रविवार, 4 जनवरी 2026

छाप सरायकेला साहित्योत्सवमे हमर उपन्यास हम आबि रहल छी,पर विशेष चर्चा

छाप सरायकेला सहित्योत्सव २०२४ 


छाप सरायकेला साहित्यिक महोत्सव 2024

एक दिन दुपहरिआमे भोजनक बाद विश्राम करैत रही कि अचानक मोबाइलक घंटी टनटना उठल।फोनमे अविचलजीक नाम उचरि रहल छल।भेल जे ओ जरूर कोनो शुभ समाचार देताह।बातो सएह रहैक। गप्प शुरू होइतहि ओ कहलथि-

“जमशेदपुरमे साहित्य कला परिषदक पहिल साहित्यिक आयोजन”छापक नामसँ अक्टूबरमे हेतैक।ओहिमे अपनेक  कोनो उपन्यासपर चर्चा करबाक योजना अछि। से कोन किताबपर कएल जा सकैत अछि?”

“हम आबि रहल छी।”-हम कहलिअनि।

“मुदा अपनेकेँ आबए पड़त।”

“आबि जेबैक।”

“ठीक छै।अहाँकेँ मिश्राजी फोन कए कार्यक्रमक विवरण देताह।अहाँ हुनका किताबक पाँच प्रति पठा देबनि,संगे अपन कार्यक्रमक बारेमे सेहो कहि देबनि।”

अविचलजीक प्रस्ताव सुनि मोनमे स्वाभाविक बहुत रास उत्सुकता जागल।मिश्रजी के छथि?साहित्य कला फाउन्डेशन,जमशेदपुर केहन संस्था अछि?एकर स्थापना के केलनि?आर-आर कतेको तरहक जानकारीक इच्छा भेल।हम इन्टरनेटपर उपलब्ध जानकारी देखिए रहल छलहुँ कि साहित्य कला फाउन्डेशनक ट्रस्टी आदरणीय डाक्टर ब्रजेश मिश्रजीक फोन आएल।ओ जमशेदपुरमे साहित्य कला फाउन्डेशन,जमशेदपुर आ जिला प्रशासनक संयुक्त तत्वावधानमे छाप शिर्षकसँ अक्टूबरमे आयोजित होमएबला साहित्यिक कार्यक्रमक जानकारी विस्तारसँ देलनि।ईहो कहलनि जे अपनेकेँ एहि आयोजनमे सामिल होएबाक अछि।ताहि लेल अपनेक  मैथिली उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर एकटा परिचर्चा सत्र आयोजित कएल जाएत।अपने अपन कार्यक्रम सूचित करी जाहिसँ आवश्यक व्यवस्था कएल जा सकए।

“हम जल्दीए आवश्यक सूचना पठाएब।किताब कोन पतापर पठाओल जाएत?”

“हमरे पतापर पठा देबैक।”

“ठीक छैक।”

फोन कटि गेल।हम ई समाचारसभ सुनि बहुत प्रसन्न रही। मैथिलीमे हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर एतेक पैघ आयोजनमे एकटा विशेष सत्रमे परिचर्चा होएत से जानि हमर प्रसन्नताक अंते नहि छल। हम तुरंत ई समाचार श्रीमतीजीकेँ देलिअनि।तुरंत लैपटापपर बैसि जमशेदपुर जएबाक कार्यक्रम बनओलहुँ आ अपन कार्यक्रमक जनतब ब्रजेशजीकेँ पठा देलिअनि।संगे हुनका  किताब पठेबाक लेल उचित व्यवस्थामे लागि गेलहुँ।

ब्रजेशजी आ त्रिपाठीजी जमशेदपुरक एहि छाप नामसँ भए रहल साहित्यिक आयोजनक प्रमुख कर्ता-धर्ता रहथि।बादमे ब्रजेशजीसँ एहि कार्यक्रमक संदर्भमे कैक बेर गप्प भेल।ओ मीतभाषी आ बहुत प्रभावशाली लोक बुझेलाह।हमर कार्यक्रम प्राप्त भए गेलाक बाद हमर पत्नी सहित दिल्लीसँ जमशेदपुर आवागमन आ ओहिठाम रहबाक व्यवस्था सभटा ओएह केलनि।त्रिपाठीजी हमर परिचय सहित चर्चाक लेल चयनित हमर मैथिली उपन्यास,हम आबि रहल छीक बारेमे हिन्दी आ अंग्रेजीमे संक्षिप्त विवरण पठेबाक आग्रह केलनि।हम हुनका आवश्यक जानकारी जल्दीए पठा देलिअनि।जखन एक सप्ताह समय बीति गेल आ टिकटक किछु जनतब नहि भेटल तँ बीचमे अविचलजीसँ सेहो गप्प भेल।तकर बाद तुरंत ब्रजेशजीक फोन आएल। ओ हमर  सपत्नीक जमशेदपुर जएबाक आ वापसी हबाइ यात्राक टिकट पठा देलनि।रहबाक व्यबस्था सेहो सरकारी अतिथिगृहमे करबा देलनि।आब कथीक चिंता?

पहिने तँ छापक आयोजन साहित्य कला ट्रस्ट जमशेदपुर  द्वारा जिला प्रशासनक सहयोगसँ आयोजित करबाक योजना छल। मुदा,बादमे स्थानीय जिला प्रशासन एहि आयोजनकेँ पूर्णतः अपना हाथमे लए लेलक।कार्यक्रमक रूपरेखा आ ओहिमे सामिल होमएबला अतिथिलोकनि ओएह रहि गेल। जिला प्रशासन एहि आयोजनकेँ भव्य बनाबएमे कोनो कसरि नहि रखलक। हमरा सपत्नीक दुनू दिसका हबाइ यात्राक लेल टिकट पठा देलक।हमरासभकेँ स्थानीय राजकीय अतिथिगृहमे रहबाक व्यवस्था कए देलक।ततबे नहि,जहिआ हमरासभकेँ राँची जएबाक छल,ओहि दिन भोरेसँ कैकटा वरिष्ठ पदाधिकारीलोकनिक फोन आबि गेल। हम कखन राँची पहुँचब,आगू जमशेदपुरक लेल कखन जाए चाहब,आदि,आदि।हमरा राँची पहुँचि  ओहि दिन ओतहि ठहरबाक छल। दोसर दिन भेने राँचीसँ जमशेदपुरक लेल जएबाक जनतब हुनकासभकेँ देलिअनि। हमरा द्वारा देल गेल जानकारीक अनुसार दोसर दिन भोरे एकटा युवक राँची आबि गेलाह।हुनका संगे हमसभ जमशेदपुरक लेल बिदा भेलहुँ।रस्तामे प्रमुख स्थानसभक जानकारी ओ हमरा दैत रहलाह। असलमे ओ स्थानीय इंजिनियरिंग कालेजक विद्यार्थी छलाह आ एहि साहित्यिक कार्यक्रममे स्वेच्छासँ अपन सेवा दए रहल छलाह।एहन-एहन बहुत रास विद्यार्थीसभ अतिथिलोकनिक स्वागत  सहायताक लेल लागल छलाह। राँचीसँ जमशेदपुरक लेल बिदा होएबाक कालसँ वापसी समय धरि ओ हमरा संगे रहलाह आ जरूरी मदति करैत रहलाह।एहि काजक कारण हुनका कैक बेर व्यक्तिगत परेसानी सेहो भेलनि।मुदा,ओ से सभ प्रसन्नतापूर्वक सहैत रहलाह। ओ बहुत प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहथि आ  साहित्यमे स्वाभाविक रुचि छलनि जाहि कारण ओ एहि कार्यक्रममे सामिल भेल रहथि।

हमसभ जमशेदपुरक रस्तेमे रही कि आदरणीय अविचलजीक फोन आएल। ओ हमरसभक स्वागतक लेल उत्सुक छलाह।

“कतए धरि पहुँचलहुँ?कोनो दिक्कति ने ने?अपनेसभकेँ रहबाक लेल अतिथिगृहमे व्यवस्था अछि। सोझे ओहीठाम चलि जाएब।”

हम हुनकर भावुक शब्द सुनि आह्लादित छलहुँ। लगैत छल जेना हम कतेक महत्वपूर्ण भए गेल होइ।ई थिक हुनकर महानता।हमरासभकेँ अतिथिगृहक द्वारिपर पहुँचिते जबरदस्त स्वागत कएल गेल। दूटा महिला आरती लेने ठाढ़ छलीह। ओतए  उपस्थित अधिकारीलोकनि माला पहरओलनि ।ओएहसभ हमरा लेल आरक्षित कोठरीमे हमर सामानसभ पहुँचा देलनि।हमसभ पाछूए लागल ओतए पहुँचलहुँ। सभ तरहक आधुनिक सुविधासँ परिपूर्ण ओ कोठरी बेस आरामदायक लागि रहल छल। आब की?हमसभ किछु काल विश्राम केलहुँ। आब साँझ पड़ि रहल छल कि आदरणीय अविचलजीक फोन आएल।

“डेरेपर छी ने?”

“हँ,हँ।”

“हमसभ अपनेसँ भेंट करए आबि रहल छी।”

“आउ,आउ।हम तँ बाटे ताकि रहल छी। भोजन संगे हेतैक।”

हमसभ कनीके कालक बाद आमने-सामने छलहुँ। अविचलजी सपरिवार आबि गेल छलाह। हुनकर सपरिवार एहि तरहेँ आएब आ एतेक समय देब बहुत नीक लागल। हमसभ बड़ीकाल धरि गप्प करैत रहलहुँ। हम आबि रहल छी,उपन्यासपर चर्चा भेल।काल्हि एहि पुस्तकपर मंचपर चर्चा होएत। तेँ हमरालोकनिकेँ स्वाभाविक उत्सुकता छल। किछु आर किताबसभ सेहो हुनका देलिअनि।हमसभ संगे भोजन केलहुँ। तकर बाद ओ सभ अपन डेरापर वापस चलि गेलाह।हमसभ वापस अपन कोठरीमे कनीकाल दूरदर्शन देखलहुँ आ कल्हुका कार्यक्रमक ध्यान करैत सुति रहलहुँ।

आइ अठारह अक्टूबर २०२४ कए छाप साहित्यिक कार्यक्रमक प्रथम दिन छल। हम सभ कार्यक्रममे जएबाक लेल तैयार छलहुँ।हमरा कार्यक्रमस्थल धरि लए जएबाक लेल कार संगे हमरसभक  मार्गदर्शक आबि चुकल छथि। हमसभ तुरंत कारमे बैसि कार्यक्रम स्थल दिस बिदा भए गेलहुँ।हमरालोकनिक अतिथिगृहसँ सटले छल ओ स्थान।दस मिनटक भीतरे ओहिठाम पहुँचि गेलहुँ। अतिथिगृहसँ कार्यक्रमस्थलक बीचमे रस्ताक बिजली खंभासभपर कार्यक्रममे सामिल होमए जा रहल लेखक,रचनाकारलोकनि आ  हुनकर चयनित पुस्तकसभक पैघ-पैघ पोस्टर लगाओल गेल छल। हमरा ई देखि बहुत प्रसन्नता भेल जे ओहि पोस्टरसभमे हमहूँ सामिल छलहुँ।हमर पुस्तक,हम आबि रहल छी,क चित्र कार्यक्रम स्थलपर शुरूएमे लगाओल गेल छल। कार्यक्रम स्थलक बाहर जिला प्रशासनक प्रमुख अधिकारी हमरालोकनिक स्वागत लेल उपस्थित छलाह।कार्यक्रम एकटा विशाल हालमे आयोजित भए रहल छल। कनीके फटकी प्रतीक्षा रूममे हम प्रतीक्षारत आन लेखकलोकनिक संग बैसलहुँ।हमर श्रीमतीजी सेहो हमरा संगे रहथि। स्थानीय जिलाधीश माननीय श्री रविशंकर शुक्लजी व्यक्तिगत रूपसँ सभसँ भेंट केलनि।परिचय-पातक बाद सभगोटे कार्यक्रम भवन दिस बढ़ि गेलहुँ।किछु गोटे मंचपर बैसबाक लेल आगू बाटे निकलि गेलाह।मंच सजि गेल छल।हाल लोकसभसँ भरल छल। जिला प्रशासनक सक्रियताक कारण श्रोताक कमी महि छल।जिला भरिक विद्यालय ,महाविद्यालयसँ विद्यार्थी एहिमे सामिल भए रहल छलाह। उद्घाटन सत्रमे साहित्य आ सृजनक महत्वपर बहुत सफल चर्चा भेल। तकर बाद दिन भरि पूर्वनियोजित कार्यक्रमक अनुसार अनेकलोकनि अपन पुस्तकक विषयमे आयोजित परिचर्चामे सामिल होइत रहलाह।

आजुक अंतिम सत्रमे हमर  उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर चर्चा प्रारंभ भेल। आदरणीय प्रोफेसर अविचलजी कार्यक्रमक संचालन कए रहल छलाह। हाल दर्शकसँ भरल छल। अविचलजीक प्रश्न पुछबाक क्रम  आ हमर उत्तरसँ लगभग एकघंटा धरि ओसभ मनोयोगपूर्वक सामिल रहलाह।अंतमे,एहि उपन्यास आ परिचर्चासँ संवंधित श्रोता दिससँ प्रश्न सेहो कएल गेल जाहिमे श्रीमती नूतन झाक प्रश्न बहुत सटीक आ मार्मिक छल। आब कार्यक्रम समाप्त होएबाक समय आबि गेल छल। लोकसभ थाकि चुकल रहथि।मंचसँ कार्यक्रम समापनक घोषणा होइतहि लोकसभ हालसँ बाहर होमए लगलाह।हमहूँसभ बाहर निकललहुँ।ओहिठाम जमशेदपुरक बहुत रास मैथिलसभ उपस्थित छलाह।ओसभ हमरा हमरासँ भेंट करबाक लेल बहुत उत्सुक छलाह।हम किछुगोटेकेँ अपन किताबसभ सेहो देलिअनि। आब बाहर निकलिए रहल छलहुँ कि अविचलजी भेटि गेलाह-

“काल्हि समय होअए तँ  एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरमे समाजमे बृद्धलोकनिक स्थितिपर कार्यक्रम आयोजित कएल जाइत ।”

“किएक ने।कखन अएबाक हेतैक?”

“साढ़े दस बजे आबि जाएब।इएह कार अहाँकेँ पहुँचा देत।संगमे मार्गदर्शक तँ रहबे करताह।”

‍१९ अक्टूबर २०२५

आइ जमशेदपुर प्रवासक तेसर दिन अछि। हमसभ अविचलजीक कालेजमे आयोजित  कार्यक्रममे जएबाक लेल तैयार छी। हमरसभक मार्गदर्शक कार सहित आबि चुकल छथि। हमसभ कारसँ गंतव्य दिस बिदा छी। मुदा,रस्तामे जाम छैक। तेँ देरी भए रहल अछि। ओमहर अविचलजी कालेजमे अपन मित्रलोकनिक संगे हमरसभक प्रतीक्षा कए रहल छथि।हमरा हुनकर फोन आबि जाइत अछि।

“कतए पहुँचलिऐक?”

“जाममे फँसि गेलहुँ।आब दसमिनटमे पहुँचि जएबाक चाही।”

“आउ,आउ।हमसभ अपनेसभक बाट ताकि रहल छी।”

हमसभ एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक द्वारिपर पहुँचैत छी।अविचलजी  रबीन्द्र चौधरीजीक संगे हमर सभक स्वागत  करैत छथि। हमसभ कनीके आगू बढ़ैत छी कि एनसीसीक कैडेटसभ सलामी दैत छथि। आदरणीय रबीन्द्रजी हुनकरसभक सलामीकेँ उचित जबाब दैत छथिन। हम अविचलजीक व्यवस्थासँ चकित छी। भाषणमंडप विद्यार्थीसभसँ भरल छल। हमरा स्वागत करबाक लेल एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक प्राचर्य सहित कालेजक अनेक गण-मान्य प्राध्यापकलोकनि उपस्थित छलाह।फूल माला,पाग,आ शाल दए हमरा दुनूगोटेक स्वागत कएल गेल।तकर बाद परिचर्चा प्रारंभ भेल। परिचर्चाक विषय छल-“समाजमे बूढ़क स्थिति आ तकर समाधान।”हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी आ ठेहापरक मौलायल गाछ एहि विषयसँ संवंधित अछि। एहि विषयपर हम कैकटा आलेखो लिखने छी। संभवतः तेँ अविचलजी एहि विषयपर हमर विचार सुनए चाहैत छलाह।

कार्यक्रमक संचालन अविचलजी स्वयं कए रहल छलाह।अविचलजी एहि कालेजक बहुत दिन धरि प्रभारी प्राचार्य रहि चुकल छथि।संप्रति मैथिली विभागाध्यक्ष छथि।ईहो सुनबामे आएल जे किछु मासक बाद ओ फेर एलबीएसएम कालेज जमशेदपुरक प्राचार्य बनि जएताह। मंचपर तत्कालीन प्राचार्यक अतिरिक्त आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर रबीन्द्र कुमार चौधरीजी उपस्थित छलाह आ ओएह एहि कार्यक्रममे शुरूमे बजबो केलथि।अविचलजी आ प्राचार्यजी सेहो अपन विचार व्यक्त केलनि। हमरा तँ ओहि विषयेपर  बजबाक लेल बजाओल गेल छल। मुदा,काल्हि भेल छापमे हमर उपन्यास,हम आबि रहल छी,पर भेल चर्चाक छाप एतहु पड़बे कएल।आजुक परिचर्चाक विषयसँ हटि कल्हुके परिचर्चापर चर्चा होमए लागल।हम परिचर्चाक विषयसँ बेसी अपन उपरोक्त उपन्यासक बारेम बजैत रहि गेलहुँ। मुदा,अविचलजी तँ सधल वक्ता संग-संग उत्कृष्ट मंच संचालक छथि। ओ अपन व्यक्तित्वक गरिमा आ विद्वतासँ सभकेँ बहुत प्रभावित केलनि।हमरो उत्साहित करैत रहलाह। बादमे श्रोताक पाँतिमे बैसलि एकटा महिला प्राध्यापक द्रोणाचार्यक एकलव्यक प्रतिए कएल गेल अन्यायक चर्चा केलनि जे कनी बेसीए काल चलैत रहल। लगभग दू घंटा चलल ई कार्यक्रम बहुत सार्थक छल।कार्यक्रमक समाप्तिक बाद हमसभ अपन डेरा आपस आबि गेलहुँ।भोजनपरांत हमसभ फेर छाप कार्यक्रममे सामिल होएबाक लेल कार्यक्रम स्थालपर पहुँचि गेलहुँ।मुदा,हाल भरल छल। कतहु बैसबाक जगह नहि छल। हमसभ किछुकाल प्रतीक्षा केलहुँ।तकर बादे भीतर जा सकलहुँ।

