह्लता देखबामे नहि आएल।  

ओहि दिन साँझमे ओही सड़क बाटे फेर जेबाक अवसर भेटल। हम सभ बरिआती जा रहल छलहुँ। महराजीपुलसँ पहिने जाम लागि गेल छल। लोक ठसाठस भरल छल। हमरा आगा पाछा दोसर बिआहक बरिआती  छल। लोककेँ आगू पाछू घसकबाक रस्ता नहि भेटि रहल छल। सजल धजल बरक कार ठामहि छल कि आगूसँ अबैत कोनो दोसर गाड़ी पों-पोंक आबाज करए लागल। के आगा बढ़त, के पाछा जाएत, कोनो ठेकान नहि। आधा घण्टा धरि ई स्थिति बनल रहल। फेर केना-ने-केना रस्ता खूजल। लोकसभ आगा बढ़ल। हम अपन कारमे आगा बढ़लहुँ। शेष बरिआती, बर पाछा छुटि गेल छल, तथापि ओहिठाम ठाढ़ भाए प्रतीक्षा करब उचित नहि छल। एक्के दिनमे एकहिठामसँ तरह तरहक दृष्य गुजरि गेल छल। राम नाम सत्य हैसँ लए शहनाइक धूनपर नचैत गबैत जाममे थकमकाएल बरियातीक धमाचौकरी देखएमे आबि रहल छल। मुदा ओही स्थानक चारूकात बैसल, ठाढ़ लोक सभ हेतु धनि सन। ने हर्षो न च विष्मय :

असलमे कोनो घटना विशेष अपने आपमे ताधरि कोनो माने नहि रखैत अछि जाधरि हम ओहिसँ कोनो ने कोनो कारणसँ जुड़ि जाइत छी। तात्पर्य ई जे कोन वस्तु हमरा कष्ट देत आ ककरासँ सुख होएत ओ पूर्णत: ओहि वस्तु विशेष वा घटना विशेषक प्रति हमर रूखिपर नर्भर करैत अछि। अस्तु, एकहि दिनमे श्यामा मंदिरसँ शुभंकरपुरक मध्य कतेको तरहक दृष्य देखबामे आएल। कतेको पुरान घटना सभ स्मृति पटलपर फेरसँ उगि आएल। ई समय ककरो नहि अछि। दरभंगा महराजक नहि अछि, आम आदमीक नहि अछि। मोन हो कठिआरी जाउ,  मोन हो बरियाती भऽ जाउ। मुदा समय ठाढ़ नहि रहत। भोर साँझमे बदलि जाएत। छोड़ि जाएत मोनक कोनो कनतोसमे एकटा आओर निसान जे दिन भरिक घटनाक क्रम हमर अहाँक देने गेल। काल्हि फेर प्रात:काल ओहिना सूर्य उगताह, दिन भरि किछु ने किछु होइत रहत, साँझ हैत। सभटा हैत, मुदा हमर अहाँक जिनगीक एकटा आओर दिन कम भऽ जाएत। समयकेँ की हेतै? ओ तऽ एहिना आगू चलैत जाएत। गुजरि जाएब हम ओहिना जेना कतेको गुजरि गेलाह आ लोक राम नाम सत्य है... कहैत महराजीपूलक एहि पारसँ ओहि पार भए जाएत।



२/११/२०१७


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