समापन कार्यक्रम

कार्यक्रमक समाप्ति आयोजकलोकनि द्वारा ओहि आयोजनमे सामिल भेल समस्त लेखक,रचनाकार,कलाकारलोकनि सहित अनय सहभागीलोकनिकेँ उपहार दए कएल गेल। जिलाक वरिष्ठअधिकारीलोकनि एहिमे उपस्थित छलाह।उपहारमे खरसवाँ जिलाक प्रतीकचिन्ह छउ(मुखौटा)  सामिल छल। कार्यक्रम समाप्तिक बाद साँझमे सामने लागल सामियानामे विवेकानन्दक जीवनीपर आधारितनाट्य रुपांतरण  प्रसिद्ध कलाकार   द्वारा कएल गेल। हमहूँसभ ओहि कार्क्रमकेँ थोड़ेकाल देखलहुँ। विवेकानन्दक जीवनीकेँ बहुत नीक जकाँ प्रदर्शित वर्णित कएल जा रहल छल। एक्केटा कलाकार अनेक प्रकारक भाव भंगिमाक सृजन कए कार्यक्रमकेँ जीवंत आ रोचक बना देने छलाह। कार्यक्रम बहुत नीक लागि रहल छल। बीचमेसँ उठबाक मोन नहि भए रहल छल।तथापि,समयसँ डेरा पहुँचि जएबाक लेल हमसभ ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ। अविचलजी,  रबीन्द्र कुमार चौधरीजी पहिले पाँतिमे दहिना दिस बैसल रहथि। हुनकासभसँ अनुमति लैत हमसभ सामिआनासँ बाहर भेलहुँ आ  कारसँ अपन डेरा दिस बिदा  भए गेलहुँ।

आइ हमरासभकेँ जमशेदपुरसँ बिदा होएबाक छल।भोरे दस बजे हमरासभकेँ राँची धरि पहुँचएबाक लेल कार आबि गेल छल। हमरसभक मार्गदर्शक फोन केलथि-

“सर! अपनेक आज्ञा होइक आ अहाँसभकेँ कोनो असुविधा नहि होअए तँ हम एतहिसँ अपनेसँ बिदा ली।”

“अहाँ निश्चिन्त रहू।हमसभ चलि जाएब।”

हम हुनका ईहो पुछलिअनि जे अतिथिगृहकेँ हिसाब-किताब केना की हेतैक?ओ संबंधित अधिकारीसँ गप्प केलाक बाद कहलनि-

“अपनेसभ तँ राजकीय अतिथि छलिऐक ने।अहाँकेँ किछु नहि देबाक अछि।”

ई ने भेलैक बात।एहन स्वागत बहुत दुर्लभ।हमसभ बहुत आनन्दमे रही। एतेक पैघ साहित्यिक कार्यक्रममे हमर मैथिली उपन्यासपर चर्चा भेल से बहुत गर्वक बात तँ छलहे संगे एतेक नीक स्वागत,एतेक नीक व्यवस्था।ऊपरसँ अविचलजीक निरंतर व्यक्तिगत ध्यान राखब कोनो मामुली बात नहि छल।आर तँ आर,ओ अपना कालेजमे हमर विशेष कार्यक्रम सेहो करओलनि,सेहो ओतेक कम समयमे।रस्ताभरि अविचलजी आ हुनकर श्रीमतीजीक स्नेहपूर्ण व्यवहार मोन पड़ैत रहल  आ मोन पड़ैत रहलाह ओहिठामक कार्यक्रमक आयोजकलोकनि जे कार्यक्रमक सफलताक लेल कोनो कसरि नहि छोड़लनि।










शनिवार, 20 दिसंबर 2025

बाबाक दरबारमे

 

बाबाक दरबारमे

 

बहुत दिनसँ वाराणसी जएबाक मोन छल। असलमे  ओहिठाम बाबा विश्वनाथक मंदिरक आ आसपासक जगहक पुनुरोद्धारक समाचार देखि-सुनि मोनमे बहुत प्रसन्नता भेल छल।हम जखन इलाहाबाद(प्रयागराज) मे रहैत रही तखन एक बेर ओतए गेल रही।इलाहाबादसँ वाराणसी ट्रेनक यात्रामे हमर एकटा संगी सेहो रस्ते मे भेटि गेल रहथि।ओ वाराणसी लग अपन पैतृक गाम जाइत रहथि।हमरा संगे हमर श्रीमतीजी आ हमर पुत्र भास्कर रहथि।ओ ट्रेन इलाहाबादक रामबाग टीसनसँ खुजल रहैक आ वाराणसी धरि गेलैक।रस्तामे सभ टीसनपर रुकैत गेलैक।हमसभ आपसमे गप करैत रहलहुँ।ट्रेन वाराणसी पहुँचलाक बाद हमर संगी  अपन गाम चलि गेलाह।हमसभ टीसने लग एकटा आटो रिक्सा केलहुँ। ओ आटोरिक्सा हमरासभक संगे भरि दिन रहल,यथासंभव सौंसे घुमओलक आ ओही दिन साँझमे हमसभ वापस इलाहाबाद आबि गेलहुँ।वाराणसीमे काशी विश्वनाथ मंदिरमे बाबाक दर्शन बहुत नीकसँ भेल रहए,कारण ओहि समयमे स्वर्गीय आर०के० मिश्र(आइएएस) (स्वर्गीय जयकान्त मिश्रजीक भाइ) ,ओ हमरासभक दर्शनक लेल ओरिआन कए देने रहथि। जयकान्त बाबू हमरा लेल हुनका फोन कए देने रहथिन। मंदिरे मे ओ पलथा मारि कए बैसल रहथि। हमरा देखितहि ओ बहुत प्रसन्न भेलथि  एकटा पंडाकेँ हमरासभक संग लगा देलथि।तकर बाद हमसभ बहुत नीकसँ महादेवक दर्शन केलहुँ।दर्शन काल पंडासभकेँ बड़का-बड़का परातमे भोजन सामग्री बाबाकेँ प्रसाद चढ़बैत देखेने रहियनि।हमरा भूख लागि गेल रहए। स्वादिष्ट भोजन सामग्रीसभ देखि मुँहमे पानि आबि गेल रहए।बाबाक दर्शनक बाद सोझे होटल गेल रही,भरि पेट भोजन केने रही। तकर बादे हमसभ घुमबाक लेल आगू बढ़ल रही।मोन पड़ैत अछि जे मंदिरक आसपास केहन गलींज छल, पैदलो चलब मोसकिल।बाबा मंदिरसँ गंगा घाटक बीच आएब-जाएब बहुत मोसकिल छल। आब जखन सुनलिऐक जे बाबा मंदिर परिसरक आ आसपासक क्षेत्रक नक्सा बदलि गेल अछि,गंगा स्नानक बाद सोझे मंदिरमे बाबाकेँ जल चढ़ाउ,कतहु कोनो अवरोध नहि,तँ हमरोसभकेँ  ओतए एक बेर फेर जएबाक इच्छा होएब स्वाभाविक छल।मुदा एकर कार्यान्वयनमे किछु विलंब भेल।कारण नवका कारीडोर बनलाक बाद वाराणसी गेनिहार लोकसभक मेला लागल रहैत छल। ओहिठाम रहबाक,घुमबाक व्यवस्था करब कठिन बुझा रहल छल।

अचानक एक दिन वाराणसी स्थित केन्द्र सरकारक होलीडे होममे पाँच दिन रहबाक लेल जगह भेटि गेल। आब की छल।हम तुरंत हुनका हाक देलिअनि-

“हेयै! कहाँ छी?”  

ओ आबि गेलथि।हम हुनका वाराणसीमे रहबाक जोगार होएबाक जनतब देलिअनि।ओहो बहुत प्रसन्न भेलथि।हम सभ तुरंत रेल टिकटक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।भेल जे जखन वाराणसी जाए रहल छी तँ इलाहाबादो घुमिते आएब।हमर अभिन्न मित्र श्री संजीव सिन्हाजीसँ भेँट-घाँट भए जाएत।ओ बहुत दिनसँ इलाहाबाद अएबाक लेल आग्रह कए रहल छलाह।संगे हमरो इलाहाबाद घुमबाक इच्छा छलहे।कारण हम जनबरी ‍१९७८सँ मार्च ‍१९८७ धरि नओ साल ओहिठाम रहल छी। ओतए पहुँचिते हमरा अपन जगहपर पहुँचि जएबाक आनन्द होइत अछि।अस्तु,ओतहु रहबाक लेल सरकारी अतिथि गृहमे रहबाक जोगारमे लागि गेलहुँ जे संयोगसँ संभव भए गेल। ओना सिन्हा साहेबक बहुत जोर छलनि जे हम हुनके ओहिठाम रही।मुदा सिभिल लाइन्स स्थित अतिथिगृह आ जार्ज टाउन स्थित हुनकर घरमे बेसी दुरी नहि अछि,से सभ कहला-सुनलापर ओ मानि गेलाह।हमसभ वापसी रेल टिकट इलाहाबादसँ बना लेलहुँ।आब की छल?बस ओहि दिनक प्रतीक्षामे लागि गेलहुँ।

२५ अगस्त २०२५क हमरासभकेँ वाराणसी यात्राक लेल प्रस्थान करबाक छल।हमसभ तैयारी कए रहल छलहुँ। हमर पौत्र हमर श्रीमतीजीकेँ तैयारी करैत  देखि दुखी भए गेल। ओकरा बुझा गेलैक जे हमसभ  कतहु जा रहल छी।ओ हुनका कहैत छनि-

“अहाँ एना नीक नहि लागि रहल छी।अहाँ जहिना रहैत छी,तहिना रहू।” ओ बहुत उदास छल। हमसभ जखन घरसँ बाहर होइत रही तखन सभ केओ बिदा करबाक लेल आएल छल,मुदा ओ नहि आएल। ओ असलमे बहुत दुखी छल। ओकरा दाइसँ फराक होएब नीक नहि लागि रहल छलैक।असलमे दाइसँ ओकरा बहुत लगाओ छैक।इसकुलसँ वापस भेलाक बाद ओ बेसी काल दाइए लग रहैत अछि। हमरोसभकेँ नीक तँ नहिए लागि रहल छल। मुदा जएबाक तँ छलहे।अस्तु,अछताइत-पछताइत हमसभ टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। हमर पोती जरूर हमरासभकेँ नीकसँ बिदा केलक। बड़ी काल धरि बाइ-बाइ करैत रहल।

हमरासभकेँ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेसमे एसीटूमे एक आ तीन नंबरक नीचाँक शायिका आरक्षित छल।ई दुनू शायिका बाहरी द्वारिसँ सटले छल।ओ निरंतर खुजैत रहैत छल।लोक अबैत-जाइत रहैत छल।हमरासभ लग दूटा बाकसमे भरल सामानसभ छल।तकर चिंता होइत रहैत छल।अस्तु,हम तँ राति भरि जगले रहि गेलहुँ।भोरे सात बजे करीब हमसभ वाराणसी टीसनपर पहुँचि गेल रही। हमरासभक स्वागत लेल माधवजी(परिवर्तित नाम)  आएल रहथि। ट्रेनसँ उतरितहि प्लेटफार्मेपर ओ भेटि गेलथि।प्रथमदृष्टिए माधवजी बहुत आकर्षक आ रमणीय व्यक्तित्वक लोक बुझेलाह।ओहो केन्द्रीय सचिवालय सेवामे रहथि।हमर कैकटा संगी हुनकर परिचित,मित्र छथिन।ओ मूलतः वाराणसीएक वासी छथि,जीवन भरि एही सहरमे रहल छथि।वाराणसीक माटि-पानिसँ बहुत प्रेम छनि,से एहि हद धरि छनि जे ओ अपन दिल्लीक नौकरी एही लेल छोड़ि देलनि। से सुनबामे कनी विचित्र तँ लगैत छैक कारण आजुक अर्थयुगमे लोक एना करत से नहि सोचल जा सकैत अछि,मुदा ओ से केने छथि आ एहि मानेमे एकटा अपना तरहक उदाहरण छथि।अत्यन्त साधारण भेषमे अपन सरल सहज व्यवहारसँ ओ अपना दिस लोककेँ आकर्षित करैत छथि।हम बड़ी काल धरि हुनका बारेमे सोचैत रहि गेलहुँ। हुनकासँ बहुत किछु जानकारी भेटैत रहल।हुनको बारेमे आ सहरोक बारेमे।मुदा ओ नौकरी किएक छोड़ि देलनि,से हम नीकसँ नहि बुझि सकलहुँ ,सेहो तखन जखन कि ओ ओकर बाद फेर कोनो नौकरी नहि कए सकलथि(हमरा जनतबे)।प्रत्येक मनुष्य स्वयंमे अद्भुत होइत अछि,रहस्य अछि।हम कनी काल सएहसभ सोचैत रहलहुँ।टैक्सी आगू बढ़ैत रहल। सहर अपने सभठाम जकाँ।कतहु नव,कतहु पुरान तरीकाक घरसभ देखाइत छल। भोरक समय छलैक।दूबगली दोकानसभ खुजि रहल छलैक। रस्ताक कातमे चाहक दोकानसभसँ धुआँ उठि रहल छल।ठाम-ठाम लोकसभ चाह बनबाक प्रतीक्षा कए रहल छल।हाथमे अखबार आ तरकारीक झोरा सेहो किछु गोटे रखने रहथि।

 माधवजीक संगे  रहलासँ हमरासभक चिंता आब खतम छल।केना जाएब,कतए घुमब,की-की देखब सभ किछु हुनका ऊपर।हुनका संगे टैक्सीसँ हमसभ घंटा भरिक बाद केन्द्र सरकारक होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।होलीडे होमेमे हमरसभक कोठरी दस बजेक बाद उपलब्ध होएत,से बात स्वागती कहलनि।हमसभ ताबत स्वागत कक्षेमे बैसि चाह-पान केलहुँ।तखनहि श्रीमतीजीसँ विमर्शक बाद आजुक घुमबाक कार्यक्रम सेहो तय केलहुँ।आइ मंगल दिन छल।हमसभ उपास केने छलहुँ।तेँ दिनमे भोजनक चिंता नहि छल। आइ हमसभ हनुमानजीक दर्शन करब।तकर बाद लगपासक चीज-वस्तु देखबाक प्रयास करब।मंगल दिन प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिरमे हनुमानजीक दर्शन करब महत्वपूर्ण छल,कारण आइ मंगल दिन रहबाक कारण सहर आ बाहरोसँ बहुत भक्तसभ ओतए अबैत छथि।हमसभ  अतिथिगृहमे  आश्वस्त भए गेलाक बाद करीब तीन बजे टैक्सीसँ संकटमोचन मंदिर लेल बिदा भेलहुँ। करीब आधा घंटामे हमसभ ओहिठाम पहुँचलहुँ।

संकटमोचन मंदिर वाराणसी

संकटमोचन मंदिर वाराणसीक अति प्राचीन मंदिर अछि।एकर स्थापना तुलसीदासजी स्वयं केने रहथि। एहि मन्दिरक पुनर्निर्माण 1900 ईस्वीमे स्वर्गीय मदन मोहन मालवीयजी द्वारा कराओल गेल। ओएह एहि मंदिरकेँ  “संकट मोचन हनुमान मन्दिर वाराणसी” क नामसँ प्रतिष्ठित केलथि।

कहबी छैक जे जखन तुलसीदासजी ओहिठाम रामकथा कहैत रहथि तँ एक दिन एकटा प्रेत देखेलनि। ओहो हुनकर रामकथा सुनैत छल। तुलसीदासजी हुनका आग्रह केलखिन जे ओ हनुमानजीक पता बताबथि जाहिसँ हुनकर दर्शन भए सकनि।ओ प्रेत कहलखिन-

“हनुमानजी तँ नित्य अहाँक कथामे उपस्थित रहैत  छथि। ओ एकटा कोढ़ीक भेषमे सभसँ पहिने अबैत छथि,पाछू बैसल रहैत छथि आ कथा समाप्त भेलाक बाद सभसँ पाछू जाइत छथि।”

प्रेतक देल हुलिआक अनुसार तुलसीदासजी हनुमानजीकेँ कोढ़ीक भेषमे चिन्हि लेलखिन आ हुनकर पैरपर खसि पड़लखिन।हनुमानजीकेँ ओ भगवान रामसँ दर्शनक रस्ता बतेबाक प्रार्थना केलखिन।हनुमानजी हुनका कहलखिन-

“अहाँ चित्रकुट चलि जाउ।ओतहि अहाँकेँ भगवान राम भेटताह।”

तकर बाद तुलसीदासजीकेँ चित्रकुटमे भगवान रामक दर्शन भेल रहनि। कहबाक तात्पर्य जे ओ स्थान बहुत सिद्ध आ प्रसिद्ध  अछि। तुलसीदासजी ओतए माटिक हनुमानजी मूर्तिक स्थापना केने रहथि। ओएह मूर्ति अखनहु ओहि मंदिरमे स्थापित अछि।हनुमानजीक हृदयक ठीक सामनेमे भगवान रामक पैर देखाइत अछि।शनि आ मंगल दिन कए ओहिठाम भक्त लोकनिक बहुत भीड़ रहैत अछि।मंदिरे परिसरमे प्रसादक कैकटा दोकान अछि जाहिठामसँ घीमे बनल लड्डू आ आन मिठाइसभ प्रसादक लेल उपलब्ध रहैत अछि।मंदिर परिसरमे  प्राचीन इनार अछि।कहल जाइत अछि जे तुलसीदासजीक समयसँ ई इनार ओहिठाम अछि।भक्त लोकनि ओहि इनारक पानि पिबैत छथि।

यद्यपि आइ मंगल दिन छल,मुदा मंदिर परिसरमे अपेक्षाकृत बेसी लोक नहि देखेलथि।हमसभ बहुत सुविधासँ हनुमानजीक दर्शन कए सकलहुँ।हनुमानजीक दर्शनक बाद माधवजी  हमरासभकेँ वाराणसीक प्रसिद्ध पहलमान लस्सी पियाबए लए गेलाह।

पहलमान लस्सी

वाराणसी सहरक लंका चौकक पास सन् ‍१९५०मे पन्ना सरदारजी द्वारा पहलवान लस्सीक स्थापना कएल गेल छल। एहि लस्सीक विशेषता ई अछि जे ई हाथेसँ बनाएल जाइत अछि आ शुरूए सँ माटिक कुल्हरमे परसल जाइत अछि।पहलवान लस्सी पीबाक लेल भोरे सँ लोकक पाँति लागि जाइत छल। सालक-साल एकर प्रसिद्धि बनल रहल। किछु महिना पहिने ओहिठामक आसपास सभटा दोकानसभकेँ सड़क बनेबाक लेल ढाहि देल गेल। तकर बाद पहलवानक लस्सी कनीके फटकी दोसर ठाम चलि गेल। हमसभ तकैत-तकैत ओहिठाम पहुँचलहु।कनीक प्रयासक बाद  दोकान भेटि गेलाक बाद हमसभ बहुत प्रसन्न रही। चारिटा लस्सी बनेबाक लेल कहलिऐक।थोड़बे कालमे लस्सी तैयार छल। हम तीनूगोटे ओहीठाम बेंचपर बैसि लस्सी पिलहुँ। लस्सीक उपरसँ बेस मोट छाल्ही छल। पहलवान लस्सी जेहने देखबामे रमनगर छल तेहने एकर स्वाद छल।हमसभ लस्सी पिबि सचमुचमे बहुत आनन्दित भेलहुँ। एकटा लस्सी वाहन चालकक लेल सेहो लेने गेलहुँ। एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न बुझेलाह। लस्सी पिलाक बाद हमरासभमे नवस्फूर्ति आबि गेल छल।आब हमसभ वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर दिस बिदा भए गेलहुँ।

वनारस हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर

बीसवीं शताब्दीक आरम्भक समय भारतक आत्मा स्वतंत्रता आ सांस्कृतिक पुनर्जागरणक लेल आतुर  छल। पश्चिमी शिक्षा प्रणाली भारतक नवयुवककेँ ज्ञान तँ दैत छल, मुदा ओ भारतीय मूल्य आ परंपराक आत्मासँ बहुत फटकी कए दैत छल। एहि परिस्थिति मे पंडित मदन मोहन मालवीय अपन अदम्य संकल्पसँ एकटा एहन विश्वविद्यालयक स्वप्न देखलाह जे भारतीय संस्कृति, धर्म, आ परंपराक गौरवकेँ आधुनिक विज्ञान आ शिक्षा संग जोड़ि सकए। एहि स्वप्नक साकार करबाक लेल मालवीयजीकेँ डॉ. एनी बेसेंट, महाराजा रामेश्वर सिंह, (दरभंगा), महाराजा प्रभु नारायण सिंह (काशी) आ अन्य गणमान्य लोकनिक सहयोग भेटलनि। सन् ‍१९१५ ई०मे  ब्रिटिश संसदमे पारित बीएचयू कानूनक आधार पर ४ फरवरी ‍१९१६ केँ वाराणसीक पवित्र भूमिपर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक स्थापना भेल।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)  एशियाक सबसँ पैघ आवासीय विश्वविद्यालय मानल जाएत अछि आ वाराणसीमे ‍१३०० एकड़ मे मुख्य परिसर स्थित अछि, जखन कि मिर्जापुर जिलामे दक्षिण परिसर २७०० एकड़मे पसरल अछि। विश्वविद्यालय मे१४ संस्थान, 14 संकाय आ ‍१४० सँ बेसी विभाग अछि, जतए करीब तीस हजार छात्र अध्ययन  करैत छथि। ई विश्वविद्यालय भारत सरकारक “प्रतिष्ठित संस्थान(Institute of Eminence) " मे चयनित अछि आ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेहो प्रसिद्ध अछि। सर सुंदरलाल अस्पताल, भारत कला भवन संग्रहालय, विशाल खेल मैदान आ सांस्कृतिक केंद्र विश्वविद्यालयक विशेष पहिचान अछि। एहिठाम एक्के परिसरमे 3५० सँ बेसी स्नातक, स्नातकोत्तर आ शोध पाठ्यक्रम उपलब्ध अछि । संक्षेपमे, बीएहयू शिक्षा, संस्कृति, शोध आ सामाजिक एकताक अद्वितीय प्रतीक अछि।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयक परिसरमे अवस्थित नव काशी विश्वनाथ मंदिर आधुनिक स्थापत्यक अद्भुत चमत्कार आ धार्मिक आस्थाक उज्ज्वल प्रतीक अछि। पंडित मदन मोहन मालवीयक संकल्पसँ ई मंदिर बिरला परिवारक सहयोग सँ ‍१९३१ मे शिलान्यास पाबि ‍१९६६ मे पूर्ण रूप सँ तैयार भेल। करीब २५० फीट ऊँच शिखर आ देबालसभ पर अंकित गीता आ शास्त्रक श्लोक एहि मंदिरक वैभवकेँ बहुत आकर्षक बनओने अछि। शिवक प्रधान स्वरूपक संग नओ अन्य देवालयक उपस्थिति एहि स्थानकेँ बहुआयामी आध्यात्मिक केन्द्र बनबैत अछि। विश्वविद्यालयक छात्र आ आगंतुक लेल ई मंदिर केवल पूजास्थल नहि, अपितु ध्यान, शांति आ सांस्कृतिक चेतनाक आलोकक स्रोत अछि, जतए धर्म, कर्म, अर्थ आ मोक्षक मूल्य संगे-संग प्रतिध्वनित होइत अछि। संक्षेपमे, ई मंदिर विश्वविद्यालयक आत्माकेँ धार्मिक आ सांस्कृतिक रूपमे आलोकित करैत भारतक सनातन परंपराक गौरवक जीवंत प्रतीक बनि गेल अछि।

एहन अद्भुत स्थान देखबाक जिज्ञासा ककरा नहि होएत?अस्तु,हमसभ बहुत उत्सुकतासँ टैक्सीसँ आब बीएचयू परिसर दिस बढ़ि रहल छलहुँ। माधवजी हमरा लोकनिकेँ विश्वविद्यालयक विभिन्न संकायक बारेमे बतबैत रहलाह।थोड़बे कालमे हमसभ विश्वविद्यालय स्थित काशी विश्वनाथ मंदिरमे पहुँचि गेलहुँ।हमसभ बहुत चैनसँ मंदिरमे भगवान शिवक दर्शन केलहुँ,चारूकात घुमलहुँ। ओतहि किछु काल विश्रामो केलहुँ  तकर बाद बाहर भए गेलहुँ।माधवजीकेँ ओहिठामक समोसा खेबाक इच्छा रहनि। ओ जखन कखनहु एमहर अबैत छथि तखन ओहिठामक प्रसिद्ध समोसा जरुर खाइत छथि। हमरोसभकेँ आग्रह केलथि। मुदा हमसभ तँ मंगलक उपास केने रही। अस्तु, ओ असगरे समोसा खेबाक लेल गेलाह।ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल हुनकर प्रतीक्षा करैत रहलहुँ।

तुलसी मानस मंदिर

माधवजी जाबे समोसा खेलनि,ताबे हमसभ टैक्सीमे बैसल सुस्ताइत रहलहुँ। हमसभ उपास केने रही आ भोरेसँ किछु-ने-किछु व्यस्तता रहबे कएल।टीसनसँ होलीडे होम पहुँचलाक बादो  कोठरी भेटबामे बड़ी काल लागि गेल।फेर हमसभ कोठरीमे सामानसभ रखलहुँ। कनीकाल विश्राम केलहुँ आ बिना किछु खेने-पीने मंदिर लेल बिदा भए गेलहुँ। आब वापसीमे बहुत थाकि गेल रही। कतहु जएबाक मोन नहि छल।तथापि,जखन टैक्सी तुलसी मानस मंदिर लग पहुँचल तँ मोन भेल जे देखिए ली। तुलसी मानस मंदिर ओएह स्थान थिक जाहिठाम तुलसीदास अपन रामायणक रचना केने छलाह। बादमे सन् ‍१९६४मे बंगालक हावराक ठाकुरदास सुरेका परिवार द्वारा एहिठाम मंदिर बनाओल गेल। मंदिरक देबालपर संपूर्ण तुलसी रामायण चित्र सहित उकेरल गेल अछि। एतए एकटा संग्रहालय सेहो अछि जाहिमे अनेक वहुमूल्य पाण्डुलिपि आ कलाकृति राखल गेल अछि।हमसभ एहि मंदिरमे दर्शनक बाद चारूकात घुमलहुँ।  किछु काल विश्रामक बाद वापसी यात्राक लेल टैक्सीमे बैसि गेलहुँ। कनीके आगू वाराणसीक प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर आएल,मुदा हमसभ ततेक थाकि गेल रही जे एहिठाम कोनो आन दिन दर्शन करबाक विचार कएल। लगभग आधा घंटाक बाद थाकल-झमारल हमसभ होलीडे होम स्थित अपन डेरापर पहुँचि गेलहुँ।माधवजी पहिने उतरि गेल रहथि। टैक्सीबलाकेँ काल्हि फेर भोरे नओ बजे अएबाक आग्रह कए हमसभ विश्राम लेल अपन कोठरीमे चलि गेलहुँ।

होलीडे होमक अपन कोठरीमे पहुँचि हम मोबाइल फोन चार्ज करए चाहलहुँ,मुदा चार्जर प्वाइंटमे जएबे नहि करैक। ओतहिसँ टीभीक सेहो चलेबाक छल। ओहो नहि चलैत छल। अगल-बगलक कैकटा प्वाइंटसभमे इएह समस्या छल।आखिर हम फोन कए ओहिठामक केयरटेकर पाण्डेयजीकेँ बजेलिअनि। ओ कहलाह जे ई समस्या सौंसे मकानमे छैक। ओ बिजलीक प्लगमे पेन घुसा देलखिन, तकर बाद ओहिमे मोबाइलक चार्जर लगा देलथि। एही तरीकासँ टीभी सेहो चलि गेल। हमसभ जखन बादमे भीआइपी कोठरीमे गेलहुँ तखनहु ई समस्या रहबे कएल । वाराणसीक होलीडे होम नबे बनल अछि। ताहिमे एहन दिक्कति नहि होएबाक चाहैत छल। मुदा ई समस्या ओतए अछि। अफसोचक बात ई अछि जे एहि समस्यापर ओतुका व्यवस्थापक लोकनिक ध्यान किएक नहि जाइत छनि।ओना ई होलीडेहोम बहुत नीक अछि आ एहिठाम बहुत मोसकिलसँ कोठरी भेटैत छैक। तेँ हमरा जखने कोठरीक आरक्षण भए गेल तँ हम तुरंत ओही हिसाबसँ रेलक टिकट बनबा लेने रही। हमसभ कुल पाँचदिन ओहिठाम रहलहुँ।भोजन,जलखै आ चाहक  कम दाममे नीक व्यवस्था छल।संयोगसँ एकटा बहुत नीक टैक्सीबला लोक भेटि गेल छल जाहिसँ हमरा लोकनिक वाराणसी भ्रमण करबामे बहुत आराम रहल।

होलीडे होम वाराणसी टीसनसँ लगभग नओ कीलोमीटरपर अवस्थित अछि। ओहिठामसँ प्रेमचंदक गाम,लमही सटले अछि।मुदा सहरक प्रमुख मंदिरसभ ओहिठामसँ फटकी पड़ैत अछि। होलीडेहोमक परिसर बेस पैघ अछि।ओकर एकदिस विभिन्न प्रकारक सरकारी कर्मचारी,अधिकारी लोकनिक लेल आवास बनल अछि।बीचमे एकटा छोटसन मंदिरो अछि जाहिमे स्थानीय लोकसभ पूजा-पाठ करैत छथि।होलीडेहोमक सामनेमे  बड़ीटा मैदान अछि जकर चारूकात  घुमनाइ मोसकिल छल।बहुत रास लोकसभ प्रातःभ्रमण करैत देखा जाइत छलाह।ओना होलीडेहोममे ठहरल यात्री लोकनि भीतरेमे चक्कर लगबैत देखेलाह।हमहूँ बेसी काल सएह करी,कारण बाहर बहुत रास कुकुरसभ घुमैत रहैत छल । होलीडेहोमक चारूकात खाली जगहमे अनेक प्रकारक बृक्षसभ रोपल गेल अछि।केकटा रुद्राक्षक गाछ सेहो रोपल देखाएल।गाछक जड़ि लग बृक्षारोपन केनिहार व्यक्तिक नाम लिखल छल।

वाराणसीमे आइ हमरा लोकनिक दोसर दिन छल। नियत समयपर ठीक नओ बजे हमसभ तैयार भए गेल रही।तखनहि टैक्सीबला आबि गेल।हमसभ आइ बाबा विश्वनाथक दर्शन करब।माधवजी बीचमे कतहु भेटि जेताह।ओ अपन ठेकान नीकसँ टैक्सीबलाकेँ बता देने रहथिन। करीब दस मिनट चललाक बाद ओ स्थान आबि गेल। हम फटकीए सँ माधवजीकेँ कातमे ठाढ़ भेल देखि लेलिअनि। टैक्सीबलाकेँ सेहो  कनीको परेसानी नहि भेलैक। ओ टैक्सी कात लगा कए ठाढ़ केलक आ माधवजी आगूमे बैसि गेलाह।रस्तामे कैकटा प्रमुख स्थानसभ अबैत छल। तकर जनतब माधवजी दैत रहलथि। दस मिनट आर चललाक बाद हमसभ अपन गंतव्यपर पहुँचि गेल छलहुँ। मंदिरसँ फटकीए टैक्सी रोकि देल गेल।तकर बाद हमसभ एकटा एक्का ठीक केलहुँ। एक्का दू गोटेक सहयोगसँ चलैत छल।एकगोटे उपर बैसल छल आ दोसर बेर-कुबेर ओकरा पाछूसँ ठेलैत छल। ऊपर दिस चढ़ान रहैक। बीचमे पुलिस सेहो ठाढ़ रहए। ओकरा माधवजी किछु कहलखिन तखनहि एक्का आगू बढ़ि सकल,अन्यथा ओ ओतहि हमरासभकेँ उतारि दैत।एक्का संगे दौड़ि रहल दोसर व्यक्ति बहुत कम बयसक छल। ओ रहि-रहि कए मधुर स्वरमे एकटा गीत गबैत रहैत छल जे हमरा बहुत नीक लागल।गीतक अर्थ छल-

“जखन टाकाक महत्व बेसी हेतैक तखन आर की हेतैक?भाए-भाएक खून करतैक।”

हम ओकर गीतक भाव बूझि चकित छलहुँ ।ओ बच्चा बेर-बेर ओहि गीतकेँ दोहरबैत रहल। अंतमे,हम ओकरा बीस  टाका इनाम देलिऐक।एहि बातसँ ओ बहुत प्रसन्न भेल छल।

“शुक्रिया साहेब। फेर आएब।हमरा जरूर कहब।हमर मोबाइल नंबर लिखि लिअ।”

आब मंदिर सामने देखा रहल छल। हमसभ एक्कासँ उतरि गेलहुँ। कनीके फटकी मंदिरक सेवाकेन्द्र छल। ओहिठाम हमसभ भीआइपी दर्शन लेल टिकट कीनलहूँ आ दुनू गोटे पैरे-पैरे मंदिर दिस बिदा भेलहुँ।माधवजीकेँ संगे नहि जाए देलकनि,ने कोनो पंडितजी संगे गेलाह।असलमे हमसभ यदि कनी आर टाका खर्च कए जलाभिषेकक टिकट लेने रहितहुँ तखन पंडितोजी संगे चलितथि आ भीतरमे जा कए शिवलिंगपर जलाभिषको कए सकितहुँ। मुदा हमसभ एहि विकल्पक बारेमे बादमे बूझि सकलहुँ जखन कि सूचनापट्टपर सभबात नीकसँ लिखल रहैक। मुदा हम से नहि पढ़ि सकलहुँ आ माधवजी जे जे कहैत रहलाह तेना-तेना करैत रहलहुँ।बादमे अफसोच होअए जे अपनो माथ किएक ने लगओलहुँ।

हमसभ लोकसभसँ पुछि-पुछि मंदिरक भीतर सही जगहपर पहुँचि गेलहुँ।एहि परिसरमे मोबाइल रखबाक बहुत नीक ओरिआन अछि। ओतहि हम अपन मोबाइल जमा करओलहुँ।कनीके हटि कए पूजाक लेल प्रसाद लेलहुँ आ दर्शनक लेल भीआइपी लाइनमे लागि गेलहुँ। बहुत जल्दीए हमसभ शिवलिंगक ठीक सामने पहुँचि गेल रही। ओतए देबालक पाछू शिवलिंग स्पष्ट देखा रहल छलथि। केओ-केओ जलाभिषेक कए रहल छलाह।पंडितजी हुनकासभकेँ मंत्रोच्चार कए पूजाक विधान संपन्न करबा रहल छलाह।हमहूँसभ बहुत नीकसँ भगवान शिवक आराधना केलहुँ आ आगू बढ़ि गेलहुँ।

बाबा विश्वनाथक दर्शनक बाद हमसभ कनीके आगू गेल छलहुँ कि एकटा पंडितजी हमरासभकेँ घेरि लेलनि। तरह-तरहसँ बुझबैत रहलाह जे की की केलासँ हमरासभक पुण्य अर्जित भए सकैत अछि। कनीके फटकी एकटा पंडितजीसँ सेहो भेंट करेलथि।ओहो किछु दक्षिणा लेलथि। फेर हमसभ सामनेमे  नन्दीक दर्शन केलहुँ जकर ठीक सामनेमे ज्ञानवापी परिसर अछि आ ओतहि कहाँदनि असली शिवलिंग भेटल छथि जाहिपर कानूनी विवाद चलिए रहल अछि।हमसभ पाँतिमे ज्ञानवापीक देबालपर बनल मूर्तिकेँ दर्शन केलहुँ आ मोनमे अपार क्षोभक संग वापस भए गेलहुँ। बाहर पंडितजी ठाढ़ छलाह।हुनको किछु टाका देलिअनि,मोबाइल छोड़ओलहुँ आ तय मार्गसँ वापस बाहर निकलि गेलहुँ। ओतएसँ कनीकाल पैदल चलि हमसभ फेर सेवाकेन्द्रपर पहुँचि गेल रही। ओहिठाम माधवजी रहबे करथि।टैक्सीबला सेहो कनीके फटकी आबि गेलथि।आब हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ।

मंदिर परिसरक व्यवस्था

मंदिर परिसरक सुरक्षा व्यवस्था बहुत चाक-चौबंद अछि।जहिना लोक एहि दुनिआमे खाली हाथ अबैत अछि आ ओहिना चलि जाइत अछि सएह हाल ओहि मंदिरक अछि।मंदिरमे प्रवेशसुरक्षा व्यवस्थामे लागल कैकटा सिपाहीसभ त्रिपुंड केने देखेलाह।ठाम-ठाम महिला पुलिस सेहो लागल छलीह। मंदिर परिसरमे प्रवेश करबासँ पूर्व सभ किछु बाहरे रखबा लेल जाइत अछि। एकटा समय छल  जे मंदिरमे जाएब मोसकिल होइत छल कारण चारूकात अबैध निर्माण भेल छल। अतिशय कठिन गलीसँ जिलेबी जकाँ घुमि-घुमि बाबाक मंदिरमे लोक पहुँचैत छल। आब जा कए देखिऔक।मंदिरक भीतर आ बाहरक संपूर्ण परिदृश्ये बदलि गेल अछि।मंदिरक चारूकात पर्याप्त खाली स्थान अछि।मंदिर परसरमे लोककेँ अएबाक आ जएबाक लेल स्पष्ट व्यवस्था अछि।गंगाक घाटसँ सोझे मंदिर धरि बिना कोनो व्यवधानकेँ लोक आबि-जा सकैत छथि।गंगामे नहाउ,गंगाजल लिअ आ आबि कए बाबापर चढ़ाउ।

माधवजीक संगे गलीक रस्तासँ हमहूँसभ गंगक कात धरि पहुँचि गेल रही।मुदा गंगाक पानि बहुत घोरल-घारल छल।ओहिमे स्नान करबाक माने छल घर पहुँचि दोबारा स्नान करब जरूरी अन्यथा जेहो स्वच्छ रही से खराप भए जाएत।गंगाक पानि रहबे करैक तेहने।तथापि,हमसभ घाटपर बहुत नीचाँ धरि गेलहुँ।गंगामाताकेँ प्रणाम केलहुँ आ वापस भए गेलहुँ।गंगास्नान नहि कए सकलहुँ।फेर ओही गलीक बाटे माधवजी हमरासभकेँ वापस सड़कपर अनलनि।बीचेमे एकटा लस्सीक दोकानपर हमसभ लस्सी पीबि फरहर भेलहुँ।मंदिरक लगीचे भंडाराक ओरिआन छलैक।माधवजी ओकर आनन्द लेबए चाहैत छलाह।मुदासभ ताहि लेल उत्साहित नहि रही। पहिने घुमि ली तकर बाद देखल जेतैक-से सोचि हमसभ टैक्सीसँ सारनाथ दिस बढ़ि गेलहुँ।

सारनाथ

वाराणसीसँ नओ किलोमीटर उत्तरपूब कोनमे अवस्थित सारनाथमे भगवान बुद्ध पहिल बेर अपन शिष्यसभकेँ उपदेश देने रहथि।लुम्बिनी,बोधगया,कुशीनगरक आ सारनाथ बुद्धक अनुयायी लोकनिक लेल बहुत पवित्र तीर्थ मानल जाइत अछि। करीब आधाघंटाक बाद हमसभ सारनाथ पहुँचल रही। टेक्सी बाहरे द्वारिक पास रूकि गेल। तकर बाद हमसभ पैरे-पैरे सारनाथक प्रमुख स्थानसभ देखलहुँ।शुरूऐमे हमरा सभकेँ एकटा गाइड पछोर केलनि। ओ कमे बएसके रहथि आ हुनका ओहिठामक बारेमे कोनो विशेष ज्ञान नहि रहनि।तथापि,हमसभ हुनका उत्साहित करबाक उद्येश्यसँ राखि लेलहुँ। हमरासभकेँ ओ की बतबितथि,उल्टे हमहीसभ हुनका समय-समयपर किछु-किछु बतबैत रहलहुँ।हमसभ बेरा-बेरी संग्रहालय, थाई मंदिर, तिब्बती मंदिर, देखलहुँ। ओहि बच्चा गाइडक बहुत जोर रहैक जे हमसभ निकटवर्ती हथकरघाक दोकानपर चली।संभवतः ओकरा किछु कमीशन भेटितैक।आखिर हमसभ ओहि दोकानपर गेबो केलहुँ,मुदा हमरासभकेँ ओहिठाम कीनबाक योग्य किछु पसिंद नहि भेल। बाहर निकललाक बाद बच्चासभक लेल जरूर किछु खेलौना कीनलहुँ। तकर बाद हमसभ वापसी यात्रामे प्रेमचंदक गाम लमही दिस बिदा भए गेलहुँ।

 

लमही

थोड़बे कालमे हमसभ प्रेमचंदक गाम लमहीक ग्रामद्वारिमे प्रवेश कए रहल छलहुँ। द्वारिक दुनू कातमे बरदक   चित्र बनल अछि। गाममे कोनो तेहन विशेषता नहि बुझाएल। आने गामसभ जकाँ कोठाक घरसभ। प्रेमचंदक पुस्तैनी घर लग पहुँचलाक बाद हमसभ टेक्सीसँ उतरि गेलहुँ। दहिना दिस प्रेमचंदक नामपर बनल(मुंशी प्रेमचंद शोध एवं अध्ययन केन्द्र-लमही छल। बामा दिस प्रेमचंदक इनार छल जे आब झाँपि देल गेल छल। प्रेमचंदक पुस्तैनी मकानक देबालक पलस्तरसभ झड़ि रहल छल। ओकरा आब संग्रहालय बना देल गेल अछि।ओहिमे प्रेमचंदसँ जुड़ल अनेक प्रकारक वस्तुसभ राखल गेल अछि। हुनकर किछु किताबक पाण्डुलिपि सेहो राखल बुझाएल।किछु पुरान पत्रिका सेहो राखल छल। ओहिठामसँ कनीके फटकी सरकार द्वारा नवनिर्मिति भवन अछि। सामनेमे  कार्यालय सेहो बनल अछि जे ओहि दिन बंद छल। आसपास घुमलाक बाद हमसभ प्रेमचंदक पुस्तैनी घरक सामने बनल बैसकीपर बैसलहुँ, थोड़काल रुकलहुँ,फोटो घिचओलहुँ।लगपासमे केओ एहन नहि देखेलाह जिनकासँ प्रेमचंदसँ जुड़ल कोनो बातपर किछु चर्चा कए सकितहुँ।माधवजी किछु-किछु कहैत रहलाह।स्थानीय होएबाक कारण हुनका ओहिठामक बहुत किछु बूझल रहनि।आब किछु करबाक नहि छल। आखिर हमसभ ओहिठामसँ  बिदा भए गेलहुँ।कनीके फटकी प्रेमचंदक पोखरि सेहो देखाएल।पोखरि आब काजक नहि रहि गेल अछि। एतेक पैघ साहित्यकारक स्मृतिसँ जुड़ल हुनकर पैतृक घर आ आसपासक वस्तुक स्थिति देखि मोनमे बहुत दुख भेल।हमसभ आब वापस अपन डेरा दिस बढ़ि गेलहुँ।कैंटीनमे फोन कए देलिऐक जे हमसभ भोजन ओतहि करब।माधवजी सेहो हमरासभक संगे रहथि।हमसभ भोजन केलहुँ आ विश्राम लेल अपन कोठरी चलि गेलहुँ।

दुर्गाकुंड मंदिर

आइ वाराणसीमे हमरसभक तेसर दिन छल।हमसभ सभसँ पहिने प्रसिद्ध दुर्गाकुंड मंदिर गेलहुँ। असलमे पहिने दिन वापसी यात्रामे हमसभ एहि मंदिरक लगे सँ गेल रही।मुदा ओहिठाम पहुँचैत काल धरि बहुत थाकि गेल रही।साहस नहि भेल जे टेक्सीसँ उतरी।आइ सभसँ एहिने हमसभ एतहि पहुँचलहुँ।विलंबसँ अएबाक लेल मातासँ माफी मंगलहुँ। बहुत पवित्र स्थान अछि दुर्गाकुंड मंदिर।एकर स्थापना   अठारहम शताब्दीमे बंगालक महरानी भवानी करओने छलीह। कहल जाइत अछि जे एहिठाम माँ दुर्गा स्वयं प्रकट भेल रहथि। दुर्गा मन्दिरमे बाबा भैरवनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, हनुमानजी आ माता कालीक मन्दिरो सेहो अछि।मंदिरक सामने एकटा बहुत पैघ पोखरि अछि। पहिने ई कुंड गंगासँ जुड़ल छल। पोखरिक पानि बहुत निर्मल देखाएल।मंदिरमे भगवतीक दर्शन केलाक बाद आसपास घुमलहुँ,कनी काल मंदिर परिसरमे बैसलहुँ आ काशीनरेशक पैतृक महल देखबाक लेल बिदा भए गेलहुँ।

 

 

 

काशीनरेशक पैतृक महल(रामनगरक किला)

स्थानीय लोकमे एहन मान्यता अछि जे काशीक तीनटा राजा छथि। पहिल बाबा विश्वनाथ,दोसर काशी नरेश आ तेसर डोम राजा।काशी राज घरानाकेँ काशी एस्टेटक नामसँ जानल जाइत अछि। सन् ‍१७०० ई०मे स्वर्गीय मंसाराम एकर स्थापना केलनि।तखनसँ सन् ‍१९४७ धरि ई परंपरा चलैत रहल। सन् ‍१९४७मे स्वतंत्रताक बाद काशी नरेशकेँ महाराजा विभूति नारायण शिंह लिखवाक अनुमति देल गेल छल।सन् २००० ई० मे हुनकर मृत्युक बाद हुनकर पुत्र श्री अनन्त नारायण सिंह कुँवरक नामसँ जानल छथि। संप्रति ओएह ओहिठामक उत्तराधिकारी छथि। ओहिठामक राजपरिवारक स्थानीय जनतामे बहुत धाख छल।मुदा पारिवारिक कलहक कारण आब स्थिति बहुत बदलि गेल अछि।

हमसभ जखन रामनगर किलाक मुख्यद्वारिपर पहुँचलहुँ तखन ओकर मरम्मतिक काज चलि रहल छल। मुदा भीतर जएबाक अनुमति छल। अस्तु,हमसभ टिकट लए किलामे प्रवेश केलहुँ। महलक अधिकांश भागमे राज परिवारक पुरान वस्तुसभ प्रदर्शनीक लेल राखल अछि। तरह-तरहक पुरान मोटर,हथियार,वर्तन,राज-परिवारक सदस्य लोकनि द्वारा प्रयोग कएल गेल गृहस्थीक अन्य वस्तुसभ देखबामे आएल। ऊपरका महलमे सेहो थोड़ बहुत  राज-परिवारक स्मृतिशेष भेटल। मुदा कनीके आगू गेलाक बाद रस्ता बंद छल।हमसभ सीढ़ीसँ नीचाँ उतरि गेलहुँ। समयो आब समाप्त भए रहल छल। सुरक्षाप्रहरीसभ सीटी बजा-बजा कए लोकसभकेँ वापस जएबाक आग्रह कए रहल छल।हमहूँसभ जल्दी-जल्दी किछु फोटो घिचओलहुँ आ वापसी यात्राक लेल मुख्याद्वारिसँ बाहर निकलि गेलहुँ। बाहर समोसा,चाटक कैकटा दोकान छल। मुदा हमसभ वाराणसीक प्रसिद्ध चाटक दोकान दीना चाट भण्डारपर चाट खएबाक लेल आगू बढ़ि गेलहुँ। बहुत काल चललाक बाद ओहि चाटक दोकानपर पहुँचबो केलहुँ,मुदा ओ बंद छल। तकर बाद हमसभ काशी चाट भंडार ( जे बहुत प्रसिद्ध अछि) दिस बिदा भए गेलहुँ।साँझक समय  छल। रस्तामे भीड़ लागि रहल छल। टैक्सीबला चाहिओ कए बहुत तेजसँ टैक्सी नहि चला सकैत छल। आखिर जेना-तेना हमसभ ओहि चाटक दोकानपर पहुँचिए गेलहुँ। जल्दीसँ हमसभ चाटक दोकानपर  अपन पसिंदक चाटक आदेश देलिऐक। थोड़बे कालमे गरमा-गरम चाट आबि गेल। ओ सचमुचकेँ बहुत स्वादिष्ट छल।चाटक बाद गरमा-गरम गुलाब जामुन सेहो चललैक।हमसभ तकर बाद ओहिठामसँ निकलिए रहल छलहुँ कि बाहरमे कुल्फी देखाएल।सभगोटे कुल्फीक आनन्द सेहो लेलहुँ ।रस्तामे हमसभश्रीराम पान दोकानपर मीठका पान खेलहुँ।पान कि ओ तँ एक प्रकारक मधुरे छल।आब हमसभ बहुत आश्वस्त छलहुँ।रातिमे किछु खएबाक स्थितिमे नहि रही, तेँ फोनपर केंटीनमे भोजन नहि बनेबाक लेल कहि देलिऐक। आधा घंटाक बाद हमसभ होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ।

वाराणसीमे  चारिम दिन

आइ वाराणसीमे हमर सभक चारिम दिन छल। मोटामोटी जे स्थानसभ देखि सकैत छलहुँ,से देखलहुँ।किछु स्थान गंगामे बाढ़िक कारण नहि देखल जा सकल। कतहु-कतहु बहुत पैदल चलबाक रहैत।ताहू ठाम नहि जा सकलहुँ। मुदा आइ की करब?टैक्सी आबि चुकल छल।माधवजी सेहो हमरासभक प्रतीक्षा कए रहल छलाह।आखिर बिदा भेलहुँ।सभसँ पहिने लगीचेमे स्थित हथगरघा म्युजियम पहुँचलहुँ। ओहिठाम हमर श्रीमतीजी पसिंदक सारीसभ कीनलनि। ओतए कैकटा दोकानमे हस्तनिर्मित सामानसभ विक्रय लेल उपलब्ध छल। से सभ देखैत सुनैत हम सभ घंटा भरिक बाद ओहिठामसँ निकलि कबीर पंथक मुख्यालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम जएबाक लेल बहुत काल पैरे चलए पड़ल।रस्तामे गाय-महीषसभक गोबर भरल छल।आखिर हमसभ कबीरस्थानमे प्रवेश केलहुँ। ओहिठाम कबीरदाससँ जुड़ल बहुत रास वस्तुसभ राखल देखाएल। अनेक स्तंभसभपर कबीरदासक उपदेशसभ लिखल देखाएल।सामनेमे एकटा महंथजी बैसल छलाह। ओहिठाम गेलाक बाद एकटा महिला हमरासभक स्वागत केलनि आ ओतए भीतरमे बैसबाक आग्रह केलनि।मुदा हमरा ओहिठाम किछु आकर्षक नहि बुझाएल।ओहिठाम सफाइक अभाव छल।संगे बाहरसँ गोबरक गंध आबि रहल छल।हमसभ जल्दीए उबि गेलहुँ।आखिर थोड़ेकाल एमहर-ओमहर घुमलाक बाद हमसभ बाहर निकलि गेलहुँ।

भारतमाता मंदिर

बाबू शिव प्रसाद गुप्ता द्वारा सन् ‍१९१८सँ ‍१९२४क बीच सात वर्षमे निर्मित  भारतमाता मंदिरक उद्घाटन महात्मा गांधी द्वारा पन्द्रह अकटूबर सन् ‍१९३६ कए  कएल गेल छल। ई वनारस रेलवे टीसनसँ डेढ़ किलोमीटर आ काशी विश्वनाथ मंदिरसँ छओ किलोमीटर दूरीपर अवस्थित अछि।भारत माता मंदिरमे कोनो देवी-देवताक नहि, अपितु अखंड भारतमाताक चित्र बनाओल गेल अछि। एहिसँ भारतक लोककेँ देश प्रेम आ राष्ट्रीय एकताक प्रेरणा भेटैत अछि। हमसभ एहि मंदिरमे पहुँचि बहुत आनन्दित भेलहुँ। कैक बेर चारू कात घुमलहुँ।

श्री शिवाय भोजनालय

साँझमे डेरा लौटबासँ पहिने हमसभ श्री शिवाय भोजनालय पहुँचलहुँ। ओहिठाम भोजन करबाक योजना कए दिनसँ बनि रहल छल। हमसभ आइ तय केने रही जे वापसीमे ओतहि भोजन करबाक अछि।तेँ केंटीनमे  पहिनेसँ मना कए देने रहिऐक। हमसभ श्रीशिवा भोजनालयमे जखन गेलहुँ तँ ओ खालीए छल। असलमे हमसभ भोजनक समयसँ किछु पहिने पहुँचि गेल रही। तथापि,हमरासभकेँ नीकसँ स्वागत कएल गेल। देशक विभिन्न भागक प्रसिद्ध भोजनसभकेँ समायोजित करैत ओहिठामक थारी भोजन बहुत प्रसिद्ध अछि। अस्तु,हमसभ तीनूगोटे  ओहि भोजनक आनन्द लेलहुँ। बेरा-बेरी अलग-अलग प्रकारक भोजनसभ परसल जाइत छल।जे खाइ,जतेक खाइ। हमसभ कतेक खइतहुँ?यथासाध्य भोजन केलाक बाद हमसभ डेरा लेल बिदा भए गेलहुँ।

वापसी यात्रा

आइ हमर सभक वाराणसी यात्राक पाँचम दिन अछि।आइ किछु नहि करबाक अछि।हमरासभ आजुक दिन विश्रामक लेल रखने छी।हमरासभकेँ होलीडे होममे घरो बदलबाक अछि।एक दिनक लेल हमसभ भीआइपी कोठरीमे जा रहल छी ,कारण दोसर कोठरी उपलब्ध नहि छल। हमरासभ लग बहुत कम सामान अछि। कम सँ कम सामान लए यात्रापर जएबाक चाही।हमसभ सएह प्रयास केने रही। तथापि दूटा बाकस आर किछु सामानसभ रहबे करए।बेरा बेरी ओकरा हमसभ उठा-उठा कए नवका कोठरीमे लए गेलहुँ।हमसभ नवका कोठरीमे पहुँचि बेस खुस रही। बड़ीटा हाल,बेडरूम सेहो पैघ।संगमे आर तरहक सुविधासभ। आब की?थोड़े काल एसी खोलि कए आराम केलहुँ।अचानक ध्यान  आएल जे दाँत तँ छुटिए गेल। आहि रे बा!आब की करी?दाँत कतए रहि गेल?हमरा बेचेन देखि ओ कहलथि-

“किएक परेसान छी? अहाँ कोन दाँत लगबिते छी जे नहि रहलासँ बेचेन छी। यदि जरूरी बुझाएत तँ फेर बना लेब।”

हम की बजितहुँ?चुप रहि गेलहुँ। तकर बाद मोन भेल जे कनी पुरना कोठरीमे जा कए देखिऐक।पुरना कोठरी एक तल नीचाँ छल। ओहिठाम कनीके पहिने सफाइबलासभ काज केने छल। तथापि,सौंसे तकलहुँ।कतहु दाँत नहि देखाएल।ओ एकटा छोटसन डिब्बीमे राखल रहैत छल। एमहर-ओमहर सौंसे बौअएलहुँ। आखिर,वापस नवका कोठरीमे आबि गेलहुँ।टीभी देखबाक प्रयास केलहुँ।मुदा मोन नहि लागि रहल छल। फेर नीचाँ गेलहुँ। पुरना कोठरीक बगलमे कूड़ादान राखल छलैक।भेल जे देखिऐक।की पता एतहि दाँत राखि देल गेल होअए?कहबी छैक –

“मरता क्या नहीं करता।”

ओहि कूड़ादानमे हाथ देलहुँ।ऊपरसँ कनीके हटओलाक बाद ओ डिब्बी भेटि गेल। ओकर भीतरमे डिब्बीमे पानि आ पानिमे हमर दाँतसभ ओहिना देखा रहल छल। हम तुरंत ओहि डिब्बीकेँ बाहर केलहुँ। ओकरा नीकसँ अनेक बेर साबुनसँ साफ केलहुँ।फेर डिब्बी खोललहुँ।पानि हरा देलिऐक आ दाँतकेँ वारंबार साफ केलहुँ।आब दाँत ठीक बुझाएल। ओकरा लेने विजयी मुद्रामे कोठरी वापस पहुँचलहुँ।हमरा प्रसन्न देखि ओ बुझि गेलथि।

“भेटि गेल की?”

जबाबमे हम हँसि देलिअनि।

बेस कीमती दाँत भेटि गेलासँ हमसभ बहुत आश्वस्त रही।आइ किछु करबोक नहि रहए।कतहु जएबोक नहि रहए।ओतेकटा भीआइपी कोठरीमे दू गोटे ।दिन-भरिक विश्रामक बाद हमसभ कल्हुका यात्राक ओरिआनमे लागि गेलहुँ।हमरासभकेँ वापसीमे विंध्याचल भगवतीकेँ दर्शन करैत प्रयागराज जएबाक छल। अस्तु,हमसभ ओही टैक्सीबलाकेँ ठीक केलहुँ।ओ हमरासभकेँ काल्हि  भोरे सात बजे प्रयागराज लए जेताह।हमसभ  ताही हिसाबसँ तैयारी केलहुँ।भोरे सात बजे टैक्सी आबि गेल छल।होलिडेहोमसँ काल्हिए फारकती भेटि गेल छल। हमसभ अपन सामानसभ टैक्सीमे रखलहुँ ,कोठरीक कुंजी स्वागतीकेँ दए देलिऐक आ टैक्सीमे आगूक यात्राक लेल बैसि गेलहुँ।

कनीकालक बाद एकटा नीक ढाबापर हमसभ चाह पीलहुँ।चाहक चुस्कीक संग हमसभ अपन वाराणसी यात्राक स्मरण करैत रहलहुँ।

“केहन रहल अपनसभक ई यात्रा?”

“अद्भुत। बहुत आनन्ददायी।”

“वाराणसीमे  की सभसँ नीक लागल?”

“ओना तँ बहुत रास नीक-नीक स्थानसभ देखलहुँ,मुदा बाबा विश्वनाथमंदिरक व्यवस्था बहुत प्रशंसनीय छल। बाबाक दर्शन बहुत बढ़िआँसँ भए सकल।”

आब चाह खतम छल।हमसभ फेर टैक्सीमे बैसि गेलहुँ , बिदा भए गेलहुँ ,,,।बहुत किछु देखलहुँ,बहुत किछु नहिओ देखि सकलहुँ।मुदा हमरसभक मोनपर कुलमिला कए एहि यात्राक बड़ नीक प्रभाव पड़ल।हमसभ बादोमे एहि यात्राक प्रसंगसभपर कैक दिन धरि आपसमे चर्चा करैत रहलहुँ।

रबीन्द्र नारायण मिश्र

‍१८।१२।२०२५

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 13 जून 2025

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्‍ठत: सशरं धनु:


पटना यात्रा

गाममे बनि  रहल  घरक छत  ढलाइ  छओ मार्चक संपन्न भेल। एहिमे सभक सहयोग रहल।जिनका-जिनका बजओलिअनि(मात्र नारायणजी छोड़ि)  सभ गोटे बेरा-बेरी अएलाह आ हमर उत्साहवर्धन केलनि। हमसभ बड़ी काल धरि आपसमे बतिआइत रहलहुँ। सौंसे दरबाजा भवन निर्माणक सामग्रीसँ भरल छल। दरबाजापर ढ़लाइ मसीन से लागल छल। मसीनक लेल बीच-बीचमे पानिक दिक्कति से भए गेल छलैक। तकर जोगार मिस्त्रीसभकेँ किछु टाका दए कएल गेल।ओ सभ दोसर चापाकलसँ पानि आनि-आनि मसीनमे ढारैत रहल। आखिर चारि बजैत-बजैत छतक ढलाइ भए गेल।मकानक छत ढलाइ भए जाएब माने मकान बनि जाएब। हमर कैकटा इष्ट-मित्रसभ एहि सुअवसरपर हमरा बधाइ देलनि। खास कए कमलाकान्तजीक अनुरागक की वर्णन कएल जाए? ओ हमरा निरंतर उत्साहित करैत रहलाह,बीच-बीचमे कैक बेर निर्माणाधीन मकान देखबाक लेल अबितो रहलाह।संगे ईहो आश्वासन देलाह जे यदि कोनो प्रकारक परेसानी होअए तँ कहब।मुदा से सभ किछु नहि भेल। समयसँ सभ काज आगू बढ़ैत रहल। आखिर छतो बनि गेल।आब कम सँ कम बाइस दिन सटरिंग लागल रहत।बाँससभ ओहिना ठाढ़ रहत। तकर बादे मकानक भीतर काज होएत। ऊपरी छतपर दस दिनक बाद काज भए सकैत अछि। अस्तु,तय भेल जे अठ्ठारह मार्च २०२५ कए प्रथम तलक काज शुरू होएत।नीचाँ बाँस लागले रहत,सटरिंग नहि खुजत।तखन हमसभ की करब?पन्द्रह दिनक लेल दिल्ली वापस चलि जाइ?मुदा एहिमे दिक्कति ई बुझाएल जे मधुबनीक व्यवस्था गड़बड़ा  सकैत छल।फेर दिल्ली आएब-जाएब कोनो आसान काज तँ अछि नहि, परेसानी आ खर्चा दुनू। तेँ निर्णय केलहुँ जे हमसभ पाँच दिन लेल पटना चली। ओहि ठाम रहबाक लेल केन्द्र सरकारक होली डे होममे जगह पहिने आरक्षित करा लेने रही, रेलक टिकट सेहो लए लेने रही। तखन चिंता कथीक?

दस मार्च २०२५क भोरे पाँच बाजि कए पचास मिनटपर मधुबनी टीसनसँ पटना जाए बला इन्टर सीटी एक्सप्रेस पकड़बाक छल। ताहि लेल एकटा आटोक जोगार लाल(बढ़इ)क मारफत करओने रही।एक दिन पहिनेसँ जोगार भेल छल तेँ कोनो चिंता करबाक प्रयोजन नहि छल।तथापि,भोरे हम लालकेँ फोन केलिअनि,मुदा ओ सुतले रहथि। थोड़े कालक बाद फेर हुनका फोन केलिअनि।तखन ओ फोन उठओलथि।  कहलाह-

“चचा। ओकर आटोमे तँ बैट्रीके गड़बड़ा गेलैक अछि। ओ स्टार्टे नहि भए रहल छैक।”

“आब की हेतैक?”

“की कहू चचा?हम तँ अपने बहुत अफसोचमे छी।”

“कोनो रस्ता निकालू जाहिसँ ट्रेन पकड़ा जाए।”

“चिंता नहि करू। हम अपने आबि रहल छी।”

मुदा हमर चिंता तँ बढ़ले जा रहल छल। हम आस-पास कैक गोटेसँ संपर्क केलहुँ। मुदा समाधान किछु फुरा नहि रहल छल। ओना मधुबनी टीसन छैक लगे,हमर डेरासँ पैरो पन्द्रह मिनटमे लोक जा सकैत अछि। मुदा हमरा सभकेँ तँ दूटा मोटा रहए। हम एही चिंतामे रही कि लाल साइकिल लेने धराधर पहुँचि गेल।एहि तरहेँ लालकेँ साइकिलपर अबैत देखि हमरा लोकनिकेँ जे प्रसन्नता भेल से कहि नहि सकैत छी।कारण आब ई मोनमे विश्वास भए गेल जे ट्रेन पकड़ा जाएत। हमसभ हुनके  साइकिलपर दुनू सामानक मोटा राखि देलिऐक । लाल दुनू मोटा लदने साइकिल गुरड़कओने चलि रहल छलाह। संगे-संगे हमसभ पैरे-पैरे चलि रहल छलहुँ। हमर श्रीमतीजीकेँ तेजीसँ चलबामे दिक्कति भए रहल छलनि।हमसभ हुनकासँ आगू बढ़ि जाइत छलहुँ,फेर कनी काल थमकि जाइत छलहुँ।जेना-तेना हमसभ थाना मोर लग पहुँचलहुँ। ओहि ठाम एकटा रिक्सा बला अबैत देखाएल। रिक्सा बलाकेँ देखि हमरा जानमे-जान आबि गेल। ओकरा आग्रह केलिऐक जे हमरा सभकेँ टीसन पहुँचा दिअए। ओ मानि गेल। हमसभ रिक्सापर बैसलहुँ । लाल संगे-संगे साइकिलसँ सामान लदने बिदा भेल। थोड़बे कालमे हमसभ टीसनपर पहुँचि गेल रही। ओतए लालक लेल प्लेटफार्म टिकट लेलहुँ।ओतहि पता लागल जे  ट्रेन विलंबसँ चलि रहल छलैक। हमसभ अपन सामानसभकेँ प्लेटफार्मपर राखि लेलहुँ आ एकटा खाली कुर्सीपर हुनका बैसा देलिअनि।हम अपने ठाढ़े छलहुँ कि केओ दहिना दिससँ टोकलथि-

“अहाँ रबीन्द्र नारायण मिश्रजी छी की?”

“सही चिन्हलहुँ।”

“हम छी केसकर ठाकुर।हमरा लागि रहल छल जे अपनहि छी।तथापि,अपनेक श्रीमतीजीसँ पुछलिअनि। ओ जखन से पुष्टि केलनि तखन अपनेकेँ टोकलहुँ।”

केसकर ठाकुरजीसँ फोनपर कैक बेर गप्प भेल छल, मुदा भेंट नहि छल। से आइ अचानक मधुबनी टीसनपर भए गेल। दू दिन पहिनहि हुनका साहित्य अकादमीक अनुवाद पुरस्कार देबाक घोषणा भेल छल। हम हुनका सद्यः बधाइ देलिअनि। कहलथि जे दू दिनसँ फोन सुनैत-सुनैत थाकि गेल छी। तकर बाद आर-आर गप्प-सप्प होइत रहल। ओ अपन पुत्रकेँ ट्रेन चढ़बए आएल रहथि। जाड़क भोर छलैक। चारू कात धुंध लागल छलैक।केसकरजी सेहो  ओढ़नासँ अपन माथ झपने रहथि।

लगभग एक घंटाक बाद ट्रेन आएल। लाल हमरासभकेँ ट्रेनमे चढ़ा देलाह, सामानसभ राखि देलनि। हमसभ आब अपन सीटपर सुभ्यस्त छलहुँ।ट्रेन सीटी देलक आ आगू बढ़ि गेल।ट्रेन खुजिते अपन गति पकड़ि लेलक।हमसभ खिड़की बाटे पण्डौल टीसन ताकि रहल छलहुँ। आखिर पण्डौल हमर सासुर थिक ने। मुदा ट्रेन कखन पण्डौलसँ आगू बढ़ि गेल से नहि बुझि सकलिऐक। सकड़ी अएलापर ट्रेन रुकल। किछु यात्रीसभ ओहिमे चढ़लाह। फेर ट्रेन आगू बढ़ि गेल। तकर बाद दरभंगा,लहेरिआसराय होइत ट्रेन समस्तीपुर पहुँचल। यात्रीसभ कहलनि जे एहिठाम ट्रेनक इंजन बदलल जेतैक। तेँ एतए आधाघंटा रुकतैक। हमसभ भुखले रही। ट्रेनमे किछु सुलभ नहि छल। एकटा सहयात्रीक संगे जलखैक जोगारमे बाहर निकललहुँ। मुदा ओतेक भोरे प्लेटफार्मो जेना सुतल छल। किछु उपलब्ध नहि बुझाएल।तकैत-तखेत हम सभ रेलवे कैंटीन लग पहुँचलहुँ। ओ सभ अपन दोकान खोलिए रहल छलाह। कुर्सीसभ यत्र-तत्र छिड़िआएल छल। सफाइ कर्मचारी पोछा लगा रहल छल। हमसभ ओहने मे दोकानक भीतर गेलहुँ आ  मनेजरकेँ पुछलिऐक-

“किछु जलखै भेटि सकैत अछि की?”

“पराठा भेटि जाएत,मुदा किछु समय लागत।”

“ट्रेन ने छुटि जाए।”

“नहि छुटत।अखन एकर टाइम छैक।”

चारि टा पराठा हम  आ ओतबे पराठा सहयात्री बनेबाक लेल कहलिऐक। थोड़े काल ओहीठाम जेना-तेना प्रतीक्षा केलहुँ। बीच-बीचमे ट्रेनोक चिंता होअए।आखिर जलखै बनि गेल। हमसभ आवश्यक भूगतान कए देलिऐक।जलखै सरिआ कए राखि लेलहुँ ।ताबे ट्रेन सीटी देबए लागल छल। हम दुनू गोटे प्लेटफार्मपर  दौड़ए लगलहुँ। सहयात्री हमरा दौड़ैत देखि पुछलाह-

“बाबा अहाँक कतेक बएस अछि?”

“अहाँक दोबर।”

“एतेक बएसमे गजबके ऊर्जा अछि अहाँमे।”-ओ हँसैत बजलाह।

हमरो हुनकर बात सुनि कए हँसी लागि गेल। हमसभ आखिर ट्रेनमे पैसि गेलहुँ। अपन-अपन सीटोपर पहुँचि गेलहुँ। तकर बादे ट्रेन आगू ससरल।आब हम दुनू बेकती जलखै केलहुँ।संयोगसँ चाहो आबि गेल। सेहो पीलहुँ।ट्रेन अपन गतिसँ चलैत रहल। जखन ट्रेन मुजफ्फरपुर पहुँचए बला रहए तखन हम अपन मित्र आदरणीय श्री मदन मोहन सिन्हाजी मोन पड़लथि।हम हुनका फोन लगओलहुँ।ओ एहि बातसँ बहुत प्रसन्न भेलाह जे हमसभ मुजफ्फरपुर पहुँचि रहल छी। साइत हुनकर गामो जाइ। ओहिठामसँ हुनकर गाम जेबाक लेल टेकर भेटि जाइत छैक। से सभ जानकारी ओ देलनि। मुदा हमरा तँ पटना जेबाक छल। तखन वापसीमे संभव भेलापर हुनकार गाम होइते वापस जेबाक गप्प भेलैक। मुदा से संभव भेलैक नहि। कारण पन्द्रह मार्च  कए पटनासँ मधुबनी वापसीक दिन कैक ठाम फगुआ मनाओल जा रहल छल। असलमे एहू साल  फगुआ दू-दिना भए गेल छल। गामसभमे पन्द्रह मार्च कए फगुआ मनाओल गेल,जखन कि सहरी क्षेत्रमे चौदहे मार्च कए।

करीब डेढ़ बजे हमसभ पटनाक पाटलिपुत्र टीसन पहुँचलहुँ।ओना हमरासभकेँ पटना टीसन उतरबाक छल। मुदा एकटा सहयात्री कहलनि जे हमरसभक पटनाक गंतव्य(केन्द्र सरकारक होली डे होम) पाटलिपुत्र टीसनसँ लगीच अछि। तखन हमसभ ओतहि उतरबाक योजना बनओलहुँ। बीचमे ट्रेन खूब गतिसँ चलल छल।तेँ हमसभ पाटलिपुत्र टीसनपर निर्धारित समयसँ किछु पहिने पहुँचि गेल रही। ओतए ट्रेनसँ उतरलाक बाद कूली भेटबे नहि करए। सामान भारी छल। ओकरा असगरे उघने प्लेटफार्मपर आगू चलब बहुत मोसकिल भए रहल छल। आखिर,दुनूगोटे सामानकेँ दुनू दिससँ पकड़लहुँ। बहुत मोसकिलसँ जेना-तेना सामान लदने हमसभ टीसनसँ बाहर भेलहुँ। ओहूठाम ओला,उबेरक टैक्सी भेटबामे दिक्कति भए रहल छल। आखिर, एकटा आटो ठीक भेल। थोड़बे कालमे हमसभ आटोसँ होलीडे होम पहुँचि गेलहुँ। ओहि ठाम पहुँचि गेलाक बाद तँ समस्या खतम छल। सभ किछु देखल-सुनल बुझाएल। हमसभ अपन कोठरीमे सामान सहित पहुँचा देल गेलहुँ।डेरा अबैत-अबैत हमसभ बहुत थाकि गेल रही। अस्तु,सोचलहुँ जे सभ किछु बिसरि पहिने थोड़े काल विश्राम कएल जाए।

हमरासभकेँ पाँच दिन माने चौदह मार्च धरि पटनामे रहबाक छल।पन्द्रह मार्च कए भोरे फेर इन्टरसीटी एक्सप्रेससँ मधुबनी वापस जेबाक कार्यक्रम पहिनेसँ तय छल।पटना स्थित  होलीडे होममे दस मार्च २०२५क पहुँचलाक बाद हमसभ दिनमे विश्राम केलहुँ। साँझमे  टैक्सीसँ पटनाक प्रसिद्ध महावीर मंदिर गेलहुँ। ओहिठामसँ हमसभ गंगा नदीक काते-काते बनल रिभरफ्रांट लग एकपाँतिसँ बनल दोकानसभ देखलहुँ। आइ ओहि ठाम बेसी भीड़ नहि छल। प्रायः फगुआ लगीच होएबाक कारण लोकसभ अपन-अपन घर चलि गेल छल। तथापि किछु लोकसभ ओहि ठाम घुमि-फिरि रहल छलाह, चाह-जलखै कए रहल छलाह। हमसभ टैक्सीसँ एहि पारसँ ओहि पार धरि देखि गेलहुँ। रातिक आठ बाजि रहल छलैक। चारू कात अन्हार भए गेल रहैक। गंगाक कछार आब देखल नहि जा रहल छल।अस्तु,हमसभ बिना बेसी देरी केने ओहि ठामसँ डेरा वापस बिदा भए गेलहुँ।

 

 

 

राजगीर,नालंदाक यात्रा

 

पटनाक प्रसिद्ध महाबीर स्थान जेबाक लेल हमसभ ओलापर टैक्सी बुक करओने रही। टैक्सी बला बहुत नीक लोक छल। ओ हमरासभकेँ बहुत नीकसँ महाबीर मंदिरमे दर्शन करा देलक ,संगे अपनहु दर्शन केलक।गंगाक कातमे बनल रिभर फ्रान्ट सेहो घुमा देलक। हमरासभकेँ राजगीर,नालंदा जेबाक इच्छा रहए। हम ओकरेसँ पुछलिऐक-

“अहाँ हमरासभकेँ राजगीर,नालंदा घुमा देब?”

“किएक ने घुमा देब।हमर तँ ई नित्यक काज अछि।कहिआ जेबै?”

“काल्हि चली,परसु चली।”

“कतेक टाका लगतैक?”

“पैंतालीस सए।”

“ठीक छैक।हमसभ आपसमे विचार करैत छी आ डेरा पहुँचलाक बाद सूचित करैत छी।”

हमसभ डेरा पहुँचैत छी। तकर  बाद कनी काल सुस्ताइत छी। फेर आपसमे चर्चा करैत छी। असलमे एतेक दूर यात्रा टैक्सीसँ करबामे हमरा चिंता होमए लगैत अछि। मुदा ई आसान आ सुलभो अछि। हुनका राजगीर,नालंदा जेबाक बहुत मोन छलनि। अस्तु,हम टैक्सी बलाकेँ फोन लगबैत छी-

“हेलो! हम मिश्राजी बाजि रहल छी।”

“हँ,हँ कहियौ।”

“हमसभ काल्हि जेबैक राजगीर,नालंदा।”

“कै बजे चलबै?”

“सात बजे बिदा भए जेबैक।”

“ठीक छै।”

भोरे सात बजिते हमसभ तैयार भए अपन कोठरीसँ बाहर निकलले छलहुँ कि टैक्सी बलाक फोन आबि गेल। ओ कहलक जे कारमे तेल भरा रहल अछि आ ओ जल्दीए पहुँचत । पाँच मिनटक बाद ओ हमरासभ लग सचमुचकेँ पहुँचि गेल। हमसभ तुरंत टैक्सीमे सबार भए गेलहुँ आ  बिदा भेलहुँ नालंदा,राजगीरक यात्रापर।

आइ यात्रापर निकलबासँ पूर्व हमसभ भोरुका चाह नहि पीबि सकल रही।मंगल दिन रहबाक कारण उपास से छल।तेँ जलखै करबाक तँ चिंते नहि रहए। चाहक उचाट जरूर लागल छल। बीचमे कैक ठाम चाहक दोकानसभ देखेबो कएल।मुदा टैक्सी बलाक इच्छा रहैक हमरासभकेँ तंदुरी चाह पिएबाक। ओ तंदुरी चाहक बहुत प्रशंसा करैत छल। हमहूँसभ तंदुरी चाह पीबाक लेल बहुत उत्सुक रही। अखन धरि तंदुरी रोटी तँ सुनने रहियैक,मुदा तंदुरी चाह तँ पहिल बेर सुनि रहल छलहुँ।देखा चाही जे तंदुरी चाह अछि केहन?अस्तु,हमसभ बाट तकैत रहलहुँ तंदुरी चाहक। बीच-बीचमे उत्सुकतावश टैक्सी बलासँ ओकर विशिष्टताक कारण पुछबो करिऐक। ओ कहैत-

“कनीके काल ठहरू। पीबैक तखन अपने गुण गेबै।”

ओकरा से कहैत सुनि हमसभ चाह पीबाक लेल  आर बेकल भए गेलहुँ, उचकि-उचकि कए बाहर देखि रहल छलहुँ। जे कोनो दोकान देखाइत से ओएह बुझाइत। हम टैक्सी बलासँ से पुछितिऐक आ ओ हँसि दैत।कार तेज गतिसँ चलैत रहल। बीचमे एकटा भगवतीक स्थान आएल। ओहि इलाकामे ओ बहुत प्रसिद्ध भगवती छथिन। हमहूँसभ हुनकर दर्शनक लेल टैक्सीसँ उतरि गेलहुँ। मंदिर परिसरमे भगवतीक दर्शनक लेल बहुत रास लोकसभ जमा भेल रहथि। भगवतीक आरती चलि रहल छल। लोकसभ प्रसाद कीनि रहल छलाह। हमहूँसभ प्रसाद चढ़ओलहुँ ,पूजा केलहुँ आ बिदा भए गेलहुँ। करीब दस मिनट चललाक बाद टैक्सीबला बाजि उठल-

“उतरैत जाउ।आबि गेल तंदुरी चाहक दोकान।”

हम बहुत प्रसन्न रही जे आखिर चाहक जोगार भल,सेहो तंदुरी चाह । हमसभ बड़ी कालसँ चाहक प्रतीक्षा कए रहल छलहुँ। हम पाँचटा तंदुरी चाहक आदेश देलिऐक।से सुनि टैक्सी बला बाजल-

“पाँचटा?

“दू-दूटा हम दुनू बेकती पीबैक आ एकटा अहाँक लेल।”

से सुनि टैक्सी बला हँसि देलक।हम बहुत उत्सुकतासँ तंदुरी चाहकेँ बनैत देखैत रहलहुँ।माटिक वर्तनमे पानिकेँ तंदुरीपर गरमाओल गेल। पुरना समयमे कोहामे भानस होइत देखने रहिऐक। ओहिना चाहकेँ माटिक वर्तनमे बरकैत देखलहुँ।माटिक दोसर वर्तनमे दूध गरम भए रहल छल।दूध की छल जेना खोआ रहल होअए। ओहिपर छाल्हीक बेस मोट पपरी पड़ल छल।चाह पीबासँ बेसी चाह बनबाक आनन्द भए रहल छल।थोड़बे कालमे माटिक कुल्हरमे तंदुरपर बनल चाह आबि गेल। हमसभ दू-दू बेर ओ चाह पीलहुँ। ओ चाह सचमुचकेँ बहुत स्वादिष्ट छल।पता लागल जे ओही दोकानपर शुद्ध घी  आ खोआक पेरा सेहो भेटैत अछि। हमसभ ओहिठामसँ घी आ पेरा सेहो कीनलहुँ।चाह पीबिए लेने रही। आब हमरसभक मोन ऊर्जासँ भरि गेल छल। हमसभ द्विगुणित उत्साहसँ टैक्सीसँ नालंदा बिदा भेलहुँ।

पटनासँ नालंदक बीच सड़क गजबकेँ अछि। लगिते नहि अछि जे ई अपना ओहिठामक सड़क अछि। नालंदा मुख्यमंत्रीजीक गृह जिला छनि।तेँ एहि ठाम बेसी ध्यान देल जाइत अछि।से कहब छलैक टैक्सी बलाक। थोड़बे कालमे नालंदाक जिला अस्पतालक विशाल भवन देखबामे आएल। कहाँ दनि एम्स जकाँ एतहु चिकित्साक व्यवस्था कएल गेल अछि। से जानि प्रसन्नता भेल।मोनमे ईहो भेल जे किएक ने मधुबनीओमे एहन अस्पताल बनि सकैत अछि? साइत ओहन दमदार राजनेता अपना ओहिठामक नहि होथि,किंवा हुनका मधुबनीक प्रतिए से लगाओ नहि होनि।जे से। मुदा मधुबनीक आसपास चिकित्सा सुविधाक जे हाल अछि से कहबाक प्रयोजन नहि ।लोकसभ जान बँचेबाक लेल पटना,दिल्ली भागि जाइत अछि, खेत-पथार बेचि लैत अछि।ओना दरभंगामे एम्स खुलबाक सुरसार चलि रहल अछि। यदि से संभव भेल तँ संभवतः स्थानीय लोकसभकेँ किछु उसास होनि।

आब हमसभ राजगीरसँ कनीके फटकी छलहुँ कि सड़कक काते-काते छोट=छोट खाजाक सैकड़ों दोकानसभ देखाएल।हम आइ धरि एक ठाम एतेक खाजाक दोकान नहि देखने रहिऐक। ओना सिलावक खाजा नामी अछि। एकटा दोकानपर लिखल छल जे ओकरा खाजाक लेल अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार  भेटल छल। हमसभ खाजा देखि मोहित भए गेल रही आ निर्णय केलहुँ जे वापसीमे खाजा कीनब।

 टैक्सी बिना रुकने चलैत रहल। आब हमसभ आब राजगीर पहुँचि गेल रही। राजगीरक गरम झरनासभ जगप्रसिद्ध अछि। एहिठामक ब्रह्मकुंडमे स्नान बहुत फलदायी मानल जाइत  अछि। अस्तु,हमसभ सभसँ पहिने एतहि पहुँचलहुँ। ओना पहिनेसँ हमरा एहि ठाम स्नान करबाक निआर नहि छल, तेँ बेसी कपड़ा नहि अनने रही। मुदा हमर श्रीमतीजी तँ पूरा तैयारी केने रहथि। ओहिठाम पहुँचलाक बाद हमरो नहि रहल गेल। सभकेँ स्नान करैत देखि हमहूँ ओही पाँतिमे लागि गेलहुँ।यद्यपि थोड़बे दिन पहिने ब्रह्मकुण्डक  विकास काज कएल गेल रहैक,मुदा ओहि ठाम स्नानक भारी कुव्यवस्था देखबामे आएल। पुरुष आ स्त्रीगण एक्के ठाम स्नान करबाक लेल उपरौंझ  करैत देखेलाह। सातटा कूपकेँ पाइपसँ जोड़ल गेल अछि।सभमे सँ गरम पानि निकलैत अछि।सभमे बेरा-बेरी स्नान करब जरूरी अछि।सभक अपन-अपन महत्व छैक। तकर बाद ब्रह्मकुण्डमे कुदि जाउ आ खूब गरम पानिमे नहाउ। ओहिठाम स्नान कए रहल महिला लोकनिक दुर्दशाक वर्णन करब मोसकिल अछि,उचितो नहि अछि।अफसोचक बात अछि जे स्थानीय प्रशासन आ ओहिठामक प्रबंधक लोकनिक ध्यान एहि समस्यापर  किएक नहि गेलनि अछि। ब्रह्मकुण्ड तँ तइओ कनी फैल छैक ,महिला-पुरुष कनी-मनी फराक भए जाइत छथि।मुदा स्थिति बहुत नीक तँ नहिए कहल जा सकैत अछि। एतबा नीक बात अछि जे महिला लोकनिक लेल एकटा कोठरी अलगसँ अछि जाहिमे ओ सभ स्नानक बाद  अपन वस्त्र पहरि सकैत छथि।पुरुष लोकनिक लेल तँ किछु नहि अछि। लोकसभ भिजल-तितल जेना-तेना ओहि कुण्डसँ बहराइत छलाह आ कहुना कए अपन वस्त्र पहिरि बाहर चलि जाइत छलाह।हमहूँसभ स्नानक बाद ओहिठामसँ बाहर भेलहुँ । फोटो खिचेलहुँ। तकर बाद कनीके फटकी बनल गुरुद्वारा  शीतल कुण्ड दिस बिदा भेलहुँ।

गुरुद्वारा  शीतल कुण्डक खिस्सा बहुत रोचक अछि। कहल जाइत अछि जे आसपासमे गरम पानिक कुण्डसभ भरल छल। सभ ठाम गरम पानिए निकलैत छल। एहिसँ ओहि ठाम आगन्तुक लोकनिकेँ बहुत दिक्कति होइत छलनि। एक बेर गुरु नानक ओहि ठाम पहुँचलाह। हुनकासभ गोहार केलकनि आ निवेदन केलकनि जे ओ शीतल जलक ओरिआन करथि। तकर बाद ओ अपन प्रभावसँ ओहि ठाम शीतल जलक झरना आनि देलनि। अखनहु ओ कुंड अछिए जाहिमे भक्त लोकनि श्रद्धापुर्वक शीतल जलक पान करैत छथि।हम सभ ओहि परिसरमे प्रवेश करितहि रूमालसँ माथ झाँपि लेलहुँ। तकर बाद गुरुद्वारामे दर्शन केलहुँ आ शीतल कुण्डमे जल पीलहुँ।किछु काल ओहि परिसरमे  विश्राम केलहुँ। ओ संपूर्ण परिसर बहुत स्वच्छ छल। कतबो काल बैसल रहू,मोन नहि भरत। मुदा हमरासभकेँ तँ आनो ठाम जेबाक छल। अस्तु,ओहिठामसँ बाहर निकललहुँ। बाहरो सँ ओ परिसर देखबामे बहुत नीक लागि रहल छल।हमसभ ओकर कैकटा फोटो खिचलहुँ आ अपन मित्र लोकनिकेँ ह्वात्सपपर पठेलिअनि।

राजगीर आ नालंदामे देखबाक,घुमबाक लेल बहुत स्थान छैक।एक्के दिनमे सभठाम घुमब संभव नहि छैक।हमरासभकेँ ओही दिन साँझमे पटना लौटि जेबाक रहए।दिन भरिमे जतेक घुमि ली। हमर श्रीमतीजीकेँ चलबामे किछु परेसानी छनि। मंगलदिन हेबाक कारण हमरासभकेँ उपासो रहए। तखन सुविधापूर्वक जतबे पार लागत से घुमि लेब।सएह सोचि हमसभ मुख्य-मुख्य चीज देखबाक प्रयास केलहुँ। राजगीरमे ब्रह्मकुण्डमे स्नानक बाद हमरा लोकनि नालंदा विश्वविद्यालयक परिसरक मुख्यद्वारिपर पहुँचलहुँ। मुदा भीतेर जेबाक अनुमति नहि भेटल। ओहि ठाम कार्यरत सुरक्षाप्रहरीसभ कहलक जे भीतर जेबाक लेल आनलाइन अनुमति पहिनेसँ लेबाक होइत छैक। तखन की कएल जाइत?हमसभ बाहरेसँ उचकि-उचकि कए किछु-किछु देखबाक प्रयास कएलहुँ। मुदा ओनामे की देखाइत।आखिर आखिर हमसभ पुरना नालंदा बिदा भेलहुँ।

पुरनका नालंदा पहुँचलाक बाद हमसभ  टैक्सीसँ आगू नहि जा सकैत छलहुँ। तेँ टैक्सीकेँ पार्कींगमे राखि एकटा आटो ठीक केलहुँ जे हमरासभकेँ ओहि ठामक प्रमुख स्थानसभ घुमा देत।हम दुनू बेकती आ टैक्सी बला ओहि आटोपर बैसलहुँ।आटो बला प्रशिक्षित छल। ओकरा नालंदाक प्रमुख स्थानसभक इतिहासक जनतब छलैक। मुदा बेसी काल ओ अपना लग बैसल टैक्सी बलासँ गप्प करैत रहैत छल।

आटो बला हमरासभकेँ सभसँ पहिने कारी बुद्धक मंदिरमे लए गेल। ओहि ठाम सएसँ बेसीए विदेशी बुद्ध भिक्षुकसभ पूजा-पाठमे लागल छलाह।हमहूँसभ ओहि ठाम थोड़े काल बैसलहुँ। भगवान बुद्धकेँ प्रणाम केलहुँ। सामनेमे तरह-तरहक बुद्धक प्रतिमासभ बिका रहल छल। से सभ देखैत-सुनैत हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ।आब हमसभ ह्वेनत्सांग स्मारक भवनमे पहुँचलहुँ। ह्वेन त्सांग  चीनक यात्री छलाह। ओ पन्द्रह वर्ष धरि भारतमे रहलथि। एहि अवधिमे ओ नालंदामे पहिने विद्यार्थी ,फेर शिक्षकक रूपमे काज केलथि।हुनके स्मृतिमे एहि म्युजियमक निर्माण कएल गेल अछि। एकर निर्माण सन् १९६०ई०मे शुरू भेल छल आ चौबीस वर्ष बाद सन् ‍१९८४ई०मे पूर्ण भेल।हमसभ बड़ी काल धरि एहि म्युजियममे घुमैत रहलहुँ। आब रौद चढ़ल जा रहल छल। ओहिमे जान बँचबैत हमसभ आगू नालंदा म्युजियम पहुँचलहुँ।ई सन् ‍१९१७ई०मे स्थापित भेल छल। नालंदा विश्वविद्यालयक बहुत रास भग्नावशेष एहि ठाम राखल अछि।ओतए लगभग 350 कलाकृति प्रदर्शनीमे राखल गेल अछि  जखन कि तेरह हजारसँ बेसी संग्रह सुरक्षित राखल गेल अछि।हमसभ एहिठाम किछु समय बितओलाक बाद विदेशी लोकनि द्वारा स्थापित अनेक बुद्ध मंदिरसभ देखलहुँ। तकर बाद हम सभ प्राचीन नालंदा विस्वविद्यालयक खण्डहर देखबाक लेल बिदा भए गेलहुँ।

आटो बला आसपासक प्रमुख स्थानसभ घुमेलाक बाद हमरा नालंदा विश्वविद्यालयक भग्नावशेष लग छोड़ि देलक।हमसभ ओहिठाम टिकट कीनलहुँ आ भीतर प्रवेश केलहुँ। कनीके आगू गेलाक बाद एकटा प्रशिक्षित गाइड सेहो हमसभ कए लेलहुँ। ओ चारि सए टाकामे अपन सेवा देबाक लेल तैयार भए गेल रहथि। हमरा लोकनिक ई अनुभव रहल अछि जे कोनो ऐतिहासिक स्थानकेँ देखबाक लेल गाइड जरूर रखबाक चाही,भने ताहि लेल किछु खर्च भए जाए।अस्तु,हमसभ तुरंत ई काज केलहुँ।आब हमसभ चारि गोटे छलहुँ।हम दुनू गोटे,टैक्सी बला  आ गाइड।भोरसँ अखन धरि निरंतर व्यस्तताक कारण हमर श्रीमतीजी बहुत थाकि गेल रहथि। बेसी थकलाक बाद कहीं हुनकर कष्ट आर ने बढ़ि  जानि,तेँ हमसभ गाइडकेँ संक्षेपमे प्रमुख-प्रमुख स्थानसभ देखेबाक आग्रह केलिअनि जाहिसँ हमसभ बिना बेसी चलने अधिकसँ-अधिक जानकारी प्राप्त कए सकी। ओ से प्रयास यथासंभव केबो केलनि। मुदा बिना चलने कहीं देखल गेलैक अछि?तथापि,हमसभ प्रयास केलहुँ। ओहो निरंतर किछु-ने-किछु बतबैत रहलाह,सेहो बहुत रोचक ढंगसँ। लगपासमे बहुत रास विदेशी पर्यटकसभ घुमि रहल छलाह।हुनका लोकनिकेँ गाइडसभ हुनके भाषामे बुझा रहल छलखिन।ई कम गौरवक बात नहि अछि जे विश्वप्रसिद्ध नालंदा अपनेसभक बीचमे अछि। कहल जाइत अछि जे नालंदाक खंडहरक मात्र दस प्रतिशत खुदाइ भेल अछि।अखनहु नब्बे प्रतिशत खंडहर जमीनक नीचाँमे अछि। मुदा जतबे उपलब्ध अछि से अद्भुत अछि,ज्ञानसँ भरल अछि।

गाइड आगू बढ़ैत जा रहल छलाह,ठाम-ठाम उपलब्ध ऐतिहासिक चीज-वस्तुसभक बारेमे हमरा लोकनिकेँ बतवैत रहैत छलाह।सैकड़ों साल धरि नालंदा विश्वभरिक शिक्षाक केन्द्र छल। एतए हजारों विद्यार्थी विश्वभरिसँ अबैत छलाह। कहल जाइत अछि जे दू हजार शिक्षक हुनका लोकनिकेँ पढ़बैत छलाह। विद्यार्थी आ शिक्षक लोकनिक रहबाक लेल छात्रावासक उत्तम व्यवस्था छल,से अखनहु ऊपलब्ध खंडहरमे देखाइत अछि। भोजनालय,वाचनालय,पुस्तकालय  मंदिरसभक वहुत उत्तम व्यवस्था कएल गेल छल। ओ दिन केहन अभागल रहल होएत जखन कि विदेशी आक्रान्ता तुर्कीक क्रूर मुगल शासक बख्तियार खिलजी(कुतुबुद्दीन ऐबकक सैन्य सलाहकार)  एहि ठामक पुस्तकालयमे आगि लगा देलक।कहाँ दनि आगि लगलासँ पुस्तकालयक लाखो पोथीसभ मासक-मास धू-धू कए जरैत रहि गेल छल।कालक्रमे विश्वविद्यालयक भवनसभ  छाउरक ढेरीमे बदलि गेल।सालक-साल ओ ढेरी ओहिना उपेक्षित  पड़ल रहल। अंततोगत्वा, ओहिपर एकटा अंग्रेज अन्वेषकक ध्यान गेलनि।हुनका लोकनिक मेहनति आ सतत प्रयाससँ वर्तमान खंडहरसभ लोकक सामनेमे आबि सकल।

प्राचीन कालमे एशियाक सबसँ पैघ विश्वविद्यालयमे सँ एक नालंदा अपन उत्कृष्ट शिक्षा व्यवस्थाक लेल जानल जाइत छल ।एकर स्थापना 450 ई. मे गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमार गुप्ता द्वारा कएल गेल छल | हुनका बाद नालंदा विश्वविद्यालयकेँ सम्राट हर्षवर्धन आ पाल शासकक पूर्ण संरक्षण भेटल छल | करीब आठ सए वर्ष धरि ई ज्ञान प्रचारक प्रमुख केन्द्र बनल रहल छल।एहि ठाम महायान बुद्धक शिक्षाक केन्द्र छल। नालंदा विश्वविद्यालय तीन बेर नष्ट कएल गेल।पहिल विनाश स्कन्दगुप्त क शासन कालमे(४५५-४६७ई०)  मिहिरकुलक हूनक आक्रमणक कारण भेल छल।कहल जाइत अछि जे भारतीय वौद्ध भिक्षु शीलभद्र बख्तियार खिलजीक बिमारीक इलाज कए ओकर जान बचओने रहथि। ताहि उपकारक बदलामे ओ अगिले वर्ष,सन् ‍११९२मे नालंदा जा कए भिक्षुश्रेष्टक गर्दनि काटि कए चुकओलक ,संगे नालंदाक पुस्तकालयमे आगि लगा देलक।लौटती बेर मे विक्रमशिलाक पुस्तकालयमे सेहो आगि लगा देलक।सन् ‍१८१२ ई०मे स्काटिस सर्वेयर फ्रैंसिस बुकानन पुरना नालंदा विश्वविद्यालयकेँ फेरसँ तकलनि।सन् ‍१८६१मे सर एलेक्जेन्डर कनींघम विधिवत  एकरा प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालयक रूपमे चिन्हित केलथि।

हमरा लोकनि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालयक परिसरमे घुमैत काल भारतवर्षक गौरवशाली अतीतक भग्नावशेष देखि-देखि रोमांचित छलहुँ। मोनमे ई भाव अबैत रहल जे ज्ञानमे एतेक स्मृद्ध रहितहुँ हमसभ अपन एहन मुल्यवान धरोहरक रक्षा किएक नहि कए सकलहुँ?ज्ञानक संग-संग शक्तिक प्रयोजन इतिहासक एहि घटनासँ स्वतः सिद्ध होइत अछि-

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्‍ठत: सशरं धनु:। इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि।।

नालंदाक खंडहरसँ जेना  निरंतर चिकरि  रहल छल-

“जागू!जागू!हे भारत माताक संतानसभ!आबो जागू!

इतिहासक एहन मर्मान्तक घटनासँ सबक लिअ।आपसमे मिलि कए रहू जाहिसँ एकटा मजगूत आ संगठित राष्ट्रक रूपमे हमसभ दुनिआक सामनेमे प्रस्तुत होइ आ फेर केओ एहन कुकृत्य करबाक दुस्साहस नहि कए सकए।”

ई विचार हमरा मोनकेँ बेर-बेर हिलोरि रहल छल,  उद्वालित कए रहल छल। हमसभ उत्सुकतावश गाइडसँ बेर-बेर तरह-तरहक प्रश्नसभ करैत रहलिअनि। ओहो यथासंभव उत्तर दैत रहलाह। चारूकात पसरल ऐतिहासिक अवशेष देखबैत रहलाह। मुदा हमर श्रीमतीजी आब थाकि कए चूर-चूर  भए गेल छलीह। आखिर,हमसभ सही स्थान देखि विश्रामक लेल बैसि गेलहुँ।तखनहु हमसभ गाइडजीसँ बैसले-बैसल नालंदाक ऐतिहासिक प्रसंगसभ सुनैत रहलहुँ। कैकटा फोटो खिचओलहुँ आ वापस मुख्यद्वारि दिस बिदा भए गेलहुँ।

वापसी यात्रामे हमसभ सिलावमे रूकि ओहिठामक प्रसिद्ध खाजा कीनलहुँ।तीनटा बंडलमे अलग-अलग प्रकारक खाजासभ राखल छल।एकटामे गुंड़क ,दोसरमे नूनगर  आ तेसरमे चीनी बला खाजा राखल छल। तीनू पैकेट जतेक भारी नहि छल ततेक जगह छेकने छल। ओकरा सम्हारि कए टैक्सीमे राखि हमसभ आगू बढ़ि गेलहुँ। मंगल दिन छल,उपासक परना करबाक छल। साँझ होइत-होइत हमसभ अपन पटनाक डेरापर पहुँचि गेल रही।नालंदा-राजगीरक यात्राक स्मरण बड़ी काल धरि होइत रहल। बहुत किछु देखलहुँ आ बहुत किछु छुटि गेल। असलमे एक्के दिने कतेक देखि सकितहुँ। कम सँ कम दू दिन जरूरी छल। मुदा जतबे पार लागल सएह कोन कम। आब हमसभ बहुत थाकि गेल रही। अस्तु, भोजन कए जल्दीए सुति रहलहुँ।

बारह मार्च २०२५क साँझमे चेतना समितिक अध्यक्ष श्रीमती निशा मदन झाजीसँ हुनका ओहि ठाम भेंट करबाक लेल हमसभ गेल रही। हुनकर आवासपर करीब एक घंटा रहलहुँ। ओ अपन व्यक्तिगत आ सामाजिक जीवनक अनेक संस्मरणसभ सुनबैत रहलथि।घंटा भरिसँ बेसीए समय कोना बीति गेल से पता नहि लागल।ओही बीचमे  हमसभ जलखै केलहुँ,काफी पीलहुँ ।आब ओहि ठामसँ बिदा होएबाक समय छल ।लगैत छल जेना बहुत किछु गप्प करब बाँकी रहि गेल।मुदा साँझ पड़ि रहल छल। हुनको पुत्र फगुआक अवसरपर बाहरसँ माए लग  आएल छलखिन। मुदा ओतए जतबे काल रहलहुँ बहुत मोन लागल,बहुत किछु बुझबाक,सुनबाक अवसर भेटल । हुनकर जीवनक अनुभव आ उपलब्धिसँ परिचित होएबाक सौभाग्य भेटल। ओ हमरासभकेँ बहुत स्वागत केलनि। ओ बाहर धरि हमरा दुनू बेकतीकेँ अरिआति देलनि आ जाधरि टैक्सी आबि नहि गेल,ओतहि ठाढे रहि गेलथि। हुनकर विनम्रता आ आतिथ्य बिसरल नहि जा सकैत अछि।

‍१३ फरबरी २०२५क सभसँ पहिने हमसभ अपन वालसखा आ मित्र नवकरहीक आदरणीय श्री नारायण झाजीक आवासपर पहुँचलहुँ। हमसभ जतेक काल ओहि ठाम रहलहुँ,हुनकर पूरा परिवार हमरासभक स्वागतमे लागल रहलथि। अपने तँ ओ रहबे करथि। बहुत दिनक बाद हुनकासँ भेंट कए अपूर्व आनन्दक अनुभव भए रहल छल।हमसभ घंटा भरि ओहिठाम रहलाक बाद वापस अपन डेरा आबि गेलहुँ। फेर करीब दू बजे आटोसँ आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर इन्द्रकान्त झाजीक ओहिठाम बिदा भेलहुँ।

प्रोफेसर डाक्टर इन्द्रकान्त झा

पछिला कतेको  सालसँ आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर इन्द्रकान्त झाजीसँ हमरा संपर्क अछि।हम हुनका अपन कोनो पोथी पठओने रहिअनि। ओ ओहि पोथीकेँ तुरंत पढ़ि हमरा फोन केलनि  आ अपन सकारात्मक प्रतिक्रिया देलनि। तकर बाद तँ हम हुनका अपन किताबसभ नियमित पठबति रहलिअनि।  ओ ओकरा पढ़ि फोनपर अपन प्रतिक्रिया दैत रहलाह।ताहि संगे बड़ी काल धरि गप्प-सप्प,हास्य-व्यंग होइत छल। ओ सदिखन प्रसन्न आ आनन्दपूर्ण अवस्थामे रहैत छलाह। सभसँ प्रभावित करबाक बात तँ ई रहैत छल जे सभ तरहेँ संपन्न आ एतेक वरिष्ठ रहितहु हुनकामे अहंक कनीको  लवलेश नहि रहैत छनि। हुनकर सहज आ सरल व्यवहारसँ के नहि प्रभावित भए जाएत?स्वाभाविक छल जे हुनका प्रतिए हमर आदर बढ़ैत गेल।हुनकर बात-व्यवहार हमरा बहुत आकृष्ट केलक ।हुनकर सकारात्मक रुखि आ उत्साहवर्धनसँ हमरा  सृजनशील रहबाक  प्रेरणो भेटैत रहल। हम जे निरंतर आ नियमित  लिखैत रहलहुँ अछि ताहिमे हुनकर बहुत योगदान छनि। ओ हमर पठाओल  किताबसभ पढ़ैत रहलाह आ पढ़लाक बाद अपन मंतव्य दैत रहलाह जे बहुत लाभकारी सिद्ध  भेल।

हम मैथिलीमे लिखल अपन पोथीसभ हुनके नहि,अपितु अनेक विद्वान,मैथिलीक प्रोफेसर ,लेखक,समीक्षक लोकनिकेँ पठबैत रहलिअनि अछि। ओहिमे बहुत कम लोक छथि जे पार्सल पहुँचलापर पहुचनामो देथि,पढ़बाक  तकर बाद अपन प्रतिक्रिया देबाक बात तँ छोड़ू। मुदा किछु गोटे एकर अपवादो छथि, जाहिमे आदरणीय प्रोफेसर डाक्टर इन्द्रकान्त झाजीक नाम हमरा दृष्टिमे औअलि अछि। कारण किछु गोटे शुरूमे जरूर उत्साह देखओलनि,मुदा बादमे ओ हिलओलो,डोलओलोपर किछु नहि केलथि। मैथिली पाठक लोकनिक मध्य एहन संवादहीनता निश्चित रूपसँ बहुत दुखद अछि। आखिर पोथी तँ पाठकेक लेल लिखल जाइत अछि। यदि पाठक ओकरा पढ़थि,ओहिपर अपन मंतव्य स्पष्टता आ इमान्दारीसँ राखथि तखन तँ बाते किछु आओर होइत। मुदा से अछि नहि। परिणाम अछि जे किछु लोक जे अंट-संट लिखि दैत छथि आ जिनका किछु लोकक वरदहस्त प्राप्त छनि,सएह चलैत रहैत अछि।एहन परिस्थितिमे साहित्यिक जगतमे खास कए मैथिलीमे इन्द्रकान्त बाबू सन लोकक उपस्थिति बहुत माने रखैत अछि,बहुत आवश्यको अछि।

हमरे नहि अपितु अनेक नव,अज्ञात रचनाकारकेँ उत्साहित करबाक लेल माननीय इन्द्रकान्त बाबू सभ दिन मोन राखल जेताह। हम हुनकर एहि गुणक अनुशंसा,प्रशंसा अपन परिचित दूटा रचनाकार(कवि राज किशोर मिश्रजी आ आदरणीय कामेश्वर चौधरीजीसँ केने रहिअनि। ओहो सभ हुनकर संपर्कमे अएलथि। हुनके सभक सेहो बहुत नीक  अनुभव भेलनि। ई अछि हुनकर उदार आ जीवंत व्यक्तित्वक आभा जकर सानिध्यमे जे केओ गेलथि से निश्चित रूपसँ प्रभावित भेलथि,आनन्द उठओलथि आ लाभान्वित भेलथि।

इन्द्रकान्त बाबू कोरोना कालक समयमे २०२२मे दिल्ली आएल रहथि। ओ हमरा सूचितो केलनि,मुदा हमरा मोनमे कोरोनाक ततेक भय छल जे हुनका लग जेबाक साहस नहि भेल।ओ मास दिन लगीचेमे नोएडामे रहि कए वापस पटना चलि गेलथि ।हमरा बादमे एहि बातक बहुत अफसोच भेल रहए।

“भेंट करबाक चाहैत छल,जे होइतैक,देखल जइतैक।”-मोनमे सोचाए। मुदा जानक डर मामुली नहि होइत अछि, से भुक्तभोगीए कहि सकैत छथि। कोरोना तेहन आतंक पसारने छल जे सालक-साल संपूर्ण विश्वकेँ हिला कए राखि देलक,हमर कोन कथा?

अपन नोएडा-दिल्ली प्रवासक समयमे इन्द्रकान्त बाबू निरंतर संपर्कमे रहलाह। किछुओ नव बात होइतैक तँ अबस्से कहितथि।ओ कहथि जे कोना हुनकर सोसाइटीमे बूढ़सभक मध्य  प्रसिद्ध भए गेल छथि,कोना ओ हुनका लोकनिकेँ अपन कविता पाठसँ प्रभावित केलनि। अनेक तरहक समाचारसभ कहैत रहलथि। हुनकासँ भेंट नहि भेल,मुदा मोनमे ई निर्णय भए गेल जे पटना जाए जतेक जल्दी संभव होएत  हुनकासँ अबस्स भेंट करबनि।

समय बीतैत गेल,मुदा पटना जेबाक कार्यक्रम नहि बनि सकल। आखिर एहि बेरक ग्राम यात्राक बीचमे किछु दिनक लेल पटना जेबाक कार्यक्रम बनओलहुँ।फगुआसँ पहिने ‍१० मार्च २०२५ कए पटना पहुँचलहुँ। ओहिसँ एक दिन पहिने इन्द्रकान्त बाबूक फोन आएल छल। हम अपन संभावित कार्यक्रमक बारेमे कहलिअनि। ओ कहलाह-

“बहुत नीक समाचार देलहुँ। हमहूँ बहुत उत्सुक छी,अपनेसँ भेंट करबाक लेल। मुदा एगारह तारीख कए हम एकटा उपनयनक क्रममे बाबा वैद्यनाथ धाम जाएब आ  बारह तारीख कए लौटब।तकर बाद अबस्स भेंट भए सकत। ओना बारहो तारीख कए साँझक बाद भेंट भए सकत कारण हम ताधरि लौटि गेल रहब। ”

सभ बातक ध्यानमे रखैत हम तेरह तारीख कए हुनकासँ भेंट करबाक कार्यक्रम बनओलहुँ। ताहिसँ पूर्व हुनका फोन केलिअनि। ओ एक-दू बजेक अएबाक आग्रह केलनि।हम दू बजे एकटा आटोसँ हुनकर    डेरापर बिदा भेलहुँ। आटो चालक मुसलमान छलाह,मुदा रहथि बहुत नीक। ओ इन्द्रकान्त बाबूक राजेन्द्र नगर,पटना स्थित घरक लगीच धरि पहुँचा देलनि। मुदा तकर बाद हमसभ एमहर-ओमहर बौआए लगलहुँ।तकर कारण छल जे हमरा हुनकर घरक सही ठेकाना नहि छल। ने हम हुनकासँ से पुछि सकलिअनि। हमरा लग हुनकर डाक पता छलहे आ ओहि पतापर हम कैक बेर किताबसभ पठा चुकल छी। मुदा पार्सल आ मनुक्खमे फरक होइत छैक। आसपासक रोडक जनतब नहि रहबाक कारण हम करीब घंटा भरि बौआइति रहि गेलहुँ। एहि बीचमे हम हुनका अनेक बेर फोन केलिअनि। मुदा ओ फोन उठेबे नहि करथिन। फोनक घंटी बजैत-बजैत बंद भए जाइक। हम हुनकर दोसर मोबाइल नंबरपर फोन केलहुँ,हुनकर दिल्ली स्थित पुत्रक मोबाइलपर फोन केलहुँ। किछु आर गोटेकेँ सेहो फोन केलिअनि। मुदा सभ प्रयास व्यर्थ साबित भेल। हम आब बहुत परेसान भए गेल रही। लगपासमे केओ हुनकर घरक हुलिआ नहि बताबए। भेल जे आब वापस अपन डेरा लौटि जाइ कि एतबेमे हुनकर फोन आबि गेल।हुनकर ध्यान मोबाइल फोनमे हमर अनेक मिसकालपर गेलनि।ओ स्वयं हमर  पहुँचबामे भए रहल विलंबसँ चिंतित छलाह-

“रस्ता भुतला गेलिऐ की?”

“हमसभ लगीचे मे कतहु छी,मुदा अहाँक घर नहि ताकि पाबि रहल छी।”

“हमरा अंदाज लागि गेल। भारतीजी घंटा भरिसँ अहाँक प्रतीक्षा करैत-करैत चलि गेलाह। कोनो बात नहि।अहाँ फोन वाहन चालककेँ दिऔक।”

हम फोन वाहन चलाककेँ दैत छी। ओ रस्ताक सही जनतब हुनकासँ लेलक आ  पाँच मिनटक भीतरे हमरा अपन गंतव्य लग पहुँचा देलक।हम आटोसँ उतरैत छी तँ देखैत छी जे इन्द्रकान्त बाबू स्वयं गंजी-धोती पहिरने सड़कक कातमे हमर स्वागतमे ठाढ़ छथि। हुनकर बेचेनी स्पष्ट देखल जा सकैत छल। हम आटो बलाकेँ किराया दैत छी आ   अपन सामानसभक संगे हुनका पाछू-पाछू बिदा भए जाइत छी।सामनेमे रेलक आवागमन देखल जा सकैत छल।असलमे ओ स्थान राजेन्द्र नगरे रेल टीसनक पछुआर थिक।हम सामान सहित हुनकर भूतल स्थित घरमे हुनके संगे पहुँचैत छी।

भूतलपर स्थित हुनकर निवासपर  पहुँचतहि हमरा पाग,डोपटा पहिरा कए ओ स्वागत करैत छथि। हुनकर पौत्र तकर वीडियो बनबैत छथि,फोटो खिचैत छथि। तकर बाद ओ अपन लिखित पुस्तकसभ दैत छथि। हमहूँ अपन नवीनतम उपन्यास,यज्ञसेनी,हुनका देलिअनि। सभ घटनाक फोटो हुनकर खिचलथि,तकरासभकेँ बादमे   हमरो मोबाइलपर पठा देलथि। कहि नहि सकैत छी ,कतेक अपनत्व भाओसँ ओ हमरा स्वागत केलनि। रसगुल्ला,गुलाब जामुन,पेरा,खजूर खाउ,जतेक खाउ ,टेबुलपर राखल अछि। संगे हुनकर ओहूसँ बेसी मधुर व्यवहारसँ आनन्दक वर्षा भए रहल छल। करीब दू घंटा हम ओतए रहलहुँ। ओही बीच कामेश्वर चौधरीजीक फोन दिल्लीसँ आबि गेलनि। फोनपर भेल हुनकर वार्तालापपसँ सोनामे सुगंध लागि गेल। आब साँझ पड़ि रहल छल। हम हुनकासँ आशीर्वाद लए डेरा वापस बिदा भेलहुँ। ओ फेर हमरा सड़क धरि अरिआति देलनि। हुनकर विनम्रता आ सिनेहसँ हम अभिभूत छलहुँ। रस्ता भरि हुनकर ध्यान अबैत रहल।

फेसबुकपर हम आदरणीय प्रोफेसर इन्द्रकान्त झाजीसँ  भेंटक जनतब देलिऐक तँ अनेक विद्वानलोकनिक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया देखबामे आएल जाहिमे सँ किछु एहिठाम उद्धृत कए रहल छी-

आदरणीय प्रोफेसर भीमनाथझा-

भाग्यशाली तँ अहाँ छीहे। तकर एक प्रमाण ईहो। 'मिथिलाक रवीन्द्र'सँ सम्मानित हैब सामान्य बात नहि भैलै। ताहूमे एहि रंगदिवसपर...। हम तँ हिनका 'सर्वतंत्रस्वतंत्र' बुझै छियनि, महामहोपाध्यायोसँ पैघ। भविष्यमे हमरो लोकनि द' लोक कहत, जँ कहत तँ यैह जे ईहो सभ 'इन्द्रकान्त युग'क थिका।”

आदरणीय प्रोफेसर रमण झा

“बहुत -सुन्दर! आदरणीय इन्द्रकान्त बाबू स्वयं विद्वान छथि आ विद्वानक सम्मान करए जनैत छथि-

विद्वानेव हि जानाति विद्वज्जन परीश्रमम्।

न हि वन्ध्या विजानाति गर्भिणी प्रसवव्यथाम्।।

दुनू साहित्यकारकेँ बधाइ आ शुभकामना!

आदरणीय विनोदानन्द झा

“आदरणीय इन्द्रकान्तजीक ई विनम्रता सभकेँ भावुक कऽ दैत अछि। बधाइ।

(https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=pfbid027E4AdNnvDK32X15nkHrNZv3fPVudZSGpHMyo2vH38JCymy1pb34U8hwDFJQkLfw6l&id=100007950603547&rdid=JHtSnPJf4yfbcwqP#)

भेंट-घाँटक क्रममे आदरणीय प्रोफेसर इन्द्रकान्त झाजीसँ हुनके रचित किछु कवितासभ सुनबाक सुअवसर भेटल। कविताक किछु प्रमुख पाँति छल-

बूढ़ छी

बुढारी मे

उर्जावान छी

आँखि कान ठीक अछि

पढ़ै छी

लिखै छी

कवि सम्मेलनमे गरजै छी

हार्ट हमर अछि बड़ मजगूत

कते बूढाकेँ

हम मरैत देखने छी

हम डरै नहि छी

कन्हा दै छी

प्रसन्न रहै छी

हमरा ने कोनो बिमारी अछि

आइ काल्हि रह रहाँ हाइब्लडप्रेसर

लो बल्डप्रेसर आ डाइबीटीज

लोक सब केँ तंग करैए

मुदा हमरासँ कोसो दूर रहैए

हम खूब प्रेमसँ पनतुआ रसगुल्ला

चाभैत रहैत छी

आनन्दक जीवन बितबै छी।

(हम बूढ़ छी पृष्ठ ६०)

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बूढ़ छी

बुढ़ारी जीवन

जीबैक सलुक

हम जानै छी,

धिया-पुताक

सब बात हम मानै छी

बंशी बजबै छी

बाँसक नहि

चैनक बंशी

जखन जे दैए

खाए लै छी

नहि दैए

लोटा भरि पानि

पीब लै छी

ढ़ेकार करै छी

ककरो विरोधमे

किछु नहि बाजै छी

हमर बिरोधमे बाजैए

सुनियो कए अन्ठबै छी

सुखमय जीवन जीबै छी

(हम बूढ़ छी, पृष्ठ ८८)

ऊपरोक्त पाँतिसभमे आदरणीय इन्द्रकान्त झाजीक जीवनमे संतुष्टि भाओ आ वृद्धावस्थोमे जीवंतता बनओने रहबाक गूण स्पष्ट झलकैत अछि। जेहने सरस आ सार्थक कवितासभ ओ लिखैत छथि,वस्तुतः तेहने आनन्दमय जीवन ओ जीबैत छथि। इएह कारण अछि जे हुनकर कवितासभ पढ़ला,सुनलासँ जीवनमे उल्लास, उत्साह बढ़ैत अछि। जीवनक रहस्य बुझबामे,गुणबामे सफल ई कवितासभ सरिपहु अद्भुत अछि। इएह सभ सोचैत हम पटनाक केन्द्र सरकारक होलीडेहोम स्थित अपन डेरा दिस बिदा भए गेलहुँ।रस्ता भरि आ डेरापर पहुँचलाक बादो बड़ीकाल धरि हुनका बारेमे सोचैत रहि गेलहुँ-  सही मानेमे जतबे महान,ततबे विनम्र ,सरल आ व्यवहार कुशल छथि ओ ।

चौदह मार्चह २०२५क पटनामे फगुआ रहैक। कामेश्वर चौधरीजीसँ फोनपर भेल गप्पसँ फगुआमे पटनाक स्थितिक बारेमे जानकारी भेटि गेल रहए।से सभ देखबोमे आएल।एक दिन पहिने सँ होलीडे होम खाली भए गेल छल। ओहि ठाम मोसकिलसँ  दू-तीन गोटे रहि गेल होएब।ओतेकटा होलीडे होममे हमसभ असगर पड़ल रही। लिफ्ट बंद,कैंटीन बंद,भोरमे तँ पानिओ बंद भए गेल रहए। नीचाँक स्वागत कार्यालयमे कार्यरत दूटा कर्मचारी पीने बुत्त बगलक कोठरीमे बिना गंजी पहिरने पड़ल छलाह।एहनमे ककरा की कहल जाइत?आखिर,एकटा बगलमे रहि रहल परिवारक लोकसभ प्रयास कए पानि चलबओलनि। हमसभ एक दिन पहिने आनलाइन भोजनक सामानसभ मंगा लेने रही। ओएह काज आएल।भोरे चाहक अमल तेज पकड़लक। आब की करी? बाहर निकललहुँ।संयोगसँ होलीडे होमक  बाहर कनीके फटकी एकटा खोपड़ीमे चाह बिका रहल छल। ओतहिसँ चारि कप चाह अनलहुँ।एहि तरहेँ   दुनू गोटे भोरुका चाह पीबि सकलहुँ। अफसोच होअए जे आइ पटनामे किएक रहि गेलहुँ। हमरा तँ बूझल रहए जे फगुआ पन्द्रह मार्च कए हेतैक। मुदा ई पाबनि दू-दिना भए गेल रहैक। जे से।कहुना कए हमसभ ओहीठाम दिन बितओलहुँ।

पन्द्रह मार्च २०२५क हमरा भोरे इन्टरसिटी एक्सप्रेससँ मधुबनी वापस जेबाक छल। चिंता रहए जे भोरे टैक्सी भेटि सकत कि नहि।मुदा संयोगसँ ओलापर तुरंत टैक्सी बुक भए गेल। हमसभ निश्चित समयपर पाटलिपुत्र टीसनपर पहुँचि गेलहुँ। ओतहि चाहो पीलहुँ। सामान प्लेटफार्मपर लए जेबाक लेल कूली नहि भेटि रहल छल। रेलवे इनक्वायरी आफिससँ माइकपर घोषणा करबओलिऐक।से काज आएल। थोड़बे कालमे एकटा कूली ओहिठाम आबि गेल। ओएह हमरासभकेँ प्लेटफार्म नंबर चारिपर लए गेल आ ट्रेन अएलापर ओहिमे बैसाओ देलक। आब जखन ट्रेनमे बैसि गेलहुँ ,तखन चिंता कथीक? समयपर ट्रेन आबि गेलैक आ खुजिओ गेलैक।सभसँ नीक बात ई भेलैक जे हमसभ मधुबनी नियत समयसँ आधा घंटा पहिने पहुँचि गेलहुँ। मधुबनी टीसनपर सामानसभ उतारबामे एकटा युवक सहयात्री मदति केलनि।हमसभ ट्रेनसँ प्लेटफार्मपर उतरि गेलहुँ। ताबतमे ट्रेनक गेटपर एकटा यात्री मोबाइल फोन लेने दौड़ल।

“ई अहाँक मोबाइल फोन अछि की?”

हम अपन मोबाइल तकलहुँ ,ओहो अपन मोबाइल तकलथि।हमरसभक मोबाइलसभ सुरक्षित छल। तखन हम कहनाइ शुरूए केलहुँ-

“नहि,नहि हमरसभक नहि अछि,,,,।”एतबेमे ओ युवक सहयात्री दौड़ल गेट लग पहुँचलाह। ओ घामे-पसीने भीजि रहल छलाह। हुनकर मोबाइल चार्जींगमे लागल छलनि। हमरासभकेँ मदति करबाक लेल ओ बाहर आबि गेल रहथि आ मोबाइल ठामहि छुटि गेल रहनि।ओ मोबाइल फोन देखितहि बाजि उटलाह-

“ई हमर फोन अछि।”

हमसभ आश्वस्त भेलहुँ जे हुनकर फोन बाँचि गेलनि।अखनहु नीक लोक एहि दुनिआमे छथि,से सिद्ध भेल।हमरालोकनिक सहयात्रीक मोबाइल फोन भेटि गेलनि आ ओ परेसानीसँ बाँचि गेलाह,से सोचि बहुत संतोष भेल।आब हमसभ प्रसन्नतापूर्वक  आगू बढ़ि गेलहुँ, अपन मधुबनी डेरा दिस।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रबीन्द्र नारायण मिश्र

‍१३।०६।२०२५